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जातियों का अनूठापन – बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध | Jaatiyon Kaa Anoothaapan

मनुष्य व्यक्ति के चरित्र का विचार कई एक रीति से हो सकता है। और जिस रीति पर आरूढ़ हो इसकी मीमांसा कीजिए उस ढंग के वैसे विचार होंगे। चाहे मनुष्य के धर्म अथवा सच्चरित्र संबंधी गुणों का विचार कीजिए या चाहे इसी के निकट का कोई प्रश्न उठाकर उस पर कुछ शंका समाधान कीजिए अर्थात् सच्चरित्र से सामाजिक क्या लाभ हैं इन सब बातों के विचार से हमको इस लेख में कुछ प्रयोजन नहीं है किंतु हमको यहाँ उस मुख्य बात से प्रयोजन है जो इस प्रकार की मीमांसा के भी पूर्व विचार में आनी चाहिए और वह यह बात है कि जातीयों का अनूठापन इस देश के इतिहास का फल है।



जब हम किसी एक जाति पर ध्यान देते हैं तो निश्चय उस जाति के आचरणों से कुछ ऐसी बातें लक्षित होती हैं जो ख़ास उसी जाति में पाई जाएँगी और वे बातें ऐसी न होंगी जो मनुष्य मात्र में साधारण रीति पर पाई जाएँ क्योंकि न तो कोई जाति इतनी भली है कि उसमें कोई बुरे होंगे ही नहीं। न देश का देश इतना बुरा हो सकता है कि उस जाति में एक भी भला न हो। इसलिए उन बातों को खोजना चाहिए जो किसी जाति का एक विशेष धर्म है और इसकी मीमांसा हम दार्शनिक रीति पर करते हैं। अर्थात् जब कार्य समझ में नहीं आता तब यह चिंता मन में होती है कि इसका कारण ढूँढ़ें और इस संबंध में कारण की खोज करने पर उस जाति या देश के पूर्व इतिहास से बढ़कर और क्या सहारा हो सकता है। अब पहले इस बात का ज्ञान स्पष्ट रीति पर होना चाहिए कि किसी एक काल में जो हम किसी जाति का कुछ अनूठापन पाते हैं वह निरा आकस्मिक नहीं है क्योंकि यदि आकस्मिक मान लिया जाए तो बस विचार का अंत हो गया और कारण का समझना तो दूर रहा तज्जनित जो कार्य है वह भी स्पष्ट रीति से मन में न आवेगा सुतराम ऐसी बातों का कोई आकस्मिक परिणाम भी हो सकता है यह कदापि न मानना चाहिए। इससे बस निश्चित हुआ कि जातीयों का अनूठापन तैयार करने में थोड़े से प्रधान कारक की अत्यंत आवश्यकता है। तो अब खोज इसी बात की है कि विशेष जाति में किसी विशेष प्रकार का अनूठापन आ जाने के लिए कारक क्या है और उनका क्या और कैसे असर होता है।



ऊपर हमने ‘किसी एक काल में’ ऐसे वाक्य का प्रयोग किया है। अब यह प्रश्न उठ सकता है कि अंत को इस रीति पर तय करने की अवधि क्या और कैसे होगी। काल तो इतिहास की सुगमता के लिए सर्वथा एक कल्पित पदार्थ है। किसी एक काल में कोई जाति का अनूठापन उस प्रकार का क्यों है यदि इसका लगाव आप उसी काल के पूर्व के इतिहास से रखते हैं तो हम पूर्व-काल के इतिहास जा दूसरे पूर्व काल के इतिहास से रखना पड़ेगा और इसी तरह यह शृंखला कभी टूटेगी ही नहीं इसलिए इस अनवस्था दोष का निराकरण होगा ही नहीं जब तक कहीं एक स्थल पर ठहर और इसी शृंखला में कहीं खंड कल्पित कर अपने प्रयोजनीय विषय के विचार पर आरूढ़ न हो जाएँगे अर्थात् किसी जाति के इतिहास में कोई ख़ास वख़्त से विचार चलावैं और इस उत्तम रीति को जब हम अपने मतलब पर लगाते हैं तो यह देखते हैं कि जब हमारा प्रश्न ही मनुष्य व्यक्ति का अनूठापन नितांत ऐतिहासिक है तो इसलिए जहाँ इतिहास हमको सहारा न देगा वहाँ निश्चय हम को ठहर जाना पड़ेगा और इसी बात को और स्पष्टतर रीति पर यों कह सकते हैं कि किसी एक जाति को जब से हम इतिहास में देखते हैं तब से हम उसमें वही विभेदक गुण पाते हैं जो मानों उसी जाति का लक्षण है। ऐसी बातों पर ध्यान देने से यह समझ में आता है कि किसी जाति के चरित्र के संबंध में अनूठापन का बीज कोई वस्तु है अर्थात् वे दो चार बातें किसी जाति के बिगड़ी या बनी दशा में आदि से पाई जाती हैं उन्हें आप एक जाति से दूसरी जाति को भिन्न रखने का बीज कहें तो अनुचित न होगा और उस देश के उपरांत के इतिहास का असर इसी बीज को पुष्ट करने में देखा जाता है। अथवा ज्यों-ज्यों वह जाति उन्नति करती जाए कालांतर में यही बात विविध पुष्ट रूपों में देखी जाएगी और कुछ काल के उपरांत प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से जब इन्हीं बीज गुणों में एक प्रकार की पुष्टि आ गई और वह जाति वैसे ही बराबर उन्नति करती गई तो उसी प्रकार की और पुष्टि दिखाई देगी। पर यह भी देखा जाता है कि किसी संयोग से ऐसी विपरीत ऐतिहासिक घटनाएँ हुई हैं जिनसे उन्नति के बदले उस जाति में अवनति और हास की सूरत बँधी तो स्पष्ट है कि उस जाति के गुणों में भी अवनति और हानि की शक्ल दिखाई दे और तब से वहाँ वह जाति अपने उत्कर्ष से ढल जाएगी और अच्छी बातों का होना उसमें बंद हो जाएगा। यहाँ तक हमने सामान्य रीति पर जातीय उन्नति और अवनति के नियम कहे पर ख़ूबी इन नियमों की किसी एक मुख्य जाति पर लगाने से और उनका पूरा-पूरा असर उस जाति पर दिखलाने में है। हम समझते हैं सबसे उत्तम उदाहरण हमको अपनी ही जाति पर लगाने के अतिरिक्त और कहाँ मिलेगा। बहुत आदिकाल से आरंभ कर हम जब से इस जाति को लक्ष्य करते हैं तो उस विभेदक गुण का बीज पाते हैं और इसका नाम मननशीलता रखेंगे। यद्यपि संसार में बहुत से मज़हब हैं जिनमें बड़ा-बड़ा उत्कर्ष किया गया है पर 'मुनि' और 'आश्रम' के जोड़ की कोई बात हम संसार के किसी मज़हब में नहीं पाते। यह बीज गुण जो हमारी जाति को औरों से अलग करता है क्यों ऐसा है इसका उत्तर चाहे हम न दे सकें पर यह तो अवश्य कहेंगे कि जब से इतिहास का लेश भी इस जाति में पाया जाता है तभी से प्राकृतिक कारणों ने इस मननशीलता की जड़ डाल रखी थी। इन प्राकृतिक कारणों से हमारा प्रयोजन यहाँ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों, बड़े लंबे चौड़े मैदानों से है। अथवा आबहवा जो अफ़्रीका देश के समान न अत्यंत उष्ण या तीव्र न लापलैंड सरीखे शीत प्रधान देश के सदृश अत्यंत शीतल वर्ष में बराबर से छः ऋतु का होना, पैदावारी भी थोड़ी मेहनत में बहुत सा पैदा होना इत्यादि से है। और ये ही सब प्राकृतिक गुण ऐसे हैं जिनसे इस जाति के अनूठेपन (National Character) का बीज बोया गया है।



इसी मननशीलता के कारण हम देखते हैं कि केवल मनन करने के जो विषय हैं उनमें यह जाति इतनी उत्कर्ष प्राप्ति किए है कि जिसके जोड़ का गुण संसार भर की किसी जाति में नहीं देखा जाता और यही कारण है कि हम लोगों के यहाँ धर्म बहुत जल्द और बहुत अधिक चमका। जब और- और जाति असभ्यता के अंधकार में पड़ी टटोल रही थीं हमारे वहाँ ऐसे-ऐसे सूक्ष्मानुसूक्ष्म सिद्धांत निकाले गए जिसकी बारीकियाँ यूरोप की समझ में अब आने लगी हैं। पर जहाँ इस मननशीलता में सब गुण हैं वहाँ बहुत से अवगुण भी इससे पैदा हुए। इस सुक्ष्मानुसंधान के पीछे दौड़ने से बहुत सी महोपकारी पदार्थ विद्या संबंधी स्थूल बातें रह गईं। इसी मननशीलता के कारण अकर्मण्यता इनकी नस-नस में घुस गई और कितने प्रकार के विज्ञान और 'साइंस' जिनमें भरपूर उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) का काम पड़ता है उन्हें शांति सहयोगिनी इनकी मननशीलता ने होने ही न दिया। धर्म संबंधी उत्कर्षता निस्संदेह अति उत्तम है किंतु इसके साथ ही यह भी हुआ कि इस धर्म की उत्कर्षता और पारलौकिक चिंतन समाज और देश के हित की स्थूल बातों को इतना दबा दिया और उन सब हितकारी उपायों के स्थान में ऐसी टाँग अड़ाया कि उनका लेश भी न आने पाया। 'मोरालिटी' जिसके लिए कोई उचित शब्द हमारी भाषा में मिलता ही नहीं बिल्कुल मज़हब हो गई। मज़हब से कुछ सरोकार न रख स्वच्छंद 'मोरालिटी' की बुनियाद पाना असंभव सा हो गया। वैद्यक में मज़हब जा घुसा, ज्योतिष में मज़हब जा पैठा, नीतिशास्त्र उसी मज़हब का एक अंग ही है।



यूरोप की सी स्वच्छंद पालिटिक्स क्या है? सो हम जानते ही नहीं। इसका तो मानों बीज ही मारा पड़ा। कामंदक और चाणक्य का नीतिशास्त्र अथवा मनु और महाभारत में जो राजधर्म लिखा गया है वह सब उससे बिल्कुल निराला है। जिसे हम पालिटिक्स के द्वारा यूरोप के क्रम पर स्वत्वरक्षा 'इंडि-विडुअल राइट' और 'प्रिविलेज' की बुनियाद कहेंगे। यहाँ तक कि इन बातों का ध्यान भी कभी उनको न हुआ। एक मनुष्य या जाति केवल एक तरफ़ तरक़्क़ी कर सकती है जिन बातों को आप अच्छा समझते हैं और जो आपके आइडियल्स हैं उन्हीं से आपके जीवन के सब काम नियमित होंगे। इसलिए इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है कि पारलौकिक बातों के अनुसंधान में लगे हुए हमारे पूर्वजों का चित्त क्षणभर के वास्ते भी राजनैतिक तत्त्वों की ओर न झुका हो। अब इसी के तारतम्य में अँग्रेज़ों की दशा पर ध्यान दीजिए तो यह बात देखी जाती है कि जैसा हमारे यहाँ धर्म और मज़हब नस-नस में घुसा है वैसा ही आदि ही अँग्रेज़ों का बीज विभेदक गुण हम स्वच्छंदता पाते हैं। यही कारण है कि बहुत जल्द उनका इतिहास राजनैतिक स्वच्छंदता की लड़ाइयों के लिए प्रसिद्ध हो गया। जो लड़ाइयाँ किसी शक्ल में वें बराबर चलाते ही गए जब तक उन्होंने मनमानी राजनैतिक स्वच्छंदता न पा लिया। इसी स्वच्छंदता की इच्छा को यदि हम बीज मान लें तो अँग्रेज़ों का इतिहास समझने में हमको केवल सुगमता ही न होगी वरन् एक-एक कल-पुरजा इस इतिहास का हमको स्पष्ट हो जाएगा जिस समय से कि इंगलैंड के साक्सन लोग वहशियों की तरह रहते थे उसी समय से इस स्वच्छंदता की इच्छा को हम इस अँग्रेज़ी जाति में पाते हैं और उसी का परिणाम उनकी राजनैतिक स्वच्छता और उत्कर्ष है।



चाहे धर्म संबंधी आदि एकता से आप और-और तरह का लाभ मानें पर देश की उन्नति और वास्तविक भलाई करने का द्वार हम राजनैतिक एकता ही को मानेंगे। जब तक कोई जाति एक राजनैतिक समूह न होगी जिसका एक ही राजनैतिक उद्देश्य है और जिस जाति के लोग एक ही राजनैतिक ख़याल से प्रोत्साहित नहीं हैं तब तक आप उस जाति की संपत्ति और वृद्धि की बुनियाद किस चीज़ पर क़ायम रखेंगे? हम देखते हैं अँग्रेज़ों के इतिहास में बहुत जल्द राजनैतिक एक जातित्व आ गया जिसके कारण उनके जाति की उन्नति चरम सीमा को पहुँचने लगी और उसी के विपरीत हम देखते हैं कि राजनैतिक बंधन होने से बहुत जल्द हमारी जाति तीन तेरह हो गई। मनुष्यों के संबंध में 'प्रारब्ध' कुछ है ऐसा आप मानते हैं, अस्तु, जाति के संबंध में तो आपको यह अवश्य मानना पड़ेगा कि अपना इतिहास कोई जाति आप स्वयं बना लेती है। हम ऊपर कह आए हैं कि अँग्रेज़ों में राजनैतिक एकता के कारण उनके देश की वास्तविक उन्नति हुई उसी के विपरीत राजनैतिक एकता न होने से हमारा ह्रास हुआ और आगे चलकर इसका यह परिणाम हुआ कि अँग्रेज़ जाति ने अपना इतिहास अपने अनुकूल कर लिया। वही हमारे जाति का इतिहास झक मार के हमारे प्रतिकूल हो गया और आपस की फूट से बची-खुची जो कुछ ताक़त रह भी गई थी उसे विदेशीय विजेताओं ने आकर चूर-चूर कर डाला। इसी कारण यह बात यहीं देखी गई कि वह देश जहाँ की संपत्ति इतनी अधिक थी जिसे लूट-लूट और और मुल्क वाले बन गए और बनते जाते हैं सदा विदेशीय नेताओं का शिकार बना उनके पंजे में पड़ा रहा और कभी अपनी दशा को सोचा तक नहीं तब उससे निवृत्त होने की सामर्थ्य पाना तो बड़ा दूर रहा। जहाज़ चलाने की विद्या में तरक़्क़ी करना और जहाओं में चढ़कर अपने देश का वाणिज्य दूसरे दूर देश में ले जाना और वहाँ का अपने देश में लाना इत्यादि बातों में उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) की दरकार थी इसलिए ये बातें हमारे यहाँ सपने की सी हो गईं। दूसरे, एक कारण यह भी है कि जब पेट भर खाने को होगा तो सब ओर ख़यालात दौड़ेंगे। इसी कारण अँग्रेज़ों के इतिहास में हम बराबर देखते हैं कि किसी समय अँग्रेज़ों ने किसी का कोई ख़याल मँगनी माँग अपनी उन्नति नहीं किया जैसे हम उनसे उन्नति करने वाले ख़यालत माँगने को ललचा रहे हैं वरन् उनके इतिहास में एक से एक नवीन सोचने वाले हर एक काल में हो गए हैं। हिंदू और अँग्रेज़ इन दो जातीयों का पूरा इतिहास दर्शाना इस लेख में हमारा उद्देश्य नहीं है पर बीज विभेदक गुणों की पुष्टि हम समझते हैं कि हम अच्छी तरह दिखा चुके और यह भी दिखा चुके कि प्रत्येक जाति किस तरह अपने अनुकूल या प्रतिकूल अपना इतिहास बना कर उन्नति अथवा अवनति करती है।



इस सब लेख का सारांश हम यों कह सकते हैं कि यदि भारत का उद्धार अब किसी तरह हो सकता है तो शांति संपादक अकर्मण्यता वाले गुणों से नहीं जिनके लिए हम अब तक प्रसिद्ध थे और जिसने हमको इस दिशा तक गिरा दिया बरन् अँग्रेज़ी जाति के साथ टक्कर खाने से और उनसे प्रगल्भता (Activity) संपादक उद्यमशीलता वाले गुणों के सीखने से। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक इस लेख से जातीयों में अनूठापन क्या है भरपूर समझ गए होंगे, और यह लेख किंचित क्लिष्ट हो जाने के लिए हमारा अपमान न करेंगे।

संत लालदास के सबद : Sant Laldas Ke Sabad

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हर गुनगावो हरजस रे साधो

हर गुनगावो हरजस रे साधो।

पार उतारै सयां मारग लावै, वाही कै रस मोहि रस रै॥

साधो भाई प्रेम प्रीत राखो विधना सु, भौर भय अब निसरै।

निसदिन राम नांव हीरदै लिख राखो, जौ कागद पर मीसरे॥

साधो बड़े-बड़े भवन भवेपत राजा, तेउ किये आप बस रे।

करोनै कुला सुमरन साहिब का, मेरे हर जी के नाव सहंसरे॥

भरम भुला रे बंदा

भरम भुला रे बंदा।

रैन गंवाई सोई-सोई, दौस कीया धंधा॥

देव ढोका साव तोड़ा, काम किया गंदा।

साधोजी आओ, सीख पावो, लाल हुवा चंदा॥

जल-थल में जोति जाहर, जीव जानत संधा।

लाल वंदो कलि में औतारी, जिन जाण जप्यो गोविंदा॥

राम हम बंदे औगुण भरे

राम हम बंदे औगुण भरे, गुणवंता साहिब।

पैदा किया की सरम गहोजी, हम ते काज कोई नाई सरै।

ईहै दुनिया देवन कूं ढोकै, तो साहिब सूं नाहिं डरै॥

सैहंस नाव पेदागर जी के सुमरो जासु ईह तेरो तन तीरै।

लालबंदो कलि में औतारी राम भजे गोविंद भजे वही तीरे॥

आछी राम सुमर लेरै मन मेरा

आछी राम सुमर लेरै मन मेरा।

अब तुम घड़ी घड़ी पल पल हरजी कौ सुमरो, जै कोई सुधा दिन तेरा।

आगै जावो कहा कहै छूटो, हंतौ पाप कीयो बहोतेरो।

लष चौरासी जीया जौन में, सभ घट पूर रहो चहुँफेरा।

लाल बंदो कल मै औतारी, कलिजुग मै आछौ न्याव निवेड़ो॥

आछी पीत लगई हो लाल

आछी पीत लगई हो लाल, हरि पीत लगाई हो।

लाल’र हर ऐसै मिले, बीच राईहू न समाई हो।

येक माया और मोहनी, दोऊ संग न लाई हो।

लाल राम जी के लाडले, भूलि कलि समझाई हो।

लालबंदे की रै वीनती, राम राखि ले हर सरनाई हो॥

अगम अगोचर सांई सब बुध तेरी

अगम अगोचर सांई सब बुध तेरी।

भाव भजे न भगवंत जी, भजन बिन का विध होय तिरगत मेरी॥

हरजन होय सो हरजस गावै, पीन हरजस फीरै कल हेरी।

नेकी नासि गई या कलि ते, औतारी लालन आये फेरी॥

या माया कु राम ईह कल डौलै, सो माया लालन घर चेरी।

गावै लाल निरंजन प्यारो, रहै लाल लागि अपने राम जी की डोरी॥

सब जुग सोवै सैंया मेरो जागै

सब जुग सोवै सैंया मेरो जागै।

पानी सौ जिन कीयो है पसारो, आपन माली सींचै बाड़ी बागो॥

काया के तुम कौतिग देखो, यामै मेरे करता को कर लागै।

सुमरन करो हर की सरन रहो रे, जासुं तेरो पाप कटै भौ भागै॥

माया ममता लोभ और लालच, अंतरजामी लाल बिना कौण त्यागै।

गावै लाल निरंजन प्यारो, लाल रहैत राम जी कै आगै॥

हरि चरनन जिनको मन लोचै

हरि चरनन जिनको मन लोचै।

जेई-जेई अमल कमाये जिन बंदा, जानि-जानि साहिब मेरो सोचै॥

षुदी गरुरो भागी जाई सब, ज़ोरावर जम आणि दबोचै।

लालवंदो कलि में औतारी, निरख-निरख सारी जुमल कौ जोखै॥

श्मशान – ब्रजनन्दन सहाय हिंदी निबंध | Shmashaan

यहाँ आने पर सब बराबर हो जाते हैं। पंडित, मूर्ख, धनी, दरिद्र, सुंदर, कुरूप, महान, क्षुद्र, ब्राह्मण, शूद्र, बंगाली यहाँ सब बराबर हैं। नैसर्गिक, अनैसर्गिक, सब तरह वैषम्य यहाँ दूर हो जाता है। शाक्यसिंह, शंकराचार्य, ईसा रूसो, राममोहन, कोई ऐसा साम्यसंस्थापक इस जगत में नहीं हुआ। इस बाज़ार में सब चीजों की एक दर बिक्री होती है। अति महान एवं अति क्षुद्र, महाकवि कालिदास और तुकबंदी करनेवाले, सबका यहाँ एक भाव है। इसी से कहता हूँ कि यह स्थान धर्मभावपूर्ण है, यह स्थान सतुपदेशपूर्ण है, यह स्थान पवित्र है।



यहाँ बैठकर यदि थोड़ी देर तक चिंता की जाए तो मनुष्य के महत्व की असारता समझ में आती है, अंहकार चूर-चूर होता है, आत्मादर संकुचित होता है, स्वार्थपरता की नीचता हृदयंगम करने में समर्थ होता हूँ। आज हो, कल हो, या दस दिन के बाद हो, पर सभी को आकर इस श्मशान की मिट्टी में मिल जाना होगा। जो अनभिभवनीय वीर्य, जो दुर्ज्जय अहंकार आज तक कभी उत्पन्न हुआ था, वह इसी मिट्टी में मिल चुका है। हमारी तुम्हारी हक़ीक़त ही क्या है? जिस उत्कट आत्माभिमान ने यूरोप की पंडितमंडली से अहंकार के साथ कर माँगा था, वह इसी मिट्टी में मिल गया। हम तुम कौन हैं। उस दिन जिस चिंताशक्ति ने ईश्वर को भी अपना काम करने में असमर्थ कह देने का साहस किया, वह भी इस श्मशान की मिट्टी हो चुकी। हमारी तुम्हारी क्या बात है। जिस रूप की अग्नि में ट्राय जल मरा था, जिस सौंदर्यतरंग में विपुल रावणवंश डूब गया था, जिस लावण्यरज्जु में जूलियस सीजर बंध गया था, जिस पवित्र सौकुमार्य के कारण इस पापी हृदय में कालाग्नि धधक रहा है, वह सुंदरी, वह देवी वह विलासवती, वह अनिर्व्वचनीया इसी मिट्टी में मिल गई। हम तुम किस खेत की मूली हैं! यह संसार कै दिन के लिए है? यह जीवन कै दिन का है? नदी हृदय पर उठते हुए जलबुद्बुद की तरह जीव जिस हवा के झोंके के साथ पैदा हुआ, उसी के साथ मर मिटा। आज अभिमान में चूर होकर एक भाई को पैरों कुचल डाला, लेकिन कल ही ऐसा दिन हो सकता है कि मुझे सियार, कुत्ते लात से ठुकरावेंगे, तो मैं भी उसका कुछ प्रतिविधान नहीं कर सकूँगा। तब अंहकार क्यों? किस लिए अहंकार? इस अनंत विश्व में मैं कौन हूँ—मेरी हक़ीक़त ही क्या है—मैं हूँ क्या? मिट्टी का पुतला! इसलिए ग्रहकार नहीं शोभा देता। इसी से कह रहा था कि यह स्थान याद आने से सारा अहंकार-विद्या का अहंकार, प्रभुत्व धन का अहंकार, सौंदर्य का अहंकार, बुद्धि का अहंकार, प्रतिभा का अहंकार, क्षमता का अहंकार, अहंकार का अहंकार—चूर्ण हो जाता है। और वह दिन! वह तो हटाए हट ही नहीं सकता; भागने से भी रक्षा नहीं हो सकती। जिन भीरु श्रेष्ठ लक्ष्मणसेन ने जीवन के भय से, मुसलमानों के हाथ में जन्मभूमि सौंपकर, मुँह का कौर भाजनपात्र में फेंककर तीर्थ की यात्रा की थी, वे भी अपनी जान नहीं बचा सके। सुना है कि स्वर्ग में वैषम्य नहीं है—ईश्वर की आँखों में सभी बराबर हैं। स्वर्ग क्या है, सो नहीं जानता—कभी देखा भी नहीं, शायद कभी देखूँगा भी नहीं। किंतु श्मशानभूमि का यह उपदेश स्पष्ट है। यह स्थान स्वर्ग की अपेक्षा भी बड़ा है। यह स्थान पवित्र है।



और स्वार्थपरता! उसकी भी क्षुद्रता अनुमित होती है। सामने असीम जलराशि अनंत प्रवाह से प्रवाहित हो रही है। पैरों के नोचे विपुला धरित्री पड़ी हुई है। मस्तक के ऊपर अनंत आक़ाश फैला हुआ है। उसमें असंख्य सौरमंडल, अगणित नक्षत्रलोक नाचते फिरते हुए दिखलाई पड़ते हैं। संख्यातीत धूम्रकेतु इधर-उधर दिखलाई पड़ते हैं। भीतर अंनत दुःखराशि क्षुब्ध सागर के समान, मत्तमातंग के तुल्य डोल रही है। जिधर देखो उधर ही अनंत देख पड़ता है। और मैं कितना छोटा हूँ, कितना गया बीता हूँ। इसी सामान्य, इसी क्षुद्रादपि क्षुद्रतर के लिए इतना आयास, इतना यत्न, इतनी परेशानी, इतना तूलकलाम, इतना पाप होता है! बड़ी लज्जा की बात है। इसी क्षुद्र को केंद्र बनाकर जो जीवन बीत चुका, उसका महत्व कहाँ रहा। लेकिन तुम क्षुद्र भले ही हो, मानवजाति क्षुद्र नहीं है। यह मैं मानता हूँ कि एक-एक मनुष्य को लेकर मनुष्यजाति बनी है, किंतु जातिमात्र ही महान् है। बिंदु-बिंदु जल से समुद्र होता है; कण-कण वाष्प लेकर मेघ बनता है, रेणु-रेणु बालुका से मरुभूमि बन जाती है, क्षुद्र-क्षुद्र नक्षत्रों से छायापथ तैयार होता है। अणु-परमाणु से ही यह अनंत विश्व रचा गया है। एकता ही महत्व है। मनुष्यजाति महान् है; महान् कार्य में आत्मसमर्पण करना ही महत्व है। हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ कि जिस तरह व्यक्ति का नाश होता है, उसी तरह जातिमात्र का भी ध्वंस होता है। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अब तक कितनी ही प्राचीन जातियाँ पृथ्वी से लुप्त हो चुकी हैं और अनेक नई जातियों का आविर्भाव हुआ है। किंतु उससे अपनी हानि ही क्या है? जिस दिन मनुष्य जाति का लोप होगा, उस दिन इसका लोप देखने को मैं थोड़े ही बचा रहूँगा, क्योंकि मैं भी तो मनुष्य ही हूँ। मनुष्यजाति के ही अंतर्गत ठहरा! किंतु क्या कह रहा था, भूल ही गया।



यहाँ आने पर सब चीजों की समाधि बन जाती है। अच्छा, बुरा, सत्, असत् सब इसी रास्ते से होकर संसार परित्याग करते हैं। यह सुख का स्थान है। यहाँ शयन करने पर शोकताप नष्ट हो जाते हैं, ज्वालायंत्रणा मिट जाती है, सभी दुःख दूर हो जाते हैं—आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक सब दुःखों का नाश हो जाता है। लेकिन यह भी कहना पड़ेगा कि यह दुःख का स्थान है। यहाँ पर जो आग जलती है, वह इस जन्म में दूर नहीं होती। उस आग में सौंदर्य जल जाता है, प्रेम जल जाता है, सरलता जल जाती है, लज्जा जल जाती है, जो कुछ जलने लायक नहीं है, वह भी जल जाता है। और उसी के साथ-साथ दूसरे की आशा, उत्साह, प्रफुल्लता, सुख, उच्चाभिलाष, माया सब कुछ लुप्त हो जाता है। इसी से कहता हूँ कि यह स्थान सुख का भी है, दु.ख का भी है। जो चला जाता है, उसे सुख है; जो रह जाता है, उसको दुःख है। इस संसार का यही नियम है। सब कुछ अच्छा है और सब कुछ बुरा भी है। कुसुम में सौरभ है, कंटक भी है; मधु में मिष्टता है, तीव्रता भी है, सूर्यरश्मि में प्रफुल्लता है, रोग पैदा करने की शक्ति भी है। रमणी की आँखों में सौंदर्य है, सर्वनाश भी है। रमणी के हृदय में प्रेम है, छल भी है। धन से क्षमता की वृद्धि होती है, यौवन निर्वाचन की प्रतिबंधकता भी होती है। जगत् में कोई वस्तु निर्दोष नहीं दिखलाई पड़ती। सब में भला-बुरा मिला हुआ है। इसलिए प्रकृति देखकर जहाँ तक समझता हूँ, उससे बोध होता है कि हम लोग जो यह संसार देख रहे हैं उसका जो आदि कारण है वह भी भला-बुरा मिला हुआ है, अथवा दो शक्तियों से यह जगत् उत्पन्न हुआ है। उनमें से एक अच्छी, एक बुरी है; एक स्नेह, एक घृणा है; एक अनुराग, एक विराग है; एक आकर्षण, एक विकर्षण है। लेकिन क्या कहते-कहते क्या कहने लगा।



यह जो संसार है, वह एक महाश्मशान है! निरंतर बहता हुया कालस्रोत दिन-दिन, प्रति दंड, प्रति क्षण, पल-पल में सबको बहाए लिए जाता है और विस्मृति के गर्भ में डाल देता है। गत मुहूर्त में जिसे देखा है, वर्तमान मुहूर्त में उसका पता नहीं है। प्राण देने पर भी वह नहीं आ सकता। इस घड़ी जो मौजूद है, दूसरे ही क्षण में वह नहीं हो जाएगा—सारा संसार छान डालोगे, तो भी उसे नहीं पाओगे। वह कहाँ जाता है, कहाँ जाएगा, यह जितना तुम्हें मालूम है, उतना मुझे भी मालूम है; और उसमें अधिक कोई नहीं जानता। सब जाता है, कुछ रहता नहीं रह जाती है केवल कीर्ति। कीर्ति अक्षय है। कालिदास चले शकुंतला रह गई। शेक्सपियर चले गए, हैमलेट आज तक मौजूद है। वाशिंगटन चले गए, पर अमेरिका की स्वाधीनता की ध्वजा आज भी फहरा रही है। रूसो चले गए, पर साम्यवाद का दुंदुभिनाद आज तक पृथ्वी में घोषित हो रहा है। कीर्ति रहती है। अकीर्ति भी रहती है। आदमी के भले-बुरे गुण आदमी के साथ ही साथ चले जाते हैं, पर उसकी कीर्ति और अकीर्ति जगत् में रह जाती है। वाशिंगटन का स्वदेशानुराग उनके साथ ही चला गया। शेक्सपियर का चरित्रदोष भी उन्हीं के साथ चला गया। किंतु वे संसार का जो उपकार कर गए हैं, उसका सौरभ दिन-दिन अधिकाधिक फैल रहा है। यही जगत् का सार तत्त्व है—धर्म की मूल भित्ति है, पुण्य का सुवर्ण-सोपान है। किंतु क्या कह रहा था।



यह संसार एक महाश्मशान है। जो चिंताग्नि यहाँ धधक रही है, उसमें जो न जले, ऐसी चीज़ ही दुनिया में नहीं है। जड़ प्रकृति किसी का मुँह नहीं देखती। जो सामने आता है, उसी को जलाती हुई, पहले की तरह धधकती हुई, हँसती और किलकारती हुई चली जाती है। यह जो नक्षत्रों का समूह अल्पांधकार में झिलमिला रहा है, वह इस विश्वव्यापी महावह्नि की सिर्फ़ चिनगारियाँ हैं। इस संसार में अग्नि कहाँ नहीं है? निर्मल चंद्रिका में, प्रफुल्ल मल्लिका में, कोकिल की काकली में, कुसुम के सौरभ में, मृदुल पवन में, पक्षियों के कूजन में, रमणी के मुखड़े में, पुरुष में—कहाँ आग नहीं धधक रही है? किस आग में आदमी नहीं जलता? अगर प्यार करोगे तो जल मरना होगा; और यदि नहीं प्यार करोगे तो और भी जल-भुनकर ख़ाक हो जाना होगा। लड़केबाले न होंगे तो शून्य गृह लेकर जलना होगा; अगर होंगे तो संसारज्वाला में जलना होगा। केवल मनुष्य ही नहीं, सारे संसार के जीव जला करते हैं। प्राकृतिक निर्वाचन में जलते हैं, यौवन निर्वाचन के हृदय में जलते हैं, सामाजिक निर्वाचन में जलते हैं, परस्पर के अत्याचार से जलते हैं। कौन नहीं जलता? इस संसार में आकर कौन स्वस्थ मन से, अक्षत शरीर से चला गया? दुःख के ऊपर दुःख तो यह है कि इस पापी संसार में सहृदयता नहीं, सहानुभूति नहीं करुणा नहीं। इस अनंत जीवसमूह का इस महावह्नि में हाड़-हाड़ जल रहा है और जड़ प्रकृति केवल व्यंग्य करती है। चंद्रमा के सदा हँसमुख चेहरे पर कभी किसी ने विषाद का चिह्न देखा है? नक्षत्रराशि के सौभाग्य भरे मृदु कंपन में कभी हास या वृद्धि देखी गई है? कल्लोलिनी के कलनिनाद में कभी किसी ने स्वरविकृति देखी है? नवकुसुमिता लता के डोलने में कभी किसी ने ताल भंग होते देखा है? हम लोग जल रहे हैं; किंतु यह देखो, वृक्षराजि करताली दे देकर नाच रही है। यह देखो, समीरण हँस रहा है... हा हा, हो हो!



हाय! इस तरह से और कितने दिन जला करूँगा? तक यह यंत्रणा दूर होगी! क्या फिर कभी तुम्हें नहीं पाऊँगा? आज हो, कल हो, दस दिन बाद हो, जन्म-जन्मांतर में हो, या युगयुगांतर में हो कभी किसी दिन तुम्हें पाऊँगा कि नहीं? अगर नहीं पाऊँगा तो क्या भूल भी नहीं सकूँगा? मुझे मन ही मन एक विश्वास है कि जिस दिन इस सैकतशय्या पर अंतिम निद्रा में सोऊँगा, उसी दिन शायद उसे भूल सकूँगा। तभी शायद आग बुझेगी। इसी से तो कभी-कभी मरने की इच्छा होती है। फिर यह भी कहना पड़ता है कि उसे भूल जाना पड़ेगा, उसके साथ संबंध नहीं रह जाएगा, ऐसा विश्वास होने ही के कारण मरने की इच्छा नहीं होती। वह इस जन्म में फिर आँखों के आगे नहीं आवेगी, यह जानता हूँ पर दिल ही दिल में उसे सदा देखा करता हूँ। वह जहाँ है, वह स्थान पवित्र है। उस मंदिर को जान-बूझकर क्यों तोडूँगा? पर क्या प्राण रहते तोड़ा जा सकता है। वह जब तक चिंता का विषय है, तब तक चिंता बनी रहे, यही ठीक है। बड़ी यंत्रणा होती है, तो इससे क्या। अगर उसके लिए यंत्रणा न सही तो मनुष्य-जन्म को धिक्कार है। इस प्रेम को धिक्कार है! इन प्राणों को धिक्कार है! इस परिणाम को धिक्कार है! किंतु मालूम होता है कि मैं फिर उसे पाऊँगा, शायद फिर मैं और वह दोनों मिलकर एक होंगे।



जगत् परिवर्तनशील है, अतएव संभव है कि वह मिट्टी और यह मिट्टी मिल सकेगी—उस कांत कलेवर के परमाणुओं के साथ इस जली हुई मिट्टी के परमाणुओं की संगति हो सकेगी। दो देहों के विलग हुए उपकरणों का पुनः मेल होकर एक नई सत्ता की सृष्टि हो सकती है। इसी से कहता हूँ कि संभव है कि परलोक में हम दोनों एक हो सकें। बम भोलानाथ! वह और मैं—जो प्राण का प्राण है, जो जीवन का जीवन है, जो नयनों का नयन है, जो हृदय का हृदय है, वह और मैं—जो संसार की माया है, जो जीवन को नौका है, जो गृह की आकर्षिणी शक्ति है, वह और मैं—जो संसारांधकार में चंद्रमा है, जो जीवनमरुभूमि का शाद्वल है, जो भवसागर की तरणी हैं, जो जीवनपथ की पाठशाला है, वह और मैं—जो पृथ्वी का सार है, स्वर्ग का आदर्श है, जो इहलोक का सर्वस्व है, जो परलोक से भी बढ़कर है, वह और मैं जो गृहकुंज की सुखलता है, जो चिंतासागर की प्रफुल्ल नलिनी हैं, जो आशा-लता का आश्रयतरु है, वह और मैं—जो संसाररूपी विदेश की स्नेहमयी संगिनी है, जो जीवनमरूभूमि का शीतल सरोवर है, जो भूत भविष्यत रूपी अंधकार का उज्ज्वल तारा है, जो हृदयकानन का विकच कुसुम है, वह और मैं—जो आशा में विश्वास है, जो काया में मोह है, जो प्रेम में कवित्व है, जो दुःख में सांत्वना हैं, जो सुख में चाहिए, वही है—वह और मैं शायद फिर भी मिल जाएँगे वह मरकर मिट्टी हुई है, मैं भी मर कर मिट्टी होऊँगा। फिर दोनों की मिट्टी एक हो जाएगी। मेरी देह के परमाणुओं में उसकी देह के परमाणु मिलेंगे। वह और मैं दोनों एक हो जाएँगे, तब एक नई सत्ता का अभ्युदय होगा। जो सत्ता होगी वह बुरी ही क्यों न हो, पर वह मिलन कैसे सुख का मिलन होगा। वह संघटन कैसा सुखकर होगा!



मेरी वह आदरणीय, वह सुहागिन, अतीत के कोमलाकाश वह इंद्रधनुष, वर्तमान के अँधेरे गगन की यह सौदामिनी कैसा हृदय को आनंद देनेवाला मिलन होगा। दोनों मिलकर एक नई सत्ता का उदय करेंगे। कैसा सुखकर मिलन है! जन्मांतर में कौन संदेह करता है? आत्मा क्या है? वह शरीरयंत्र की गतिमात्र है। इसी से कहता हूँ कि शरीर का प्रत्येक परमाणु आत्मा है। मनुष्य मरने पर वृक्ष हो सकता है, तृण हो सकता है, पत्थर हो सकता है, मनुष्य हो सकता है, नक्षत्र हो सकता है, पशु हो सकता है और कीट भी हो सकता है। जो डरपोक डर के मारे घर से बाहर नहीं निकल सकता, उसी की देह में एकिलिस या सिकंदर की, सीजर या हनीवाल की, नेपोलियन अथवा इयामिनडास की, व्रासिडास अथवा लाइसेंडर की, भीम अथवा अर्जुन की देह का अंश हो तो कोई अचरज की बात नहीं। राम के शरीर में संभव है कि कालडेरन अथवा लैप डी बेगार, मेटे अथवा शिलर, पिट्रार्क अथवा डाटे, कर्नेली अथवा रेसाइन, शेक्सपियर अथवा कालिदास, होमर अथवा वर्ज्जिल, व्यास अथवा वाल्मीकि की आत्मा रही हो। संभव है कि मोहन की देह स्कालिगर अथवा मेंलियाविक की विशिष्ट देह के उपकरण से बनी हो। यह जो हंसपुच्छ लेखनी है, संभव है कि इसके भीतर रूसो अथवा वाल्टेयर मौजूद हों। हो सकता है कि इस मसिपात्र में शाक्यसिंह अथवा कोमट हों। यह हृदय जिसके लिए लालायित है, संभव है कि वह इसी हृदय में हो। मनुष्य की देह का प्रतिक्षण आणविक परिवर्तन हो रहा है। प्रत्येक व्यक्ति प्रति सातवें वर्ष नया कलेवर धारण करता है। उस सदा होते रहनेवाले परिवर्तन के प्रवाह में तैरता हुआ उस देह का परमाणु, संभव है कि, इस देह में मिल रहा हो। जगत में कोई बात आश्चर्य की नहीं है; और सभी कुछ आश्चर्यजनक है। जो चला गया, सारा जगत जिसके चले जाने से अंधकारमय हो गया, वह फिर लौटकर आ सकता है—चाहे युगयुगांतर में हो, कल्पांतर में हो। वह अकलंक चंद्रमा आकर फिर भी इस आक़ाश में दिखलाई देगा। पुनर्जन्म असंभव नहीं है। उसमें उस अमूल्य निधि में जो-जो चीज़ें थीं, सब की सब हैं। कोई वस्तु बिलकुल विलुप्त नहीं होती। सब कुछ है, केवल एकत्र नहीं है। वे सब उपकरण जगत् में विराजमान हैं। जिस दिन उसका एकत्र संघटन होगा, उसी दिन सोचते हुए भी हृदय थिरक उठता है, प्राणों के भीतर रोमांच हो जाता है उसी दिन फिर संसार मरुभूमि में वह सुकुमार, वह मनोहर, वह सुंदर कुसुम खिलेगा। दशों दिशाओं को उज्ज्वल करता हुआ, जगत से जगदतर पर्यंत लहराता हुआ वह सौरभ विश्व के एक प्रांत से दूसरे प्रांत पर्यंत अपने पवित्र प्रवाह से पवित्र करता हुआ खिल उठेगा। पुनर्जन्म असंभव नहीं है।



हिंदू धर्म में ऐसी कोई बात नहीं जो निरी भ्रमपूर्ण हो, ऐसा कोई मत नहीं जो हँसकर उड़ा देने लायक हो। जो चिंताशील है, वह सदा यही कहेगा कि हिंदू धर्म सब धर्मों से अच्छा है। ईश्वर निराकार है, यह दिल्लगी की बात है। देह से निरपेक्ष तो कोई चैतन्य जीव इस जगत् से दिखलाई ही नहीं देता। जब तक नहीं देखूँगा, तब तक नहीं मानूँगा। जगत् का कारण इच्छामय है, यह बात मुर्ख लोग कहा करते हैं। एक कारण का एक कार्य होता है। जिस कारण से इस जगत् की उत्पत्ति हुई है, उस कारण से दूसरी तरह की सृष्टि होना असंभव है। ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयामय है, यह प्रलापमात्र है। अपने हृदय पूछ देखो। एक जीव पृथ्वी में आता है। वह मर सकता है, अकर्मण्य हो सकता है, पृथ्वी का बोझ हो सकता है। किंतु केवल उसके संसारप्रवेश के लिए और एक उत्कृष्टतर जीव को मृत्युयंत्रणा भोगनी पड़ती है। उस यातना से न कोई लाभ है, न कोई विपद् दूर होती है, न कोई उद्देश्य पूरा होता है, न किसी का सुख बढ़ता है, न किसी का दुःख घटता है। तो भी वह यमयातना भोगनी ही पड़ती है। निरर्थक यातना देना जिसका काम है, वह निष्ठुर है, वह निर्दय है। किंतु दया कहते-कहते क्या बक गया! वह फिर आ सकती है। जो चली गई हैं—जगत् की माधुरी हरण कर हृदय के परदे-परदे में आग सुलगाकर, सोने के संसार को छार-छार कर, सुख के पात्र में विष घोल कर, भीतर बाहर सर्वत्र नैराश्य फैलाकर जो चली गई है, वह फिर लौटकर आ सकती पर मैं पागल तो नहीं हो गया हूँ? कहाँ वह और कहाँ मैं! वह प्रेम कहाँ है? वह सुंदर संसार कहाँ है। परिप्लुत हृदय कहाँ है? हाय, मैं मर क्यों न गया! जिस समय वह धोखा देकर चली गई, उसी समय उसके पीछे-पीछे क्यों न चला गया! जिस समय उस मुखड़े पर मृत्यु की विकट छाया पड़ी, उसी समय ज़हर क्यों नहीं खा लिया? वह चिंता जो रात के अंधकार को दूर करती हुई भागीरथी सैकत में उजाला किए हुए थी, उसी में क्यों न कूद पड़ा! उस सोने की सी देह की बचीखुची हड्डियों को जब कलेजे पर पत्थर रखकर प्रवाह करने गया था, उसी समय क्यों नहीं जल में डूब मरा! क्यों न फाँसी लगाकर मर गया! कलेजा उथलपुथल होने लगा। चारों ओर अंधकार दिखलाई पड़ने लगा। कातर स्वर से, उद्धात भाव से, चिल्ला उठा—प्राणाधिके! तुम कहाँ हो? मेरे हृदय के आलोक मेरे बाहर के अंतर, मेरे नयनों के मणि, मेरे सर्वस्व के सर्वस्व, मेरे सब कुछ, मेरे जीवनसर्वस्व, मेरी तुम कहाँ हो? दूसरे पार से कठोर प्रतिध्वनि ने कठोर स्वर, उत्तर दिया—अब कहाँ? आक़ाश उसी कठोर स्वर में स्वर मिलाकर गूंजता हुआ बोला—अब कहाँ? यह कठोर स्वर जब दूर पहुँचकर विलीन होने लगा, तब बोला—अब कहाँ? मैं स्तंभित हो रहा। मुहर्त भर के लिए अंतर्जगत का अस्तित्व लुप्त हो गया। हाय! किस मूर्ख ने विधाता को प्रतिध्वनि की सृष्टि करने को कहा था?

बनारस का बुढ़वामंगल – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Banaaras Kaa Budhavaamangal

...काशी के पूर्व छोर से लेकर पश्चिम पर्यंत के प्रत्येक घाटों पर जो अनुमान ढाई-तीन कोस के विस्तार में होंगे, काशिराज और नगर प्रतिष्ठित महाजनों से लेकर, मदनपुर के जुलाहों तथा श्मशान के डोमड़ों तक की नौकाएँ निज शक्ति और श्रद्धा के अनुसार सुसज्जित देख पड़ने लगीं। संख्या भी उनकी और वर्षों की अपेक्षा अधिक है। कोई पटैले पर बाँसों के ठाट ठाटे हैं, तो कोई घटहा पाटे हैं, कोई बजड़े पर झाड़-फानूस की सजावट कर नाच-वाच देखता, तो कोई मोरपंखी सजाए अपना अखाड़ा ला खड़ा किए हैं, किसी ने कोई छोटा-मोटा कटर भाड़े कर रंगीन चोब वा तूल लपेटकर गोटे को लहरिया देकर झालरदार चाँदनी तान, चार ठो हाँड़ी नांद जलाकर उजाला किए अपनी सूरत और झलामल कपड़ों की सजावट ही दिखाता घूमता, तो कोई एक पनसुही पर सबार नाचवाली नौकाओं की ताक में डोलता फिरता, मानो मेले में भिक्षा सी माँग रहा है। विशेषतः काशी के बड़े नाम और घराने वाले महाजन और रईस प्राय: इसी श्रेणी में रहा करते हैं, क्योंकि गाँठ से रुपया खर्चा जाता नहीं और फिर शौक़ इतना कि बिना मेला देखे भी नहीं रहा जाता। कोई साल भर तक इसी लालसा से थानेदारों से साहब सलामत किए, मुफ़्त में पुलिस की किस्ती पर चढ़े मेले का प्राण सा निकालते घूमते हैं। कोई दो-चार लैंप जलाए दस-पाँच कुर्सी बिछाए काली पतलून और जाकिट जमाए गड्डामियरी सूरत बनाए, मुँह में चुरुट सुलगाए, धुँआ कस की समा लाए, गिटपिट-गिटपिट अँग्रेज़ी बोलते, साहिब लोगों का स्वांग सजाए, अपना ही तमाशा ओरों को दिखला रहे हैं। कोई एक लालटेन बीच में रखे बिसात बिछाए, शतरंज के मुहरों के कटने के रंज में डूबे रात काटे डालते, तो कोई ताश के पन्ने प्रारब्ध के पत्र से उलट रहे हैं। कोई गनीमत का मौका हाथ आया देख अचानक अपने यार वफ़ादार को पाकर किसी अकेली किश्ती के कोने में एक एक्के की ज्योति में उस दिलवर के नूरानी मसहफ़े रुख़सार को कुरान शरीफ़ के समान ध्यान लगाए मानो पढ़ रहा है, और उसके हर ख़तों ख़ाल पर गुलिस्तां और वोस्तां को वार फेरकर फेंकता, शेष संसार को निस्सार जान मेले से माँगता, भगवान की विलक्षण रचना चातुरी के पहचानने में असमर्थ हो तन्मय दशा को प्राप्त हो रहा है, जिसकी आँखों में यह मेला केवल एक निर्जन वन से सादृश्य रखता है। कहीं मिलकर लोढ़ियाँ बजती घोर किसी डोंगी पर बूटी छनती, कहीं गाँजे की दम लगती और तान उड़ती है। कहीं होली ने जलते भट्टे पर छनाछन पूरियाँ निकालते 'गरमागरम कचौड़ी मसालेदार' चिल्लाते धुआँ-धक्कड़ मचाते, हलवाई लोग अपनी दूकान की नौकाएँ बढ़ाते चले जाते और भूखे परदेशी मेला देखने वाले शिकारी कुत्ते के समान अपनी नोका दौड़ाए लपक रहे हैं। कहीं बनारसी गुंडे और अक्खड़ों की बोली ठोलियाँ उड़ती—या सिंघा? —'अचूका तो राजा'—'और कैसन दवल जात होव:'—'कहाँ तोहरे नावै के तो कट्टर भिड़ोले चलल आवत हुई।' 'रंग है झज्झर इतो भारी भर्राटे के आवाज़ छैड़ल्यः।’ कहीं कोई चिल्लाता है कि 'तनिक रोकले रह: होः। नाव बढ़ जायद्य:'—'अरे काहे झूरे नाव नाव चिचियायेल्य: बच्चू अबहिए जहाँ चार डांड कसलीं कि पल्ले पार के दिहल।'



'देखत होअ: कि नाहीं बे रंगे बोली बोलत डोंगी सटोले चलल आवत बाड़ै, सूझत नई नाही जनते कि हमन बड़े-बड़े गुण्डन के चेहरा बिगाड़ दिहले हुई।' किसी नाव पर रंडिया विविध भाव बतला-बतलाकर गा रही हैं—



चलो सखी रे, मलिया की बगियाँ हो रामा।



फुलवा में वीनी हो भरल्यू चगेरिया हो रामा०।



आय गयलो रे मलिया रखवरवा हो रामा।



बस, इसका भाव जिसने देखा, वही जाने।



इत्यादि-इत्यादि बनारस की अनोखी लयदारी के संग इस चैती गान की तान इस प्रेसमय भी राग रसिकों के कान में क्या काम करती है, यह केवल अनुभव का विषय है। कहीं कथक थिरकते तो कहीं कलावंत, भाँड रागिनी गाकर माड़वारियों को भी मस्त किए देते, कहीं भाँडों की तालियाँ बजती तो कहीं कव्वालों की नक़ल होती, कहीं गँवार लोग तन भड़-भड़ लगाए, तो कहीं जोगीड़े होली मचाए भड़तल्ले की ताल पर ललकार रहे हैं।



बस, इसी हेर-फेर और सोच-विचार में प्रभात बात बहने लगा, पूर्व दिशा अपने प्रिय प्रभाकर को पाकर मंद-मंद मुस्कुराना आरंभ करने लगी। लज्जावश ज्यों-ज्यों तारावलियों ने अपना मूँ छिपाना आरंभ किया कि इधर फ़र्राश लोग नौकाओं के झाड़-फानूस को बत्तियाँ भी बुझा चले। जिस तम को ये असंख्य ज्योतियाँ न दूर कर सकी थीं, भगवान भास्कर की दो-चार किरनों ने आकर नाश कर दिया। अब कुछ और ही शोभा हो चली, रात बीत गई, दिन दिखलाई देने लगा, उजेले में दूर-दूर की भी हर ओर नौकाएँ पहचान पड़ने लगीं। घाट छोड़ नौकाओं के झूमड़ धारा में पड़ चले, सब राग-रागिनियों का गाना बंद हुआ! अब केवल भैरवी ही राग का सनाका सुर सारे सुरसरिघार पर सुनाई दे रहा है।...अपने लोग भी उठे और अपनी नौका हटा, घाट की ओर प्रस्थान किया।



आहा आहा हा! उत्तरा विमुख होते ही मानो उत्तराखंड ही में पहुँच गए। जहाँ तक दृष्टि दौड़ती है, एक अद्भुत पवित्र दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा है, मानो आज काशी कैलास का विलास कर रही है। श्री मंदाकिनी के सुचिक्करण शिलासोपान विनिर्मित विशाल घाटों के ऊपर प्रस्तरमय असंख्य सप्तभूमि हर्म्य, प्रासाद और मंदिर पर्वत श्रेणी के समान अनुमान होते, जिनकी सुधा धवलित अट्टालिकाएँ और संगमरमर के बँगले हिमाचल के हिमाच्छादित शृंग की सी शोभा धारण किए हैं। शिवालयों के उच्चतम भाग में नभस्पर्शी स्वर्णादि धातु विनिर्मित कलश और कंगूरों के वृंद त्रिशूल धारण किए, मानो हाथ उठाए कह रहे हैं कि त्रिताप शमनकारी, त्रिजन्म पापहारी, स्थल त्रिलोक में केवल एक यही त्रिलोचन त्रिपुरारी पुरी ही है, और सुनहरी पताकाएँ फहराती साहंकार मानो आर्य धर्म के अटल राज्य के प्रकर्ष प्रताप को सूचित कर रही हैं। अनेक सुविशाल देवालयों में प्रातःकालीन अर्चन और पूजन में बजते शंख भेरी घंटा घड़ियाल का कल तुमुल दशों दिशा में व्याप्त हो मानो हमारे सनातन धर्म की विश्व विजय बधाई सी सुनाई देती है। कहीं तानपूरा, मृदंग और झांझ बजते, कीर्तन और भजन होता, जिनके द्वारों पर भैरवी-भैरवी की नौवत झड़ती, मानो इस नित्य मंगलमय स्थल को बतला भूलों को चैतन्य करती हैं, कहीं ब्राह्मणों के लड़के वेदाध्ययन करते, उद्घोषण कर रहे हैं कि सरस्वती देवी का आश्रय स्थान अब केवल यही है। गंगातट पर ब्राह्मण लोग संध्या वंदन तर्पण देवार्चनादि ब्रह्मकर्म करते, मानो इस कराल कलिकाल में भी धर्म को धैर्य-सा दे रहे हैं, और सामान्य द्विजाति अपने आर्य वेश सत्कर्म रस लखाते मानो इस तीर्थ में अद्यापि धर्म के निवास का प्रमाण सा दे रहे हैं। सामान्य जन हरहर महादेव शंकर पुकारते, मानो जिसका राज, उसकी दुहाई वाली कहावत को चरितार्थ करते।



भगवान भूतभावन भुजंगभूषण का स्मरण करते, शिवालयों में जा, जल चढ़ाते, गाल बजाते अपने जन्म-जन्मांतर के पाप-पुंज को दूर बहाते जाते हैं। कहीं स्नान कर काषाय कोपीन धारी एक हाथ में गंगाजल पूरित कमंडल लिए, दूसरे में अपना दंड ऊँचा किए, दंडी स्वामी लोग प्रशांत भाव से अपने आश्रम को जाते, मानो 'एकमेवा द्वितीयम् ब्रह्म' की शिक्षा सी देते जाते। कहीं सुर सरिता के निर्मल और सुशीतल सलिल में कुलवधू सुकुमारी सुमुखियाँ स्नान करती, देवताओं के मन को भी हरतीं, यह निश्चय कराती कि मानो चतुर चतुरानन ने काशी को गलियों में मुक्ति को यों ठोकर खाते देख, उसकी रक्षा के लिए इस अवरोधक कुलाहल की सृष्टि की है। जिनके सहज सलज्ज रहन-सहन को देख रात भर के देखे वैश्याओं के सब हाव-भाव रसाभास से अनुमान होता और मन मान लेता कि ठीक है, इसीलिए साहित्याचार्यों यथार्थ प्रतिष्ठा स्वकीया ही नायिका को दी गई है। वे अपने बहुमूल्य वस्त्रालंकार और दान-दक्षिणा देती स्थिर भाव से रहती हैं। एवं निज नित्य नैमित्तिक कर्म से अवकाश पाकर झुंड के झुंड ब्राह्मणों तथा संन्यासियों का क्षेत्रों में भोजनार्थ जाना, मानो भगवती अन्नपूर्णा के साक्षात् विद्यमान होने को प्रमाणित कर रहा है। आहा, धन्य यह काशी है कि जहाँ कुबेर के समान कितने ही धनवान और शेष के सदृश कितने ही विद्वान्, असंख्य भक्त महात्मा और तपस्वी अब भी निवास करते हैं। धन्य हैं, जो यहाँ सदैव निवास करते और नित्य इस आनंद को देखते। किसी ने सच कहा है :



'चना चवैना गंगजल, जो पुरवै करतार।



काशी कबहुँ न छोडिए विश्वनाथ दरबार।'



अब अपनी नौका ईप्सित घाट पर आई, हम लोग नाव से उतर गाड़ी पर चढ़े उस बिछड़े मित्र के न मिलने का पश्चात्ताप करते अपने बनारसी मित्र के साथ जा उन्हीं के घर फिर धमके।



पाँच बचे संध्या को सुस्वादु गुलाबी बूटी के रंग से फिर गुलाबी आँखें कर यार लोग श्री गंगाजी के घाट पर आ डटे। कल मंगल था, आज दंगल का दिन है, अर्थात् दिन के मध्यान्होपरांत से पुनः मेले का आरंभ होकर अर्धरात्रोपरांत समाप्त होता, और इसकी संध्या की शोभा मानो मेले भर का सारांश है, इसी से आज गंगाजी की धारा के अतिरिक्त घाट पर भी आनंद की हाट लगी है, अर्थात् जल और स्थल दोनों स्थान पर मेला जम रहा है, वरंच जो लहर आज स्थल पर है, जल पर नहीं, क्योंकि वे लोग भी, जो कि नाव पटैया के मेले में नहीं भी सम्मिलित होना चाहते, घाट पर से एक दृष्टि उसकी शोभा देखने को आ डटते, यों ही अनेक नौकारोहण-भीरु और लड़के वाले लोग तथा जिनका कहीं सुवीते से नाव का सेढ़ा नहीं लगा वा टकां निकालने में असमर्थ और उस लोग भी आकर घाटियों के तख़्ते, मढ़ी और घाट के बुर्जों को दखल कर बैठते, जिनमें प्रायः सभी प्रकार के लोग अपनी शक्ति और मर्यादा के अनुसार सुंदर वस्त्रालंकार से सुसज्जित होते हैं। बहुतेरे बनारसी नवयुवक छैले, जिनके सुंदर मुखारविंद पर कलित कामदार टोपियों से लसित घूंघरवाली काली कुंतलावलि मानो मलिंद माला सी मनोहर मालूम होती, सर्दई, संदली, शर्बती, काफ़ूरी, मोतियई, खसखसी, कपासी, गुलावासी, गुलाबा और प्याजी बनारसी दुपट्टों, जिनसे गुलाब और खस के इत्र की सुगंध फैल रही है, गले में डाले मानो बहार में खिले नाना रंग के फूलों को बहार दिखलाते तटस्थ तंबोलियों की दुकानों पर ऐंठे बैठे आँख लड़ा रहे हैं। कहीं सर्व कहीं सर्व कदों की कतार, तो कहीं चश्मि नर्गिस का दीदार, कहीं गुल रुख़ों की भरमार, तो कहीं बुलबुल से बेक़रार आशिकज़ार भाँति-भाँति की बोलियाँ बोल रहे हैं। वाह! क्या बहार है! माना इस बहार के मौसिम का यह मेला भी गुलज़ार पर बहार है। अनेक रसीले मेले का सर्वाश रस चूराते इधर से उधर डोलते फिरते, तो कितने ही किसी एक ही के मुखारविंद पर टकटकी लगाए मानो कंठगत प्राण से हो रहे हैं! न इतनी भीड़ केवल तट के तल भाग ही पर है, वरंच घाट के ऊपर के पंचतल्ले ओर सततल्ले मंदिर और महलों की अट्टालिकाओं पर भी वैसा ही नर-नारियों का समूह सुशोभित हो रहा है। विशेषतः ऊपरी भाग तो केवल सुंदरियों ही के सौंदर्य से भरा-पुरा है। अहा हा! यह भाग वौसा अद्भुत शोभा का समुद्र उमड़ रहा है! अरे, यह तो मानो ब्रह्मा की विचित्र रचना चातुरी के प्रदर्शन का मेला है, वा महाराज मनोज के मन बहलाने के लिए अपूर्व मीना बाज़ार लगाई गई है :



'नज़र आती हैं हर सूरतें ही सूरतें मुझको।



कोई आईनाख़ाना कारख़ाना कारख़ाना है ख़ुदाई का॥'



यह बुढ़वामंगल का मेला क्या वस्तुत: बुढ़वा बाबा महादेव का मंगल विवाह का मेला ही है, और यह दंगल (भारी भीड़) कदाचित् बारात वा सोहगी निकलने का समय है, जिसे देखने के लिए ये देवदारा और गंधर्व कन्याएँ अपनी ऊँची अट्टालिकाओं पर चढ़ी हैं! श्री गंगाजी की सब नौकाएँ मानो नाना बाराती देवताओं के विमान हैं, जो अभी आकाश से उतर रहे हैं, क्योंकि आगे बढ़ी यह मोर पंखा देव सेनानी भगवान् मयूर वाहन के समान इस अनुमान के यथार्थ होने का प्रमाण सी दे रही है। इस वर्ष सूर्यग्रहण के समीप होने से प्रयाग के कुंभ से लौटे साधु-संतों का उस पार भी अधिकता से आ बसने से एक नवीन जनस्थान सा बस गया है, जो मानो बुढ़वा बाबा की बारात का जनवास है, कि जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के साधुओं की मंडलियाँ मानो भिन्न-भिन्न बाराती देवताओं की बराती सेना है,—यदि दंडी लोग काषाय वस्त्रधारी चोबदार कंचुक वा द्वारपाल हैं, तो परमहंस लोग पार्षद और प्रधान तथा नंगे भुजंगे विभूतिधारी नागें उस दिगंबर के खास हुज़ूरी पलटन के सैनिक समूह के समान अनुमान होते। अयोध्या के वैष्णव लोगों के अखाड़े मानो विष्णु की सेना है, और कमंडलुधारी अनेक ब्रह्मचारी और ब्राह्मण ब्रह्मा की, उनके दर्शकधनी गृहस्थ कुबेर और उनकी रक्षा के अर्थ पुलीस के कांस्टेबिल और चौकीदार यम की और अनेक अन्य-अन्य को। श्री गंगाजी में भी नौकाएँ आज अधिक हैं; क्योंकि बहुतेरी नावें आज ही पटी हैं; क्यों नहीं, आज तो दंगल (किश्तियों की कुश्ती का मेला) न है, वाह! यह महाराज काशिराज का कच्छा है कि जिससे सात कच्छे एक ही में मिलाकर पटे हैं, और बड़ा भारी देश और शाहमियाना खड़ा है, और भी सब उचित राजसी ठाट-ठटा है, झुंड की झुंड रंडियाँ बैठी हैं। यह यहीं की वनी केले के खंभे के समान मोटी मोमबत्तियाँ हैं, जो बैठकियों पर लगी हैं, पर नृत्य गान कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि महाराज तो घुड़दौड़ (एक उत्तम नौका जिसके अग्रभाग पर दो कृत्रिम घोड़े लगे हैं) पर सवार हो आज मेला देख रहे हैं, और उसी पर गान हो रहा है। इधर-उधर के कई सुसज्जित बजड़े और मोरपंखियों पर महाराज के अन्य प्रधान पुरुष लोग भी साथ-साथ मेला देख रहे हैं। वाह! क्या विचित्र शोभा है। चुने पार्षद वर्ग और परिकरयुक्त आर्य राज वेषधारी नवीन महाराज आज कैसे शोभायमान हो रहे हैं, मानो बुढ़वामंगल अपना बुढ़वा स्वामी छोड़, नवीन को पाकर नवीन मंगल हो गया है। यह जिस मोरपंखी पर नाच हो रहा है। उस पर महाराज के ठाकुरजी विराजमान मेला देख रहे हैं। धन्य! क्या हिंदू राजा की पवित्र श्रद्धा का प्रमाण है। धन्य काशिराज! धन्य!



अब तो संध्या हो गई, चारों ओर दीपावलियाँ प्रज्ज्वलित हो गई। अपने लोग भी दशाश्वमेध घाट से घाट ही घाट घूमते आकर पंचगंगा घाट पर पहुँचे, पैर भी थक रहे, पर यह मन तनिक भी तृप्त न हुआ! कहता है कि स्थल का मेला तो ख़ूब देखा, अब जल के मेला देखने की वेला आई, अतः वहीं चलो; क्योंकि यहाँ तो अब बेवल बँधे तार वाले लोगों ही का काम है। ‘लिए फिरता है मुझको जा वजा दिल। मेरा बेहोश मेरा चुलबुला दिल।' अस्तु, फिर डोंगी पर चढ़ आगे बढ़े। वाह! यह गंगाजी में आधी दूर तक पुल कैसा बँध गया! नहीं! यह वही श्री मन्महाराज गोस्वामी श्री बालकृष्ण लालजी कांकरोली अधीश्वर का कच्छा है! ओहो! यह कितने कच्छे एक में पटे हैं? कदाचित बीस होंगे। क्योंकि दोनों ओर इसके दो नृत्यशाला बनी हैं, जिनमें एक तो श्वेत, ठीक श्री काशिराज के तुल्य और दूसरी गुलाबी रंग की एक नवीन ही छटा छहरा रही है, और दोनों के बीच में कुछ नज़रबाग़ और खुले चबूतरे की बनावट है। धन्य-धन्य यह अलौलिक रचना और समारंभ! हाँ, यह लोकोक्ति तो प्रसिद्ध ही है कि वल्लभ कुल के गोस्वामी महानुभावों के घर में सदा अचल रूप से लक्ष्मीजी ने निज निवास का वर दिया है। यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं जबकि लक्ष्मीनाथ की रसीली लीला ही का वह स्थान है, फिर भला ऐसे लक्ष्मी कृपापात्र और जिनकी आँखों में उन्हीं की ललित लीला का ध्यान है, उनके इस लीला रचना की लीला लिखने में कैसे आ सकती है। यह कितनी मोमबत्तियाँ जला दी गई कि इतना अधिक प्रकाश हो गया! वाह, इन लाल महताबों का उँजाला तो मानो समस्त उजाले को रँगकर लाल कर दिया, और होली का दृश्य आगे आ गया है। यह विद्युत प्रभा कैसी! और यह ठीक ही विद्युत प्रभा कैसी (बिजली की रोशनी) है, जो कि कई सौ रुपये रोज़ पर कलकत्ते से मँगाई गई है। भई वाह! यह तो सबी को दवा बैठी। अहा! घाटों की अँटारियों पर तो इसने जाकर वह कार्य किया है, कि जो दिन में भी दुर्लभ था! यह प्रभा तो चंद्रमुखियों के मुख पर पड़ कुछ और ही लीला दिखलाती है। इसकी चमक की चौंधी से उनके चंचल चक्षु-चंचरीक, जो करपुंडरीक की ओट में जा छिपते, तो मानो चंद्रग्रहण सा लग जाता है। कितनी उस चमक के पड़ते ही चमककर स्वयं चंचला सी चल देती और दर्शकों के चित्त पर चंचला की चोट सो चला देती। यों ही कितनियों को इस दामिनी की चमक-दमक में अपने दामिनी की दुति को भी दबाने वाली बदन की दीप्ति के दिखाने को और भी सुबीता होता। सच तो यह है कि इस समय यह बिजली की रोशनी दूरबीन का कार्य दे रही हैं अथवा जैसे किसी सुबृहत् दृश्य के छायाचित्र की विचित्रता देखने को सूक्ष्मदर्शक दर्पण, कि बीच धारा में बैठे उस लालटेन के तनिक घुमाने से सहज ही सबकी शोभा लखाई पड़ती है।



अच्छा, चलो उसी गुलाबी कच्छे पर चलें, और वहाँ की भी छवि देखें, परंतु वहाँ तो इतनी नौकाएँ चारों ओर घेरे हैं कि पहुँचना भी कठिन है! यह किसकी किश्ती है? इसके बीच में क्या कुँवर सच्चितप्रसादजी हैं? हाँ, इधर ही तो देखते भी हैं। 'आइए आइए, बस चले आइए! कल भी आप लोग नहीं आए, कहाँ रहे?' चलो, भाई कुँवर साहिब ही की आज्ञा का प्रथम पालन हो; यह कहते जो हम लोग उनकी नौका पर जा पहुँचे, तो देखते हैं कि कई वेश्याएँ वहाँ पर नृत्य कर रही थी और उनके रूप-यौवन पर बनारसी लोग लट्टू हुए, उनकी आरसी सी स्वच्छ सूरत के आरसी में अपने बर्बादी और मिट्टी में मिलने की सूरत देख रहे हैं। वाह! यह भाँड़ लोग जो गा रहे हैं, बड़े चतुर हैं। उनके ढोटे की नाच और भाव का तो कहना ही क्या है, ख़ुदा आबाद रखे लखनऊ फिर भी गनीमत है।' अहा! अब इस ऊँचे बजड़े पर से जो कि कांकरौली वाले महाराज के गुलाबी कच्छे से सटा बँधा है, निकट से कच्छे की शोभा कुछ अपूर्व ही दीख पड़ने लगी है। उफ़! बहुत ही बड़ी नृत्यशाला बनी है! यह गुलाबी पट मंडप जिसकी ‘झालर, खंभे और जंगले आदि सब गुलाबी ही रंग के हैं, अधिकाई से उत्तमोत्तम और बहुमूल्य इतने झाड़-फानूस तथा शीशा आलात और राजसी ठाट से सुसज्जित हैं, मानो सुरेंद्र राजभवन की तुल्यता प्राप्त किया चाहता है, अथवा सहस्रों प्रज्ज्वलित दीप शिखाओं के प्रकाश से जगमगाता मानो असंख्य तारागणों से देदीप्यमान शरदाकाश की शोभा धारण कर रहा है, जिसमें मंगल, बुद्ध, बृहस्पति और शुक्र की भाँति रंग-बिरंगी महताबों का ताब और सच्चे महताब के तुल्य बिजली की रोशनी है।



जिसकी तीव्र ज्योति झाड़ और फानूसों में लगी शीशों की डाल ओर कलमों पड़कर सतरंगे असंख्य इंद्रधनुष बनाती और दर्पणों में अपना प्रतिबिंब ला वर्षा ऋतु की चंचलता की चकाचौंध लाती है, किंतु नीचे दृष्टि दीजिए, मानो वसंत का अखाड़ा वहीं उतरा अनुमान होता। न केवल कच्छे की सजावट ही गुलाबी रंग की दिखलावट, और अनेक सोने-चाँदी के फूल चंगेरों में गुलाब के फूल अधिकता से भरे हैं, वरंच उस पर बैठे सभासद स्वामी, सभ्य और सेवक सब लोग गुलाबी ही रंग की सब पोशाक पहने हैं, जिससे यही अनुमान होता है कि मानो इस चैत मास में प्रातःकाल ही गाजीपुर के उन गुलाब के खेतों में जा पहुँचे हैं कि जहाँ कोसों तक केवल गुलाब के फूलों के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखलाई पड़ता। भाई, इस भाँति गुलाबी रंग से रंगो महासभा किसी ने काहे को कभी देखी होगी। सच है, यह यहीं का प्रसाद है, जो कि अब के अन्य नौकाओं पर भी अधिकांश लोग गुलाबी ही रंग के कपड़े पहने देख पड़ रहे हैं, कदाचित् इस वर्ष हज़ारों थान गुलाबी रंग के रेशमी कपड़े केवल इसी मेले के कारण बिक गए होंगे तथा सहस्रों दर्जी और रंगरेज़ों का भी भला हो गया होगा। इन चाँदी की चोटी पर तने सुनहरे कामदार नमगिरे के नीचे गुलाबी कमखाब ही का बिछौना बिछ रहा है, जिसके आगे सुंदर सोने के अनेक मजलिसी साज, पानदान, इत्रदान आदि सुसज्जित हैं, और उसके नीचे हौज़ में नृत्य होता है।



क्या नगर का कोई ऐसा प्रतिष्ठित और मान्य पुरुष होगा कि जो इस समय यहाँ उपस्थित न हो? नहीं, कदापि नहीं। हाँ, जब अनेक दूर के नगर निवासी आज आकर बनारसी हो रहे हैं, तो भला बनारसी क्यों न आ उपस्थित हों। वास्तव में कैसे-कैसे धनी और मानी लोगों की इस समय यहाँ भीड़ भरी है। बड़े-बड़े बहुमूल्य वस्त्राभूषणधारी पुरुष इधर से उधर ठोकर खा रहे हैं और अनेक लखपतियों को तो कहीं बैठने का भी ठिकाना नहीं लगता है। सचमुच ऐसे समारोह की सभा तो कदाचित् बड़े-बड़े महाराजाओं के यहाँ भी न देखने में आती होगी।



इस कामदार नगरी के नीचे कामदार गद्दी मसनदों पर गुलाबी वागा पहने सातों स्वरूप श्री गोस्वामी महाराज लोगों के हैं। अहा हा! धन्य! क्या शोभा है! बीच में बड़े-बड़े अमूल्य हीरों का सरपेच लगाए और अधिकता से केवल श्वेत हीरे ही के अनेक आभूषणों से भूषित कांकरौलीपति गोस्वामी श्री बाल-कृष्ण लाल जी महाराज विराज रहे हैं। उनके पास वाले उनके ज्येष्ठ भ्राता हमारे लाल बाबा साहिब काशी के श्री गोपाल मंदिर के टिकैत गोस्वामी श्री जीवनलालजी महाराज, और शेष ब्रज, बंबई और कोटे के महाराज लोग सुशोभित हो रहे हैं, और दोनों पाशर्व में गुलाबी कमखाब के फ़र्श पर भट (अर्थात् उनके संबंधी लोग) न्यूनाधिक वैसे ही वस्त्राभूषणधारी विराजमान हैं। इन महानुभावों के मुखारविंद की शोभा ही कुछ दूसरी है, और एक अद्भुत श्री की छवि आई है। अहा! इन महाराजों के दर्शन से यद्यपि हमारे प्राचीन आर्य वेष का परिचय सा मिलता है। देखिए तो इन जवाहिरात से जगमगाते वेष के आगे आजकल की टुच्ची चाल पर कैसी घृणा होती है, मानो यह इंद्र आदि आठों दिक्पाल हैं, जो यहाँ विराजे हैं, या सप्तर्षियों की गोष्ठी है एवं उस बुढ़वामंगल की बारात की कदाचित् यही कच्छा नृत्यशाला भी है। यह दूसरा कच्छा बग़ीचे को लिए कहाँ चला गया? हाँ, आज उसी पर अंग्रेज़ों का निमंत्रण भी तो है। यह क्या पार में अग्निक्रीड़ा (आतिशबाजी) भी आरंभ हो गई! हाँ! मंगल के अवसर पर यह सामग्री भी तो आवश्यक ही है। वाह! यह धमाका, यह चर्खियाँ, यह पटेबाज़, यह टट्टी, फुलझड़ी! अहा, ये बान कैसे ऊपर जा रहे हैं! वाह, ये गंज सितारे तो टूट-टूटकर आकाश के सब सितारों यो मंद कर अपनी ही रंग-बिरंगी प्रभा फैला चले, मानो इस बुढ़वामंगल के अवसर पर सुर समूह सुमन वर्षा कर हर्ष प्रगट कर रहे हैं। यह बिजली की लालटेन क्यों इधर घुमाई गई। हाँ, दूसरे कच्छे की ओर वाह! यह तो श्वेत कच्छा देखते ही देखते अँग्रेज़ और मेमों से भर गया! अहा, इतनी दूर से भी इस विद्युत प्रभा के द्वारा समस्त दर्शनीय वस्तु यथार्थ दृष्टिगोचर होती है। साहिब, मैजिस्ट्रेट और कमिश्नर आदि सभी प्रतिष्ठित राजकर्मचारी लोग आ डटे हैं। यह भी एक अपूर्व दृश्य है! जाने दो भाई! अब इधर अधिक देखना ठीक नहीं। समय बहुत टेढ़ा है। अच्छा, अब आगे की भीड़ हट गई है, और महाराज लोग भी इधर ही देख रहे हैं! बस उचित अवसर जान, जैसे ही खड़े होकर प्रणाम किया, कि इशारे से आज्ञा हुई कि यहाँ आओ। प्रणाम करके बैठने पर कुशल प्रश्नादि सन्मान जो मुझ समान सामान्य जन के लिए अवश्य ही अपार कृपा का विस्तार था, पाकर परमानंदित मन ने मान लिया कि जो सुनते थे कि—



'शुनीदा के वुअद मानिन्दे दीदा।'



(अर्थात् सुना देने के तुल्य कब होता है) सो आज आँखों देखा।



उन दोनों बंगालिनों की बारी आई, कि जिन्हें हम लोगों ने मुग़लसराय के स्टेशन पर देखा था। वाह! इस समय तो इनका कुछ और ही बनक बन रहा है। बंगीय वस्त्रालंकार और सिंगार कुछ विचित्र ही बहार दिखा रहे हैं। इन्हें निहार चुटीले चित्त वाले प्रेमियों का अपने को वार फेरकर इन पर बलिहार जाना क्या आश्चर्य है? अब इन लीलावतियों की लीला कैसे लिखने में आए, कि जो केवल देखने ही का विषय है। वाह, इनका नाटकीय बंगला गान यद्यपि बंग भाषा से अज्ञान अनेक जनों को नहीं समझ पड़ता होगा, किंतु हाव-भाव, कटाक्ष की काट से उन्हें कौन बचाएगा? देखिए तो केवल साड़ी पहने ये इस समय नाच रही हैं, परंतु दर्शकों की आँखों से पूछिए कि वे अपनी नाच भूल कर एकटक लगाए, मानो धन्य-धन्य कहना चाहती हैं। इन मधुर अधरों से निस्मृत स्वर स्वाभाविक ही सुधास्त्रावसा श्रवणानंददाई है, फिर बंग-भाषा के माधुर्य सरस स्वाद को सौ गुना बढ़ा रही है। 'यमुना पुलीने वोशी कांदे राधा विनोदिनी।’ बलिहार! बलिहार! कहता मन जो उस रस में फँसा तो बस, फिर कुछ काल तक इसका कुछ परिज्ञान ही न रहा कि यहाँ क्या हो रहा है!



रात भी अब थोड़ी ही है, दो दिन की उनीदी आँखें अब अपना कहना भी नहीं करती, अतः खिसकना ही ठीक है। प्रातःकाल होई चुका था, डेरे पर पहुँचते-पहुँचते दिन भी कुछ चढ़ आया। नित्य कृत्य से निवृत हो जो सोए, तो संध्या को ओरों से जगाए गए। अस्तु, फिर उसी पाठ पढ़ने को चलते-चलते आठ ओर राजपाट पहुँचते नौ बजे, क्योंकि आज यहीं से आरंभ करने का विचार स्थिर हो चुका था। यहाँ से जो नौका पर चढ़कर चले, तो आज मेले की कुछ दूसरी ही शोभा लखाई पड़ने लगी, मानो मेले की दशा भी आज उस तरुणी की युवावस्था की सी है, जिसमें मनोहरता और निकाई अपनी अंतिम अवस्था पर पहुँचना चाहती है। राजघाट की ओर से सब नौकाएँ असीघाट की ओर चली जा रही हैं। ऐसा अनुमान होता कि मानो आज श्री गंगाजी अपनी धारा उलटकर पश्चिम की ओर बहा रही हैं, और प्रवाह के कारण स्वयं सब नौकाएँ उधर ही बही जा रही हैं। अथवा गंगाजी आज आकाश-गंगा हो, देवों का आकाश मार्ग (डहर) बन गई हैं, जिस पर से बुढ़वाभंगल में पाए देवताओं के विमान बरात के संग विदा होकर मानो अब दूल्हे के घर कैलाश को जा रहे हैं। अहा, ये असंख्य नौकाएँ इस शीघ्र गति से आपस में बचती-बचाती ऐसी उड़ी चली जाती हैं, कि जैसे लोटाभंटा के मेले में असंख्य पतंग उड़ाने वालों को लागडाँट से अमल आकाश में ढील की डोर पर छूटी अनेक प्रकार को रंग-बिरंगी पतंगें आपस में पेंच खाती और बचती-बचाती वेग से बढ़ी चली जाती हैं। यों ही इन नौकाओं पर प्रज्ज्वलित नाना रंग-रंजित दर्पण, वर्ण के मध्य से मोमबत्तियों और रंगबिरंगी महताबों के प्रकाश की आभा जल में पड़कर मानो एक्की-एक्की दून लगाती ऐसा अनुमान कराती, कि कदाचित् श्री गंगाजी ने अनेक रंग के असंख्य कमल खिलाए हैं! वा भगवती भागीरथी ने अपने प्रिय पति रत्नाकर के समस्त अमूल्य रत्नों का हार बनाकर निज प्रिय सखी काशी के गले में पहनाना चाहती हैं। वाह! अनेक घाटों पर भी आज रोशनी हुई है, यह तो इस समय मानो सड़क को लालटेन वा मील के पत्थरों का कार्य दे रही है, क्योंकि इस समय इनके न रहने से न तो तट, और न घाटों की संज्ञा का ज्ञान हो सकता है। यह क्या मणिकरिणका महातीर्थ है? वाह, यहाँ की रोशनी तो मानो बतला रही है कि सच्ची रोशनी बस यही है, और सब रोशनियाँ झूठी हैं! अनेक चिताएँ जल रही हैं और अनेक शव स्थान-संकोच के कारण कफ़न लपेटे पड़े हैं तथा सैकड़ों जन रोते-बिलखते लखाई पड़ रहे, मानो इस मसल की सच्चाई साबित कर रहे हैं कि—'दुनियाँ भी है क्या बलंदी सराय। कहीं ख़ूब ख़ूबी, कहीं हाय-हाय।' क्यों नहीं, मुणडमालधारी भगवान् भूतनाथ रुद्र की राजधानी काशी न है, कि जिसका नाम ही महाश्मशान है।



कदाचित् यही उनके कार्यालय का स्थल भी है, क्योंकि 'चिता भस्मा लेपी गरल असनम्' को श्मशान का निवास ही प्रिय है। सच है, सच्चे उदासीन और विशुद्ध विरक्त के रहने के योग्य इनके सिवा और कोई स्थान भी तो समीचीन नहीं है। जिसके तनिक देखने ही से विचित्र ज्ञानोदय होता और पाप का भय, तथा धर्म की चिंता होती है, इसी से श्मशान भी एक मुख्य ज्ञान का स्थान माना गया है।



धन्य काशी कि जहाँ उच्चातिउच्च तथा नीच, म्लेच्छ आदि को भी वह दृश्य देख ज्ञानलाभ करने का अवसर मिलता, पाप करते भी धर्मशिक्षा मिलती है। देखिए, आज इसी ओर कई सौ नौकाएँ, और सहस्त्रों मनुष्य गए हैं? पर क्या किसी को कुछ भी ज्ञान लाभ हुआ होगा? उन्हें कैसे ज्ञान लाभ हो, जो इधर देखते ही नहीं?



धन्य है हिंदू धर्म तथा उनके विश्वास सन्मान को कि मध्य नगर में यह प्राचीन पवित्र तीर्थ आज भी ज्यों का त्यों अपना प्रताप दिखाता वर्तमान है। नहीं तो इस अँग्रेज़ी सफ़ाई की सनक समय में इसका यों यहाँ अपने पूर्व कार्य को करते रहना कितना असंभव है, विशेषतः जब कि प्रतिवर्ष या लाट और राजप्रतिनिधियों के दृष्टिगोचर होता ही रहता है? यह क्या बारह बज गए, कि जो मंदिरों में आधी रात को नौबत बज रही है। धन्य, यह भी हम आर्यों की प्राचीन चाल है, मानो यह अब जागृतों को शयन में अतिकाल होने की सूचना दे रही है। अच्छा भाई, तनिक और शीघ्रता से रोओ। यद्यपि असीघाट अभी दूर है, पर नौकाओं का झुंड इधर घना हो चला। जान पड़ती है कि आज भी कुछ नई नौकाएँ पटी हैं।



मारुत के शीतल झकोरों के साथ हमारी नौका शीघ्रतापूर्वक अब सुसज्जित नौकाओं के बीच से होती हुई अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गई।



यद्यपि कि उस काल का मनोरम चित्र यही कहता था कि टुक और रुको, देखो, पर कार्य अपनी आतूरता के घोड़े पर सवार, शोघ्रता से ही इस अनोरो मेले से प्रस्थान करने के लिए प्रेरित कर रहा था। अस्तु, मैं शीघ्रता से यहाँ से चलकर अपने साथियों से छुट्टी ले, मेले को प्रतिभा और सफलता का चित्र हृदयंगम किए हुए अपने आश्रितगणों से शीघ्र चलने के लिए शीघ्रता कराते हुए, जल्दी क़दम बढ़ाते हुए, मेले के अनुपम वातावरण को छोड़, आगे बढ़ता हुआ चल पड़ा।

रंग की पिचकारी – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Rang Kee Pichakaaree

‘कवि वाचन सुधा’ के पीछे ‘नागरी नीरद’ ही ने होली का नंबर निकाल लोगों को उसकी विधि बतलाई और प्राय: होलियों में वाह अपना आरंभ किया हुआ कर्तव्य करता ही जाता था। क्रमश: कलकतिए समाचार पत्र भी होली मनाने लगे; नहीं तो वे स्वदेशाचारानुसार प्राय: शारदीय पूजा ही में हँस लिया करते थे। यों देखादेखी जो लोग इधर होली में हँसने लगे, तो प्राय: निज योग्यतानुसार अपने पाठकों के मनोरंजन के हेतु भी होते रहे और अवाश्य ही कोई-कोई उनमें कृतकार्य भी हो जाते थे। यद्यपि वाह एक ही रंग में शराबोर न भी दिखलाते, तथापि उनमें कुछ सुहावाने रंग की पिचकारी के छीटों से सुशोभित लखाते ही थे। किंतु उन्हें देख कुछ लोगों ने बेरंग अथवा बेढंग रीति से भी रंग छिड़कना आरंभ किया,—ठीक उसी भाँति, जैसे कि आज कल योग अपने केशर, बक्कम, मजीठ वा किंशुक और गुलाल के लाल और पीले रंग के स्थान पर विविध रंग की विलायती नीली हरी वा बेगनी रंग की बुकनी से बने विविध विरूद्ध रंगों को फेंक न केवाल लोगों के वास्त्र ही बिगाड़ देते, वारंच देखने वालों की दृष्टि को विरूद्ध दृश्य दिखला कर बेंत खाने के योग्य कार्य करते, यों हीं कोई किसी के मुँह में बलात् कालिख लगा गले में लताड़ियों की माला पहना जूतियाँ खा जाते हैं। तद्रूप कई लोग चाहे किसी को अच्छा लगे वा नहीं, कुछ बेढंगी बातें बक देने ही में अपने को कृतकार्य मानते हैं! वास्तवा में यह ठीक नहीं, इसी से ऐसों की दशा पर अगले कवियों ने कहा है कि—“होली खेलही न जाने, वाह तो निपट अनारी!” सो यदि कोई अपने पत्र पाठकों को सुहाती हँसी ठिठोली से प्रसन्न कर सके, तो उसका होली मनाना सर्वथा उचित है, किंतु व्यर्थ किसी का दिल दुखाने वा घृणा उत्पन्न कराने से कोई लाभ नहीं। युक्त रीति पर गाली देने में भी रस आता और अयुक्त रीति पर स्तुति भी बुरी लगती है। इसी से इसमें इसका ध्यान रखना अत्यंतावाश्यक है कि जिसमें किसी को हँसी के स्थान पर रुलाई न आए। यों ही जैसे लोग कालिख आदि के व्यवाहार से किसी को कष्ट पहुँचाने ही के अर्थ होली के आने की प्रतीक्षा करते, वैसे ही कुछ लोग इसी व्याज से कुछ मर्मस्पर्शी बातें कहकर किसी से दूसरी कसर निकालने ही के लिए व्यर्थ उटपटांग बातें बक चलते हैं कि जो सर्वथा अयोग्य हैं। कुछ लोग अब एप्रिल फूल के भी फूल बनते हुए वास्तवा में अपने को फूल प्रमाणित करते हैं। क्योंकि होली-फूल जब एप्रिल फूल का परदादा हुई है तो क्यों वाह हिंदू होकर व्यर्थ क्रिस्तानों के मेले में मिलने का प्रयत्न करते हैं?



इस वार्ष भी कुछ लोगों ने होली मनाई और किसी से कुछ ठिकाने से बोली ठोली बोलते भी बन आई। जहाँ कुछ कचाई है उसके अर्थ आगामि में सुघड़ई लखाई जाने पर ध्यान रहे, व्यर्थ की ढिठाई से हँसाई कराना ठीक नहीं। क्योंकि इस बार भी देखा कि कई लोगों ने कैयों पर अयोग्य आक्रमण किए जो अनुचित थे। समान श्रेणी में भी संभ्रांत के संभ्रम का विचार अवाश्य है। गुलाल, बाप, भई, बेटे और साले को भी लगाया जाता ही है, किंतु सब को एक समान नहीं। वारंच उसमें भी भेद रहता है। बस, इसमें भी उसका ध्यान रखना चाहिए; नहीं तो केवाल जलकिटी के आधिक्य से आनंद के स्थान पर केवाल रसाभास और वैमनस्य ही की वृद्धि सदा सुलभ है। यद्यपि इस बार कोई व्यक्ति विशेष इसका लक्ष्य नहीं है, वारंच केवाल सामान्य भावा का रंग छिड़कावा है; तो भी आशा है कि इस पिचकारी के छीटों से लोग चैतन्य हो जाएँगे।



लाल गुलाल तो मानों होली वा फागुन का प्राण है क्योंकि इसकी शोभा का हेतु है। अवाश्य ही गड्डामियरी पौशाक पहनने वाले बहुतेरे अँग्रेज़ीबाज़ साँवाले लोग इसका लगवाना मानों अपने मुँह में कालिख लगवाने से कम नहीं जानते, किंतु उन्हें आर्य संतान ही नहीं मानते, इसी से उन्हें केवाल संसार का कूड़ा करकट समझ होलिकानल में झोंक देना मात्र ही इति कर्तव्य समझते। नहीं तो जो इस वार्षांत में हर्षोच्छलित मन बनाने वाले, स्वाभाविक मानवा मात्र को आनंद विह्वल वा प्रेमोन्मत्त के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में अपने इष्ट मित्रों के गालों पर लाल गुलाल न मले अथवा उसे वारण करे तो किसी कवि के कथानुसार उसे इसी पद्य का संबोधन उचित है कि—“नाहक तू जन्म लीन्यो मूरख अवानि महिं, बूड़ि क्यों न गयों उल्लू चुल्लू भर पानी में।” सुतराम् हम इस होली के हौस में भर अपने सुहृद सहयागियों और प्रिय पाठकगण के गाल लाल किए बिना नहीं रह सकते और हँसकर उन्हें प्रेमालिंगन किए नहीं मान सकते। अवाश्य ही वे बहुत दूर पड़े हैं, किंतु मन उनसे वाहीं मिलकर इन कार्यों के करने में समर्थ है, अत: वाह अपना कार्य का अपराध की क्षमा चाहता है।



हमारा होली का त्योहार हँसी-ठठोली, बोली-ठोली और गाली-गलौज के अर्थ भी विख्यात है। वास्तवा में हर्ष का चिह्न भी यही है, आनंद मनाने का नियम भी यही है और सच पूछिए तो इस होलिकोत्सवा का वास्तविक सत्कार भी यही है। हाँ, अवासर और पात्र तथा उसके प्रयोग के प्रकार का विचार अवाश्य है; क्योंकि इसके विरुद्धाचरण से फल विपरीत होता है। सो सहृदय पाठकों की कृपा से होली बीत जाने पर भी उसका अवासर उपस्थित है, अब पात्र का विवेक मात्र और सापेक्ष्य है। पात्र हमारे प्रिय पाठकों से बढ़कर कोई मिलता कब है। मिले भी तो उसकी इतनी प्रतिष्ठा कहाँ कि वाह इस सत्कार का भागी हो सके। इसी से अब हम उन पात्रों के तीन भेद कर अर्थात् पात्र, सुपात्र और कुपात्र तीनों के अर्थ अलग-अलग यथा योग्य तीनों सत्कार का प्रयोग करके होली मनाने का प्रयत्न करेंगे।



लोग तीन का नाम सुन चौकेंगे कि “भाई! यह तीन कैसा? नहीं नहीं! डरने की कुछ बात नहीं है। हम अपने ग्राहकों के तीन भेद कर उनके अर्थ होली के तीनों सत्कार का प्रयोग करेंगे। जैसे कि एक सामान्य सुपात्र की जिन्हें कुछ परलोक में यमदंड और इस लोक में उपहास का भय है, इस पत्रिका पर यथार्थ अनुराग के कारण जिन्होंने कादंबिनी का यदि सब नहीं तो कुछ मूल्य दिया है; उनको हम सामान्य बोली-ठोली ही से सत्कार करते हैं और वाह केवाल एकमात्र कि—कृपाकर निज कृपा विस्तारपूर्वक अब शीघ्र मूल्य दे दीजिए और हमारा अनंत धन्यवाद ग्रहण कीजिए। दूसरे श्रेणी के पात्र हमारे वे बेख़बर पत्र पाठक कि जो पत्र तो जब मिला खोलकर अपने मनोरंजन में प्रवृत्त हुए, किंतु दाम देने की कोई आवाश्यकता ही नहीं समझते। कदाचित् उनमें कुछ लोगों के ध्यान में—यदि कभी कुछ मूल्य देना पड़ेगा—समाता भी होगी, तो तबी कि जब उन पर कठिन चाँप चढ़े, क्योंकि सामान्य सूचना वा कार्डों का पचा जाना तो उनके अर्थ सदा सुलभ है। अत: उनकी सेवा में द्वितीय श्रेणी का सत्कार समपर्ण कर हम यह प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर के निहोरे कुछ धर्म का भय भी विचार अब मूल्य भेजने की दया दिखाएँ और हमें अनुगृहीत बनाएँ तथा अधिक न सताएँ। हम पात्रों से अधिक खोद विनोद न कर केवाल इसी कटु वाचनों द्वारा उन से छेड़खानी कर कृतकृत्य होने की आशा रखते हैं। आशा है कि तृतीय श्रेणी के प्रवेश से डरकर उदारता का परिचय देंगे। रहे वे जो ईश्वर ही के घर से तृतीय सत्कार गाली गलौच के पात्र वा कुपात्र हैं, उनकी तो कथा ही अकथ है। वे सदैवा लज्जा का पर उलट बेसुध औंधे पड़े रहने वाले, पत्रों के निवाले निगलते ही चले जाते नहीं अघाते और डकारते तक नहीं, सदैवा पराए पत्र पत्रिका को निज पिता की संपत्ति समझते दाम के नाम की भी चिंता चित्त में नहीं लाते। कितने ही तक़ाज़ों के पत्र और कार्ड नित्य जिनके रद्दीदान में पड़े सड़ा करते और वे कहीं से कुछ भी कान पूँछ नहीं हिलाते! बहुतेरे उनमें ऐसे भी नर पिशाच देखने में आते कि जो पाँच वार्ष पर्यंत निरंतर पत्रिका पढ़ वेल्यूपेएबिल पार्सल के मूल्य देने से मुकर कर अधिक हानि के घलुए दिलाने के भी कारण होते। तब सिवाए सौ गाली को छोड़ वे अन्य और किस सत्कार के पात्र हैं और उन्हें छोड़ तीसरे का स्वत्व किसे पहुँच सकता है? सुतराम् उनके इधर और उधर सात पुश्त को लाख गाली है। आशा है कि अब अपने यथोचित सत्कार को पा वे प्रसन्न हो किंचित कांख-कूँख कर अपनी संकुचित कृपा को विस्तार दे आगामि में इसकी आवाश्यकता न लाएँ।



इन सब से विलक्षण कुछ ऐसे भी व्यक्ति विशेष हैं कि जो इन अंतिम श्रेणी वालों के भी दादागुरु हैं। जिनसे प्रथम तो हम तक़ाज़ा ही नहीं कर सकते और यदि करते तो केवाल खीस बा कर केवाल हैं—हें की हिनहिनाहट सुनाते वा कहते कि हम तो इष्ट हैं, मित्र हैं, हमसे मूल्य! वे यह भी नहीं जानते कि अंतत: काग़ज़ रोशनाई और डाक का महसूल कुछ भी तो देना चाहिए, वाह खैराती खाते में भी जाते लजाते। पत्र प्रेरकों में भी सूरत नहीं दिखाते फिर ऐसों को कहिए कि क्या कहें? और उन्हें कौन सी गाली दें कि जो निर्लज्ज शिरोमणि विधाता के घर के बने हैं! अस्तु, ऐसे कंजूस मक्खीचूस ग्राहक भी क्या कुछ शर्माने की कृपा दिखाएँगे!



हमारे तरफ़ से जो त्रुटियाँ हुआ करतीं उसका हम स्वयं शोधन कर, पूरा मूल्य नहीं चाहते, वारंच हिसाब से घटाते हैं। यदि वाह चाहे कुछ जुर्माना भी लें किंतु क्या वे कुछ न देकर ही पत्र-पठन-न्याय संगत मानते हैं? वे पत्रिका लौटा ही देकर आगामि से क्षति न पहुँचाने की भलमनसाहत दिखा सकते थे। जो हो, आशा है कि हमारे सज्जन पत्र-पठन-समूह इस होली की गाली गलौज से अवाश्य शिक्षा ग्रहण कर अपनी वास्तविक कृपा दिखाएँगे। होली की इस ठठोली को निरी ठठोली ही जान वैद्य की गोली सी न पचा जाएँगे। यदि वे ऐसा करेंगे, तो सचमुच गाली खाएँगे, अन्यथा इस बोली-ठोली पर प्रसन्न हो बुरा न मान वे अवाश्य ही प्रसन्नता का प्रमाण दें हमें अनुगृहीत बनाएँगे।

संत लाधूनाथ के सबद : Sant Ladhunath Ke Sabad

संत लाधूनाथ आधुनिक काल के संत कवि थे और उनका संबंध राजस्थान के मसूरी क्षेत्र से बताया जाता है। वे दलित समाज से जुड़े थे, लेकिन उनकी रचनाओं का शिल्प संत काव्य की पुरानी परंपरा से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। उनकी कविता में आत्मज्ञान, गुरु-महिमा, राम-नाम और भक्ति के साथ ऊँच-नीच तथा धार्मिक आडंबर से ऊपर उठने की बात मिलती है। मनुष्य को भीतर की सच्चाई खोजने और नाम-स्मरण की ओर ले जाना उनकी वाणी का महत्वपूर्ण पक्ष है।

‘अबधू अखी देश हमारा’, ‘कारीगर धन चेजारा भारी’, ‘भजन में सब कोई को सीर’ और ‘हँसला जुग जीता बड़भागी’ जैसे सबदों में निराकार परम सत्ता, आत्मचिंतन, भक्ति और गुरु-कृपा के विचार सामने आते हैं। उनकी भाषा में राजस्थानी लोकभाषा का रंग है 

अबधू जुग से करी उदासी

अबधू जुग से करी उदासी।

अखी देव से डोरी जोड़ी टूटी काल की फाँसी॥

एक दिन पवना ऐसी आसी उड़सी धरण अकासी।

खंड ब्रह्मंड सब उड़ जासी चंदा सूरज बिलासी॥

ब्रह्मा विष्णु शिव अरू शक्ति सब ही काल के दासी।

हर नारायण शेष महेशा काल चकर में आसी॥

रंग रूप काया अरू माया उत्पत रचना नासी।

रहसी एक आत्मा अमर विरला जोगी ध्यासी॥

लाधूनाथ आप से मिलिया नहीं आवे नहीं जासी।

मूल पेड़ सब खोजी जोगी सत की बाणी गासी॥

नारी सब रचना की खाँणी

नारी सब रचना की खाँणी।

देवी-देवता नारी में उपजा नारी में पवना पाँणी॥

ब्रह्मा विष्णु नारी राखी सदा नार के सँगा।

आदि शक्ति शिव की नारी रच्या लिंग अरू भंगा॥

राम कृष्ण संग नारी रमती नाथ मछंदर भोगी।

व गोरखनाथ एकला रहता आदि अखंडी जोगी॥

ध्रुव प्रहलाद रिषेसर मुनि नारी के पेट से जाया।

बरन अकाश चंद्रमा सूरज नारी के भग से आया॥

तीनूँ लोक इक्किसूँ ब्रह्मंड भग में सकल पसारा।

हरनारायण शेष महेशा कोई नहीं निकले बारा॥

इस नारी को त्यागी होसी वो पाखण्डी पूरा।

रूप-रूप घट-घट में नारी किसविध होसी दूरा॥

लाधूनाथ की तीजाँ नारी कबहूँ ना अँग से त्यागी।

अखे मंडल में हँसा पूगा जोगेश्वर बड़ भागी॥

कारीगर धन चेजारा भारी

कारीगर धन चेजारा भारी।

धरा गिगन चंदा सूरज रचिया रचदी रचना सारी॥

लख चौरासी जूणी रच दी देखा न्यारी-न्यारी।

नर-नारी को आप बणावे आप पुरुष नहीं नारी॥

रामचंद्र कई किरोड़ों हो गए किरोड़ों कृष्ण मुरारी।

तेरा भेद वाहीं नहीं पाया तू तो अथग अपारी॥

वेद कतेब पार नहीं पावे कुदरत कला तुमारी॥

काजी पंडित रीता जावे देवी-देवता हारी॥

अनघड़ अलख लख्यो नहीं जावे अमरदेव निराकारी।

लाधूनाथ आत्मा खोजी सत का शब्द पुकारी॥

हँसला कुण माता कुण मासी

हँसला कुण माता कुण मासी।

हरी भजन बिन दुख में जावे अंतकाल पिछतासी॥

तीर्थ व्रत से पाप धुपे नहीं न्हावों गंगा काशी।

वेद पुराण पढ़ो भावे गीता हाथ कछु नहीं आसी॥

काया नगर में अमर आत्मा नहीं ऊपजे नहीं नासी।

भूला जीव पत्थर कूँ पूजे घट की अक्ल गमासी॥

सत्संगत कर गुरु की सेवा निराकार कूँ ध्यासी।

अखी जोत में हँसा मिलिया काल कबहूँ नहीं खासी॥

लाधूनाथ जागता जोगी सत की बाणी गासी।

आवागमन में फेर नहीं आवे एक देव कूँ ध्यासी॥

पिंडतों कैसे राम रिझाया

पिंडतों कैसे राम रिझाया।

वेद कतेब भ्रम की फाँसी पार कोई नहीं पाया॥

तीर्थ व्रतकर पत्थर पूजो फिर गिर शीश निवाया।

जड़ जूँण में जीवडो जासी बहुत घणा दुःख दाया॥

गीता पुराण भागवंत बाँचो रामायण पढ़ गाया।

राम कृष्ण जी परले आया झूठा जुग भरमाया॥

धरा गिगन अरू चंदा सूरज माया खेल रचाया।

हर ओंकार काल के माहीं सबको जमड़ा खाया॥

खंड मंड सब भस्मी होसी ऊपर अग्न जलाया।

तीन लोक अरू चवदे भवन में धधुंकार मिलाया॥

ऊँच नीच में एक अखंडी चराचरी में छाया।

हिंदु मुसला नर अरू नारी पूर्ण ब्रह्म समाया॥

लाधूनाथ आत्मा खोजी एक देव को ध्याया।

निराकार में डोरी साँधी अखी नगर बसाया॥

भजन में सब कोई को सीर

भजन में सब कोई को सीर।

ऊँच नीच हो नर नारी हो पूगे पेले तीर॥

हर की भक्ति करो प्रेम से राजा प्रजा फ़क़ीर।

जिन बिना नर ढौर समाना पंडित कसाई कीर॥

राम नाम से काया माँजो पीवो इमरत नीर।

पाप कल्पना सारी धोवो निर्मल करो शरीर॥

हँसा होय चुगो नित मोती नाम अमोलख हीर।

ध्रु प्रह्लाद कई हँस चुगता चुगता गोरख कबीर॥

लाधूनाथ जागता जोगी दृढ़ बुद्धि मन धीर।

गुरु प्रताप भजन में पूरा पाई अमर जागीर॥

अबधू जग परले में जावे

अबधू जग परले में जावे।

एक देव की भक्ति भूला निर्फल जन्म गमावे॥

गीता वेद भागवंत बाँचे सार तंत नहीं पावे।

तीर्थ व्रत देवरा पूजे जीव जाल उलझावे॥

पिता पुत्र में कोई नहीं संगी आप किए फल पावे।

गुरू सेवा सत संगत छोड़ी पापी पाप कमावे॥

काजी पंडित राजा प्रजा सबको जमड़ा खावे।

तीन लोक में उत्पत्त रचना पृथ्वी में मिल जावे॥

अकाश मंडल में अग्न तपेगी सभी भस्म होय जावे।

धरणा अकाश चंद्रमा सूरज मंडल खेण नहीं पावे॥

लाधूनाथ आत्मा खोजी आप अखंडी ध्यावे।

निराकार में जोती मिलगी सत में बूँद सँमावे॥

हँसला रटो हरि की माला

हँसला रटो हरि की माला।

काल जमाँ का बंधण टूटे कटे जीव का जाला॥

जीभ होट का काम नहीं कुछ नहीं कुँची नहीं ताला।

सत की डोर शब्द का मिणिया फेरे गुरु का बाला॥

निज नाम का धोरा उल्टी अखे नाम असराला।

सुन्न मंडल में भरी भंडारा जोगेश्वर मतवाला॥

अमर कोट में झिंडा फरूके किरोड़ जोत उजियाला।

अधर छत्र जोत में जोती मिले समंदर नाला।

लाधूनाथ आप से मिलिया नहीं धोला नहीं काला॥

भजन बिन ऊमर पाई थोड़ी

भजन बिन ऊमर पाई थोड़ी।

दान पुन्न को भूल गयो नर माया बहुत सी जोड़ी॥

पाप कपट के घोड़े चढ़ियो मूर्ख मूँछ मरोड़ी।

घड़ी पलक भर जुग में जीवणों जमड़ा गर्दन तोड़ी॥

भाई कहवे मेरी बाँह टूटगी नारी कहवे मेरी जोड़ी।

मात पिता रोवे चिल्लावे पीट-पीट छाती फोड़ी॥

मतलब के संगी सब जुग में इनसे मुखड़ो मोड़ी।

मोह माया में फँसे प्राणी अंतकाल में छोड़ी॥

कई कंगाल कई मायापति कई-कई लाख किरोड़ी।

लाधूनाथ भजन बिना माया झूठी फूटी कौड़ी॥

हँसला जुग जीता बड़भागी

हँसला जुग जीता बड़भागी।

जरा मरणा का बंधन टूटा सत में बूँद सँमागी॥

दु:ख मिटे सुख संपत्ति पाई काम कल्पना भागी।

तृष्णा ताप तप्त सब बुझगी अलख नाम लिव लागी॥

निर्मल हुवा पाप सब धुपिया अणघड़ मिलिया सागी।

भेद मरम कोई विरला पावे नहीं भेला नहीं त्यागी॥

आरपार में जोगी खेलो नहीं सूता नहीं जागी।

रँग नहीं रूप धूप नहीं छाँया नहीं कोई थाग अथागी॥

लाधूनाथ आपको ध्यावे काल मौत नहीं खागी।

अखी नगर में हँसा पूगा सतगुरु मिलिया पागी॥

अबधू अखी देश हमारा

अबधू अखी देश हमारा।

मेरे देश में ऊपजे नहीं बिणसे किरोड़ जोत उजियारा॥

खंड नहीं ब्रह्मंड अगम नहीं नगमा चाँद सूरज नहीं तारा।

धरा नहीं गिगन पून नहीं पाणी नहीं वहाँ सकल पसारा॥

ब्रह्मा न विष्णु शिव नहीं शक्ति नहीं वहाँ हरकारा।

जात वर्ण कुल काया नाहीं निराकार निरधारा॥

नहीं वहाँ भोम नहीं वहाँ बस्ती नहीं जीता नहीं हारा।

नहीं वहाँ ऊगे नहीं वहाँ आथे नहीं वहाँ रात अँधारा॥

लाधूनाथ अखंडी मिलिया नहीं मरता नहीं मारा।

नहीं वहाँ पिता नहीं वहाँ पुत्र नहीं भेला नहीं न्यारा॥

जोगी राजा तेरी कुदरत न्यारी

जोगी राजा तेरी कुदरत न्यारी।

जन्म मरणा में कबहूँ नहीं आयो काल जम नहीं मारी॥

नहीं तूँ हिंदू नहीं तूँ मुसला नहीं पुरुष नहीं नारी।

नहीं तूँ ओछा नहीं तूँ लंबा नहीं हल्का नहीं भारी॥

नहीं तूँ घटता नहीं तू बढ़ता नहीं जीता नहीं हारी।

नहीं तेरे रूप वर्ण कुल काया अखी अमर निराकारी॥

नहीं तेरे कोट नहीं तेरे क़िला नहीं तेरे अधर अटारी।

नहीं तेरे भोम नहीं तेरे बस्ती नहीं आर नहीं पारी॥

लाधूनाथ तुम्हीं से मिलिया मुख बिना बोल उच्चारी।

नहीं तुम प्रगट नहीं तुम गुप्ति नहीं खिड़की नहीं बारी॥

किसको कहूँ भजन की बाताँ

किसको कहूँ भजन की बाताँ लोग भ्रम में भूलाजी।

सुख सागर हरी नाम छोड़कर दुख समंदर में झूला जी॥

पाँच तत्व अरू तीन गुणा का काया का स्थूला जी।

दशवें गुप्त लगाया ताला नव दरवाज़ा खुला जी॥

झूठा खेल रचे दुनियाँ में जैसे दुली दुला जी।

पल में ऊपजे पल में बिणसे पाणी का बुलबुला जी॥

पापी नुगरा दुःखी जगत में आँधा पँगला लूला जी।

दया धर्म जिसके घट नहीं है उनका सब धन धूला जी॥

काले चक्कर में देवी-देवता काजी-पंडित-मुल्ला जी।

लाधूनाथ आत्मा खोजी सब जुग अमर खुला जी॥

भजन की कहाँ लग करूँ बड़ाई

भजन की कहाँ लग करूँ बड़ाई।

पाप धुपा तन भया पवित्र हँस अमरफल पाई॥

निज नाम की जहाज़ बनाई भवसागर तिरी आई।

हरी भजन का धोरा लागा कमी रही ना काई॥

पापी नुगरा जीव जगत में भजन बिना दु:ख पाई।

दया धर्म सत्संगत भूला जुग-जुग जमड़ा खाई॥

राजा हरिशचन्द राणी तारादे कर दीनी लोग हँसाई।

नीचे कुल में पाणी भरियो अलख डोर लिव लाई॥

अजामेल सा पापी तिरगा गिनका सज्जन कसाई।

करमाँ शिंवरी अधर्मी नारी सेजाँ मुक्ति पाई॥

अड़सठ तीर्थ गंगा जमना घट भीतर में न्हाई।

इमरत हौद भरे गिगना में प्याला भर-भर पाई॥

नानकनाथ मिले जोगेश्वर सूताँ की नींद उड़ाई।

लाधूनाथ जाग अबधूता निराकार को ध्याई॥

मेरा घर क्या बूझो भाई

मेरा घर क्या बूझो भाई।

काल जम्माँ के हाथ नहीं जाऊँ जोती में जोत सँमाई॥

आत्म तंत खोजकर देख सत गुराँ सेन बताई।

पाप कल्पना सारी धुपगी इमरत प्याला पाई॥

बंकनाल में रमणी रमिया ध्रु लग ख़बर मंह गाई।

अखी नाम का धोरा लागा कमी रही नहीं काई॥

अजब नगर की ऐसी महिमा मुख से कही नहीं जाई।

अधर छत्र वहाँ जोगी सूता काल मौत नहीं खाई॥

लाधूनाथ आप से मिलिया देव अखंडी ध्याई।

रँग नहीं रूप नहीं छाँया आवागिवण नहीं आई॥

हँसला दूर देश घर मेरा

हँसला दूर देश घर मेरा।

चंद नहीं सूरज पवन नहीं पाणी नहीं वहाँ रात अँधेरा॥

काजी पंडित वहाँ नहीं पूगे पच-पच मरे घणेरा।

तीन लोक अरू चवदे भवन में काल माया का घेरा॥

खंड नहीं पिंड पुरूष नहीं नारी नहीं मेरा नहीं तेरा।

वहाँ पूगा ऊपजे नहीं बिणसे फेर फिरे नहीं फेरा॥

नहीं वहाँ डिगे नहीं वहाँ डोले अधर अखंडी ठहरा।

अमर जोत में जोती मिलगी मिली संमद में लहराँ॥

लाधूनाथ आत्मा खोजी खोज-खोज कर हेरा॥

अबधू क्या बोलूँ जुग अँधा

अबधू क्या बोलूँ जुग अँधा।

हरि नाम हृदय नहीं जपते लाख उठावे धंधा॥

बेटा पोता जाल भ्रम को नारी भ्रम का फंदा।

बन्धियों जीव मोह की फाँसी पुतला गंदा॥

हस्ती घोड़ा माल खजाना सब झूठा छल छंदा।

काल चक्कर सिर ऊपर घूमे पल में भस्म करंदा॥

दशों अवतार ब्रह्मा अरू विष्णु जम को डाँड भरंदा।

शिव सनकादिक हरनारायण ऊपजे जन्म मरंदा॥

सबके ऊपर अटल अखंडी जोगी ध्यान धरंदा।

लाधूनाथ वहीं जा पूगा पूर्ण काम सरंदा॥

अबधू एक अचंभों भारी

अबधू एक अचंभों भारी।

कर बिना ढोल नगारा बाजे पग बिना नाचे नारी॥

बेटी अपणों पिता जन्मियों जन्मे इकन्न कुवाँरी।

हस्ती कूं कीड़ी परणाई चढ़गी अधर अटारी॥

एक बीज से सब जुग ऊपजे कुण पुरुष कुण नारी।

पाँच तंत को इंड बनायो जामें रचना सारी॥

आँधो पंगलो दोनूँ लड़िया कुण जीता कुण हारी।

आँधो निरखे पँगलों भागे खोली बेगम की बारी॥

इनके ऊपर देव अखंडी अमर आप निराकारी।

मूल नहीं पेड़ फूल फल बोहते कुदरत की गम न्यारी॥

लाधूनाथ आत्मा खोजी सत की सेन हमारी।

खोजी सो इमरत फल पा सी नहीं मीठी नहीं खारी॥

मैं जोगी उण को म्हारी हेली

मैं जोगी उण को म्हारी हेली नहीं पुरूष नहीं नारा।

नहीं भोम नहीं गाँव हे म्हारी हेली नहीं अधर निराकारा॥

कुण जीव कुण पीव हे म्हारी हेली कुण आवे कुण जाय।

कुण माया कुण ब्रह्म हे म्हारी हेली किसको जमड़ा खाय॥

कुण संगी कुण साथ हे म्हारी हेली कुण पिता कुण पूत।

कुण गुरु कुण चेला हे म्हारी हेली कुण देव कुण भूत॥

कुण मरता कुण अमर हे म्हारी हेली जिसका भेद बताय।

आरपार में कुण हे म्हारी हेली सब घट कुण समाय॥

किरोड़ जोत को चानणों म्हारी हेली ऊपर छत्र छाय।

अखे जोगी की सेज में म्हारी हेली पर बिना हँसा जाय॥

लाधूनाथ जोगी जागता म्हारी हेली मुख बिना बाणी गाय।

बिना देह का देव हे म्हारी हेली रूप वर्ण कुल माँय॥

गेबी अजब अचंभा देखा

गेबी अजब अचंभा देखा मुख से कहूँ तो कयो न जाय।

तीन लोक ने कीड़ी गिटगी मुख उदर तो उनके नाँय॥

सूतो बटाउड़ो नींदरा जागे जल बिच अग्नि लागी लाय।

बकरी पकड़ कसाई ने मारे छुन्न-छुन्न करके माँस बिकाय॥

हड्डियाँ जलगी चूल्हों सीजे घर धणी ने खावे धान।

घड़ो बरसे कुवो भरीजे धिन्न जोगाँ रो पूरो ज्ञान॥

जले काँधिया मुड़दो जीवे जमड़े के शिर लागी मार।

शूरवाँ भागे कायर जूझे बिना फौज बावे तरवार॥

मुसलमान घर सूर मारियो हिंदू के घर मारी गाय।

धरमीड़ा नरकां में गिरगा पापी नर बैकुंटाँ जाय॥

लाधूनाथ बोलिया जोगी नानकनाथ जी खोज बताय।

ऊँचा मूल तले को डाला फल लागा पियाँला माँय॥

लाधूनाथ छुडावण चाला गऊ बनी के सिंग ने खाय।

सर्प कूं मूसो खा बैठो हस्ती कूं कीड़ी खा जाय॥

पुरुष ऊपर माचो सूतो ऊभोड़े ने आवे नींद।

माता तो पटराणी बणगी पुत्र जायो सो बणियो बींद॥

पर्वत कूं माखी ले उड़गी तीन लोक से ऊपर जाय।

बिना डंका वहाँ ढोल घूरत है बिना भोमी का नगर बसाय॥

धरती को जल गिगना छायो नदियाँ उल्ट अकाशा आय।

कुवे की जोत अगम जा लागी धिन्न जोगी के आई दाय॥

सातू समंदर सूखा पड़िया सब नदियाँ मछली पी जाय।

लाधूनाथ बोलिया जोगी नानकनाथ जी खोज बताय॥

भारत वर्ष की दरिद्रता – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Bhaarat Varsh Kee Daridrataa

जिसके धन और प्रशस्त भूमि की प्रशंसा, जिसमें प्राय: पृथ्वी मात्र की सभी वस्तु उत्पन्न होती हैं, संसार भर करता था; जहाँ सामान्य ऋतुओं के भोगने से देशियों को किसी दूसरे स्थान को जाने की आकांक्षा तक नहीं होती, और जहाँ की ख़ाने सभी अमूल्य रत्नों को उत्पन्न करती, कोई भी प्रस्तर ऐसे नहीं हैं जो यहाँ उत्पन्न न होते हों; जिसके समृद्धि पाने की लालसा ने पहले समर विजयी सिकंदर और सिल्यूकस को हिमपूरित पहाड़ों को ढकवा मैसीडोनिया के लंबे भालों को यहाँ चमकाया, और फिर पीछे लुटेरे पहाड़ियों को उपद्रव और प्रलय फैलाने को बुलाया; जिसके खोजने में विलायत की कंपनियों ने न जाने कितनी जहाज़ें डुबाईं, धन खोया और मनुष्यों को भी साथ ही साथ समुद्र में समाधि लेनी पड़ी, उसके दरिद्रता के कारण आज उपाए खोजी जा रही हैं। कौन समझ सकता था कि जो इतने रत्नों का आगार था, जिसके धन की प्रशंसा परदेशी कवियों ने की थी और जो इसी के लिए संसार भर में विख्यात था और जिसके ऐसे होने की शंका और प्रभुत्व पाने की इच्छा से आज कई पुरुषों से रूस घात लगाए हैं और अब ऐसा विकृत रूप धारण किए हैं, उसकी अब ऐसी दशा हो जाए कि जो अपनी उपज से इतर देशों को भी खिलाता था, वह अपने वासियों को दिन भर में एक बार भी न खिला सके। क्या भारतवासी व्यवसाय और परिश्रम बुद्धि और विद्या से हीन और शून्य तो नहीं हो गए; वा इस भूमि में वह शक्ति ही नहीं बच रही, जिससे जो केवल एक मनुष्य के परिश्रम से परिवार मात्र भोजन करते थे, अब सब के परिश्रम करने पर भी पूरे प्रकार से अटने के अतिरिक्त रात्रि दिवस पेट के चपेट से संवई और साग, खजूर और गेहूँ की गाँठ तक का लाला पड़ा है। ऐसी दशा कैसे हुई और कैसे जो सुख का आकर था आज दु:ख का विवर हो रहा है। इसी विषय पर आज हमें कुछ कहना है और उनके मिथ्या आश्चर्यों को झूठा बनाना है जो व्यर्थ अपने मन की बकते हैं और ऐसी साक्षात् वस्तु को झूठी ठहरा इस देश की समृद्धि को कहते हैं कि तब से उत्तम है। यहाँ की दरिद्रता के कारण को विचारने और कहने पर बातें प्रत्यक्ष हो जाएँगी।



यह बात प्रत्यक्ष है कि जो देश बहुत घना बसा है वहाँ के बासियों को यदि कई प्रकार के मार्ग धन के उपार्जन के न हों तो एक ही दो अथवा तीन के रहने से उनमें भीड़ बड़ी हो जाती है इसी से लाभदायक अथवा सर्वपोषक नहीं हो सकते। यहाँ के वासियों को मुख्य एक ही मार्ग और नाम के वास्ते तीन मार्ग द्रव्योपार्जन के बच गए हैं, वनित अथवा व्यापार, कृषि और नौकरी।



व्यापार की दशा जैसी कुछ इस देश में आगे थी उसके समक्ष में आधुनिक व्यापार को किसी अंश में कोई ममताओं को पहनते, बर्तते और काम में लाते थे एवं अन्य देशी वस्तुओं के अनुपस्थिति से इन्हीं को स्थान मिलता था और धनाढ्यों के घर में जितनी सामग्री सजावट के अर्थ काम में लाई जाती थीं देशी ही रहती थीं। परंतु परदेशी जहाज़ों के आगमन से यंत्र निर्माणित, अल्प व्यय के कारण सर्वजन सुलभ वस्तुओं के सामने यहाँ की बनी पुराने चाल की भूखे ग्राहकों को कैसे रुचिकर हो सकती थी। निदान सांसारिक विषय में कुशल चघड़ चतुर विलायतियों की सस्ती स्वच्छ वस्तुओं के हिंदुस्तानी पण्यों में प्रवेश पाने से और फ़्री ट्रेड की आशा इस देश के शासकों के देने से धीरे-धीरे देशी व्यवसाय निष्फल हो चले और व्यापार के क्षेत्र में पराजित होने से पूँजी तक गवाँ इतर दोनों मार्गों में इस कक्षा के मनुष्यों ने प्रवेश करना आरंभ किया और जो कुछ शेष बच गया है वह भी कुछ दिन में नष्टप्राय हुआ चाहता है। कारण इसका प्रत्यक्ष है हमारे देश का यह स्वभाव है कि कभी कोई कार्य दस जन मिलकर नहीं कर सकते और विलायती व्यवसायियों के सामने जो सदैव कंपनी द्वारा बड़े-बड़े साहस करते हैं कभी अकेले मनुष्य का किया कुछ नहीं हो सकता चाहे कितना ही धनी क्यूँ न हो; क्योंकि अकेले की अवधि बहुत थोड़ी होती है और कंपनियाँ बहुत काल पर्यंत भी जीवित रहती है। हमारे देश के मनुष्य क्यों एक साथ मिलकर कार्य नहीं कर सकते? क्यों इन्हें एक दूसरे पर भरोसा नहीं रहता। इसका कारण हम केवल दुर्भाग्य, दुर्बुद्धि और प्रमाद समझेंगे। इसमें संदेह नहीं है कि यदि दृढ़ता के साथ ऐसे कार्य किए जाए और स्वच्छ व्यवहार के साथ उचित मनुष्य नियुक्त किए जाएँ जो ऐसे कार्यों को कर सकते हों और हर प्रकार से इसके उत्तरदायी हो और साझियों को निश्चय करा दिया जाए कि उनका धन रक्षित रहेगा और उचित कार्य में लगाया जाएगा, इसके हानि-लाभ का वे भाग्यानुसार भागी होंगे, तो ऐसे कार्य असाध्य नहीं हो सकते परंतु वहाँ के वासियों के स्वभाव में तो एकाकी रहना अकेले बर्ताव करना, रात-दिन अपनी ही क्षुद्र रक्षा मे पड़े रहना अच्छा लगता है। इन्हें ऐसे कार्य न केवल असंभव जान पड़ते हैं वरन् इन्हें यह निश्चय हो गया है कि ऐसे संयोग में एक दिन का निबटना कठिन है, क्योंकि मूर्खता में उचित व्यवसाय की समझ इनमें नहीं है। अपने मन से जो चाहे वह करे परंतु उचित शिक्षा और मंत्र के मानने में अपना अपमान समझते हैं क्योंकि वे अपने अर्थ के जानने में संसार भर में किसी को कुशल नहीं समझते। यदि खाने-पीने का ठिकाना है तो मूर्खता की अवधि में अपने को उस नियमित न्यून स्थान का नरेश मान जगत को तुच्छ समझते हैं। प्राचीन समय में जब इन्हें अपने देश वालों से केवल बर्तना पड़ता था तब तक तो किसी प्रकार इस अविश्वास और मूढ़ता से कोई विशेष हानि नहीं हो सकती थी, परंतु परदेशियों के आगमन से ये बातें विशेष हानिकर हो गई हैं। देश भी इस प्रकार से दरिद्र हो गया है कि एकाएकी साहस करना कठिन हो गया है तो बिना समाजबद्ध हुए व्यापार की वृद्धि, देशी वस्तुओं का संग्रह, परदेशी वस्तुओं का त्याग कदाचित् होना संभव नहीं है। भारतवर्ष के 25 करोड़ वासियों मे कोई भी ऐसा न होगा जो विलायती कपड़े न पहनता हो और दूसरी आवश्यक सामग्रियों को इन्हीं विलायतियों के घर की बनी न लेता हो। जब आवश्यक शारीरिक वस्त्र को हमें परदेशियों से लेना पड़ता है, तब धन का रहना कैसे संभव है, निदान व्यापार का नाश हो जाना ही देश की दरिद्रता का मुख्य कारण है। नाम-मात्र का एक व्यापार जो यहाँ के व्यापारी करते हैं जिन्हें हम व्यापारी न कहकर दलाल कहेंगे, क्योंकि वे विलायती वस्तुओं के बेचने के बिचवई हैं, यद्यपि किसी प्रकार इनकी जीविका चली जाती है तथापि इस देश के धन की वृद्धि दलाली से नहीं हो सकती।



हमने व्यापार के विषय में कहा है कि व्यापारियों के व्यापार में हानि पहुँचने से उन सबों को इतर दोनों मार्गों को लेना पड़ा है यही कारण मुख्य है जिससे कृषिकारों को भी वही दु:ख भोगना पड़ा है जो सब भोग रहे हैं। खेती ही एक शरण व्यापारियों और चाकरों को मिली है। जितनी प्रजा हिंदुस्तान की है उनको किसी न किसी तरह पालना कृषिकारों के मत्थे पड़ा है। दयालु भारतभूमि ने अपने अंक में लक्ष्मी से तिरस्कृत, शक्ति और विद्या से शून्य हस्तकारी में मुग्ध, आधुनिक यंत्र और पदार्थ विद्या में अकुशल, इसी से इतर देशियों के बराबर काम करने में अशक्त अपने आलसी संतानों को स्थान दिया है। परंतु अब वह भी अपनी संतान की वृद्धि के कारण उनके सबके पालने में निश्चय असमर्थ सी देख पड़ रही है। प्राकृतिक शक्ति ने भी इसे जवाब दिया है। निरंतर पीड़ित होने से इसमें अब उपज की शक्ति भी वैसी नहीं रही और खेतों के कर के बढ़ जाने से उनके मालिकों में परिवर्तन हुआ करता है। किसानों को इस परिवर्तन से धनहीन हो जाने के कारण समय पर उचित दयाशील प्राणदाता के न मिलने से कुटिल और निर्दय छोटी पूंजी वाले बनिए तथा और अल्प महाजनों की शरण मिलने से कुटिल और निर्दय छोटी पूँजी वाले बनिए महाजनों की शरण लेनी पड़ती है, जो उनकी हड्डी तक चूस जाने में अन्याय और पाप नहीं समझते। नित्य प्रति देखने में आता है कि असामियों को बिसार के कारण कितना कष्ट उठाना पड़ता है, कितनी दूर इसी के लिए उन्हें निष्फल जाना होता है, चुटकी बजाना पड़ता है। और केवल इसीलिए कि उन्हें समय पर बिसार मिल जाए, जिसकी सवाई या यह डेढ़ी अपने दयाशील [?] महाजन को थोड़े ही दिनों में लौटा दें। कितने खेत बिसार न मिलने के कारण परती रह जाते हैं। यदि बिसार भी मिला तो समय पर और जितना चाहिए उतना नहीं मिलता। लाचार हो जहाँ 12 वा 13 पंसेरी बीआ डालना चाहिए वहाँ 6 वा 7 पंसेरी डाल संतोष कर लेते हैं। जानना चाहिए कि जिन्हें बिसार की इतनी कमी है उनके कर के लेन-देन की क्या दशा होगी। एक बार ऋणी हो जाने से किसान के गले की फँसड़ी महाजन के हाथ हो जाती है, और वह जीते जी इस ऋण से मुक्त नहीं होता क्योंकि इसकी गणना महाजन के अधीन रहती है। अनपढ़ा किसान मारे भय के चूँ तक नहीं कर सकता, अपनी बात नहीं खोता, महाजन नहीं बिगाड़ता, क्योंकि कल को फिर कहाँ जाएगा। यह बात सही है कि गल्ला महँगा बिकने से किसान को अब उतना ही अन्न में विशेष लाभ होता है। परंतु व्यय की वृद्धि से और ऊपर कहे गए कारणों के उपस्थित होने से किसानों को हर तिहाई केवल थोड़े दिनों के भोजन के अतिरिक्त सब अन्न कर तथा महाजन के ब्याज ही के अर्थ बिक जाता है और वह पूर्ववत् शाक तथा और मोटे अन्न जो अन्य देशों में पशुओं को दिए जाते होंगे खाकर दिन बिताता है। जहाँ पर जंगलों का आधिक्य है वहाँ पर पशुओं के कारण किसानों को जो कुछ कष्ट होता है अकथनीय है। निरंतर रक्षा पर भी शस्त्र-हीन होने से पशुओं से तिहाई का बचना कठिन है, ग्रामों के स्वामी लोग सरकारी तहसीलदारों से बिना कर दिए नहीं छुटकारा पाते। इसी से वे अपने असामियों से निर्दयता से, चाहे उनके खेतों में वर्षा तथा और कारणों से कुछ भी उत्पन्न न हुआ हो, कर भर लेते हैं। दैवात् दो तीन वर्ष यदि उक्त कारणों से किसान को कुछ भी न मिला तो उसे खेती त्यागना पड़ता है। अंतिम शरण से दुर्भिक्ष के कारण मुखमोड़ चोरी और भिक्षा की ओर दौड़ता है इसी से किसानों को वनपशुओं के समान मनुष्यों से भी तिहाई की रक्षा करनी पड़ती है। निदान करके बढ़ने से, परती ऊसर तक के उठ जाने से, इसी से पृथ्वी के तृणविहीन हो जाने से पशुओं के दुख पाने से, दरिद्रता के कारण जलाशयों के न होने से, अन्न का परदेश चले जाने से, नित्य परिवर्तन से, खेती ही की ओर और मार्गों के रुक जाने से सब के दौड़ने से किसान भी नित्यप्रति दीन और दरिद्र होता जाता है।



जब इस देश में परदेशी नहीं थे और राज्य का भार देशियों पर था, तब इसी देश के लोग नौकरी पाते थे। अब विदेशी राजा के होने से नौकरियाँ विलायतियों को विशेष कर दी जाती हैं। और देश के लोगों को परिश्रम कर उनके विद्याओं के पढ़ने पर भी नौकरी नहीं मिलती। यदि ये विदेशी यहाँ नौकरी कर यहीं रह जाते और अपने धन को इसी देश में रखते तो थोड़ा बहुत उपकार इस देश का उनसे होता, पर वे तो नौकरी कर कड़ाकुल पक्षियों की भाँति ऋतुपरिवर्तन होते ही पिन्शिन ले उड़कर अपने देश को चले जाते हैं। हमारे देश की दरिद्रता तब पूर्ण रूप से अत्यंत हो जाती है।



जब कोई नौकरी खाली होती है तो सहस्रों प्रार्थनाएँ उस स्थान के लिए की जाती है इतने लोग बेकार ही रहते हैं जो चारा देखते ही भूखे टूट पड़ते हैं। हमारे देश में उन जातियों के सिवा जो सदा से नौकरी कर आई है और सबों को इसकी विशेष चाह नहीं रहती थी, वरन् पराधीनता गर्हित मानते थे, दरिद्रता में अब सब नौकरी ही नौकरी चिल्लाते हैं। परंतु शासकों का विश्वास हमारे ऊपर है। हमें भारी पदों के देने से सिटपिटाते हैं यद्यपि जिनसे शंका उन्हें हो सकती है वहाँ हमारी पहुँच असंभव है। बहुत दिनों से यह देश आशा लगाए ताक रहा था कि कभी विलायत जाने का अड़ंगा छूटता तो इस देश के कुलीन बिना जाति च्युत हुए अच्छी नौकरियाँ पाते, यदि उनकी भाग्य अनुकूल होती और न्यायपरायण इंग्लैंड के साधारण जनों ने अपनी भाषा से आज्ञा दे दी परंतु असाधारणों की लोलुपता ने जो कलयुग में सब से बढ़ गई है, यद्यपि इसके अपरिमित कोषों के भरने में इस देश ने बहुत कुछ सहायता की है तथापि इसकी हाय-हाय नहीं नहीं छूटी, अस्थिमात्रविशेष को भी खंडित कर निगल जाया चाहती है, इस आशा को दृष्टि से देखा है और मुख्यत: इस अभागे देश के क्रूरग्रहों के निर्दय दृष्टि ने ऐसी लाभदायक आज्ञा को पलटना चाहा है।



निदान धनोपार्जन के उपायों की दशा तो यों है परंतु इसे कौन देखता है। साधारण लज्जा ढाँकने मात्र के निमित्त स्वच्छ धोती और धुले कुर्ते को नगरों में पहने लोग धन की जाँच करते हैं। गाँव में लँगोटी चढ़ाए पेट खलाड़े दुर्भिक्ष का रूप बनाए, चौथे उपवास पर भोजन पाने वालों को देख कोई नहीं कह सकेगा कि इस देश के चौथाई निवासियों के अर्थ सदा काल नहीं पड़ा रहता। परंतु दानशील देश इनकी यह दशा नहीं देख सकता, किसी न किसी प्रकार इनके प्राण की संरक्षा करने से नहीं भागता। परंतु जब एक देश का विशेष अंश सदैव के लिए ऐसी दशा में निमग्न हो जाता है तो राजा और दैव के अतिरिक्त इनका उद्धार कौन कर सकता है? राजा जैसा कुछ चेत किये हैं प्रत्यक्ष है। परमेश्वर की कृपा भाग्य और कर्म के अनुकूल होती है कर्म कर्म को क्या कहना है।

भारतेंदु अवसान – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Bhaaratendu Avasaan

हे इस सभा को शोभा देने वाले! और इस असह्य शोक में संगी होने वाले! सज्जन सभ्य समूह!!! निश्चय आज उस करुणामय विषय के वर्णन की आवश्यकता आन पड़ी कि जिसे स्मरण कर, न केवल मनुष्य मात्र को शोक मूर्छा आए किंतु प्रस्तर को भी यदि शान हो तो मोम सा अवश्य पिघल जाए, जिसके लिखने में हमारी यह लेखनी भी सिर झुकाए थरथराती और चिरचिराहट के मिस अंतर्नाद कर चिंघारती है। प्रत्यक्ष जिसकी छाती फट गई, और उसने काले आँसुओं की लड़ी से झड़ी लगा दिया हाय! हाय!! वह भारतीय प्रजा का एक ही प्यारा, और भारतआकाश का ऊँज्यारा, भारतेंदु रूपी इंदु, वह भारत-भामिनी के स्वच्छ ललाट का केशर बिंदु, वह अनगिनत गुणों का आकर, और पश्चिमोत्तर देश का प्रभाकर निश्चय आज अस्त हो गया, कि जिस से देश हितैषियों का समाज शोक ग्रस्त हो गया, आज आर्यों का मान अवश्य घट गया, आज आर्य विद्या का पुष्कर पट गया आज आर्यों का सच्चा हितैषी उनसे मुँह मोड़ गया, आज आर्यावर्त का आधार उसे छोड़ गया, आह! वह सर्व-जन-मन-रंजन खंजन उड़ गया, जिसके कारण उन्नति आशा का जहाज आज विपत्ति वारिधि में बूड़ गया। सच है! वह ऐसा ही अनुपम जन था, जो सचमुच इस देश का सौभाग्य धन था। न वह केवल कविता के सब देशों का अनन्य महाकवि था, किंतु हिंदी भाषा का तो अवश्य मानों छबि था, वह किसका नहीं प्यारा, वह रसिकों के नेत्रों का तारा, वह नागरी-बाला का शृंगार करने वाला, वह अभिमानी भारत के हाथ का भाला, वह आर्य वैरियों के शस्त्राघात की ढाल वह उर्दू का कराल काल क्या सचमुच स्वयम् काल के गाल में जा दबा! विधि! तूने यह कौन विचार विचारा है कि जिसमें हमारा कुछ भी नहीं चारा है मनुष्य विचारा इस स्थान पर हैरान है, जैसा किसी उर्दू शायर का बयान है—



“न गोरे सिकंदर न है कब्रोदारा मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे” कजा जब कि आ जाती है जी की दुशमन, किसी की नहीं चलती कुछ मुश-फ़िके मन। गुज़र गाहे दुनिया में है मौत रह जन, छुटा क्या अजबरूह से जामए तन, लुटे राह में कारवाँ कैसे-कैसे”।



कबीर ने भी बहुत ठीक कहा है—



दस द्वारे को पींजरा तामै पंछी पौन।



रहिबे को अचरज महा, गए अचंभा कौन॥



इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य का शरीर अवश्य अनित्य और नाश होने वाला है, परंतु जीवन पर्यंत मनुष्य के मन में इसका मान कदापि नहीं होता कि हमें भी एक दिन मरना होगा। महाराजा युधिष्ठिर ने बहुत ही ठीक कहा—कि दुनिया देखती है कि सब लोग मरते चले ही जाते हैं, पर तो भी उन्हें रहने की उम्मेद बनी ही रहती है इससे बढ़कर आश्चर्य क्या है। परंतु वह हरिशचंद्र कि जिसे लोगों ने यथार्थ ख़िताब ‘माहेहिंद’ अर्थात् भारतेंदु पद प्रदान किया, नित्य अपने मृत्यु के दिन को याद करता, और यही कारण था कि वह अपने निश्चित सिद्धांतों का पक्का, और अपने कर्तव्य कार्यों के करने में सदैव बद्ध परिकर रहा। मेरी इन दोनों बातों का प्रमाण उसके एक कवित्त का यह पद है—“कहैंगे सबैही नैन नीर भरि-भरि पाछे, प्यारे हरिचंद की कहानी रह जाएगी” सच है! “जीते जी कद्र बशरा की नहिं होती प्यारे याद आएगी तुझे मेरी वफ़ा मेरे बाद।”



इसमें संदेह नहीं कि दुनियाँमुर्दा परस्त है, जैसे उसने भी अपने जीते संसार के सलूक यही कहा कि—हाँ! प्यारे हरिचंद्र का संसार ने कुछ भी गुण रूप न समझा और सचमुच अप्राप्त वस्तु की अधिक चाह होती है जैसे आज उस मृत महामान्य का शोक सबको व्याकुल कर रहा है। लेकिन ऐसे मनुष्य जिनकी कीर्ति संसार को उसकी याद दिलाया करती है, पूर्ण रूप से काल भी उसके नाश में समर्थ नहीं है, और सत्कवि तो मानो मरते ही नहीं यथा—



“जिंद: दिल लोग पढ़ा करते हैं गजलै दिन-रात, कभी शायर नहीं मरता वे ख़ुदा सच है य: बात। आबदारी से है हर मिसरये तर आबेहयात, नाजगी है सुखने काहन: में य: बादे वफ़ात; लोग अकसर मेरे जीने का गुमां रखते हैं”।

हिंद, हिंदु और हिंदी – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Hinda, Hindu Aur Hindee

ये तीनों हकारादि शब्द ने केवल अकेले हमीं, को वरंच हिंद-निवसी समस्त हिंदुओं को श्रवणानंददाई है। इन तीनों के आदि का ‘ह’ अक्षर मिलकर ह-ह-ह—प्रसन्नता-सूचक हास्य का रूप व अंग होता है। यों ही कभी-कभी यही शब्द कष्ट व उपहास का भी वची हो जाता है; यों ही तीन ‘हिं’ मिलकर हिं-हिं-हिं—जैसे आनंद सहज हास्य का स्वाभाविक कल स्वर है उसी भाँति दुःख और दैन्य प्रकाशक भी हैं। वस्तव में यह साधारण रीति से समस्त सामान्य और विशेषजनों को एक ही प्रकार से आनंदोन्मत्त व दीन बनाने में समान रीति से समर्थ है कि जिसे सुन औरों के मुख से भी उसी भाव और प्रभाव से वे ही शब्द उच्चारित होते हैं। परंतु हाँ शोक कि न जाने क्यों ईश्वर की अकृपा से अब अधिकांश पिछले ही व्यर्थ से इसका अर्थ कठिन कष्ट का कारण है।



यद्यपि इनमें एक ही हकारादि शब्द के विषय में कुछ कहने को बहुत समय और स्थान चाहिए, और इन तीनों ही के विषय में पृथक्-पृथक् हमें बहुत कुछ कहना है, और एक ही के लिए अनेक बार और अनेक प्रकार से अनेक प्रबंध लिखने की इच्छा है, अत: एक स्थान पर तीनों का एक बार ही प्रवेश कर देना कुछ अनुचित क्यों न हो; परंतु इनमें परस्पर एक दूसरे के संग अति निकटस्थ संबंध रहने और तीनों के आदि, अंत और मध्य तीनों काल में अन्योन्याश्रय के वर्तमान रहने से इन तीनों के विषय में एक साथ विचार करना भी कुछ विशेष अयोग्य न होगा। इनमें एक को दूसरे से क्या संबंध है? प्रथम इसी के समझने-समझाने की बड़ी आवयश्कता है। मानों एक हकार की तीन हिं शाखा हैं, व क्रमश: एक से एक की उत्पत्ति से मानो पिता पुत्र और पौत्र का सा संबंध है—अत: सभी एक से एक आवश्यक और एक दूसरे के प्रबलतर सहायक हैं। यों ही बिना एक दूसरे की शोभा व सम्मान का वर्तमान रहना फीका और कुछ असंभव भी है। क्योंकि इसमें कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी देश की उन्नति तहाँ तक हो ही नहीं सकती कि जहाँ तक उस देश के निवसियों की उन्नत दशा नहीं और यावत्पर्य्यन्त उस देश की भाषा की उन्नति नहीं, तब तक उस जाति की उन्नति कैसे मानी जाएगी? हब हिंद व भारत की दशा उन्नति पर थी, हिंदू व आर्य जाति की दशा तथा हमारी हिंदी भाषा अर्थात् संस्कृत व नागरी इत्यादि की भी उन्नति थी; अब जबसे कि भारत की दशा आरत हुई है, इन दोनों का भी अध: पतन हुआ; व यों कहिए कि जब से हिंदू जाति का प्रारब्ध, प्रताप व पराक्रम का सूर्य पश्चिम समुद्र में जा अस्त हुआ, हिंद और हिंदी की उन्नति के दिन का अंत हो क्रमशः उनका दीनदशारूपी अंधकार बढ़ता गया। वस्तव में यह विभेद कहीं अयुक्त भी होता, क्योंकि केवल एक आर्य जाति की उन्नति व अवनति के आधार पर उन दोनों की उन्नति अवनति निर्भर है इसलिए हमने इन तीनों को एक ही में मिलाया है इसलिए कि इन तीनों का स्वयम्-सिद्धि संबंध है।



बहुतेरे जन कहते और हम नित्य सुनते हैं, कि हिंद व भारत अब क्रमशः उन्नति कर रहा है, परंतु क्या यह सच है? हमारे पाठकों में अनेक जन कह उठेंगे, कि ‘हाँ! हाँ इसमें भी क्या कुछ संदेह है! तुम्हें इतनी समझ व परिज्ञान नहीं! देखते नहीं हो क्या से क्या हो गया, और निरंतर क्या हुआ जाता है?’ हाँ हम भी आधे मुँह इसे स्वीकार कर लेंगे, पर क्या हमारा हठीला मन भी मान लेगा? नहीं-नहीं और कदापि नहीं। वह हो सकता है कि ‘अजी ओस चाटने से कहीं प्यास बुझी है!’ अथव ‘दूसरे को लाठी टेक कर उसके विरूद्ध निज मनोवांछित स्थल को पहुँचने का आशा और उद्योग किस अर्थ का?’ व ‘उच्छिष्ट भोजन कर गर्हित जीवन धारण से क्या लाभ!’ अथव ‘स्वप्न और प्रेतबाधाभियुक्त व उन्मत्तावस्था के विचार और वक्य का क्या ठिकाना!’ सारांश ममत्व, अपनपौ, अपना, हमारा, हम, हमसे और हमीं से, हमारा और हमारा ही कहाँ तक कहें कि तीन ‘ह’ कार वह और एक यह बस इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं, और कदापि नहीं। न अन्य, शब्द, वर्ण, मात्रा, अनुस्वार व विसर्ग देखा, और, न सुना जा सकता, और न ईश्वर चिर दिन चित्त के विरुद्ध इसके स्वीकार का अवसर दे, बस इसी प्रकार और कहाँ तक कहें कि जिसका अंत नहीं।



पाठक जन कहेंगे कि “यह कैसी व्यर्थ और बेजोड़ बातें बक चले हो।” हाँ यथार्थ में यह उन्मत्त प्रलाप ही है, परंतु हाय! इस, इसमें भी संदेह नहीं कि इसी के बिना उक्त चारों की दशा हित और हीन हो रही है! हे ईश्वर तू उक्त चारों हकार से इन्हीं बेजोड़ शब्दों की ध्वनि का संबंध जोड़ दे! और इनके तथा उन चारों हकार के अतिरिक्त अन्य समस्त वस्तु का नाता तुरंत तोड़ दे! हमारे लेख को निपट अटपटा अनुमान करने लगे होंगे। फिर यदि इस संबंध में इसी प्रकार की कुछ और बातें करें तो और उपद्रवों के अतिरिक्त भय है, कि पाठक वर्ग कदाचित् सचमुच हमें पूरा पागल ही न अनुमान कर लें! अत: कुछ सीधी बातें कह कर इस संबंध को समाप्त कर देना ही समीचीन बोध होता है।

समाचार पत्र या अख़बार किसे कहते हैं – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Samaachaar Patr Yaa Akhabaar Kise Kahate Hain

समाचार पत्र को जिसे प्राय: अन्य ऐसे मनुष्य कि जो भलीभाँति इसके स्वाद से वंचित हैं, केवल यही समझ लिया है, कि कलकत्ते में एक लड़की हुई जिसके एक सींग, दो नाक, तीन हाथ, चार पैर और पाँच आँखें हैं। ऐसी-ऐसी बेसिर-पैर की ख़बरें और समाचार पंसारियों की पुड़ियाँ बाँधने के लिए छपे काग़ज़ की पोटली या पुलिंदा को समाचार पत्र, न्यूज़ पेपर और अख़बार कहते हैं। परंतु वस्तुत: जब विचार कर विचार जनों के विचार के अनुसार विचारो तो यह आजकल के काल का कल्पद्रुम है, और सभी अच्छी और उत्तम देशोन्नति, विद्या, बुद्धि, सभ्यता के प्रचार का उपाय, और देश व जातियों में एकता के उत्पन्न करने को और फूट के फल के सेवन से उत्पन्न रोगमात्र की एकमात्र औषधि और राजा और प्रजा के बीच की सत्य इच्छा और दुख-सुख तथा प्रसन्नता और अप्रसन्नता प्रगट करने का एक उत्तम संबंध है; जो दीन अवस्था में पड़े एक देश के भाइयों की दशा को जता दूसरे देश-बांधवों से उनका उपकार कराने वाला धर्म, कार्य, एक छोटी सी बात को भी दूर-दूर के बड़े-बड़े मनुष्यों पर विदित करने में समर्थ दूत यही है।



अमेरिका वालों ने आज कौन सी कल की नई रचना की और योरोप ने कल कौन सी नई उन्नति की है, लंदन और फ़्रांस में क्या रौनक है, अयोध्या और इंद्रप्रस्थ की क्या उजाड़ सी सूरत है, अँग्रेज़ कैसे विद्वान, ज्ञानमान, वीर और क्या साहसी हैं, हिंदू कैसे मूर्ख, निर्बुद्धि, कायर और आलसी हो गए हैं, हम लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए, व मूँछ पर ताव देना चाहिए; चोली, कुर्ती, ओढ़नी, ओढ़ पर्देनशीन होना चाहिए व निर्लज्ज हो कोट, पतलून, चुर्ट धारण कर व्यर्थ मिथ्या अँग्रेज़ बन मिस्टर गड्डामियर कहलाना चाहिए; इन बातों को एक जिह्वा से कह करोड़ कानों में पहुँचा देना यह इसी का काम है! यह वह सैरवीन है जो घर बैठे सारे संसार का सैर कराती है, और यह वह नाट्यशाला है जो देश के प्रत्येक दशा का दृश्य दिखा योग्या-योग्य कार्य और कर्तव्य कथा के प्रबंध का तमाशा दिखाता है, फिर क्या धर्म क्या कर्म क्या विद्या और क्या नीति, शिल्प, कृषि, वाणिज्य, व्यापार, आदि सभी शिक्षा का श्रेष्ठ शिक्षक, कभी वह धर्मशास्त्री बन धर्म का मार्ग दिखाता, और मौलवी या पादरी हो दाढ़ी हिला-हिला कर वाज़ सुनाता; कभी नाना विद्वानों के कथन से अपनी योग्यता प्रगटाता, कारीगरों को दूर-दूर की अनोखी और विचित्र कारिगरियाँ जिन्हें वे नहीं जानते जनाता, कृषिकारों को कृषि कर्म, व्यापारियों को संसार भर के सौदे सुलफ़ के भाव और पड़ता तथा वाणिज्य की विधि बतलाता, विद्यार्थियों को विद्या, वकील मुख्तारों के लिए नियम और नीति के नवीन आशयों को प्रगट करता, राजाओं को राजनीति शिक्षा दान छोड़ गवर्नमेंट की इच्छा का प्रकाश, और गवर्नमेंट से प्रजा की दुर्दशा, अप्रसन्नता प्रगट करता है; हास्य प्रिय जनों को हास्य, रसिकों को रस, कवियों को काव्य, सभ्यों को सभ्यता के लेख, कहाँ तक कहें कि समस्त मनुष्यों को उनके इच्छा के अनुसार रूप भर प्रसन्न ही करता है, सदा सब के उपकार के अर्थ शोच निमग्न होकर हित वचन सोच विचार कर कहा जाता है और अपने ऊपर आपत्ति सहकर भी उचित धर्म का परित्याग नहीं करता। जिस बात को कोई भी नहीं कहता उसे कह ही डालता और किसी के ग्राम संदेश और इच्छा को संसार से भी कह कर उसके नाम को गुप्त रखते हैं, कहाँ तक कहें ये सदा सबको नई बात सुनाते, सिखाते और जताते हैं।

संत बीरू साहिब के सबद : Sant Biru Sahib Ke Sabad

संत बीरू साहिब के जीवन के बारे में प्रमाणिक जानकारी बहुत सीमित मिलती है, लेकिन संत परंपरा में उनका संबंध बावरी साहिबा और यारी साहब से स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। वे बावरी साहिबा के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं और प्रसिद्ध संत यारी साहब के गुरु माने जाते हैं। उनके जीवनकाल की निश्चित जन्म-मृत्यु तिथियाँ उपलब्ध नहीं हैं।

बीरू साहिब के सबद मिलते हैं। इनमें मन की साधना, सुमिरन, गुरु-शब्द और भीतर अनुभव किए जाने वाले आध्यात्मिक स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। ‘त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल’ जैसे सबद में अनहद नाद, त्रिकुटी और आंतरिक साधना से जुड़े योगपरक संकेत दिखाई देते हैं। उनकी रचनाएँ संत काव्य की उस धारा का परिचय देती हैं जिसमें बाहरी आडंबर से अधिक साधक के भीतर होने वाले आध्यात्मिक अनुभवों पर जोर मिलता है।

हंसा! रे बाझल मोर याहि घराँ

हंसा! रे बाझल मोर याहि घराँ, करबो मैं कवनि उपाय।

मोतिया चुगन हंसा आयल हो, सो तो रहल भुलाय॥

झीलर को बगुला भयो है, कर्म कीट धरि खाय।

सतगुरु सत्य दया कियो, भव-बंधन लियो छुड़ाय॥

यह संसार सकल है अंधा, मोह-माया लपटाय।

‘वीरू’ भक्त हंसा भयो, सुख-सागर चल्यो है नहाय॥

त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल

त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल,

भाल लाल से सबै सुरंग रूप चातुरी।

यमुना ते और गंग अनहद सुर तान संग,

फेरि देखु जगमग को छोड़ देवै कादरी॥

वायु प्रचंड चंड बंकनाल मेरुदंड,

अनहद को छोड़ि दे आगे चलु बावरी।

ऊँकार धार वास इनहूं का है विनास,

खसम की साथ करु चीन्ह ले तू नाहरी॥

जन बिरु सतगुरु शब्द रकाब धरू,

चल शूर जीत मैदान घर आवरी॥

आली! रूप लागी लौ आछे मने

आली! रूप लागी लौ आछे मने।

हियरा मध्य मोहनि मूरति राखिलो जतने॥

अलखवान पुरी आसन ध्यान माँझ त्रिपुनि कोने।

दरस परस मोहन मूरति देखिलो सपने॥

कोटि ब्रह्मा जाको पार न पावैं सुर नर मुनि को गने।

‘वीरू’ भक्त केरा मन स्थिर नाही मैं पापी भजिबो केमने॥

हमारी प्यारी हिंदी – बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' हिंदी निबंध | Hamaaree Pyaaree Hindee

अनेक जनों के कान में हमारी नागरी भाषा की भाँति भारतीय भाषा का प्रयोग भी खटकेगा, परंतु यह भी केवल उसी अधम अभ्यास का आभास है कि जो दुर्भाग्य से अद्यपि हिंदी को उर्दू बनाए हुए है, नहीं तो हिंदी और भारतीय भाषा में भी उतना ही भेद है कि जितना आफ़ताब और सूर्य में। अब यदि कोई सूर्य के स्थान पर आफ़ताब ही कहता और नहीं चाहता कि सूर्य शब्द उसके कानों को दुःख दे, तो किसी का क्या चारा है? नहीं तो जिस मूल पर आज यह भाषा सचमुच एक भाषा कही जाने योग्य हुई, व हो रही है; और केवल यही कुविचार उसका कुटार अथव उन्नति अवरोधक भी है। यद्यपि यह आग्रह और हठ अब घट रहा है, तथापि यह अभी बहुत दिनों तक इसका पीछा नहीं छोड़ता दिखता परंतु इस हठ और आग्रह का तिरस्कार कर तथा उससे अपने उत्साह को मंद न करके उद्योग तत्पर रहना ही इसके हित साधकों की मुख्य चेष्टा है।



अनेक जन यह भी पूछ बैठेंगे कि—“भारतीय भाषा तो उसी को कहेंगे कि जो समस्त भारत की भाषा हो, केवल पाश्चिमोत्तर प्रदेश व उसके इधर-उधर ही जिसका प्रचार है वह भारत भर की भाषा क्योंकर कही जा सकती है; जब कि आज भी भारत में मारवड़ी, मेवाड़ी, पंजाबी, गुजराती, मरहठी, तैलंगी, द्राविड़ी, कर्नाटकी, ओड़िया, बँगला, आदि प्रधान तथा इनके अनेक आभ्यंतरिक भेद वर्तमान हैं? यद्यपि यह आपत्ति कुछ बहुत ही वे जोड़ नहीं है, परंतु उन्हें समझना चाहिए कि हिंदी शब्द भी इससे हीन नहीं हो सकता, क्योंकि हिंद की भाषा हिंदी, तब उससे एक प्रदेश की भाषा का ग्रहण कैसे हो सकता है? जो कहिए कि यह किसी विशेष भाषा के अर्थ में रूढ़ि हो गया है, तो ब्रज भाषा और बुंदेलखंडी व बिहारी भाषा भी इससे पृथक् नहीं है। क्योंकि आप इन्हें एक पृथक् व स्वतंत्र भाषा नहीं कह सकते।



वस्तव में इसमें बड़ी उलझन है, और यही कारण है जो, आज हमने भारतीय भाषा का प्रयोग किया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त कि हिंदी विशुद्ध हिंदी शुद्ध अथव संस्कृत शब्द नहीं है, यह किसी विशेष भाषा का बोधक भी पूर्ण रूप से नहीं हो सकता, क्योंकि अनेक भाषाओँ पर उसका बोधक भी पूर्ण रूप से नहीं हो सकता, क्योंकि अनेक भाषाओँ पर उसका समान अधिकार है, जैसा कि बिहारी हिंदी-ब्रजभाषा-बुंदेलखंडी-कन्नौजी (सूर्यधारी) व भोजपुरी भाषाएँ भी हिंदी के आभ्यंतरिक मुख्य भेद व शाखा ही हैं।



अतएव जिस समय व स्थान पर हिंदी से समग्र हिंदी व भारत भर की भाषाओं से संबंध हो वहाँ हिंदुस्तानी की नाई भारतीय भाषा प्रयोग करना समीचीन होगा, जो कि कालक्रम से सब प्रकार सुसंपन्न भाषा बन गई हैं। चाहे उनकी माता व मूल एक क्यों न हो, परंतु हिंदी से उन्हें कुछ भी संबंध नहीं है। इसी भाँति भारतवर्ष के मध्य देश में अर्थात् बिहार, पश्चिमोत्तर, अवध, मध्यप्रदेशादि देशों के अनेक प्रांतों में जो कुछ न्यूनाधिक फेरफार से बोली जाती और परस्पर एक दूसरे प्रांत के निवसियों से सुगमतापूर्वक समझी जाती, उन सब भाषाओँ के समूह को हिंदी कहेंगे? उनमें बहुतेरी तो निज प्रांत के नाम से मिलकर विशेषता की उद्बोधक होगी, परंतु पूर्वक समझी जाती, उन सब भाषाओँ के समूह को हिंदी कहेंगे? परंतु काशी, प्रयाग, अयोध्या के मध्य और कुछ समीप की भाषा में किसी विशेष शब्द के आयोजन की आवश्यकता नहीं है। अत: इसी देश को उसकी राजधानी भी माननी होगी, अथव यों कहिए कि इस प्रांत के निवासियों की घरऊ बातचीत की भाषा ही विशुद्ध हिंदी है, क्योंकि इसी के मूल पर प्रसरित और पल्लवित होकर अन्य प्रांतों की विशेष भाषाएँ कुछ-कुछ विभिन्न हो एक नवीन उपाधि से युक्त हो पृथकता की झलक देती हैं। सारांश सामान्य हिंदी से केवल इसी देश की भाषा का ग्रहण होगा; पर अन्य विशेष हिंदी भाषाओं में किसी विशेष उपाधि की भी आवश्यकता होगी, इसका एक प्रबल प्रमाण यह भी है कि—अन्य प्रांतों की भाषाओं के लिए तो, जैसा कि ऊपर गिना चुके हैं पृथक् नाम हैं, परंतु इसके लिए कोई विशेष नाम नहीं है।



यद्यपि दस-दस बीस-बीस कोस ही की दूरी पर भाषा में कुछ-कुछ अंतर अर्थात् उसके उच्चारण अथवा लब व लहज़े में भिन्नता हो जाती है, परंतु शब्दों और क्रियाओं का जब तक विशेष रूपांतर न हो तब तक उसमें भेद नहीं कहा जा सकता, वरंच किसी एक प्रदेश के एक प्रांत के निवसियों से दूसरे प्रांत के रहने वलों को यथार्थ समझ पड़ने पर वे दोनों प्रांतिक भाषाएँ उस एक ही भाषा के दो भेद व शाखा मानी जाएँगी; जैसे कि एक वृक्ष की अनेक शाखाएँ, चाहे वह आकार में सीधी व टेढ़ी क्यों न हों पर एक ही प्रकार के पत्र-पुष्प से युक्त होने के कारण वृक्ष की संज्ञा में वे अंतर्गत हो जाती है। अब देखिए कि ब्रजभाषा व बिहारी अथव कन्नौजी और बुंदेलखंडी चाहे परस्पर एक दूसरे से कुछ विशेष विभिन्नता दिखलातीं, परंतु विशुद्ध हिंदी अर्थात हमारे प्रांत की हिंदी के सन्मुख वह विभिन्नता बहुत ही न्यून हो जाती है, ठीक जैसे कि एक माता की अनेक पुत्रियाँ जो भिन्न देशों में ब्याही गई और सदैव ससुराल में रहने से यद्यपि परस्पर उनकी भाषाओं में बहुत कुछ भेद पड़ गया हो, परंतु संयोग से वे सब जैसे अपने मायके व पितृगृह में आकर बिना कष्ट के आपस में मिल प्रेम से बिना किसी परिश्रम के अपने भाव एक दूसरे पर प्रकट करतीं, और समझ कर प्रसन्न हो अपनी अभिन्नता दिखलाती हों।



इसके अतिरिक्त यह स्मरण रहे कि यह सब बातें केवल ग्राम्य भाषा व सामान्य भाषा ही से संबंध रखती हैं, परंतु विशेष में सब की भाषा एक ही हैं, जैसे कि इन सब की नागरी भाषा एक ही है जिसमें कहीं बाल बराबर का भी भेद नहीं है।

खानपान की बदलती तस्वीर – प्रयाग शुक्ल हिंदी निबंध | Khaanapaan Kee Badalatee Tasveer

पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हमारी खानपान की संस्कृति में एक बड़ा बदलाव आया है। इडली-डोसा-बड़ा-साँभर-रसम अब केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं हैं। ये उत्तर भारत के भी हर शहर में उपलब्ध हैं और अब तो उत्तर की ‘ढाबा’ संस्कृति लगभग पूरे देश में फैल चुकी है। अब आप कहीं भी हों, उत्तर भारतीय रोटी-दाल-साग आपको मिल ही जाएँगे। ‘फ़ास्ट फ़ूड’ में बर्गर, नूडल्स’ अब संभवत: किसी के लिए अजनबी नहीं रहे।



‘टू मिनट्स नूडल्स’ के पैकेटबंद रूप से तो कम-से-कम बच्चे-बूढ़े सभी परिचित हो चुके हैं। इसी तरह नमकीन के कई स्थानीय प्रकार अभी तक भले मौजूद हों, लेकिन आलू-चिप्स के कई विज्ञापित रूप तेज़ी से घर-घर में अपनी जगह बनाते जा रहे हैं।



गुजराती ढोकला-गाठिया भी अब देश के कई हिस्सों में स्वाद लेकर खाए जाते हैं और बंगाली मिठाइयों की केवल रसभरी चर्चा ही नहीं होती, वे कई शहरों साथ ही अब अन्य प्रदेशों के व्यंजन-पकवान भी प्राय: हर क्षेत्र में मिलते हैं और मध्यमवर्गीय जीवन में भोजन-विविधता अपनी जगह बना चुकी है।



कुछ चीज़ें और भी हुई हैं। मसलन अँग्रेज़ी राज तक जो ब्रेड केवल साहबी ठिकानों तक सीमित थी, वह कस्बों तक पहुँच चुकी है और नाश्ते के रूप में लाखों-करोड़ों संस्कृति से सबसे अधिक प्रभावित नई पीढ़ी हुई है, जो पहले के स्थानीय व्यंजनों के बारे में बहुत कम जानती है, पर कई नए व्यंजनों के बारे में बहुत-कुछ जानती है। स्थानीय व्यंजन भी तो अब घटकर कुछ ही चीज़ों तक सीमित रह गए हैं। बंबई की पाव-भाजी और दिल्ली के छोले-कुलचों की दुनिया पहले की तुलना में बड़ी ज़रूर है, पर अन्य स्थानीय व्यंजनों की दुनिया में छोटी हुई है। जानकार ये भी बताते हैं कि मथुरा के पेड़ों और आगरा के पेठे-नमकीन में अब वह बात कहाँ रही! यानी जो चीज़ें बची भी हुई हैं, उनकी गुणवत्ता में फ़र्क पड़ा है। फिर मौसम और ऋतुओं के अनुसार फलों-खाद्यान्नों से जो व्यंजन और पकवान बना करते थे, उन्हें बनाने की फ़ुर्सत भी अब कितने लोगों को रह गई है। अब गृहिणियों या कामकाजी महिलाओं के लिए ख़रबूज़े के बीज सुखाना-छीलना और फिर उनसे व्यंजन तैयार करना सचमुच दु:साध्य है।



यानी हम पाते हैं कि एक ओर तो स्थानीय व्यंजनों में कमी आई है, दूसरी ओर वे ही देसी-विदेशी व्यंजन अपनाए जा रहे हैं, जिन्हें बनाने-पकाने में सुविधा हो। जटिल प्रक्रियाओं वाली चीज़ें तो कभी-कभार व्यंजन-पुस्तिकाओं के आधार पर तैयार की जाती हैं। अब शहरी जीवन में जो भागमभाग है, उसे देखते हुए यह स्थिति स्वाभाविक लगती है। फिर कमरतोड़ महँगाई ने भी लोगों को कई चीज़ों से धीरे-धीरे वंचित किया है। जिन व्यंजनों में बिना मेवों के स्वाद नहीं आता, उन्हें बनाने-पकाने के बारे में भला कौन चार बार नहीं सोचेगा!



खानपान की जो एक मिश्रित संस्कृति बनी है, इसके अपने सकारत्मक पक्ष भी हैं। गृहिणियों और कामकाजी महिलाओं को अब जल्दी तैयार हो जानेवाले विविध व्यंजनों की विधियाँ उपलब्ध हैं। नई पीढ़ी को देश-विदेश के व्यंजनों को जानने का सुयोग मिला है—भले ही किन्हीं कारणों से और किन्हीं ख़ास रूपों में (क्योंकि यह भी एक सच्चाई है कि विविध व्यंजन इन्हें ख़ालिस रूप में उपलब्ध नहीं है)



आज़ादी के बाद उद्योग-धंधों, नौकरियों-तबादलों का जो एक नया विस्तार हुआ है, उसके कारण भी खानपान की चीज़ें किसी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पहुँची हैं। बड़े शहरों के मध्यमवर्गीय स्कूलों में जब दुपहर के ‘टिफ़िन’ के वक़्त बच्चों के टिफ़िन-डिब्बे खुलते हैं तो उनसे विभिन्न प्रदेशों के व्यंजनों की एक ख़ुशबू उठती है।



हम खानपान से भी एक-दूसरे को जानते हैं। इस दृष्टि से देखें तो खानपान की नई संस्कृति में हमें राष्ट्रीय एकता के लिए नए बीज भी मिल सकते हैं। बीज भलीभाँति तभी अंकुरित होंगे जब उस बोली-बानी, भाषा-भूषा आदि को भी किसी-न-किसी रूप में ज़्यादा जानेंगे, जो किसी खानपान-विशेष से जुड़ी हुई है।



इसी के साथ ध्यान देने की बात यह है कि ‘स्थानीय’ व्यंजनों का पुनरुद्धार भी ज़रूरी है जिन्हें अब ‘एथनिक’ कहकर पुकारने का चलन बढ़ा है। ऐसे स्थानीय व्यंजन केवल पाँच सितारा होटलों के प्रचारार्थ नहीं छोड़ दिए जाने चाहिए। पाँच सितारा होटलों में कभी-कभार मिलते रहें, पर घरों-बाज़ारों से ग़ायब हो जाएँ तो यह एक दुर्भाग्य ही होगा। अच्छी तरह बनाई-पकाई गई पूड़ियाँ-कचौड़ियाँ-जलेबियाँ भी अब बाज़ारों से ग़ायब हो रही हैं। मौसमी सब्ज़ियों से भरे हुए समोसे भी अब कहाँ मिलते हैं? उत्तर भारत में उपलब्ध व्यंजनों की भी दुर्गति हो रही है।



अचरज नहीं कि पहले उत्तर भारत में जो चीज़ें गली-मुहल्लों की दुकानों में आम हुआ करती थीं, उन्हें अब ख़ास दुकानों में तलाश जाता है। यह भी एक कड़वा सच है कि कई स्थानीय व्यंजनों को हमने तथाकथित आधुनिकता के चलते छोड़ दिया है और पश्चिम की नक़ल में बहुत सी ऐसी चीज़ें अपना ली हैं, जो स्वाद, स्वास्थ्य और सर्सता के मामले में हमारे बहुत अनुकूल नहीं हैं।



हो यह भी रहा है कि खानपान की मिश्रित संस्कृति में हम कई बार चीज़ों का असली और अलग स्वाद नहीं ले पा रहे। अक्सर प्रीतिभोजों और पार्टियों में एक साथ ढेरों चीज़ें रख दी जाती हैं और उनका स्वाद गड्डमड्ड होता रहता है। खानपान की मिश्रित या विविध संस्कृति हमें कुछ चीज़ें चुनने का अवसर देती है, हम उसका लाभ प्राय: नहीं उठा रहे हैं। हम अकसर एक ही प्लेट में कई तरह के और कई बार तो बिलकुल विपरीत प्रकृतिवाले व्यंजन परोस लेना चाहते हैं।



इसलिए खानपान की जो मिश्रित-विविध संस्कृति बनी है—और लग यही रहा है कि यही और विकसित होनेवाली है—उसे तरह-तरह से जाँचते रहना ज़रूरी है।

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