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शकेब जलाली की नज़्में : Shakeb Jalali Nazm Hindi

मुजरिम : शकेब जलाली यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है जिस के फ़ुट-पाथ फ़क़ीरों से अटे रहते हैं ख़स्ता कपड़ों में ये लिपटे हुए मरियल ढाँचे ये भिकारी कि जिन्हें देख के घिन आती है हड्डियाँ जिस्म की निकली हुई पिचके हुए गाल मैले सर में जुएँ, आज़ा से टपकता हुआ कोढ़ रूह बीमार, बदन सुस्त, निगाहें पामाल हाथ फैलाए पड़े रहते हैं रोगी इंसान चंद बेवाओं के मदक़ूक़ से पीले चेहरे कुछ हवस-कार निगाहों में उतर जाते हैं जिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीने चंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं शिद्दत-ए-फ़ाक़ा से रोते हुए नन्हे बच्चे एक रोटी के निवाले से बहल जाते हैं या सर-ए-शाम ही सो जाते हैं भूके प्यासे माँ की सूखी हुई छाती को दबा कर मुँह में चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सर अपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिए या कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा कर चार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं क्या फ़क़त रहम की हक़दार हैं नंगी रूहें? क्यूँ ये इंसानों पे इंसान तरस खाते हैं? क्यूँ इन्हें देख के एहसास-ए-तही-दस्ती है अक्सर औक़ात मैं कतरा के निकल जाता हूँ? यही रस्ता मिरी मंज़िल की त...

शकेब जलाली की ग़ज़लें : Shakeb Jalali Ghazal Hindi

शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है। कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं। आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे : शकेब जलाली आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी क्यूँ मुझे ...