हम न किसीके कोई न हमारा, झूठा है जगका ब्योहारा
तनसम्बन्धी सब परिवारा, सो तन हमने जाना न्यारा ।।हम. ।।
पुन्य उदय सुखका बढ़वारा, पाप उदय दुख होत अपारा ।
पाप पुन्य दोऊ संसारा, मैं सब देखन जानन हारा ।।१ ।।
मैं तिहुँ जग तिहुँ काल अकेला, पर संजोग भया बहु मेला ।
थिति पूरी करि खिर खिर जांहीं, मेरे हर्ष शोक कछु नाहीं ।।२ ।।
राग भावतैं सज्जन मानैं, दोष भावतैं दुर्जन जानैं ।
राग दोष दोऊ मम नाहीं, `द्यानत' मैं चेतनपदमाहीं ।।३ ।।
हमारो कारज कैसें होय 1
हमारो कारज कैसें होय
कारण पंच मुकति मारगके, जिनमें के हैं दोय ।।हमारो. ।।
हीन संहनन लघु आयूषा, अल्प मनीषा जोय ।
कच्चे भाव न सच्चे साथी, सब जग देख्यो टोय ।।हमारो. ।।१ ।।
इन्द्री पंच सुविषयनि दौरैं, मानैं कह्या न कोय ।
साधारन चिरकाल वस्यो मैं, धरम बिना फिर सोय ।।हमारो. ।।२ ।।
चिन्ता बड़ी न कछु बनि आवै, अब सब चिन्ता खोय ।
`द्यानत' एक शुद्ध निजपद लखि, आपमें आप समोय ।।हमारो. ।।३ ।।
हमारो कारज ऐसे होय 2
हमारो कारज ऐसे होय
आतम आतम पर पर जानैं, तीनौं संशय खोय ।।हमारो. ।।
अंत समाधिमरन करि तन तजि, होय शक्र सुरलोय ।
विविध भोग उपभोग भोगवै, धरमतनों फल सोय ।।हमारो. ।।१ ।।
पूरी आयु विदेह भूप ह्वै, राज सम्पदा भोय ।
कारण पंच लहै गहै दुद्धर, पंच महाव्रत जोय ।।हमारो. ।।२ ।।
तीन जोग थिर सहै परीसह, आठ करम मल धोय ।
`द्यानत' सुख अनन्त शिव विलसै, जनमैं मरै न कोय ।।हमारो. ।।३ ।।
हमारे ये दिन यों ही गये जी
कर न लियो कछु जप तप जी, कछु जप तप,
बहु पाप बिसाहे नये जी ।।हमारे. ।।१ ।।
तन धन ही निज मान रहे, निज मान रहे,
कबहूँ न उदास भये जी ।।हमारे. ।।२ ।।
`द्यानत' जे करि हैं करुना, करि हैं करुना,
तेइ जीव लेखेमें लये जी ।।हमारे. ।।३ ।।
राग भावतैं सज्जन मानैं, दोष भावतैं दुर्जन जानैं ।
राग दोष दोऊ मम नाहीं, `द्यानत' मैं चेतनपदमाहीं ।।३ ।।
भाई धनि मुनि ध्यान-लगायके खरे हैं
मूसल भारसी धार परै है बिजुली कड़कत सोर करै है।।भाई. ।।१ ।।
रात अँध्यारी लोक डरे हैं, साधुजी आपनि करम हरे हैं।।भाई.।।२ ।।
झंझा पवन चहूँदिशि बाजैं, बादर घूम घूम अति गाजैं।।भाई.।।३ ।।
डंस मसक, बहु दुख उपराजैं, `द्यानत' लाग रहे निज काजैं ।।भाई.।।४ ।।
यारी कीजै साधो नाल
आपद मेटै सम्पद भैंटे, बेपरवाह कमाल।।यारी. ।।१ ।।
परदुख दुखी सुखी निज सुखसों, तन छीने मन लाल।।यारी.।।२ ।।
राह लगावै ज्ञान जगावै, `द्यानत' दीनदयाल।।यारी.।।३ ।।
सोहां दीव (शोभा देवें) साधु तेरी बातड़ियां
दोष मिटावैं हरष बढ़ावैं, रोग सोग भय घातड़ियां।।सोहां. ।।१ ।।
जग दुखदाता तुमही साता, धनि ध्यावै उठि प्रातड़ियां।।सोहां.।।२ ।।
`द्यानत' जे नरनारी गावैं, पावैं सुख दिन रातड़ियां।।सोहां.।।३ ।।
गौतम स्वामीजी मोहि वानी तनक सुनाई
जैसी वानी तुमने जानी, तैसी मोहि बताई।।गौतम. ।।१ ।।
जा वानीतैं श्रेणिक समझ्यो, क्षायक समकित पाई।।गौतम.।।२ ।।
`द्यानत' भूप अनेक तरे हैं, वानी सफल सुहाई।।गौतम.।।३ ।।
जिनवानी प्रानी! जान लै रे
छहों दरब परजाय गुन सरब, मन नीके सरधान लै रे।।जिनवानी. ।।१ ।।
देव धरम गुरु निहचै धर उर, पूजा दान प्रमान लै रे।।जिनवानी.।।२ ।।
`द्यानत' जान्यो जैन बखान्यो, $ अक्षर मन आन लै रे।।जिनवानी.।।३ ।।
वे प्राणी! सुज्ञानी, जिन जानी जिनवानी
चन्द सूर हू दूर करैं नहिं, अन्तरतमकी हानी।।वे. ।।१ ।।
पक्ष सकल नय भक्ष करत है, स्यादवादमें सानी।।वे.।।२ ।।
`द्यानत' तीनभवन-मन्दिरमें, दीवट एक बखानी।।वे.।।३ ।।
मैं न जान्यो री! जीव ऐसी करैगो
मोसौं विरति कुमतिसों रति कै, भवदुख भूरि भरैगो।।मैं. ।।१ ।।
स्वारथ भूलि भूलि परमारथ, विषयारथमें परैगो।।मैं.।।२ ।।
`द्यानत' जब समतासों राचै, तब सब काज सरैगो।।मैं.।।३ ।।
रे जिय! क्रोध काहे करै
देखकै अविवेकि प्रानी, क्यों विवेक न धरै ।।रे जिय. ।।
जिसे जैसी उदय आवै, सो क्रिया आचरै ।
सहज तू अपनो बिगारै, जाय दुर्गति परै ।।रे जिय. ।।१ ।।
होय संगति-गुन सबनिकों, सरव जग उच्चरै ।
तुम भले कर भले सबको, बुरे लखि मति जरै ।।रे जिय. ।।२ ।।
वैद्य परविष हर सकत नहिं, आप भखि को मरै ।
बहु कषाय निगोद-वासा, छिमा `द्यानत' तरै ।।रे जिय. ।।३ ।।
सबसों छिमा छिमा कर जीव!
मन वच तनसों वैर भाव तज, भज समता जु सदीव ।।सबसों. ।।
तपतरु उपशम जल चिर सींच्यो, तापस शिवफल हेत ।
क्रोध अगनि छिनमाहिं, जरावै, पावै नरक-निकेत ।।सबसौं. ।।१ ।।
सब गुनसहित गहत रिस मनमें, गुन औगुन ह्वै जात ।
जैसैं प्रानदान भोजन ह्वै, सविष भये तन घात ।।सबसौं. ।।२ ।।
आप समान जान घट घटमें, धर्ममूल यह वीर ।
`द्यानत' भवदुखदाह बुझावै, ज्ञान सरोवर नीर ।।सबसौं. ।।३ ।।
जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा (?)
लोभ करै मूरख संसारी, छांडै पण्डित शिव अधिकारी।।जियको. ।।
तजि घरवास फिरै वनमाहीं, कनक कामिनी छांडै नाहीं ।
लोक रिझावनको व्रत लीना, व्रत न होय ठगई सा कीना।।१ ।।
लोभवशात जीव हत डारै, झूठ बोल चोरी चित धारै ।
नारि गहै परिग्रह विसतारै, पाँच पाप कर नरक सिधारै।।२ ।।
जोगी जती गृही वनवासी, बैरागी दरवेश सन्यासी ।
अजस खान जसकी नहिं रेखा, `द्यानत' जिनकै लोभ विशेखा।।३ ।।
गहु सन्तोष सदा मन रे! जा सम और नहीं धन रे
आसा कांसा भरा न कबहूं, भर देखा बहुजन रे ।
धन संख्यात अनन्ती तिसना, यह बानक किमि बन रे ।।गहु. ।।१ ।।
जे धन ध्यावैं ते नहिं पावैं, छांडै लगत चरन रे ।।
यह ठगहारी साधुनि डारी, छरद अहारी निधन रे ।।गहु. ।।२ ।।
तरुकी छाया नरकी माया, घटै बढ़ै छन छन रे ।
`द्यानत' अविनाशी धन लागैं, जागैं त्यागैं ते धन रे ।।गहु. ।।३ ।।
साधो! छांडो विषय विकारी । जातैं तोहि महा दुखकारी
जो जैनधर्म को ध्यावै, सो आतमीक सुख पावै ।।साधो. ।।
गज फरस विषैं दुख पाया, रस मीन गंध अलि गाया ।
लखि दीप शलभ हित कीना, मृग नाद सुनत जिय दीना ।।साधो. ।।१ ।।
ये एक एक दुखदाई, तू पंच रमत है भाई ।
यह कौंनें, सीख बताई, तुमरे मन कैसैं आई ।।साधो. ।।२ ।।
इनमाहिं लोभ अधिकाई, यह लोभ कुगतिको भाई ।
सो कुगति माहिं दुख भारी, तू त्याग विषय मतिधारी ।।साधो. ।।३ ।।
ये सेवत सुखसे लागैं, फिर अन्त प्राणको त्यागैं ।
तातैं ये विषफल कहिये, तिनको कैसे कर गहिये ।।साधो. ।।४ ।।
तबलौं विषया रस भावै, जबलौं अनुभव नहिं आवै ।
जिन अमृत पान ना कीना, तिन और रसन चित दीना ।।साधो. ।।५ ।।
अब बहुत कहां लौं कहिए, कारज कहि चुप ह्वै रहिये ।
ये लाख बातकी एक, मत गहो विषयकी टेक ।।साधो. ।।६ ।।
जो तजै विषयकी आसा, `द्यानत' पावै शिववासा ।
यह सतगुरु सीख बताई, काहू बिरले जिय आई ।।साधो. ।।७ ।।
वे साधौं जन गाई, कर करुना सुखदाई
निरधन रोगी प्रान देत नहिं, लहि तिहुँ जग ठकुराई।।वे. ।।१ ।।
क्रोड़ रास कन मेरु हेम दे, इक जीवध अधिकाई।।वे.।।२ ।।
`द्यानत' तीन लोक दुख पावक, मेघझरी बतलाई।।वे.।।३ ।।
कर्मनिको पेलै, ज्ञान दशामें खेलै
सुख दुख आवै खेद न पावै, समता रससों ठेलै।।कर्म. ।।१ ।।
सुदरब गुन परजाय समझके, पर-परिनाम धकेलै।।कर्म.।।२ ।।
आनँदकंद चिदानँद साहब, `द्यानत' अंतर झेलै।।कर्म.।।३ ।।
खेलौंगी होरी, आये चेतनराय
दरसन वसन ज्ञान रँग भीने, चरन गुलाल लगाय।।खेलौं. ।।१ ।।
आनँद अतर सुनय पिचकारी, अनहद बीन बजाय।।खेलौं.।।२ ।।
रीझौं आप रिझावौं पियको, प्रीतम लौं गुन गाय ।।खेलौं. ।।३ ।।
`द्यानत' सुमति सुखी लखि सुखिया, सखी भई बहु भाय।।खेलौं.।।४ ।।
चेतन खेलै होरी
सत्ता भूमि छिमा वसन्तमें, समता प्रानप्रिया सँग गोरी।।चेतन. ।।
मनको माट प्रेमको पानी, तामें करुना केसर घोरी ।
ज्ञान ध्यान पिचकारी भरि भरि, आपमें छोरै होरा होरी।।१ ।।
गुरुके वचन मृदंग बजत हैं, नय दोनों डफ ताल टकोरी ।
संजम अतर विमल व्रत चोवा, भाव गुलाल भरै भर झोरी।।२ ।।
धरम मिठाई तप बहु मेवा, समरस आनँद अमल कटोरी ।
`द्यानत' सुमति कहै सखियनसों, चिरजीवो यह जुगजुग जोरी।।३ ।।
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