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फ़ौजी लड़कियाँ (कहानी) | Faujee Larakiyaan : चिनुआ अचेबे

पहली बार जब वे एक-दूसरे की राहों से गुज़रे तो कुछ भी नहीं हुआ। यह उन संघर्षमय दिनों की बात है, जब हर रोज़ हज़ारों नौजवानों को और कभी-कभी लड़कियों को भी भर्ती दफ़्तरों से निराश वापस लौटना पड़ता था, क्योंकि नवगठित देश की सुरक्षा के लिए हथियार उठाने बहुत अधिक लोग आ रहे थे। दूसरी बार वे आवका के एक चेक-पॉइंट पर मिले। लड़ाई शुरू हो चुकी थी और दूर उत्तरी क्षेत्रों से धीरे-धीरे दक्षिण की ओर बढ़ रही थी। वह औनित्शा से ऐनूगू की ओर जा रहा था और जल्दी में था। हालाँकि बौद्धिक स्तर पर वह सड़क-अवरोधों पर अच्छी तरह तलाशी के हक़ में था, लेकिन जब भी उसे तलाशी देनी पड़ती थी, भावात्मक स्तर पर उसे हमेशा बुरा लगता था। हालाँकि वह स्वयं इस बात को मानने को तैयार नहीं था। लेकिन लोग मानते थे कि अगर आपकी तलाशी ली गई तो आप बड़े आदमी नहीं हैं। अक्सर वह अपनी गहरी, प्रभावशाली आवाज़ में यह कहकर—रेगिनाल्ड न्वानक्वो, न्याय मंत्रालय-तलाशी से बच जाता था। इसका असर तुरन्त होता था, लेकिन कई बार अज्ञानता के कारण या विशुद्ध हठीलेपन के कारण चेक-पॉइंट के लोग उसके इस कथन से प्रभावित होने से इंकार कर देते थे। जैसा कि अभी आवका पर हुआ...