कौन है ये मतला-ए-तख़ईल पर / 'अमीक' हनफ़ी

कौन है ये मतला-ए-तख़ईल पर महताब सा
मेरी रग रग में बपा होने लगा सैलाब सा

आग की लपटों में है लिपटा हुआ सारा बदन
हड्डियों की नलकियों में भर गया तेज़ाब सा

ख़्वाहिशों की बिजलियों की जलती बुझती रौशनी
खींचती है मंज़रों में नक़्शा-ए-आसाब सा

किस बुलंदी पर उड़ा जाता हूँ बर-दोश हवा
आसमाँ भी अब नज़र आने लगा पायाब सा

तैरता है ज़हन यूँ जैसे फ़ज़ा में कुछ नहीं
और दिल सीने में है इक माहि-ए-बे-आब सा

श्रेणी: ग़ज़ल

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है