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हरिवंशराय बच्चन के गीत : Harivansh Rai Bachchan Geet

 हरिवंश राय बच्चन (1907–2003) हिंदी के प्रसिद्ध कवि और लेखक थे। उनका जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के पास बाबूपट्टी गाँव में हुआ था। उनका पूरा नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव था और ‘बच्चन’ उनका उपनाम था। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मधुशाला है, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य में विशेष पहचान दिलाई। उन्होंने कविता, गीत और साहित्य की कई विधाओं में रचनाएँ लिखीं। उन्हें 1976 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनका निधन 18 जनवरी 2003 को मुंबई में हुआ।

जो बीत गई

हरिवंशराय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाई फिर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

हरिवंशराय बच्चन

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
वृक्ष हों भलें खड़े,
हों घने, हों बड़ें,
एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
यह महान दृश्य है—
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

मुझे पुकार लो

हरिवंशराय बच्चन

इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

एक

ज़मीन है न बोलती
न आसमान बोलता, 
जहान देखकर मुझे 
नहीं ज़बान खोलता, 

नहीं जगह कहीं जहाँ
न अजनबी गिना गया, 

कहाँ-कहाँ न फिर चुका 
दिमाग़-दिल टटोलता, 

कहाँ मनुष्य है कि जो 
उमीद छोड़कर जिया, 
इसीलिए अड़ा रहा 
कि तुम मुझे पुकार लो!

इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

दो

तिमिर-समुद्र कर सकी 
न पार नेत्र की तरी, 
विनष्ट स्वप्न से लदी, 
विषाद याद से भरी, 

न कूल भूमि का मिला, 
न कोर भोर की मिली, 

न कट सकी, न घट सकी
विरह-घिरी विभावरी, 

कहाँ मनुष्य है जिसे 
कमी ख़ली न प्यार की, 
इसीलिए खड़ा रहा 
कि तुम मुझे दुलार लो!

इसीलिए खड़ा रहा 
कि तुम मुझे पुकार लो!

तीन

उजाड़ से लगा चुका 
उमीद मैं बहार की, 
निदाघ से उमीद की, 
बसंत के बयार की, 

मरुस्थली मरीचिका 
सुधामयी मुझे लगी, 

अंगार से लगा चुका
उमीद मैं तुषार की, 

कहाँ मनुष्य है जिसे 
न भूल शूल-सी गड़ी, 
इसीलिए खड़ा रहा
कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ

हरिवंशराय बच्चन

न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ,
मगर यामिनी बीच में ढल रही है।
दिखाई पड़े पूर्व में जो सितारे,
वही आ गए ठीक ऊपर हमारे,
क्षितिज पश्चिमी है बुलाता उन्हें अब,
न रोके रुकेंगे हमारे-तुम्हारे।
न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ,
मगर यामिनी बीच में ढल रही है।
उधर तुम, इधर मैं, खड़ी बीच दुनिया,
हरे राम! कितनी कड़ी बीच दुनिया,
किए पार मैंने सहज ही मरुस्थल,
सहज ही दिए चीर मैदान-जंगल,
मगर माप में चार बीते बमुश्किल,
यही एक मंज़िल मुझे खल रही है।
न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ,
मगर यामिनी बीच में ढल रही है।
नहीं आँख की राह रोकी किसी ने,
तुम्हें देखते रात आधी गई है,
ध्वनित कंठ में रागिनी अब नई है,
नहीं प्यार की आह रोकी किसी ने,
बढ़े दीप कब के, बुझे चाँद-तारे,
मगर आग मेरी अभी जल रही है।
न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ,
मगर यामिनी बीच में ढल रही है।
मनाकर बहुत एक लट मैं तुम्हारी
लपेटे हुए पोर पर तर्जनी के
पड़ा हूँ, बहुत ख़ुश, कि इन भाँवरों में
मिले फ़ॉर्मूले मुझे ज़िंदगी के,
भँवर में पड़ा-सा हृदय घूमता है,
बदन पर लहर पर लहर चल रही है।
न तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ,
मगर यामिनी बीच में ढल रही है।

आज मुझसे दूर दुनिया

हरिवंशराय बच्चन

आज मुझसे दूर दुनिया!
भावनाओं से विनिर्मित,
कल्पनाओं से सुसज्जित,
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
‘बात पिछली भूल जाओ,
दूसरी नगरी बसाओ’—
प्रेमियों के प्रति रही है, हाय, कितनी क्रूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
वह समझ मुझको न पाती,
और मेरा दिल जलाती,
है चिता की राख कर मैं माँगती सिंदूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!

मैं जीवन में कुछ कर न सका

हरिवंशराय बच्चन

मैं जीवन में कुछ कर न सका!
जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था,
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ कर न सका!
अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ कर न सका!
बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ कर न सका!

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी

हरिवंशराय बच्चन

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
मैं दु:खी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनों ने निभाई,
किंतु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूँदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरों से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दु:ख नहीं बँटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से है मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दु:खी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

साथी, सो न, कर कुछ बात

हरिवंशराय बच्चन

साथी, सो न, कर कुछ बात!
बोलते उडुगण परस्पर,
तरु दलों में मंद ‘मरमर’,
बात करतीं सरि-लहरियाँ कूल से जल-स्नात!
साथी, सो न, कर कुछ बात!
बात करते सो गया तू,
स्वप्न में फिर खो गया तू,
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात!
साथी, सो न, कर कुछ बात!
पूर्ण कर दे वह कहानी,
जो शुरू की थी सुनानी,
आदि जिसका हर निशा में, अंत चिर अज्ञात!
साथी, सो न, कर कुछ बात!

आओ हम पथ से हट जाएँ

हरिवंशराय बच्चन

आओ हम पथ से हट जाएँ!
युवती और युवक मदमाते
उत्सव आज मानने आते,
लिए नयन में स्वप्न, वचन में हर्ष, हृदय में अभिलाषाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!
इनकी इन मधुमय घड़ियों में,
हास-लास की फुलझड़ियों में,
हम न अमंगल शब्द निकालें, हम न अमंगल अश्रु बहाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!
यदि इनका सुख सपना टूटे,
काल इन्हें भी हम-सा लूटे,
धैर्य बँधाएँ इनके उर को हम पथिकों की किरण कथाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!

एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!)

हरिवंशराय बच्चन

हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं—
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे—
यह ध्यान परों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्लता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!)

हरिवंशराय बच्चन

हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं—
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे—
यह ध्यान परों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्लता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

कवि की वासना

हरिवंशराय बच्चन

कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

एक

सृष्टि के प्रारंभ में 
मैंने उषा के गाल चूमे, 
बाल रवि के भाग्यवाले 
दीप्त भाल विशाल चूमे

प्रथम संध्या के अरुण दृग
चूमकर मैंने सुलाए, 

तारिका-कलि से सुसज्जित 
नव निशा के बाल चूमे, 

वायु के रसमय अधर 
पहले सके छू होंठ मेरे, 
मृत्तिका की पुतलियों से 
आज क्या अभिसार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

दो

विगत-बाल्य वसुंधरा के 
उच्च तुंग-उरोज उभरे, 

तरु उगे हरिताभ पट धर 
काम के ध्वज मत्त फहरे, 

चपल उच्छृंखल करों न 
जो किया उत्पात उस दिन, 

है हथेली पर लिखा वह, 
पढ़ भले ही विश्व हहरे;

प्यास वारिधि से बुझाकर 
भी रहा अतृप्त हूँ मैं, 
कामिनी के कुच-कलश से 
आज कैसा प्यार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!

तीन

इंद्रधनु पर शीश धरकर 
बादलों की सेज सुख पर 
सो चुका हूँ नींद भर मैं 
चंचला को बाहु में भर, 

दीप रवि-शशि-तारकों ने 
बाहरी कुछ केलि देखी, 

देख, पर, पाया न कोई 
स्वप्न वे सुकुमार सुंदर 

जो पलक पर कर निछावर 
थी गई मधु यामिनी वह;
यह समाधि बनी हुई है, 
यह न शयनागार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

चार

आज मिट्टी से घिरा हूँ 
पर उमंगें हैं पुरानी, 
सोमरस जो पी चुका है 
आज उसके हाथ पानी, 
होंठ प्यालों पर झुके तो 
थे विवश इसके लिए वे, 

प्यास का व्रत धार बैठा 
आज है मन, किंतु मानी;

मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से 
बँधा, जग, जान ले तू, 
तन विकृत हो जाए लेकिन 
मन सदा अविकार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!

पाँच

निष्परिश्रम छोड़ जिनको 
मोह लेता विश्व भर को, 
मानवों को, सुर-असुर को, 
वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को, 

भंग कर देता तपस्या 
सिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों की, 

वे सुमन के बाण मैंने
ही दिए थे पंचशर को;
शक्ति रख कुछ पास अपने
ही दिया यह दान मैंने, 
जीत पाएगा इन्हीं से 
आज क्या मन यार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

छह

प्राण प्राणों से सकें मिल 
किस तरह, दीवार है तन, 
काल है घड़ियाँ न गिनता, 
बेड़ियों का शब्द झन-झन 

वेद-लोकाचार प्रहरी 
ताकते हर चाल मेरी, 

बद्ध इस वातावरण में 
क्या करें अभिलाष यौवन!

अल्पतम इच्छा यहाँ, 
मेरी बनी बंदी पड़ी है, 
विश्व क्रीड़ास्थल नहीं रे
विश्व कारागार मेरा!

कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

सात

थी तृषा जब शीत जल की
खा लिए अंगार मैंने, 
चीथड़ों से उस दिवस था
कर लिया शृंगार मैंने 

राजसी पट पहनने की, 
जब हुई इच्छा प्रबल थी, 

चाह-संचय में लुटाया 
था भरा भंडार मैंने;

वासना जब तीव्रतम थी 
बन गया था संयमी मैं, 
है रही मेरी क्षुधा ही 
सर्वदा आहार मेरा!

कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

आठ

कल छिड़ी, होगी ख़तम कल 
प्रेम की मेरी कहानी, 
कौन हूँ मैं, जो रहेगी 
विश्व में मेरी निशानी?

क्या किया मैंने नहीं जो 
कर चुका संसार अब तक?

वृद्ध जग को क्यों अखरती 
है क्षणिक मेरी जवानी?

मैं छिपाना जानता तो 
जग मुझे साधु समझता, 
शत्रु मेरा बन गया है 
छल-रहित व्यवहार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

इसकी मुझको लाज नहीं है

हरिवंशराय बच्चन

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है।
जिसने कलियों के अधरों में
रस रक्खा पहले शरमाए,
जिसने अलियों के पंखों में
प्यास भरी वह सिर लटकाए,
आँख करे वह नीची जिसने
यौवन का उन्माद उभारा,
मैं सुख पर, सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है।
मन में सावन-भादों बरसे,
जीभ करे, पर, पानी-पानी!
चलती-फलती है दुनिया में
बहुधा ऐसी बेईमानी,
पूर्वज मेरे, किंतु, हृदय की
सच्चाई पर मिटते आए,
मधुवन भोगे, मरु उपदेशे मेरे वंश रिवाज़ नहीं है।
मैं सुख पर, सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है।
चला सफ़र पर जब तक मैंने
पथ पूछा अपने अनुभव से,
अपनी एक भूल से सीखा
ज़्यादा, औरों के सच सौ से,
मैं बोला जो मेरी नाड़ी
में डोला, जो रग में घूमा,
मेरी नाड़ी आज किताबी नक़्शों की मोहताज नहीं है।
मैं सुख पर, सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है।
अधरामृत की उस तह तक मैं
पहुँचा विष को भी चख आया,
और गया सुख को पिछुआता
पीर जहाँ वह बनकर छाया,
मृत्यु गोद में जीवन अपनी
अंतिम सीमा पर लेटा था,
राग जहाँ पर, तीव्र अधिकतम है, उसमें आवाज़ नहीं है।
मैं सुख पर, सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नहीं है।

आज मुझसे बोल, बादल

हरिवंशराय बच्चन

आज मुझसे बोल, बादल!
तम-भरा तू, तम-भरा मैं,
ग़म-भरा तू, ग़म-भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!
आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!
भेद यह मत देख दो पल—
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूँद है अनमोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

तुम्हारे नील झील-से नैन

हरिवंशराय बच्चन

तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश।
तुम्हारे तन का रेखाकार
वही कमनीय, कलामय हाथ
कि जिसने रुचिर तुम्हारा देश
रचा गिरि-ताल-माल के साथ,
करों में लतरों का लचकाव,
करतलों में फूलों का वास,
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश।
उधर झुकती अरुनारी साँझ,
इधर उठता पूनो का चाँद,
सरों, शृंगों, झरनों पर फूट
पड़ा है किरनों का उन्माद,
तुम्हें अपनी बाँहों में देख
नहीं कर पाता मैं अनुमान,
प्रकृति में तुम बिंबित चहुँ ओर
कि तुममें बिंबित प्रकृति अशेष।
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर झर्झर-से लहरे केश।
जगत है पाने को बेताब
नारि के मन की गहरी थाह—
किए थी चिंतित औ’ बेचैन
मुझे भी कुछ दिन ऐसी चाह—
मगर उसके तन का भी भेद
सका है कोई अब तक जान!
मुझे है अद्भुत एक रहस्य
तुम्हारी हर मुद्रा, हर वेश।
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश।
कहा मैंने, मुझको इस ओर
कहाँ फिर लाती है तक़दीर,
कहाँ तुम आती हो उस छोर
जहाँ है गंग-जमुन का तीर;
विहंगम बोला, युग के बाद
भाग से मिलती है अभिलाष;
और... अब उचित यहीं दूँ छोड़
कल्पना के ऊपर अवशेष।
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश।
मुझे यह मिट्टी अपना जान
किसी दिन कर लेगी लयमान,
तुम्हें भी कलि-कुसुमों के बीच
न कोई पाएगा पहचान,
मगर तब भी यह मेरा छंद
कि जिसमें एक हुआ है अंग
तुम्हारा औ’ मेरा अनुराग
रहेगा गाता मेरा देश।
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश।

तुम तूफ़ान समझ पाओगे

हरिवंशराय बच्चन

तुम तूफ़ान समझ पाओगे?
गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता ‘हरहर’—इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?
गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?
तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को! हटो विहंगम, उड़ जाओगे!
तुम तूफ़ान समझ पाओगे?

जुगनू

हरिवंशराय बच्चन

जुगनू

एक

अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

उसी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चाँद औ’ तारे, 
उठा तूफ़ान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे;

मगर इस रात में भी लौ
लगाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक 
जलाए कौन बैठा है?

दो

गगन में गर्व से उठ-उठ, 
गगन में गर्व से घिर-घिर, 
गरज कहती घटाएँ हैं, 
नहीं होगा उजाला फिर;
मगर चिर ज्योति में निष्ठा
जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक 
जलाए कौन बैठा है?

तीन

तिमिर के राज का ऐसा 
कठिन आतंक छाया है, 
उठा जो शीश सकते थे 
उन्होंने सिर झुकाया है;

मगर विद्रोह की ज्वाला
जलाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक 
जलाए कौन बैठा है?

चार

प्रलय का सब समाँ बाँधे 
प्रलय की रात है छाई, 
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आई;

मगर निर्माण में आशा 
दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक 
जलाए कौन बैठा है?

पाँच

प्रभंजन, मेघ, दामिनि ने 
न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा, 
धरा के और नभ के बीच 
कुछ साबित नहीं छोड़ा;

मगर विश्वास को अपने 
बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए 
कौन बैठा है?

छह

प्रलय की रात में सोचे 
प्रणय की बात क्या कोई, 
मगर पड़ प्रेम बंधन में 
समझ किसने नहीं खोई,

किसी के पंथ में पलकें
बिछाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक 
जलाए कौन बैठा है?

अग्नि देश से आता हूँ मैं

हरिवंशराय बच्चन

अग्नि देश से आता हूँ मैं!
झुलस गया तन, झुलस गया मन,
झुलस गया कवि-कोमल जीवन,
किंतु अग्नि वीणा पर अपने दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
स्वर्ण शुद्ध कर लाया जग में,
उसे लुटाता आया मग में,
दीनों का मैं वेश किए, पर दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!
तुमने अपने कर फैलाए,
लेकिन देर बड़ी कर आए,
कंचन तो लुटा चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!

चाँदनी फैली गगन में

हरिवंशराय बच्चन

चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।
दिवस में सबके लिए बस एक जग है,
रात में हर एक की दुनिया अलग है,
कल्पना करने लगी अब राह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।
भूमि का उर तप्त करता चंद्र शीतल,
व्योम की छाती जुड़ाती रश्मि कोमल,
कितुं भरतीं भावनाएँ दाह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।
कुछ अँधेरा, कुछ उजाला, क्या समा है,
कुछ करो, इस चाँदनी में सब क्षमा है,
किंतु बैठा मैं सँजोए आह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।
चाँद निखरा, चंद्रिका निखरी हुई है,
भूमि से आकाश तक बिखरी हुई है,
काश मैं भी यों बिखर सकता भुवन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

कहते हैं, तारे गाते हैं

हरिवंशराय बच्चन

कहते हैं, तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!

आज कितनी वासनामय यामिनी है

हरिवंशराय बच्चन

आज कितनी वासनामय यामिनी है!
दिन गया तो ले गया बातें पुरानी,
याद मुझको अब नहीं रातें पुरानी,
आज ही पहली निशा मनभावनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!
घूँट मधु का है, नहीं झोंका पवन का,
कुछ नहीं मन को पता है आज तन का,
रात मेरे स्वप्न की अनुगामिनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!
यह कली का हास आता है किधर से,
यह कुसुम का श्वास जाता है किधर से,
हर लता-तरु में प्रणय की रागिनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!
दुग्ध-उज्ज्वल मोतियों से युक्त चादर,
जो बिछी नभ के पलंग पर आज उस पर
चाँद से लिपटी लजाती चाँदनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!

लहर सागर का नहीं शृंगार

हरिवंशराय बच्चन

लहर सागर का नहीं शृंगार,
उसकी विकलता है;
अनिल अंबर का नहीं खिलवार,
उसकी विकलता है;
विविध रूपों में हुआ साकार,
रंगों में सुरंजित,
मृत्तिका का यह नहीं संसार,
उसकी विकलता है।
गंध कलिका का नहीं उद्गार,
उसकी विकलता है;
फूल मधुवन का नहीं गलहार,
उसकी विकलता है;
कोकिला का कौन-सा व्यवहार,
ऋतुपति को न भाया?
कूक कोयल की नहीं मनुहार,
उसकी विकलता है।
गान गायक का नहीं व्यापार,
उसकी विकलता है;
राग वीणा की नहीं झंकार,
उसकी विकलता है;
भावनाओं का मधुर आधार
साँसों से विनिर्मित,
गीत कवि-उर का नहीं उपहार,
उसकी विकलता है।

आज हृदय स्वच्छंद नहीं है

हरिवंशराय बच्चन

तुमको छोड़ कहीं जाने को आज हृदय स्वच्छंद नहीं है।
रोमराजि पहले गिन डालूँ
तब तन के बंधन बतलाऊँ
नाम तुम्हारा मन का बंधन
कैसे दोनों को अलगाऊँ,
नित्य बचन की गाँठ जोड़ती
मेरी रसना—मेरी रचना,
तुमको छोड़ कहीं जाने को आज हृदय स्वच्छंद नहीं है।
तुमसे नाता जोड़ अवनि से
ले अंबर पर्यंत तुम्हारा
जो था सब की ओर ललककर
मैंने अपना हाथ पसारा,
नीति-नियम के ऊपर चढ़कर
तुमने ही यह बात कही थी
मेरे कानों में ‘तू कवि है तुझ पर कुछ प्रतिबंध नहीं है।’
तुमको छोड़ कहीं जाने को आज हृदय स्वच्छंद नहीं है।
रूप, रंग, रस, गंध सना तो
मुझसे कोई पाप हुआ क्या,
उस दिन का आदेश तुम्हारा
हाय राम, अभिशाप हुआ क्या
अपने मन को समझ तुम्हारा
ही तो मैंने दुलराया था,
मेरे भाल कलंक तुम्हारे हाथ लगाया चंदन ही है।
तुमको छोड़ कहीं जाने को आज हृदय स्वच्छंद नहीं है।
मेरी दुर्बलता के पल को
याद तुम्हीं करुणाकर आते,
अपनी करुणा के क्षण में तुम
मेरी दुर्बलता बिसराते,
बुद्धि बिचारी गुमसुम, हारी
साफ़ बोलता पर चित मेरा—
मेरे पाप तुम्हारी करुणा में कोई संबंध कहीं है।
तुमको छोड़ कहीं जाने को आज हृदय स्वच्छंद नहीं है।

नया वर्ष

हरिवंशराय बच्चन

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल,
प्रीति नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

यह पपीहे की रटन है

हरिवंशराय बच्चन

यह पपीहे की रटन है!
बादलों की घिर घटाएँ
भूमि की लेतीं बलाएँ,
खोल दिल देतीं दुआएँ—देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की रटन है!
जो बहा दे, नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
वज्र भी बेपीर आया—कब रुका इसका वचन है?
यह पपीहे की रटन है!
यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी, यह वियोगी की लगन है!
यह पपीहे की रटन है!

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