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गवर्नेस (कहानी) | Gavarnes : स्टीफन ज़्वीग

दोनों बच्चियाँ अपने कमरे में अकेली थीं। बत्तियाँ बुझा दी गई थीं। चारों ओर अँधेरा था सिवाए धुँधली रोशनी के जो उनके बिस्तरों में से टिमटिमा रही थी। वे इतने आहिस्ता से साँस ले रही थीं, जैसे लगे कि वे सो रही हैं। “सुनो,” बिस्तर पर से एक हल्की फुसफुसाहट भरी आवाज़ आई। यह बारह बरस की बच्ची थी। “क्या बात है” उसकी बहन ने पूछा जो उससे एक बरस बड़ी थी। “मैं बहुत ख़ुश हूँ कि तुम अभी तक जाग रही हो। मुझे तुमसे कुछ कहना है।” उसने कुछ जवाब नहीं दिया, पर दूसरे बिस्तरे पर थोड़ी हलचल ज़रूर हुई। बड़ी बच्ची उठकर बैठ गई थी और धुँधली रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं। “मैं तुमसे यह कहना चाहती थी, पर पहले बताओ कि तुमने मिस मान में इन दिनों आए बदलाव पर ग़ौर किया है?” “हाँ,” पल भर की चुप्पी के बाद दूसरी बच्ची बोली। “कुछ बात तो ज़रूर है, पर मैं नहीं जानती कि क्या? अब वह पहले की तरह सख़्ती नहीं बरतती। पिछले दो दिनों से मैंने अपनी पढ़ाई नहीं की और उसने मुझे ज़रा भी नहीं डाँटा। मैं नहीं जानती उसे क्या हुआ है, पर इतना ज़रूर है कि वह अब हमारी फ़िक्र नहीं करती। हमेशा खोई-खोई रहती है, पहले की तरह वह हमारे साथ खेलती...