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शरीफ़ज़ादे (कहानी) | Shareefazaade : अनातोले फ़्रांस

मैं भीतर आया तो पाओलिन दे लुजी ने हाथ हिलाकर मेरा स्वागत किया। फिर कुछ देर चुप्पी छाई रही। उसका स्कार्फ़ और तौलियों का बना टोप आरामकुर्सी पर लापरवाही से पड़े थे। “मादाम,” मैंने अपनी बात ज़रा खोलकर कही, “क्या आपको याद है कि ठीक दो साल पहले आज ही के दिन पहाड़ी की तली में बहती नदी के किनारे, वहीं जहाँ आपकी आँखें इस समय देख रही हैं, आपने क्या कहा था? क्या आपको याद है कि पैग़ंबरी मुद्रा में अपने हाथ हिलाते हुए आप मेरे पास तक आई थीं? मेरे प्रेम की स्वीकारोक्ति आपने मेरे होंठों के भीतर ही रोक दी थी और मुझे न्याय तथा स्वतंत्रता के लिए जीने और लड़ने के लिए छोड़ दिया था। मादाम, आपके जिस हाथ को मैं चूमते हुए अपने आँसुओं से भिगो देना चाहता था, उसी से आपने मुझे बाहर का रास्ता दिखाया और मैं बिना कहे लौट गया था। मैंने आपकी आज्ञा का पालन किया। दो सालों से मैं बेवक़ूफ़ कँगलों के साथ रहा हूँ, जिनके लिए लोगों के मन में घृणा और अरुचि ही होती है। जो दिखावे की सहानुभूति के हिंसक प्रदर्शन से लोगों को बहकाते हैं और जो चढ़ते सूरज को ही सलाम करते हैं।” अपने हाथ के एक इशारे से उसने मुझे चुप कर दिया और संकेत किया कि...