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चालीस भाइयों की पहाड़ी : कश्मीरी लोक-कथा : Lok-Katha (Kashmir)


Chalis Bhaiyon Ki Pahadi : Lok-Katha (Kashmir)
कई साल पहले कश्मीर की ऊँची पहाड़ियों में एक धनी किसान रहता था, जिसका नाम द्रूस था। हालाँकि उसके पास बहुत सारी भेड़ें और मवेशी थे, लेकिन वह और उसकी पत्नी दोनों दु:खी थे, क्योंकि उनके विवाह के बाद से बच्चे नहीं हुए थे। उनकी प्रार्थनाएँ, संतों, पीरों और साधुओं की प्रार्थनाएँ भी बेकार चली गई थीं, उनका कोई परिणाम नहीं निकला था। एक दिन सफर से थका हुआ एक पीर गाँव में से होकर गुजरा। वह श्रीनगर में बागों और मेवे के उद्यानों के बीच आराम करने के रास्ते में था।

जब वह द्रूस के टेंट के पास से गुजर रहा था, पीर ने आवाज लगाई, ‘अल्लाह के नाम पर अपनी खैरात मुझे दे दो। मेरे पास न तो गोश्त है और न ही रोटी का टुकड़ा है।’

लेकिन द्रूस ने जवाब दिया, “मैं अपनी जिंदगी के हर दिन दयालु रहा हूँ; लेकिन अभी तक मुझे एक बेटे का वरदान नहीं मिला है, इसलिए मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दूँगा।’
“जिसे जन्नत ने मना कर दिया, उसे कौन मंजूर कर सकता है!’ पीर ने निढाल होते हुए कहा और दूसरे टेंट की तरफ चल दिया।

लेकिन पीर का युवा शिष्य, जो पीछे आ रहा था, ने आश्वस्त होकर अनुभव किया कि उसके पास दुःखी दंपती को संतुष्ट करने की शक्ति थी। उसने चालीस कंकर इकट्ठे करके बिना बच्चेवाली स्त्री की गोद में रख दिए और उसे आशीर्वाद दिया।
निर्धारित समय पर उस स्त्री ने पूरे चालीस बेटों को जन्म दिया–सबको एक ही समय में।
द्रूस बहुत परेशान और चिंतित हो गया। उसे विश्वास हो गया कि वह इतने सारे बच्चों को नहीं पाल सकेगा।

‘हम चालीस बच्चों के लिए रोटी नहीं जुटा सकते।’ वह अपनी पत्नी से बोला, ‘इसलिए केवल एक चीज है, जो हम कर सकते हैं। अपनी पसंद के एक लड़के को रख लें और शेष उनतालीस लड़कों को जंगल में ले जाएँ और उनको वहीं छोड़ दें। हमारी कठिन परिस्थिति से निकलने का और कोई रास्ता नहीं है।’

इसलिए एक को छोड़कर सभी बच्चे पहाड़ों पर ले जाए गए और भेड़ियों की दया पर वहीं छोड़ दिए गए। उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया था। लेकिन एक दिन पहाड़ियों में अपनी भेड़ों के झुंड को चराते हुए एक गड़रिए को एक हिरण का खास व्यवहार उन चट्टानों और बोल्डरों की तरफ ले गया, जिन्होंने एक कंदरा का मुख बंद कर रखा था। वहाँ उसने पाया कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चे जंगली ट्यूलिपों के बीच में खेलते हुए इधर से उधर दौड़ रहे थे।

गड़रिया लड़का डर गया। ‘ये बच्चे कौन हो सकते हैं?’ उसने आश्चर्य से सोचा, ‘ये इस निर्जन इलाके में कैसे आए? ‘

शाम को उसने अपने अनुभव के बारे में अपने पिता को बताया और वह खबर ऐसे फैली, जैसे उसे हवा ने फैलाया हो। अंततः यह बात द्रूस तक भी पहुँची। वह फौरन समझ गया कि उस निर्जन क्षेत्र में खेलनेवाले बच्चे उसके अपने थे। कई महीनों से वह पछता रहा था और दुःखी था, लेकिन अब वह खुशी से झूम उठा। वह उस पहाड़ी की तरफ दौड़ा, जहाँ उन्हें देखा गया था। उसने वहाँ देखा कि वे नन्हे-नन्हे बच्चे जंगली जैतून और पिस्ता के पेड़ों के बीच छुपा-छुपी खेल रहे थे। सभी बच्चे एक-दूसरे से मिलते थे और बहुत सुंदर थे; लेकिन अजनबियों से शरमाते थे। जब द्रूस उनसे बोला तो वे दौड़ गए और खुद को गुफाओं में छुपा लिया। उसने एक दिन और एक रात उनका इंतजार किया, लेकिन वे अपने छुपने के स्थान से बाहर नहीं आए और वह भारी मन से अपने घर लौट आया।

उसकी पत्नी, जिसका दिल अपने खोए हुए बच्चों की चाह में दुःखी हो रहा था, ने एक अन्य पीर से सलाह ली, जिसने कहा, ‘उनके भाई को ले जाओ, जिसे तुमने अपने पास रख लिया था। उसे लेकर उस पहाड़ी पर जाओ, जहाँ वे खेलते हैं। जब वहाँ पहुँचो तो उसे नीचे उतार देना और खुद छुप जाना।’

ममता से अभिभूत माँ ने ठीक वैसा ही किया, जैसा उससे कहा गया था और सच में वही हुआ, बच्चे उसके प्यारे बेटे के साथ खेलने के लिए बाहर निकल आए। नन्हे अजनबी और उसकी मधुर आवाज से आकर्षित होकर वे उसके पीछे-पीछे अपनी माँ के पास आ गए, जिसने उन्हें गले से लगाया और उन्हें मिठाइयाँ दीं और जल्दी ही बिना किसी कठिनाई के वह उन्हें उनके घर लाने में सफल हो गई।

द्रूस बच्चों को वापस पाकर इतना खुश था कि उसने गरीबों को उपहार और भोजन बाँटा और गाँव में संगीत तथा भोज का आयोजन हुआ। उसने सभी चालीस बच्चों को नमाज अदा करना और पवित्र किताबें पढ़ना सिखाया। लेकिन अल्लाह का फरमान यह था कि देवदूत अजराइल एक ही समय में चालीसों की साँसें ले ले।
सारे चालीस बच्चे, अचानक, एक ही दिन मर गए।

पूरे गाँव में मातम छा गया और लगातार तीन दिन और तीन रात तक दुआएँ की गई। अंतिम संस्कार में भाग लेने आए अनेक मित्रों के लिए भोजन तैयार किया गया। उसके बाद चालीस भाइयों को उस पहाड़ी पर ले जाया गया, जहाँ वे पाए गए थे और सुनसान क्षेत्र में, उसी पहाड़ी पर उन्हें दफना दिया गया, जहाँ वे जंगली ट्यूलिपों के बीच खेलते थे।

और आज के दिन तक बच्चे अभी भी रहस्यमय पर्वत पर घूमते हैं, जिसे ‘कुह चेहल तान’, ‘चालीस भाइयों की पहाड़ी’ के नाम से जाना जाता है।

(रस्किन बांड की रचना ‘कश्मीरी किस्सागो’ से)

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ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित विजेताओं को सूची

वर्ष लेखक का नाम भाषा
1965जी. शंकर कुरुपमलयालम
1966ताराशंकर बंद्योपाध्यायबंगाली
1967कुवेम्पुकन्नड़
1967उमाशंकर जोशीगुजराती
1968सुमित्रानंदन पंतहिंदी
1969फ़िराक़ गोरखपुरीउर्दू
1970विश्वनाथ सत्यनारायणतेलुगु
1971बिष्णु डेबंगाली
1972रामधारी सिंह दिनकरहिंदी
1973डी. आर. बेंद्रेकन्नड़
1974वि. स. खांडेकरमराठी
1975अकिलनतमिल
1976आशापूर्णा देवीबंगाली
1977के. शिवराम कारंतकन्नड़
1978अज्ञेयहिंदी
1979बिरेंद्र कुमार भट्टाचार्यअसमिया
1980एस. के. पोट्टेक्काटमलयालम
1981अमृता प्रीतमपंजाबी
1982महादेवी वर्माहिंदी
1983मास्ति वेंकटेश अयंगारकन्नड़
1984ठाकाज़ी शिवशंकर पिल्लैमलयालम
1985पन्नालाल पटेलगुजराती
1986सच्चिदानंद राउतरायओड़िया
1987विष्णु वामन शिरवाडकरमराठी
1988सी. नारायण रेड्डीतेलुगु
1989कुर्रतुलऐन हैदरउर्दू
1990वी. के. गोकककन्नड़
1991सुभाष मुखोपाध्यायबंगाली
1992नरेश मेहताहिंदी
1993सिताकांत महापात्रओड़िया
1994यू. आर. अनंतमूर्तिकन्नड़
1995एम. टी. वासुदेवन नायरमलयालम
1996महाश्वेता देवीबंगाली
1997अली सरदार जाफ़रीउर्दू
1998गिरिश कर्नाडकन्नड़
1999निर्मल वर्मा / गुरदयाल सिंहहिंदी / पंजाबी
2000इंदिरा गोस्वामीअसमिया
2001राजेंद्र शाहगुजराती
2002डी. जयकांतनतमिल
2003विंदा करंदीकरमराठी
2004रहमान राहीकश्मीरी
2005कुंवर नारायणहिंदी
2006रवीन्द्र केलेकर / सत्यव्रत शास्त्रीकोंकणी / संस्कृत
2007ओ. एन. वी. कुरुपमलयालम
2008शहरयारउर्दू
2009अमरकांत / श्रीलाल शुक्लहिंदी
2010चंद्रशेखर कंबरकन्नड़
2011प्रतिभा रायओड़िया
2012रवुरी भारद्वाजतेलुगु
2013केदारनाथ सिंहहिंदी
2014भालचंद्र नेमाडेमराठी
2015रघुवीर चौधरीगुजराती
2016शंख घोषबंगाली
2017कृष्णा सोबतीहिंदी
2018अमिताव घोषअंग्रेज़ी
2019अक्कित्थम अच्युतन नम्बूदिरीमलयालम
2021नीलमणि फूकनअसमिया
2022दामोदर मौज़ोकोंकणी
2023गुलज़ार / रामभद्राचार्यउर्दू / संस्कृत
2024विनोद कुमार शुक्लहिंदी

रुहेलखंडी लोकगीत हिंदी में | Ruhelkhandi Lok Geet

 होली के गीत

Ruhelkhand ke lokgeet


त्योहारों को आधार बनाकर गीत लिखने की परम्परा हमारे देश में अत्यन्त प्राचीन है। भारतवर्ष के प्रत्येक हिस्से में प्रारम्भ से ऐसे गीतों की रचना की गयी जो विभिन्न त्योहारों के अवसर पर गाये जाते थे। रुहेलखण्ड क्षेत्र में ऐसे अनेक गीतों की रचना की गई, जिन्हें त्यौहारों के मौके पर गाया जाता है। होली के अवसर पर गाऐ जाने वाले गीतों की अपनी पृथक पहचान हैं। इन गीतों में कुछ इस प्रकार हैं--


होली गीत

सं०- (i )


कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई

आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ

कल कहाँ थे कन्हाई हमें रात नींद न आई


एजी अपनी जली कुछ कह बैठूँगी,

सास सुनेगी रिसाई हमें नींद न आई।


एजी तुमरी तो रैन -रैन से गुजरी,

कुवजा से आँख लगाई हमें रात नींद न आई।


एजी चोया चंदन और आरती,

मोति न मांग भराई हमें रात नींद न आई।


कल थे कहाँ कन्हाई हमें रात नींद न आई,

आओ -आओ कन्हाई न बातें बनाओ,

कल थे कहाँ कन्हाई हमें रात नींद न आई,।


होली गीत

सं०- (ii )


र्तृया होली में ला दो गुलाल मेरा जिया न माने रे,

खाने को ला दो पूरी कचौरी चखने को लादो कवाब,

मेरा जिया न माने रे।


पीने को लादो लैमन बोतल चखने को लादो शराब

मेरा जिया न माने रे।


बजानो को लादो तबला सारंगी गढ़ने को लादो किताब,

मेरा जिया न माने रे।


बैठने को लादो चौकी कुर्सी लिखने को लादो किताब,

मेरा जिया न माने रे।


रंगने को लादो पुड़िया बसंती मलने को ला दो गुलाल,

मेरा जिया न माने रे।


होली गीत

सं०- (iii )


अरी भागो री भागो री गोरी भागो,

रंग लायो नन्द को लाल।


बाके कमर में बंसी लटक रही

और मोर मुकुटिया चमक रही


संग लायो ढेर गुलाल,

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,

रंग लायो नन्द को लाल।


इक हाथ पकड़ लई पिचकारी

सूरत कर लै पियरी कारी

इक हाथ में अबीर गुलाल


अरी भागो री भागो री गोरी भागो,

रंग लायो नन्द को लाल।

भर भर मारैगो रंग पिचकारी


चून कारैगो अगिया कारी

गोरे गालन मलैगो गुलाल

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,

रंग लायो नन्द को लाल।


यह पल आई मोहन टोरी

और घेर लई राधा गोरी

होरी खेलै करैं छेड़ छाड़

अरी भागो री भागो री गोरी भागो,

रंग लायो नन्द को लाल।


होली की चौपाइयाँ


रुहेलखण्ड के गाँवों में होली के उपरान्त लोग होली मिलन हतु सामूहिक स्थल पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर लोग गोलाकार श्रृँखला बनाकर नृत्य करते हैं और विभिन्न प्रकार की चौपाइयाँ गाते हैं। यह चौपाई परम्परागत है । ढोल की संगत पर गाई जाने वाली इन चौपाइयों में गाँव के समस्त लोग हिस्सा लेते हैं।


इन चौपाइयों में से कुछ इस प्रकार हैं --


चौपाई

सं० - (i )


चौपाई का विषय -- रामचन्द्र जी की वन यात्रा


वन को चले दो भाई री माई इन्हें समझावो न कोई,

आगे -आगे राम चलत हैं,पीछे से लक्ष्मण भाई री माई,

इन्हें समझावो न कोई ।


ताके पीछे चलैं जानकी शोभा बखानी न जाए री माई

इन्हें समझावो न कोई ।


राम बिना मेरी सूनी आयोध्या, लक्ष्मण बिना ठकुराई,

सीता बिना मेरी सूनी रसुइया ,जे दुख सहे न जाये री,

इन्हें समझावो न कोई ।


अरे भादों की रैन अन्धेरी पवन चलैं पुरवाई,

इन्हें समझावो न कोई ।


वन को चले दो भाई री माई इन्हें समझावो न कोई,

आगे -आगे राम चलत हैं,पीछे से लक्ष्मण भाई री माई,

इन्हें समझावो न कोई ।


चौपाई

सं० - (ii )


चौपाई का विषय -- मन्दोदरी द्वारा रावण को यह समझाना कि वह सीता राम को लौटा दें।


उठ देखो समुद्र जी के तीर रे बलम

जनक सिया जी के पति आए

पड़े -पड़े दिन बहुतक हुए गए

समुद्र बधतु है नाए रे बालम

जनक सिया जी के पति आए


सिला काट हनुमत लै आए

उसई से सेतु बधो रे बालम

जनक सिया जी के पति आए रे


चन्दन कटवावो रथ बनवावो

सिये लैओ बैठाए रे बालम

जनक सिया जी के पति आए


क्यों मन डरपे चतुर कामिनी

क्यों मन शंका खाए रे बालम

जनक सिया जी के पति आए


महादेव शिव शंकर वश में

काल बँधो पाटी से हमारे

जनक सिया जी के पति आए


उठ देखो समुद्र जी के तीर रे बलम

जनक सिया जी के पति आए।


चौपाई

सं० - (iii )


चौपाई का विषय -- राम के बनवास के दौरान की घटनाओं का संक्षिप्त विवरण


राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर

पहले राम तपे वन में तपसी दोनों वीर 

पंचवेदिका तापे रे सरजू के तीर

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


दूजे मया मृग मारन को निकले दोनों वीर

बिना मारे मृग को रे अचबए को नीर

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


तीजै रौजा छल कीनो सीता जी के साथ

सिया हरी बन में से रे माता भिक्षा डार

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


चौथो सोंच जटायु को दशरथ जी को सोंच

सिया हरि बन में से तिनहु को सोंच

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


पंचाए तस्सुरा मारन को खरदूषण मार

नार ताडुका मारी से नक लीनी काट

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


छठे वाण छल से मारो प्रभु एकहे वाण

राज दियो सुग्रीवो रे अंगद जुवराज

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


सातवें सायथ शादी रे अंजन के लाल

जाए समुद्र में छाए रे दल उल्ले पार

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


आठमे पद में आठासी से लौके भगवान

सेतु बाँध दल उतरे रे दल पल्ले पार

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


नवें वाण झर लागो रे धरती धर्म द्वार

हर की शरणा लागी रे उभरें रे प्राण

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


दसए रावण हाँसो रे जुद खेलो अथाय

सीधो चलो बैकुंठो रे रघुवर के हाथ

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


एकादशी गड़ तोरो रे सिया लाए लिवाए

जाए अवधपुर छाए रे घर मंगल चार

राम लखन सिया कैसे रे कहाओ हनुमत वीर


चौपाई

सं० - (iv )


नीम पेठ आ गईं नींव निवौरी

आम पे आ गए अम्बा

होली पे आ गए पान फूल

पनिहारी पे जोवन धल्ला

तेरी कौन जात परिहार ठाड़ी होई जा री।

विवाह के गीत


विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीत


शादी विवाह के अवसर पर गीत गाने की परम्परा हमारे देश की संस्कृति का अभिन्न अंग है। इन गीतों के अभाव में विवाह के अवसर को पूर्ण नहीं माना जाता । रुहेलखण्ड में ऐसे अनेक लोक गीत प्रचलित हैं, जिन्हें विवाह के अवसर पर गाया जाता है। परिवार की महिलाएं ढोलक -- मजीरे की ताल पर सामूहिक रुप से इन गीतों को गाती हैं। प्राय: इन गीतों की धुन पर महिलाएं नृत्य करती हैं। इनमें से कुछ गीत इस प्रकार हैं--


गीत

सं० --(i )


बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।

मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।


बाबा तेरे बैठे नाना तेरे बैठे

मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।


नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के, पायल उतार के।

आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ी।।


बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।

मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।


चाचा तेरे बैठें, ताऊ तेरे बैठे।

मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।


नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के,पायल उतार के।

आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ी।।


बन्ना बुलाए, बन्नो न आए।

मैं कैसे आऊँ , बन्ना मेरी पायल बजनी है।।


नीचे निगाह डाल कै लम्बा घूँघट काढ़ के, पायल उतार के।

आज मेरी बन्नो रे, अटरिया मेरी सूनी पड़ीं।।


 


गीत

सं० --(ii )


लगन आई हरे- भरे

लगन आई मेरे अँगना।

चाचा सज गए. चाची सज गईं,

सज गयी सारी बारात।


रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।


लगन आई हरे- भरे

लगन आई मेरे अँगना।

मामा सज गए. मामी सज गयीं,

सज गयी सारी बारात।


रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।


लगन आई हरे- भरे

लगन आई मेरे अँगना।

भईया सज गए. भाभी सज गयीं,

सज गयी सारी बारात।


रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।


लगन आई हरे- भरे

लगन आई मेरे अँगना।

फूफा सज गए. बुआ सज गयीं,

सज गयी सारी बारात।


रघुन्नदन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान।।



गीत

सं० --(iii )


बन्नो सोहाग भरी किसी को न न लगे। बन्नो

दादी आई सोहाग चढ़ाने माता आई सोहाग चढ़ाने

उसकी मोतिन से मांग भरी।


और फूलों से गोद भरी। किसी ताई आई सोहाग

चढ़ाई चाची आई सोहाग चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।


और फूलों से गोद भरी। किसी बुआ आई

सोहाग चढ़ाने मौसी आई सोहाग चढ़ाने

जीजा आई सोहाग चढ़ाने भाभी आई सोहाग

चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।


और फूलों से गोद भरी। किसी नानी आई सोहाग

चढ़ाने मामी आई सोहाग चढ़ाने मोतिन से मांग भरी।


और फूलों से गोद भरी। किसी मेरी लाड़ो

सोहाग भरी किसी की न ना लगे।


 


गीत

सं० --(iv )


सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना

सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना


तुम आए चटक चदरिया, सिर पै रखो गगरिया,

छोटी ननद लै लेओ साथ।

सासुल पनिया कैसे लाऊँ रसीले दोऊ नैना।


मैने ओढ़ी चटक चुनरिया,सिर पै रखी गगरिया,

छोटी ननदी लै लई साथ ।

रसीले दोऊ नैना।


तुम बैठो कदम की छैया, मैं भर लाऊँ ठन्डो पनिया,

ननदी गर मत कहइयो जाय।

रसीले दोऊ नैना।


वह मोसे पहले आई,उसने दो की चार लगाई,

भैया भाभी के दो यार।

रसीले दोऊ नैना।


फाल्गुन में ब्याह कर्रूँगी,बैसाख में गौना कर्रूँगी,

ननदी कबहूँ न लेऊ तेरो नाम।

रसीले दोऊ नैना।


फाल्गुन में ब्याह रचइयो, बैसाख में गौना करइयो,

भाभी तीजो पे लियो बुलाय,

रसीले दोऊ नैना।

सावन के गीत


विभिन्न ॠतुओं को आधार बनाकर गीत लिखने की परम्परा अति प्राचीन है। सावन ॠतु को आधार बनाकर असंख्य गीत लिखे गये हैं। रुहेलखण्ड क्षेत्र में भी ऐसे गीतों का दर्शन होते हैं। इसी प्रकार के गीत हैं--


गीत

सं०--(i )


ऊँची अटरिया झझन किवरिया,

कोरी आवे झरोकन व्यार जी।

विजनी डुलाउत सास नै देखो,

कोई सास को मुडवा पिराने जी।


लावौ ना अम्मा मेरी कसी खुरपिया,

कोई जंगल बूटी लै आवै जी।

कोई लावै ना रनिया करेजी जी।


लावै ना जम्मा मेरी पाँचौ से कपड़े,

कोई लावौ ना पाँचौ हतियार जी।

कोई रनिया करेजी लै आवे जी,

लेउ ना अम्मा मेरी रनिया करेजी कोई घिस-घिस मुडवा लगावौ


कोह कौ -- बेटा मेरे छलवल करत हौ,

कोई लाए न हिरन करेजी जी।

तुमरे पीहर में रनिया ब्याह उठो है, 

कोई तुम्हे पीहर पहुचावें जी।


न मेरे भैया न भतीजो,

कोई कि घर उठो है ब्याहो जी।

तुमरे पिछले रनिया भैया जो जनमें,

कोई उन्हीं को उठो है ब्याहो जी।

आपको तो राजा ने घुडेला सजाये,

कोई रनिया को डुलिया सजायी जी।


एक वन नागो दूजो वन नागो,

कोई तिजवन पहुँचे वन जाये जी।


न हिया चिरही न दिया चिरमगली,

कोई वन में काहे ले आए जी।

पहली कटारी जब मारी है राजा नै,

कोई लै लई वैयान बीच जी।


दूसरी कटारी जब मारी राजा नै,

कोई लै लई जंघन बीच जी।

बिना खता के राजा काहे कौ मारौ,

कोई बाई कोख नन्द लाल जी।


तीसरी कटारी जब मारी है राजा नै,

तीसरी में तजे है प्राण जी।

बाई हाथ राजा लई है करेजी,

कोई दाहिने लहै है नन्द लाल जी।


मलिन -मलिन में बेचत फीरत है,

कोई लाल नै लैलो मौल जी।

कई रुपैया जाको मोल बुलत है,

कोई कइयो रुपैया दै दो जी।


लाख रुपैया जाको मोल बुलत है,

कोई पाँच रुपैया दे दो जी।

लेयो न अम्मा मेरी रनिया करेजी,

कोई घिस- घिस मुडवा लगावोजी।


लावो न अम्मा मेरी पाँचों से कपड़े

होई हम जोगी हो जावेगें।

चन्दा सा मेरी बहू गई है सूरत सी ससुराल जी

काहो को बेटा मेरे सोच करत हो दो--दो व्याहंगी

करा एक गोरी एक साँवली जी।



गीत

सं०--(ii )


नन्हीं - नन्हीं बुदियाँ सावन का मेरा बरसना जी।

पहला झूला -झूला मैनें बावुल जी के राज्य में,


सारी -सारी रतियां बागों का मेरा झूलना जी।


पहला झूला -झूला मैनें भैया जी के राज्य में,


सारी -सारी रतियां सखियों संग मेरा झूलना जी।


एक झूला- झूला मैंने ससुरा जी के राज्य में,


सारी -सारी रतियां महलों में मेरा झूलना जी।


एक झूला- झूला मैंने ससिया जी के राज्य में,


सारी -सारी रतियां सेजों पर मेरा झूलना जी।



नवरात्र के गीत


नवरात्र के अवसर पर गाये जानेवाले गीत


विभिन्न धार्मिक अवसरों का गीतों से गहन सम्बन्ध है। नवरात्र के अवसर पर गाये जाने वाले गीत , भारत के अनेक प्रान्तों में देखे जा सकते हैं। रुहेलखण्ड के गाँवों में ऐसे अनेक गीत प्रचलित हैं , जिन्हें नवरात्र में गाया जाता है। इनमें से कुछ गीत इस प्रकार हैं --


गीत

सं०--i


पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,

सासुल पीसे पीसनो, ससुरा सौवो खाट।

निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।


पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,

देवरानी पीसे पीसनो, देवर सौवो खाट।

निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।


पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,

भाभी पीसे पीसनो, भाईया सौवो खाट।

निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।


पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,

चाची पीसे पीसनो, चाचो सौवो खाट।

निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।


पलका पीतल को बनवा लो, पटापट बोले लांगुरिया,

मामी पीसे पीसनो, मामा सौवो खाट।

निवृत आवै पीसनो ,सरकत आवै खाट।।


गीत

सं०--ii


दो- दो जोगिनी के बीच अकेला लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली झूमड़ ला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली लटकन ला दे मोय।

दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली नथनी ला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली झमका ला दे मोय।

दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली हरवा ला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली पैन्डल ला दे मोय।

दो - दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली तगड़ी ला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली गच्छा ला दे मोय।

दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली पायलला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली आयल ला दे मोय।

दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


पहली जोगिनी यो उठ बोली बिन्दा ला दे मोय,

दूजी जोगिनी यो उठ बोली सिन्दूर ला दे मोय।

दो- दो जोगिनी के बीच अकेली लांगुरिया।


गीत

सं०--iii


मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।


मेरो ससुरा जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,

बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,

मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।


मेरो जेठ जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,

बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,

मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।


मेरो देवर जान नाय देय भवानी जी के दर्शन कौ,

बहुअर घर ही से माँगो वरदान हाथ जोड़ विनती करौ,

मेरो जीय लहरिया लेय भवानी जी के दर्शन कौ।


नवरात्र के समय रुहेलखण्ड को गाँवों और नगरों में छोटी -छोटी बच्चियों द्वारा गाए जाने वाले झुझिया गीत भी अत्यन्त लोकप्रिय हैं। नवरात्र के दिनों में छोटी बच्चियाँ टोलियाँ बनाकर घर-घर जाती हैं और इन गीतों को सामूहिक रुप से गाती हैं। इन गीतों को गाते समय यह बालिकाएं अपने साथ मिट्टी से बने जालीदार कंडील भी रखती हैं। छोटे- छोटे इन कंडीलों के भीतर दिया जलाया जाता है, जिससे कंडील सुन्दर प्रतीत होते हैं।

जो देखकर भी नहीं देखते – हेलेन केलर हिंदी निबंध | Jo Dekhakar Bhee Naheen Dekhate

कभी-कभी मैं अपने मित्रों की परीक्षा लेती हूँ, यह परखने के लिए कि वह क्या देखते हैं। हाल ही में मेरी एक प्रिय मित्र जंगल की सैर करने के बाद वापस लौटीं। मैंने उनसे पूछा, “आपने क्या-क्या देखा?”



“कुछ ख़ास तो नहीं,” उनका जवाब था। मुझे बहुत अचरज नहीं हुआ क्योंकि मैं अब इस तरह के उत्तरों की आदी हो चुकी हूँ। मेरा विश्वास है कि जिन लोगों की आँखें होती हैं, वे बहुत कम देखते हैं।



क्या यह संभव है कि भला कोई जंगल में घंटाभर घूमे और फिर भी कोई विशेष चीज़ न देखे? मुझे—जिसे कुछ भी दिखाई नहीं देता—सैकड़ों रोचक चीज़ें मिलती हैं, जिन्हें मैं छूकर पहचान लेती हूँ। मैं भोज—पत्र के पेड़ की चिकनी छाल और चीड़ की खुरदरी छाल को स्पर्श से पहचान लेती हूँ। वसंत के दौरान मैं टहनियों में नई कलियाँ खोजती हूँ। मुझे फूलों की पंखुड़ियों की मखमली सतह छूने और उनकी घुमावदार बनावट महसूस करने में अपार आनंद मिलता है। इस दौरान मुझे प्रकृति के जादू का कुछ अहसास होता है। कभी, जब मैं ख़ुशनसीब होती हूँ, तो टहनी पर हाथ रखते ही किसी चिड़िया के मधुर स्वर कानों में गूँजने लगते हैं। अपनी अँगुलियों के बीच झरने के पानी को बहते हुए महसूस कर मैं आनंदित हो उठती हूँ। मुझे चीड़ की फैली पत्तियाँ या घास का मैदान किसी भी महँगे कालीन से अधिक प्रिय है। बदलते हुए मौसम का समाँ मेरे जीवन में एक नया रंग और ख़ुशियाँ भर जाता है।



कभी-कभी मेरा दिल इन सब चीज़ों को देखने के लिए मचल उठता है। अगर मुझे इन चीज़ों को सिर्फ़ छूने भर से इतनी ख़ुशी मिलती है, तो उनकी सुंदरता देखकर तो मेरा मन मुग्ध ही हो जाएगा। परंतु, जिन लोगों की आँखें हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं। इस दुनिया के अलग-अलग सुंदर रंग उनकी संवेदना को नहीं छूते। मनुष्य अपनी क्षमताओं की कभी क़दर नहीं करता। वह हमेशा उस चीज़ की आस लगाए रहता है जो उसके पास नहीं है।



यह कितने दुख की बात है कि दृष्टि के आशीर्वाद को लोग एक साधारण सी चीज़ समझते हैं, जबकि इस नियामत से ज़िंदगी को ख़ुशियों के इंद्रधनुषी रंगों से हरा-भरा किया जा सकता है।

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