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सरकार का समर्थक (कहानी) | Sarakaar Ka Samarthak : सिगफ्राइड लेन्ज़

उन लोगों ने निमंत्रण पत्र भेजकर पत्रकारों को न्यौता दिया था कि सप्ताहांत पर वे आएँ और स्वयं अपनी आँखों से देखें कि सरकार के प्रति जनता का समर्थन कितना ज़बर्दस्त है। शायद वे साबित करना चाहते थे कि उस अशांत प्रदेश के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा था, वह सब झूठ था; किसी को भी वहाँ ‘टॉर्चर’ नहीं किया जा रहा था। ग़रीबी पूरी तरह हट चुकी थी और सबसे ज़रूरी, स्वतंत्रता संग्राम जैसी किसी आग का कोई नामोनिशान तक वहाँ मौजूद नहीं था। लिहाज़ा काफ़ी शालीनता के साथ उन्होंने हमें बुलाया और जब निर्धारित समय पर ऑपेरा हाउस की बिल्डिंग के पिछवाड़े में हम पहुँचे तो सम्भ्रांत वेशभूषा वाले एक मृदु-भाषी अधिकारी ने हमारी अगवानी की। फिर वह हमें अपने साथ सरकारी बस की ओर ले चला। बस के भीतर ताज़े वार्निश और महँगे चमड़े की गंध थी। स्पीकर पर हल्का-हल्का संगीत बज रहा था। बस चली तो उस अधिकारी ने क्लिप पर टँगा माइक्रोफ़ोन निकाला और उसकी चमकदार जाली को अपने नाखूनों से खरोंचकर साफ़ करते हुए विनम्रतापूर्वक दुबारा हम सबका स्वागत किया। “मेरा नाम गारेक है!” उसके स्वर में संकोच था। फिर एक-के-बाद-एक उसने शहर के मुख्य आकर्षणों के ...