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कविवर श्री सौभाग्यमलजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Saubhagyamalji ke Bhajan -2

धोली हो गई रे काली कामली माथा की थारी धोली हो गई रे काली कामली, सुरज्ञानी चेतो, धोली हो गई रे काली कामली ।।टेर ।। वदन गठीलो कंचन काया, लाल बूँद रंग थारो । हुयो अपूरव फेर फार सब, ढांचो बदल्यो सारो ।।१ ।। नाक कान आँख्या की किरिया सुस्त पड़ गई सारी । काजू और अखरोट चबे नहिं दाँता बिना सुपारी जी ।।२ ।। हालण लागी नाड़ कमर भी झुक कर बणी कवानी । मुंडो देख आरसी सोचो ढल गई कयां जवानी जी ।।३ ।। न्याय नीति ने तजकर छोड़ी भोग संपदा भाई । बात-बात में झूठ कपट छल, कीनी मायाचारी ।।४ ।। बैठ हताई तास चोपड़ा खेल्यो बुला खिलाय । लड़या पराया भोला भाई फूल्या नहीं समाय ।।५ ।। प्रभू भक्ति में रूचि न लीनी नहीं करूणा चितधारी । वीतराग दर्शन नहीं रूचियो उमर खोदई सारी जी ।।६ ।। पुन्य योग `सौभाग्य' मिल्यो है नरकुल उत्तम प्यारो । निजानंद समता रस पील्यो होसी भव निस्तारो ।।७ ।। पर्वराज पर्यूषण आया दस धर्मो की ले माला मिथ्यातम में दबी आत्मनिधि अब तो चेत परख लाला ।।टेर ।। तू अखंड अविनाशी चेतन ज्ञाता दृष्टा सिद्ध समान । रागद्वेष परपरणति कारण स्व सरूप को कर्यो न भान ।। मोहजाल की भूल भुलैया समझ नरक सी है ज्वाला ।।१ ।...

कविवर श्री सौभाग्यमलजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Saubhagyamalji ke Bhajan

भावों में सरलता भावों में सरलता रहती है, जहाँ प्रेम की सरिता बहती है । हम उस धर्म के पालक हैं, जहाँ सत्य अहिंसा रहती है ।। जो राग में मूँछे तनते हैं, जड़ भोगों में रीझ मचलते हैं । वे भूलते हैं निज को भाई, जो पाप के सांचे ढलते हैं ।। पुचकार उन्हें माँ जिनवाणी, जहाँ ज्ञान कथायें कहती हैं ।।हम उस. ।।१ ।। जो पर के प्राण दुखाते हैं, वह आप सताये जाते हैं । अधिकारी वे हैं शिव सुख के, जो आतम ध्यान लगाते हैं ।। `सौभाग्य' सफल कर नर जीवन, यह आयु ढलती रहती है ।।हम उस. ।।१ ।। निरखी निरखी मनहर मूरत निरखी निरखी मनहर मूरत तोरी हो जिनन्दा, खोई खोई आतम निधि निज पाई हो जिनन्दा ।।टेर ।। ना समझी से अबलो मैंने पर को अपना मान के, पर को अपना मान के । माया की ममता में डोला, तुमको नहीं पिछान के, तुमको नहीं पिछान के ।। अब भूलों पर रोता यह मन, मोरा हो जिनन्दा ।।१ ।। भोग रोग का घर है मैंने, आज चराचर देखा है, आज चराचर देखा है । आतम धन के आगे जग का झूँठा सारा लेखा है, झूँठा सारा लेखा है । अपने में घुल मिल जाऊँ, वर पावूँ जिनन्दा ।।२ ।। तू भवनाशी मैं भववासी, भव से पार उतरना है, भव से पार उतरना है । शुद्ध स्वरू...

कविवर श्री बुधजनजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Budhjanji ke Bhajan -2

बन्यौ म्हांरै या घरीमैं रंग बन्यौ म्हांरै या घरीमैं रंग ।।बन्यौ. ।।टेक ।। तत्वारथकी चरचा पाई, साधरमी कौ संग ।।१ ।।बन्यौ. ।। श्री जिनचरन बसे उर माहीं, हरष भयौ सब अंग । ऐसी विधि भव भवमैं मिलिज्यौ, धर्मप्रसाद अभंग ।।२ ।।बन्यौ. ।। कींपर करो जी गुमान (राग-सोरठ) कींपर करो जी गुमान, थे तो कै दिनका मिजमान ।।कींपर. ।।टेक ।। आये कहांतैं कहाँ जावोगे, ये उर राखौं ज्ञान ।।१ ।।कींपर. ।। नारायण बलभद्र चक्रवर्ति, नाना रिद्धिनिधान । अपनी-अपनी बारी भुगतिर, पहुँचे परभव थान ।।२ ।।कींपर. ।। झूठ बोलि माया चारीतैं, मति पीड़ो पर प्रान । तन धन दे अपने वश बुधजन, करि उपगार जहान ।।३ ।।कींपर. ।। अब घर आये चेतनराय अब घर आये चेतनराय, सजनी खेलौंगी मैं होरी ।।अब. ।।टेक ।। आरस सोच कानि कुल हारी धरि धीरज बरजोरी ।।१ ।।सजनी. ।। बुरी कुमति बात न बूझै, चितवत है मोओरी । वा गुरुजनक बलि बलि जाऊँ, दूरि करी मति भोरी ।।२ ।।सजनी. ।। निज सुभाव जल हौज भराऊँ, घोरूँ निजरङ्ग रोरी । निज ल्यौं ल्याय शुद्ध पिचकारी, छिरकन निज मति दोरी ।।३ ।।सजनी. ।। गाय रिझाय आप वश करिकै, जावन द्यौं नहि पोरी । बुधजन रचि मचि रहूँ निरंतर, शक्ति अपूरब ...

कविवर श्री बुधजनजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Budhjanji ke Bhajan

और ठौर क्यों हेरत प्यारा, तेरे हि घट में जानन हारा (राग तिताला) और ठौर क्यों हेरत प्यारा, तेरे हि घटमें जाननहारा ।।और. ।।टेक ।। चलन हलन थल वास एकता, जात्यान्तरतैं न्यारा न्यारा ।।१ ।।और. ।। मोह उदय रागी द्वेषी ह्वै, क्रोधादिक का सरजनहारा । भ्रमत फिरत चारौं गति भीतर, जनम मरन भोगत-दुख भारा ।।२ ।।और. ।। गुरु उपदेश लखै पद आपा, तबहिं विभाव करै परिहारा । ह्वै एकाकी बुधजन निश्चल, पावै शिवपुर सुखद अपारा ।।३ ।।और. ।। काल अचानक ही ले जायगा (राग तिताला) काल अचानक ही ले जायगा, गाफिल होकर रहना क्या रे ।।काल. ।।टेक ।। छिन हूँ तोकूं नाहिं बचावै, तौ सुभटनका रखना क्या रे ।।१ ।।काल. ।। रंच स्वाद करिनके काजै, नरकनमें दुख भरना क्या रे । कुलजन पथिकनि के हितकाजै, जगत जाल में परना क्या रे ।।२ ।।काल. ।। इंद्रादिक कोउ नाहिं बचैया, और लोकका शरना क्या रे । निश्चय हुआ जगतमें मरना, कष्ट परै तब डरना क्या रे ।।३ ।।काल. ।। अपना ध्यान करत खिर जावै, तौ करमनिका हरना क्या रे । अब हित करि आरत तजि बुधजन, जन्म जन्ममें जरना क्या रे ।।४ ।।काल. ।। तन देख्या अथिर घिनावना (राग सारंग) तन देख्या अथिर घिनावना ।।तन. ।।टेक ।। ...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -8

नगर में होरी हो रही हो मेरो पिय चेतन घर नाहीं, यह दुख सुन है को।।नगर. ।।१ ।। सोति कुमति राच रह्यो है, किहि विध लाऊं सो।।नगर.।।२ ।। `द्यानत' सुमति कहै जिन स्वामी, तुम कछु शिक्षा दो।।नगर.।।३ ।। पिया बिन कैसे खेलौं होरी आतमराम पिया नहिं आये, मोकों होरी कोरी।।पिया. ।।१ ।। एक बार प्रीतम हम खेलैं, उपशम केसर घोरी।।पिया.।।२ ।। `द्यानत' वह समयो कब पाऊं, सुमति कहै कर जोरी।।पिया.।।३ ।। भली भई यह होरी आई, आये चेतनराय काल बहुत प्रीतम बिन बीते, अब खेलौं मन लाय।।भली. ।।१ ।। सम्यक रंग गुलाल बरतमें, राग विराग सुहाय।।भली.।।२ ।। `द्यानत' सुमति महा सुख पायो, सो वरन्यो नहिं जाय।।भली.।।३ ।। परमगुरु बरसत ज्ञान झरी हरषि हरषि बहु गरजि गरजिकै, मिथ्यातपन हरी ।।परमगुरु. ।। सरधा भूमि सुहावनि लागै, संशय बेल हरी । भविजन मनसरवर भरि उमड़े, समुझि पवन सियरी ।।परमगुरु. ।।१ ।। स्यादवाद नय बिजली चमकै, पर-मत-शिखर परी । चातक मोर साधु श्रावकके, हृदय सुभक्ति भरी ।।परमगुरु. ।।२ ।। जप तप परमानन्द बढ़्यो है, सुखमय नींव धरी । `द्यानत' पावन पावस आयो, थिरता शुद्ध करी ।।परमगुरु. ।।३ ।। री! मेरे घट ज्ञान घन...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -8

नगर में होरी हो रही हो मेरो पिय चेतन घर नाहीं, यह दुख सुन है को।।नगर. ।।१ ।। सोति कुमति राच रह्यो है, किहि विध लाऊं सो।।नगर.।।२ ।। `द्यानत' सुमति कहै जिन स्वामी, तुम कछु शिक्षा दो।।नगर.।।३ ।। पिया बिन कैसे खेलौं होरी आतमराम पिया नहिं आये, मोकों होरी कोरी।।पिया. ।।१ ।। एक बार प्रीतम हम खेलैं, उपशम केसर घोरी।।पिया.।।२ ।। `द्यानत' वह समयो कब पाऊं, सुमति कहै कर जोरी।।पिया.।।३ ।। भली भई यह होरी आई, आये चेतनराय काल बहुत प्रीतम बिन बीते, अब खेलौं मन लाय।।भली. ।।१ ।। सम्यक रंग गुलाल बरतमें, राग विराग सुहाय।।भली.।।२ ।। `द्यानत' सुमति महा सुख पायो, सो वरन्यो नहिं जाय।।भली.।।३ ।। परमगुरु बरसत ज्ञान झरी हरषि हरषि बहु गरजि गरजिकै, मिथ्यातपन हरी ।।परमगुरु. ।। सरधा भूमि सुहावनि लागै, संशय बेल हरी । भविजन मनसरवर भरि उमड़े, समुझि पवन सियरी ।।परमगुरु. ।।१ ।। स्यादवाद नय बिजली चमकै, पर-मत-शिखर परी । चातक मोर साधु श्रावकके, हृदय सुभक्ति भरी ।।परमगुरु. ।।२ ।। जप तप परमानन्द बढ़्यो है, सुखमय नींव धरी । `द्यानत' पावन पावस आयो, थिरता शुद्ध करी ।।परमगुरु. ।।३ ।। री! मेरे घट ज्ञान घन...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -7

हम न किसीके कोई न हमारा, झूठा है जगका ब्योहारा तनसम्बन्धी सब परिवारा, सो तन हमने जाना न्यारा ।।हम. ।। पुन्य उदय सुखका बढ़वारा, पाप उदय दुख होत अपारा । पाप पुन्य दोऊ संसारा, मैं सब देखन जानन हारा ।।१ ।। मैं तिहुँ जग तिहुँ काल अकेला, पर संजोग भया बहु मेला । थिति पूरी करि खिर खिर जांहीं, मेरे हर्ष शोक कछु नाहीं ।।२ ।। राग भावतैं सज्जन मानैं, दोष भावतैं दुर्जन जानैं । राग दोष दोऊ मम नाहीं, `द्यानत' मैं चेतनपदमाहीं ।।३ ।। हमारो कारज कैसें होय 1 हमारो कारज कैसें होय कारण पंच मुकति मारगके, जिनमें के हैं दोय ।।हमारो. ।। हीन संहनन लघु आयूषा, अल्प मनीषा जोय । कच्चे भाव न सच्चे साथी, सब जग देख्यो टोय ।।हमारो. ।।१ ।। इन्द्री पंच सुविषयनि दौरैं, मानैं कह्या न कोय । साधारन चिरकाल वस्यो मैं, धरम बिना फिर सोय ।।हमारो. ।।२ ।। चिन्ता बड़ी न कछु बनि आवै, अब सब चिन्ता खोय । `द्यानत' एक शुद्ध निजपद लखि, आपमें आप समोय ।।हमारो. ।।३ ।। हमारो कारज ऐसे होय 2 हमारो कारज ऐसे होय आतम आतम पर पर जानैं, तीनौं संशय खोय ।।हमारो. ।। अंत समाधिमरन करि तन तजि, होय शक्र सुरलोय । विविध भोग उपभोग भोगवै, धरमतनों...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -6

नहिं ऐसो जनम बारंबार कठिन कठिन लह्यो मनुष भव, विषय भजि मति हार ।।नहिं. ।। पाय चिन्तामन रतन शठ, छिपत उदधिमँझार । अंध हाथ बटेर आई, तजत ताहि गँवार ।।नहिं. ।।१ ।। कबहुँ नरक तिरयंच कबहूँ, कबहूँ सुरगबिहार । जगतमहिं चिरकाल भ्रमियो, दुर्लभ नर अवतार ।।नहिं. ।।२ ।। पाय अमृत पाँय धोवै, कहत सुगुरु पुकार । तजो विषय कषाय `द्यानत', ज्यों लहो भवपार ।।नहिं. ।।३ ।। निज जतन करो गुन-रतननिको, पंचेन्द्रीविषय सत्य कोट खाई करुनामय, वाग विराग छिमा भुवि भर।।निज. ।।१ ।। जीव भूप तन नगर बसै है, तहँ कुतवाल धरमको कर।।निज.।।२ ।। `द्यानत' जब भंडार न जावै, तब सुख पावै साहु अमर।।निज.।।३ ।। परमाथ पंथ सदा पकरौ कै अरचा परमेश्वरजीकी, कै चरचा गुन चित्त धरौ।।परमारथ. ।।१ ।। जप तप संजम दान छिमा करि, परधन परतिय देख डरौ।।परमारथ.।।२ ।। `द्यानत' ज्ञान यही है चोखा, ध्यानसुधामृत पान करौ।।परमारथ.।।३ ।। प्राणी लाल! छांडो मन चपलाई देखो तन्दुलमच्छ जु मनतैं, लहै नरक दुखदाई ।।प्राणी. ।। धारै मौन दया जिनपूजा, काया बहुत तपाई । मनको शल्य गयो नहिं जब लों, करनी सकल गँवाई ।।प्राणी. ।।१ ।। बाहूबलि मुनि ज्ञान न उपज्यो, मनकी ख...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -5

प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं मो मन ध्यावै भगति बढ़ावै, रीझ न कछु मनमाहीं।।प्रभु. ।।१ ।। जनम-जरा-मृत-रोग-वैद्य हो, कहा करैं कहां जाहीं।।प्रभु.।।२ ।। `द्यानत' भव-दुख-आग-माहिंतैं, राख चरण-तरु-छाहीं ।।प्रभु.।।३ ।। प्रभु तुम सुमरन ही में तारे सूअर सिंह नौल वानरने, कहौ कौन व्रत धारे।।प्रभु. ।। सांप जाप करि सुरपद पायो, स्वान श्याल भय जारे । भेक वोक गज अमर कहाये, दुरगति भाव विदारे ।।प्रभु. ।।१ ।। भील चोर मातंग जु गनिका, बहुतनिके दुख टारे । चक्री भरत कहा तप कीनौ, लोकालोक निहारे ।।प्रभु. ।।२ ।। उत्तम मध्यम भेद न कीन्हों, आये शरन उबारे । `द्यानत' राग दोष बिन स्वामी, पाये भाग हमारे ।।प्रभु. ।।३ ।। प्रभु तेरी महिमा किहि मुख गावैं गरभ छमास अगाउ कनक नग सुरपति नगर बनावैं।।प्रभु. ।। क्षीर उदधि जल मेरु सिंहासन, मल मल इन्द्र न्हुलावैं । दीक्षा समय पालकी बैठो, इन्द्र कहार कहावैं ।।प्रभु. ।।१ ।। समोसरन रिध ज्ञान महातम, किहिविधि सरब बतावैं । आपन जातबात कहा शिव, बात सुनैं भवि जावैं ।।प्रभु. ।।२ ।। पंच कल्यानक थानक स्वामी, जे तुम मन वच ध्यावैं । `द्यानत' तिनकी कौन कथा है, हम देखैं सुख पावैं ।...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -4

हम तो कबहुँ न निज घर आये परघर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये ।।हम तो. ।। परपद निजपद मानि मगन ह्वै, परपरनति लपटाये । शुद्ध बुद्ध सुख कन्द मनोहर, चेतन भाव न भाये।।१ ।।हम तो. ।। नर पशु देव नरक निज जान्यो, परजय बुद्धि लहाये । अमल अखण्ड अतुल अविनाशी, आतमगुन नहिं गाये।।२ ।।हम तो. ।। यह बहु भूल भई हमरी फिर, कहा काज पछताये । `दौल' तजौ अजहूँ विषयनको, सतगुरु वचन सुनाये।।३ ।।हम तो. ।। हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय लीन कषाय अधीन विषयके, धरम करै नहिं कोय।।हो भैया. ।। पाप उदय लखि रोवत भोंदू!, पाप तजै नहिं सोय । स्वान-वान ज्यों पाहन सूंघै, सिंह हनै रिपु जोय ।।हो भैया. ।।१ ।। धरम करत सुख दुख अघसेती, जानत हैं सब लोय । कर दीपक लै कूप परत है, दुख पैहै भव दोय ।।हो भैया. ।।२ ।। कुगुरु कुदेव कुधर्म लुभायो, देव धरम गुरु खोय । उलट चाल तजि अब सुलटै जो, `द्यानत' तिरै जग-तोय ।।हो भैया. ।।३ ।। वे कोई निपट अनारी, देख्या आतमराम जिनसों मिलना फेरि बिछुरना, तिनसों कैसी यारी । जिन कामोंमें दुख पावै है, तिनसों प्रीति करारी ।।वे. ।।१ ।। बाहिर चतुर मूढ़ता घरमें, लाज सबै परिहारी । ठगसों नेह वैर साधुनिसो...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -3

भाई कौन कहै घर मेरा जे जे अपना मान रहे थे, तिन सबने निरवेरा।।भाई. ।। प्रात समय नृप मन्दिर ऊपर, नाना शोभा देखी । पहर चढ़े दिन काल चालतैं, ताकी धूल न पेखी ।।भाई. ।।१ ।। राज कलश अभिषेक लच्छमा, पहर चढ़ैं दिन पाई । भई दुपहर चिता तिस चलती, मीतों ठोक जलाई ।।भाई. ।।२ ।। पहर तीसरे नाचैं गावैं, दान बहुत जन दीजे । सांझ भई सब रोवन लागे, हा-हाकार करीजे ।।भाई. ।।३ ।। जो प्यारी नारीको चाहै, नारी नरको चाहै । वे नर और किसीको चाहैं, कामानल तन दाहै ।।भाई. ।।४ ।। जो प्रीतम लखि पुत्र निहोरैं, सो निज सुतको लोरै । सो सुत निज सुतसों हित जोरैं, आवत कहत न ओरैं ।।भाई. ।।५ ।। कोड़ाकोड़ि दरब जो पाया, सागरसीम दुहाई । राज किया मन अब जम आवै, विषकी खिचड़ी खाई ।।भाई. ।।६ ।। तू नित पोखै वह नित सोखै, तू हारै वह जीतै । `द्यानत' जु कछु भजन बन आवै, सोई तेरो मीतै ।।भाई. ।।७ ।। भाई! ब्रह्मज्ञान नहिं जाना रे सब संसार दु:ख सागरमें, जामन मरन कराना रे।।भाई. ।। तीन लोकके सब पुद्गल तैं, निगल निगल उगलाना रे । छर्दि डारके फिर तू चाखै, उपजै तोहि न ग्लाना रे ।।भाई. ।।१ ।। आठ प्रदेश बिन तिहुँ जगमें, रहा न कोइ ठिकाना रे । उपजा मर...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -2

चेतन प्राणी चेतिये हो, अहो भवि प्रानी चेतिये हो, छिन छिन छीजत आव।।टेक ।। घड़ी घड़ी घड़ियाल रटत है, कर निज हित अब दाव ।।चेतन. ।। जो छिन विषय भोगमें खोवत, सो छिन भजि जिन नाम । वातैं नरकादिक दुख पैहै, यातैं सुख अभिराम ।।चेतन. ।।१ ।। विषय भुजंगमके डसे हो, रुले बहुत संसार । जिन्हैं विषय व्यापै नहीं हो, तिनको जीवन सार ।।चेतन. ।।२ ।। चार गतिनिमें दुर्लभ नर भव, नर बिन मुकति न होय । सो तैं पायो भाग उदय हों, विषयनि-सँग मति खोय ।।चेतन. ।।३ ।। तन धन लाज कुटुँब के कारन, मूढ़ करत है पाप । इन ठगियों से ठगायकै हो, पावै बहु दुख आप ।।चेतन. ।।४ ।। जिनको तू अपने कहै हो, सो तो तेरे नाहिं । कै तो तू इनकौं तजै हो, कै ये तुझे तज जाहिं ।।चेतन. ।।५ ।। पलक एककी सुध नहीं हो, सिरपर गाजै काल । तू निचिन्त क्यों बावरे हो, छांडि दे सब भ्रमजाल ।।चेतन. ।।६ ।। भजि भगवन्त महन्तको हो, जीवन-प्राणअधार । जो सुख चाहै आपको हो, `द्यानत' कहै पुकार ।।चेतन. ।।७ ।। चेतन! मान ले बात हमारी पुद्गल जीव जीव पुद्गल नहिं, दोनों की विधि न्यारी।।चेतन. ।।१ ।। चहुँगतिरूप विभाव दशा है, मोखमाहिं अविकारी।।चेतन. ।।२।। `द्यानत' दरवित सि...

कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan

आतम अनुभव कीजै हो जनम जरा अरु मरन नाशकै, अनंतकाल लौं जीजै हो ।।आतम. ।। देव धरम गुरु की सरधा करि, कुगुरु आदि तज दीजै हो । छहौं दरब नव तत्त्व परखकै, चेतन सार गहीजै हो ।।आतम. ।।१ ।। दरब करम नो करम भिन्न करि, सूक्ष्मदृष्टि धरीजै हो । भाव करमतैं भिन्न जानिकै, बुधि विलास न करीजै हो ।।आतम. ।।२ ।। आप आप जानै सो अनुभव, `द्यानत' शिवका दीजै हो । और उपाय वन्यो नहिं वनि है, करै सो दक्ष कहीजै हो ।।आतम. ।।३ ।। आतम अनुभव सार हो, अब जिय सार हो, प्राणी विषय भोगफेणने तोहि काट्यो, मोह लहर चढ़ी भार हो ।।आतम. ।।१ ।। याको मंत्र ज्ञान है भाई, जप तप लहरिउतार हो ।।आतम. ।।२ ।। जनमजरामृत रोग महा ये, तैं दुख सह्यो अपार हो ।।आतम. ।।३ ।। `द्यानत' अनुभव-औषध पीके, अमर होय भव पार हो ।।आतम. ।।४ ।। आतम काज सँवारिये, तजि विषय किलोलैं तुम तो चतुर सुजान हो, क्यों करत अलोलैं।।आतम. ।। सुख दुख आपद सम्पदा, ये कर्म झकोलैं । तुम तो रूप अनूप हो, चैतन्य अमोलैं ।।आतम. ।।१ ।। तन धनादि अपने कहो, यह नहिं तुम तोलैं । तुम राजा तिहुँ लोकके, ये जात निठोलैं ।।आतम. ।।२ ।। चेत चेत `द्यानत' अबै, इमि सद्गुरु बोलैं । आतम निज प...

कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan -3

होरी खेलौंगी, घर आये चिदानंद कन्त (राग धमाल सारंग) होरी खेलौंगी, घर आये चिदानंद कन्त ।।टेक ।। शिशिर मिथ्यात गयो आई अब, कालकी लब्धि बसन्त ।।होरी. ।। पिय सँग खेलनको हम सखियो! तरसीं काल अनन्त । भाग फिरे अब फाग रचानों, आयो बिरहको अन्त ।।१ ।।होरी. ।। सरधा गागरमें रुचिरूपी, केसर घोरि तुरन्त । आनँद नीर उमंग पिचकारी, छोड़ो नीकी भन्त ।।२ ।।होरी. ।। आज वियोग कुमति सौतनिकै, मेरे हरष महन्त । `भूधर' धनि यह दिन दुर्लभ अति, सुमति सखी विहसन्त ।।३ ।।होरी. ।।

कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan -2

अब मेरे समकित सावन आयो (राग मलार) अब मेरे समकित सावन आयो ।।टेक ।। बीति कुरीति मिथ्या मति ग्रीषम, पावस सहज सुहायो ।। अनुभव दामिनि दमकन लागी, सुरति घटा घन छायो । बोलै विमल विवेक पपीहा, सुमति सुहागिनि भायो ।।१ ।।अब मेरे. ।। गुरुधुनि गरज सुनत सुख उपजै, मोर सुमन विहसायो । साधक भाव अंकूर उठे बहु, जित तित हरष सवायो ।।२ ।।अब मेरे. ।। भूल धूल कहिं भूल न सूझत, समरस जल झर लायो । `भूधर' को निकसै अब बाहिर, निज निरचू घर पायो ।।३ ।।अब मेरे. सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया (राग सोरठ) सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया ।।टेक ।। टुक विश्वास किया जिन तेरा, सो मूरख पछताया ।। आपा तनक दिखाय बीज१ ज्यों, मूढमती ललचाया । करि मद अंध धर्म हर लीनौं, अन्त नरक पहुँचाया ।।१ ।।सुनि. ।। केते कंत किये तैं कुलटा, तो भी मन न अघाया । किसही सौं नहिं प्रीति निबाही; वह तजि और लुभाया ।।२ ।।सुनि. ।। `भूधर' छलत फिरै यह सबकों, भौंदू करि जग पाया । जो इस ठगनी कों ठग बैठे, मैं तिनको सिर नाया ।।३ ।।सुनि. ।। अज्ञानी पाप धतूरा न बोय (राग सोरठ) अज्ञानी पाप धतूरा न बोय ।।टेक ।। फल चाखन की बार भरै दृग, मरि है मूरख रोय ।। ...