और फिर, छह बरसों के बाद इसने उसे दोबारा देखा। वह बाँस से बनी उन छोटी-छोटी मेज़ों में से एक पर बैठा था। मेज़ काग़ज़ से बने डेफोडिल फूलों के जापानी गुलदस्ते से सजी हुई थी। सामने फलों की एक बड़ी प्लेट रखी हुई थी और वह अपने उसी ख़ास अंदाज से संतरा छील रहा था, जिसे वह ख़ूब पहचानती थी और इसी वजह से इसने उसे फ़ौरन पहचान लिया। उसने भी अपने भीतर अचानक पहचान लिए जाने को एक झटके के साथ महसूस किया। क्योंकि जैसे ही उसने सिर उठाया था, उन दोनों की आँखें मिली थीं। नामुमकिन! वह एकदम से पहचान ही नहीं पाया! वह मुस्कराई; इसने त्यौरियाँ चढ़ा लीं। वह उसके क़रीब आई। उसने पल भर के लिए आँखें बंद कीं, पर आँखें खोलते ही उसका चेहरा चमक उठा, जैसे अँधेरे कमरे में माचिस की तीली जलाने से होता है। उसने संतरा रख दिया और कुर्सी पीछे की तरफ़ खिसका दी। इसने गर्माहट भरा अपना हाथ दस्ताने में से बाहर निकाला और उसके हाथ में दे दिया। “वैरा”, यह विस्मय से चिल्लाया “कितनी अजीब बात है। वाक़ई एक क्षण के लिए तो मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया। क्या तुम बैठोगी नहीं? तुमने खाना खाया? कॉफ़ी लोगी?” वह हिचकिचाई पर फिर बोली, “ठीक है, कॉ...