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शकेब जलाली की ग़ज़लें : Shakeb Jalali Ghazal Hindi

शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है।
कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं।

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे : शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे
जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे
ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की
आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे
मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे
तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत
ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे
क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी
क्यूँ मुझे ढाल बनाने को ये छितनार गिरे
देख कर अपने दर-ओ-बाम लरज़ जाता हूँ
मिरे हम-साए में जब भी कोई दीवार गिरे
वक़्त की डोर ख़ुदा जाने कहाँ से टूटे
किस घड़ी सर पे ये लटकी हुई तलवार गिरे
हम से टकरा गई ख़ुद बढ़ के अँधेरे की चटान
हम सँभल कर जो बहुत चलते थे नाचार गिरे
क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है
संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे
हाथ आया नहीं कुछ रात की दलदल के सिवा
हाए किस मोड़ पे ख़्वाबों के परस्तार गिरे
वो तजल्ली की शुआएँ थीं कि जलते हुए पर
आइने टूट गए आइना-बरदार गिरे
देखते क्यूँ हो 'शकेब' इतनी बुलंदी की तरफ़
न उठाया करो सर को कि ये दस्तार गिरे

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है : शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है
मिरी तरह से अकेला दिखाई देता है
न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो
शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है
बुरा न मानिए लोगों की ऐब-जूई का
उन्हें तो दिन का भी साया दिखाई देता है
ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अब तो
वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है
वो अलविदा'अ का मंज़र वो भीगती पलकें
पस-ए-ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है
मिरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई
कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है
सिमट के रह गए आख़िर पहाड़ से क़द भी
ज़मीं से हर कोई ऊँचा दिखाई देता है
खिली है दिल में किसी के बदन की धूप 'शकेब'
हर एक फूल सुनहरा दिखाई देता है

जाती है धूप उजले परों को समेट के : शकेब जलाली

जाती है धूप उजले परों को समेट के
ज़ख़्मों को अब गिनूँगा मैं बिस्तर पे लेट के
मैं हाथ की लकीरें मिटाने पे हूँ ब-ज़िद
गो जानता हूँ नक़्श नहीं ये सलेट के
दुनिया को कुछ ख़बर नहीं क्या हादिसा हुआ
फेंका था उस ने संग गुलों में लपेट के
फ़व्वारे की तरह न उगल दे हर एक बात
कम कम वो बोलते हैं जो गहरे हैं पेट के
इक नुक़रई खनक के सिवा क्या मिला 'शकेब'
टुकड़े ये मुझ से कहते हैं टूटी प्लेट के

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख : शकेब जलाली

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख
सूरज हूँ मेरा रंग मगर दिन-ढले भी देख
काग़ज़ की कतरनों को भी कहते हैं लोग फूल
रंगों का ए'तिबार ही क्या सूँघ के भी देख
हर चंद राख हो के बिखरना है राह में
जलते हुए परों से उड़ा हूँ मुझे भी देख
दुश्मन है रात फिर भी है दिन से मिली हुई
सुब्हों के दरमियान हैं जो फ़ासले भी देख
'आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर
दीमक ने जो लिखे कभी वो तब्सिरे भी देख
तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख
उस की शिकस्त हो न कहीं तेरी भी शिकस्त
ये आइना जो टूट गया है इसे भी देख
तू ही बरहना-पा नहीं इस जलती रेत पर
तलवों में जो हवा के हैं वो आबले भी देख
बिछती थीं जिस की राह में फूलों की चादरें
अब उस की ख़ाक घास के पैरों-तले भी देख
क्या शाख़-ए-बा-समर है जो तकता है फ़र्श को
नज़रें उठा 'शकेब' कभी सामने भी देख

कोई इस दिल का हाल क्या जाने : शकेब जलाली

कोई इस दिल का हाल क्या जाने
एक ख़्वाहिश हज़ार तह-ख़ाने
मौत ने आज ख़ुद-कुशी कर ली
ज़ीस्त पर क्या बनी ख़ुदा जाने
फिर हुआ कोई बद-गुमाँ हम से
फिर जनम ले रहे हैं अफ़्साने
वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर
आज के दोस्त कल के बेगाने
दूर से एक चीख़ उभरी थी
बन गए बे-शुमार अफ़्साने
ज़ीस्त के शोर-ओ-शर में डूब गए
वक़्त को नापने के पैमाने
कितना मुश्किल है मंज़िलों का हुसूल
कितने आसाँ हैं जाल फैलाने
राज़ ये है कि कोई राज़ नहीं
लोग फिर भी मुझे न पहचाने

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर : शकेब जलाली

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर
बेहतर है ख़ाक डालिए ऐसी उड़ान पर
आ कर गिरा था कोई परिंदा लहू में तर
तस्वीर अपनी छोड़ गया है चटान पर
पूछो समुंदरों से कभी ख़ाक का पता
देखो हवा का नक़्श कभी बादबान पर
यारो मैं इस नज़र की बुलंदी को क्या करूँ
साया भी अपना देखता हूँ आसमान पर
कितने ही ज़ख़्म हैं मिरे इक ज़ख़्म में छुपे
कितने ही तीर आने लगे इक निशान पर
जल-थल हुई तमाम ज़मीं आस-पास की
पानी की बूँद भी न गिरी साएबान पर
मल्बूस ख़ुश-नुमा हैं मगर जिस्म खोखले
छिलके सजे हों जैसे फलों की दुकान पर
साया नहीं था नींद का आँखों में दूर तक
बिखरे थे रौशनी के नगीं आसमान पर
हक़ बात आ के रुक सी गई थी कभी 'शकेब'
छाले पड़े हुए हैं अभी तक ज़बान पर

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका : शकेब जलाली

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
रह तो गई फ़रेब-ए-मसीहा की आबरू
हर चंद ग़म के मारों का चारा न हो सका
ख़ुश हूँ कि बात शोरिश-ए-तूफ़ाँ की रह गई
अच्छा हुआ नसीब किनारा न हो सका
बे-चारगी पे चारागरी की हैं तोहमतें
अच्छा किसी से इश्क़ का मारा न हो सका
कुछ इश्क़ ऐसी बख़्श गया बे-नियाज़ियाँ
दिल को किसी का लुत्फ़ गवारा न हो सका
फ़र्त-ए-ख़ुशी में आँख से आँसू निकल पड़े
जब उन का इल्तिफ़ात गवारा न हो सका
उल्टी तो थी नक़ाब किसी ने मगर 'शकेब'
दा'वों के बावजूद नज़ारा न हो सका

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया : शकेब जलाली

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया
दरिया से कोई शख़्स तो प्यासा पलट गया
लगता था बे-कराँ मुझे सहरा में आसमाँ
पहुँचा जो बस्तियों में तो ख़ानों में बट गया
या इतना सख़्त-जान कि तलवार बे-असर
या इतना नर्म-दिल कि रग-ए-गुल से कट गया
बाँहों में आ सका न हवेली का इक सुतून
पुतली में मेरी आँख की सहरा सिमट गया
अब कौन जाए कू-ए-मलामत को छोड़ कर
क़दमों से आ के अपना ही साया लिपट गया
गुम्बद का क्या क़ुसूर उसे क्यूँ कहो बुरा
आया जिधर से तैर उधर ही पलट गया
रखता है ख़ुद से कौन हरीफ़ाना कश्मकश
मैं था कि रात अपने मुक़ाबिल ही डट गया
जिस की अमाँ में हूँ वही उकता गया न हो
बूँदें ये क्यूँ बरसती हैं बादल तो छट गया
वो लम्हा-ए-शुऊर जिसे जांकनी कहें
चेहरे से ज़िंदगी के नक़ाबें उलट गया
ठोकर से मेरा पाँव तो ज़ख़्मी हुआ ज़रूर
रस्ते में जो खड़ा था वो कोहसार हट गया
इक हश्र सा बपा था मिरे दिल में ऐ 'शकेब'
खोलीं जो खिड़कियाँ तो ज़रा शोर घट गया

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में : शकेब जलाली

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में
मुरझा के आ गिरा हूँ मगर सर्द घास में
सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह
देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
सहरा की बूद-ओ-बाश है अच्छी न क्यूँ लगे
सूखी हुई गुलाब की टहनी गिलास में
चमके नहीं नज़र में अभी नक़्श दूर के
मसरूफ़ हूँ अभी अमल-ए-इनइकास में
धोके से उस हसीं को अगर चूम भी लिया
पाओगे दिल का ज़हर लबों की मिठास में
तारा कोई रिदा-ए-शब-ए-अब्र में न था
बैठा था मैं उदास बयाबान-ए-यास में
जू-ए-रवान-ए-दश्त अभी सूखना नहीं
सावन है दूर और वही शिद्दत है प्यास में
रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ
पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में
काँटों की बाड़ फाँद गया था मगर 'शकेब'
रस्ता न मिल सका मुझे फूलों की बास में

आग के दरमियान से निकला : शकेब जलाली

आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
फिर हवा से सुलग उठे पत्ते
फिर धुआँ गुल्सितान से निकला
जब भी निकला सितारा-ए-उम्मीद
कोहर के दरमियान से निकला
चाँदनी झाँकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला
एक शो'ला फिर इक धुएँ की लकीर
और क्या ख़ाक-दान से निकला
चाँद जिस आसमान में डूबा
कब उसी आसमान से निकला
ये गुहर जिस को आफ़्ताब कहें
किस अँधेरे की कान से निकला
शुक्र है उस ने बेवफ़ाई की
मैं कड़े इम्तिहान से निकला
लोग दुश्मन हुए उसी के 'शकेब'
काम जिस मेहरबान से निकला

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर : शकेब जलाली

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर
दोस्तो पानी कभी रुकता नहीं ढलवान पर
आज तक उस के तआ'क़ुब में बगूले हैं रवाँ
अब्र का टुकड़ा कभी बरसा था रेगिस्तान पर
मैं जो पर्बत पर चढ़ा वो और ऊँचा हो गया
आसमाँ झुकता नज़र आया मुझे मैदान पर
कमरे ख़ाली हो गए सायों से आँगन भर गया
डूबते सूरज की किरनें जब पड़ीं दालान पर
अब यहाँ कोई नहीं है किस से बातें कीजिए
ये मगर चुप-चाप सी तस्वीर आतिश-दान पर
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
बस चले तो अपनी उर्यानी को उस से ढाँप लूँ
नीली चादर सी तनी है जो खुले मैदान पर
वो ख़मोशी उँगलियाँ चटख़ा रही थी ऐ 'शकेब'
या कि बूँदें बज रही थीं रात रौशन-दान पर

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा : शकेब जलाली

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा
मेरा साया है जो दीवार पे जम जाएगा
ठहरो ठहरो मिरे असनाम-ए-ख़याली ठहरो
मेरा दिल गोशा-ए-तन्हाई में घबराएगा
लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को
ज़ख़्म गहरा ही सही ज़ख़्म है भर जाएगा
अज़्म पुख़्ता ही सही तर्क-ए-वफ़ा का लेकिन
मुंतज़िर हूँ कोई आ कर मुझे समझाएगा
आँख झपके न कहीं राह अँधेरी ही सही
आगे चल कर वो किसी मोड़ पे मिल जाएगा
दिल सा अनमोल रतन कौन ख़रीदेगा 'शकेब'
जब बिकेगा तो ये बे-दाम ही बिक जाएगा

मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो : शकेब जलाली

मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो
उदास चाँद सितारो कोई तो बात करो
कहाँ है डूब चुका अब तो डूबने वाला
शिकस्ता-दिल से किनारो कोई तो बात करो
मिरे नसीब को बर्बादियों से निस्बत है
लुटी हुई सी बहारो कोई तो बात करो
कहाँ गया वो तुम्हारा बुलंदियों का जुनून
बुझे बुझे से शरारो कोई तो बात करो
इसी तरह से अजब क्या जो कुछ सुकून मिले
ग़म-ए-फ़िराक़ के मारो कोई तो बात करो
तुम्हारा ग़म भी मिटाती हैं मस्तियाँ कि नहीं
शराब-ए-नाब के मारो कोई तो बात करो
तुम्हारी ख़ाक उड़ाता नहीं 'शकेब' तो क्या
उदास राह-गुज़ारो कोई तो बात करो

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को : शकेब जलाली

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को
भूला हुआ था देर से मैं अपने-आप को
रहते हैं कुछ मलूल से चेहरे पड़ोस में
इतना न तेज़ कीजिए ढोलक की थाप को
अश्कों की एक नहर थी जो ख़ुश्क हो गई
क्यूँकर मिटाऊँ दिल से तिरे ग़म की छाप को
कितना ही बे-कनार समुंदर हो फिर भी दोस्त
रहता है बे-क़रार नदी के मिलाप को
पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
तारीफ़ क्या हो क़ामत-ए-दिलदार की 'शकेब'
तज्सीम कर दिया है किसी ने अलाप को

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए : शकेब जलाली

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए
ये सन्नाटा अगर हद से बढ़े कोहराम हो जाए
सितारे मिशअलें ले कर मुझे भी ढूँडने निकलें
मैं रस्ता भूल जाऊँ जंगलों में शाम हो जाए
मैं वो आदम-गज़ीदा हूँ जो तन्हाई के सहरा में
ख़ुद अपनी चाप सुन कर लर्ज़ा-बर-अंदाम हो जाए
मिसाल ऐसी है इस दौर-ए-ख़िरद के होश-मंदों की
न हो दामन में ज़र्रा और सहरा नाम हो जाए
'शकेब' अपने तआ'रुफ़ के लिए ये बात काफ़ी है
हम उस से बच के चलते हैं जो रस्ता आम हो जाए

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत : शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत
मैं उस गली में अकेला था और साए बहुत
किसी के सर पे कभी टूट कर गिरा ही नहीं
इस आसमाँ ने हवा में क़दम जमाए बहुत
न जाने रुत का तसर्रुफ़ था या नज़र का फ़रेब
कली वही थी मगर रंग झिलमिलाए बहुत
हवा का रुख़ ही अचानक बदल गया वर्ना
महक के क़ाफ़िले सहरा की सम्त आए बहुत
ये काएनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्रा
मैं अपने दश्त से गुज़रा तो भेद पाए बहुत
जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत
बस एक रात ठहरना है क्या गिला कीजे
मुसाफ़िरों को ग़नीमत है ये सराए बहुत
जमी रहेगी निगाहों पे तीरगी दिन भर
कि रात ख़्वाब में तारे उतर के आए बहुत
'शकेब' कैसी उड़ान अब वो पर ही टूट गए
कि ज़ेर-ए-दाम जब आए थे फड़फड़ाए बहुत

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं : शकेब जलाली

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं
हम गुलिस्ताँ में कब समाए हैं
आप नग़्मों के मुंतज़िर होंगे
हम तो फ़रियाद ले के आए हैं
एक अपना दिया जलाने को
तुम ने लाखों दिए बुझाए हैं
क्या नज़र आएगा अभी हम को
यक-ब-यक रौशनी में आए हैं
यूँ तो सारा चमन हमारा है
फूल जितने भी हैं पराए हैं

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं : शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं
जो किनारों में सिमट जाए वो दरिया ही नहीं
ओस की बूंदों में बिखरा हुआ मंज़र जैसे
सब का इस दौर में ये हाल है मेरा ही नहीं
बर्क़ क्यूँ उन को जलाने पे कमर-बस्ता है
मैं तो छाँव में किसी पेड़ की बैठा ही नहीं
इक किरन थाम के मैं धूप-नगर तक पहुँचा
कौन सा अर्श है जिस का कोई ज़ीना ही नहीं
कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद
आइना ग़ौर से तू ने कभी देखा ही नहीं
बोझ लम्हों का हर इक सर पे उठाए गुज़रा
कोई इस शहर में सुस्ताने को ठहरा ही नहीं
साया क्यूँ जल के हुआ ख़ाक तुझे क्या मा'लूम
तू कभी आग के दरियाओं में उतरा ही नहीं
मोती क्या क्या न परे हैं तह-ए-दरिया लेकिन
बर्फ़ लहरों की कोई तोड़ने वाला ही नहीं
इस के पर्दों पे मुनक़्क़श तिरी आवाज़ भी है
ख़ाना-ए-दिल में फ़क़त तेरा सरापा ही नहीं
हाइल-ए-राह थे कितने ही हवा के पर्बत
तो वो बादल कि मिरे शहर से गुज़रा ही नहीं
याद के दाएरे क्यूँ फैलते जाते हैं 'शकेब'
उस ने तालाब में कंकर अभी फेंका ही नहीं

कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई : शकेब जलाली

कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई
गुमाँ गुज़रता है ये शख़्स दूसरा है कोई
हवा ने तोड़ के पत्ता ज़मीं पे फेंका है
कि शब की झील में पत्थर गिरा दिया है कोई
बटा सके हैं पड़ोसी किसी का दर्द कभी
यही बहुत है कि चेहरे से आश्ना है कोई
दरख़्त-ए-राह बताएँ हिला हिला कर हाथ
कि क़ाफ़िले से मुसाफ़िर बिछड़ गया है कोई
छुड़ा के हाथ बहुत दूर बह गया है चाँद
किसी के साथ समुंदर में डूबता है कोई
ये आसमान से टूटा हुआ सितारा है
कि दश्त-ए-शब में भटकती हुई सदा है कोई
मकान और नहीं है बदल गया है मकीं
उफ़ुक़ वही है मगर चाँद दूसरा है कोई
फ़सील-ए-जिस्म पे ताज़ा लहू के छींटे हैं
हुदूद-ए-वक़्त से आगे निकल गया है कोई
'शकेब' दीप से लहरा रहे हैं पलकों पर
दयार-ए-चश्म में क्या आज रत-जगा है कोई

क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त : शकेब जलाली

क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त
भटकी हुई इस भीड़ में सब सोच रहे हैं
भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे
हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं
टूटे हुए पत्तों से दरख़्तों का त'अल्लुक़
हम दूर खड़े कुंज-ए-तरब सोच रहे हैं
बुझती हुई शम्ओं' का धुआँ है सर-ए-महफ़िल
क्या रंग जमे आख़िर-ए-शब सोच रहे हैं
इस लहर के पीछे भी रवाँ हैं नई लहरें
पहले नहीं सोचा था जो अब सोच रहे हैं
हम उभरे भी डूबे भी सियाही के भँवर में
हम सोए नहीं शब-हमा-शब सोच रहे हैं

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया : शकेब जलाली

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया
पैरों में ज़ंजीरें डालीं हाथों में कश्कोल दिया
इतना गहरा रंग कहाँ था रात के मैले आँचल का
ये किस ने रो रो के गगन में अपना काजल घोल दिया
ये क्या कम है उस ने बख़्शा एक महकता दर्द मुझे
वो भी हैं जिन को रंगों का इक चमकीला ख़ोल दिया
मुझ सा बे-माया अपनों की और तो ख़ातिर क्या करता
जब भी सितम का पैकाँ आया मैं ने सीना खोल दिया
बीते लम्हे ध्यान में आ कर मुझ से सवाली होते हैं
तू ने किस बंजर मिट्टी में मन का अमृत डोल दिया
अश्कों की उजली कलियाँ हों या सपनों के कुंदन फूल
उल्फ़त की मीज़ान में मैं ने जो था सब कुछ तोल दिया

नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है : शकेब जलाली

नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है
घटा में चाँद आया जा रहा है
ज़माने की निगाहों में समो कर
मुझे दिल से भुलाया जा रहा है
कहाँ का जाम जब याँ ज़ौक़-ए-मस्ती
निगाहों से पिलाया जा रहा है
अभी अरमान कुछ बाक़ी हैं दिल में
मुझे फिर आज़माया जा रहा है
पिला कर फिर शराब-ए-हुस्न-ओ-जल्वा
मुझे बे-ख़ुद बनाया जा रहा है
सलामत आप का जौर-ए-मुसलसल
मिरे दिल को दुखाया जा रहा है
'शकेब' अब वो तसव्वुर में न आएँ
कलेजा मुँह को आया जा रहा है

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है : शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है
कोई मौसम हो मिरा ज़ख़्म हरा रहता है
शब को होगा उफ़ुक़-ए-जाँ से तिरा हुस्न तुलूअ'
ये वो ख़ुर्शीद है जो दिन को छुपा रहता है
यही दीवार-ए-जुदाई है ज़माने वालो
हर घड़ी कोई मुक़ाबिल में खड़ा रहता है
कितना चुप-चाप ही गुज़रे कोई मेरे दिल से
मुद्दतों सब्त निशान-ए-कफ़-ए-पा रहता है
सारे दर बंद हुए शहर में दीवाने पर
एक ख़्वाबों का दरीचा ही खुला रहता है

दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ : शकेब जलाली

दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ
आओ काग़ज़ की नाव तैराएँ
हम अगर रह-रवी का अज़्म करें
मंज़िलें खिंच के ख़ुद चली आएँ
हम को आमादा-ए-सफ़र न करो
रास्ते पुर-ख़तर न हो जाएँ
हम-सफ़र रह गए बहुत पीछे
आओ कुछ देर को ठहर जाएँ
मुतरिबा ऐसा गीत छेड़ कि हम
ज़िंदगी के क़रीब हो जाएँ
इन बहारों की आबरू रख लो
मुस्कुराओ कि फूल खिल जाएँ
गेसू-ए-ज़ीस्त के ये उलझाओ
आओ मिल कर 'शकेब' सुलझाएँ

आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी : शकेब जलाली

आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी
पस्ती से हम-कनार मिले कोहसार भी
आख़िर को थक के बैठ गई इक मक़ाम पर
कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी
दिल क्यूँ धड़कने लगता है उभरे जो कोई चाप
अब तो नहीं किसी का मुझे इंतिज़ार भी
जब भी सुकूत-ए-शाम में आया तिरा ख़याल
कुछ देर को ठहर सा गया आबशार भी
कुछ हो गया है धूप से ख़ाकिस्तरी बदन
कुछ जम गया है राह का मुझ पर ग़ुबार भी
इस फ़ासलों के दश्त में रहबर वही बने
जिस की निगाह देख ले सदियों के पार भी
ऐ दोस्त पहले क़ुर्ब का नश्शा अजीब था
मैं सुन सका न अपने बदन की पुकार भी
रस्ता भी वापसी का कहीं बन में खो गया
ओझल हुई निगाह से हिरनों की डार भी
क्यूँ रो रहे हो राह के अंधे चराग़ को
क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी
कुछ अक़्ल भी है बाइस-ए-तौक़ीर ऐ 'शकेब'
कुछ आ गए हैं बालों में चाँदी के तार भी

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ : शकेब जलाली

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
रहता है अपने नूर में सूरज छुपा हुआ
ऐ रौशनी की लहर कभी तो पलट के आ
तुझ को बुला रहा है दरीचा खुला हुआ
सैराब किस तरह हो ज़मीं दूर दूर की
साहिल ने है नदी को मुक़य्यद किया हुआ
ऐ दोस्त चश्म-ए-शौक़ ने देखा है बार-हा
बिजली से तेरा नाम घटा पर लिखा हुआ
पहचानते नहीं उसे महफ़िल में दोस्त भी
चेहरा हो जिस का गर्द-ए-अलम से अटा हुआ
इस दौर में ख़ुलूस का क्या काम ऐ 'शकेब'
क्यूँ कर चले बिसात पे मोहरा पिटा हुआ

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 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...