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कुमार विश्वास की ग़ज़लें : Kumar Vishwas Ghazals

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया 

kumar vishwas

बात करनी है बात कौन करे : कुमार विश्वास

बात करनी है बात कौन करे
दर्द से दो दो हाथ कौन करे
हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं
चाँद न हो तो रात कौन करे
अब तुझे रब कहें या बुत समझें
इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे
ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम
इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

फिर मिरी याद आ रही होगी : कुमार विश्वास

फिर मिरी याद आ रही होगी
फिर वो दीपक बुझा रही होगी
फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो
ख़ुद को बैनर बना रही होगी
अपने बेटे का चूम कर माथा
मुझ को टीका लगा रही होगी
फिर उसी ने उसे छुआ होगा
फिर उसी से निभा रही होगी
जिस्म चादर सा बिछ गया होगा
रूह सिलवट हटा रही होगी
फिर से इक रात कट गई होगी
फिर से इक रात आ रही होगी

ख़ुद को आसान कर रही हो ना : कुमार विश्वास

ख़ुद को आसान कर रही हो ना
हम पे एहसान कर रही हो ना
ज़िंदगी हसरतों की मय्यत है
फिर भी अरमान कर रही हो ना
नींद सपने सुकून उम्मीदें
कितना नुक़सान कर रही हो ना
हम ने समझा है प्यार पर तुम तो
जान पहचान कर रही हो ना

तुम्हें जीने में आसानी बहुत है : कुमार विश्वास

तुम्हें जीने में आसानी बहुत है
तुम्हारे ख़ून में पानी बहुत है
कबूतर इश्क़ का उतरे तो कैसे
तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है
इरादा कर लिया गर ख़ुद-कुशी का
तो ख़ुद की आँख का पानी बहुत है
ज़हर सूली ने गाली गोलियों ने
हमारी ज़ात पहचानी बहुत है
तुम्हारे दिल की मन-मानी मिरी जाँ
हमारे दिल ने भी मानी बहुत है

दिल तो करता है ख़ैर करता है : कुमार विश्वास

दिल तो करता है ख़ैर करता है
आप का ज़िक्र ग़ैर करता है
क्यूँ न मैं दिल से दूँ दुआ उस को
जबकि वो मुझ से बैर करता है
आप तो हू-ब-हू वही हैं जो
मेरे सपनों में सैर करता है
इश्क़ क्यूँ आप से ये दिल मेरा
मुझ से पूछे बग़ैर करता है
एक ज़र्रा दुआएँ माँ की ले
आसमानों की सैर करता है

उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे : कुमार विश्वास

उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे
वो मिरा होने से ज़ियादा मुझे पाना चाहे
मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा
ये मुसाफ़िर तो कोई और ठिकाना चाहे
एक बनफूल था इस शहर में वो भी न रहा
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे
ज़िंदगी हसरतों के साज़ पे सहमा-सहमा
वो तराना है जिसे दिल नहीं गाना चाहे

तुम लाख चाहे मेरी आफ़त में जान रखना : कुमार विश्वास

तुम लाख चाहे मेरी आफ़त में जान रखना
पर अपने वास्ते भी कुछ इम्तिहान रखना
वो शख़्स काम का है दो ऐब भी हैं उस में
इक सर उठाना दूजा मुँह में ज़बान रखना
पगली सी एक लड़की से शहर ये ख़फ़ा है
वो चाहती है पलकों पे आसमान रखना
केवल फ़क़ीरों को है ये कामयाबी हासिल
मस्ती से जीना और ख़ुश सारा जहान रखना

मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा : कुमार विश्वास

मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना तुझे तुझ से चुरा ले जाऊँगा
हो के क़दमों पे निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल कर भी मैं ख़ुशबू बचा ले जाऊँगा
कौन सी शय मुझ को पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा
कोशिशें मुझ को मिटाने की भले हों कामयाब
मिटते मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जाऊँगा
शोहरतें जिन की वज्ह से दोस्त दुश्मन हो गए
सब यहीं रह जाएँगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा

सब तमन्नाएँ हों पूरी कोई ख़्वाहिश भी रहे : कुमार विश्वास

सब तमन्नाएँ हों पूरी कोई ख़्वाहिश भी रहे
चाहता वो है मोहब्बत में नुमाइश भी रहे
आसमाँ चूमे मिरे पँख तिरी रहमत से
और किसी पेड़ की डाली पे रिहाइश भी रहे
उस ने सौंपा नहीं मुझ को मिरे हिस्से का वजूद
उस की कोशिश है कि मुझ से मिरी रंजिश भी रहे
मुझ को मालूम है मेरा है वो मैं उस का हूँ
उस की चाहत है कि रस्मों की ये बंदिश भी रहे
मौसमों से रहें 'विश्वास' के ऐसे रिश्ते
कुछ अदावत भी रहे थोड़ी नवाज़िश भी रहे

रंग दुनिया ने दिखाया है निराला देखूँ : कुमार विश्वास

रंग दुनिया ने दिखाया है निराला देखूँ
है अँधेरे में उजाला तो उजाला देखूँ
आइना रख दे मिरे सामने आख़िर मैं भी
कैसा लगता है तिरा चाहने वाला देखूँ
कल तलक वो जो मिरे सर की क़सम खाता था
आज सर उस ने मिरा कैसे उछाला देखूँ
मुझ से माज़ी मिरा कल रात सिमट कर बोला
किस तरह मैं ने यहाँ ख़ुद को सँभाला देखूँ
जिस के आँगन से खुले थे मिरे सारे रस्ते
उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ

हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी : कुमार विश्वास

हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी
बात आधी तो सँभालो तुम भी
दिल लगाया ही नहीं था तुम ने
दिल-लगी की थी मज़ा लो तुम भी
हम को आँखों में न आँजो लेकिन
ख़ुद को ख़ुद पर तो सजा लो तुम भी
जिस्म की नींद में सोने वालों
रूह में ख़्वाब तो पालो तुम भी

ये ख़यालों की बद-हवासी है : कुमार विश्वास

ये ख़यालों की बद-हवासी है
या तिरे नाम की उदासी है
आइने के लिए तो पतली हैं
एक का'बा है एक काशी है
तुम ने हम को तबाह कर डाला
बात होने को ये ज़रा सी है

उन की ख़ैर-ओ-ख़बर नहीं मिलती : कुमार विश्वास

उन की ख़ैर-ओ-ख़बर नहीं मिलती
हम को ही ख़ास कर नहीं मिलती
शाइ'री को नज़र नहीं मिलती
मुझ को तू ही अगर नहीं मिलती
रूह में दिल में जिस्म में दुनिया
ढूँढता हूँ मगर नहीं मिलती
लोग कहते हैं रूह बिकती है
मैं जिधर हूँ उधर नहीं मिलती

आबशारों की याद आती है : कुमार विश्वास

आबशारों की याद आती है
फिर किनारों की याद आती है
जो नहीं हैं मगर उन्हीं से हूँ
उन नज़ारों की याद आती है
ज़ख़्म पहले उभर के आते हैं
फिर हज़ारों की याद आती है
आइने में निहार कर ख़ुद को
कुछ इशारों की याद आती है
और तो मुझ को याद क्या आता
उन पुकारों की याद आती है
आसमाँ की सियाह रातों को
अब सितारों की याद आती है

राहत इंदौरी की ग़ज़लें : Rahat Indori Ghazal Hindi

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो : राहत इंदौरी

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो
राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें
रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो
एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो
आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो
ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो
ले तो आए शाइरी बाज़ार में 'राहत' मियाँ
क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के : राहत इंदौरी

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के
दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के
आते जाते हैं कई रंग मिरे चेहरे पर
लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के
एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे
वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के
आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने
चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के
मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की
तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
मुंतज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे
चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा कर के

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है : राहत इंदौरी

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है
एक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में
वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता है
अपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब
रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है
रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते : राहत इंदौरी

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते
अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था
तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते
मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते
हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा : राहत इंदौरी

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा
मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर
तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा
इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था
तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा
बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन
जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा
गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना
जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए : राहत इंदौरी

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए
अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए
दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए
मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना
तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए
मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए
मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग
मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए
मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो
मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए
मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे
मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए
सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके
मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए : राहत इंदौरी

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए
शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं
शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए
मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है
मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए
मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में
तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए
ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में
ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए
मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो : राहत इंदौरी

मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो
आसमाँ लाए हो ले आओ ज़मीं पर रख दो
अब कहाँ ढूँढने जाओगे हमारे क़ातिल
आप तो क़त्ल का इल्ज़ाम हमीं पर रख दो
मैं ने जिस ताक पे कुछ टूटे दिये रक्खे हैं
चाँद तारों को भी ले जा के वहीं पर रख दो

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं : राहत इंदौरी

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं
मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ'र का पैमाना है
ख़ाली शीशों की तरह लोग उछलते क्यूँ हैं
मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँ हैं
नींद से मेरा तअल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख़्वाब आ आ के मिरी छत पे टहलते क्यूँ हैं
मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रौशनी वाले मिरे नाम से जलते क्यूँ हैं

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे : राहत इंदौरी

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे
जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे
मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का
इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे
बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन
उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे
पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज
कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे

बुलाती है मगर जाने का नइं : राहत इंदौरी

बुलाती है मगर जाने का नइं
वो दुनिया है उधर जाने का नइं
सितारे नोच कर ले जाऊँगा
मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नइं
मिरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नइं
वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर ज़ालिम से डर जाने का नइं
वबा फैली हुई है हर तरफ़
अभी माहौल मर जाने का नइं

दोस्ती जब किसी से की जाए : राहत इंदौरी

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए
मौत का ज़हर है फ़ज़ाओं में
अब कहाँ जा के साँस ली जाए
बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ
ये नदी कैसे पार की जाए
अगले वक़्तों के ज़ख़्म भरने लगे
आज फिर कोई भूल की जाए
लफ़्ज़ धरती पे सर पटकते हैं
गुम्बदों में सदा न दी जाए
कह दो इस अहद के बुज़ुर्गों से
ज़िंदगी की दुआ न दी जाए
बोतलें खोल के तो पी बरसों
आज दिल खोल कर ही पी जाए

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं : राहत इंदौरी

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं
मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं
अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को
वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं
मैं आइनों से तो मायूस लौट आया था
मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं
वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी
कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं
वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है
उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं
सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ
ये मेरा हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं
यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था
हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं
ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी
मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं : राहत इंदौरी

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं
हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे
हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं
बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं
इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं
ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो है बुत-ख़ाना
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं
हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे
यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं : राहत इंदौरी

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं
और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं
आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत
हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं
हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है
हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं
देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की
आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं
ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने
बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं
एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे
उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है : राहत इंदौरी

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है
अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है
जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो
इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है
मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार
मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है
नश्शा ऐसा था कि मय-ख़ाने को दुनिया समझा
होश आया तो ख़याल आया कि घर जाना है
मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर
मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ : राहत इंदौरी

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया
ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जिला भी न सकूँ
मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे
उस ने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ
फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन
इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ
इक न इक रोज़ कहीं ढूँड ही लूँगा तुझ को
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ

अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे : राहत इंदौरी

अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे
चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे
तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे
लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज
परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे
ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे
झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे
अजीब रंग था मज्लिस का ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ काएँ करने लगे

चराग़ों का घराना चल रहा है : राहत इंदौरी

चराग़ों का घराना चल रहा है
हवा से दोस्ताना चल रहा है
जवानी की हवाएँ चल रही हैं
बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है
मिरी गुम-गश्तगी पर हँसने वालो
मिरे पीछे ज़माना चल रहा है
अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए
तआ'रुफ़ ग़ाएबाना चल रहा है
नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है
वही दुनिया वही साँसें वही हम
वही सब कुछ पुराना चल रहा है
ज़ियादा क्या तवक़्क़ो हो ग़ज़ल से
मियाँ बस आब-ओ-दाना चल रहा है
समुंदर से किसी दिन फिर मिलेंगे
अभी पीना-पिलाना चल रहा है
वही महशर वही मिलने का वा'दा
वही बूढ़ा बहाना चल रहा है
यहाँ इक मदरसा होता था पहले
मगर अब कारख़ाना चल रहा है

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए : राहत इंदौरी

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए
सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए
मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था
हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए
नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र
आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए
सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार
आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए
अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर
मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ : राहत इंदौरी

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ
मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ
मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए
तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ
उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है
बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ
है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की
किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ
मैं करवटों के नए ज़ाइक़े लिखूँ शब-भर
ये 'इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी 'अज़ाब करूँ
ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही
कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ

कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो : राहत इंदौरी

कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो
ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो
जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद
गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो
तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं
हमारी तरह अगर चार दिन सफ़र में रहो
है अब ये हाल कि दर दर भटकते फिरते हैं
ग़मों से मैं ने कहा था कि मेरे घर में रहो
किसी को ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए
बुरी हो चाहे भली हो मगर ख़बर में रहो

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं : राहत इंदौरी

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं
नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं
रोज़ हम इक अँधेरी धुंद के पार
क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं
धूप इतनी कराहती क्यूँ है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं
टिकटिकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं
पानियों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

रात की धड़कन जब तक जारी रहती है : राहत इंदौरी

रात की धड़कन जब तक जारी रहती है
सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है
जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं
यार तबीअत भारी भारी रहती है
पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में
हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है
वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं
जिन लोगों के पास सवारी रहती है
छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं
जब आँगन में छाँव हमारी रहती है
घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दु'आ नहीं देंगे : राहत इंदौरी

हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दु'आ नहीं देंगे
ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे
हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को
जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं देंगे
रिवायतों की सफ़ें तोड़ कर बढ़ो वर्ना
जो तुम से आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे
यहाँ कहाँ तिरा सज्जादा आ के ख़ाक पे बैठ
कि हम फ़क़ीर तुझे बोरिया नहीं देंगे
शराब पी के बड़े तज्रबे हुए हैं हमें
शरीफ़ लोगों को हम मशवरा नहीं देंगे

बैठे बैठे कोई ख़याल आया : राहत इंदौरी

बैठे बैठे कोई ख़याल आया
ज़िंदा रहने का फिर सवाल आया
कौन दरियाओं का हिसाब रखे
नेकियाँ नेकियों में डाल आया
ज़िंदगी किस तरह गुज़ारते हैं
ज़िंदगी भर न ये कमाल आया
झूट बोला है कोई आईना
वर्ना पत्थर में कैसे बाल आया
वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम
आसमाँ की तरफ़ उछाल आया
क्यूँ ये सैलाब सा है आँखों में
मुस्कुराए थे हम-ख़याल आया

वो इक इक बात पे रोने लगा था : राहत इंदौरी

वो इक इक बात पे रोने लगा था
समुंदर आबरू खोने लगा था
लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी
मैं आँखें खोल कर सोने लगा था
चुराता हूँ अब आँखें आइनों से
ख़ुदा का सामना होने लगा था
वो अब आईने धोता फिर रहा है
उसे चेहरे पे शक होने लगा था
मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया
मैं सब के सामने रोने लगा था

चराग़ों को उछाला जा रहा है : राहत इंदौरी

चराग़ों को उछाला जा रहा है
हवा पर रो'ब डाला जा रहा है
न हार अपनी न अपनी जीत होगी
मगर सिक्का उछाला जा रहा है
वो देखो मय-कदे के रास्ते में
कोई अल्लाह-वाला जा रहा है
थे पहले ही कई साँप आस्तीं में
अब इक बिच्छू भी पाला जा रहा है
मिरे झूटे गिलासों की छका कर
बहकतों को सँभाला जा रहा है
हमी बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन
हमें घर से निकाला जा रहा है
जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो
मोहब्बत करने वाला जा रहा है

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ : राहत इंदौरी

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ
वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ
ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है
हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ
ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है
बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ
बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की
ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ
रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग
अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ
हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से
सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी : राहत इंदौरी

ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी
हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी
पावँ पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए
चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी
जुगनुओं को साथ ले कर रात रौशन कीजिए
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी
ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती 'उम्र-भर
ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी
तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा
मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी
तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते
इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी

सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा : राहत इंदौरी

सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा
मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा
मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर
यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा
हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर
तुझे कभी न कभी बे-नक़ाब कर दूँगा
मुझे भरोसा है अपने लहू के क़तरों पर
मैं नेज़े नेज़े को शाख़-ए-गुलाब कर दूँगा
मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं
उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा
मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना
मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा
महाजनों से कहो थोड़ा इंतिज़ार करें
शराब-ख़ाने से आ कर हिसाब कर दूँगा

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में : राहत इंदौरी

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में
उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में
ये कोई और ही किरदार है तुम्हारी तरह
तुम्हारा ज़िक्र नहीं है मिरी कहानी में
अब इतनी सारी शबों का हिसाब कौन रखे
बड़े सवाब कमाए गए जवानी में
चमकता रहता है सूरज-मुखी में कोई और
महक रहा है कोई और रात-रानी में
ये मौज मौज नई हलचलें सी कैसी हैं
ये किस ने पाँव उतारे उदास पानी में
मैं सोचता हूँ कोई और कारोबार करूँ
किताब कौन ख़रीदेगा इस गिरानी में

तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी : राहत इंदौरी

तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी
नज़र शो'लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी
हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे
तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी
मैं अपना अज़्म ले कर मंज़िलों की सम्त निकला था
मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी
इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे
हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी
सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे
दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी

मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा : राहत इंदौरी

मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा
ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा
सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है
मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा
मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से
मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूँगा
वो मेरे हुक्म को फ़रियाद जान लेता है
अगर ये सच है तो लहजा बदल के देखूँगा
उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है
किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा
अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए
मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा

उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी : राहत इंदौरी

उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी
इरादा था कि मैं कुछ देर तूफ़ाँ का मज़ा लेता
मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी
मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को
मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी
मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी
वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे
बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी
मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूटा है
कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी

सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का : राहत इंदौरी

सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का
मिरा मिज़ाज नहीं बे-लिबास होने का
नया बहाना है हर पल उदास होने का
ये फ़ाएदा है तिरे घर के पास होने का
महकती रात के लम्हो नज़र रखो मुझ पर
बहाना ढूँड रहा हूँ उदास होने का
मैं तेरे पास बता किस ग़रज़ से आया हूँ
सुबूत दे मुझे चेहरा-शनास होने का
मिरी ग़ज़ल से बना ज़ेहन में कोई तस्वीर
सबब न पूछ मिरे देवदास होने का
कहाँ हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ
ख़ुश-आमदीद है मौसम उदास होने का
कई दिनों से तबीअ'त मिरी उदास न थी
यही जवाज़ बहुत है उदास होने का
मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर
मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का
मिरे लबों से तबस्सुम मज़ाक़ करने लगा
मैं लिख रहा था क़सीदा उदास होने का
पता नहीं ये परिंदे कहाँ से आ पहुँचे
अभी ज़माना कहाँ था उदास होने का
मैं कह रहा हूँ कि ऐ दिल इधर-उधर न भटक
गुज़र न जाए ज़माना उदास होने का

सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए : राहत इंदौरी

सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए
सोचता हूँ कोई अख़बार निकाला जाए
पी के जो मस्त हैं उन से तो कोई ख़ौफ़ नहीं
पी के जो होश में हैं उन को सँभाला जाए
आसमाँ ही नहीं इक चाँद भी रहता है यहाँ
भूल कर भी कभी पत्थर न उछाला जाए

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से : राहत इंदौरी

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से
अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने
लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से
ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी
एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से
शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुम्किन है
चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से
बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से

काली रातों को भी रंगीन कहा है मैं ने : राहत इंदौरी

काली रातों को भी रंगीन कहा है मैं ने
तेरी हर बात पे आमीन कहा है मैं ने
तेरी दस्तार पे तन्क़ीद की हिम्मत तो नहीं
अपनी पा-पोश को क़ालीन कहा है मैं ने
मस्लहत कहिए उसे या कि सियासत कहिए
चील कव्वों को भी शाहीन कहा है मैं ने
ज़ाइक़े बारहा आँखों में मज़ा देते हैं
बाज़ चेहरों को भी नमकीन कहा है मैं ने
तू ने फ़न की नहीं शजरे की हिमायत की है
तेरे एज़ाज़ को तौहीन कहा है मैं ने

शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए : राहत इंदौरी

शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए
ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए
मैं अँधेरों से बचा लाया था अपने-आप को
मेरा दुख ये है मिरे पीछे उजाले पड़ गए
जिन ज़मीनों के क़बाले हैं मिरे पुरखों के नाम
उन ज़मीनों पर मिरे जीने के लाले पड़ गए
ताक़ में बैठा हुआ बूढ़ा कबूतर रो दिया
जिस में डेरा था उसी मस्जिद में ताले पड़ गए
कोई वारिस हो तो आए और आ कर देख ले
ज़िल्ल-ए-सुब्हानी की ऊँची छत में जाले पड़ गए

शकेब जलाली की ग़ज़लें : Shakeb Jalali Ghazal Hindi

शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है।
कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं।

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे : शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे
जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे
ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की
आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे
मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ
जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे
तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत
ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे
क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी
क्यूँ मुझे ढाल बनाने को ये छितनार गिरे
देख कर अपने दर-ओ-बाम लरज़ जाता हूँ
मिरे हम-साए में जब भी कोई दीवार गिरे
वक़्त की डोर ख़ुदा जाने कहाँ से टूटे
किस घड़ी सर पे ये लटकी हुई तलवार गिरे
हम से टकरा गई ख़ुद बढ़ के अँधेरे की चटान
हम सँभल कर जो बहुत चलते थे नाचार गिरे
क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है
संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे
हाथ आया नहीं कुछ रात की दलदल के सिवा
हाए किस मोड़ पे ख़्वाबों के परस्तार गिरे
वो तजल्ली की शुआएँ थीं कि जलते हुए पर
आइने टूट गए आइना-बरदार गिरे
देखते क्यूँ हो 'शकेब' इतनी बुलंदी की तरफ़
न उठाया करो सर को कि ये दस्तार गिरे

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है : शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है
मिरी तरह से अकेला दिखाई देता है
न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो
शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है
बुरा न मानिए लोगों की ऐब-जूई का
उन्हें तो दिन का भी साया दिखाई देता है
ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अब तो
वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है
वो अलविदा'अ का मंज़र वो भीगती पलकें
पस-ए-ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है
मिरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई
कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है
सिमट के रह गए आख़िर पहाड़ से क़द भी
ज़मीं से हर कोई ऊँचा दिखाई देता है
खिली है दिल में किसी के बदन की धूप 'शकेब'
हर एक फूल सुनहरा दिखाई देता है

जाती है धूप उजले परों को समेट के : शकेब जलाली

जाती है धूप उजले परों को समेट के
ज़ख़्मों को अब गिनूँगा मैं बिस्तर पे लेट के
मैं हाथ की लकीरें मिटाने पे हूँ ब-ज़िद
गो जानता हूँ नक़्श नहीं ये सलेट के
दुनिया को कुछ ख़बर नहीं क्या हादिसा हुआ
फेंका था उस ने संग गुलों में लपेट के
फ़व्वारे की तरह न उगल दे हर एक बात
कम कम वो बोलते हैं जो गहरे हैं पेट के
इक नुक़रई खनक के सिवा क्या मिला 'शकेब'
टुकड़े ये मुझ से कहते हैं टूटी प्लेट के

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख : शकेब जलाली

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख
सूरज हूँ मेरा रंग मगर दिन-ढले भी देख
काग़ज़ की कतरनों को भी कहते हैं लोग फूल
रंगों का ए'तिबार ही क्या सूँघ के भी देख
हर चंद राख हो के बिखरना है राह में
जलते हुए परों से उड़ा हूँ मुझे भी देख
दुश्मन है रात फिर भी है दिन से मिली हुई
सुब्हों के दरमियान हैं जो फ़ासले भी देख
'आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर
दीमक ने जो लिखे कभी वो तब्सिरे भी देख
तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख
उस की शिकस्त हो न कहीं तेरी भी शिकस्त
ये आइना जो टूट गया है इसे भी देख
तू ही बरहना-पा नहीं इस जलती रेत पर
तलवों में जो हवा के हैं वो आबले भी देख
बिछती थीं जिस की राह में फूलों की चादरें
अब उस की ख़ाक घास के पैरों-तले भी देख
क्या शाख़-ए-बा-समर है जो तकता है फ़र्श को
नज़रें उठा 'शकेब' कभी सामने भी देख

कोई इस दिल का हाल क्या जाने : शकेब जलाली

कोई इस दिल का हाल क्या जाने
एक ख़्वाहिश हज़ार तह-ख़ाने
मौत ने आज ख़ुद-कुशी कर ली
ज़ीस्त पर क्या बनी ख़ुदा जाने
फिर हुआ कोई बद-गुमाँ हम से
फिर जनम ले रहे हैं अफ़्साने
वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर
आज के दोस्त कल के बेगाने
दूर से एक चीख़ उभरी थी
बन गए बे-शुमार अफ़्साने
ज़ीस्त के शोर-ओ-शर में डूब गए
वक़्त को नापने के पैमाने
कितना मुश्किल है मंज़िलों का हुसूल
कितने आसाँ हैं जाल फैलाने
राज़ ये है कि कोई राज़ नहीं
लोग फिर भी मुझे न पहचाने

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर : शकेब जलाली

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर
बेहतर है ख़ाक डालिए ऐसी उड़ान पर
आ कर गिरा था कोई परिंदा लहू में तर
तस्वीर अपनी छोड़ गया है चटान पर
पूछो समुंदरों से कभी ख़ाक का पता
देखो हवा का नक़्श कभी बादबान पर
यारो मैं इस नज़र की बुलंदी को क्या करूँ
साया भी अपना देखता हूँ आसमान पर
कितने ही ज़ख़्म हैं मिरे इक ज़ख़्म में छुपे
कितने ही तीर आने लगे इक निशान पर
जल-थल हुई तमाम ज़मीं आस-पास की
पानी की बूँद भी न गिरी साएबान पर
मल्बूस ख़ुश-नुमा हैं मगर जिस्म खोखले
छिलके सजे हों जैसे फलों की दुकान पर
साया नहीं था नींद का आँखों में दूर तक
बिखरे थे रौशनी के नगीं आसमान पर
हक़ बात आ के रुक सी गई थी कभी 'शकेब'
छाले पड़े हुए हैं अभी तक ज़बान पर

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका : शकेब जलाली

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
रह तो गई फ़रेब-ए-मसीहा की आबरू
हर चंद ग़म के मारों का चारा न हो सका
ख़ुश हूँ कि बात शोरिश-ए-तूफ़ाँ की रह गई
अच्छा हुआ नसीब किनारा न हो सका
बे-चारगी पे चारागरी की हैं तोहमतें
अच्छा किसी से इश्क़ का मारा न हो सका
कुछ इश्क़ ऐसी बख़्श गया बे-नियाज़ियाँ
दिल को किसी का लुत्फ़ गवारा न हो सका
फ़र्त-ए-ख़ुशी में आँख से आँसू निकल पड़े
जब उन का इल्तिफ़ात गवारा न हो सका
उल्टी तो थी नक़ाब किसी ने मगर 'शकेब'
दा'वों के बावजूद नज़ारा न हो सका

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया : शकेब जलाली

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया
दरिया से कोई शख़्स तो प्यासा पलट गया
लगता था बे-कराँ मुझे सहरा में आसमाँ
पहुँचा जो बस्तियों में तो ख़ानों में बट गया
या इतना सख़्त-जान कि तलवार बे-असर
या इतना नर्म-दिल कि रग-ए-गुल से कट गया
बाँहों में आ सका न हवेली का इक सुतून
पुतली में मेरी आँख की सहरा सिमट गया
अब कौन जाए कू-ए-मलामत को छोड़ कर
क़दमों से आ के अपना ही साया लिपट गया
गुम्बद का क्या क़ुसूर उसे क्यूँ कहो बुरा
आया जिधर से तैर उधर ही पलट गया
रखता है ख़ुद से कौन हरीफ़ाना कश्मकश
मैं था कि रात अपने मुक़ाबिल ही डट गया
जिस की अमाँ में हूँ वही उकता गया न हो
बूँदें ये क्यूँ बरसती हैं बादल तो छट गया
वो लम्हा-ए-शुऊर जिसे जांकनी कहें
चेहरे से ज़िंदगी के नक़ाबें उलट गया
ठोकर से मेरा पाँव तो ज़ख़्मी हुआ ज़रूर
रस्ते में जो खड़ा था वो कोहसार हट गया
इक हश्र सा बपा था मिरे दिल में ऐ 'शकेब'
खोलीं जो खिड़कियाँ तो ज़रा शोर घट गया

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में : शकेब जलाली

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में
मुरझा के आ गिरा हूँ मगर सर्द घास में
सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह
देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
सहरा की बूद-ओ-बाश है अच्छी न क्यूँ लगे
सूखी हुई गुलाब की टहनी गिलास में
चमके नहीं नज़र में अभी नक़्श दूर के
मसरूफ़ हूँ अभी अमल-ए-इनइकास में
धोके से उस हसीं को अगर चूम भी लिया
पाओगे दिल का ज़हर लबों की मिठास में
तारा कोई रिदा-ए-शब-ए-अब्र में न था
बैठा था मैं उदास बयाबान-ए-यास में
जू-ए-रवान-ए-दश्त अभी सूखना नहीं
सावन है दूर और वही शिद्दत है प्यास में
रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ
पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में
काँटों की बाड़ फाँद गया था मगर 'शकेब'
रस्ता न मिल सका मुझे फूलों की बास में

आग के दरमियान से निकला : शकेब जलाली

आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
फिर हवा से सुलग उठे पत्ते
फिर धुआँ गुल्सितान से निकला
जब भी निकला सितारा-ए-उम्मीद
कोहर के दरमियान से निकला
चाँदनी झाँकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला
एक शो'ला फिर इक धुएँ की लकीर
और क्या ख़ाक-दान से निकला
चाँद जिस आसमान में डूबा
कब उसी आसमान से निकला
ये गुहर जिस को आफ़्ताब कहें
किस अँधेरे की कान से निकला
शुक्र है उस ने बेवफ़ाई की
मैं कड़े इम्तिहान से निकला
लोग दुश्मन हुए उसी के 'शकेब'
काम जिस मेहरबान से निकला

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर : शकेब जलाली

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर
दोस्तो पानी कभी रुकता नहीं ढलवान पर
आज तक उस के तआ'क़ुब में बगूले हैं रवाँ
अब्र का टुकड़ा कभी बरसा था रेगिस्तान पर
मैं जो पर्बत पर चढ़ा वो और ऊँचा हो गया
आसमाँ झुकता नज़र आया मुझे मैदान पर
कमरे ख़ाली हो गए सायों से आँगन भर गया
डूबते सूरज की किरनें जब पड़ीं दालान पर
अब यहाँ कोई नहीं है किस से बातें कीजिए
ये मगर चुप-चाप सी तस्वीर आतिश-दान पर
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
बस चले तो अपनी उर्यानी को उस से ढाँप लूँ
नीली चादर सी तनी है जो खुले मैदान पर
वो ख़मोशी उँगलियाँ चटख़ा रही थी ऐ 'शकेब'
या कि बूँदें बज रही थीं रात रौशन-दान पर

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा : शकेब जलाली

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा
मेरा साया है जो दीवार पे जम जाएगा
ठहरो ठहरो मिरे असनाम-ए-ख़याली ठहरो
मेरा दिल गोशा-ए-तन्हाई में घबराएगा
लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को
ज़ख़्म गहरा ही सही ज़ख़्म है भर जाएगा
अज़्म पुख़्ता ही सही तर्क-ए-वफ़ा का लेकिन
मुंतज़िर हूँ कोई आ कर मुझे समझाएगा
आँख झपके न कहीं राह अँधेरी ही सही
आगे चल कर वो किसी मोड़ पे मिल जाएगा
दिल सा अनमोल रतन कौन ख़रीदेगा 'शकेब'
जब बिकेगा तो ये बे-दाम ही बिक जाएगा

मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो : शकेब जलाली

मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो
उदास चाँद सितारो कोई तो बात करो
कहाँ है डूब चुका अब तो डूबने वाला
शिकस्ता-दिल से किनारो कोई तो बात करो
मिरे नसीब को बर्बादियों से निस्बत है
लुटी हुई सी बहारो कोई तो बात करो
कहाँ गया वो तुम्हारा बुलंदियों का जुनून
बुझे बुझे से शरारो कोई तो बात करो
इसी तरह से अजब क्या जो कुछ सुकून मिले
ग़म-ए-फ़िराक़ के मारो कोई तो बात करो
तुम्हारा ग़म भी मिटाती हैं मस्तियाँ कि नहीं
शराब-ए-नाब के मारो कोई तो बात करो
तुम्हारी ख़ाक उड़ाता नहीं 'शकेब' तो क्या
उदास राह-गुज़ारो कोई तो बात करो

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को : शकेब जलाली

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को
भूला हुआ था देर से मैं अपने-आप को
रहते हैं कुछ मलूल से चेहरे पड़ोस में
इतना न तेज़ कीजिए ढोलक की थाप को
अश्कों की एक नहर थी जो ख़ुश्क हो गई
क्यूँकर मिटाऊँ दिल से तिरे ग़म की छाप को
कितना ही बे-कनार समुंदर हो फिर भी दोस्त
रहता है बे-क़रार नदी के मिलाप को
पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें
फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को
तारीफ़ क्या हो क़ामत-ए-दिलदार की 'शकेब'
तज्सीम कर दिया है किसी ने अलाप को

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए : शकेब जलाली

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए
ये सन्नाटा अगर हद से बढ़े कोहराम हो जाए
सितारे मिशअलें ले कर मुझे भी ढूँडने निकलें
मैं रस्ता भूल जाऊँ जंगलों में शाम हो जाए
मैं वो आदम-गज़ीदा हूँ जो तन्हाई के सहरा में
ख़ुद अपनी चाप सुन कर लर्ज़ा-बर-अंदाम हो जाए
मिसाल ऐसी है इस दौर-ए-ख़िरद के होश-मंदों की
न हो दामन में ज़र्रा और सहरा नाम हो जाए
'शकेब' अपने तआ'रुफ़ के लिए ये बात काफ़ी है
हम उस से बच के चलते हैं जो रस्ता आम हो जाए

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत : शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत
मैं उस गली में अकेला था और साए बहुत
किसी के सर पे कभी टूट कर गिरा ही नहीं
इस आसमाँ ने हवा में क़दम जमाए बहुत
न जाने रुत का तसर्रुफ़ था या नज़र का फ़रेब
कली वही थी मगर रंग झिलमिलाए बहुत
हवा का रुख़ ही अचानक बदल गया वर्ना
महक के क़ाफ़िले सहरा की सम्त आए बहुत
ये काएनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्रा
मैं अपने दश्त से गुज़रा तो भेद पाए बहुत
जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत
बस एक रात ठहरना है क्या गिला कीजे
मुसाफ़िरों को ग़नीमत है ये सराए बहुत
जमी रहेगी निगाहों पे तीरगी दिन भर
कि रात ख़्वाब में तारे उतर के आए बहुत
'शकेब' कैसी उड़ान अब वो पर ही टूट गए
कि ज़ेर-ए-दाम जब आए थे फड़फड़ाए बहुत

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं : शकेब जलाली

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं
हम गुलिस्ताँ में कब समाए हैं
आप नग़्मों के मुंतज़िर होंगे
हम तो फ़रियाद ले के आए हैं
एक अपना दिया जलाने को
तुम ने लाखों दिए बुझाए हैं
क्या नज़र आएगा अभी हम को
यक-ब-यक रौशनी में आए हैं
यूँ तो सारा चमन हमारा है
फूल जितने भी हैं पराए हैं

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं : शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं
जो किनारों में सिमट जाए वो दरिया ही नहीं
ओस की बूंदों में बिखरा हुआ मंज़र जैसे
सब का इस दौर में ये हाल है मेरा ही नहीं
बर्क़ क्यूँ उन को जलाने पे कमर-बस्ता है
मैं तो छाँव में किसी पेड़ की बैठा ही नहीं
इक किरन थाम के मैं धूप-नगर तक पहुँचा
कौन सा अर्श है जिस का कोई ज़ीना ही नहीं
कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद
आइना ग़ौर से तू ने कभी देखा ही नहीं
बोझ लम्हों का हर इक सर पे उठाए गुज़रा
कोई इस शहर में सुस्ताने को ठहरा ही नहीं
साया क्यूँ जल के हुआ ख़ाक तुझे क्या मा'लूम
तू कभी आग के दरियाओं में उतरा ही नहीं
मोती क्या क्या न परे हैं तह-ए-दरिया लेकिन
बर्फ़ लहरों की कोई तोड़ने वाला ही नहीं
इस के पर्दों पे मुनक़्क़श तिरी आवाज़ भी है
ख़ाना-ए-दिल में फ़क़त तेरा सरापा ही नहीं
हाइल-ए-राह थे कितने ही हवा के पर्बत
तो वो बादल कि मिरे शहर से गुज़रा ही नहीं
याद के दाएरे क्यूँ फैलते जाते हैं 'शकेब'
उस ने तालाब में कंकर अभी फेंका ही नहीं

कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई : शकेब जलाली

कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई
गुमाँ गुज़रता है ये शख़्स दूसरा है कोई
हवा ने तोड़ के पत्ता ज़मीं पे फेंका है
कि शब की झील में पत्थर गिरा दिया है कोई
बटा सके हैं पड़ोसी किसी का दर्द कभी
यही बहुत है कि चेहरे से आश्ना है कोई
दरख़्त-ए-राह बताएँ हिला हिला कर हाथ
कि क़ाफ़िले से मुसाफ़िर बिछड़ गया है कोई
छुड़ा के हाथ बहुत दूर बह गया है चाँद
किसी के साथ समुंदर में डूबता है कोई
ये आसमान से टूटा हुआ सितारा है
कि दश्त-ए-शब में भटकती हुई सदा है कोई
मकान और नहीं है बदल गया है मकीं
उफ़ुक़ वही है मगर चाँद दूसरा है कोई
फ़सील-ए-जिस्म पे ताज़ा लहू के छींटे हैं
हुदूद-ए-वक़्त से आगे निकल गया है कोई
'शकेब' दीप से लहरा रहे हैं पलकों पर
दयार-ए-चश्म में क्या आज रत-जगा है कोई

क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त : शकेब जलाली

क्या जानिए मंज़िल है कहाँ जाते हैं किस सम्त
भटकी हुई इस भीड़ में सब सोच रहे हैं
भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे
हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं
टूटे हुए पत्तों से दरख़्तों का त'अल्लुक़
हम दूर खड़े कुंज-ए-तरब सोच रहे हैं
बुझती हुई शम्ओं' का धुआँ है सर-ए-महफ़िल
क्या रंग जमे आख़िर-ए-शब सोच रहे हैं
इस लहर के पीछे भी रवाँ हैं नई लहरें
पहले नहीं सोचा था जो अब सोच रहे हैं
हम उभरे भी डूबे भी सियाही के भँवर में
हम सोए नहीं शब-हमा-शब सोच रहे हैं

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया : शकेब जलाली

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया
पैरों में ज़ंजीरें डालीं हाथों में कश्कोल दिया
इतना गहरा रंग कहाँ था रात के मैले आँचल का
ये किस ने रो रो के गगन में अपना काजल घोल दिया
ये क्या कम है उस ने बख़्शा एक महकता दर्द मुझे
वो भी हैं जिन को रंगों का इक चमकीला ख़ोल दिया
मुझ सा बे-माया अपनों की और तो ख़ातिर क्या करता
जब भी सितम का पैकाँ आया मैं ने सीना खोल दिया
बीते लम्हे ध्यान में आ कर मुझ से सवाली होते हैं
तू ने किस बंजर मिट्टी में मन का अमृत डोल दिया
अश्कों की उजली कलियाँ हों या सपनों के कुंदन फूल
उल्फ़त की मीज़ान में मैं ने जो था सब कुछ तोल दिया

नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है : शकेब जलाली

नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है
घटा में चाँद आया जा रहा है
ज़माने की निगाहों में समो कर
मुझे दिल से भुलाया जा रहा है
कहाँ का जाम जब याँ ज़ौक़-ए-मस्ती
निगाहों से पिलाया जा रहा है
अभी अरमान कुछ बाक़ी हैं दिल में
मुझे फिर आज़माया जा रहा है
पिला कर फिर शराब-ए-हुस्न-ओ-जल्वा
मुझे बे-ख़ुद बनाया जा रहा है
सलामत आप का जौर-ए-मुसलसल
मिरे दिल को दुखाया जा रहा है
'शकेब' अब वो तसव्वुर में न आएँ
कलेजा मुँह को आया जा रहा है

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है : शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है
कोई मौसम हो मिरा ज़ख़्म हरा रहता है
शब को होगा उफ़ुक़-ए-जाँ से तिरा हुस्न तुलूअ'
ये वो ख़ुर्शीद है जो दिन को छुपा रहता है
यही दीवार-ए-जुदाई है ज़माने वालो
हर घड़ी कोई मुक़ाबिल में खड़ा रहता है
कितना चुप-चाप ही गुज़रे कोई मेरे दिल से
मुद्दतों सब्त निशान-ए-कफ़-ए-पा रहता है
सारे दर बंद हुए शहर में दीवाने पर
एक ख़्वाबों का दरीचा ही खुला रहता है

दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ : शकेब जलाली

दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ
आओ काग़ज़ की नाव तैराएँ
हम अगर रह-रवी का अज़्म करें
मंज़िलें खिंच के ख़ुद चली आएँ
हम को आमादा-ए-सफ़र न करो
रास्ते पुर-ख़तर न हो जाएँ
हम-सफ़र रह गए बहुत पीछे
आओ कुछ देर को ठहर जाएँ
मुतरिबा ऐसा गीत छेड़ कि हम
ज़िंदगी के क़रीब हो जाएँ
इन बहारों की आबरू रख लो
मुस्कुराओ कि फूल खिल जाएँ
गेसू-ए-ज़ीस्त के ये उलझाओ
आओ मिल कर 'शकेब' सुलझाएँ

आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी : शकेब जलाली

आया है हर चढ़ाई के बा'द इक उतार भी
पस्ती से हम-कनार मिले कोहसार भी
आख़िर को थक के बैठ गई इक मक़ाम पर
कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी
दिल क्यूँ धड़कने लगता है उभरे जो कोई चाप
अब तो नहीं किसी का मुझे इंतिज़ार भी
जब भी सुकूत-ए-शाम में आया तिरा ख़याल
कुछ देर को ठहर सा गया आबशार भी
कुछ हो गया है धूप से ख़ाकिस्तरी बदन
कुछ जम गया है राह का मुझ पर ग़ुबार भी
इस फ़ासलों के दश्त में रहबर वही बने
जिस की निगाह देख ले सदियों के पार भी
ऐ दोस्त पहले क़ुर्ब का नश्शा अजीब था
मैं सुन सका न अपने बदन की पुकार भी
रस्ता भी वापसी का कहीं बन में खो गया
ओझल हुई निगाह से हिरनों की डार भी
क्यूँ रो रहे हो राह के अंधे चराग़ को
क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी
कुछ अक़्ल भी है बाइस-ए-तौक़ीर ऐ 'शकेब'
कुछ आ गए हैं बालों में चाँदी के तार भी

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ : शकेब जलाली

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
रहता है अपने नूर में सूरज छुपा हुआ
ऐ रौशनी की लहर कभी तो पलट के आ
तुझ को बुला रहा है दरीचा खुला हुआ
सैराब किस तरह हो ज़मीं दूर दूर की
साहिल ने है नदी को मुक़य्यद किया हुआ
ऐ दोस्त चश्म-ए-शौक़ ने देखा है बार-हा
बिजली से तेरा नाम घटा पर लिखा हुआ
पहचानते नहीं उसे महफ़िल में दोस्त भी
चेहरा हो जिस का गर्द-ए-अलम से अटा हुआ
इस दौर में ख़ुलूस का क्या काम ऐ 'शकेब'
क्यूँ कर चले बिसात पे मोहरा पिटा हुआ

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