कर्म से ग्वाले, क्षत्रिय कुल के सुमंत्र की सुगठित सुंदरी सीता और उसके दोनों पतियों (अगर पति कहना ही अपरिहार्य हो तो) की कहानी ऐसी है कि श्रोता से श्रेष्ठ मानसिक बल व माया के विविध रूपों की प्रतिक्रिया में अविचलित रहने की माँग करती है। स्मृति के अंतर्गत आने वाले एक काल में जगद्धात्री के वक्ष पर अंतरंग मैत्री के कोमल बंधनों में दो नवयुवक रहा करते थे। भवभूति का बेटा श्रीदामा कुल से ब्राह्मण, कर्म से वणिक् और आयु में अपने सखा गर्ग के बेटे नंद से तीन वर्ष बड़ा था। यादववंशी, अठारह वर्षीय नंद कुलीन नहीं था, किंतु व्यवसाय करता था। श्रीदामा के लिए ब्राह्मणमार्गी संस्कारों को तजना कर्म बदलने के बावजूद कठिन था, अतः वह अध्ययन, गांभीर्य, सुसंस्कृत भाष्य से अलंकृत था, जबकि नंद को शूद्र न होते हुए भी इन वस्तुओं से कुछ ज़्यादा लगाव नहीं था। दोनों के शरीर भी इसी भाँति विभिन्न थे। नंद श्यामकाय महाबली था, श्रीदामा ओजमंडित मुखश्री व चंद्रवर्ण से विभूषित था, किंतु कृषकाय था। कोशल भूमि के गोपुरम ग्राम में दोनों रहते थे और दोनों की आमूल विभिन्नता ही अभिन्न मित्रता का मूल थी—ऐतद् वेतद् के सिद्धांतानुसार सहचा...