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दाग़ देहलवी के मशहूर शेर | Daagh Dehlvi Shayari

 

उर्दू के मशहूर शायर दाग़ देहलवी की शायरी में मोहब्बत, दिल की बातें, शोखी और ज़िंदगी के अनुभव बहुत सहज अंदाज़ में मिलते हैं। उनके शेरों की खासियत यह है कि सरल और बोलचाल की भाषा में कही गई बात भी अपने पीछे गहरा भाव छोड़ जाती है। इसी वजह से दाग़ के कई शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।

यहाँ दाग़ देहलवी के कुछ मशहूर और चुनिंदा शेर व अशआर दिए गए हैं, जिनमें उनकी शायरी के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं।


तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता


हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं


वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था


मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है

मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है


नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो

कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते


उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'

हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है


सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं


हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे

तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना


आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले

आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले


दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे


ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं


शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को

ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का


इस नहीं का कोई इलाज नहीं

रोज़ कहते हैं आप आज नहीं


आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद

बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता


ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया


ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से

ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में


लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से

इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे


न जाना कि दुनिया से जाता है कोई

बहुत देर की मेहरबाँ आते आते


जिस में लाखों बरस की हूरें हों

ऐसी जन्नत को क्या करे कोई


कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो

दो दिन में ये मिज़ाज है आगे की ख़ैर हो


आप का ए'तिबार कौन करे

रोज़ का इंतिज़ार कौन करे


रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैं

उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है


हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल

हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं


बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा

वो मिन्नतों से कहें चुप रहो ख़ुदा के लिए


दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया


ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा


बात तक करनी न आती थी तुम्हें

ये हमारे सामने की बात है


दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं

उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया


लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद

हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं



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