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जौन एलिया की नज़्में : Jaun Elia Ki Nazm Hindi

रम्ज़ : जौन एलिया

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

सज़ा : जौन एलिया

हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं
तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम
मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं
तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में
और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं
पस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहो
बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम
जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो
तुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़
तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा
तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो
तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई
इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात
मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो
अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिए
बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो
जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सका
ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका
जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं
जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं
फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

शायद : जौन एलिया

मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँ
शायद जान-ए-जाँ शायद
कि अब तुम मुझ को पहले से ज़ियादा याद आती हो
है दिल ग़मगीं बहुत ग़मगीं
कि अब तुम याद दिलदाराना आती हो
शमीम-ए-दूर-माँदा हो
बहुत रंजीदा हो मुझ से
मगर फिर भी
मशाम-ए-जाँ में मेरे आश्ती-मंदाना आती हो
जुदाई में बला का इल्तिफ़ात-ए-मेहरमाना है
क़यामत की ख़बर-गीरी है
बेहद नाज़-बरदारी का आलम है
तुम्हारे रंग मुझ में और गहरे होते जाते हैं
मैं डरता हूँ
मिरे एहसास के इस ख़्वाब का अंजाम क्या होगा
ये मेरे अंदरून-ए-ज़ात के ताराज-गर
जज़्बों के बैरी वक़्त की साज़िश न हो कोई
तुम्हारे इस तरह हर लम्हा याद आने से
दिल सहमा हुआ सा है
तो फिर तुम कम ही याद आओ
मता-ए-दिल मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ
बहुत कुछ बह गया है सैल-ए-माह-ओ-साल में अब तक
सभी कुछ तो न बह जाए
कि मेरे पास रह भी क्या गया है
कुछ तो रह जाए

दरख़्त-ए-ज़र्द : जौन एलिया

नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
वो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगी
तुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगे
तुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगे
तुम्हारी सुब्ह जाने किन ख़यालों से नहाती हो
तुम्हारी शाम जाने किन मलालों से निभाती हो
न जाने कौन दोशीज़ा तुम्हारी ज़िंदगी होगी
न जाने उस की क्या बायसतगी शाइस्तगी होगी
उसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगे
न जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगी
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
वो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों में
गढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों में
गुमाँ ये है तुम्हारी भी रसाई ना-रसाई हो
वो आई हो तुम्हारे पास लेकिन आ न पाई हो
वो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती हो
वो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती हो
वो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादा
उसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादा
तहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिस
गिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा
(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)
वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगी
वो नौहों के अदब का तर्ज़ तो पहचानती होगी
उसे कद होगी शायद उन सभी से जो लपाड़ी हों
न होंगे ख़्वाब उस का जो गवय्ये और खिलाड़ी हों
हदफ़ होंगे तुम्हारा कौन तुम किस के हदफ़ होगे
न जाने वक़्त की पैकार में तुम किस तरफ़ होगे
है रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा है
हमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना है
सो हम भी इस नफ़स तक हैं सिपाही एक लश्कर के
हज़ारों साल से जीते चले आए हैं मर मर के
शुहूद इक फ़न है और मेरी अदावत बे-फ़नों से है
मिरी पैकार अज़ल से
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
सो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल का
सिधारत भी था शर्मिंदा कि दो-आबे का बासी था
तुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली है
वो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
ये कड़वाहट की बातें हैं मिठास इन की न पूछो तुम
नम-ए-लब को तरसती हैं सो प्यास इन की न पूछो तुम
ये इक दो जुरओं की इक चुह्ल है और चुह्ल में क्या है
अवामुन्नास से पूछो भला अल-कुह्ल में क्या है
ये तअन-ओ-तंज़ की हर्ज़ा-सराई हो नहीं सकती
कि मेरी जान मेरे दिल से रिश्ता खो नहीं सकती
नशा चढ़ने लगा है और चढ़ना चाहिए भी था
अबस का निर्ख़ तो इस वक़्त बढ़ना चाहिए भी था
अजब बे-माजरा बे-तौर बेज़ाराना हालत है
वजूद इक वहम है और वहम ही शायद हक़ीक़त है
ग़रज़ जो हाल था वो नफ़्स के बाज़ार ही का था
है ''ज़'' बाज़ार में तो दरमियाँ 'ज़रयून' में अव्वल
तो ये इब्राफ़नीक़ी खेलते हर्फ़ों से थे हर पल
तो ये 'ज़रयून' जो है क्या ये अफ़लातून है कोई
अमाँ 'ज़रयून' है 'ज़रयून' वो माजून क्यूँ होता
हैं माजूनें मुफ़ीद ''अर्वाह'' को माजून यूँ होता
सुनो तफ़रीक़ कैसे हो भला अश्ख़ास ओ अश्या में
बहुत जंजाल हैं पर हो यहाँ तो ''या'' में और ''या'' में
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहना
है शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहना
मगर मेरे ग़रीब अज्दाद ने भी कुछ किया होगा
बहुत टुच्चा सही उन का भी कोई माजरा होगा
ये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकी
हमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगा
है आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
क़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरा
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
मिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल है
मिरे घर का वही सरनाम-तर है जो भी बिस्मिल है
गुज़श्त-ए-वक़्त से पैमान है अपना अजब सा कुछ
सो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ
'हसन' नामी हमारे घर में इक 'सुक़रात' गुज़रा है
वो अपनी नफ़्इ से इसबात तक माशर के पहुँचा है
कि ख़ून-ए-रायगाँ के अम्र में पड़ना नहीं हम को
वो सूद-ए-हाल से यकसर ज़ियाँ-काराना गुज़रा है
तलब थी ख़ून की क़य की उसे और बे-निहायत थी
सो फ़ौरन बिन्त-ए-अशअश का पिलाया पी गया होगा
वो इक लम्हे के अंदर सरमदिय्यत जी गया होगा
तुम्हारी अर्जुमंद अम्मी को मैं भूला बहुत दिन में
मैं उन की रंग की तस्कीन से निमटा बहुत दिन में
वही तो हैं जिन्हों ने मुझ को पैहम रंग थुकवाया
वो किस रग का लहू है जो मियाँ मैं ने नहीं थूका
लहू और थूकना उस का है कारोबार भी मेरा
यही है साख भी मेरी यही मेआर भी मेरा
मैं वो हूँ जिस ने अपने ख़ून से मौसम खिलाए हैं
न-जाने वक़्त के कितने ही आलम आज़माए हैं
मैं इक तारीख़ हूँ और मेरी जाने कितनी फ़सलें हैं
मिरी कितनी ही फ़रएँ हैं मिरी कितनी ही असलें हैं
हवादिस माजरा ही हम रहे हैं इक ज़माने से
शदायद सानेहा ही हम रहे हैं इक ज़माने से
हमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैं
हमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदा
ये चर्ख़-ए-जब्र के दव्वार-ए-मुमकिन की है गिरवीदा
लड़ाई के लिए मैदान और लश्कर नहीं लाज़िम
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
कि नफ़्इ-ए-ऐन-ए-ऐन ओ सर-ब-सर ज़िद्दीन हैं दोनों
Luis-Urbina ने मेरी अजब कुछ ग़म-गुसारी की
ब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी की
बहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ को
पलक तक उस ने मरने के लिए जीने न दी मुझ को
''मैं तेरे इश्क़ में रंजीदा हूँ हाँ अब भी कुछ कुछ हूँ
मुझे तेरी ख़यानत ने ग़ज़ब मजरूह कर डाला
मगर तैश-ए-शदीदाना के ब'अद आख़िर ज़माने में
रज़ा की जाविदाना जब्र की नौबत भी आ पहुँची''
मोहब्बत एक पसपाई है पुर-अहवाल हालत की
मोहब्बत अपनी यक-तौरी में दुश्मन है मोहब्बत की
सुख़न माल-ए-मोहब्बत की दुकान-आराई करता है
सुख़न सौ तरह से इक रम्ज़ की रुस्वाई करता है
सुख़न बकवास है बकवास जो ठहरा है फ़न मेरा
वो है ताबीर का अफ़्लास जो ठहरा है फ़न मेरा
सुख़न यानी लबों का फ़न सुख़न-वर यानी इक पुर-फ़न
सुख़न-वर ईज़द अच्छा था कि आदम या फिर अहरीमन
मज़ीद आंकि सुख़न में वक़्त है वक़्त अब से अब यानी
कुछ ऐसा है ये मैं जो हूँ ये मैं अपने सिवा हूँ ''मैं''
सो अपने आप में शायद नहीं वाक़े हुआ हूँ मैं
जो होने में हो वो हर लम्हा अपना ग़ैर होता है
कि होने को तो होने से अजब कुछ बैर होता है
यूँही बस यूँही 'ज़ेनू' ने यकायक ख़ुद-कुशी कर ली
अजब हिस्स-ए-ज़राफ़त के थे मालिक ये रवाक़ी भी
बिदह यारा अज़ाँ बादा कि दहक़ाँ पर्वर्द आँ-रा
ब सोज़द हर मता-ए-इनतिमाए दूदमानां रा
ब-सोज़द ईं ज़मीन-ए-ए'तिबार-ओ-आस्मानां रा
ब-सोज़द जान ओ दिल राहम बयासायद दिल ओ जाँ रा
दिल ओ जाँ और आसाइश ये इक कौनी तमस्ख़ुर है
हुमुक़ की अबक़रिय्यत है सफ़ाहत का तफ़क्कुर है
हुमुक़ की अबक़रिय्यत और सफ़ाहत के तफ़क्कुर ने
हमें तज़ई-ए-मोहलत के लिए अकवान बख़्शे हैं
और अफ़लातून-ए-अक़्दस ने हमें अ'यान बख़्शे हैं
सुनो 'ज़रयून' तुम तो ऐन-ए-अ'यान-ए-हक़ीक़त हो
नज़र से दूर मंज़र का सर-ओ-सामान-ए-सर्वत हो
हमारी उम्र का क़िस्सा हिसाब अंदोज़-ए-आनी है
ज़मानी ज़द में ज़न की इक गुमान-ए-लाज़िमानी है
गुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी है
कहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैं
कहानी कहने वाला इक कहानी की कहानी है
पिया पे ये गदाज़िश ये गुमाँ और ये गिले कैसे
सिला-सोज़ी तो मेरा फ़न है फिर इस के सिले कैसे
तो मैं क्या कह रहा था यानी क्या कुछ सह रहा था मैं
अमाँ हाँ मेज़ पर या मेज़ पर से बह रहा था मैं
रुको मैं बे-सर-ओ-पा अपने सर से भाग निकला हूँ
इला या अय्युहल-अबजद ज़रा यानी ज़रा ठहरो
There is an absurd I इन absurdity शायद
कहीं अपने सिवा यानी कहीं अपने सिवा ठहरो
तुम इस absurdity में इक रदीफ़ इक क़ाफ़िया ठहरो
रदीफ़ ओ क़ाफ़िया क्या हैं शिकस्त-ए-ना-रवा क्या है
शिकस्त-ए-नारवा ने मुझ को पारा पारा कर डाला
अना को मेरी बे-अंदाज़ा-तर बे-चारा कर डाला
मैं अपने आप में हारा हूँ और ख़्वाराना हारा हूँ
जिगर-चाकाना हारा हूँ दिल-अफ़गाराना हारा हूँ
जिसे फ़न कहते आए हैं वो है ख़ून-ए-जिगर अपना
मगर ख़ून-ए-जिगर क्या है वो है क़त्ताल-तर अपना
कोई ख़ून-ए-जिगर का फ़न ज़रा ताबीर में लाए
मगर मैं तो कहूँ वो पहले मेरे सामने आए
वजूद ओ शेर ये दोनों define हो नहीं सकते
कभी मफ़्हूम में हरगिज़ ये काइन हो नहीं सकते
हिसाब-ए-हर्फ़ में आता रहा है बस हसब उन का
नहीं मालूम ईज़द ईज़दाँ को भी नसब उन का
है ईज़द ईज़दाँ इक रम्ज़ जो बे-रम्ज़ निस्बत है
मियाँ इक हाल है इक हाल जो बे-हाल-ए-हालत है
न जाने जब्र है हालत कि हालत जब्र है यानी
किसी भी बात के मअनी जो हैं उन के हैं क्या मअनी
वजूद इक जब्र है मेरा अदम औक़ात है मेरी
जो मेरी ज़ात हरगिज़ भी नहीं वो ज़ात है मेरी
मैं रोज़-ओ-शब निगारिश-कोश ख़ुद अपने अदम का हूँ
मैं अपना आदमी हरगिज़ नहीं लौह-ओ-क़लम का हूँ
हैं कड़वाहट में ये भीगे हुए लम्हे अजब से कुछ
सरासर बे-हिसाबाना सरासर बे-सबब से कुछ
सराबों ने सराबों पर बहुत बादल हैं बरसाए
शराबों ने मआबद के तमूज़ ओ बअल नहलाए
(यक़ीनन क़ाफ़िया है यावा-फ़रमाई का सर-चश्मा
''हैं नहलाए'' ''हैं बरसाए'')
न जाने आरिबा क्यूँ आए क्यूँ मुस्तारबा आए
मुज़िर के लोग तो छाने ही वाले थे सो वो छाए
मिरे जद हाशिम-ए-आली गए ग़़ज़्ज़ा में दफ़नाए
मैं नाक़े को पिलाऊँगा मुझे वाँ तक वो ले जाए
लिदू लिलमौती वबनू लिलहिज़ाबी सन ख़राबाती
वो मर्द-ए-ऊस कहता है हक़ीक़त है ख़ुराफ़ाती
ये ज़ालिम तीसरा पैग इक अक़ानीमी बिदायत है
उलूही हर्ज़ा-फ़रमाई का सिर्र-ए-तूर-ए-लुक्नत है
भला हूरब की झाड़ी का वो रम्ज़-ए-आतिशीं क्या था
मगर हूरब की झाड़ी क्या ये किस से किस की निस्बत है
ये निस्बत के बहुत से क़ाफ़िए हैं है गिला इस का
मगर तुझ को तो यारा! क़ाफ़ियों की बे-तरह लत है
गुमाँ ये है कि शायद बहर से ख़ारिज नहीं हूँ मैं
ज़रा भी हाल के आहंग में हारिज नहीं हूँ
तना-तन तन तना-तन तन तना-तन तन तना-तन तन
तना-तन तन नहीं मेहनत-कशों का तन न पैराहन
न पैराहन न पूरी आधी रोटी अब रहा सालन
ये साले कुछ भी खाने को न पाएँ गालियाँ खाएँ
है इन की बे-हिसी में तो मुक़द्दस-तर हरामी-पन
मगर आहंग मेरा खो गया शायद कहाँ जाने
कोई मौज-ए-... कोई मौज-ए-शुमाल-ए-जावेदाँ जाने
शुमाल-ए-जावेदाँ के अपने ही क़िस्से थे जो गुज़रे
वो हो गुज़रे तो फिर ख़ुद मैं ने भी जाना वो हो गुज़रे
शुमाल-ए-जावेदाँ अपना शुमाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
है अब भी अपनी पूँजी इक मलाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
यही है दिल का मज़मून अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
हमारे दरमियाँ अब एक बेजा-तर ज़माना है
लब-ए-तिश्ना पे इक ज़हर-ए-हक़ीक़त का फ़साना है
अजब फ़ुर्सत मयस्सर आई है ''दिल जान रिश्ते'' को
न दिल को आज़माना है न जाँ को आज़माना है
कलीद-ए-किश्त-ज़ार-ए-ख़्वाब भी गुम हो गई आख़िर
कहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना है
कहूँ तो क्या कहूँ मेरा ये ज़ख़्म-ए-जावेदाना है
वही दिल की हक़ीक़त जो कभी जाँ थी वो अब आख़िर
फ़साना दर फ़साना दर फ़साना दर फ़साना है
हमारा बाहमी रिश्ता जो हासिल-तर था रिश्तों का
हमारा तौर-ए-बे-ज़ारी भी कितना वालिहाना है
किसी का नाम लिक्खा है मिरी सारी बयाज़ों पर
मैं हिम्मत कर रहा हूँ यानी अब उस को मिटाना है
ये इक शाम-ए-अज़ाब-ए-बे-सरोकाराना हालत है
हुए जाने की हालत में हूँ बस फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है
नहीं मालूम तुम इस वक़्त किस मालूम में होगे
न जाने कौन से मअनी में किस मफ़्हूम में होगे
मैं था मफ़्हूम ना-मफ़्हूम में गुम हो चुका हूँ मैं
मैं था मालूम ना-मालूम में गुम हो चुका हूँ मैं
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
मिरे ख़ुद से गुज़रने के ज़माने से सिवा होगी
मिरे क़ामत से अब क़ामत तुम्हारा कुछ फ़ुज़ूँ होगा
मिरा फ़र्दा मिरे दीरोज़ से भी ख़ुश नुमूं होगा
हिसाब-ए-माह-ओ-साल अब तक कभी रक्खा नहीं मैं ने
किसी भी फ़स्ल का अब तक मज़ा चक्खा नहीं मैं ने
मैं अपने आप में कब रह सका कब रह सका आख़िर
कभी इक पल को भी अपने लिए सोचा नहीं मैं ने
हिसाब-ए-माह-ओ-साल ओ रोज़-ओ-शब वो सोख़्ता-बूदश
मुसलसल जाँ-कनी के हाल में रखता भी तो कैसे
जिसे ये भी न हो मालूम वो है भी तो क्यूँ-कर है
कोई हालत दिल-ए-पामाल में रखता भी तो कैसे
कोई निस्बत भी अब तो ज़ात से बाहर नहीं मेरी
कोई बिस्तर नहीं मेरा कोई चादर नहीं मेरी
ब-हाल-ए-ना-शिता सद-ज़ख़्म-हा ओ ख़ून-हा ख़ूर्दम
ब-हर-दम शूकराँ आमेख़्ता माजून-हा ख़ूर्दम
तुम्हें इस बात से मतलब ही क्या और आख़िरश क्यूँ हो
किसी से भी नहीं मुझ को गिला और आख़िरश क्यूँ हो
जो है इक नंग-ए-हस्ती उस को तुम क्या जान भी लोगे
अगर तुम देख लो मुझ को तो क्या पहचान भी लोगे
तुम्हें मुझ से जो नफ़रत है वही तो मेरी राहत है
मिरी जो भी अज़िय्यत है वही तो मेरी लज़्ज़त है
कि आख़िर इस जहाँ का एक निज़ाम-ए-कार है आख़िर
जज़ा का और सज़ा का कोई तो हंजार है आख़िर
मैं ख़ुद में झेंकता हूँ और सीने में भड़कता हूँ
मिरे अंदर जो है इक शख़्स मैं उस में फड़कता हूँ
है मेरी ज़िंदगी अब रोज़-ओ-शब यक-मज्लिस-ए-ग़म-हा
अज़ा-हा मर्सिया-हा गिर्या-हा आशोब-ए-मातम-हा
तुम्हारी तर्बियत में मेरा हिस्सा कम रहा कम-तर
ज़बाँ मेरी तुम्हारे वास्ते शायद कि मुश्किल हो
ज़बाँ अपनी ज़बाँ मैं तुम को आख़िर कब सिखा पाया
अज़ाब-ए-सद-शमातत आख़िरश मुझ पर ही नाज़िल हो
ज़बाँ का काम यूँ भी बात समझाना नहीं होता
समझ में कोई भी मतलब कभी आना नहीं होता
कभी ख़ुद तक भी मतलब कोई पहुंचाना नहीं होता
गुमानों के गुमाँ की दम-ब-दम आशोब-कारी है
भला क्या ए'तिबारी और क्या ना-ए'तिबारी है
गुमाँ ये है भला में जुज़ गुमाँ क्या था गुमानों में
सुख़न ही क्या फ़सानों का धरा क्या है फ़सानों में
मिरा क्या तज़्किरा और वाक़ई क्या तज़्किरा मेरा
मैं इक अफ़्सोस था अफ़्सोस हूँ गुज़रे ज़मानों में
है शायद दिल मिरा बे-ज़ख़्म और लब पर नहीं छाले
मिरे सीने में कब सोज़िंदा-तर दाग़ों के हैं थाले
मगर दोज़ख़ पिघल जाए जो मेरे साँस अपना ले
तुम अपनी माम के बेहद मुरादी मिन्नतों वाले
मिरे कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं बाले
मगर पहले कभी तुम से मिरा कुछ सिलसिला तो था
गुमाँ में मेरे शायद इक कोई ग़ुंचा खिला तो था
वो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो था
सो उस को एक अब्बू नाम का घोड़ा मिला तो था
साया-ए-दामान-ए-रहमत चाहिए थोड़ा मुझे
मैं न छोड़ूँ या नबी तुम ने अगर छोड़ा मुझे
ईद के दिन मुस्तफ़ा से यूँ लगे कहने 'हुसैन'
सब्ज़ जोड़ा दो 'हसन' को सुर्ख़ दो जोड़ा मुझे
''अदब अदब कुत्ते तिरे कान काटूँ
'ज़रयून' के ब्याह के नान बाटूँ''
तारों भरे जगर जगर ख़्वान बाटूँ
''आ जा री निन्दिया तू आ क्यूँ न जा
'ज़रयून' को आ के सुला क्यूँ न जा''
तुम्हारे ब्याह में शजरा पढ़ा जाना था नौशा वास्ती दूल्हा
''चौकी आँगन में बिछी वास्ती दूल्हा के लिए''
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासे
शाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोते
हज़रत इमाम-'हसन' हज़रत इमाम-'हुसैन' के पोते
हज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोते
सय्यद-'जाफ़र' सानी के पोते
सय्यद अबुल-फ़रह सैदवाइल-वास्ती के पोते
मीराँ सय्यद-'अली'-बुज़ुर्ग के पोते
सय्यद-'हुसैन'-शरफ़ुद्दीन शाह-विलायत के पोते
क़ाज़ी सय्यद-'अमीर'-अली के पोते
दीवान सय्यद-'हामिद' के पोते
अल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोते
सय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
मगर नाज़िर हमारा सोख़्ता-सुल्ब आख़िरी नस्साब अब मरने ही वाला है
बस इक पल हफ़ सदी का फ़ैसला करने ही वाला है
सुनो 'ज़रयून' बस तुम ही सुनो यानी फ़क़त तुम ही
वही राहत में है जो आम से होने को अपना ले
कभी कोई भी पर हो कोई 'बहमन' यार या 'ज़ेनू'
तुम्हें बहका न पाए और बैरूनी न कर डाले
मैं सारी ज़िंदगी के दुख भुगत कर तुम से कहता हूँ
बहुत दुख देगी तुम में फ़िक्र और फ़न की नुमू मुझ को
तुम्हारे वास्ते बेहद सहूलत चाहता हूँ मैं
दवाम-ए-जहल ओ हाल-ए-इस्तिराहत चाहता हूँ मैं
न देखो काश तुम वो ख़्वाब जो देखा किया हूँ मैं
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
मिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरो
कोई 'ज़रयून' कोई भी क्लर्क और कोई कारिंदा
कोई भी बैंक का अफ़सर सेनेटर कोई पावंदा
हर इक हैवान-ए-सरकारी को टट्टू जानता हूँ मैं
सो ज़ाहिर है इसे शय से ज़ियादा मानता हूँ मैं
तुम्हें हो सुब्ह-दम तौफ़ीक़ बस अख़बार पढ़ने की
तुम्हें ऐ काश बीमारी न हो दीवार पढ़ने की
अजब है 'सार्त्र' और 'रसेल' भी अख़बार पढ़ते थे
वो मालूमात के मैदान के शौक़ीन बूढ़े थे
नहीं मालूम मुझ को आम शहरी कैसे होते हैं
वो कैसे अपना बंजर नाम बंजर-पन में बोते हैं
मैं ''उर्र'' से आज तक इक आम शहरी हो नहीं पाया
इसी बाइस मैं हूँ अम्बोह की लज़्ज़त से बे-माया
मगर तुम इक दो-पाया रास्त क़ामत हो के दिखलाना
सुनो राय-दहिंदा बिन हुए तुम बाज़ मत आना
फ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना साबिक़ा छोड़ो
फ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना लाहिक़ा छोड़ो
मगर मैं कौन जो चाहूँ तुम्हारे बाब में कुछ भी
भला क्यूँ हो मिरे एहसास के अस्बाब में कुछ भी
तुम्हारा बाप यानी मैं अबस मैं इक अबस-तर मैं
मगर मैं यानी जाने कौन अच्छा मैं सरासर मैं
मैं कासा-बाज़ ओ कीना-साज़ ओ कासा-तन हूँ कुत्ता हूँ
मैं इक नंगीन-ए-बूदश हूँ प तुम तो सिर्र-ए-मुनअम हो
तुम्हारा बाप रूहुल-क़ुद्स था तुम इब्न-ए-मरयम हो
ये क़ुलक़ुल तीसरा पैग अब तो चौथा हो गुमाँ ये है
गुमाँ का मुझ से कोई ख़ास रिश्ता हो गुमाँ ये है
गुमाँ ये है कि मैं जो जा रहा था आ रहा हूँ मैं
मगर मैं आ रहा कब हूँ पियापे जा रहा हूँ मैं
ये चौथा पैग है ऊँ-हूँ ज़लालत की गई मुझ से
ज़लालत की गई मुझ से ख़यानत की गई मुझ से
जोज़ामी हो गई 'वज़्ज़ाह' की महबूब वावैला
मगर इस का गिला क्या जब नहीं आया कोई एेला
सुनो मेरी कहानी पर मियाँ मेरी कहानी क्या
मैं यकसर राइगानी हूँ हिसाब-ए-राइगानी क्या
बहुत कुछ था कभी शायद पर अब कुछ भी नहीं हूँ मैं
न अपना हम-नफ़स हूँ मैं न अपना हम-नशीं हूँ मैं
कभी की बात है फ़रियाद मेरा वो कभी यानी
नहीं इस का कोई मतलब नहीं इस के कोई मअनी
मैं अपने शहर का सब से गिरामी नाम लड़का था
मैं बे-हंगाम लड़का था मैं सद-हंगाम लड़का था
मिरे दम से ग़ज़ब हंगामा रहता था मोहल्लों में
मैं हश्र-आग़ाज़ लड़का था मैं हश्र-अंजाम लड़का था
मिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थे
उन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थे
सुख़न बहता चला आता है बे-बाइस के होंटों से
वो कुछ कहता चला आता है बे-बाइस के होंटों से
मैं अशराफ़-ए-कमीना-कार को ठोकर पे रखता था
सो मैं मेहनत-कशों की जूतियाँ मिम्बर पे रखता था
मैं शायद अब नहीं हूँ वो मगर अब भी वही हूँ मैं
ग़ज़ब हंगामा-परवर ख़ीरा-सरा अब भी वही हूँ मैं
मगर मेरा था इक तौर और भी जो और ही कुछ था
मगर मेरा था इक दौर और भी जो और ही कुछ था
मैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिन
मिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिन
मिरा बाबा मुझे ख़ामोश आवाज़ें सुनाता था
वो अपने-आप में गुम मुझ को पुर-हाली सिखाता था
वो हैअत-दाँ वो आलिम नाफ़-ए-शब में छत पे जाता था
रसद का रिश्ता सय्यारों से रखता था निभाता था
उसे ख़्वाहिश थी शोहरत की न कोई हिर्स-ए-दौलत थी
बड़े से क़ुत्र की इक दूरबीन उस की ज़रूरत थी
मिरी माँ की तमन्नाओं का क़ातिल था वो क़ल्लामा
मिरी माँ मेरी महबूबा क़यामत की हसीना थी
सितम ये है ये कहने से झिजकता था वो फ़ह्हामा
था बेहद इश्तिआल-अंगेज़ बद-क़िस्मत ओ अल्लामा
ख़लफ़ उस के ख़ज़फ़ और बे-निहायत ना-ख़लफ़ निकले
हम उस के सारे बेटे इंतिहाई बे-शरफ़ निकले
मैं उस आलिम-तरीन-ए-दहर की फ़िक्रत का मुनकिर था
मैं फ़सताई था जाहिल था और मंतिक़ का माहिर था
पर अब मेरी ये शोहरत है कि मैं बस इक शराबी हूँ
मैं अपने दूदमान-ए-इल्म की ख़ाना-ख़राबी हूँ
सगान-ए-ख़ूक ज़ाद-ए-बर्ज़न ओ बाज़ार-ए-बे-मग़्ज़ी
मिरी जानिब अब अपने थोबड़े शाहाना करते हैं
ज़िना-ज़ादे मिरी इज़्ज़त भी गुस्ताख़ाना करते हैं
कमीने शर्म भी अब मुझ से बे-शर्माना करते थे
मुझे इस शाम है अपने लबों पर इक सुख़न लाना
'अली' दरवेश था तुम उस को अपना जद्द न बतलाना
वो सिब्तैन-ए-मोहम्मद, जिन को जाने क्यूँ बहुत अरफ़ा
तुम उन की दूर की निस्बत से भी यकसर मुकर जाना
कि इस निस्बत से ज़हर ओ ज़ख़्म को सहना ज़रूरी है
अजब ग़ैरत से ग़ल्तीदा-ब-ख़ूँ रहना ज़रूरी है
वो शजरा जो कनाना फहर ग़ालिब कअब मर्रा से
क़ुसइ ओ हाशिम ओ शेबा अबू-तालिब तक आता था
वो इक अंदोह था तारीख़ का अंदोह-ए-सोज़िंदा
वो नामों का दरख़्त-ए-ज़र्द था और उस की शाख़ों को
किसी तन्नूर के हैज़म की ख़ाकिस्तर ही बनना था
उसे शोला-ज़दा बूदश का इक बिस्तर ही बनना था
हमारा फ़ख़्र था फ़क़्र और दानिश अपनी पूँजी थी
नसब-नामों के हम ने कितने ही परचम लपेटे हैं
मिरे हम-शहर 'ज़रयून' इक फ़ुसूँ है नस्ल, हम दोनों
फ़क़त आदम के बेटे हैं फ़क़त आदम के बेटे हैं
मैं जब औसान अपने खोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
मैं तुम को याद कर के रोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़
ख़ुदा हाफ़िज़
ख़ुदा हाफ़िज़

दरीचा-हा-ए-ख़याल : जौन एलिया

चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें
और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल
जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं
बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ
याद की इक किरन भी आ न सके
चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें
और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें
जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं
जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

अजनबी शाम : जौन एलिया

धुँद छाई हुई है झीलों पर
उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर
सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़
बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़
अपने गल्लों को ले के चरवाहे
सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे
दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ
अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

नाकारा : जौन एलिया

कौन आया है
कोई नहीं आया है पागल
तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है
अच्छा यूँ है
बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने
तेज़-रवी की राहगुज़र से
मेहनत-कोश और काम के दिन की
धूल आई है धूप आई है
जाने ये किस ध्यान में था मैं
आता तो अच्छा कौन आता
किस को आना था कौन आता

वो : जौन एलिया

वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा
वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा
किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार
किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार
गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए
और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए
रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं
कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं
वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी
जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी
मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं
ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं
दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं
वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

क़ातिल : जौन एलिया

सुना है तुम ने अपने आख़िरी लम्हों में समझा था
कि तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो मेरे बाज़ुओं में हो
सुना है बुझते बुझते भी तुम्हारे सर्द ओ मुर्दा लब से
एक शो'ला शोला-ए-याक़ूत-फ़ाम ओ रंग ओ उम्मीद-ए-फ़रोग़-ए-ज़िंदगी-आहंग लपका था
हमें ख़ुद में छुपा लीजे
ये मेरा वो अज़ाब-ए-जाँ है जो मुझ को
मिरे अपने ख़ुद अपने ही जहन्नम में जलाता है
तुम्हारा सीना-ए-सीमीं
तुम्हारे बाज़ूवान-ए-मर-मरीं
मेरे लिए
मुझ इक हवसनाक-ए-फ़रोमाया की ख़ातिर
साज़ ओ सामान-ए-नशात ओ नश्शा-ए-इशरत-फ़ुज़ूनी थे
मिरे अय्याश लम्हों की फ़ुसूँ-गर पुर-जुनूनी के लिए
सद-लज़्ज़त आगीं सद-करिश्मा पुर-ज़बानी थे
तुम्हें मेरी हवस-पेशा
मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बेवफ़ाई का गुमाँ तक
इस गुमाँ का एक वहम-ए-ख़ुद गुरेज़ाँ तक नहीं था
क्यूँ नहीं था क्यूँ नहीं था क्यूँ
कोई होता कोई तो होता
जो मुझ से मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बेवफ़ाई की सज़ा में
ख़ून थुकवाता
मुझे हर लम्हे की सूली पे लटकाता
मगर फ़रियाद कोई भी नहीं कोई
दरेग़ उफ़्ताद कोई भी
मुझे मफ़रूर होना चाहिए था
और मैं सफ़्फ़ाक-क़ातिल बेवफ़ा ख़ूँ-रेज़-तर मैं
शहर में ख़ुद-वारदाती
शहर में ख़ुद-मस्त आज़ादाना फिरता हूँ
निगार-ए-ख़ाक-आसूदा
बहार-ए-ख़ाक-आसूदा

सफ़र के वक़्त : जौन एलिया

तुम्हारी याद मिरे दिल का दाग़ है लेकिन
सफ़र के वक़्त तो बे-तरह याद आती हो
बरस बरस की हो आदत का जब हिसाब तो फिर
बहुत सताती हो जानम बहुत सताती हो
मैं भूल जाऊँ मगर कैसे भूल जाऊँ भला
अज़ाब-ए-जाँ की हक़ीक़त का अपनी अफ़्साना
मिरे सफ़र के वो लम्हे तुम्हारी पुर-हाली
वो बात बात मुझे बार बार समझाना
ये पाँच कुर्ते हैं देखो ये पाँच पाजामे
डले हुए हैं क़मर-बंद इन में और देखो
ये शेव-बॉक्स है और ये है ओलड असपाइस
नहीं हुज़ूर की झोंजल का अब कोई बाइ'स
ये डाइरी है और इस में पते हैं और नंबर
इसे ख़याल से बक्से की जेब में रखना
है अर्ज़ ''हज़रत-ए-ग़ाएब-दिमाग़'' बंदी की
कि अपने ऐब की हालत को ग़ैब में रखना
ये तीन कोट हैं पतलून हैं ये टाइयाँ हैं
बंधी हुई हैं ये सब तुम को कुछ नहीं करना
ये 'वेलियम' है 'ओनटल' है और 'टरपटी-नाल'
तुम इन के साथ मिरी जाँ ड्रिंक से डरना
बहुत ज़ियादा न पीना कि कुछ न याद आए
जो लखनऊ में हुआ था वो अब दोबारा न हो
हो तुम सुख़न की अना और तमकनत जानम
मज़ाक़ का किसी 'इंशा' को तुम से यारा न हो
वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहीं
तुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखना
अजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैं
ख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखना
हो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलाम
ख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुम
तुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दिया
मुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
ये बैंक-कार मैनेजर ये अपने टेक्नोक्रेट
कोई भी शुबह नहीं हैं ये एक अबस का ढिढोल
मैं ख़ुद भी इन को क्रो-मैग्नन समझती हूँ
ये शानदार जनावर हैं दफ़्तरों का मख़ौल
मैं जानती हूँ कि तुम सुन नहीं रहे मिरी बात
समाज झूट सही फिर भी उस का पास करो
है तुम को तैश है बालिशतियों की ये दुनिया
तो फिर क़रीने से तुम उन को बे-लिबास करो
तुम एक सादा ओ बरजस्ता आदमी ठहरे
मिज़ाज-ए-वक़्त को तुम आज तक नहीं समझे
जो चीज़ सब से ज़रूरी है वो मैं भूल गई
ये पासपोर्ट है इस को सँभाल के रखना
जो ये न हो तो ख़ुदा भी बशर तक आ न सके
सो तुम शुऊ'र का अपने कमाल कर रखना
मिरी शिकस्त के ज़ख़्मों की सोज़िश-ए-जावेद
नहीं रहा मिरे ज़ख़्मों का अब हिसाब कोई
है अब जो हाल मिरा वो अजब तमाशा है
मिरा अज़ाब नहीं अब मिरा अज़ाब कोई
नहीं कोई मिरी मंज़िल पे है सफ़र दरपेश
है गर्द गर्द अबस मुझ को दर-ब-दर पेश

तआ'क़ुब : जौन एलिया

मुझ से पहले के दिन
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हें
ख़्वाब-ओ-ता'बीर के गुम-शुदा सिलसिले
बार बार अब सताने लगे हैं तुम्हें
दुख जो पहुँचे थे तुम से किसी को कभी
देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हें
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हें
अपने वो अहद-ओ-पैमाँ जो मुझ से न थे
क्या तुम्हें मुझ से अब कुछ भी कहना नहीं

बस एक अंदाज़ा : जौन एलिया

बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुए
उठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओ
मैं आया हूँ
मैं अंदाज़े से समझा हूँ
यहाँ सोई हुई हो तुम
यहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद में
बाद-हा-ए-तुंद ने
मेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!

मगर ये ज़ख़्म ये मरहम : जौन एलिया

तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकार
तुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैं
बस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस में
हम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं
न वो नशात-ए-तसव्वुर कि लो तुम आ ही गए
न ज़ख़्म-ए-दिल की है सोज़िश कोई जो सहनी हो
न कोई वा'दा-ओ-पैमाँ की शाम है न सहर
न शौक़ की है कोई दास्ताँ जो कहनी हो
नहीं जो महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू सर-ए-राह
तो अब फ़ज़ा में फ़ज़ा के सिवा कुछ और नहीं
नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयाम
तो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं
उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहम
तो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैं
तुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भी
तो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं
न कोई ज़ख़्म न मरहम कि ज़िंदगी अपनी
गुज़र रही है हर एहसास को गँवाने में
मगर ये ज़ख़्म ये मरहम भी कम नहीं शायद
कि हम हैं एक ज़मीं पर और इक ज़माने में

हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं : जौन एलिया

बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है
यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं
सारे
ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं
यहाँ पर सारे मोहरे
अपनी अपनी चाल चलते हैं
कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं
यहाँ पर शह भी पड़ती है
यहाँ पर मात होती है
कभी इक चाल टलती है
कभी बाज़ी पलटती है
यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं
मगर मैं वो पियादा हूँ
जो हर घर में
कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले
कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले
हमेशा क़त्ल हो जाता है

रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं : जौन एलिया

चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा
उन की लज़्ज़त और अज़िय्यत से मैं अपना कोई अहद नहीं तोडूँगा
तेज़ नज़र ना-बीनाओं की आबादी में
क्या मैं अपने ध्यान की ये पूँजी भी गिनवा दूँ
हाँ मेरे ख़्वाबों को तुम्हारी सुब्हों की सर्द और साया-गूँ ताबीरों से नफ़रत है
इन सुब्हों ने शाम के हाथों अब तक जितने सूरज बेचे
वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे
सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें
ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैं
जिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है
मेरे अंधेरे भी सच्चे हैं
और तुम्हारे ''रोग उजाले'' भी झूटे हैं
रातें सच्ची हैं दिन झूटे
जब तक दिन झूटे हैं जब तक
रातें सहना और अपने ख़्वाबों में रहना
ख़्वाबों को बहकाने वाले दिन के उजालों से अच्छा है
हाँ मैं बहकावों की धुँद नहीं ओढूँगा
चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो मैं फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा
अपना अहद नहीं तोडूँगा
यही तो बस मेरा सब कुछ है
माह ओ साल के ग़ारत-गर से मेरी ठनी है
मेरी जान पर आन बनी है
चाहे कुछ हो मेरे आख़िरी साँस तलक अब चाहे कुछ हो

ख़ल्वत : जौन एलिया

मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
किसी भी दिल-कुशा जज़्बे से यकसर ना-शनासाना
नशात-ए-रंग की सरशारी-ए-हालत से बेगाना
मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
फ़ुसूँ-कारा निगारा नौ-बहारा आरज़ू-आरा
भला लम्हों का मेरी और तुम्हारी ख़्वाब-परवर
आरज़ू-मंदी की सरशारी से क्या रिश्ता
हमारी बाहमी यादों की दिलदारी से क्या रिश्ता
मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
यहाँ अब तीसरा कोई नहीं या'नी मोहब्बत भी

फ़न पारा : जौन एलिया

ये किताबों की सफ़-ब-सफ़ जिल्दें
काग़ज़ों का फ़ुज़ूल इस्ती'माल
रौशनाई का शानदार इसराफ़
सीधे सीधे से कुछ सियह धब्बे
जिन की तौजीह आज तक न हुई
चंद ख़ुश-ज़ौक़ कम-नसीबों ने
बसर औक़ात के लिए शायद
ये लकीरें बिखेर डाली हैं
कितनी ही बे-क़ुसूर नस्लों ने
इन को पढ़ने के जुर्म में ता-उम्र
ले के कश्कूल-ए-इल्म-ओ-हिक्मत-ओ-फ़न
कू-ब-कू जाँ की भीक माँगी है
आह ये वक़्त का अज़ाब-ए-अलीम
वक़्त ख़ल्लाक़ बे-शुऊर क़दीम
सारी तारीफ़ें उन अँधेरों की
जिन में परतव न कोई परछाईं
आह ये ज़िंदगी की तन्हाई
सोचना और सोचते रहना
चंद मासूम पागलों की सज़ा
आज मैं ने भी सोच रक्खा है
वक़्त से इंतिक़ाम लेने को
यूँही ता-शाम सादे काग़ज़ पर
टेढ़े टेढ़े ख़ुतूत खींचे जाएँ

लौह-ए-दाइरा : जौन एलिया

मैं दाएरे पर पड़ा हुआ अपने ख़ूँ के धब्बों को चाटता हूँ
कि मेरे होने का सारा इल्ज़ाम मेरे सर है
लबों की दहलीज़ पर मिरी रूह कब से फ़रियाद कर रही है
मैं अपने सीने में जल रहा हूँ मैं अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ
ये शाह-राहों का हादसा है मगर किसी को ख़बर नहीं है
मुझे बचा लो मुझे बचा लो
हुजूम-ए-आदम जवाब दे क्या ये कोई सहरा है शहर की रहगुज़र नहीं है
मैं फिर न आऊँगा मेरी आवाज़ फिर न आएगी
मेरा इसबात फिर न टकराएगा तुम्हारी बतालतों से
मगर मिरा बाल बाल मक़रूज़ है मिरे जब्र-ए-आगही का
मैं अपनी आवाज़ का बदन हूँ
जो चुप है उस की ज़बान उस के दहन में सड़ जाएगी
मैं बोलूँगा और मिरा बोलना ही मेरा ज़ियाँ भी ठहरेगा
मेरे सीने में जो ख़राशें सुलग रही हैं
वो आख़िर-ए-कार मेरी लौह-ए-मज़ार का हाशिया बनेंगी
जवाब की बस्तियों के दरवाज़े बंद हैं और मिरा गला ख़ुश्क हो चुका है
तमाम इंसान अपनी परछाइयों को ओढ़े हुए हैं और शाम बह रही है
धुँद ने चौक के बड़े बुर्ज का मुसल्लस निगल लिया है
सुकूत का ज़महरीर सम्तों में घुल चुका है
मैं एक संगीन मुजस्समा हूँ जिसे बना कर जिसे ख़याबाँ में नस्ब कर के
मुजस्समा-साज़ और मे'मार अपना रोज़ीना पा चुके हैं
मैं एक संगीं मुजस्समा हूँ
जो धुँद की तैलिसान ओढ़े हुए हयूलों को तक रहा है
मगर समा'अत का जाल अब जल्द बुन लिया जाए
सुन लिया जाए
मेरे अतराफ़ एक तूफ़ान उठने वाला है
जो ज़मीनों को यूँ निगल लेगा जैसे ये लोग अपने लोगों का ख़ून-ए-बस्ता निगल रहे हैं
मैं अपने सीने में जल रहा हूँ अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ

फैज अहमद फैज की नज्में : Faiz Ahmad Faiz Nazm Hindi

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

रक़ीब से! : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था
जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था
आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उस की मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में
उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे बरसा है उसी बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है
तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने
तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के
अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे) : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47) : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिल
जवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों से
चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
पुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
नशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हराम
जिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गई
अभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं
अभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आई
नजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

तन्हाई : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा

बोल : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

निसार मैं तेरी गलियों के : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं
बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है
कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं
यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई
यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है न अपनी जीत नई
इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो
ख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो
हाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भी
सुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भी
उन का दम-साज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
रख़्त-ए-दिल बाँध लो दिल-फ़िगारो चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो

याद : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच
अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात

हम जो तारीक राहों में मारे गए : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम
दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए
तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम
नीम-तारीक राहों में मारे गए
सूलियों पर हमारे लबों से परे
तेरे होंटों की लाली लपकती रही
तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती बरसती रही
तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही
जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम
हम चले आए लाए जहाँ तक क़दम
लब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़म
अपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न की
देख क़ाएम रहे इस गवाही पे हम
हम जो तारीक राहों पे मारे गए
ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी
तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी
किस को शिकवा है गर शौक़ के सिलसिले
हिज्र की क़त्ल-गाहों से सब जा मिले
क़त्ल-गाहों से चुन कर हमारे अलम
और निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफ़िले
जिन की राह-ए-तलब से हमारे क़दम
मुख़्तसर कर चले दर्द के फ़ासले
कर चले जिन की ख़ातिर जहाँगीर हम
जाँ गँवा कर तिरी दिलबरी का भरम
हम जो तारीक राहों में मारे गए

ये फ़स्ल उमीदों की हमदम : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सब काट दो
बिस्मिल पौदों को
बे-आब सिसकते मत छोड़ो
सब नोच लो
बेकल फूलों को
शाख़ों पे बिलकते मत छोड़ो
ये फ़स्ल उमीदों की हमदम
इस बार भी ग़ारत जाएगी
सब मेहनत सुब्हों शामों की
अब के भी अकारत जाएगी
खेती के कोनों-खुदरों में
फिर अपने लहू की खाद भरो
फिर मिट्टी सींचो अश्कों से
फिर अगली रुत की फ़िक्र करो
फिर अगली रुत की फ़िक्र करो
जब फिर इक बार उजड़ना है
इक फ़स्ल पकी तो भरपाया
जब तक तो यही कुछ करना है

चंद रोज़ और मिरी जान : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीआद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
अरसा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पे यूँही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बे-नाम गिराँ-बार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बे-सूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

इस वक़्त तो यूँ लगता है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं है
महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा
आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन
और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा
मुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना हो
गलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेरा
शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद
अब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा
इक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्ता
तेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा
माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी है
लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है
हिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है

कुत्ते : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्ते
कि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया इन का
जहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई
न आराम शब को न राहत सवेरे
ग़लाज़त में घर नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे को लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाक़ों से उकता के मर जाने वाले
मज़लूम मख़्लूक़ गर सर उठाए
तो इंसान सब सर-कशी भूल जाए
ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आक़ाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इन को एहसास-ए-ज़िल्लत दिला दे
कोई इन की सोई हुई दुम हिला दे

दो इश्क़ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(1)
ताज़ा हैं अभी याद में ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ाम
वो अक्स-ए-रुख़-ए-यार से लहके हुए अय्याम
वो फूल सी खुलती हुई दीदार की साअ'त
वो दिल सा धड़कता हुआ उम्मीद का हंगाम
उम्मीद कि लौ जागा ग़म-ए-दिल का नसीबा
लो शौक़ की तरसी हुई शब हो गई आख़िर
लो डूब गए दर्द के बे-ख़्वाब सितारे
अब चमकेगा बे-सब्र निगाहों का मुक़द्दर
इस बाम से निकलेगा तिरे हुस्न का ख़ुर्शीद
इस कुंज से फूटेगी किरन रंग-ए-हिना की
इस दर से बहेगा तिरी रफ़्तार का सीमाब
उस राह पे फैलेगी शफ़क़ तेरी क़बा की
फिर देखे हैं वो हिज्र के तपते हुए दिन भी
जब फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ में फ़ुग़ाँ भूल गई है
हर शब वो सियह बोझ कि दिल बैठ गया है
हर सुब्ह की लौ तीर सी सीने में लगी है
तन्हाई में क्या क्या न तुझे याद किया है
क्या क्या न दिल-ए-ज़ार ने ढूँडी हैं पनाहें
आँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा को
डाली हैं कभी गर्दन-ए-महताब में बाहें
(2)
चाहा है इसी रँग में लैला-ए-वतन को
तड़पा है इसी तौर से दिल उस की लगन में
ढूँडी है यूँही शौक़ ने आसाइश-ए-मंज़िल
रुख़्सार के ख़म में कभी काकुल की शिकन में
उस जान-ए-जहाँ को भी यूँही क़ल्ब-ओ-नज़र ने
हँस हँस के सदा दी कभी रो रो के पुकारा
पूरे किए सब हर्फ़-ए-तमन्ना के तक़ाज़े
हर दर्द को उजयाला हर इक ग़म को सँवारा
वापस नहीं फेरा कोई फ़रमान जुनूँ का
तन्हा नहीं लौटी कभी आवाज़ जरस की
ख़ैरिय्यत-ए-जाँ राहत-ए-तन सेह्हत-ए-दामाँ
सब भूल गईं मस्लिहतें अहल-ए-हवस की
इस राह में जो सब पे गुज़रती है वो गुज़री
तन्हा पस-ए-ज़िंदाँ कभी रुस्वा सर-ए-बाज़ार
गरजे हैं बहुत शैख़ सर-ए-गोशा-ए-मिम्बर
कड़के हैं बहुत अहल-ए-हकम बर-सर-ए-दरबार
छोड़ा नहीं ग़ैरों ने कोई नावक-ए-दुश्नाम
छूटी नहीं अपनों से कोई तर्ज़-ए-मलामत
इस इश्क़ न उस इश्क़ पे नादिम है मगर दिल
हर दाग़ है इस दिल में ब-जुज़-दाग़-ए-नदामत

मिरे हमदम मिरे दोस्त! : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्त
गर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकन
तिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलन
मेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगी
गर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस से
जी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़
तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़
तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाए
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्त
रोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँ
मैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरीं
आबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीत
आमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीत
तुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँ
कैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्म
गर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैं
कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूश
देखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैं
किस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोर
यक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता है
कैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाब
किस तरह रात का ऐवान महक जाता है
यूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिर
गीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिर
पर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहीं
नग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सही
गीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सही
तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा
और ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहीं
इस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहीं
हाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा

इंतिसाब : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज के नाम
और
आज के ग़म के नाम
आज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा
ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस है
दर्द की अंजुमन जो मिरा देस है
क्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम
किर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्ट-मैनों के नाम
ताँगे वालों का नाम
रेल-बानों के नाम
कार-ख़ानों के भूके जियालों के नाम
बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़
दहक़ाँ के नाम
जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए
हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है
जिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तले
धज्जियाँ हो गई है
उन दुखी माओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलकते हैं और
नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
उन हसीनाओं के नाम
जिन की आँखों के गुल
चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल के
मुरझा गए हैं
उन बियाहताओं के नाम
जिन के बदन
बे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैं
बेवाओं के नाम
कटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नाम
जिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों
को आ आ के करता है अक्सर वज़ू
जिन के सायों में करती है आह-ओ-बुका
आँचलों की हिना
चूड़ियों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू
पढ़ने वालों के नाम
वो जो असहाब-ए-तब्ल-ओ-अलम
के दरों पर किताब और क़लम
का तक़ाज़ा लिए हाथ फैलाए
वो मासूम जो भोले-पन में
वहाँ अपने नन्हे चराग़ों में लौ की लगन
ले के पहुँचे जहाँ
बट रहे थे घटा-टोप बे-अंत रातों के साए
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शब-ताब गौहर
जेल-ख़ानों की शोरीदा रातों की सरसर में
जल जल के अंजुम-नुमा होगए हैं
आने वाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह
अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा होगए हैं

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िर
हुआ फिर से हुक्म सादिर
कि वतन-बदर हों हम तुम
दें गली गली सदाएँ
करें रुख़ नगर नगर, का
कि सुराग़ कोई पाएँ
किसी यार-ए-नामा-बर का
हर इक अजनबी से पूछें
जो पता था अपने घर का
सर-ए-कू-ए-ना-शनायाँ
हमें दिन से रात करना
कभी इस से बात करना
कभी उस से बात करना
तुम्हें क्या कहूँ कि क्या है
शब-ए-ग़म बुरी बला है
हमें ये भी था ग़नीमत
जो कोई शुमार होता
हमें क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता!

ढाका से वापसी पर : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'द
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'द
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'द
उन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किए
अन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द

दुआ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आइए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं
आइए अर्ज़ गुज़ारें कि निगार-ए-हस्ती
ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दा भर दे
वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे
जिन की आँखों को रुख़-ए-सुब्ह का यारा भी नहीं
उन की रातों में कोई शम्अ मुनव्वर कर दे
जिन के क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहीं
उन की नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे
जिन का दीं पैरवी-ए-किज़्ब-ओ-रिया है उन को
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले जुरअत-ए-तहक़ीक़ मिले
जिन के सर मुंतज़िर-ए-तेग़-ए-जफ़ा हैं उन को
दस्त-ए-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले
इश्क़ का सिर्र-ए-निहाँ जान-ए-तपाँ है जिस से
आज इक़रार करें और तपिश मिट जाए
हर्फ़-ए-हक़ दिल में खटकता है जो काँटे की तरह
आज इज़हार करें और ख़लिश मिट जाए

पास रहो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम मिरे पास रहो
मिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले,
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिए
बैन करती हुई हँसती हुई, गाती निकले
दर्द के कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगे
आस लिए
और बच्चों के बिलकने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मय
बहर-ए-ना-सूदगी मचले तो मनाए न मने
जब कोई बात बनाए न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी सुनसान सियह रात चले
पास रहो
मिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो

लौह-ओ-क़लम : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे
असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे
वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे
हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे
मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा
दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे
मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से
तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा
रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे
इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

हार्ट-अटैक : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दर्द इतना था कि उस रात दिल-ए-वहशी ने
हर रग-ए-जाँ से उलझना चाहा
हर बुन-ए-मू से टपकना चाहा
और कहीं दूर तिरे सहन में गोया
पत्ता पत्ता मिरे अफ़्सुर्दा लहू में धुल कर
हुस्न-ए-महताब से आज़ुर्दा नज़र आने लगा
मेरे वीराना-ए-तन में गोया
सारे दुखते हुए रेशों की तनाबें खुल कर
सिलसिला-वार पता देने लगीं
रुख़्सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ की तय्यारी का
और जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहीं
एक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी का
दर्द इतना था कि उस से भी गुज़रना चाहा
हम ने चाहा भी मगर दिल न ठहरना चाहा

हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन
जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें
कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा
कितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें
तेरे ऐवानों में पुर्ज़े हुए पैमाँ कितने
कितने वादे जो न आसूदा-ए-इक़रार हुए
कितनी आँखों को नज़र खा गई बद-ख़्वाहों की
ख़्वाब कितने तिरी शह-राहों में संगसार हुए
''बला-कशान-ए-मोहब्बत पे जो हुआ सो हुआ
जो मुझ पे गुज़री मत उस से कहो, हुआ सो हुआ
मबादा हो कोई ज़ालिम तिरा गरेबाँ-गीर
लहू के दाग़ तू दामन से धो, हुआ सो हुआ''
हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं मगर ऐ जान-ए-जहाँ
अपने उश्शाक़ से ऐसे भी कोई करता है
तेरी महफ़िल को ख़ुदा रक्खे अबद तक क़ाएम
हम तो मेहमाँ हैं घड़ी भर के हमारा क्या है

दर्द आएगा दबे पाँव : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

और कुछ देर में जब फिर मिरे तन्हा दिल को
फ़िक्र आ लेगी कि तन्हाई का क्या चारा करे
दर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख़ चराग़
वो जो इक दर्द धड़कता है कहीं दिल से परे
शोला-ए-दर्द जो पहलू में लपक उट्ठेगा
दिल की दीवार पे हर नक़्श दमक उट्ठेगा
हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़ कहीं गोशा-ए-रुख़्सार कहीं
हिज्र का दश्त कहीं गुलशन-ए-दीदार कहीं
लुत्फ़ की बात कहीं प्यार का इक़रार कहीं
दिल से फिर होगी मिरी बात कि ऐ दिल ऐ दिल
ये जो महबूब बना है तिरी तन्हाई का
ये तो मेहमाँ है घड़ी-भर का चला जाएगा
उस से कब तेरी मुसीबत का मुदावा होगा
मुश्तइल हो के अभी उट्ठेंगे वहशी साए
ये चला जाएगा रह जाएँगे बाक़ी साए
रात-भर जिन से तिरा ख़ून-ख़राबा होगा
जंग ठहरी है कोई खेल नहीं है ऐ दिल
दुश्मन-ए-जाँ हैं सभी सारे के सारे क़ातिल
ये कड़ी रात भी ये साए भी तन्हाई भी
दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल
लाओ सुल्गाओ कोई जोश-ए-ग़ज़ब का अँगार
तैश की आतिश-ए-जर्रार कहाँ है लाओ
वो दहकता हुआ गुलज़ार कहाँ है लाओ
जिस में गर्मी भी है हरकत भी तवानाई भी
हो न हो अपने क़बीले का भी कोई लश्कर
मुंतज़िर होगा अंधेरे की फ़सीलों के उधर
उन को शोलों के रजज़ अपना पता तो देंगे
ख़ैर हम तक वो न पहुँचे भी सदा तो देंगे
दूर कितनी है अभी सुब्ह बता तो देंगे

बहार आई : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बहार आई तो जैसे यक-बार
लौट आए हैं फिर अदम से
वो ख़्वाब सारे शबाब सारे
जो तेरे होंटों पे मर-मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक़ का लहू हैं
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्ताँ भी
ख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-मह-वशां भी
ग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारे
तिरे हमारे
सवाल सारे जवाब सारे
बहार आई तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे

शीशों का मसीहा कोई नहीं : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मोती हो कि शीशा जाम कि दुर
जो टूट गया सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया सो छूट गया
तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो
शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वो साग़र-ए-दिल है जिस में कभी
सद-नाज़ से उतरा करती थी
सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ की परी
फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये साग़र ले कर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर तोड़ दिया
ये रंगीं रेज़े हैं शायद
उन शोख़ बिलोरीं सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
ख़ल्वत को सजाया करते थे
नादारी दफ़्तर भूक और ग़म
उन सपनों से टकराते रहे
बे-रहम था चौमुख पथराओ
ये काँच के ढाँचे क्या करते
या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का
वो जिस से तुम्हारे इज्ज़ पे भी
शमशाद-क़दों ने रश्क किया
इस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर भी बहुत रहज़न भी कई
है चोर-नगर याँ मुफ़लिस की
गर जान बची तो आन गई
ये साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर
सालिम हों तो क़ीमत पाते हैं
यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़त
चुभते हैं लहू रुलवाते हैं
तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो
यादों के गिरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बख़िया उधेड़ा एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है
इस कार-गह-ए-हस्ती में जहाँ
ये साग़र शीशे ढलते हैं
हर शय का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं
जो हाथ बढ़े यावर है यहाँ
जो आँख उठे वो बख़्तावर
याँ धन-दौलत का अंत नहीं
हों घात में डाकू लाख मगर
कब लूट-झपट से हस्ती की
दूकानें ख़ाली होती हैं
याँ परबत-परबत हीरे हैं
याँ सागर सागर मोती हैं
कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
पर्दे लटकाते फिरते हैं
हर पर्बत को हर सागर को
नीलाम चढ़ाते फिरते हैं
कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
ये पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाई-गीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं
इन दोनों में रन पड़ता है
नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर
ये कालक भरते फिरते हैं
वो जोत जगाते रहते हैं
ये आग लगाते फिरते हैं
वो आग बुझाते रहते हैं
सब साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर
इस बाज़ी में बद जाते हैं
उट्ठो सब ख़ाली हाथों को
इस रन से बुलावे आते हैं

मौज़ू-ए-सुख़न : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रात
और मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगी
और उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हात
उन का आँचल है कि रुख़्सार कि पैराहन है
कुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगीं
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाँव में
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहीं
आज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगी
वही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीर
रंग-ए-रुख़्सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का ग़ुबार
संदली हाथ पे धुंदली सी हिना की तहरीर
अपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यही
जान-ए-मज़मूँ है यही शाहिद-ए-मअ'नी है यही
आज तक सुर्ख़ ओ सियह सदियों के साए के तले
आदम ओ हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है?
मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई में
हम पे क्या गुज़रेगी अज्दाद पे क्या गुज़री है?
इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़
क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती है
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!
किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती है
ये हर इक सम्त पुर-असरार कड़ी दीवारें
जल-बुझे जिन में हज़ारों की जवानी के चराग़
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहें
जिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़
ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंट
हाए उस जिस्म के कम्बख़्त दिल-आवेज़ ख़ुतूत
आप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे
अपना मौज़ू-ए-सुख़न उन के सिवा और नहीं
तब्अ-ए-शाएर का वतन उन के सिवा और नहीं

तराना : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे
ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे
कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे
ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक
कुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे

कोई 'आशिक़ किसी महबूबा से! : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबा
फिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो
उम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्द
फिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दो
जैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सही
आओ दो चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठो
गरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'द
अपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगा
हम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीच
अन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगा
कोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुम
कोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगा
गर्द-ए-अय्याम की तहरीर को धोने के लिए
तुम से गोया हों दम-ए-दीद जो मेरी पलकें
तुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनो
और जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखें
तुम जो चाहो तो कहो और जो न चाहो न कहो

जब तेरी समुंदर आँखों में : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोनों वक़्त जहाँ
जो रात न दिन जो आज न कल
पल-भर को अमर पल भर में धुआँ
इस धूप किनारे पल-दो-पल
होंटों की लपक
बाँहों की छनक
ये मेल हमारा झूट न सच
क्यूँ रार करो क्यूँ दोश धरो
किस कारन झूटी बात करो
जब तेरी समुंदर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोएँगे घर दर वाले
और राही अपनी रह लेगा

तुम अपनी करनी कर गुज़रो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
जो कुछ पाया खो जाएगा
जो मिल न सका वो पाएँगे
ये दिन तो वही पहला दिन है
जो पहला दिन था चाहत का
हम जिस की तमन्ना करते रहे
और जिस से हर दम डरते रहे
ये दिन तो कई बार आया
सौ बार बसे और उजड़ गए
सौ बार लुटे और भर पाया
अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
तुम ख़ौफ़-ओ-ख़तर से दर-गुज़रो
जो होना है सो होना है
गर हँसना है तो हँसना है
गर रोना है तो रोना है
तुम अपनी करनी कर गुज़रो
जो होगा देखा जाएगा

रंग है दिल का मिरे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम न आए थे तो हर इक चीज़ वही थी कि जो है
आसमाँ हद्द-ए-नज़र राहगुज़र राहगुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय राहगुज़र रंग-ए-फ़लक
रंग है दिल का मिरे ख़ून-ए-जिगर होने तक
चम्पई रंग कभी राहत-ए-दीदार का रंग
सुरमई रंग कि है साअत-ए-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का ख़स-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख़ फूलों का दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग लहू रंग शब-ए-तार का रंग
आसमाँ राहगुज़र शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग कोई रुत कोई शय
एक जगह पर ठहरे
फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है
आसमाँ हद्द-ए-नज़र राहगुज़र राहगुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय

आख़िरी ख़त : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो वक़्त मिरी जान बहुत दूर नहीं है
जब दर्द से रुक जाएँगी सब ज़ीस्त की राहें
और हद से गुज़र जाएगा अंदोह-ए-निहानी
थक जाएँगी तरसी हुई नाकाम निगाहें
छिन जाएँगे मुझ से मिरे आँसू मिरी आहें
छिन जाएगी मुझ से मिरी बे-कार जवानी
शायद मिरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी
अपने दिल-ए-मा'सूम को नाशाद करोगी
आओगी मिरी गोर पे तुम अश्क बहाने
नौ-ख़ेज़ बहारों के हसीं फूल चढ़ाने
शायद मिरी तुर्बत को भी ठुकरा के चलोगी
शायद मिरी बे-सूद वफ़ाओं पे हँसोगी
इस वज़्-ए-करम का भी तुम्हें पास न होगा
लेकिन दिल-ए-नाकाम को एहसास न होगा
अल-क़िस्सा मआल-ए-ग़म-ए-उल्फ़त पे हँसो तुम
या अश्क बहाती रहो फ़रियाद करो तुम
माज़ी पे नदामत हो तुम्हें या कि मसर्रत
ख़ामोश पड़ा सोएगा वामाँदा-ए-उल्फ़त

मुलाक़ात : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये रात उस दर्द का शजर है
जो मुझ से तुझ से अज़ीम-तर है
अज़ीम-तर है कि इस की शाख़ों
में लाख मिशअल-ब-कफ़ सितारों
के कारवाँ घर के खो गए हैं
हज़ार महताब इस के साए
में अपना सब नूर रो गए हैं
ये रात उस दर्द का शजर है
जो मुझ से तुझ से अज़ीम-तर है
मगर इसी रात के शजर से
ये चंद लम्हों के ज़र्द पत्ते
गिरे हैं और तेरे गेसुओं में
उलझ के गुलनार हो गए हैं
इसी की शबनम से ख़ामुशी के
ये चंद क़तरे तिरी जबीं पर
बरस के हीरे पिरो गए हैं
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बहुत सियह है ये रात लेकिन
इसी सियाही में रूनुमा है
वो नहर-ए-ख़ूँ जो मिरी सदा है
इसी के साए में नूर गर है
वो मौज-ए-ज़र जो तिरी नज़र है
वो ग़म जो इस वक़्त तेरी बाँहों
के गुलसिताँ में सुलग रहा है
वो ग़म जो इस रात का समर है
कुछ और तप जाए अपनी आहों
की आँच में तो यही शरर है
हर इक सियह शाख़ की कमाँ से
जिगर में टूटे हैं तीर जितने
जिगर से नोचे हैं और हर इक
का हम ने तेशा बना लिया है
3
अलम-नसीबों जिगर-फ़िगारों
की सुब्ह अफ़्लाक पर नहीं है
जहाँ पे हम तुम खड़े हैं दोनों
सहर का रौशन उफ़ुक़ यहीं है
यहीं पे ग़म के शरार खिल कर
शफ़क़ का गुलज़ार बन गए हैं
यहीं पे क़ातिल दुखों के तेशे
क़तार अंदर क़तार किरनों
के आतिशीं हार बन गए हैं
ये ग़म जो इस रात ने दिया है
ये ग़म सहर का यक़ीं बना है
यक़ीं जो ग़म से करीम-तर है
सहर जो शब से अज़ीम-तर है

ख़ुदा वो वक़्त न लाए : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि सोगवार हो तू
सकूँ की नींद तुझे भी हराम हो जाए
तिरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाए
तिरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाए
ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा
हुजूम-ए-यास से बेताब हो के रह जाए
वुफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब होके रह जाए
तिरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाए
ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरा
तवील रातों में तू भी क़रार को तरसे
तिरी निगाह किसी ग़म-गुसार को तरसे
ख़िज़ाँ-रसीदा तमन्ना बहार को तरसे
कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्दा पे ए'तिमाद करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि तुझ को याद आए
वो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी है
वो आँख जिस को तिरा इंतिज़ार अब भी है

ज़िंदाँ की एक शाम : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से
ज़ीना ज़ीना उतर रही है रात
यूँ सबा पास से गुज़रती है
जैसे कह दी किसी ने प्यार की बात
सेहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जार
सर-निगूँ महव हैं बनाने में
दामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगार
शाना-ए-बाम पर दमकता है
मेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमील
ख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूम
नूर में घुल गया है अर्श का नील
सब्ज़ गोशों में नील-गूँ साए
लहलहाते हैं जिस तरह दिल में
मौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए
दिल से पैहम ख़याल कहता है
इतनी शीरीं है ज़िंदगी इस पल
ज़ुल्म का ज़हर घोलने वाले
कामराँ हो सकेंगे आज न कल
जल्वा-गाह-ए-विसाल की शमएँ
वो बुझा भी चुके अगर तो क्या
चाँद को गुल करें तो हम जानें

तुम्हारे हुस्न के नाम : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नाम
बिखर गया जो कभी रंग-ए-पैरहन सर-ए-बाम
निखर गई है कभी सुब्ह दोपहर कभी शाम
कहीं जो क़ामत-ए-ज़ेबा पे सज गई है क़बा
चमन में सर्व-ओ-सनोबर सँवर गए हैं तमाम
बनी बिसात-ए-ग़ज़ल जब डुबो लिए दिल ने
तुम्हारे साया-ए-रुख़सार-ओ-लब में साग़र-ओ-जाम
सलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नाम
तुम्हारे हाथ पे है ताबिश-ए-हिना जब तक
जहाँ में बाक़ी है दिलदारी-ए-उरूस-ए-सुख़न
तुम्हारा हुस्न जवाँ है तो मेहरबाँ है फ़लक
तुम्हारा दम है तो दम-साज़ है हवा-ए-वतन
अगरचे तंग हैं औक़ात सख़्त हैं आलाम
तुम्हारी याद से शीरीं है तल्ख़ी-ए-अय्याम
सलाम लिखता है शाएर तुम्हारे हुस्न के नाम

हिज्र की राख और विसाल के फूल : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज फिर दर्द-ओ-ग़म के धागे में
हम पिरो कर तिरे ख़याल के फूल
तर्क-ए-उल्फ़त के दश्त से चुन कर
आश्नाई के माह ओ साल के फूल
तेरी दहलीज़ पर सजा आए
फिर तिरी याद पर चढ़ा आए
बाँध कर आरज़ू के पल्ले में
हिज्र की राख और विसाल के फूल

फलस्तीनी बच्चे के लिए लोरी : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(2)
मत रो बच्चे
रो रो के अभी
तेरी अम्मी की आँख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने ग़म से रुख़्सत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने ख़्वाब की तितली पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराए देस गया है
मत रो बच्चे
तेरे आँगन में
मुर्दा सूरज नहला के गए हैं
चंद्रमा दफ़ना के गए हैं
मत रो बच्चे
अम्मी, अब्बा, बाजी, भाई
चाँद और सूरज
तू गर रोएगा तो ये सब
और भी तुझ को रुलवाएेंगे
तू मुस्काएगा तो शायद
सारे इक दिन भेस बदल कर
तुझ से खेलने लौट आएँगे

जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मैं क्या लिखूँ कि जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
वो आशिक़ी की ज़बाँ में कहीं भी दर्ज नहीं
लिखा गया है बहुत लुतफ़-ए-वस्ल ओ दर्द-ए-फ़िराक़
मगर ये कैफ़ियत अपनी रक़म नहीं है कहीं
ये अपना इशक़-ए-हम-आग़ोश जिस में हिज्र ओ विसाल
ये अपना दर्द कि है कब से हमदम-ए-मह-ओ-साल
इस इश्क़-ए-ख़ास को हर एक से छुपाए हुए
''गुज़र गया है ज़माना गले लगाए हुए''

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
मध भरा हर्फ़ कोई ज़हर भरा हर्फ़ कोई
दिल-नशीं हर्फ़ कोई क़हर भरा हर्फ़ कोई
हर्फ़-ए-उल्फ़त कोई दिलदार-ए-नज़र हो जैसे
जिस से मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत
इतना रौशन कि सर-ए-मौजा-ए-ज़र हो जैसे
सोहबत-ए-यार में आग़ाज़-ए-तरब की सूरत
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-ग़ज़ब हो जैसे
ता-अबद शहर-ए-सितम जिस से तबह हो जाएँ
इतना तारीक कि शमशान की शब हो जैसे
लब पे लाऊँ तो मिरे होंट सियह हो जाएँ
आज हर सुर से हर इक राग का नाता टूटा
ढूँडती फिरती है मुतरिब को फिर उस की आवाज़
जोशिश-ए-दर्द से मजनूँ के गरेबाँ की तरह
चाक-दर-चाक हुआ आज हर इक पर्दा-ए-साज़
आज हर मौज-ए-हवा से है सवाली ख़िल्क़त
ला कोई नग़्मा कोई सौत तिरी उम्र दराज़
नौहा-ए-ग़म ही सही शोर-ए-शहादत ही सही
सूर-ए-महशर ही सही बाँग-ए-क़यामत ही सही

तुम ही कहो क्या करना है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब दुख की नदिया में हम ने
जीवन की नाव डाली थी
था कितना कस-बल बाँहों में
लोहू में कितनी लाली थी
यूँ लगता था दो हाथ लगे
और नाव पूरम पार लगी
ऐसा न हुआ, हर धारे में
कुछ अन-देखी मंजधारें थीं
कुछ माँझी थे अंजान बहुत
कुछ बे-परखी पतवारें थीं
अब जो भी चाहो छान करो
अब जितने चाहो दोश धरो
नदिया तो वही है, नाव वही
अब तुम ही कहो क्या करना है
अब कैसे पार उतरना है
जब अपनी छाती में हम ने
इस देस के घाव देखे थे
था वेदों पर विश्वाश बहुत
और याद बहुत से नुस्ख़े थे
यूँ लगता था बस कुछ दिन में
सारी बिपता कट जाएगी
और सब घाव भर जाएँगे
ऐसा न हुआ कि रोग अपने
कुछ इतने ढेर पुराने थे
वेद इन की टोह को पा न सके
और टोटके सब बे-कार गए
अब जो भी चाहो छान करो
अब जितने चाहो दोश धरो
छाती तो वही है, घाव वही
अब तुम ही कहो क्या करना है
ये घाव कैसे भरना है

सोच : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

क्यूँ मेरा दिल शाद नहीं है
क्यूँ ख़ामोश रहा करता हूँ
छोड़ो मेरी राम-कहानी
मैं जैसा भी हूँ अच्छा हूँ
मेरा दिल ग़म-गीं है तो क्या
ग़म-गीं ये दुनिया है सारी
ये दुख तेरा है न मेरा
हम सब की जागीर है पियारी
तू गर मेरी भी हो जाए
दुनिया के ग़म यूँही रहेंगे
पाप के फंदे ज़ुल्म के बंधन
अपने कहे से कट न सकेंगे
ग़म हर हालत में मोहलिक है
अपना हो या और किसी का
रोना-धोना जी को जलाना
यूँ भी हमारा यूँ भी हमारा
क्यूँ न जहाँ का ग़म अपना लें
ब'अद में सब तदबीरें सोचें
ब'अद में सुख के सपने देखें
सपनों की ताबीरें सोचें
बे-फ़िकरे धन-दौलत वाले
ये आख़िर क्यूँ ख़ुश रहते हैं
इन का सुख आपस में बाँटें
ये भी आख़िर हम जैसे हैं
हम ने माना जंग कड़ी है
सर फूटेंगे ख़ून बहेगा
ख़ून में ग़म भी बह जाएँगे
हम न रहें ग़म भी न रहेगा

मिरे दर्द को जो ज़बाँ मिले : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मिरा दर्द नग़मा-ए-बे-सदा
मिरी ज़ात ज़र्रा-ए-बे-निशाँ
मेरे दर्द को जो ज़बाँ मिले
मुझे अपना नाम-ओ-निशाँ मिले
मेरी ज़ात का जो निशाँ मिले
मुझे राज़-ए-नज़्म-ए-जहाँ मिले
जो मुझे ये राज़-ए-निहाँ मिले
मिरी ख़ामुशी को बयाँ मिले
मुझे काएनात की सरवरी
मुझे दौलत-ए-दो-जहाँ मिले

कोई आशिक़ किसी महबूबा से! : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते
ख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलो
मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का
जिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो
साँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम
तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो
गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है
गर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र
फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता है
याँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहीं
जिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सके
तुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा है
तुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं

एक रह-गुज़र पर : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ
वो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ
हज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशीं
हर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगीं
शबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसें
वक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसें
अदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बां
बयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां
सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूम
तवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूम
वो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराए
ज़बान-ए-शेर को तारीफ़ करते शर्म आए
वो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोश
बहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोश
गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे
दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे
ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहीं
वो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहीं
किसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा था
ब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा था
और अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसीं
है इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकीं
हवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैं
फ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं
ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है
नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मयस्सर है

कहाँ जाओगे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

और कुछ देर में लुट जाएगा हर बाम पे चाँद
अक्स खो जाएँगे आईने तरस जाएँगे
अर्श के दीदा-ए-नमनाक से बारी-बारी
सब सितारे सर-ए-ख़ाशाक बरस जाएँगे
आस के मारे थके हारे शबिस्तानों में
अपनी तन्हाई समेटेगा, बिछाएगा कोई
बेवफ़ाई की घड़ी, तर्क-ए-मदारात का वक़्त
इस घड़ी अपने सिवा याद न आएगा कोई
तर्क-ए-दुनिया का समाँ ख़त्म-ए-मुलाक़ात का वक़्त
इस घड़ी ऐ दिल-ए-आवारा कहाँ जाओगे
इस घड़ी कोई कसी का भी नहीं रहने दो
कोई इस वक़्त मिले गा ही नहीं रहने दो
और मिले गा भी इस तौर कि पछताओगे
इस घड़ी ऐ दिल-ए-आवारा कहाँ जाओगे
और कुछ देर ठहर जाओ कि फिर नश्तर-ए-सुब्ह
ज़ख़्म की तरह हर इक आँख को बेदार करे
और हर कुश्ता-ए-वामाँदगी-ए-आख़िर-ए-शब
भूल कर साअत-ए-दरमांदगी-ए-आख़िर-ए-शब
जान पहचान मुलाक़ात पे इसरार करे

आज की रात : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़
दुख से भरपूर दिन तमाम हुए
और कल की ख़बर किसे मालूम
दोश-ओ-फ़र्दा की मिट चुकी हैं हुदूद
हो न हो अब सहर किसे मालूम
ज़िंदगी हेच! लेकिन आज की रात
एज़दिय्यत है मुमकिन आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़
अब न दोहरा फ़साना-हा-ए-अलम
अपनी क़िस्मत पे सोगवार न हो
फ़िक्र-ए-फ़र्दा उतार दे दिल से
उम्र-ए-रफ़्ता पे अश्क-बार न हो
अहद-ए-ग़म की हिकायतें मत पूछ
हो चुकीं सब शिकायतें मत पूछ
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़

इंतिज़ार : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ तुम नहीं आतीं
रियाज़-ए-ज़ीस्त है आज़ुरदा-ए-बहार अभी
मिरे ख़याल की दुनिया है सोगवार अभी
जो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं प्यारी
अभी तलक मिरी तन्हाइयों में बस्ती हैं
तवील रातें अभी तक तवील हैं प्यारी
उदास आँखें तिरी दीद को तरसती हैं
बहार-ए-हुस्न पे पाबंदी-ए-जफ़ा कब तक
ये आज़माइश-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कब तक
क़सम तुम्हारी बहुत ग़म उठा चुका हूँ मैं
ग़लत था दावा-ए-सब्र-ओ-शकेब आ जाओ
क़रार-ए-ख़ातिर-ए-बेताब थक गया हूँ मैं

परवीन शाकिर की नज़्में : Parveen Shakir Nazm Hindi

इतना मालूम है! : परवीन शाकिर

अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़
सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में
रोज़ की तरह से वो आज भी आया होगा
और जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?
आप को इल्म है वो आज नहीं आई हैं?
मेरी हर दोस्त से उस ने यही पूछा होगा
क्यूँ नहीं आई वो क्या बात हुई है आख़िर
ख़ुद से इस बात पे सौ बार वो उलझा होगा
कल वो आएगी तो मैं उस से नहीं बोलूँगा
आप ही आप कई बार वो रूठा होगा
वो नहीं है तो बुलंदी का सफ़र कितना कठिन
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उस ने ये सोचा होगा
राहदारी में हरे लॉन में फूलों के क़रीब
उस ने हर सम्त मुझे आन के ढूँडा होगा
नाम भूले से जो मेरा कहीं आया होगा
ग़ैर-महसूस तरीक़े से वो चौंका होगा
एक जुमले को कई बार सुनाया होगा
बात करते हुए सौ बार वो भूला होगा
ये जो लड़की नई आई है कहीं वो तो नहीं
उस ने हर चेहरा यही सोच के देखा होगा
जान-ए-महफ़िल है मगर आज फ़क़त मेरे बग़ैर
हाए किस दर्जा वही बज़्म में तन्हा होगा
कभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसे
उस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगा
चलते चलते कोई मानूस सी आहट पा कर
दोस्तों को भी किस उज़्र से रोका होगा
याद कर के मुझे नम हो गई होंगी पलकें
''आँख में पड़ गया कुछ'' कह के ये टाला होगा
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगा
जब मिली होगी उसे मेरी अलालत की ख़बर
उस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगा
सोच कर ये कि बहल जाए परेशानी-ए-दिल
यूँही बे-वज्ह किसी शख़्स को रोका होगा!
इत्तिफ़ाक़न मुझे उस शाम मिरी दोस्त मिली
मैं ने पूछा कि सुनो आए थे वो? कैसे थे?
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
इस हँसी में तो वो तल्ख़ी थी कि इस से आगे
क्या कहा उस ने मुझे याद नहीं है लेकिन
इतना मालूम है ख़्वाबों का भरम टूट गया!

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी : परवीन शाकिर

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी
रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभी
मेरे माथे पे तिरा प्यार दमकता है अभी
मेरी साँसों में तिरा लम्स महकता है अभी
मेरे सीने में तिरा नाम धड़कता है अभी
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए
तेरे मल्बूस की ख़ुश्बू है अभी मेरे लिए
तेरी बाँहें तिरा पहलू है अभी मेरे लिए
सब से बढ़ कर मिरी जाँ तू है अभी मेरे लिए
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी!
आज के ब'अद मगर रंग-ए-वफ़ा क्या होगा
इश्क़ हैराँ है सर-ए-शहर-ए-सबा क्या होगा
मेरे क़ातिल तिरा अंदाज़-ए-जफ़ा क्या होगा!
आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिए
एक अंदेशा-ए-बेनाम है और कुछ भी नहीं
देखना ये है कि कल तुझ से मुलाक़ात के ब'अद
रंग-ए-उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगा
वक़्त पर्वाज़ करेगा कि ठहर जाएगा
जीत हो जाएगी या खेल बिगड़ जाएगा
ख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा

ज़िद : परवीन शाकिर

मैं क्यूँ उस को फ़ोन करूँ!
उस के भी तो इल्म में होगा
कल शब
मौसम की पहली बारिश थी!

लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी : परवीन शाकिर

इस उम्र के बाद उस को देखा!
आँखों में सवाल थे हज़ारों
होंटों पे मगर वही तबस्सुम!
चेहरे पे लिखी हुई उदासी
लहजे में मगर बला का ठहराओ
आवाज़ में गूँजती जुदाई
बाँहें थीं मगर विसाल-ए-सामाँ!
सिमटी हुई उस के बाज़ुओं में
ता-देर मैं सोचती रही थी
किस अब्र-ए-गुरेज़-पा की ख़ातिर
मैं कैसे शजर से कट गई थी
किस छाँव को तर्क कर दिया था
मैं उस के गले लगी हुई थी
वो पोंछ रहा था मिरे आँसू
लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी!

ए'तिराफ़ : परवीन शाकिर

जाने कब तक तिरी तस्वीर निगाहों में रही
हो गई रात तिरे अक्स को तकते तकते
मैं ने फिर तेरे तसव्वुर के किसी लम्हे में
तेरी तस्वीर पे लब रख दिए आहिस्ता से!

आईना : परवीन शाकिर

लड़की सर को झुकाए बैठी
काफ़ी के प्याले में चमचा हिला रही है
लड़का हैरत और मोहब्बत की शिद्दत से पागल
लाँबी पलकों के लर्ज़ीदा सायों को
अपनी आँख से चूम रहा है
दोनों मेरी नज़र बचा कर
इक दूजे को देखते हैं हँस देते हैं
मैं दोनों से दूर
दरीचे के नज़दीक
अपनी हथेली पर अपना चेहरा रखे
खिड़की से बाहर का मंज़र देख रही हूँ
सोच रही हूँ
गए दिनों में हम भी यूँही हँसते थे

एक्सटेसी : परवीन शाकिर

सब्ज़ मद्धम रौशनी में सुर्ख़ आँचल की धनक
सर्द कमरे में मचलती गर्म साँसों की महक
बाज़ुओं के सख़्त हल्क़े में कोई नाज़ुक बदन
सिलवटें मल्बूस पर आँचल भी कुछ ढलका हुआ
गर्मी-ए-रुख़्सार से दहकी हुई ठंडी हवा
नर्म ज़ुल्फ़ों से मुलाएम उँगलियों की छेड़-छाड़
सुर्ख़ होंटों पर शरारत के किसी लम्हे का अक्स
रेशमीं बाँहों में चूड़ी की कभी मद्धम खनक
शर्मगीं लहजों में धीरे से कभी चाहत की बात
दो दिलों की धड़कनों में गूँजती थी इक सदा
काँपते होंटों पे थी अल्लाह से सिर्फ़ इक दुआ
काश ये लम्हे ठहर जाएँ ठहर जाएँ ज़रा!

मुझे मत बताना : परवीन शाकिर

मुझे मत बताना
कि तुम ने मुझे छोड़ने का इरादा किया था
तो क्यूँ
और किस वज्ह से
अभी तो तुम्हारे बिछड़ने का दुख भी नहीं कम हुआ
अभी तो मैं
बातों के वादों के शहर-ए-तिलिस्मात में
आँख पर ख़ुश-गुमानी की पट्टी लिए
तुम को पेड़ों के पीछे दरख़्तों के झुण्ड
और दीवार की पुश्त पर ढूँडने में मगन हूँ
कहीं पर तुम्हारी सदा और कहीं पर तुम्हारी महक
मुझ पे हँसने में मसरूफ़ है
अभी तक तुम्हारी हँसी से नबर्द-आज़मा हूँ
और इस जंग में
मेरा हथियार
अपनी वफ़ा पर भरोसा है और कुछ नहीं
उसे कुंद करने की कोशिश न करना
मुझे मत बताना.....

निक-नेम : परवीन शाकिर

तुम मुझ को गुड़िया कहते हो
ठीक ही कहते हो!
खेलने वाले सब हाथों को मैं गुड़िया ही लगती हूँ
जो पहना दो मुझ पे सजेगा
मेरा कोई रंग नहीं
जिस बच्चे के हाथ थमा दो
मेरी किसी से जंग नहीं
सोचती जागती आँखें मेरी
जब चाहे बीनाई ले लो
कूक भरो और बातें सुन लो
या मेरी गोयाई ले लो
माँग भरो सिन्दूर लगाओ
प्यार करो आँखों में बसाओ
और फिर जब दिल भर जाए तो
दिल से उठा के ताक़ पे रख दो
तुम मुझ को गुड़िया कहते हो
ठीक ही कहते हो!

सिर्फ़ एक लड़की : परवीन शाकिर

अपने सर्द कमरे में
मैं उदास बैठी हूँ
नीम-वा दरीचों से
नम हवाएँ आती हैं
मेरे जिस्म को छू कर
आग सी लगाती हैं
तेरा नाम ले ले कर
मुझ को गुदगुदाती हैं
काश मेरे पर होते
तेरे पास उड़ आती
काश मैं हवा होती
तुझ को छू के लौट आती
मैं नहीं मगर कुछ भी
संग दिल रिवाजों के
आहनी हिसारों में
उम्र-क़ैद की मुल्ज़िम
सिर्फ़ एक लड़की हूँ!

ख़्वाब : परवीन शाकिर

खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ
नर्म लहरों के छींटे उड़ाती हुई
बात-बे-बात हँसती हुई
अपने ख़्वाबों के शहज़ादों का तज़्किरा कर रही थीं
जो ख़ामोश थीं
उन की आँखों में भी मुस्कुराहट की तहरीर थी
उन के होंटों को भी अन-कहे ख़्वाब का ज़ाइक़ा चूमता था!
आने वाले नए मौसमों के सभी पैरहन नीलमीं हो चुके थे!
दूर साहिल पे बैठी हुई एक नन्ही सी बच्ची
हमारी हँसी और मौजों के आहंग से बे-ख़बर
रेत से एक नन्हा घरौंदा बनाने में मसरूफ़ थी
और मैं सोचती थी
ख़ुदा-या! ये हम लड़कियाँ
कच्ची उम्रों से ही ख़्वाब क्यूँ देखना चाहती हैं
ख़्वाब की हुक्मरानी में कितना तसलसुल रहा है!

चाँद रात : परवीन शाकिर

गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था
चाँद को देख के उस का चेहरा देखा था
फ़ज़ा में 'कीट्स' के लहजे की नरमाहट थी
मौसम अपने रंग में 'फ़ैज़' का मिस्रा था
दुआ के बे-आवाज़ उलूही लम्हों में
वो लम्हा भी कितना दिलकश लम्हा था
हाथ उठा कर जब आँखों ही आँखों में
उस ने मुझ को अपने रब से माँगा था
फिर मेरे चेहरे को हाथों में ले कर
कितने प्यार से मेरा माथा चूमा था!
हवा! कुछ आज की शब का भी अहवाल सुना
क्या वो अपनी छत पर आज अकेला था?
या कोई मेरे जैसी साथ थी और उस ने
चाँद को देख के उस का चेहरा देखा था?

एक दोस्त के नाम : परवीन शाकिर

लड़की!
ये लम्हे बादल हैं
गुज़र गए तो हाथ कभी नहीं आएँगे
इन के लम्स को पीती जा
क़तरा क़तरा भीगती जा
भीगती जा तू जब तक इन में नम है
और तिरे अंदर की मिट्टी प्यासी है
मुझ से पूछ
कि बारिश को वापस आने का रस्ता कभी न याद हुआ
बाल सुखाने के मौसम अन-पढ़ होते हैं!

जुदाई की पहली रात : परवीन शाकिर

आँख बोझल है
मगर नींद नहीं आती है
मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं
किसी करवट भी मुझे चैन नहीं पड़ता है
सर्द पड़ती हुई रात
माँगने आई है फिर मुझ से
तिरे नर्म बदन की गर्मी
और दरीचों से झिझकती हुई आहिस्ता हवा
खोजती है मिरे ग़म-ख़ाने में
तेरी साँसों की गुलाबी ख़ुश्बू!
मेरा बिस्तर ही नहीं
दिल भी बहुत ख़ाली है
इक ख़ला है कि मिरी रूह में दहशत की तरह उतरा है
तेरा नन्हा सा वजूद
कैसे उस ने मुझे भर रक्खा था
तिरे होते हुए दुनिया से तअल्लुक़ की ज़रूरत ही न थी
सारी वाबस्तगियाँ तुझ से थीं
तू मिरी सोच भी, तस्वीर भी और बोली भी
मैं तिरी माँ भी, तिरी दोस्त भी हम-जोली भी
तेरे जाने पे खुला
लफ़्ज़ ही कोई मुझे याद नहीं
बात करना ही मुझे भूल गया!
तू मिरी रूह का हिस्सा था
मिरे चारों तरफ़
चाँद की तरह से रक़्साँ था मगर
किस क़दर जल्द तिरी हस्ती ने
मिरे अतराफ़ में सूरज की जगह ले ली है
अब तिरे गिर्द मैं रक़्सिंदा हूँ!
वक़्त का फ़ैसला था
तिरे फ़र्दा की रिफ़ाक़त के लिए
मेरा इमरोज़ अकेला रह जाए
मिरे बच्चे, मिरे लाल
फ़र्ज़ तो मुझ को निभाना है मगर
देख कि कितनी अकेली हूँ मैं!

मशवरा : परवीन शाकिर

नन्ही लड़की
साहिल के इतने नज़दीक
रेत से अपने घर न बना
कोई सरकश मौज इधर आई तो
तेरे घर की बुनियादें तक बह जाएँगी
और फिर उन की याद में तू
सारी उम्र उदास रहेगी!

अोथेलो : परवीन शाकिर

अपने फ़ोन पे अपना नंबर
बार बार डायल करती हूँ
सोच रही हूँ
कब तक उस का टेलीफ़ोन इंगेज रहेगा
दिल कुढ़ता है
इतनी इतनी देर तलक
वो किस से बातें करता है!

वही नर्म लहजा : परवीन शाकिर

वही नर्म लहजा
जो इतना मुलाएम है जैसे
धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो
शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो
किस क़दर रंग-ओ-आहंग का किस क़दर ख़ूबसूरत सफ़र
वही नर्म लहजा
कभी अपने मख़्सूस अंदाज़ में मुझ से बातें करेगा
तो ऐसा लगे
जैसे रेशम के झूले पे कोई मधुर गीत हलकोरे लेने लगा हो
वही नर्म लहजा
किसी शोख़ लम्हे में उस की हँसी बन के बिखरे
तो ऐसा लगे
जैसे क़ौस-ए-क़ुज़ह ने कहीं पास ही अपनी पाज़ेब छनकाई है
हँसी को वो रिम-झिम
कि जैसे फ़ज़ा में बनफ़्शी चमकदार बूंदों के घुंघरू छनकने लगे हों
कि फिर
उस की आवाज़ का लम्स पा के
हवाओं के हाथों में अन-देखे कंगन खनकने लगे हों
वही नर्म लहजा मुझे छेड़ने पर जब आए
तो ऐसा लगेगा
जैसे सावन की चंचल हवा
सब्ज़ पत्तों के झाँझन पहन
सुर्ख़ फूलों की पायल बजाती हुई
मेरे रुख़्सार को
गाहे गाहे शरारे से छूने लगे
मैं जो देखूँ पलट के तो वो
भाग जाए मगर
दूर पेड़ों में छुप कर हँसे
और फिर नन्हे बच्चों की मानिंद ख़ुश हो के ताली बजाने लगे
वही नर्म लहजा
कि जिस ने मिरे ज़ख़्म-ए-जाँ पे हमेशा शगुफ़्ता गुलाबों की शबनम रखी है
बहारों के पहले परिंदे की मानिंद है
जो सदा आने वाले नए सुख के मौसम का क़ासिद बना है
उसी नर्म लहजे ने फिर मुझ को आवाज़ दी है

ड्यूटी : परवीन शाकिर

जान
मुझे अफ़्सोस है
तुम से मिलने शायद इस हफ़्ते भी न आ सकूँगा
बड़ी अहम मजबूरी है
जान
तुम्हारी मजबूरी को
अब तो मैं भी समझने लगी हूँ
शायद इस हफ़्ते भी
तुम्हारे चीफ़ की बीवी तन्हा होगी

फ़बेअय्ये आलाए रब्बिकमा तुकज़्ज़िबान : परवीन शाकिर

दिल-आज़ारी भी इक फ़न है
और कुछ लोग तो
सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं
चाहे उन का बुर्ज कोई हो
अक़रब ही लगते हैं
तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये
अपनी यर्क़ानी सोचों से
और भी ज़र्दी मलते रहते हैं
माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल
कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते
ऊपर से इस अमल को
फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं
जिस का पहला निशाना उमूमन
बिल को अदा करने वाला साथी होता है!
अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले
ये नन्हे मेंडक
हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं
और जब फटने वाले हों तो
हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं
कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने
फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं
लेकिन ये वो साँप हैं जो कि
अपने बच्चे
ख़ुद ही चट कर जाते हैं
कभी कभी मैं सोचती हूँ कि
साँपों की ये ख़सलत
मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में
कैसी बे-पायाँ रहमत है!

वाहिमा : परवीन शाकिर

तुम्हारा कहना है
तुम मुझे बे-पनाह शिद्दत से चाहते हो
तुम्हारी चाहत
विसाल की आख़िरी हदों तक
मिरे फ़क़त मेरे नाम होगी
मुझे यक़ीं है मुझे यक़ीं है
मगर क़सम खाने वाले लड़के!
तुम्हारी आँखों में एक तिल है!

वो बाग़ में मेरा मुंतज़िर था : परवीन शाकिर

वो बाग़ में मेरा मुंतज़िर था
और चाँद तुलू'अ हो रहा था
ज़ुल्फ़-ए-शब-ए-वस्ल खुल रही थी
ख़ुश्बू साँसों में घुल रही थी
आई थी मैं अपने पी से मिलने
जैसे कोई गुल हवा से खिलने
इक उम्र के ब'अद मैं हँसी थी
ख़ुद पर कितनी तवज्जोह दी थी!
पहना गहरा बसंती जोड़ा
और इत्र-ए-सुहाग में बसाया
आईने में ख़ुद को फिर कई बार
उस की नज़रों से मैं ने देखा
संदल से चमक रहा था माथा
चंदन से बदन महक रहा था
होंटों पे बहुत शरीर लाली
गालों पे गुलाल खेलता था
बालों में पिरोए इतने मोती
तारों का गुमान हो रहा था
अफ़्शाँ की लकीर माँग में थी
काजल आँखों में हँस रहा था
कानों में मचल रही थी बाली
बाँहों से लिपट रहा था गजरा
और सारे बदन से फूटता था
उस के लिए गीत जो लिखा था!
हाथों में लिए दिए की थाली
उस के क़दमों में जा के बैठी
आई थी कि आरती उतारूँ
सारे जीवन को दान कर दूँ!
देखा मिरे देवता ने मुझ को
ब'अद इस के ज़रा सा मुस्कुराया
फिर मेरे सुनहरे थाल पर हाथ
रक्खा भी तो इक दिया उठाया
और मेरी तमाम ज़िंदगी से
माँगी भी तो एक शाम माँगी

ख़ुद से मिलने की फ़ुर्सत किसे थी : परवीन शाकिर

अपनी पिंदार की किर्चियाँ
चुन सकूँगी
शिकस्ता उड़ानों के टूटे हुए पर समेटूँगी
तुझ को बदन की इजाज़त से रुख़्सत करूँगी
कभी अपने बारे में इतनी ख़बर ही न रक्खी थी
वर्ना बिछड़ने की ये रस्म कब की अदा हो चुकी होती
मिरा हौसला
अपने दिल पर बहुत क़ब्ल ही मुन्कशिफ़ हो गया होता
लेकिन यहाँ
ख़ुद से मिलने की फ़ुर्सत किसे थी!

ताज-महल : परवीन शाकिर

संग-ए-मरमर की ख़ुनुक बाँहों में
हुस्न-ए-ख़्वाबीदा के आगे मिरी आँखें शल हैं
गुंग सदियों के तनाज़ुर में कोई बोलता है
वक़्त जज़्बे के तराज़ू पे ज़र-ओ-सीम-ओ-जवाहिर की तड़प तौलता है!
हर नए चाँद पे पत्थर वही सच कहते हैं
उसी लम्हे से दमक उठते में उन के चेहरे
जिस की लौ उम्र गए इक दिल-ए-शब-ज़ाद को महताब बना आई थी!
उसी महताब की इक नर्म किरन
साँचा-ए-संग में ढल पाई तो
इश्क़ रंग-ए-अबदिय्यत से सर-अफ़राज़ हुआ
क्या अजब नींद है
जिस को छू कर
जो भी आता है खुली आँख लिए आता है
सो चुके ख़्वाब-ए-अबद देखने वाले कब के
और ज़माना है कि उस ख़्वाब की ताबीर लिए जाग रहा है अब तक!

बुलावा : परवीन शाकिर

मैं ने सारी उम्र
किसी मंदिर में क़दम नहीं रक्खा
लेकिन जब से
तेरी दुआ में
मेरा नाम शरीक हुआ है
तेरे होंटों की जुम्बिश पर
मेरे अंदर की दासी के उजले तन में
घंटियाँ बजती रहती हैं!

पज़ीराई : परवीन शाकिर

अभी मैं ने दहलीज़ पर पाँव रक्खा ही था कि
किसी ने मिरे सर पे फूलों भरा थाल उल्टा दिया
मेरे बालों पे आँखों पे पलकों पे, होंटों पे
माथे पे, रुख़्सार पर
फूल ही फूल थे
दो बहुत मुस्कुराते हुए होंट
मेरे बदन पर मोहब्बत की गुलनार मोहरों को यूँ सब्त करते
चले जा रहे थे
कि जैसे अबद तक
मिरी एक इक पोर का इंतिसाब
अपनी ज़ेबाई के नाम ले कर रहेंगे
मुझे अपने अंदर समो कर रहेंगे!

गए जनम की सदा : परवीन शाकिर

वो एक लड़की
कि जिस से शायद मैं एक पल भी नहीं मिली हूँ
मैं उस के चेहरे को जानती हूँ
कि उस का चेहरा
तुम्हारी नज़्मों तुम्हारी गीतों की चिलमनों से उभर रहा है
यक़ीन जानो
मुझे ये चेहरा तुम्हारे अपने वजूद से भी अज़ीज़-तर है
कि उस की आँखों में
चाहतों के वही समुंदर छुपे हैं
जो मेरी अपनी आँखों में मौजज़न हैं
वो तुम को इक देवता बना कर मिरी तरह पूजती रही है
उस एक लड़की का जिस्म
ख़ुद मेरा ही बदन है
वो एक लड़की
जो मेरे अपने गए जनम की मधुर सदा है

एक मंज़र : परवीन शाकिर

कच्चा सा इक मकाँ कहीं आबादियों से दूर
छोटा सा एक हुज्रा फ़राज़-ए-मकान पर
सब्ज़े से झाँकती हुई खपरेल वाली छत
दीवार-ए-चोब पर कोई मौसम की सब्ज़ बेल
उतरी हुई पहाड़ पे बरसात की वो रात
कमरे में लालटैन की हल्की सी रौशनी
वादी में घूमता हुआ बारिश का जल-तरंग
साँसों में गूँजता हुआ इक अन-कही का भेद!

सलाम : परवीन शाकिर

गरचे लिखी हुई थी शहादत इमाम की
लेकिन मेरे हुसैन ने हुज्जत तमाम की
ज़ैनब की बे-रिदाई ने सर मेरा ढक दिया
आग़ाज़-ए-सुब्ह-ए-नौ हुई वो शाम शाम की
इक ख़्वाब-ए-ख़ास चश्म-ए-मोहम्मद में था छुपा
ता'बीर नूर-ए-ऐन-ए-मोहम्मद ने आम की
बच्चों की प्यास मालिक-ए-कौसर पे शाक़ थी
साक़ी को वर्ना मय की ज़रूरत न जाम की
हुर सा नसीब बादशहों को नहीं नसीब
आक़ा से मिल रही थी गवाही ग़ुलाम की
दरिया पे तिश्ना-लब हैं पे सहरा में शाद-काम
दुनिया अजब है उन के सफ़र और क़याम की
दे कर रज़ा जो चेहरा-ए-शब्बीर ज़र्द है
थी इल्तिजा-ए-जंग ये किस लाला-फ़ाम की

कंगन बेले का : परवीन शाकिर

उस ने मेरे हाथ में बाँधा
उजला कंगन बेले का
पहले प्यार से थामी कलाई
बा'द इस के हौले हौले पहनाया
गहना फूलों का
फिर झुक कर हाथ को चूम लिया
फूल तो आख़िर फूल ही थे
मुरझा ही गए
लेकिन मेरी रातें उन की ख़ुशबू से अब तक रौशन हैं
बाँहों पर वो लम्स अभी तक ताज़ा है
शाख़-ए-सनोबर पर इक चाँद दमकता है
फूल का गहना
प्रेम का कंगन
प्यार का बंधन
अब तक मेरी याद के हाथ से लिपटा हुआ है

नहीं मेरा आँचल मैला है : परवीन शाकिर

नहीं मेरा आँचल मेला है
और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं
किसी हवा ने इन को अब तक छूने की जुरअत नहीं की है
तेरी उजली पेशानी पर
गए दिनों की कोई घड़ी
पछतावा बन के नहीं फूटी
और मेरे माथे की सियाही
तुझ से आँख मिला कर बात नहीं कर सकती
अच्छे लड़के
मुझे न ऐसे देख
अपने सारे जुगनू सारे फूल
सँभाल के रख ले
फटे हुए आँचल से फूल गिर जाते हैं
और जुगनू
पहला मौक़ा पाते ही उड़ जाते हैं
चाहे ओढ़नी से बाहर की धूप कितनी ही कड़ी हो!

मसअला : परवीन शाकिर

''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा ने
इक महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी में
जब नज़्म सुनाते मुझ को देखा
कुछ सोच के दिल में मुस्कुराई
जब मेज़ पर हम मिले तो उस ने
बढ़ कर मिरे हाथ ऐसे थामे
जैसे मुझे खोजती हो कब से
फिर मुझ से कहा कि आज, 'परवीन'!
जब शेर सुनाते तुम को देखा
मैं ख़ुद को बहुत ही याद आई
वो वक़्त कि जब तुम्हारी सूरत
मैं भी यूँही शेर कह रही थी
लिखती थी इसी तरह की नज़्में
पर अब तो वो सारी नज़्में ग़ज़लें
गुज़रे हुए ख़्वाब की हैं बातें!
मैं सब को डिसओन कर चुकी हूँ!
''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा के
चम्बेली से नर्म हाथ थामे
''ख़ुश्बू'' की सफ़ीर सोचती थी
दर-पेश हवाओं के सफ़र में
पल पल की रफ़ीक़-ए-राह मेरे
अंदर की ये सादा-लौह 'ऐलिस'
हैरत की जमील वादियों से
वहशत के मुहीब जंगलों में
आएगी तो उस का फूल-लहजा
क्या जब भी सबा-नफ़स रहेगा!?
वो ख़ुद को डिसओन कर सकेगी!?

नाटक : परवीन शाकिर

रुत बदली तो भंवरो ने तितली से कहा
आज से तुम आज़ाद हो
परवाजों की सारी सम्तें तुम्हारे नाम हुईं
जाओ
जंगल की मग़रूर हवा के साथ उड़ो
बादल के हमराह सितारे छू आओ
ख़ुशबू के बाज़ू थामो और रक़्स करो
रक़्स करो
कि इस मौसम के सूरज की किरनों का ताज तुम्हारे सर है
लहराओ
कि इन रातों का चाँद तुम्हारी पेशानी पर अपने हाथ से दुआ लिखेगा
गाओ
इन लम्हों की हवाएँ तुम को तुम्हारे गीतों पर संगीत देंगी
पत्ते कड़े बजाएँगे
और फूलों के हाथों में दफ़ होगा
तितली मा'सूमाना हैरत से सरशार
सियह शाख़ों के हल्क़े से निकली
सदियों के जकड़े हुए रेशमी पर फैलाए और उड़ने लगी
खुली फ़ज़ा का ज़ाइक़ा चक्खा
नर्म हवा का गीत सुना
अन-देखे कोहसारों की क़ामत नापी
रौशनियों का लम्स पिया
ख़ुशबू के हर रंग को छू कर देखा
लेकिन रंग हवा और ख़ुशबू का विज्दान अधूरा था
कि रक़्स का मौसम ठहर गया
रुत बदली
और सूरज की किरनों का ताज पिघलने लगा
चाँद के हाथ दुआ के हर्फ़ ही भूल गए
हवा के लब बर्फ़ीले सुमों में नीले पड़ कर अपनी सदाएँ खो बैठे
पत्तों की बाँहों के सर बे-रंग हुए
और तन्हा रह गए फूलों के हाथ
बर्फ़ की लहर के हाथों तितली को लौट आने का पैग़ाम गया
भौंरे शबनम की ज़ंजीरें ले कर दौड़े
और बेचैन परों में अन-चखी परवाजों की आशुफ़्ता प्यास जला दी
अपने काले नाख़ूनों से
तितली के पर नोच के बोले
अहमक़ लड़की
घर वापस आ जाओ
नाटक ख़त्म हुआ
ख़्वातीन का आलमी साल

नए साल की पहली नज़्म : परवीन शाकिर

अंदेशों के दरवाज़ों पर
कोई निशान लगाता है
और रातों रात तमाम घरों पर
वही सियाही फिर जाती है
दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है
और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है
मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत
तारीकी की चादर ओढ़े
रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं
घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं
हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से
अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं
अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए
अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है
सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है : परवीन शाकिर

मुझे मालूम था
ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है
मेरी मातमी चादर
नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी
जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में
यूँही आशुफ़्ता रहेगी
और उदासी की यही सूरत रहेगी
मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ
यूँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी
और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा
मगर ये कौन है
जो यूँ मुझे बाहर बुलाता है
बड़ी नर्मी से कहता है
कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ
ज़रा बाहर तो देखो
दूर तक सब्ज़ा बिछा है
और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं
मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम
सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है
दरख़्तों में छुपी नद्दी
बहुत धीमे सुरों में गुनगुनाती है
चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में
नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है
परिंद-ए-ख़ुश-गुलू
शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है
घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़
सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर
मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है
कोई आता है
आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से
मेरे शानों से हटा कर
सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है
मैं खुल कर साँस लेती हूँ
मिरे अंदर
कोई पैरों में घुंघरू बाँधता है
रक़्स का आग़ाज़ करता है
मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ
जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं
कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है
फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है
हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है

ज़ूद-पशीमान : परवीन शाकिर

गहरी भूरी आँखों वाला इक शहज़ादा
दूर देस से
चमकीले मुश्की घोड़े पर हवा से बातें करता
जिगर जिगर करती तलवार से जंगल काटता आया
दरवाज़ों से लिपटी बेलें परे हटाता
जंगल की बाँहों में जकड़े महल के हाथ छुड़ाता
जब अंदर आया तो देखा
शहज़ादी के जिस्म की सारी सूइयाँ ज़ंग-आलूदा थीं
रस्ता देखने वाली आँखें
सारे शिकवे भुला चुकी थीं!

जिज़्या : परवीन शाकिर

गुड़िया सी ये लड़की
जिस की उजली हँसी से
मेरा आँगन दमक रहा है
कल जब सात समुंदर पार चली जाएगी
और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर
पूरे चाँद की रौशनी बन कर बिखरेगी
हम सब उस को याद करेंगे
और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से
सारी उम्र
इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे
जिस का अस्ल भी हम पर क़र्ज़ नहीं था!

तक़य्या : परवीन शाकिर

सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी
कि शहर के सब नजीब अफ़राद
अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें
वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में
उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे
सुना है बातिल क़रार पाए
वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे
वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी
बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र
रूह के अहद-नामे तक फ़स्ख़ माने जाएँ
ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है
मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में
अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं
कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है
सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे
उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे
तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना
और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना
कि आज से जब
हज़ार-हा साल बा'द हम भी
किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ
तो उस ज़माने के लोग
हम को
कहीं बहुत कम-नसब न जानें

शुगून : परवीन शाकिर

सात सुहागनें और मेरी पेशानी!
संदल की तहरीर
भला पत्थर के लिखे को क्या धोएगी
बस इतना है
जज़्बे की पूरी नेकी से
सब ने अपने अपने ख़ुदा का इस्म मुझे दे डाला है
और ये सुनने में आया है
शाम ढले जंगल के सफ़र में
इस्म बहुत काम आते हैं!

फ़रोग़ फ़रख़-ज़ाद के लिए एक नज़्म : परवीन शाकिर

मुसाहिब-ए-शाह से कहो कि
फ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैं
कि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई है
हुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र के
तमाम जल्लाद मुंतज़िर हैं
कि कौन सी हद जनाब जारी करें
तो तामील-ए-बंदगी हो
कहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल है
कहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिए
कहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगा
कहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजे
कहाँ बटेगी लुआन की छूट
और कहाँ पर
रज्म के अहकाम जारी होंगे
कहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथ
संगीन में पिरोने का हुक्म होगा
कहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों को
किसी तरह शक का फ़ाएदा हो
कहाँ पे मासूम दार पर खींचना पड़ेगा
हुज़ूर अहकाम जो भी जारी करेंगे
फ़क़त इल्तिजा ये होगी
कि अपने इरशाद-ए-आलिया को
ज़बानी रखें
वगरना
कानूनी उलझनें हैं!

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