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जौहरी (कहानी) | Jauharee : एच. जी. वेल्स

चांसलरी लेन में किन्हीं अपरिहार्य व्यस्तताओं के चलते मैं रात को नौ बजे तक व्यस्त रहा आया था और हल्के से सिरदर्द के कारण मेरा मन न तो आगे काम करने का रह गया था और न ही किसी प्रकार के मनोरंजन की तलाश का। ट्रैफ़िक से सँकरी हो चुकी उस गली में झाँकता छोटा-सा आकाश ख़ामोश रात की घोषणा कर रहा था, इसीलिए मैंने नदी के किनारे जा आँखों को आराम देने के विचार से नदी में शहर की झिलमिलाती रोशनियों को देखने का निश्चय कर लिया। अब इसमें तो कोई संदेह है ही नहीं कि शोर-शराबे भरे शहर की रातों में सुकून अधिक नहीं मिलता। अंधकार कृपा कर गंदगी को छिपा देता है और इस तेज़ी से भागते युग की लाल, चमकीली नारंगी, गैस की पीली और बिजली की तेज़ सफ़ेद रोशनियाँ धुँधली परछाइयों में दिखती गुमती—रहती हैं—गहरी स्याह और गाढ़े लाल रंग के बीच। वाटरलू पुल पर लगे सौ लैंप पोस्टों की रोशनियाँ नदी के ढाल को स्पष्ट कर देती हैं और उसके ऊपर से झाँकती रहती हैं वेस्टमिस्टर टावर्स की स्याह परछाइयाँ। ख़ामोशी के साथ काली नदी बहती रहती है, जिसे कभी-कभार कोई लहर भंग कर देती है और नदी के ऊपर तैरती रोशनियों की परछाइयों के टुकड़े हो जाते हैं। “आह...