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शहर (कहानी) | Shahar : हरमन हेस

‘ऐसा लगता है अब हम लोग कहीं पहुँच रहे हैं। इंजीनियर ज़ोर से बोल पड़ा; जैसे ही लोगों, कोयलें, औज़ारों और खाद्य-पदार्थों से भरी हुई दूसरी ट्रेन उस नए इलाके में पहुँची, जहाँ कल ही रेल की पटरियाँ बिछाई गई थीं। घास भरी ज़मीन के उस अछूते विस्तार में सूरज की सुनहली किरणें चमक रही थीं। दूर क्षितिज पर पेड़ों से भरे पहाड़ नीले कुहासे में नहा रहे थे। हरे-भरे मैदान में कोयलें, राख, काग़ज़ और टिन का ढेर उतर रहा था, शोर-गुल हो रहा था और जंगली कुत्ते और बैल यह सब देख रहे थे। आरा मशीन की पहली कर्कश आवाज़ दूर जंगलों को चीरती चली गई, बंदूक़ की पहली गूँज मेघों की गड़गड़ाहट की तरह पर्वतों पर तैर गई, लोहे पर भारी हथौड़े की पहली चोट की ‘घन’ आवाज़ हुई। टिन की छत की एक झोंपड़ी खड़ी हुई, दूसरे दिन लकड़ी का एक घर, फिर दिनों-दिन पत्थर के मकान दिखाई पड़ने लगे। जंगली कुत्ते और बैल वहाँ से दूरी रखने लगे, ज़मीन जोती जाने लगी और उसमें फसल उगी। पहले ही बसंत में वह ज़मीन हरी फसलों से भर गई। वहाँ खेत, अस्तबल और अनाज-घर बनाए गए, ज़मीन काट कर सड़कें बन गईं। रेलवे स्टेशन बन कर खड़ा हुआ और उसका उद्घाटन भी हो गया। इसके तुरंत...

वहमी (कहानी) | Vahamee : हरमन हेस

मार्टिन सिड ने अपने पिता की स्टडी के दरवाज़े पर दस्तक दी। तत्काल एक गुर्राहट उभरी और उसके पिता की आवाज़ आई, “अंदर आ जाओ!” आम तौर पर मार्टिन अपने पिता के आराम या अध्ययन में हस्तक्षेप नहीं करता था। उसका पिता किताबों का कीड़ा था और उसे यह बात बिलकुल पसंद नहीं थी कि कोई उसे अध्ययन के समय परेशान करे, किंतु आज समस्या दूसरी ही थी। कर्नल टाउन सिड ने नौकर को भेजकर उसे बुलाया था, क्योंकि वह उससे किसी महत्त्वपूर्ण मामले पर बातचीत करना चाहता था। “आओ मार्टिन!” कर्नल सिड ने कहा, “बैठ जाओ!” उसने एक कुर्सी की ओर संकेत किया और मर्टिन चुपचाप कुर्सी पर बैठकर जिज्ञासु दृष्टि से अपने पिता की ओर देखने लगा। उसके चेहरे से प्रकट होता था कि वह इस प्रकार बुलाए जाने पर परेशान है। “कहिए डैडी!” मार्टिन ने अंततः कहा। मार्टिन सोच रहा था कि कोई विशेष बात अवश्य है, जो उसके पिता ने उसे बुलाया है। वह अभी किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सका था कि कर्नल की आवाज़ उसके कानों से टकराई, “मैं तुमसे एक महत्त्वपूर्ण मामले पर बातचीत करना चाहता हूँ।” मार्टिन की बाईं आँख की पलक जिज्ञासु अंदाज़ में कमान का रूप धारण कर गई। वह मन ही मन सोच रह...