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Aitbar Sajid Ghazal / ऐतबार साजिद ग़ज़ल


Aitbar Sajid Ghazal


वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा
कि अब तो शौक़-ए-राहत-ए-विसाल ही नहीं रहा


तमाम हसरतें हर इक सवाल दफ़्न कर चुके
हमारे पास अब कोई सवाल ही नहीं रहा


तलाश-ए-रिज़्क़ में ये शाम इस तरह गुज़र गई
कोई है अपना मुंतज़िर ख़याल ही नहीं रहा


इन आते जाते रोज़-ओ-शब कि गर्दिशों को देख कर
किसी के हिज्र का कोई मलाल ही नहीं रहा


हमारा क्या बनेगा कुछ न कुछ तो इस पे सोचते
मगर कभी हमें ग़म-ए-मआल ही नहीं रहा


तुम्हारे ख़ाल-ओ-ख़द पे इक किताब लिख रहे थे हम
मगर तुम्हारा हुस्न बे-मिसाल ही नहीं रहा


सँवारता निखारता मैं कैसे अपने आप को
तुम्हारे बाद अपना कुछ ख़याल ही नहीं रहा


ज़रा सी बात से दिलों में इतना फ़र्क़ आ गया

तअल्लुक़ात का तो फिर सवाल ही नहीं रहा

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा
ख़ुद ही उठ बैठ किसी इज़्न ओ इजाज़त पे न जा


सूरत-ए-शम्अ तिरे सामने रौशन हैं जो फूल
उन की किरनों में नहा ज़ौक़-ए-समाअत पे न जा


दिल सी चेक-बुक है तिरे पास तुझे क्या धड़का
जी को भा जाए तो फिर चीज़ की क़ीमत पे न जा


इतना कम-ज़र्फ़ न बन उस के भी सीने में है दिल
उस का एहसास भी रख अपनी ही राहत पे न जा


देखता क्या है ठहर कर मिरी जानिब हर रोज़
रौज़न-ए-दर हूँ मिरी दीद की हैरत पे न जा


तेरे दिल-सोख़्ता बैठे हैं सर-ए-बाम अभी
बाल खोले हुए तारों भरी इस छत पे न जा


मेरी पोशाक तो पहचान नहीं है मेरी

दिल में भी झाँक मिरी ज़ाहिरी हालत पे न जा

ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं
मगर हमारी ज़रा आदतें भी ठीक नहीं


अगर मिलो तो खुले दिल के साथ हम से मिलो
कि रस्मी रस्मी सी ये चाहतें भी ठीक नहीं


तअल्लुक़ात में गहराइयाँ तो अच्छी हैं
किसी से इतनी मगर क़ुर्बतें भी ठीक नहीं


दिल ओ दिमाग़ से घायल हैं तेरे हिज्र-नसीब
शिकस्ता दर भी हैं उन की छतें भी ठीक नहीं


क़लम उठा के चलो हाल-ए-दिल ही लिख डालो
कि रात दिन की बहुत फ़ुर्क़तें भी ठीक नहीं


तुम 'ए'तिबार' परेशाँ भी इन दिनों हो बहुत

दिखाई पड़ता है कुछ सोहबतें भी ठीक नहीं

मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ
जनम-दिन है अकेला रो रहा हूँ


किसी ने झाँक कर देखा न दिल में
कि मैं अंदर से कैसा हो रहा हूँ


जो दिल पर दाग़ हैं पिछली रुतों के
उन्हें अब आँसुओं से धो रहा हूँ


सभी परछाइयाँ हैं साथ लेकिन
भरी महफ़िल में तन्हा हो रहा हूँ


मुझे इन निस्बतों से कौन समझा
मैं रिश्ते में किसी का जो रहा हूँ


मैं चौंक उठता हूँ अक्सर बैठे बैठे
कि जैसे जागते में सो रहा हूँ


किसे पाने की ख़्वाहिश है कि 'साजिद'

मैं रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद को खो रहा हूँ

मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ
जो सराब हों न अज़ाब हों वो रिफाक़तें मुझे चाहिएँ


उन्हीं साअ'तों की तलाश है जो कैलेंडरों से उतर गईं
जो समय के साथ गुज़र गईं वही फ़ुर्सतें मुझे चाहिएँ


कहीं मिल सकें तो समेट ला मरे रोज़ ओ शब की कहानियाँ
जो ग़ुबार-ए-वक़्त में छुप गईं वो हिकायतें मुझे चाहिएँ


जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे
वही लोग हैं मिरी आरज़ू वही सूरतें मुझे चाहिएँ


तिरी क़ुर्बतें नहीं चाहिएँ मरी शाइरी के मिज़ाज को
मुझे फ़ासलों से दवाम दे तरी फ़ुर्क़तें मुझे चाहिएँ


मुझे और कुछ नहीं चाहिए ये दुआएँ हैं मरे साएबाँ

कड़ी धूप में कहीं मिल सकें तो यही छतें मुझे चाहिएँ

ऐतबार साजिद ग़ज़ल 

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है
इसी पर सोचते रहने की फ़ुर्सत कौन रखता है


मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती
वगरना सिर्फ़ बाम-ओ-दर से उल्फ़त कौन रखता है


नहीं है निर्ख़ कोई मेरे इन अशआर-ए-ताज़ा का
ये मेरे ख़्वाब हैं ख़्वाबों की क़ीमत कौन रखता है


दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने
सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है


मरे दुश्मन का क़द इस भीड़ में मुझ से तो ऊँचा हो
यही में ढूँढता हूँ ऐसी क़ामत कौन रखता है


हमारे शहर की रौनक़ है कुछ मशहूर लोगों से

मगर सब जानते हैं कैसी शोहरत कौन रखता है

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी
सहे हैं उस के लिए ये अज़ाब मैं ने भी


जुदाइयों की ख़लिश उस ने भी न ज़ाहिर की
छुपाए अपने ग़म ओ इज़्तिराब मैं ने भी


दिए बुझा के सर-ए-शाम सो गया था वो
बिताई सो के शब-ए-माहताब मैं ने भी


यही नहीं कि मुझे उस ने दर्द-ए-हिज्र दिया
जुदाइयों का दिया है जवाब मैं ने भी


किसी ने ख़ून में तर चूड़ियाँ जो भेजी हैं
लिखी है ख़ून-ए-जिगर से किताब मैं ने भी


ख़िज़ाँ का वार बहुत कार-गर था दिल पे मगर

बहुत बचा के रखा ये गुलाब मैं ने भी

बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ
सच्ची हैं ये रिफाक़तें बाक़ी हैं सब कहानियाँ


ख़ेमे उखड़ उजड़ गए ऐसी हवा-ए-शब चली
किरनें ज़मीं पे लिख गईं कैसी अजब कहानियाँ


वुसअत-ए-दश्त के मकीं वादी में कूच कर गए
शाख़ों पे बर्फ़ लिख गई नग़्मा-ब-लब कहानियाँ


चाँद की ख़ाक आ गई पैरों तले हयात के
ऐसी कठिन रिवायतें ऐसी कढब कहानियाँ


जौहर-ए-हक़ नहीं मिला मुझ को किसी किताब में
मिट्टी से सुन रहा हूँ मैं आली-नसब कहानियाँ


वुसअत-ए-कोह-ओ-दश्त हो शहर ओ नगर का गश्त हो
मेरा सफ़र हिकायतें मेरा अदब कहानियाँ


शहरों को क्या ख़बर कि मैं कौन हूँ किस फ़ज़ा में हूँ

लिखनी हैं एक दिन मुझे सब्र-तलब कहानियाँ

फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे
ऐसे ज़िंदा थे कि जीने की अलामत हम थे


सब ख़िरद-मंद बने फिरते थे माशा-अल्लाह
बस तिरे शहर में इक साहिब-ए-वहशत हम थे


नाम बख़्शा है तुझे किस के वुफ़ूर-ए-ग़म ने
गर कोई था तो तिरे मुजरिम-ए-शोहरत हम थे


अब तो ख़ुद अपनी ज़रूरत भी नहीं है हम को
वो भी दिन थे कि कभी तेरी ज़रूरत हम थे


धूप के दश्त में कितना वो हमें ढूँडता था

'ए'तिबार' उस के लिए अब्र की सूरत हम थे

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न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का
सो ये हाल इन दिनों है मिरे दिल की बे-कसी का


मैं शिकस्ता बाम ओ दर में जिसे जा के ढूँडता था
कोई याद थी किसी की कोई नाम था किसी का


मैं हवाओं से हिरासाँ वो घुटन से दिल-गिरफ़्ता
मैं चराग़ तीरगी का वो गुलाब रौशनी का


अभी रेल के सफ़र में हैं बहुत निहाल दोनों
कहीं रोग बन न जाए यही साथ दो घड़ी का


कोई शहर आ रहा है तो ये ख़ौफ़ आ रहा है
कोई जाने कब उतर ले कि भरोसा क्या किसी का


कोई मुख़्तलिफ़ नहीं है ये धुआँ ये राएगानी

कि जो हाल शहर का है वही अपनी शाइरी का

धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा
मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा


गए दिनों की तस्वीरों के बुझते हुए नुक़ूश
ताज़ा तर्क-ए-तअल्लुक़ के सदमात अकेला कमरा


दोश-ए-हवा पर उड़ने वाले ख़िज़ाँ के आख़िरी पत्ते
अपनी अकेली जान ग़म-ए-हालात अकेला कमरा


आख़िरी शब के चाँद से करना बालकनी में बातें
उस के शहर में होटल की ये रात अकेला कमरा


मेरी सिसकती आवाज़ों से गूँजती हैं दीवारें
सुनता है दिन रात मरे नग़्मात अकेला कमरा


सब सामान बहम हैं 'साजिद' लिखने लिखाने के

ख़ून-ए-जिगर और आँसू दिल की दवात अकेला कमरा

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो
मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो


मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो


किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता
मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो



जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो
रात दिन कौन से दिलदार के गुन गाते हो


ये तो देखो कि तुम्हें लूट लिया है उस ने
इक तबस्सुम पे ख़रीदार के गुन गाते हो


अपनी तन्हाई पे नाज़ाँ हो मिरे सादा-मिज़ाज
अपने सूने दर ओ दीवार के गुन गाते हो


अपने ही ज़ेहन की तख़्लीक़ पे इतने सरशार
अपने अफ़्सानवी किरदार के गुन गाते हो


और लोगों के भी घर होते हैं घर वाले भी
सिर्फ़ अपने दर ओ दीवार के गुन गाते हो



ज़ख़्मों का दो-शाला पहना धूप को सर पर तान लिया /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal




ज़ख़्मों का दो-शाला पहना धूप को सर पर तान लिया
क्या क्या हम ने कष्ट कमाए कहाँ कहाँ निरवान लिया


नक़्श दिए तिरी आशाओं को अक्स दिए तिरे सपनों को
लेकिन देख हमारी हालत वक़्त ने क्या तावान लिया


अश्कों में हम गूँध चुके थे उस के लम्स की ख़ुशबू को
मोम के फूल बनाने बैठे लेकिन धूप ने आन लिया


बरसों ब'अद हमें देखा तो पहरों उस ने बात न की
कुछ तो गर्द-ए-सफ़र से भाँपा कुछ आँखों से जान लिया


आँख पे हात धरे फिरते थे लेकिन शहर के लोगों ने
उस की बातें छेड़ के हम को लहजे से पहचान लिया


सूरज सूरज खेल रहे थे 'साजिद' हम कल उस के साथ
इक इक क़ौस-ए-क़ुज़ह से गुज़रे इक इक बादल छान लिया



छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं
दर-ब-दर ख़ुद को जो दिन रात लिए फिरते हैं


अपनी मजरूह अनाओं को दिलासे दे कर
हाथ में कासा-ए-ख़ैरात लिए फिरते हैं


शहर में हम ने सुना है कि तिरे शोला-नवा
कुछ सुलगते हुए नग़्मात लिए फिरते हैं


मुख़्तलिफ़ अपनी कहानी है ज़माने भर से
मुनफ़रिद हम ग़म-ए-हालात लिए फिरते हैं


एक हम हैं कि ग़म-ए-दहर से फ़ुर्सत ही नहीं
एक वो हैं कि ग़म-ए-ज़ात लिए फिरते हैं



घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना
तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना


ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है
चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना


यूँही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू
तुम किसी दाम-ए-तलबगार में मत आ जाना


दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना
किसी उम्मीद के मंजधार में मत आ जाना


अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम
हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना


चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम
रात को रौज़न-ए-दीवार में मत आ जाना





आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया
कल हवा-ए-शब ने सारा लान ख़ाली कर दिया


हम तिरे ख़्वाबों की जन्नत से निकल कर आ गए
देख तेरा क़स्र-ए-आली-शान ख़ाली कर दिया


दुश्मनों ने शुस्त बाँधी ख़ेमा-ए-उम्मीद पर
दोस्तों ने दर्रा-ए-इमकान ख़ाली कर दिया


बाँटने निकला है वो फूलों के तोहफ़े शहर में
इस ख़बर पर हम ने भी गुल-दान ख़ाली कर दिया


ले गया वो साथ अपने दिल की सारी रौनक़ें
किस क़दर ये शहर था गुंजान ख़ाली कर दिया


सारी चिड़ियाँ उड़ गईं मुझ को अकेला छोड़ कर
मेरे घर का सेहन और दालान ख़ाली कर दिया


डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया





आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है /ऐतबार साजिद ग़ज़ल / Aitbar Sajid Ghazal


आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है
अब आ भी चुको वक़्त-ए-मसीहाई तो अब है


पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे
रग रग में उतरती हुई तन्हाई तो अब है


तारी है तमन्नाओं पे सकरात का आलम
हर साँस रिफ़ाक़त की तमन्नाई तो अब है


कल तक मिरी वहशत से फ़क़त तुम ही थे आगाह
हर गाम पे अंदेशा-ए-रुस्वाई तो अब है


क्या जाने महकती हुई सुब्हों में कोई दिल
शामों में किसी दर्द की रानाई तो अब है


दिल-सोज़ ये तारे हैं तो जाँ-सोज़ ये महताब
दर-असल शब-ए-अंजुमन-आराई तो अब है


सफ़-बस्ता हैं हर मोड़ पे कुछ संग-ब-कफ़ लोग
ऐ ज़ख़्म-ए-हुनर लुत्फ़-ए-पज़ीराई तो अब है

Obaidullah Aleem Ghazal / उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल


Obaidullah Aleem Ghazal



अजीब थी वो अजब तरह चाहता था मैं उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


अजीब थी वो अजब तरह चाहता था मैं
वो बात करती थी और ख़्वाब देखता था मैं


विसाल का हो कि उस के फ़िराक़ का मौसम
वो लज़्ज़तें थीं कि अंदर से टूटता था मैं


चढ़ा हुआ था वो नश्शा कि कम न होता था
हज़ार बार उभरता था डूबता था मैं


बदन का खेल थीं उस की मोहब्बतें लेकिन
जो भेद जिस्म के थे जाँ से खोलता था मैं


फिर इस तरह कभी सोया न इस तरह जागा
कि रूह नींद में थी और जागता था मैं


कहाँ शिकस्त हुई और कहाँ सिला पाया
किसी का इश्क़ किसी से निबाहता था मैं


मैं अहल-ए-ज़र के मुक़ाबिल में था फ़क़त शाएर

मगर मैं जीत गया लफ़्ज़ हारता था मैं




अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए


मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी
कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए


मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए


ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए


मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ
जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए


हर एक लहज़ा यही आरज़ू यही हसरत

जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाए




अज़ाब आए थे ऐसे कि फिर न घर से गए उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


अज़ाब आए थे ऐसे कि फिर न घर से गए
वो ज़िंदा लोग मिरे घर के जैसे मर से गए


हज़ार तरह के सदमे उठाने वाले लोग
न जाने क्या हुआ इक आन में बिखर से गए


बिछड़ने वालों का दुख हो तो सोच लेना यही
कि इक नवा-ए-परेशाँ थे रहगुज़र से गए


हज़ार राह चले फिर वो रहगुज़र आई
कि इक सफ़र में रहे और हर सफ़र से गए


कभी वो जिस्म हुआ और कभी वो रूह तमाम
उसी के ख़्वाब थे आँखों में हम जिधर से गए


ये हाल हो गया आख़िर तिरी मोहब्बत में
कि चाहते हैं तुझे और तिरी ख़बर से गए


मिरा ही रंग थे तो क्यूँ न बस रहे मुझ में
मिरा ही ख़्वाब थे तो क्यूँ मिरी नज़र से गए


जो ज़ख़्म ज़ख़्म-ए-ज़बाँ भी है और नुमू भी है

तो फिर ये वहम है कैसा कि हम हुनर से गए


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आओ तुम ही करो मसीहाई उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


आओ तुम ही करो मसीहाई
अब बहलती नहीं है तन्हाई


तुम गए थे तो साथ ले जाते
अब ये किस काम की है बीनाई


हम कि थे लज़्ज़त-ए-हयात में गुम
जाँ से इक मौज-ए-तिश्नगी आई


हम-सफ़र ख़ुश न हो मोहब्बत से
जाने हम किस के हों तमन्नाई


कोई दीवाना कहता जाता था
ज़िंदगी ये नहीं मिरे भाई


अव्वल-ए-इश्क़ में ख़बर भी न थी
इज़्ज़तें बख़्शती है रुस्वाई


कैसे पाओ मुझे जो तुम देखो
सतह-ए-साहिल से मेरी गहराई


जिन में हम खेल कर जवान हुए

वही गलियाँ हुईं तमाशाई




ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी
लेकिन हम ने मौला जैसी ज़ात नहीं देखी


उस की शान-ए-अजीब का मंज़र देखने वाला है
इक ऐसा ख़ुर्शीद कि जिस ने रात नहीं देखी


बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाक
ऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी


उस की आल वही जो उस के नक़्श-ए-क़दम पर
सिर्फ़ ज़ात की हम ने आल-ए-सादात नहीं देखी


एक शजर है जिस की शाख़ें फैलती जाती हैं
किसी शजर में हम ने ऐसी बात नहीं देखी


इक दरिया-ए-रहमत है जो बहता जाता है
ये शान-ए-बरकात किसी के साथ नहीं देखी


शाहों की तारीख़ भी हम ने देखी है लेकिन
उस के दर के गदाओं वाली बात नहीं देखी


उस के नाम पे मारें खाना अब एज़ाज़ हमारा
और किसी की ये इज़्ज़त-औक़ात नहीं देखी


सदियों की इस धूप छाँव में कोई हमें बतलाए
पूरी हुई कौन सी उस की बात नहीं देखी


अहल-ए-ज़मीं ने कौन सा हम पर ज़ुल्म नहीं ढाया

कौन सी नुसरत हम ने उस के हाथ नहीं देखी




कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझ को मार दिया


इक सब्ज़ शाख़ गुलाब की था इक दुनिया अपने ख़्वाब की था
वो एक बहार जो आई नहीं उस के लिए सब कुछ हार दिया


ये सजा-सजाया घर साथी मिरी ज़ात नहीं मिरा हाल नहीं
ऐ काश कभी तुम जान सको जो इस सुख ने आज़ार दिया


मैं खुली हुई इक सच्चाई मुझे जानने वाले जानते हैं
मैं ने किन लोगों से नफ़रत की और किन लोगों को प्यार दिया


वो इश्क़ बहुत मुश्किल था मगर आसान न था यूँ जीना भी
उस इश्क़ ने ज़िंदा रहने का मुझे ज़र्फ़ दिया पिंदार दिया


मैं रोता हूँ और आसमान से तारे टूटते देखता हूँ
उन लोगों पर जिन लोगों ने मिरे लोगों को आज़ार दिया


मिरे बच्चों को अल्लाह रखे इन ताज़ा हवा के झोंकों ने

मैं ख़ुश्क पेड़ ख़िज़ाँ का था मुझे कैसा बर्ग-ओ-बार दिया




कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या


कोई रंग तो दो मिरे चेहरे को
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या


जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या


इक आइना था सो टूट गया
अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या


तुम आस बंधाने वाले थे
अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या


दुनिया भी वही और तुम भी वही
फिर तुम से आस लगाओ तो क्या


मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या


जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या गहनाओ तो क्या


अब वहम है ये दुनिया इस में
कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या


है यूँ भी ज़ियाँ और यूँ भी ज़ियाँ

जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या




कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ
दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ


ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम
और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ


तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में
ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ


जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी
सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ


अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है
ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ


यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे
हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ


जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे
कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ


शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ
धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ


अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे

बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ




ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ


चाँदनी का समाँ था और हम तुम
अब सितारे पलक पलक देखूँ


जाने तू किस का हम-सफ़र होगा
मैं तुझे अपनी जाँ तलक देखूँ


बंद क्यूँ ज़ात में रहूँ अपनी
मौज बन जाऊँ और छलक देखूँ


सुब्ह में देर है तो फिर इक बार
शब के रुख़्सार से ढलक देखूँ


उन के क़दमों तले फ़लक और मैं

सिर्फ़ पहनाई-ए-फ़लक देखूँ




ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए
तो आसमान से उतरा ख़ुदा हमारे लिए


उन्हें ग़ुरूर कि रखते हैं ताक़त ओ कसरत
हमें ये नाज़ बहुत है ख़ुदा हमारे लिए


तुम्हारे नाम पे जिस आग में जलाए गए
वो आग फूल है वो कीमिया हमारे लिए


बस एक लौ में उसी लो के गिर्द घूमते हैं
जला रखा है जो उस ने दिया हमारे लिए


वो जिस पे रात सितारे लिए उतरती है
वो एक शख़्स दुआ ही दुआ हमारे लिए


वो नूर नूर दमकता हुआ सा इक चेहरा
वो आईनों में हया ही हया हमारे लिए


दरूद पढ़ते हुए उस की दीद को निकलें
तो सुब्ह फूल बिछाए सबा हमारे लिए


अजीब कैफ़ियत-ए-जज़्ब-ओ-हाल रखती है
तुम्हारे शहर की आब-ओ-हवा हमारे लिए


दिए जलाए हुए साथ साथ रहती है
तुम्हारी याद तुम्हारी दुआ हमारे लिए


ज़मीन है न ज़माँ नींद है न बे-दारी
वो छाँव छाँव सा इक सिलसिला हमारे लिए


सुख़न-वरों में कहीं एक हम भी थे लेकिन

सुख़न का और ही था ज़ाइक़ा हमारे लिए




जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई
बदन पुराना हुआ रूह भी पुरानी हुई


कोई अज़ीज़ नहीं मा-सिवा-ए-ज़ात हमें
अगर हुआ है तो यूँ जैसे ज़िंदगानी हुई


न होगी ख़ुश्क कि शायद वो लौट आए फिर
ये किश्त गुज़रे हुए अब्र की निशानी हुई


तुम अपने रंग नहाओ मैं अपनी मौज उड़ूँ
वो बात भूल भी जाओ जो आनी-जानी हुई


मैं उस को भूल गया हूँ वो मुझ को भूल गया
तो फिर ये दिल पे क्यूँ दस्तक सी ना-गहानी हुई


कहाँ तक और भला जाँ का हम ज़ियाँ करते

बिछड़ गया है तो ये उस की मेहरबानी हुई




जो उस ने किया उसे सिला दे उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


जो उस ने किया उसे सिला दे
मौला मुझे सब्र की जज़ा दे


या मेरे दिए की लौ बढ़ा दे
या रात को सुब्ह से मिला दे


सच हूँ तो मुझे अमर बना दे
झूटा हूँ तो नक़्श सब मिटा दे


ये क़ौम अजीब हो गई है
इस क़ौम को ख़ू-ए-अम्बिया दे


उतरेगा न कोई आसमाँ से
इक आस में दिल मगर सदा दे


बच्चों की तरह ये लफ़्ज़ मेरे
माबूद इन्हें बोलना सिखा दे


दुख दहर के अपने नाम लिक्खूँ
हर दुख मुझे ज़ात का मज़ा दे


इक मेरा वजूद सुन रहा है
इल्हाम जो रात की हवा दे


मुझ से मिरा कोई मिलने वाला
बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे


चेहरा मुझे अपना देखने को
अब दस्त-ए-हवस में आईना दे


जिस शख़्स ने उम्र-ए-हिज्र काटी
उस शख़्स को एक रात क्या दे


दुखता है बदन कि फिर मिले वो
मिल जाए तो रूह को दिखा दे


क्या चीज़ है ख़्वाहिश-ए-बदन भी
हर बार नया ही ज़ाइक़ा दे


छूने में ये डर कि मर न जाऊँ

छू लूँ तो वो ज़िंदगी सिवा दे




तू अपनी आवाज़ में गुम है मैं अपनी आवाज़ में चुप उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


तू अपनी आवाज़ में गुम है मैं अपनी आवाज़ में चुप
दोनों बीच खड़ी है दुनिया आईना-ए-अल्फ़ाज़ में चुप


अव्वल अव्वल बोल रहे थे ख़्वाब-भरी हैरानी में
फिर हम दोनों चले गए पाताल से गहरे राज़ में चुप


ख़्वाब-सरा-ए-ज़ात में ज़िंदा एक तो सूरत ऐसी है
जैसे कोई देवी बैठी हो हुजरा-ए-राज़-ओ-नियाज़ में चुप


अब कोई छू के क्यूँ नहीं आता उधर सिरे का जीवन-अंग
जानते हैं पर क्या बतलाएँ लग गई क्यूँ पर्वाज़ में चुप


फिर ये खेल-तमाशा सारा किस के लिए और क्यूँ साहब
जब इस के अंजाम में चुप है जब इस के आग़ाज़ में चुप


नींद-भरी आँखों से चूमा दिए ने सूरज को और फिर
जैसे शाम को अब नहीं जलना खींच ली इस अंदाज़ में चुप


ग़ैब-समय के ज्ञान में पागल कितनी तान लगाएगा

जितने सुर हैं साज़ से बाहर उस से ज़ियादा साज़ में चुप




तेरे प्यार में रुस्वा हो कर जाएँ कहाँ दीवाने लोग उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


तेरे प्यार में रुस्वा हो कर जाएँ कहाँ दीवाने लोग
जाने क्या क्या पूछ रहे हैं ये जाने-पहचाने लोग


हर लम्हा एहसास की सहबा रूह में ढलती जाती है
ज़ीस्त का नश्शा कुछ कम हो तो हो आएँ मय-ख़ाने लोग


जैसे तुम्हें हम ने चाहा है कौन भला यूँ चाहेगा
माना और बहुत आएँगे तुम से प्यार जताने लोग


यूँ गलियों बाज़ारों में आवारा फिरते रहते हैं
जैसे इस दुनिया में सभी आए हों उम्र गँवाने लोग


आगे पीछे दाएँ बाएँ साए से लहराते हैं
दुनिया भी तो दश्त-ए-बला है हम ही नहीं दीवाने लोग


कैसे दुखों के मौसम आए कैसी आग लगी यारो
अब सहराओं से लाते हैं फूलों के नज़राने लोग


कल मातम बे-क़ीमत होगा आज उन की तौक़ीर करो

देखो ख़ून-ए-जिगर से क्या क्या लिखते हैं अफ़्साने लोग




दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या
तुम भी तो बे-अमाँ हुए हम को सता लिया तो क्या


आप के घर में हर तरफ़ मंज़र-ए-माह-ओ-आफ़्ताब
एक चराग़-ए-शाम अगर मैं ने जला लिया तो क्या


बाग़ का बाग़ आप की दस्तरस-ए-हवस में है
एक ग़रीब ने अगर फूल उठा लिया तो क्या


लुत्फ़ ये है कि आदमी आम करे बहार को
मौज-ए-हवा-ए-रंग में आप नहा लिया तो क्या


अब कहीं बोलता नहीं ग़ैब जो खोलता नहीं
ऐसा अगर कोई ख़ुदा तुम ने बना लिया तो क्या


जो है ख़ुदा का आदमी उस की है सल्तनत अलग
ज़ुल्म ने ज़ुल्म से अगर हाथ मिला लिया तो क्या


आज की है जो कर्बला कल पे है उस का फ़ैसला
आज ही आप ने अगर जश्न मना लिया तो क्या


लोग दुखे हुए तमाम रंग बुझे हुए तमाम
ऐसे में अहल-ए-शाम ने शहर सजा लिया तो क्या


पढ़ता नहीं है अब कोई सुनता नहीं है अब कोई

हर्फ़ जगा लिया तो क्या शेर सुना लिया तो क्या


दुखे हुए हैं हमें और अब दुखाओ मत उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


दुखे हुए हैं हमें और अब दुखाओ मत
जो हो गए हो फ़साना तो याद आओ मत


ख़याल-ओ-ख़्वाब में परछाइयाँ सी नाचती हैं
अब इस तरह तो मिरी रूह में समाओ मत


ज़मीं के लोग तो क्या दो दिलों की चाहत में
ख़ुदा भी हो तो उसे दरमियान लाओ मत


तुम्हारा सर नहीं तिफ़्लान-ए-रह-गुज़र के लिए
दयार-ए-संग में घर से निकल के जाओ मत


सिवाए अपने किसी के भी हो नहीं सकते
हम और लोग हैं लोगो हमें सताओ मत


हमारे अहद में ये रस्म-ए-आशिक़ी ठहरी
फ़क़ीर बन के रहो और सदा लगाओ मत


वही लिखो जो लहू की ज़बाँ से मिलता है
सुख़न को पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ में छुपाओ मत


सुपुर्द कर ही दिया आतिश-ए-हुनर के तो फिर

तमाम ख़ाक ही हो जाओ कुछ बचाओ मत




नींद आँखों से उड़ी फूल से ख़ुश्बू की तरह उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


नींद आँखों से उड़ी फूल से ख़ुश्बू की तरह
जी बहल जाएगा शब से तिरे गेसू की तरह


दोस्तो जश्न मनाओ कि बहार आई है
फूल गिरते हैं हर इक शाख़ से आँसू की तरह


मेरी आशुफ़्तगी-ए-शौक़ में इक हुस्न भी है
तेरे आरिज़ पे मचलते हुए गेसू की तरह


अब तिरे हिज्र में लज़्ज़त न तिरे वस्ल में लुत्फ़
इन दिनों ज़ीस्त है ठहरे हुए आँसू की तरह


ज़िंदगी की यही क़ीमत है कि अर्ज़ां हो जाओ
नग़्मा-ए-दर्द लिए मौजा-ए-ख़ुश्बू की तरह


किस को मालूम नहीं कौन था वो शख़्स 'अलीम'

जिस की ख़ातिर रहे आवारा हम आहू की तरह




बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स
हुआ चराग़ तो घर ही जला गया इक शख़्स


तमाम रंग मिरे और सारे ख़्वाब मिरे
फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स


मैं किस हवा में उड़ूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ
दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स


पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर
मुझे ये कौन से रस्ते लगा गया इक शख़्स


मोहब्बतें भी अजब उस की नफ़रतें भी कमाल
मिरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स


मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे
मिले वो ज़ख़्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स


खुला ये राज़ कि आईना-ख़ाना है दुनिया

और उस में मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स





बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है
हर धूप में जो मुझे साया दे वो सच्चा साया घर में है


पाताल के दुख वो क्या जानें जो सत्ह पे हैं मिलने वाले
हैं एक हवाला दोस्त मिरे और एक हवाला घर में है


मिरी उम्र के इक इक लम्हे को मैं ने क़ैद किया है लफ़्ज़ों में
जो हारा हूँ या जीता हूँ वो सब सरमाया घर में है


तू नन्हा-मुन्ना एक दिया मैं एक समुंदर अँधियारा
तू जलते जलते बुझने लगा और फिर भी अँधेरा घर में है


क्या स्वाँग भरे रोटी के लिए इज़्ज़त के लिए शोहरत के लिए
सुनो शाम हुई अब घर को चलो कोई शख़्स अकेला घर में है


इक हिज्र-ज़दा बाबुल पियारी तिरे जागते बच्चों से हारी
ऐ शाएर किस दुनिया में है तू तिरी तन्हा दुनिया घर में है


दुनिया में खपाए साल कई आख़िर में खुला अहवाल यही

वो घर का हो या बाहर का हर दुख का मुदावा घर में है




मिट्टी था मैं ख़मीर तिरे नाज़ से उठा उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


मिट्टी था मैं ख़मीर तिरे नाज़ से उठा
फिर हफ़्त-आसमाँ मिरी पर्वाज़ से उठा


इंसान हो किसी भी सदी का कहीं का हो
ये जब उठा ज़मीर की आवाज़ से उठा


सुब्ह-ए-चमन में एक यही आफ़्ताब था
इस आदमी की लाश को एज़ाज़ से उठा


सौ करतबों से लिख्खा गया एक एक लफ़्ज़
लेकिन ये जब उठा किसी एजाज़ से उठा


ऐ शहसवार-ए-हुस्न ये दिल है ये मेरा दिल
ये तेरी सर-ज़मीं है क़दम नाज़ से उठा


मैं पूछ लूँ कि क्या है मिरा जब्र ओ इख़्तियार
या-रब ये मसअला कभी आग़ाज़ से उठा


वो अब्र शबनमी था कि नहला गया वजूद
मैं ख़्वाब देखता हुआ अल्फ़ाज़ से उठा


शाएर की आँख का वो सितारा हुआ 'अलीम'

क़ामत में जो क़यामती अंदाज़ से उठा




मैं जिस में खो गया हूँ मिरा ख़्वाब ही तो है उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


मैं जिस में खो गया हूँ मिरा ख़्वाब ही तो है
यक दो नफ़स नुमूद सही ज़िंदगी तो है


जलती है कितनी देर हवाओं में मेरे साथ
इक शम्अ' फिर मिरे लिए रौशन हुई तो है


जिस में भी ढल गई उसे महताब कर गई
मेरे लहू में ऐसी भी इक रौशनी तो है


परछाइयों में डूबता देखूँ भी महर-ए-उम्र
और फिर बचा न पाऊँ ये बेचारगी तो है


तू बू-ए-गुल है और परेशाँ हुआ हूँ मैं
दोनों में एक रिश्ता-ए-आवारगी तो है


ऐ ख़्वाब ख़्वाब उम्र-ए-गुरेज़ाँ की साअ'तो

तुम सुन सको तो बात मिरी गुफ़्तनी तो है




ये और बात कि इस अहद की नज़र में हूँ उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


ये और बात कि इस अहद की नज़र में हूँ
अभी मैं क्या कि अभी मंज़िल-ए-सफ़र में हूँ


अभी नज़र नहीं ऐसी कि दूर तक देखूँ
अभी ख़बर नहीं मुझ को कि किस असर में हूँ


पिघल रहे हैं जहाँ लोग शो'ला-ए-जाँ से
शरीक मैं भी इसी महफ़िल-ए-हुनर में हूँ


जो चाहे सज्दा गुज़ारे जो चाहे ठुकरा दे
पड़ा हुआ मैं ज़माने की रहगुज़र में हूँ


जो साया हो तो डरूँ और धूप हो तो जलूँ
कि एक नख़्ल-ए-नुमू ख़ाक-ए-नौहा-गर में हूँ


किरन किरन कभी ख़ुर्शीद बन के निकलूँगा
अभी चराग़ की सूरत में अपने घर में हूँ


बिछड़ गई है वो ख़ुश्बू उजड़ गया है वो रंग

बस अब तो ख़्वाब सा कुछ अपनी चश्म-ए-तर में हूँ




वहशत उसी से फिर भी वही यार देखना उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


वहशत उसी से फिर भी वही यार देखना
पागल को जैसे चाँद का दीदार देखना


इस हिज्रती को काम हुआ है कि रात दिन
बस वो चराग़ और वो दीवार देखना


पाँव में घूमती है ज़मीं आसमाँ तलक
इस तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार की रफ़्तार देखना


या-रब कोई सितारा-ए-उम्मीद फिर तुलू
क्या हो गए ज़मीन के आसार देखना


लगता है जैसे कोई वली है ज़ुहूर में
अब शाम को कहीं कोई मय-ख़्वार देखना


इस वहशती का हाल अजब है कि उस तरफ़
जाना भी और जानिब-ए-पिंदार देखना


देखा था ख़्वाब शायर-ए-मोमिन ने इस लिए
ताबीर में मिला हमें तलवार देखना


जो दिल को है ख़बर कहीं मिलती नहीं ख़बर
हर सुब्ह इक अज़ाब है अख़बार देखना


मैं ने सुना है क़ुर्ब-ए-क़यामत का है निशाँ
बे-क़ामती पे जुब्बा-ओ-दस्तार देखना


सदियाँ गुज़र रही हैं मगर रौशनी वही
ये सर है या चराग़ सर-ए-दार देखना


इस क़ाफ़िले ने देख लिया कर्बला का दिन
अब रह गया है शाम का बाज़ार देखना


दो चार के सिवा यहाँ लिखता ग़ज़ल है कौन

ये कौन हैं ये किस के तरफ़-दार देखना




वहशतें कैसी हैं ख़्वाबों से उलझता क्या है उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


वहशतें कैसी हैं ख़्वाबों से उलझता क्या है
एक दुनिया है अकेली तू ही तन्हा क्या है


दाद दे ज़र्फ़-ए-समाअत तो करम है वर्ना
तिश्नगी है मिरी आवाज़ की नग़्मा क्या है


बोलता है कोई हर-आन लहू में मेरे
पर दिखाई नहीं देता ये तमाशा क्या है


जिस तमन्ना में गुज़रती है जवानी मेरी
मैं ने अब तक नहीं जाना वो तमन्ना क्या है


ये मिरी रूह का एहसास है आँखें क्या हैं
ये मिरी ज़ात का आईना है चेहरा क्या है


काश देखो कभी टूटे हुए आईनों को
दिल शिकस्ता हो तो फिर अपना पराया क्या है


ज़िंदगी की ऐ कड़ी धूप बचा ले मुझ को

पीछे पीछे ये मिरे मौत का साया क्या है




वीरान सराए का दिया है उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


वीरान सराए का दिया है
जो कौन-ओ-मकाँ में जल रहा है


ये कैसी बिछड़ने की सज़ा है
आईने में चेहरा रख गया है


ख़ुर्शीद मिसाल शख़्स कल शाम
मिट्टी के सुपुर्द कर दिया है


तुम मर गए हौसला तुम्हारा
ज़िंदा हूँ मैं ये मेरा हौसला है


अंदर भी इस ज़मीं के रौशनी हो
मिट्टी में चराग़ रख दिया है


मैं कौन सा ख़्वाब देखता हूँ
ये कौन से मुल्क की फ़ज़ा है


वो कौन सा हाथ है कि जिस ने
मुझ आग को ख़ाक से लिखा है


रक्खा था ख़ला में पाँव मैं ने
रस्ते में सितारा आ गया है


शायद कि ख़ुदा में और मुझ में
इक जस्त का और फ़ासला है


गर्दिश में हैं कितनी काएनातें

बच्चा मिरा पाँव चल रहा है




वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था
वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था


वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई
कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था


देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी
वो मुस्कुरा दिया तो मैं शायर अदीब था


रखता न क्यूँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने
वो यूँ भी था तबीब वो यूँ भी तबीब था


हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ
चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था


मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ
गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था


मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम
ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था


हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में
ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था


देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा
वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था


लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम'

उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था




सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना
ये ज़िंदगी है हमारी सँभाल कर रखना


खुला कि इश्क़ नहीं है कुछ और इस के सिवा
रज़ा-ए-यार जो हो अपना हाल कर रखना


उसी का काम है फ़र्श-ए-ज़मीं बिछा देना
उसी का काम सितारे उछाल कर रखना


उसी का काम है इस दुख-भरे ज़माने में
मोहब्बतों से मुझे माला-माल कर रखना


बस एक कैफ़ियत-ए-दिल में बोलते रहना
बस एक नश्शे में ख़ुद को निहाल कर रखना


बस एक क़ामत-ए-ज़ेबा के ख़्वाब में रहना
बसा एक शख़्स को हद्द-ए-मिसाल कर रखना


गुज़रना हुस्न की नज़्ज़ारगी से पल-भर को
फिर उस को ज़ाइक़ा-ए-ला-ज़वाल कर रखना


किसी के बस में नहीं था किसी के बस में नहीं

बुलंदियों को सदा पाएमाल कर रखना




हँसो तो रंग हूँ चेहरे का रोओ तो चश्म-ए-नम में हूँ उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


हँसो तो रंग हूँ चेहरे का रोओ तो चश्म-ए-नम में हूँ
तुम मुझ को महसूस करो तो हर मौसम में हूँ


चाहा था जिसे वो मिल भी गया पर ख़्वाब भरे हैं आँखों में
ऐ मेरे लहू की लहर बता अब कौन से मैं आलम में हूँ


लोग मोहब्बत करने वाले देखेंगे तस्वीर अपनी
एक शुआ-ए-आवारा हूँ आईना-ए-शबनम में हूँ


उस लम्हे तो गर्दिश-ए-ख़ूँ ने मेरी ये महसूस किया
जैसे सर पे ज़मीं उठाए इक रक़्स-ए-पैहम में हूँ


यार मिरा ज़ंजीरें पहने आया है बाज़ारों में
मैं कि तमाशा देखने वाले लोगों के मातम में हूँ


जो लिक्खे वो ख़्वाब मिरे अब आँखों आँखों ज़िंदा हैं

जो अब तक नहीं लिख पाया मैं उन ख़्वाबों के ग़म में हूँ




हर आवाज़ ज़मिस्तानी है हर जज़्बा ज़िंदानी है उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


हर आवाज़ ज़मिस्तानी है हर जज़्बा ज़िंदानी है
कूचा-ए-यार से दार-ओ-रसन तक एक सी ही वीरानी है


कितने कोह-ए-गिराँ काटे तब सुब्ह-ए-तरब की दीद हुई
और ये सुब्ह-ए-तरब भी यारो कहते हैं बेगानी है


जितने आग के दरिया में सब पार हमीं को करना हैं
दुनिया किस के साथ आई है दुनिया तो दीवानी है


लम्हा लम्हा ख़्वाब दिखाए और सौ सौ ता'बीर करे
लज़्ज़त-ए-कम-आज़ार बहुत है जिस का नाम जवानी है


दिल कहता है वो कुछ भी हो उस की याद जगाए रख
अक़्ल ये कहती है कि तवहहुम पर जीना नादानी है


तेरे प्यार से पहले कब था दिल में ऐसा सोज़-ओ-गुदाज़
तुझ से प्यार किया तो हम ने अपनी क़ीमत जानी है


आप भी कैसे शहर में आ कर शाइर कहलाए हैं 'अलीम'

दर्द जहाँ कमयाब बहुत है नग़्मों की अर्ज़ानी है




हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते उबैदुल्लाह अलीम ग़ज़ल / Obaidullah Aleem Ghazal


हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते
हम बहर-हाल बसर ख़्वाब तुम्हारा करते


एक ऐसी भी घड़ी इश्क़ में आई थी कि हम
ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते


अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर
इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते


मेहव-ए-आराइश-ए-रुख़ है वो क़यामत सर-ए-बाम
आँख अगर आईना होती तो नज़ारा करते


एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे
किस से करते जो कोई इश्क़ दोबारा करते


जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए
फिर कोई आए यहाँ कैसे गवारा करते


कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब
तेरी जानिब ही तिरे लोग इशारा करते


ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ और तिरा हुस्न कहाँ
हम तिरे चेहरे से आईना सँवारा करते

Adil Mansuri Ghazal / आदिल मंसूरी ग़ज़लें


आदिल मंसूरी ग़ज़ल 


एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
एक मुश्त-ए-ख़ाक जो बिखरी तो सहरा कर दिया


मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया


वारदात-ए-क़ल्ब लिक्खी हम ने फ़र्ज़ी नाम से
और हाथों-हाथ उस को ख़ुद ही ले जा कर दिया


उस की नाराज़ी का सूरज जब सवा नेज़े पे था
अपने हर्फ़-ए-इज्ज़ ही ने सर पे साया कर दिया


दुनिया भर की ख़ाक कोई छानता फिरता है अब
आप ने दर से उठा कर कैसा रुस्वा कर दिया


अब न कोई ख़ौफ़ दिल में और न आँखों में उम्मीद
तू ने मर्ग-ए-ना-गहाँ बीमार अच्छा कर दिया


भूल जा ये कल तिरे नक़्श-ए-क़दम थे चाँद पर
देख उन हाथों को किस ने आज कासा कर दिया


हम तो कहने जा रहे थे हम्ज़ा-ये-वस्सलाम
बीच में उस ने अचानक नून-ग़ुन्ना कर दिया


हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया


तीरगी की भी कोई हद होती है आख़िर मियाँ
सुर्ख़ परचम को जला कर ही उजाला कर दिया


बज़्म में अहल-ए-सुख़न तक़्ती फ़रमाते रहे
और हम ने अपने दिल का बोझ हल्का कर दिया


जाने किस के मुंतज़िर बैठे हैं झाड़ू फेर कर
दिल से हर ख़्वाहिश को 'आदिल' हम ने चलता कर दिया





इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला
टूटा है चश्म-ए-ख़्वाब में हैरत का आइना


जो आसमान बन के मुसल्लत सरों पे था
किस ने उसे ज़मीन के अंदर धँसा दिया


बिखरी हैं पीली रेत पे सूरज की हड्डियाँ
ज़र्रों के इंतिज़ार में लम्हों का झूमना


एहराम टूटते हैं कहाँ संग-ए-वक़्त के
सहरा की तिश्नगी में अबुल-हौल हँस पड़ा


उँगली से उस के जिस्म पे लिक्खा उसी का नाम
फिर बत्ती बंद कर के उसे ढूँडता रहा


शिरयानें खिंच के टूट न जाएँ तनाव से
मिट्टी पे खुल न जाए ये दरवाज़ा ख़ून का


मौजें थीं शो'लगी के समुंदर में तुंद-ओ-तेज़
मैं रात भर उभरता रहा डूबता रहा


अल्फ़ाज़ की रगों से मुआ'नी निचोड़ ले

फ़ासिद मवाद काग़ज़ी घोड़े पे डाल आ




आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के
हैं उन के दिल में वसवसे अब एहतिसाब के


वो जो तुम्हारे हाथ से आ कर निकल गया
हम भी क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के


फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के


सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा
जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के


बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें
दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब के


ओकाड़ा इतनी दूर न होता तो एक दिन
भर लाते साँस साँस में गुल आफ़्ताब के


किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को

काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के


इस ब्लॉग पर अन्य शायर / ग़ज़लकार /ग़ज़लें 

 


अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार
इक शख़्स चीख़ता है समुंदर के आर-पार


आँखों से राह निकली है तहतुश-शुऊर तक
रग रग में रेंगता है सुलगता हुआ ख़ुमार


गिरते रहे नुजूम अंधेरे की ज़ुल्फ़ से
शब भर रहीं ख़मोशियाँ सायों से हम-कनार


दीवार ओ दर पे ख़ुशबू के हाले बिखर गए
तन्हाई के फ़रिश्तों ने चूमी क़बा-ए-यार


कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ में

कब तक चलेगा खोखले शब्दों का कारोबार






कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ
रात के गुम्बद से टकरा कर पलट आई सदा


मैं तो था बिखरा हुआ साहिल की पीली रेत पर
और दरिया में था नीला आसमाँ डूबा हुआ


सोच की सूखी हुई शाख़ों से मुरझाए हुए
टूट कर गिरते हुए लफ़्ज़ों को मैं चिंता रहा


जब भी ख़ुद की खोज में निकला हूँ अपने जिस्म से
काली तन्हाई के जंगल से गुज़रना ही पड़ा


फैलता जाता है ठंडी चाँदनी के साथ साथ

शो'ला शो'ला लज़्ज़तों की तिश्नगी का दायरा





गाँठी है उस ने दोस्ती इक पेश-इमाम से आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


गाँठी है उस ने दोस्ती इक पेश-इमाम से
'आदिल' उठा लो हाथ दुआ-ओ-सलाम से


पानी ने रास्ता न दिया जान-बूझ कर
ग़ोते लगाए फिर भी रहे तिश्ना-काम से


मैं उस गली से सर को झुकाए गुज़र गया
चिलगोज़े फेंकती रही वो मुझ पे बाम से


वो कौन था जो दिन के उजाले में खो गया
ये चाँद किस को ढूँडने निकला है शाम से


कोने में बादशाह पड़ा ऊँघता रहा
टेबल पे रात कट गई बेगम ग़ुलाम से


नश्शा सा डोलता है तिरे अंग अंग पर

जैसे अभी भिगो के निकाला हो जाम से






घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
उस का लहू भी मर गया सुब्ह के इंतिज़ार में


रूह की ख़ुश्क पत्तियाँ शाख़ से टूटती रहीं
और घटा बरस गई जिस्म के रेगज़ार में


रंग में रंग घुल गए अक्स के शीशे धुल गए
क़ौस-ए-क़ुज़ह पिघल गई भीगी हुई लगार में


ठंडी सड़क थी बे-ख़बर गर्म दिनों के क़हर से
धूप को झेलते रहे पेड़ खड़े क़तार में


बहती हवा की मौज में तैर रहे थे सब्ज़ घर
शहर अजीब सा लगा रात चढ़े ख़ुमार में


नींद भी जागती रही पूरे हुए न ख़्वाब भी
सुब्ह हुई ज़मीन पर रात ढली मज़ार में


देता जवाब क्या कोई मेरे सिवा न था कोई

डूब के रह गई सदा तंग सियाह ग़ार में


Adil Mansuri Ghazal


चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को
और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो


बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो
कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो


छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को
ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो


क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो


जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया
नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो


अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी
दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को


वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात
ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो


'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें

जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो




चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई
सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई


मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में
कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई


सूरज वही था धूप वही शहर भी वही
क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई


ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर
अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई


तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ
ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई


चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से
रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई


रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब

अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई




ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा


मिरी पतियाँ सारी सूखी हुईं
नए मौसमों में बिखर जाऊँगा


अगर आ गया आइना सामने
तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा


वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है
न आई नज़र तो किधर जाऊँगा


वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर
मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा


पलट कर न पाया किसी को अगर
तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा


तिरी ज़ात में साँस ली है सदा

तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा




दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया


वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया
पेड़ों ने फूल पत्तों से रस्ता छुपा लिया


उस के क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ
मैं अपने-आप से भी बहुत दूर जा पड़ा


अंगड़ाई ले रही थी गुलिस्ताँ में जब बहार
हर फूल अपने रंग की आतिश में जल गया


काँटे से टूटते हैं मेरे अंग अंग में
रग रग में चाँद जलता हुआ ज़हर भर गया


आँखों ने उस को देखा नहीं इस के बावजूद
दिल उस की याद से कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा


दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए
ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा


शब चाँदनी की आँच में तप कर निखर गई
सूरज की जलती आग में दिन ख़ाक हो गया


सड़कें तमाम धूप से अँगारा हो गईं
अंधी हवाएँ चलती हैं इन पर बरहना-पा


वो आए थोड़ी देर रुके और चले गए

'आदिल' मैं सर झुकाए हुए चुप खड़ा रहा




जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख


मंज़िल यहीं है आम के पेड़ों की छाँव में
ऐ शहसवार घोड़े से नीचे उतर के देख


टूटे पड़े हैं कितने उजालों के उस्तुख़्वाँ
साया-नुमा अंधेरे के अंदर उतर के देख


फूलों की तंग-दामनी का तज़्किरा न कर
ख़ुशबू की तरह मौज-ए-सबा में बिखर के देख


तुझ पर खुलेंगे मौत की सरहद के रास्ते
हिम्मत अगर है उस की गली से गुज़र के देख


दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं

तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख




न कोई रोक सका ख़्वाब के सफ़ीरों को आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


न कोई रोक सका ख़्वाब के सफ़ीरों को
उदास कर गए नींदों के राहगीरों को


वो मौज बन के उठी याद के समुंदर से
तबाह कर गई तन्हाई के जज़ीरों को


लरज़ के टूट गईं हफ़्त-रंग दीवारें
हवा चली तो रिहाई मिली असीरों को


दफ़ीने पाँव तले से गुज़र गए कितने

मैं देखता ही रहा हाथ में लकीरों को




पानी को पत्थर कहते हैं आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


पानी को पत्थर कहते हैं
क्या कुछ दीदा-वर कहते हैं


ख़ुश-फ़हमी की हद होती हैं
ख़ुद को दानिश-वर कहते हैं


कौन लगी-लिपटी रखता है
हम तेरे मुँह पर कहते हैं


ठीक ही कहते होंगे फिर तो
जब ये प्रोफ़ेसर कहते हैं


सब उन को अंदर समझे थे
वो ख़ुद को बाहर कहते हैं


तेरा इस में क्या जाता है
अपने खंडर को घर कहते हैं


नज़्म समझ में कब आती है

देख इस को मंतर कहते हैं


फिर किसी ख़्वाब के पर्दे से पुकारा जाऊँ आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal

फिर किसी ख़्वाब के पर्दे से पुकारा जाऊँ
फिर किसी याद की तलवार से मारा जाऊँ


फिर कोई वुसअत-ए-आफ़ाक़ पे साया डाले
फिर किसी आँख के नुक़्ते में उतारा जाऊँ


दिन के हंगामों में दामन कहीं मैला हो जाए
रात की नुक़रई आतिश में निखारा जाऊँ


ख़ुश्क खोए हुए गुमनाम जज़ीरे की तरह
दर्द के काले समुंदर से उभारा जाऊँ


अपनी खोई हुई जन्नत का तलबगार बनूँ

दस्त-ए-यज़्दाँ से गुनहगार सँवारा जाऊँ


फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से
जाएँ कहाँ निकल के ख़यालों के जाल से


मशरिक़ से मेरा रास्ता मग़रिब की सम्त था
उस का सफ़र जुनूब की जानिब शुमाल से


कैसा भी तल्ख़ ज़िक्र हो कैसी भी तुर्श बात
उन की समझ में आएगी गुल की मिसाल से


चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं
बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से


रंगों को बहते देखिए कमरे के फ़र्श पर
किरनों के वार रोकिए शीशे की ढाल से


आँखों में आँसुओं का कहीं नाम तक नहीं
अब जूते साफ़ कीजिए उन के रुमाल से


चेहरा बुझा बुझा सा परेशान ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़
अल्लाह दुश्मनों को बचाए वबाल से


फिर पानियों में नुक़रई साए उतर गए

फिर रात जगमगा उठी चाँदी के थाल से




बदन पर नई फ़स्ल आने लगी आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


बदन पर नई फ़स्ल आने लगी
हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी


कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया
उदासी की मेहनत ठिकाने लगी


जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर
वो तस्वीर बातें बनाने लगी


ख़यालों के तारीक खंडरात में
ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी


ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में

तिरी याद आँखें दुखाने लगी




बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
मैं हाथ में तलवार लिए झूम रहा था


घूँघट में मिरे ख़्वाब की ताबीर छुपी थी
मेहंदी से हथेली में मिरा नाम लिखा था


लब थे कि किसी प्याली के होंटों पे झुके थे
और हाथ कहीं गर्दन-ए-मीना में पड़ा था


हम्माम के आईने में शब डूब रही थी
सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था


दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी
और पानी की तह में वो मुझे ढूँढ रहा था


मालूम नहीं फिर वो कहाँ छुप गया 'आदिल'

साया सा कोई लम्स की सरहद पे मिला था




मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal

मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ


हुदूद-ए-वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ
मैं एक लम्हा हूँ सदियों के इंतिज़ार में हूँ


अभी न कर मिरी तश्कील मुझ को नाम न दे
तिरे वजूद से बाहर में किस शुमार में हूँ


मैं एक ज़र्रा मिरी हैसियत ही क्या है मगर
हवा के साथ हूँ उड़ते हुए ग़ुबार में हूँ


बस आस-पास ये सूरज है और कुछ भी नहीं

महक रहा तो हूँ लेकिन मैं रेगज़ार में हूँ




ये फैलती शिकस्तगी एहसास की तरफ़ आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


ये फैलती शिकस्तगी एहसास की तरफ़
दरिया रवाँ-दवाँ हैं मिरी प्यास की तरफ़


उस का बदन झुका हुआ पत्थर की बीच पर
अपने क़दम भी मुड़ते हुए घास की तरफ़


दिखला रही है धूप बशाशत का आईना
और छाँव खींचती है मुझे यास की तरफ़


अशिया की लज़्ज़तों में अटकता हुआ बदन
और रूह का खिंचाव है बन-बास की तरफ़


सब ये समझ रहे थे कि निरवान मिल गया

चकरा रही है चील मगर मास की तरफ़




वो तुम तक कैसे आता आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


वो तुम तक कैसे आता
जिस्म से भारी साया था


सारे कमरे ख़ाली थे
सड़कों पर भी कोई न था


पीछे पीछे क्यूँ आए
आगे भी तो रस्ता था


खिड़की ही में ठिठुर गई
काली और चौकोर हवा


दीवारों पर आईने
आईनों में सब्ज़ ख़ला


बैठी थी वो कुर्सी पर
दाँतों में उँगली को दबा


बोटी बोटी जलती थी
उस का बदन अँगारा था


ते के ऊपर दो नुक़्ते
बे के नीचे इक नुक़्ते


चाय में उस के पिस्ताँ थे
मेरा बदन पानी में था


तन्हाई की रानों में
सुब्ह तलक मैं क़ैद रहा


'आदिल' अब शादी कर लो

सत्ताईस्वाँ ख़त्म हुआ






वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर
अँधेरे के पहलू में सुनसान घर


खुलेंगे अभी और किस किस के दर
कहाँ ख़त्म होगा लहू का सफ़र


कुछ अपने अक़ाएद भी कमज़ोर थे
लरज़ते थे साए भी दीवार पर


उजाले सिमटते रहे आँख में
सितारे बिखरते रहे फ़र्श पर


बदन में पिघलती रही चाँदनी
लहू में सुलगती रही दोपहर


कभी ख़ाक वालों की बातें भी सुन
कभी आसमानों से नीचे उतर


क़दम घर में रखते ही घायल हुआ

गिरे टूट कर मुझ पे दीवार-ओ-दर






सड़कों पर सूरज उतरा आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


सड़कों पर सूरज उतरा
साया साया टूट गया


जब गुल का सीना चीरा
ख़ुश्बू का काँटा निकला


तू किस के कमरे में थी
मैं तेरे कमरे में था


खिड़की ने आँखें खोली
दरवाज़े का दिल धड़का


दिल की अंधी ख़ंदक़ में
ख़्वाहिश का तारा टूटा


जिस्म के काले जंगल में
लज़्ज़त का चीता लपका


फिर बालों में रात हुई

फिर हाथों में चाँद खिला




साँस की आँच ज़रा तेज़ करो आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


साँस की आँच ज़रा तेज़ करो
काँच का जिस्म पिघल जाने दो


लाम ख़ाली है उसे मत छेड़ो
नून के पेट में नुक़्ता देखो


रात के पर्दे उलटते जाओ
चाँद का जिस्म बरहना भी हो


सर उठाओ न कनार-ए-दरिया
मौज को सर से गुज़र जाने दो


ख़ुद-ब-ख़ुद शाख़ लचक जाएगी
फल से भरपूर तो हो लेने दो


आँख खुलते ही ये आवाज़ आई
चोर घुस आया है घर में पकड़ो


उँगलियाँ चाटते रह जाओगे
तुम कभी अपना लहू चख देखो


मौत सड़कों पे फिरा करती है
घर से निकलो तो सँभल कर निकलो


कौन अब शेर कहे नज़्म लिखे
शहर ही छोड़ गई जब ज़ेबो


तुम को दावा है सुख़न-फ़हमी का
जाओ 'ग़ालिब' के तरफ़-दार बनो


कल वो 'आदिल' से ये फ़रमाते थे

शाएरी छोड़ के शादी कर लो






सोए हुए पलंग के साए जगा गया आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


सोए हुए पलंग के साए जगा गया
खिड़की खुली तो आसमाँ कमरे में आ गया


आँगन में तेरी याद का झोंका जो आ गया
तन्हाई के दरख़्त से पत्ते उड़ा गया


हँसते चमकते ख़्वाब के चेहरे भी मिट गए
बत्ती जली तो मन में अंधेरा सा छा गया


आया था काले ख़ून का सैलाब पिछली रात
बरसों पुरानी जिस्म की दीवार ढा गया


तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को
ख़ुद ही फ़्रेम तोड़ के पहलू में आ गया


वो चाय पी रहा था किसी दूसरे के साथ

मुझ पर निगाह पड़ते ही कुछ झेंप सा गया






हज का सफ़र है इस में कोई साथ भी तो हो आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


हज का सफ़र है इस में कोई साथ भी तो हो
पर्दा-नशीं से अपनी मुलाक़ात भी तो हो


कब से टहल रहे हैं गरेबान खोल कर
ख़ाली घटा को क्या करें बरसात भी तो हो


दिन है कि ढल नहीं रहा इस रेग-ज़ार में
मंज़िल भले न आए कहीं रात भी तो हो


मजमूआ छापने तो चले हो मियाँ मगर

अशआर में तुम्हारे कोई बात भी तो हो




हर ख़्वाब काली रात के साँचे में ढाल कर आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


हर ख़्वाब काली रात के साँचे में ढाल कर
ये कौन छुप गया है सितारे उछाल कर


ऐसे डरे हुए हैं ज़माने की चाल से
घर में भी पाँव रखते हैं हम तो सँभाल कर


ख़ाना-ख़राबियों में तिरा भी पता नहीं
तुझ को भी क्या मिला हमें घर से निकाल कर


झुलसा गया है काग़ज़ी चेहरों की दास्ताँ
जलती हुई ख़मोशियाँ लफ़्ज़ों में ढाल कर


ये फूल ख़ुद ही सूख कर आएँगे ख़ाक पर

तू अपने हाथ से न इन्हें पाएमाल कर






हाथ में आफ़्ताब पिघला कर आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


हाथ में आफ़्ताब पिघला कर
रात भर रौशनी से खेला कर


यूँ खुले सर न घर से निकला कर
देख बूढ़ों की बात माना कर


आइना आईने में क्या देखे
टूट जाते हैं ख़्वाब टकरा कर


एक दम यूँ उछल नहीं पड़ते
बात के पैंतरे भी समझा कर


देख ठोकर बने न तारीकी
कोई सोया है पाँव फैला कर


ऊँट जाने किधर निकल भागा

जलते सहरा में हम को ठहरा कर






हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा
सफ़र का तसलसुल कहाँ जा लगा


अजब रात बस्ती का नक़्शा लगा
हर इक नक़्श अंदर से टूटा लगा


तुम्हारा हज़ारों से रिश्ता लगा
कहो साईं का काम कैसा लगा


अभी खिंच ही जाती लहू की धनक
मियाँ तीर टुक तेरा तिरछा लगा


लहू में उतरती रही चाँदनी
बदन रात का कितना ठंडा लगा


तअज्जुब के सुराख़ से देखते

अंधेरे में कैसे निशाना लगा






होने को यूँ तो शहर में अपना मकान था आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal


होने को यूँ तो शहर में अपना मकान था
नफ़रत का रेगज़ार मगर दरमियान था


लम्हे के टूटने की सदा सुन रहा था मैं
झपकी जो आँख सर पे नया आसमान था


कहने को हाथ बाँधे खड़े थे नमाज़ में
पूछो तो दूसरी ही तरफ़ अपना ध्यान था


अल्लाह जाने किस पे अकड़ता था रात दिन
कुछ भी नहीं था फिर भी बड़ा बद-ज़बान था


शोले उगलते तीर बरसते थे चर्ख़ से
साया था पास में न कोई साएबान था


सब से किया है वस्ल का वादा अलग अलग
कल रात वो सभी पे बहुत मेहरबान था


मुँह-फट था बे-लगाम था रुस्वा था ढीट था
जैसा भी था वो दोस्तो महफ़िल की जान था

अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal



अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी
मिरी बहार में शामिल है अब ख़िज़ाँ मेरी

मैं अपने आप को औरों में रख के देखता हूँ
कहीं फ़रेब न हों दर्द-मंदियाँ मेरी

मैं अपनी क़ुव्वत-ए-इज़हार की तलाश में हूँ
वो शौक़ है कि सँभलती नहीं ज़बाँ मेरी

यही सबब है कि अहवाल-ए-दिल नहीं कहता
कहूँ तो और उलझती हैं गुत्थियाँ मेरी

मैं अपने इज्ज़ पे नादिम नहीं हूँ हम-सुख़नो
हज़ार शुक्र तबीअत नहीं रवाँ मेरी


अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए
इश्क़ ओ हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए

उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के
मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए

कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ
मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए

कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का
संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए

कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में
हम-नफ़सान-ए-शोला-ख़ू आग नई जलाइए


अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं 
कौन रहता था कहाँ याद नहीं 

जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल थे वो दयार 
जिन के अब नाम-ओ-निशाँ याद नहीं 

कोई उजला सा भला सा घर था 
किस को देखा था वहाँ याद नहीं 

याद है ज़ीना-ए-पेचाँ उस का 
दर-ओ-दीवार-ए-मकाँ याद नहीं 

याद है ज़मज़मा-ए-साज़-ए-बहार 
शोर-ए-आवाज़-ए-ख़िज़ाँ याद नहीं 


अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal


अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा
फिर क़दम हम ने तिरी राहगुज़र पर रक्खा

हम ने एक हाथ से थामा शब-ए-ग़म का आँचल
और इक हाथ को दामान-ए-सहर पर रक्खा

चलते चलते जो थके पाँव तो हम बैठ गए
नींद गठरी पे धरी ख़्वाब शजर पर रक्खा

जाने किस दम निकल आए तिरे रुख़्सार की धूप
मुद्दतों ध्यान तिरे साया-ए-दर पर रक्खा

जाते मौसम ने पलट कर भी न देखा 'मुश्ताक़'
रह गया साग़र-ए-गुल सब्ज़ा-ए-तर पर रक्खा


आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना 
याद कर ऐ दिल-ए-ख़ामोश वो अपना रोना 

रक़्स करना कभी ख़्वाबों के शबिस्तानों में 
कभी यादों के सुतूनों से लिपटना रोना 

तुझ से सीखे कोई रोने का सलीक़ा ऐ अब्र 
कहीं क़तरा न गिराना कहीं दरिया रोना 

रस्म-ए-दुनिया भी वही राह-ए-तमन्ना भी वही 
वही मिल बैठ के हँसना वही तन्हा रोना 

ये तिरा तौर समझ में नहीं आया 'मुश्ताक़' 
कभी हँसते चले जाना कभी इतना रोना 


इक फूल मेरे पास था इक शम्अ मेरे साथ थी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ मेरे साथ थी
बाहर ख़िज़ाँ का ज़ोर था अंदर अँधेरी रात थी

ऐसे परेशाँ तो न थे टूटे हुए सन्नाहटे
जब इश्क़ की तेरे मिरे ग़म पर बसर-औक़ात थी

कुछ तुम कहो तुम ने कहाँ कैसे गुज़ारे रोज़ ओ शब
अपने न मिलने का सबब तो गर्दिश-ए-हालात थी

इक ख़ामुशी थी तर-ब-तर दीवार-ए-मिज़्गाँ से उधर
पहुँचा हुआ पैग़ाम था बरसी हुई बरसात थी

सब फूल दरवाज़ों में थे सब रंग आवाज़ों में थे
इक शहर देखा था कभी उस शहर की क्या बात थी

ये हैं नए लोगों के घर सच है अब उन को क्या ख़बर
दिल भी किसी का नाम था ग़म भी किसी की ज़ात थी


इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम
हँसते रहेंगे शोर मचाते रहेंगे हम

लब सूख क्यूँ न जाएँ गला बैठ क्यूँ न जाए
दिल में हैं जो सवाल उठाते रहेंगे हम

अपनी रह-ए-सुलूक में चुप रहना मना है
चुप रह गए तो जान से जाते रहेंगे हम

निकले तो इस तरह कि दिखाई नहीं दिए
डूबे तो देर तक नज़र आते रहेंगे हम

दुख के सफ़र पे दिल को रवाना तो कर दिया
अब सारी उम्र हाथ हिलाते रहेंगे हम


इश्क़ में कौन बता सकता है अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

इश्क़ में कौन बता सकता है 
किस ने किस से सच बोला है 

हम तुम साथ हैं इस लम्हे में 
दुख सुख तो अपना अपना है 

मुझ को तो सारे नामों में 
तेरा नाम अच्छा लगता है 

भूल गई वो शक्ल भी आख़िर 
कब तक याद कोई रहता है 


उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी
इक उम्र का प्यासा हूँ मुझ को भी पिला पानी

है इक ख़त-ए-नादीदा दरिया-ए-मोहब्बत में
होता है जहाँ आ कर पानी से जुदा पानी

दोनों ही तो सच्चे थे इल्ज़ाम किसे देते
कानों ने कहा सहरा आँखों ने सुना पानी

क्या क्या न मिली मिट्टी क्या क्या न धुआँ फैला
काला न हुआ सब्ज़ा मैला न हुआ पानी

जब शाम उतरती है क्या दिल पे गुज़रती है
साहिल ने बहुत पूछा ख़ामोश रहा पानी

फिर देख कि ये दुनिया कैसी नज़र आती है
'मुश्ताक़' मय-ए-ग़म में थोड़ा सा मिला पानी

 

उदास कर के दरीचे नए मकानों के अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

उदास कर के दरीचे नए मकानों के 
सितारे डूब गए सब्ज़ आसमानों के 

गई वो शब जो कभी ख़त्म ही न होती थी 
हवाएँ ले गईं औराक़ दास्तानों के 

हर आन बर्क़ चमकती है दिल धड़कता है 
मिरी क़मीस पे तिनके हैं आशियानों के 

तिरे सुकूत से वो राज़ भी हुए इफ़्शा 
कि जिन को कान तरसते थे राज़-दानों के 

ये बात तो जरस-ए-शौक़ को भी है मालूम 
क़दम उठें गे तो बस तेरे ना-तवानों के


कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में
अभी कुछ वक़्त लगेगा उसे समझाने में

मौसम-ए-गुल हो कि पतझड़ हो बला से अपनी
हम कि शामिल हैं न खिलने में न मुरझाने में

हम से मख़्फ़ी नहीं कुछ रहगुज़र-ए-शौक़ का हाल
हम ने इक उम्र गुज़ारी है हवा खाने में

है यूँही घूमते रहने का मज़ा ही कुछ और
ऐसी लज़्ज़त न पहुँचने में न रह जाने में

नए दीवानों को देखें तो ख़ुशी होती है
हम भी ऐसे ही थे जब आए थे वीराने में

मौसमों का कोई महरम हो तो उस से पूछो
कितने पतझड़ अभी बाक़ी हैं बहार आने में



किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए 
टुकड़े शफ़क़ के धूप से गालों में आ गए 

अफ़्सुर्दगी की लय भी तिरे क़हक़हों में थी 
पतझड़ के सर बहार के झालों में आ गए 

उड़ कर कहाँ कहाँ से परिंदों के क़ाफ़िले 
नादीदा पानियों के ख़यालों में आ गए 

हुस्न तमाम थे तो कोई देखता न था 
तुम दर्द बन के देखने वालों में आ गए 

काँटे समझ के घास पे चलता रहा हूँ मैं 
क़तरे तमाम ओस के छालों में आ गए 

कुछ रत-जगे थे जिन की ज़रूरत नहीं रही 
कुछ ख़्वाब थे जो मेरे ख़यालों में आ गए 



कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी
न किसी का दामन-ए-चाक था न किसी की तर्फ़-ए-कुलाह थी

कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए
न लहू मिरे ही जिगर में था न तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी

दिल-ए-कम-अलम पे वो कैफ़ियत कि ठहर सके न गुज़र सके
न हज़र ही राहत-ए-रूह था न सफ़र में रामिश राह थी

मिरे चार-दांग थी जल्वागर वही लज़्ज़त-ए-तलब-ए-सहर
मगर इक उम्मीद-ए-शिकस्ता-पर कि मिसाल-ए-दर्द सियाह थी

वो जो रात मुझ को बड़े अदब से सलाम कर के चला गया
उसे क्या ख़बर मिरे दिल में भी कभी आरज़ू-ए-गुनाह थी

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता
इक ख़्वाब-ए-मोहब्बत है कि बूढ़ा नहीं होता

वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी
फिरती हैं वो शक्लें जिन्हें देखा नहीं होता

बारिश वो बरसती है कि भर जाते हैं जल-थल
देखो तो कहीं अब्र का टुकड़ा नहीं होता

घिर जाता है दिल दर्द की हर बंद गली में
चाहो कि निकल जाएँ तो रस्ता नहीं होता

यादों पे भी जम जाती है जब गर्द-ए-ज़माना
मिलता है वो पैग़ाम कि पहुँचा नहीं होता

तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता

क्या उस से गिला कीजिए बर्बादी-ए-दिल का
हम से भी तो इज़हार-ए-तमन्ना नहीं होता


ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं
ख़ून ठंडा पड़ गया आँखें पुरानी हो गईं

जिस का चेहरा था चमकते मौसमों की आरज़ू
उस की तस्वीरें भी औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गईं

दिल भर आया काग़ज़-ए-ख़ाली की सूरत देख कर
जिन को लिखना था वो सब बातें ज़बानी हो गईं

जो मुक़द्दर था उसे तो रोकना बस में न था
उन का क्या करते जो बातें ना-गहानी हो गईं

रह गया 'मुश्ताक़' दिल में रंग-ए-याद-ए-रफ़्तगाँ
फूल महँगे हो गए क़ब्रें पुरानी हो गईं


चमक दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

चमक दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय
सिवाए शाख़-ए-तमन्ना हरी नहीं कोई शय

दिल-ए-गदाज़ ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर के बग़ैर
ये इल्म ओ फ़ज़्ल ये दानिश-वरी नहीं कोई शय

तो फिर ये कशमकश-ए-दिल कहाँ से आई है
जो दिल-गिरफ़्तगी ओ दिलबरी नहीं कोई शय

अजब हैं वो रुख़ ओ गेसू कि सामने जिन के
ये सुब्ह ओ शाम की जादूगरी नहीं कोई शय

मलाल-ए-साया-ए-दीवार-ए-यार के आगे
शब-ए-तरब तिरी नीलम-परी नहीं कोई शय

जहान-ए-इश्क़ से हम सरसरी नहीं गुज़रे
ये वो जहाँ है जहाँ सरसरी नहीं कोई शय

तिरी नज़र की गुलाबी है शीशा-ए-दिल में
कि हम ने और तो उस में भरी नहीं कोई शय


चश्म ओ लब कैसे हों रुख़्सार हों कैसे तेरे अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

चश्म ओ लब कैसे हों रुख़्सार हों कैसे तेरे 
हम ख़यालों में बनाते रहे नक़्शे तेरे 

तेरे सावंत को सूली की ज़बाँ चाट गई 
जिस्म अभी गर्म था और बाल थे गीले तेरे 

क्या कहूँ क्या तिरे अफ़्सुर्दा दिलों पर गुज़री 
कैसे ताराज हुए आईना-ख़ाने तेरे 

अब कहाँ देखने वालों को यक़ीं आएगा 
बाग़-ए-जन्नत था बदन ख़्वाब थे बोसे तेरे 


चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

 चाँद उस घर के दरीचों के बराबर आया
दिल-ए-मुश्ताक़ ठहर जा वही मंज़र आया

मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में
क्यूँ तिरी याद का बादल मिरे सर पर आया

बुझ गई रौनक़-ए-परवाना तो महफ़िल चमकी
सो गए अहल-ए-तमन्ना तो सितमगर आया

यार सब जम्अ हुए रात की ख़ामोशी में
कोई रो कर तो कोई बाल बना कर आया


चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले
मुझ से अच्छे तो शब-ए-ग़म के मुक़द्दर निकले

शाम होते ही बरसने लगे काले बादल
सुब्ह-दम लोग दरीचों में खुले सर निकले

कल ही जिन को तिरी पलकों पे कहीं देखा था
रात उसी तरह के तारे मिरी छत पर निकले

धूप सावन की बहुत तेज़ है दिल डूबता है
उस से कह दो कि अभी घर से न बाहर निकले

प्यार की शाख़ तो जल्दी ही समर ले आई
दर्द के फूल बड़ी देर में जा कर निकले

दिल-ए-हंगामा-तलब ये भी ख़बर है तुझ को
मुद्दतें हो गईं इक शख़्स को बाहर निकले


छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से
दिल बहलते हैं कहीं हौसला-अफ़ज़ाई से

कैसा रौशन था तिरा नींद में डूबा चेहरा
जैसे उभरा हो किसी ख़्वाब की गहराई से

वही आशुफ़्ता-मिज़ाजी वही ख़ुशियाँ वही ग़म
इश्क़ का काम लिया हम ने शनासाई से

न कभी आँख भर आई न तिरा नाम लिया
बच के चलते रहे हर कूचा-ए-रुस्वाई से

हिज्र के दम से सलामत है तिरे वस्ल की आस
तर-ओ-ताज़ा है ख़ुशी ग़म की तवानाई से

खिल के मुरझा भी गए फ़स्ल-ए-मुलाक़ात के फूल
हम ही फ़ारिग़ न हुए मौसम-ए-तन्हाई से


ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है
ये बे-इरादा उदासी कहाँ से आती है

इसे नए दर-ओ-दीवार भी न रोक सके
वो इक सदा जो पुराने मकाँ से आती है

बदन की बॉस नसीम-ए-लिबास बू-ए-नफ़स
कोई महक हो उसी ख़ाक-दाँ से आती है

दिलों की बर्फ़ पिघलती नहीं है जिस के बग़ैर
वो आँच एक ग़म-ए-बे-निशाँ से आती है

सुख़न-वरी है नज़र से नज़र का नाज़-ओ-नियाज़
अरूज़ से न ज़बान-ओ-बयाँ से आती है


ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे
रंग-ए-गुल और बू-ए-गुल दोनों हवा हो जाएँगे

आँख से आँसू निकल जाएँगे और टहनी से फूल
वक़्त बदलेगा तो सब क़ैदी रिहा हो जाएँगे

फूल से ख़ुश्बू बिछड़ जाएगी सूरज से किरन
साल से दिन वक़्त से लम्हे जुदा हो जाएँगे

कितने पुर-उम्मीद कितने ख़ूब-सूरत हैं ये लोग
क्या ये सब बाज़ू ये सब चेहरे फ़ना हो जाएँगे


ज़ुल्फ़ देखी वो धुआँ-धार वो चेहरा देखा अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

ज़ुल्फ़ देखी वो धुआँ-धार वो चेहरा देखा
सच बता देखने वाले उसे कैसा देखा

रात सारी किसी टूटी हुई कश्ती में कटी
आँख बिस्तर पे खुली ख़्वाब में दरिया देखा

ज़र्द गलियों में खुले सब्ज़ दरीचे जिन में
धूप लिपटी रही और साए को जलता देखा

काले कमरों में कटी सारी जवानी उस की
जिस ने ऐ सुब्ह-ए-मोहब्बत तिरा रस्ता देखा

सुनते रहते थे कि यूँ होगा वो ऐसा होगा
लेकिन उस को तो किसी और तरह का देखा


टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal

टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया
संग-ओ-कुलूख़ रह गए लहर गई भँवर गया

वो भी अजीब दौर था दिल का चलन ही और था
शाम हुई तो जी उठा सुब्ह हुई तो मर गया

किस के बंधे हुए थे हम दामन-ए-माहताब से
हम भी उधर उधर गए चाँद जिधर जिधर गया

कितने रफ़ीक़-ओ-हम-सफ़र जिन की मिली न कुछ ख़बर
किस के क़दम उठे किधर कौन कहाँ पसर गया

बुझ गई रौनक़-ए-बदन उड़ गया रंग-ए-पैरहन
जान उमीद-वार-ए-मन वक़्त बहुत गुज़र गया

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