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बस अड्डे पर (कहानी) | Bas Adde Par : नजीब महफूज़

बादल घिर आए और इतने गहरा गए मानों रात हो आई हो। हल्की-हल्की बूँदें पड़ने लगीं। सड़क की धूल ठंडी हवाओं ने झाड़ दी थी, बस उसकी उमस भरी गंध रह गई थी। राहगीर तेज़-तेज़ भागे जा रहे थे। कुछ लोग बस-स्टॉप की शेड के नीचे सिमट आए थे। यह साधारण-सा दृश्य ठहरा-ठहरा ही रह गया होता, अगर बग़ल की गली से एक आदमी निकलकर पागलों की तरह दौड़ता सामने वाली गली में न चला गया होता। उसके पीछे-पीछे लोगों का हुजूम था। वे चिल्ला रहे थे—’चोर-चोर, पकड़ो पकड़ो!’ शोर कम होते-होते अचानक बंद हो गया। बूंदाबाँदी रुकी नहीं। सड़क तक़रीबन सुनसान थी, बस कुछ लोग बस स्टॉप के शेड के नीचे खड़े थे। कुछ बस का इंतज़ार कर रहे थे, कुछ भीग जाने के डर से बूंदाबाँदी रुकने के इंतज़ार में खड़े थे। दौड़ा-दौड़ी की आवाज़ें फिर आने लगीं। वे नज़दीक आते जा रहे थे, उनकी आवाज़ें तेज़ हो रही थीं। सामने दिखने लगा था कि कुछ लोगों ने चोर को पकड़ रखा था। आसपास खड़े नौजवान ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहे थे चिल्ला रहे थे। रास्ते में उसने भागने की कोशिश भी की, लेकिन उन्होंने पकड़ लिया और लात-जूतों से उसकी ख़बर लेने लगे। इस ज़बरदस्त पिटाई के बीच वह हवा में हाथ-पाँव...