कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

सूरदास जी के पद : Surdas Ji Ke Pad Sangrah


सूरदास के पद (एन.सी. ई.आर.टी)

सूरदास

एक

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै, नागिनी सी भुइँ लोटी।
काँचौ दूध पियावत पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूर चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी।

दो

तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ।
दुपहर दिवस जानि घर सूनो ढूँढ़ि-ढूँढ़ोरि आपही आयौ।
खोलि किवारि, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ।
ऊखल चढ़ि, सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ।
दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ।
सूर स्याम कौं हटकि न राखै तैं ही पूत अनोखौ जायौ।

मैया! हौं गाई चरावन जैहौं

सूरदास

मैया! हौं गाई चरावन जैहौं।
तू कहि महर नंद बाबा सौं, बड़ौ भयौ न डरैहों॥
रैता, पैता, मना, मनसुखा, हलधर संगहि रैहौं।
बंसीबट तर ग्वालनि कैं सँग, खेलत अति सुख पैहौं॥
ओदन भोजन दै दधि काँवरि, भूख लगे तैं खेहौं।
सूरदास है साखि जमुन-जल सौंह देहु जु नहैहौं॥

मैया मैं नहिं माखन खायो

सूरदास

मैया मैं नहि माखन खायो।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।
चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो॥
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो।
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥
तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो।
जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं, जानि परायो जायो॥
ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो।
सूरदास तब बिर्हसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥

भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो

सूरदास

भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो।
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय−बस वैसौ॥
बग−बगुली अरु गीध−गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसौ।
उनहू कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ?
जीव मारि कै उदर भरत हैं, तिन कौ लेखौ ऐसौ।
सूरदास भगवंत−भजन बिनु, मनौ ऊँट−बृष−भैंसौ॥

खेलन में को काको गुसैयाँ (एन.सी. ई.आर.टी)

सूरदास

खेलन में को काको गुसैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ॥
जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातै जातैं अधिक तुम्हारै गैयाँ।
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ॥
मुरली तऊ गुपालहिं भावति।
सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति।
राखति एक पाई ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ौ ह्वै आवति।
अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति।

ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी (एन. सी. ई. आर. टी)

सूरदास

एक

ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥

दो

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही॥

तीन

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥

चार

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए॥


आयो घोष बड़ो व्योपारी

सूरदास

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी॥
फाटक दै कर हाटक माँगत भोरै निपट सुधारी।
धुर ही तें खोटी खायो है लये फिरत सिर भारी॥
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी?
अपनो दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी॥
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँह माँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ॥

अति मलीन वृषभानुकुमारी

सूरदास

अति मलीन वृषभानुकुमारी।
हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी॥
अधोमुख रहति उरध नहिं चितति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी।
छूटे चिहुर, बदन कुम्हिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी॥
हरि-संदेस सुनि सहज मृतक भई, इक बिरहिनि दूजे अलि जारी।
सूर स्याम बिनु यों जीवित है ब्रजवनिता सब स्यामदुलारी॥


संदेसनि मधुबन-कूप भरे

सूरदास

संदेसनि मधुबन-कूप भरे।
जो कोउ पथिक गए हँ ह्याँ ते फिरि नहिं अवन करे॥
कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे?
अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे॥
मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे।
पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे?

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै

सूरदास

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्योपार तिहारो ऊधो! ऐसोइ फिरि जैहै।
जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहे।
दाख छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै?

बिन गोपाल बैरनि भई कुंजैं

सूरदास

बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं।
तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥
बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं।
पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥
ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं।
सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥

निरखत अंक स्यामसुंदर के

सूरदास

निरखत अंक स्यामसुंदर के बारबार लावति छाती।
लोचन-जल कागद-मसि मिलि कै ह्वै गई स्याम स्याम की पाती॥
गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती।
तब की कथा कहा कहौं, ऊधो, जब हम बेनुनाद सुनि जाती॥
हरि के लाड़ गनति नहि काहू निसिदिन सुदिन रासरसमाती।
प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती॥

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ

सूरदास

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं खेलन हौं नहिं जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता को है तेरौ तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी, तू कत स्यामल गात।
चुटुकी दै-दै ग्वाल नवावत, हँसत, सबै मुसुकात॥
तू मोही कौं मारन सीखी, दाउहि कबहुँ न खीझै।
मोहन-मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥
सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥

हमारे हरि हारिल की लकरी

सूरदास

हमारे हरि हारिल की लकरी।
मन बच क्रम नंदनंद सों उर यह दृढ़ करि पकरी॥
जागत, सोबत, सपने सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री।
सुनतहि जोग लगत ऐसो अति! ज्यों करुई ककरी॥
सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी।
यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी॥

निर्गुन कौन देस को वासी

सूरदास

निर्गुन कौन देस को बासी?
मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति, साँच, न हाँसी॥
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन, भेस है कैसो केहि रस कै अभिलासी॥
पावैगो पुनि कियो अपनो जो रे! कहैगो गाँसी॥
सुनत कौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥

अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी

सूरदास

अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी।
कैसे रहैं, रूपरसराची ये बतियाँ सुनि रूखी॥
अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी।
अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥
बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी।
सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥

काहे को रोकत मारग सूधो

सूरदास

काहे को रोकत मारग सूधो?
सुनहु मधुप! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रूधो?
कै तुम सिखै पठाए कुब्जा, कै कही स्यामघन जू धौं?
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढौं जुवतिन जोग कहूँ धौं?
ताको कहा परेखो कीजै जानत छाछ न दूधौ।
सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥

ऊधो! कोकिल कूजल कानन

सूरदास

ऊधो! कोकिल कूजल कानन।
तुम हमको उपदेस करत हौ भस्म लगावन आनन।
औरों सब तजि, सिंगी लै लै टेरन, चढ़त पखानन।
पै नित आनि पपीहा के मसि मदन हनत निज बानन॥
हम तौ निपट अहिरि बावरी जोग दीजिए ज्ञानिन।
कहा कथत मामी के आगे जानत नानी नानन॥
सुन्दरस्याम मनोहर मूरति भावति नीके गानन।
सूर मुकुति कैसे पूजति है वा मुरली की तानन॥

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए

सूरदास

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पाए?
इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए।
जानी बुद्धि बड़ी, जुवतिन को जोग-सँदेस पठाए॥
भले लोग आगे के, सखि री! परहित डोलत धाए।
वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए॥
ते क्यों नीति करत आपुन जे औरनि रीति छुड़ाए?
राज-धर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए॥

लरिकाई को प्रेम कहौ अलि

सूरदास

लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत?
कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥
चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत।
नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥
चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत।
सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥

काहे को गोपीनाथ कहावत

सूरदास

काहे को गोपीनाथ कहावत?
जो पै मधुकर कहत हमारे गोकुल काहे न आवत?
सपने की पहिचानि जानि कै हमहि कलंक लगावत।
जो पै स्याम कूबरी रीझे सो किन नाम धरावत?
ज्यों गतराज काज के औसर औरे दसन दिखावत।
कहत सुनन को हम हैं ऊधो सूर अनत बिरमावत॥

मैया, मैं तो चंद−खिलौना लैहौं

सूरदास

मैया, मैं तो चंद-खिलौना लैहौं।
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं॥
सुरी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं।
ह्वैहौं पूत नंद बाबा कौ, तेरौ सुत न कहैहौं॥
आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं।
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं॥
तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं।
सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं॥

ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी

सूरदास

ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥
पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी।
ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥
प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥

देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै

सूरदास

देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै!
इतनक मुख माखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवनि धोवै॥
माखन लागि उलूखल बाँध्यौ, सकल लोग ब्रज जोवै।
निरखि कुरुख उन बालनि की दिस, लाजनि अँखियनि गोवै॥
ग्वाल कहैं धनि जननि हमारी, सुकर सुरभि नित नोवै।
बरबस हीं बैठारि गोद में, धारैं बदन निचोवै॥
ग्वालि कहैं या गोरस कारन, कत सुत की पति खोवै?
आनि देहिं अपने घर तैं हम, चाहति जितौ जसोवै॥
जब-जब बंधन छोरायौ चाहतिं, सूर कहै यह को वै।
मन माधौ तन, चित गोरस में, इहिं बिधि महरि बिलोवै॥

कहन लागे मोहन मैया-मैया

सूरदास

कहन लागे मोहन मैया-मैया।
नंद महर सौं बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया॥
ऊँचे चढ़ि-चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया।
दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया॥
गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ, चरननि की बलि जैया॥

अब हौं माया-हाथ बिकानौ

सूरदास

अब हौं माया-हाथ बिकानौ।
परबस भयौ पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ॥
हिंसा-मद-ममता-रस भूल्यौ, आसाहीं लपटानौ।
याही करत अधीन भयौ हौं, निद्रा अति न अघानौ॥
अपने हीं अज्ञान-तिमिर मैं, बिसर्यौ परम ठिकानौ।
सूरदास की एक आँखि है, ताहू मैं कछु कानौ॥

जसोदा हरि पालनैं झुलावै

सूरदास

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ-जोइ कछु गावै॥
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि-करि सैन बतावै॥
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद-भामिनि पावै॥

गोकुल सबै गोपाल उपासी

सूरदास

गोकुल सबै गोपाल उपासी।
जोग-अंग साधत जे ऊधो ते सब बसत ईसपुर कासी॥
यद्यपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रसरासी।
अपनी सीतलताहि न छाँडत यद्यपि है ससि राहु-गरासी॥
का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भजन तजि करत उदासी।
सूरदास ऐसी को बिरहिन माँगति मुक्ति तले गुनरासी॥

आए जोग सिखावन पाँडे

सूरदास

आए जोग सिखावन पाँडे।
परमारथी पुराननि लादे ज्यों बनजारे टाँड़े॥
हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखैं ते राँड़े।
कहौ मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँड़े।
कहु षटपट, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काकी भूख गई बयारि भखि बिना दूध घृत डाँड़े॥
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।
सूरदास तीनों नहि उपजत धनिया धान कुम्हाँड़े॥

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल

सूरदास

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, चलत असंगत चाल॥
भ्रम-भोयौ मन भयौ, पखावज, चलत असंगत चाल॥
तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल।
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥
कोटिक कला काछि दिखाराई जल-थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नँदलाल॥

खेलत मैं को काको गुसैयाँ

सूरदास

खेलत में को काको गुसैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबसहीं कत करत रिसैयाँ॥
जाति-पाँति हम ते बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातैं, जातैं अधिक तुम्हारैं गैयाँ!
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ॥

उर में माखन-चोर गड़े

सूरदास

उर में माखन-चोर गड़े।
अब कैसेहू निकसत नहिं ऊधो! तिरछे ह्वै जु अड़े॥
जदपि अहीर जसोदानंदन तदपि न जात छँड़े।
वहाँ बने जदुबंस महाकुल हमहिं न लगत बड़े।
को वसुदेव, देवकी है को, ना जानै औ बूझैं।
सूर स्यामसुंदर बिनु देखे और न कोऊ सूझैं॥

हरि हौं सब पतितनि को नायक

सूरदास

हरि, हौं सब पतितनि को नायक।
को करि सकै बराबरि मेरी, और नहीं कोउ लायक॥
जो प्रभु अजामील कौं दीन्हौ, सो पाटौ लिखित पाऊँ।
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौ पतित बुलाऊँ।
बचन बाँह लै चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी।
यह मारग चौगुनौ चलाऊँ, तौ पूरौ ब्यौपारी॥
यह सुनि जहाँ-तहाँ तैं सिमिटैं, आइ होइ इक ठौर।
अब कैं तौ आपुन लै आयौ, बेर बहुर की और॥
होड़ा-होड़ी मनहि भावते किए पाप भारि पेट।
ते सब पतित पाय तर डारौं, यहै हमारी भेंट॥
बहुत भरोसौ जानि तुम्हारौ, अध कीन्हें भरि भाँड़ौ।
लीजै बेगि निबेरि तुरतहीं सूर पतित कौ टाँड़ौं॥

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी

सूरदास

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वैहै लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥

चरन-कमल बंदौं हरि−राइ

सूरदास

चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कछु दरसाइ॥
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ॥

हमारे निर्धन के धन राम

सूरदास

हमारे निर्धन के धन राम।
चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आबत गाढ़ैं काम॥
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसो हरि-नाम।
बैकुँठनाथ सकल सुख दाता, सूरदास सुख-धाम॥

अपील का जादू – Appeal ka Jadoo | Harishankar Parsai

 एक देश है ! गणतंत्र है ! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूंक, टोना-टोटका से हल किया जाता है ! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-कांटे में कुछ गड़बड़ आ गयी है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतंत्र ठीक चलने लगता है। सारी समस्याएं मुहावरों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया—हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई !


एक दिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के पास यह शिकायत करने गये कि चीजों की कीमतें बहुत बढ़ गयी हैं। प्रधानमंत्री उस समय गाय के गोबर से कुछ प्रयोग कर रहे थे, वे स्वमूत्र और गाय के गोबर से देश की समस्याओं को हल करने में लगे थे। उन्होंने लोगों की बात सुनी, चिढ़कर कहा—आप लोगों को कीमतों की पड़ी है ! देख नहीं रहे हो, मैं कितने बड़े काम में लगा हूँ। मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूं। जैसे गोबर गैस ‘वैसे गोबर नैतिकता’। इस नैतिकता के प्रकट होते ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। तीस साल के कांग्रेसी शासन ने देश की नैतिकता खत्म कर दी है। एक मुंहफट आदमी ने कहा—इन तीस में से बाइस साल आप भी कांग्रेस के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहे हैं, तो तीन-चौथाई नैतिकता तो आपने ही खत्म की होगी ! प्रधान मन्त्री ने गुस्से से कहा-बको मत, तुम कीमतें घटवाने आए हो न ! मैं व्यापारियों से अपील कर दूंगा। एक ने कहा—साहब, कुछ प्रशासकीय कदम नहीं उठायेंगे ? दूसरे ने कहा-साहब, कुछ अर्थशास्त्र के भी नियम होते हैं।


प्रधानमंत्री ने कहा—मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में, यह गांधी का देश है,, यहां हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं अपील से उनके दिलों में लोभ की जगह त्याग फिट कर दूंगा। मैं सर्जरी भी जानता हूं। रेडियो से प्रधानमंत्री ने व्यापारियों से अपील कर दी-व्यापारियों को नैतिकता का पालन करना चाहिए। उन्हें अपने हृदय में मानवीयता को जगाना चाहिए। इस देश में बहुत गरीब लोग हैं। उन पर दया करनी चाहिए। अपील से जादू हो गया। दूसरे दिन शहर के बड़े बाजार में बड़े-बड़े बैनर लगे थे- व्यापारी नैतिकता का पालन करेंगे। मानवता हमारा सिद्धांत है। कीमतें एकदम घटा दी गयी हैं। जगह-जगह व्यापारी नारे लगा रहे थे-नैतिकता ! मानवीयता ! वे इतने जोर से और आक्रामक ढंग से ये नारे लगा रहे थे कि लगता था, चिल्ला रहे हैं-हरामजादे ! सूअर के बच्चे !


गल्ले की दुकान पर तख्ती लगी थी—गेहूं सौ रुपये क्विंटल ! ग्राहक ने आंखें मल, फिर पढ़ा। फिर आंखें मलीं फिर पढ़ा। वह आंखें मलता जाता। उसकी आंखें सूज गयीं, तब उसे भरोसा हुआ कि यही लिखा है। उसने दुकानदार से कहा—क्या गेहूं सौ रुपये क्विंटल कर दिया ? परसों तक दो सौ रुपये था। सेठ ने कहा—हां, अब सौ रुपये के भाव देंगे। ग्राहक ने कहा—ऐसा गजब मत कीजिए। आपके बच्चे भूखे मर जाएँगे। सेठ ने कहा—चाहे जो हो जाये, मैं अपना और परिवार का बलिदान कर दूंगा, पर कीमत नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता का तकाजा है।


ग्राहक गिड़गिड़ाने लगा—सेठजी, मेरी लाज रख लो। दो सौ पर ही दो। मैं पत्नी से दो सौ के हिसाब से लेकर आया हूं, सौ के भाव से ले जाऊंगा, तो वह समझेगी कि मैंने पैसे उड़ा दिये और गेहूं चुरा कर लाया हूं। सेठ ने कहा—मैं किसी भी तरह सौ से ऊपर नहीं बढ़ाऊंगा। लेना हो तो लो, वरना भूखों मरो। दूसरा ग्राहक आया। वह अक्खड़ था। उसने कहा—ऐ सेठ, यह क्या अंधेर मचा रखा है, भाव बढ़ाओ वरना ठीक कर दिये जाओगे। सेठ ने जवाब दिया—मैं धमकी से डरने वाला नहीं हूं। तुम मुझे काट डालो; पर मैं भाव नहीं बढ़ाऊंगा। नैतिकता, मानवीयता भी कोई चीज है। एक गरीब आदमी झोला लिये दुकान के सामने खड़ा था। दुकानदार आया और उसे गले लगाने लगा। गरीब आदमी डर से चिल्लाया-अरे, मार डाला ! बचाओ ! बचाओ ! सेठ ने कहा—तू इतना डरता क्यों है ?


गरीब ने कहा—तुम मुझे दबोच जो रहे हो  ! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? सेठ ने कहा—अरे भाई, मैं तो तुझसे प्यार कर रहा हूं। प्रधान मंत्री ने मानवीयता की अपील की है न ! एक दुकान पर ढेर सारे चाय के पैकेट रखे थे। दुकान के सामने लगी भीड़ चिल्ला रही थी—चाय को छिपाओ। हमें इतनी खुली चाय देखने की आदत नहीं है। हमारी आंखें खराब हो जाएंगे। उधर से सेठ चिल्लाया—मैं नैतिकता में विश्वास करता हूं। चाय खुली बेचूंगा और सस्ती बेचूंगा। कालाबाजार बंद हो गया है।


एक मध्यमवर्गीय आदमी बाजार से निकला। एक दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया। उस आदमी ने कहा—सेठजी, इस तरह बाजार से बेइज्जत क्यों करते हो ! मैंने कह तो दिया कि दस तारीख को आपकी उधारी चुका दूंगा। सेठ ने कहा—अरे भैया, पैसे कौन मांगता है ? जब मर्जी हो, दे देना। चलो, दुकान पर चलो। कुछ शक्कर लेते जाओ। दो रुपये किलो।


दस दिन का अनशन – Das Din ka Anshan | Harishankar Parsai

 आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."


बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.


सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "


मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए."


सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, " यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे."


मैंने कहा, " अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल है, गोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं क उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा."


बन्नू ने कहा," सफलता मिल जायेगी?"


मैंने कहा," यह तो 'इशू' बनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम 'एक्सपर्ट' के पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी 'प्रैक्टिस' चल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं."


हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा," ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?"


बन्नू कांप गया. बोला," मुझे डर लगता है."


"जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है."


"मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है."


बाबा ने कहा," अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. 'इशू' हम बनायेंगे."


बन्नू फिर डरा. बोला," मर तो नहीं जाऊँगा."


बाबा ने कहा," चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे."


11 जनवरी


आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है - 'सबको


सन्मति दे भगवान्!'. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि 'मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!'


सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा," यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?"


बाबा बोले," देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है."


सावित्री ने कहा," मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ."


बाबा ने शान्ति से कहा," देवी, तू तो 'इशू' है. 'इशू' से थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."


वह बड़बड़ाती हुई चली गई.


बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया," चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है."


13 जनवरी


बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, " जयप्रकाश नारायण आये?"


मैंने कहा," वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है."


वह पूछता है," विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?"


बाबा बोले," उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है."


बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,"भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ."


आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.


पूछने लगे," उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? "


बाबा ने कहा," हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है."


मैंने कहा," और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा."


14 जनवरी


बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.


आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.


इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग 'धर्म की जय हो!' नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी----


"राधिका प्रसाद-- पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो."


स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.


15 जनवरी


रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.


जनमत बन गया है.


स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने---


"बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है."


"धन्य है इस निष्ठां को."


"मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला."


"उसका मरद भी कैसा बेशरम है."


"सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था."


"स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!"


"बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना."


आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.


बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.


अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.


आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने मिलने से इनकार कर दिया.


देखते हैं कब तक नहीं मिलते.


शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे," किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है."


हमने समझाया," यह 'इशू' ज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी."


वे शांत हुए. बोले," अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा."


मैंने कहा," फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है."


जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.


बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.


बाद में हमने उससे कहा," अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं."


16 जनवरी


जयप्रकाश बाबू की 'मिशन' फेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा," हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा."


हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा," पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी 'एसीटोन' आने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें."


बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, "अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा. उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का."


आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.


हमने नामंजूर कर दिया.


17 जनवरी


आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं---


"बन्नू के प्राण बचाओ!


बन्नू की हालत चिंताजनक!'


मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!"


एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया---


"कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग---!


बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!


बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !"


ब्राम्हण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राम्हण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.


हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.


इससे निपटकर वही लोग ब्राम्हणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.


पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.


बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे 'केस' मज़बूत होगा.


18 जनवरी


रात को ब्राम्हणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.


सुबह ब्राम्हणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.


शहर में दफा 144 लग गयी.


सनसनी फैली हुई है.


हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा," इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा."


हमने कहा," तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी."


वे कहने लगे," पहले अनशन तुडवाओ ? "


हमने कहा," सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है."


सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.


मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में 'डेडलॉक' आ गया है.


छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.


रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.


'प्राण बचाओ'---की मांग आज और बढ़ गयी.


19 जनवरी


बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.


बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग 'एक्सपोज़' हो जायेंगे.


कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.


प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.


20 जनवरी


'डेडलॉक '


सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.


बन्नू अब संभल नहीं रहा है.


उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि "वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!"


सरकार भी घबराई मालूम होती है.


साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.


ब्राम्हण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राम्हण आत्मदाह करेंगे.


सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.


बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.


राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.


जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.


डॉ. लोहिया ने कहा है कि जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.


21 जनवरी:


बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.


व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.


भजन औ र प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.


ब्राम्हणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.


चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है," सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ."


नारे लग रहे हैं -- सत्य की जय! धर्म की जय!


कंधे श्रवणकुमार के – Kandhe Shravan Kumar ke | Harishankar Parsai

 एक सज्जन छोटे बेटे की शिकायत करते हैं - कहना नहीं मानता और कभी मुँहजोरी भी करता है। और बड़ा लड़का? वह तो बड़ा अच्छा है। पढ़-लिखकर अब कहीं नौकरी करता है। सज्जन के मत में दोनों बेटों में बड़ा फर्क है और यह फर्क कई प्रसंगों में उन्हें दिख जाता है। एक शाम का प्रसंग है। वे नियमित संध्यावंदन करते हैं (यानी शराब पीते हैं), कोई बुरा नहीं करते। बहुत लोग पीते हैं। गंगाजल खुलेआम पीते हैं, शराब छिपकर - गो शराब ज्यादा मजा देती है। आदमी बेमजा खुलकर बात करता है। और बामजा को छिपाकर, यानी सुख शर्म की बात मानी जाती है। लेकिन बात उन सज्जन की उठी थी। उन्हें सोडा की जरूरत पड़ती है। बड़ा लड़का कहते ही फौरन किताब के पन्नों में पेन्सिल रखकर सोडा लेने दौड़ जाता था। लाता छोटा भी है, पर फौरन नहीं उठता। पैराग्रफ पूरा करके उठता है। भारतीय पिता को यह अवज्ञा बरदाश्त नहीं। वह सीमांतों पर संबंध रखता है। या तो बेटे को पीटेगा या उसके हाथ से पिटेगा। बीच की स्थिति उसे पसंद नहीं। छोटा बेटा भी हरकत करता है। पिता जल्दी मचाते हैं, तो कह भी देता है ‘जाता तो हूँ’ ! उसके मन में सवाल और शंका भी उठती है। सोचता है - यह पिता फीस रोकर देता है, कपड़े बनवाना टालता जाता है, फिर यह नहीं सोचता कि इसे पढ़ाई के बीच से नहीं उठना चाहिए।


बड़े लड़के के मन में कभी सवाल और शंका नहीं उठे। वह मेरी ही उम्र का होगा। उसने वही किताब पढ़ी होंगी, जो मैंने पढ़ी थीं। हम सब गलत किताबों की पैदावार हैं। ये सवालों को मारने की किताबें थीं। स्कूल प्रार्थना से शुरू होता था -‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन!’ - क्यों शरण में आए हैं, किसके डर से आए हैं - कुछ नहीं मालूम। शरण में आने की ट्रेनिंग अक्षर-ज्ञान से पहले हो जाती थी। हमने गलत किताबें पढ़ीं हैं और आँखों को उनमें जड़ दिया। छोटा लड़का दूसरी किताबें पढ़ता है और आँखें उनमें गड़ाता नहीं है, आसपास भी देख लेता है। वह अपनी आँखों को फूटने से बचाने की कोशिश कर रहा है। इससे सारे पिता-स्वरूप लोग परेशान हैं - भौतिक पिता, गुरु, बड़े-बूढ़े शासक और नेता। हमारी किताबों में पिता-स्वरूप लोग सवाल और शंका से ऊपर होते थे। शिष्य पक्षपाती गुरु को अँगूठा काटकर दे देता था और दोनों ‘धन्य’ कहलाते थे। अब शिष्य उपकुलपति से रिपोर्ट कर देता है कि अमुक अध्यापक शिष्यों के अँगूठे कटवाते हैं। यदि उपकुलपति ध्यान नहीं देते, तो वह विद्यार्थियों का जुलूस लेकर विश्वविद्यालय पर धावा बोल देता है। हमें तो तीसरी कक्षा में ही उस भक्त की कथा पढ़ा दी गई थी, जो अपने पुत्र को आरे से चीरता है। कुछ लोगों के लिए आदमी और कद्दू में कोई फर्क नहीं। दोनों ही चीरे जा सकते हैं। उस भक्त का नाम मोरध्वज था। ऐसी सारी कथाओं का अंत ऐसा होता है जिससे चिरनेवालों को प्रोत्साहन मिले। भगवान प्रकट होते हैं और जिस पार्टी का जो नुकसान हुआ है, पूरा कर देते हैं - मृत को जिला देते हैं, जायदाद चली गई है, तो वापस दिला देते हैं, किसी को मुआवजे के रूप में स्वर्ग भेज देते हैं। कथा के इस अंत ने कितनी पीढ़ियों को आरे से चिरवा दिया होगा।


इस कथा पर न मैंने शंका की थी, न सज्जन के बड़े बेटे ने। मगर छोटा लड़का पूछेगा - पिताजी, चीरने से पहले यह बताइए कि भगवान इससे खुश होते हैं इसका सबूत क्या है? फिर इसकी क्या गारंटी कि वे आ ही जाएँगे? उन्हें हजार काम लगे रहते हैं। फिर इसका क्या भरोसा कि वे कटे को जोड़ देते हैं? अगर यह सब हो भी, तो भी आपके सत्यकल्पित विश्वास आपके अपने हैं। उनके लिए आप अपने को कटवाइए और अपनी हठ निभाइए। पहले जन्मे लोग अपनी सही-गलत मान्यता के लिए पीछे जन्मों को क्यों काटें? एक पीढ़ी के लिए दूसरी पीढ़ी क्यों चीरी जाए?


लड़के मुँहजोरी करने लगे हैं। कंबख्तों की किताबें बदल गई हैं। कोर्स इतनी जल्दी क्यों बदलने लगे हैं? बड़े लड़के से कह दिया था कि अपनी किताबें सँभालकर रखना छोटे के काम आएँगी! पर किताबें बदल गईं। पुरानी किताबें किसी के काम नहीं आ रही हैं। एक ही किताब पीढ़ियों क्यों नहीं चलती? पिताओं को यह चिंता है। बड़ा लड़का फौरन किताब में पेन्सिल रखकर सोडा लेने भाग जाता था। छोटा पैराग्राफ पूरा करके उठता है। भीष्म की कथा भी हमें तभी पढ़ा दी गई थी। हमने भीष्म को ‘धन्य’ कहा था। छोटा लड़का शांतनु को ‘धिक्कार’ कहेगा। ‘धन्य’ और ‘धिक्कार’ की जगहें बदल गई हैं। लोगों को पता नहीं है। छोटा लड़का भीष्म से कहेगा - क्या तुमने भी वही किताबें पढ़ी थीं, जो हमारे बड़े भाई ने? तुम पिता से क्यों नहीं कह सके कि जीवन भर के भोग के बाद भी आप की लिप्सा बनी हुई है, तो मैं क्या करूँ? अपना संयम दे सकता, तो थोड़ा दे देता, जीवन कैसे दे दूँ? राज्य से आप मुझे वंचित कर सकते हैं, पर मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार मैं हरगिज नहीं छोड़ूँगा।


छोटा टिप्पणी करेगा - भीष्म ऐसा नहीं कह सके। उन्हें पिता ने आदमी से तीर चलानेवाली मशीन बना दिया। ऑटोमेटिक धनुष ! महाभारत का यह सबसे भला, तेजस्वी, आदरणीय, ज्ञानी व्यक्ति सबसे दयनीय भी है। मगर देख रहा हूँ कि श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। यह काँवड़ हिलाने लगा है। काँवड़ में अंधे परेशान हैं। विचित्र दृश्य है यह। दो अंधे एक आँख वाले पर लदे हैं और उसे चला रहे हैं। जीवन से कट जाने के कारण एक पीढ़ी दृष्टिहीन हो जाती है, तब वह आगामी पीढ़ी के ऊपर लद जाती है। अंधी होते ही उसे तीर्थ सूझने लगते हैं। वह कहती है - हमें तीर्थ ले चलो। इस क्रियाशील जन्म का भोग हो चुका है। हमें आगामी जन्म के भोग के लिए पुण्य का एडवांस देना है। आँखवाले की जवानी अंधों को ढोने में गुजर जाती है। वह अंधों के बताए रास्ते पर चलता है। उसका निर्णय और निर्वाचन का अधिकार चला जाता है। उसकी आँखें रास्ता नहीं खोजतीं, सिर्फ राह के काँटे बचाने के काम आती हैं।


कितनी काँवड़े हैं - राजनीति में, साहित्य में, कला में, धर्म में, शिक्षा में। अंधे बैठे हैं और आँखवाले उन्हें ढो रहे हैं। अंधे में अजब काँइयाँपन आ जाता है। वह खरे और खोटे सिक्के को पहचान लेता है। पैसे सही गिन लेता है। उसमें टटोलने की क्षमता आ जाती है। वह पद टटोल लेता है, पुरस्कार टटोल लेता है, सम्मान के रास्ते टटोल लेता है। बैंक का चेक टटोल लेता है। आँखवाले जिन्हें नहीं देख पाते, उन्हें वह टटोल लेता है। नए अंधों के तीर्थ भी नए हैं। वे काशी, हरिद्वार, पुरी नहीं जाते। इस काँवड़वाले अंधे से पूछो - कहाँ ले चलें? वह कहेगा - तीर्थ! कौन सा तीर्थ? जवाब देगा केबिनट! मंत्रिमंडल! उस काँवड़वाले से पूछो, तो वह भी तीर्थ जाने को प्रस्तुत है। कौन-सा तीर्थ चलेंगे आप? जवाब मिलेगा अकादमी, विश्वविद्यालय! मगर काँवड़े हिलने लगी हैं। ढोनेवालों के मन में शंका पैदा होने लगी है। वे झटका देते हैं, तो अंधे चिल्लाते हैं - अरे पापी! यह क्या करते हो? क्या हमें गिरा दोगे? और ढोनेवाला कहता है - अपनी शक्ति और जीवन हम अंधों को ढोने में नहीं गुजारेंगे। तुम एक जगह बैठो। माला जपो। आदर लो, रक्षण लो। हमें अपनी इच्छा से चलने दो। अनुभव दे दो, दृष्टि मत दो! वह हम कमा लेंगे।


राजनीति, साहित्य आदि तो बड़े प्रगट क्षेत्र हैं। अप्रगट रूप से भी, विभिन्न क्षेत्रों में श्रवणकुमार काँवड़ उतारने के लिए हिला रहे हैं। वे किन्हीं विश्वासों की आरी से चिरने को तैयार नहीं हैं। मैं कॉफी हाउस के कोने में बैठे उस युवक की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसने गुस्से में दाढ़ी बड़ा ली है, जैसे उसकी दाढ़ी एक खास साइज और आकार की होते ही क्रांति हो जाएगी। बढ़ी दाढ़ी, ड्रेन पाइप और ‘सो ह्वाट’ वालों से यह नहीं हो रहा है। चुस्त कपड़े, हेयर स्टाइल और ‘ओ वंडरफुल’ वालियों से भी यह नहीं हो रहा है। ये तो न विश्वास में सच्चे, न शंका में। यह बिना प्रदर्शन और शोर शराबे के घरों और परिवारों में हो रहा है। सुशील, विनम्र और आज्ञाकारी युवक-युवती काँवड़े उतारने लगे हैं किसी के विश्वास के ओर से कटने से इनकार करने लगे हैं। एक परिचित है, जिसका ज्योतिष में विश्वास है। उनकी शिक्षिता जवान लड़की है। जिससे वह शादी करना चाहती थी, उससे ग्रह नहीं मिले। एक-दो और योग्य वरों से मिलान किया पर ग्रह यहाँ भी नहीं मिले। उसके ग्रहों ने किसी नालायक से मिलने के लिए स्थिति सँभाली होगी। लड़की एक दो साल घुटती रही। एक दिन उसने नम्रता से परिवार से कह दिया - ‘आप लोगों का इस ज्योतिष में विश्वास है, पर मेरा नहीं है। जो मेरा विश्वास ही नहीं है, उस पर मेरा बलिदान नहीं होना चाहिए।’ परिवार कुछ देर तो चमत्कृत रहा, फिर उसकी इच्छा से शादी कर दी। देख रहा हूँ कि मोरध्वज का आरा छीनकर फेंका जा रहा है। श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। वह काँवड़ को उतार कर रखने लगा है। वे सज्जन परेशान हैं। छोटा लड़का पैराग्राफ पूरा करके उठता है। बड़ा तो फौरन पेन्सिल रखकर दौड़ जाता था।


एक मध्यमवर्गीय कुत्ता – Ek Madhyamvargiya Kutta | Harishankar Parsai

 मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, “इनके यहां कुत्ता तो नहीं है?“ मित्र ने कहा, “तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!” मैंने कहा, “आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता. उनसे निपट लेता हूं. पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूं.“


कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते. वहां जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है. अपने स्नेही से “नमस्ते“ हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- “क्यों यहां आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहां से !”


फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता- चार बार काट ले. डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है. यूं कुछ आदमी कुत्ते से अधिक ज़हरीले होते हैं. एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था. मैंने कहा, ”इन्हें कुछ नहीं होगा. हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ.”


एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया. मैं उनके बंगले पर पहुंचा तो फाटक पर तख्ती टंगी दीखी- ”कुत्ते से सावधान !” मैं फ़ौरन लौट गया.


कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ”आप उस दिन चाय पीने नहीं आये.” मैंने कहा, “माफ़ करें. मैं बंगले तक गया था. वहां तख्ती लटकी थी- ‘कुत्ते से सावधान.‘ मेरा ख़्याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं. पर नेमप्लेट कुत्ते की टंगी हुई दीखी.“ यूं कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है. मार्क ट्वेन ने लिखा है- ‘यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा.‘ कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है.


बंगले में हमारे स्नेही थे. हमें वहां तीन दिन ठहरना था. मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही ”भौं-भौं” की आवाज़ आयी. मैं दो क़दम पीछे हट गया. हमारे मेजबान आये. कुत्ते को डांटा- ‘टाइगर, टाइगर!’ उनका मतलब था- ‘शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं. तू इतना वफ़ादार मत बन.‘


कुत्ता ज़ंजीर से बंधा था. उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था. मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया. मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है. लगता ऐसा ही है. मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूं. चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो. उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी. मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता.


शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे. नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था. मैंने देखा, फाटक पर आकर दो ‘सड़किया‘ आवारा कुत्ते खड़े हो गए. वे सर्वहारा कुत्ते थे. वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते. फिर यहां-वहां घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते. पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था. वे सहम जाते और यहां-वहां हो जाते. पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते. मेजबान ने कहा, “यह हमेशा का सिलसिला है. जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं.“


मैंने कहा, “पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए. यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है. सुविधाभोगी है. वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं. इसकी और उनकी बराबरी नहीं है. फिर यह क्यों चुनौती देता है!”


रात को हम बाहर ही सोए. ज़ंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था. अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता. आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है. जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहां हूं, तुम्हारे साथ हूं.


मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है. यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है. मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते. उनका रोब ही निराला ! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना. आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे. लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे. कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी. वे बैठे रहते या घूमते रहते. फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट.


यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है. कहता है- ‘मैं तुममें शामिल हूं.‘ उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का. यह मध्यवर्गीय चरित्र है. यह मध्यवर्गीय कुत्ता है. उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है. तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है. हमारी आहट पर वह भौंका नहीं,


थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया. आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं. थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया. मैंने मेजबान से कहा, “आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है.“


मेजबान ने बताया, “आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया. वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही. दोनों ने इसे घेर लिया. इसे रगेदा. दोनों इस पर चढ़ बैठे. इसे काटा. हालत ख़राब हो गयी. नौकर इसे बचाकर लाया. तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है. डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउंगा.“


मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा. दीन भाव से पड़ा था. मैंने अन्दाज़ लगाया. हुआ यों होगा-


यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा. उन कुत्तों पर भौंका होगा. उन कुत्तों ने कहा होगा- “अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता. ढोंग रचता है. ये पट्टा और ज़ंजीर लगाये हैं. मुफ़्त का खाता है. लॉन पर टहलता है. हमें ठसक दिखाता है. पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है. संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा. हममें से है तो निकल बाहर. छोड़ यह पट्टा और ज़ंजीर. छोड़ यह आराम. घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा. धूल में लोट.“ यह फिर भौंका होगा. इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे. यह कहकर- ‘अच्छा ढोंगी. दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं.‘


इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी.


कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है|


खेती – Kheti | Harishankar Parsai

 सरकार ने घोषणा की कि हम अधिक अन्न पैदा करेंगे और एक साल में खाद्य में आत्मनिर्भर हो जायेंगे।


दूसरे दिन कागज के कारखानों को दस लाख एकड़ कागज का आर्डर दे दिया गया। जब कागज आ गया, तो उसकी फाइलें बना दी गयीं। प्रधानमंत्री के सचिवालय से फाइल खाद्य विभाग को भेजी गयी। खाद्य विभाग ने उस पर लिख दिया कि इस फाइल से कितना अनाज पैदा होना है और अर्थ विभाग को भेज दिया।


अर्थ विभाग में फाइल के साथ नोट नत्थी किये गये और उसे कृषि विभाग भेज दिया गया। कृषि विभाग में उसमें बीज और खाद डाल दिये गये और उसे बिजली विभाग को भेज दिया। बिजली विभाग ने उसमें बिजली लगायी और उसे सिंचाई विभाग को भेज दिया गया।


अब यह फाइल गृह विभाग को भेज दी गयी। गृह विभाग विभाग ने उसे एक सिपाही को सौंपा और पुलिस की निगरानी में वह फाइल राजधानी से लेकर तहसील तक के दफ्तरों में ले जायी गयी। हर दफ्तर में फाइल की आरती करके उसे दूसरे दफ्तर में भेज दिया जाता।


जब फाइल सब दफ्तर घूम चुकी तब उसे पकी जानकर फूड कार्पोरेशन के दफ्तर में भेज दिया गयाऔर उस पर लिख दिया गया कि इसकी फसल काट ली जाए। इस तरह दस लाख एकड़ कागज की फाइलों की फसल पककर फूड कार्पोरेशन के पास पहुँच गयी।


एक दिन एक किसान सरकार से मिला और उसने कहा- "हुजूर हम किसानों को आप जमीन, पानी और बीज दिला दीजिए और अपने अफसरों से हमारी रक्षा कीजिए, तो हम देश के लिए पूरा अनाज पैदा कर देंगे।"


सरकारी प्रवक्ता ने जवाब दिया- "अन्न की पैदावार के लिए किसान की अब जरूरत नहीं है। हम दस लाख एकड़ कागज पर अन्न पैदा कर रहे हैं।"


कुछ दिनों बाद सरकार ने बयान दिया- "इस साल तो संभव नहीं हो सका, पर आगामी साल हम जरूर खाद्य में आत्मनिर्भर हो जायेंगे।" और उसी दिन बीस लाख एकड़ कागज का ऑर्डर और दे दिया गया।


मुण्डन – Mundan | Harishankar Parsai

 किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुण्डन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुंघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुण्डन हो गया था।


सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा- शायद सिर में जूं हो गयी हों। दूसरे ने कहा- शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो। किसी और ने कहा- शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गयी। पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे।


आखिर एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूं कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गयी है?


मंत्री ने जवाब दिया- नहीं।


सदस्यों ने अटकल लगायी कि कहीं उन लोगों ने ही तो मंत्री का मुण्डन नहीं कर दिया, जिनके खिलाफ वे बिल पेश करने का इरादा कर रहे थे।


एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या माननीय मंत्री को मालूम है कि उनका मुण्डन हो गया है? यदि हां, तो क्या वे बतायेंगे कि उनका मुण्डन किसने कर दिया है?


मंत्री ने संजीदगी से जवाब दिया- मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं!


कई सदस्य चिल्लाये- हुआ है! सबको दिख रहा है।


मंत्री ने कहा- सबको दिखने से कुछ नहीं होता। सरकार को दिखना चाहिए। सरकार इस बात की जांच करेगी कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं।


एक सदस्य ने कहा- इसकी जांच अभी हो सकती है। मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें।


मंत्री ने जवाब दिया- मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हर्गिज नहीं देखूंगा। सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती। मगर मैं वायदा करता हूं कि मेरी सरकार इस बात की विस्तृत जांच करवाकर सारे तथ्य सदन के सामने पेश करेगी।


सदस्य चिल्लाये- इसकी जांच की क्या जरूरत है? सिर आपका है और हाथ भी आपके हैं। अपने ही हाथ को सिर पर फेरने में मंत्री महोदय को क्या आपत्ति है?


मंत्री बोले- मैं सदस्यों से सहमत हूं कि सिर मेरा है और हाथ भी मेरे हैं। मगर हमारे हाथ परंपराओं और नीतियों से बंधे हैं। मैं अपने सिर पर हाथ फेरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूं। सरकार की एक नियमित कार्यप्रणाली होती है। विरोधी सदस्यों के दबाव में आकर मैं उस प्रणाली को भंग नहीं कर सकता। मैं सदन में इस संबंध में एक वक्तव्य दूंगा।


शाम को मंत्री महोदय ने सदन में वक्तव्य दिया-अध्यक्ष महोदय! सदन में ये प्रश्न उठाया गया कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं? यदि हुआ है तो किसने किया है? ये प्रश्न बहुत जटिल हैं। और इस पर सरकार जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं दे सकती। मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। जब तक जांच पूरी न हो जाए, सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कह सकती। हमारी सरकार तीन व्यक्तियों की एक जांच समिति नियुक्त करती है, जो इस बात की जांच करेगी। जांच समिति की रिपोर्ट मैं सदन में पेश करूंगा।


सदस्यों ने कहा- यह मामला कुतुब मीनार का नहीं जो सदियों जांच के लिए खड़ी रहेगी। यह आपके बालों का मामला है, जो बढ़ते और कटने रहते हैं। इसका निर्णय तुरंत होना चाहिए।


मंत्री ने जवाब दिया- कुतुब मीनार से हमारे बालों की तुलना करके उनका अपमान करने का अधिकार सदस्यों को नहीं है। जहां तक मूल समस्या का संबंध है, सरकार जांच के पहले कुछ नहीं कह सकती।


जांच समिति सालों जांच करती रही। इधर मंत्री के सिर पर बाला बढ़ते रहे।


एक दिन मंत्री ने जांच समिति की रिपोर्ट सदन के सामने रख दी।


जांच समिति का निर्णय था कि मंत्री का मुण्डन नहीं हुआ था।


सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इसका स्वागत हर्ष-ध्वनि से किया।


सदन के दूसरे भाग से ‘शर्म-शर्म’ की आवाजें उठीं। एतराज उठे- यह एकदम झूठ है। मंत्री का मुण्डन हुआ था।


मंत्री मुस्कुराते हुए उठे और बोले- यह आपका ख्याल हो सकता है। मगर प्रमाण तो चाहिए। आज भी अगर आप प्रमाण दे दें तो मैं आपकी बात मान लेता हूं।


ऐसा कहकर उन्होंने अपने घुंघराले बालों पर हाथ फेरा और सदन दूसरे मसले सुलझाने में व्यस्त हो गया।


भगत की गत – Bhagat ki Gat | Harishankar Parsai

 उस दिन जब भगतजी की मौत हुई थी, तब हमने कहा था- भगतजी स्वर्गवासी हो गए।


पर अभी मुझे मालूम हुआ कि भगतजी, स्वर्गवासी नहीं, नरकवासी हुए हैं। मैं कहूं तो किसी को इस पर भरोसा नहीं होगा, पर यह सही है कि उन्हें नरक में डाल दिया गया है और उन पर ऐसे जघन्य पापों के आरोप लगाये गये हैं कि निकट भविष्य में उनके नरक से छूटने की कोई आशा नहीं है। अब हम उनकी आत्मा की शान्ति की प्रार्थना करें तो भी कुछ नहीं होगा। बड़ी से बड़ी शोक-सभा भी उन्हें नरक से नहीं निकाल सकती।


सारा मुहल्ला अभी तक याद करता है कि भगतजी मंदिर में आधीरात तक भजन करते थे। हर दो-तीन दिनों में वे किसी समर्थ श्रद्धालु से मंदिर में लाउड-स्पीकर लगवा देते और उस पर अपनी मंडली समेत भजन करते। पर्व पर तो चौबीसों घंटे लाउड-स्पीकर पर अखण्ड कीर्तन होता। एक-दो बार मुहल्ले वालों ने इस अखण्ड कोलाहल का विरोध किया तो भगतजी ने भक्तों की भीड़ जमा कर ली और दंगा कराने पर उतारू हो गए। वे भगवान के लाउड-स्पीकर पर प्राण देने और प्राण लेने पर तुल गये थे।


ऐसे ईश्वर-भक्त, जिन्होंने अरबों बार भगवान का नाम लिया, नरक में भेजे गए और अजामिल, जिसने एक बार भूल से भगवान का नाम ले लिया था, अभी भी स्वर्ग के मजे लूट रहा है। अंधेर कहां नहीं है!


भगतजी बड़े विश्वास से उस लोक में पहुंचे। बड़ी देर तक यहां-वहां घूमकर देखते रहे। फिर एक फाटक पर पहुंचकर चौकीदार से पूछा- स्वर्ग का प्रवेश-द्वार यही है न?


चौकीदार ने कहा- हां यही है।


वे आगे बढ़ने लगे, तो चौकीदार ने रोका- प्रवेश-पत्र यानी टिकिट दिखाइए पहले।


भगतजी को क्रोध आ गया। बोले- मुझे भी टिकिट लगेगा यहां? मैंने कभी टिकिट नहीं लिया। सिनेमा मैं बिना टिकिट देखता था और रेल में भी बिना टिकिट बैठता था। कोई मुझसे टिकिट नहीं मांगता। अब यहां स्वर्ग में टिकिट मांगते हो? मुझे जानते हो। मैं भगतजी हूं।


चौकीदार ने शान्ति से कहा- होंगे। पर मैं बिना टिकिट के नहीं जाने दूंगा। आप पहले उस दफ्तर में जाइए। वहां आपके पाप-पुण्य का हिसाब होगा और तब आपको टिकिट मिलेगा।


भगतजी उसे ठेलकर आगे बढ़ने लगे। तभी चौकीदार एकदम पहाड़ सरीखा हो गया और उसने उन्हें उठाकर दफ्तर की सीढ़ी पर खड़ा कर दिया।


भगतजी दफ्तर में पहुंचे। वहां कोई बड़ा देवता फाइलें लिए बैठा था। भगतजी ने हाथ जोड़कर कहा- अहा मैं पहचान गया भगवान कार्तिकेय विराजे हैं।


फाइल से सिर उठाकर उसने कहा- मैं कार्तिकेय नहीं हूं। झूठी चापलूसी मत करो। जीवन-भर वहां तो कुकर्म करते रहे हो और यहां आकर ‘हें-हें’ करते हो। नाम बताओ।


भगतजी ने नाम बताया, धाम बताया।


उस अधिकारी ने कहा- तुम्हारा मामला बड़ा पेचीदा है। हम अभीतक तय नहीं कर पाये कि तुम्हे स्वर्ग दें या नरक। तुम्हारा फैसला खुद भगवान करेंगे।


भगतजी ने कहा- मेरा मामला तो बिल्कुल सीधा है। मैं सोलह आने धार्मिक आदमी हूं। नियम से रोज भगवान का भजन करता रहा हूं। कभी झूठ नहीं बोला और कभी चोरी नहीं की। मंदिर में इनी स्त्रियां आती थीं, पर मैं सबको माता समझता था। मैंने कभी कोई पाप नहीं किया। मुझे तो आंख मूंदकर आप स्वर्ग भेज सकते हैं।


अधिकारी ने कहा- भगतजी आपका मामला उतना सीधा नहीं है, जितना आप समझ रहे हैं। परमात्मा खुद उसमें दिलचस्पी ले रहे हैं। आपको मैं उनके सामने हाजिर किये देता हूं।


एक चपरासी भगतजी को भगवान के दरबार में ले चला। भगतजी ने रास्ते में ही स्तुति शुरू कर दी। जब वे भगवान के सामने पहुंचे तो बड़े जोर-जोर से भजन गाने लगे-


‘हम भगतन के भगत हमारे,


सुन अर्जुन परतिज्ञा मेरी, यह व्रत टरै न टारे।’


भजन पूरा करके गदगद वाणी में बोले- अहा, जन्म-जन्मान्तर की मनोकामना आज पूरी हुई है। प्रभु, अपूर्व रूप है आपका। जितनी फोटो आपकी संसार में चल रही हैं, उनमें से किसी से नहीं मिलता।


भगवान स्तुति से ‘बोर’ हो रहे थे। रुखाई से बोले- अच्छा अच्छा ठीक है। अब क्या चाहते हो, सो बोलो।


भगतजी ने निवेदन किया- भगवन, आपसे क्या छिपा है! आप तो सबकी मनोकामना जानते हैं। कहा है- राम, झरोखा बैठ के सबका मुजरा लेय, जाकी जैसी चाकरी ताको तैसा देय! प्रभु, मुझे स्वर्ग में कोई अच्छी सी जगह दिला दीजिए।


प्रभु ने कहा- तुमने ऐसा क्या किया है, जो तुम्हें स्वर्ग मिले?


भगतजी को इस प्रश्न से चोट लगी। जिसके लिए इतना किया, वही पूछता है कि तुमने ऐसा क्या किया! भगवान पर क्रोध करने से क्या फायदा- यह सोचकर भगतजी गुस्सा पी गये। दीनभव से बोले- मैं रोज आपका भजन करता रहा।


भगवान ने पूछा- लेकिन लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे?


भगतजी सहज भव से बोले- उधर सभी लाउड-स्पीकर लगाते हैं। सिनेमावाले, मिठाईवाले, काजल बेचने वाले- सभी उसका उपयोग करते हैं, तो मैंने भी कर लिया।


भगवान ने कहा- वे तो अपनी चीज का विज्ञापन करते हैं। तुम क्या मेरा विज्ञापन करते थे? मैं क्या कोई बिकाऊ माल हूं।


भगतजी सन्न रह गये। सोचा, भगवान होकर कैसी बातें करते हैं।


भगवान ने पूछा- मुझे तुम अन्तर्यामी मानते हो न?


भगतजी बोले- जी हां!


भगवान ने कहा- फिर अन्तर्यामी को सुनाने के लिए लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे? क्या मैं बहरा हूं? यहां सब देवता मेरी हंसी उड़ाते हैं। मेरी पत्नी मजाक करती है कि यह भगत तुम्हें बहरा समझता है।


भगतजी जवाब नहीं दे सके।


भगवान को और गुस्सा आया। वे कहने लगे- तुमने कई साल तक सारे मुहल्ले के लोगों को तंग किया। तुम्हारे कोलाहल के मारे वे न काम कर सकते थे, न चैन से बैठ सकते थे और न सो सकते थे। उनमें से आधे तो मुझसे घृणा करने लगे हैं। सोचते हैं, अगर भगवान न होता तो यह भगत इतना हल्ला न मचाता। तुमने मुझे कितना बदनाम किया है!


भगत ने साहस बटोरकर कहा- भगवना आपका नाम लोंगों के कानों में जाता था, यह तो उनके लिए अच्छा ही था। उन्हें अनायास पुण्य मिल जाता था।


भगवान को भगत की मूर्खता पर तरस आया। बोले- पता नहीं यह परंपरा कैसे चली कि भक्त का मूर्ख होना जरूरी है। और किसने तुमसे कहा कि मैं चापलूसी पसंद करता हूं? तुम क्या यह समझते हो कि तुम मेरी स्तुति करोगे तो मैं किसी बेवकूफ अफसर की तरह खुश हो जाऊंगा? मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं भगतजी कि तुम जैसे मूर्ख मुझे चला लें। मैं चापलूसी से खुश नहीं होता कर्म देखता हूं।


भगतजी ने कहा- भगवन, मैंने कभी कोई कुकर्म नहीं किया।


भगवान हंसे। कहने लगे- भगत, तुमने आदमियों की हत्या की है। उधर की अदालत से बच गये, पर यहां नहीं बच सकते।


भगतजी का धीरज अब छूट गया। वे अपने भगवान की नीयत के बारे में शंकालु हो उठे। सोचने लगे, यह भगवान होकर झूठ बोलता है। जरा तैश में कहा- आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। मैंने किसी आदमी की जान नहीं ली। अभी तक मैं सहता गया, पर इस झूठे आरोप को मैं सहन नहीं कर सकता। आप सिद्ध करिए कि मैंने हत्या की।


भगवान ने कहा- मैं फिर कहता हूं कि तुम हत्यारे हो, अभी प्रमाण देता हूं।


भगवान ने एक अधेड़ उम्र के आदमी को बुलाया। भगत से पूछा- इसे पहचानते हो?


हां, यह मेरे मुहल्ले का रमानाथ मास्टर है। पिछले साल बीमारी से मरा था।– भगतजी ने विश्वास से कहा।


भगवान बोले- बीमारी से नहीं, तुम्हारे भजन से मरा है। तुम्हारे लाउड-स्पीकर से मरा है। रमानाथ, तुम्हारी मृत्यु क्यों हुई?


रमानाथ ने कहा- प्रभु मैं बीमार था। डॉक्टर ने कहा कि तुम्हें पूरी तरह नींद और आराम मिलना चाहिए। पर भगतजी के लाउडस्पीकर पर अखण्ड कीर्तन के मारे मैं सो न सका, न आराम कर सका। दूसने दिन मेरी हालत बिगड़ गयी और चौथे दिन मैं मर गया।


भगत सुनकर घबरा उठे।


तभी एक बीस-इक्कीस साल का लड़का बुलाया गया। उससे पूछा- सुरेंद्र,तुम कैसे मरे?


मैंने आत्महत्या कर ली थी- उसने जवाब दिया।


आत्महत्या क्यों कर ली थी?- भगवान ने पूछा।


सुरेंद्रनाथ ने कहा- मैं परीक्षा में फेल हो गया था।


परीक्षा में फेल क्यों हो गये थे?


भगतजी के लाउड-स्पीकर के कारण मैं पढ़ नहीं सका। मेरा घर मंदिर के पास ही है न!


भगतजी को याद आया कि इस लड़के ने उनसे प्रार्थना की थी कि कम से कम परीक्षा के दिनों में लाउड-स्पीकर मत लगाइए।


भगवान ने कठोरता से कहा- तुम्हाने पापों को देखते हुए मैं तुम्हें नरक में डाल देने का आदेश देता हूं।


भगतजी ने भागने की कोशिश की, पर नरक के डरावने दूतों ने उन्हें पकड़ लिया।


अपने भगतजी, जिन्हें हम धर्मात्मा समझते थे, नरक भोग रहे हैं।


भारत को चाहिए जादूगर और साधु – Bharat ko Chahiye Jadugar aur Sadhu | Harishankar Parsai

 हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूं कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूं तो भी काम चलेगा- बल्कि ज्यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।


यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्र दिवस है, मगर ‘गण’ टूट रहे हैं। हर गणतंत्र दिवस ‘गण’ के टूटने या नये ‘गण’ बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और ‘गण’ संकट आयेगा।


इस पूरे साल में मैंने दो चीजें देखीं। दो तरह के लोग बढ़े- जादूगर और साधु बढ़े। मेरा अंदाज था, सामान्य आदमी के जीवन के सुभीते बढ़ेंगे- मगर नहीं। बढ़े तो जादूगर और साधु-योगी। कभी-कभी सोचता हूं कि क्या ये जादूगर और साधु ‘गरीबी हटाओ’ प्रोग्राम के अंतर्गत ही आ रहे हैं! क्या इसमें कोई योजना है?


रोज अखबार उठाकर देखता हूं। दो खबरें सामने आती हैं- कोई नया जादूगर और कोई नया साधु पैदा हो गया है। उसका विज्ञापन छपता है। जादूगर आंखों पर पट्टी बांधकर स्कूटर चलाता है और ‘गरीबी हटाओ’ वाली जनता कामधाम छोड़कर, तीन-चार घंटे आंखों पर पट्टी बांधे जादू्गर को देखती हजारों की संख्या में सड़क के दोनों तरफ खड़ी रहती है। ये छोटे जादूगर हैं। इस देश में बड़े बड़े जादूगर हैं, जो छब्बीस सालों से आंखों पर पट्टी बांधे हैं। जब वे देखते हैं कि जनता अकुला रही है और कुछ करने पर उतारू है, तो वे फौरन जादू का खेल दिखाने लगते हैं। जनता देखती है, ताली पीटती है। मैं पूछता हूं- जादूगर साहब, आंखों पर पट्टी बांधे राजनैतिक स्कूटर पर किधर जा रहे हो? किस दिशा को जा रहे हो- समाजवाद? खुशहाली? गरीबी हटाओ? कौन सा गन्तव्य है? वे कहते हैं- गन्तव्य से क्या मतलब? जनता आंखों पर पट्टी बांधे जादूगर का खेल देखना चाहती है। हम दिखा रहे हैं। जनता को और क्या चाहिए?


जनता को सचमुच कुछ नहीं चाहिए। उसे जादू के खेल चाहिए। मुझे लगता है, ये दो छोटे-छोटे जादूगर रोज खेल दिखा रहे हैं, इन्होंने प्रेरणा इस देश के राजनेताओं से ग्रहण की होगी। जो छब्बीस सालों से जनता को जादू के खेल दिखाकर खुश रखे हैं, उन्हें तीन-चार घंटे खुश रखना क्या कठिन है। इसलिए अखबार में रोज फोटो देखता हूं, किसी शहर में नये विकसित किसी जादूगर की।


सोचता हूं, जिस देश में एकदम से इतने जादूगर पैदा हो जाएं, उस जनता की अंदरूनी हालत क्या है? वह क्यों जादू से इतनी प्रभावित है? वह क्यों चमत्कार पर इतनी मुग्ध है? वह जो राशन की दुकान पर लाइन लगाती है और राशन नहीं मिलता, वह लाइन छोड़कर जादू के खेल देखने क्यों खड़ी रहती है?


मुझे लगता है, छब्बीस सालों में देश की जनता की मानसिकता ऐसी बना दी गयी है कि जादू देखो और ताली पीटो। चमत्कार देखो और खुश रहो।


बाकी काम हम पर छोड़ो।


भारत-पाक युद्ध ऐसा ही एक जादू था। जरा बड़े स्केल का जादू था, पर था जादू ही। जनता अभी तक ताली पीट रही है।


उधर राशन की दुकान पर लाइन बढ़ती जा रही है।


देशभक्त मुझे माफ करें। पर मेरा अंदाज है, जल्दी ही एक शिमला शिखर-वार्ता और होगी। भुट्टो कहेंगे- पाकिस्तान में मेरी हालत खस्ता। अलग-अलग राज्य बनना चाह रहे हैं। गरीबी बढ़ रही है। लोग भूखे मर रहे हैं।


हमारी प्रधानमंत्री कहेंगी- इधर भी गरीबी हट नहीं रही। कीमतें बढ़ती जा रही हैं। जनता में बड़ी बेचैनी है। बेकारी बढ़ती जा रही है।


तब दोनों तय करेंगे- क्यों न पंद्रह दिनों का एक और जादू हो जाए। चार-पांच साल दोनों देशों की जनता इस जादू के असर में रहेगी।(देशभक्त माफ करें- मगर जरा सोंचें)


जब मैं इन शहरों के इन छोटे जादूगरों के करतब देखता हूं तो कहता हूं- बच्चों, तुमने बड़े जादू नहीं देखे। छोटे देखे हैं तो छोटे जादू ही सीखे हो।


दूसरा कमाल इस देश में साधु है। अगर जादू से नहीं मानते और राशन की दुकान पर लाइन लगातार बढ़ रही है, तो लो, साधु लो।


जैसे जादूगरों की बाढ़ आयी है, वैसे ही साधुओं की बाढ़ आयी है। इन दोनों में कोई संबंध जरूर है।


साधु कहता है- शरीर मिथ्या है। आत्मा को जगाओ। उसे विश्वात्मा से मिलाओ। अपने को भूलो। अपने सच्चे स्वरूप को पहचानो। तुम सत्-चित्-आनन्द हो।


आनंद ही ब्रह्म है। राशन ब्रह्म नहीं। जिसने ‘अन्नं ब्रह्म’ कहा था, वह झूठा था। नौसिखिया था। अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचा कि अन्न नहीं ‘आनन्द’ ही ब्रह्म है।


पर भरे पेट और खाली पेट का आनन्द क्या एक सा है? नहीं है तो ब्रह्म एक नहीं अनेक हुए। यह शास्त्रोक्त भी है- ‘एको ब्रह्म बहुस्याम।’ ब्रह्म एक है पर वह कई हो जाता है। एक ब्रह्म ठाठ से रहता है, दूसरा राशन की दुकान में लाइन से खड़ा रहता है, तीसरा रेलवे के पुल के नीचे सोता है।


सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।


शक्कर में पानी डालकर जो उसे वजनदार बनाकर बेचता है, वह भी ब्रह्म है और जो उसे मजबूरी में खरीदता है, वह भी ब्रह्म है।


ब्रह्म, ब्रह्म को धोखा दे रहा है।


साधु का यही कर्म है कि मनुष्य को ब्रह्म की तरफ ले जाय और पैसे इकट्ठे करे; क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।’


26 जनवरी आते आते मैं यही सोच रहा हूं कि ‘हटाओ गरीबी’ के नारे को, हटाओ महंगाई को, हटाओ बेकारी को, हटाओ भुखमरी को क्या हुआ?


बस, दो तरह के लोग बहुतायत से पैदा करें- जादूगर और साधु।


ये इस देश की जनता को कई शताब्दी तक प्रसन्न रखेंगे और ईश्वर के पास पहुचा देंगे।


भारत-भाग्य विधाता। हममें वह क्षमता दे कि हम तरह-तरह के जादूगर और साधु इस देश में लगातार बढ़ाते जायें।


हमें इससे क्या मतलब कि ‘तर्क की धारा सूखे मरूस्थल की रेत में न छिपे’(रवींद्रनाथ) वह तो छिप गयी। इसलिए जन-गण-मन अधिनायक! बस हमें जादूगर और पेशेवर साधु चाहिए। तभी तुम्हारा यह सपना सच होगा कि हे परमपिता, उस स्वर्ग में मेरा यह देश जाग्रत हो।(जिसमें जादू्गर और साधु जनता को खुश रखें)।


यह हो रहा है, परमपिता की कृपा से!


एक अशुद्ध बेवकूफ – Ek Ashuddh Bewakoof | Harishankar Parsai

 बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।


मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।


अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।


मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।


मैंने कहा- कुछ सुनाइए।


वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।


मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।


मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।


पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।


मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।


कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।


उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।


मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।


एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं।


एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।


डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।


अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।


हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं।


कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)


अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- ‘टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट’- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।


शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और ‘माडरेशन’ के लिए बुला लें तो और अच्छा है।


मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।


बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।


एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।


घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।


वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।


मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।


एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।


कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।


मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।


वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।


मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।


वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?


मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।


वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।


मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।


वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।


मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।


वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले ‘अशुद्ध’ बेवकूफ के अलग मजे हैं।


मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- ‘माया महा ठगनि हम जानी’।


बदचलन – Badchalan | Harishankar Parsai

 एक बाड़ा था। बाड़े में तेरह किराएदार रहते थे। मकान मालिक चौधरी साहब पास ही एक बंगले में रहते थे।


एक नए किराएदार आए। वे डिप्टी कलेक्टर थे। उनके आते ही उनका इतिहास भी मुहल्ले में आ गया था। वे इसके पहले ग्वालियर में थे। वहां दफ्तर की लेडी टाइपिस्ट को लेकर कुछ मामला हुआ था। वे साल भर सस्पैंड रहे थे। यह मामला अखबार में भी छपा था। मामला रफा-दफा हो गया और उनका तबादला इस शहर में हो गया।


डिप्टी साहब के इस मकान में आने के पहले ही उनके विभाग का एक आदमी मुहल्ले में आकर कह गया था कि यह बहुत बदचलन, चरित्रहीन आदमी है। जहां रहा, वहीं इसने बदमाशी की। यह बात सारे तेरह किराएदारों में फैल गई।


किरदार आपस में कहते- यह शरीफ आदमियों का मोहल्ला है। यहां ऐसा आदमी रहने आ रहा है। चौधरी साहब ने इस आदमी को मकान देकर अच्छा नहीं किया।


कोई कहते- बहू-बेटियां सबके घर में हैं। यहां ऐसा दुराचारी आदमी रहने आ रहा है। भला शरीफ आदमी यहां कैसे रहेंगे।


डिप्टी साहब को मालूम था कि मेरे बारे में खबर इधर पहुंच चुकी है। वे यह भी जानते थे कि यहां सब लोग मुझसे नफरत करते हैं। मुझे बदमाश मानते हैं। वे इस माहौल में अड़चन महसूस करते थे। वे हीनता की भावना से ग्रस्त थे। नीचा सिर किए आते-जाते थे। किसी से उनकी दुआ-सलाम नहीं होती थी।


इधर मुहल्ले के लोग आपस में कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन आ बसा है।


डिप्टी साहब का सिर्फ मुझसे बोलचाल का संबंध स्थापित हो गया था। मेरा परिवार नहीं था। मैं अकेला रहता था। डिप्टी साहब कभी-कभी मेरे पास आकर बैठ जाते। वे अकेले रहते थे। परिवार नहीं लाए थे।


एक दिन उन्होंने मुझसे कहा- ये जो मिस्टर दास हैं, ये रेलवे के दूसरे पुल के पास एक औरत के पास जाते हैं। बहुत बदचलन औरत है।


दूसरे दिन मैंने देखा, उनकी गर्दन थोड़ी सी उठी है।


मुहल्ले के लोग आपस में कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन आ गया।


दो-तीन दिन बाद डिप्टी साहब ने मुझसे कहा- ये जो मिसेज चोपड़ा हैं, इनका इतिहास आपको मालूम है? जानते हैं इनकी शादी कैसे हुई? तीन आदमी इनसे फंसे थे। इनका पेट फूल गया। बाकी दो शादीशुदा थे। चोपड़ा को इनसे शादी करनी पड़ी।


दूसरे दिन डिप्टी साहब का सिर थोड़ा और ऊंचा हो गया।


मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में कैसा बदचलन आदमी आ बसा।


तीन-चार दिन बाद फिर डिप्टी साहब ने कहा- श्रीवास्तव साहब की लड़की बहुत बिगड़ गई है। ग्रीन होटल में पकड़ी गई थी एक आदमी के साथ।


डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हुआ।


मुहल्ले वाले अभी भी कह रहे थे- शरीफों के मुहल्ले में यह कहां का बदचलन आ गया।


तीन-चार दिन बाद डिप्टी साहब ने कहा- ये जो पांडे साहब हैं, अपने बड़े भाई की बीवी से फंसे हैं। सिविल लाइंस में रहता है इनका बड़ा भाई।


डिप्टी साहब का सिर और ऊंचा हो गया था।


मुहल्ले के लोग अभी भी कहते थे- शरीफों के मुहल्ले में यह बदचलन कहां से आ गया।


डिप्टी साहब ने मुहल्ले में लगभग हर एक के बारे में कुछ पता लगा लिया था। मैं नहीं कह सकता कि यह सब सच था या उनका गढ़ा हुआ। आदमी वे उस्ताद थे। ऊंचे कलाकार। हर बार जब वे किसी की बदचलनी की खबर देते, उनका सिर और ऊंचा हो जाता।


अब डिप्टी साहब का सिर पूरा तन गया था। चाल में अकड़ आ गई थी। लोगों से दुआ सलाम होने लगी थी। कुछ बात भी कर लेते थे।


एक दिन मैंने कहा- बीवी-बच्चों को ले आइए न। अकेले तो तकलीफ होती होगी।


डिप्टी साहब ने कहा- अरे साहब, शरीफों के मुहल्ले में मकान मिले तभी तो लाऊंगा बीवी-बच्चों को।

 

पिटने-पिटने में फर्क – Pitne-Pitne mein Farq | Harishankar Parsai

 (यह आत्म प्रचार नहीं है। प्रचार का भार मेरे विरोधियों ने ले लिया है। मैं बरी हो गया। यह ललित निबंध है।)


बहुत लोग कहते हैं- तुम पिटे। शुभ ही हुआ। पर तुम्हारे सिर्फ दो अखबारी वक्तव्य छपे। तुम लेखक हो। एकाध कहानी लिखो। रिपोर्ताज लिखो। नहीं तो कोई ललित निबंध लिख डालो। पिट भी जाओ और साहित्य-रचना भी न हो। यह साहित्य के प्रति बड़ा अन्याय है। लोगों को मिरगी आती है और वे मिरगी पर उपन्यास लिख डालते हैं। टी-हाउस में दो लेखकों में सिर्फ मां-बहन की गाली-गलौज हो गयी। दोनों ने दो कहानियां लिख डालीं। दोनों बढि़या। एक ने लिखा कि पहला नीच है। दूसरे ने लिखा- मैं नहीं, वह नीच है। पढ़ने वालों ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों ही नीच हैं। देखो, साहित्य का कितना लाभ हुआ कि यह सिद्ध हो गया कि दोनों लेखक नीच हैं। फिर लोगों ने देखा कि दोनों गले मिल रहे हैं। साथ चाय पी रहे हैं। दोनों ने मां-बहन की गाली अपने मन के कलुष से नहीं दी थी, साहित्य-साधना के लिए दी थी। ऐसे लेखक मुझे पसंद हैं।


पिटाई की सहानुभूति के सिलसिले में जो लोग आये, उनकी संख्या काफी होती थी। मैं उन्हें पान खिलाता था। जब पान का खर्च बहुत बढ़ गया, तो मैंने सोचा पीटने वालों के पास जाऊं और कहूं, “जब तुमने मेरे लिए इतना किया है, मेरा यश फैलाया है, तो कम से कम पान का खर्च दे दो। चाहे तो एक बेंत और मार लो। लोग तो खरोंच लग जाय तो भी पान का खर्च ले लेते हैं।”


मेरे पास कई तरह के दिलचस्प आदमी आते हैं।


आमतौर पर लोग आकर यही कहते हैं, “सुनकर बड़ा दुख हुआ, बड़ा बुरा हुआ।”


मैं इस ‘बुरे लगने’ और ‘दुख’ से बहुत बोर हो गया। पर बेचारे लोग और कहें भी क्या?


मगर एक दिलचस्प आदमी आये। बोले, “इतने सालों से लिख रहे हो। क्या मिला? कुछ लोगों की तारीफ, बस! लिखने से ज्यादा शोहरत पिटने से मिली। इसलिए हर लेखक को साल में कम से कम एक बार पिटना चाहिए। तुम छ: महीने में एक बार पिटो। फिर देखो कि बिना एक शब्द लिखे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के होते हो या नहीं। तुम चाहो तो तुम्हारा यह काम मैं ही कर सकता हूं।”


मैंने कहा, “बात सही है। जब जरूरत होगी, आपको तकलीफ दूंगा। पर यार ज्यादा मत मारना।”


पिटा पहले भी हूं।


मैंट्रिक में था तो एक सहपाठी रामेश्वर से मेरा झगड़ा था। एक दिन उसे मैं ढकेलते-ढकेलते कक्षा की दीवार तक ले गया। वह फंस गया था। मैंने उसे पीटा। फिर दोनों में अच्छे संबंध हो गये। स्कूली लड़ाई स्थाई नहीं होती। पर वह गांठ बांधे था। हमारे घर से स्कूल डेढ़ मील दूर था। एक दिन हम दोनों गपशप करते शाम के झुटपुटे में आ रहे थे कि वह एकाएक बोला, “अरे, यह रामदास कहां से आ रहा है? वह देखो।” मैं उस तरफ देखने लगा। उसने बिजली की तेजी से मेरी टांगों में हाथ डाला और वह पटखनी दी कि मैं नाले के पुल से नीचे गिर पड़ा। उठा। शरीर से ताकत से मैं डेवढ़ा पड़ता था। सोचा, इसे दमचूं। पर उसने बड़े मजे की बात कही। कहने लगा, “देखो, अदा-बदा हो गये। अपन अब पक्के दोस्त। मैंने तुम्हें कैसी बढि़या तरकीब सिखायी है।” मैंने भी कहा, “हां यार, तरकीब बढि़या है। मैं काफी दुश्मनों को ठीक करूंगा।” फिर मैंने चार विरोधियों को वहीं आम के झुरमुट में पछाड़ा। तरकीब वही- साथ जा रहे हैं। एकाएक कहता- अरे, वह उधर से श्याम सुंदर आ रहा है। वह उधर देखने लगता और मैं उसकी टांगों में हाथ डालकर सड़क के नीचे गढ़े में फेंक देता।


यह तो स्कूल की पिटाई हुई।


लिखने लगा, तो फिर एक बार पिटाई हुई। आज से पंद्रह-बीस साल पहले। मैं कहानियां लिखता और उसमें ‘कमला’ नाम की पात्री आ जाती। कुछ नाम कमला, विमला, आशा, सरस्वती ऐसे हैं कि कलम पर यों ही आ जाते हैं।


मुझे दो चिट्ठियां मिलीं- ‘खबरदार, कभी कमला कहानी में आयी तो ठीक कर दिये जाओगे। वह मेरी प्रेमिका है और तुम उससे कहानी में हर कुछ करवाते हो। वह ऐसी नहीं है।’


मैं बात टाल गया।


एक दिन संकरी गली से घर आ रहा था। आगे गली का मोड़ था। वहीं मकान के पीछे की दीवार थी। एक आदमी चुपचाप पीछे से आया और ऐसे जोर से धक्का दिया कि मैं दीवार तक पहुंच गया। हाथ आगे बढ़ाकर मैंने दीवार पर रख दिये और सिर बचा लिया, वरना सिर फूट जाता। बाद में मालूम हुआ कि वह शहर का नंबर एक का पहलवान है। मैंने कमला को विमला कर दिया। लेखक को नाम से क्या फर्क पड़ता है।


पर यह जून वाली ताजा पिटाई बड़ी मजेदार रही। मारने वाले आये। पांच-छ: बेंत मारे। मैंने हथेलियों से आंखें बचा लीं। पांच-सात सेकंड में काम खत्म। वे दो वाक्य राजनीति के बोलकर हवा में विलीन हो गये।


मैंने डिटाल लगाया और एक-डेढ़ घंटे सोया। ताजा हो गया।


तीन दिन बाद अखबारों में खबर छपी तो मजे की बातें मेरे कानों में शहर और बाहर से आने लगीं। स्नेह, दुख की आती ही थीं। पर-


- अच्छा पिटा।- पिटने लायक ही था।- घोर अहंकारी आदमी।- ऐसा लिखेगा तो पिटेगा ही।- जो लिखता है, वह साहित्य है क्या? अरे, प्रेम कहानी लिख। उसमें कोई नहीं पिटता।


कुछ लेखकों की प्रसन्नता मेरे पास तक आयी। उनका कहना था- अब यह क्या लिखेगा? सब खत्म। हो गया इसका काम-तमाम। बहुत आंग मूतता था। पर मैंने ठीक वैसा ही लिखना जारी रखा और इस बीच पांच कहानियां तथा चार निबंध लिख डाले और एक डायरी उपन्यास तिहाई लिख लिया है।


सहानुभूति वाले बड़े दिलचस्प होते हैं। तरह-तरह की बातें करते हैं। बुजुर्ग-बीमार-वरिष्ठ साहित्यकार बाबू रामानुजलाल श्रीवास्तव ने अपनी मोटी छड़ी भेजी और लिखा- “अब यह मेरे काम की नहीं रही। मेरी दुनियां अब बिस्तर हो गयी है। इस छड़ी को साथ रखो।”


लाठी में गुन बहुत हैं, सदा राखिए संग.......


एक अपरिचित आये और एक छड़ी दे गये। वह गुप्ती थी, पर भीतर फलक नहीं था। मूठ पर पैने लोहे का ढक्कन लगा था, जिसके कनपटी पर एक वार से आदमी पछाड़ खा जाए।


मेरे चाचा नम्बर एक के लठैत थे। वे लट्ठ को तेल पिलाते थे और उसे दुखभंजन कहते थे। मुहल्ले के रंगदार को, जो सबको तंगा करता था, उन्होंने पकड़ा। सामने एक पतले झाड़ से बांधा और वह पिटाई की कि वह हमेशा के लिए ठीक हो गया। मैंने ही कहा, “दादा इसे अब छोड़ दो।” उन्होंने छोड़ दिया, मगर कहा, “देख मैंने दुखभंजन से काम नहीं लिया। गड़बड़ की तो दुखभंजन अपना काम करेगा।”


वह दुखभंजन पता नहीं कहां चला गया। उनकी मृत्यु हो गयी। पर वे शीशम की अपनी छड़ी छोड़ गये हैं।


एक साहब एक दिन आये। एक-दो बार दुआ-सलाम हुई होगी। पर उन्होंने प्रेमी मित्रों से ज्यादा दुख जताया। मुझे आशंका हुई कि कहीं वे रो न पड़ें।


वे मुझे उस जगह ले गये, जहां मैं पिटा था। जगह का मुलाहजा किया।


- कहां खड़े थे?


- किस तरफ देख रहे थे?


- क्या वे पीछे से चुपचाप आये?


- तुम सावधान नहीं थे?


- कुल पांच-सात सेकंड में हो गया?


- बिना चुनौती दिये हमला करना कायरता है। सतयुग से चुनौती देकर हमला किया जाता रहा है, पर यह कलियुग है।


मैं परेशान। जिस बात को ढाई महीने हो गये, जिसे मैं भूल जाना चाहता हूं, उसी की पूरी तफशीश कर रहा है। कहीं यह खुफिया विभाग का आदमी तो नहीं है? पर जिसका सब खुला है, उसे खुफिया से क्या डर।


वे आकर बैठ गये।


कहने लगे, “नाम बहुत फैल गया है। मन्त्रियों ने दिलचस्पी ली होगी?”


मैंने कहा, “हां, ली।”


वे बोले, “मुख्यमंत्री ने भी ली होगी। मुख्यमंत्री से आपके संबंध बहुत अच्छे होंगे?”


मैंने कहा, “अच्छे संबंध हैं।”


वे बोले, “मुख्यमंत्री आपकी बात मानते हैं?”


मैंने कहा, “हां, मान भी लेते हैं।”


मैं परेशान कि आखिर ये बातें क्यों करते हैं। क्या मकसद है?


आखिर वे खुले।


कहने लगे, “मुख्यमंत्री आपकी बात मानते हैं। लड़के का तबादला अभी कांकरे हो गया है। जरा मुख्यमंत्री से कहकर उसका तबादला यहीं करवा दीजिए।”


पिटे तो तबादला करवाने, नियुक्ति कराने की ताकत आ गयी- ऐसा लोग मानने लगे हैं। मानें। मानने से कौन किसे रोक सकता है। यह क्या कम साहित्य की उपलब्धि है कि पिटकर लेखक तबादला कराने लायक हो जाये। सन् 1973 की यह सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है। पर अकादमी माने तो।


शर्म की बात पर ताली पीटना – Sharm ki Baat par Taali Peetna | Harishankar Parsai

 मैं आजकल बड़ी मुसीबत में हूं।


मुझे भाषण के लिए अक्सर बुलाया जाता है। विषय यही होते हैं- देश का भविष्य, छात्र समस्या, युवा-असंतोष, भारतीय संस्कृति भी(हालांकि निमंत्रण की चिट्ठी में ‘संस्कृति’ अक्सर गलत लिखा होता है), पर मैं जानता हूं जिस देश में हिंदी-हिंसा आंदोलन भी जोरदार होता है, वहां मैं ‘संस्कृति’ की सही शब्द रचना अगर देखूं तो बेवकूफ के साथ ही ‘राष्ट्र-द्रोही’ भी कहलाऊंगा। इसलिए जहां तक बनता है, मैं भाषण ही दे आता हूं।


मजे की बात यह है कि मुझे धार्मिक समारोहों में भी बुला लिया जाता है। सनातनी, वेदान्ती, बौद्ध, जैन सभी बुला लेते हैं; क्योंकि इन्हें न धर्म से मतलब है, न संत से, न उसके उपदेश से। ये धर्मोपदेश को भी समझना नहीं चाहते। पर ये साल में एक-दो बार सफल समारोह करना चाहते हैं। और जानते हैं कि मुझे बुलाकर भाषण करा देने से समारोह सफल होगा, जनता खुश होगी और उनका जलसा कामयाब हो जाएगा।


मैं उनसे कह देता हूं- जितना लाइट और लाउडस्पीकरवालों को दोगे, कम से कम उतना मुझ गरीब शास्ता को दे देना- तो वे दे भी देते हैं। मुझे अगर लगे कि इनका इरादा कुछ गड़बड़ है तो मैं शास्ता विक्रयकर अधिकारी या थानेदार की भी सहायता ले लेता हूं। ये लोग पता नहीं क्यूं मेरे प्रति आत्मीयता का अनुभव करते हैं। इनके कारण सारा काम ‘धार्मिक’ और ‘पवित्र’ वातावरण में हो जाता है।


पर मेरी एक नयी मुसीबत पैदा हो गयी है। जब मैं ऐसी बात करता हूं जिस पर शर्म आनी चाहिए, तब उस पर लोग हंसकर ताली पीटने लगते हैं।


मैं एक संत की जयंती के समारोह में अध्यक्ष था। मैं जानता था कि बुलाने वाले लोग मुझसे भीतर से बहुत नाराज रहते हैं। यह भी जानता हूं कि ये मुझे गंदी-गंदी गालियां देते हैं, क्योंकि राजनीति और समाज के मामले में मैं मुंहफट हो जाता हूं। तब सुनने वालों का दीन क्रोध बड़ा मजा देता है। पर उस शाम मेरे गले में वही लोग मालाएं डाल रहे थे- यह अच्छी और उदात्त बात भी हो सकती है। पर मैं जानता था कि ये मेरे व्यंग्य, हास्य और कटु उक्तियों का उपयोग करके उन तीन-चार हजार श्रोताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं- याने आयोजन सफल करना चाहते हैं- याने बेवकूफ बनाना चाहते हैं।


जयन्ती एक क्रांतिकारी संत की थी। ऐसे संत की जिसने कहा- खुद सोचो। सत्य के अनेक कोंण होते हैं। हर बात में ‘शायद’ का ध्यान जरूर रखना चाहिए। महावीर और बुद्ध ऐसे संत हुए, जिन्होने कहा- सोचो। शंका करो। प्रश्न करो। तब सत्य को पहचानो। जरूरी नहीं कि वही शाश्वत सत्य है, जो कभी किसी ने लिख दिया था।


ये संत वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे। और जब तक इन संतों के विचारों का प्रभाव रहा तब तक विज्ञान की उन्नति भारत में हुई। भौतिक और रासायनिक विज्ञान की शोध हुई। चिकित्सा विज्ञान की शोध हुई। नागार्जुन हुए, बाणभट्ट हुए। इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी में भारत के बड़े से बड़े दिमाग ने यही काम किया कि सोचते रहे- ईश्वर एक हैं या दो हैं, या अनेक हैं। हैं तो सूक्ष्म हैं या स्थूल। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। इसके साथ ही केवल काव्य रचना।


विज्ञान नदारद। गल्ला कम तौलेंगे, मगर द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, मुक्ति और पुनर्जन्म के बारे में बड़े परेशान रहेंगे। कपड़ा कम नापेंगे, दाम ज्यादा लेंगे, पर पंच आभूषण के बारे में बड़े जाग्रत रहेंगे।


झूठे आध्यात्म ने इस देश को दुनिया में तारीफ दिलवायी, पर मनुष्य को मारा और हर डाला, उस धार्मिक संत-समारोह में मैं अध्यक्ष के आसन पर था। बायें तरफ दो दिगंबर मुनि बैठे थे। दाहिने तरफ दो श्वेतांबर। चार मुनियों से घिरा यह दीन लेखक बैठा था। पर सही बात यह है कि ‘होल टाइम’ मुनि या तपस्वी बड़ा दयनीय प्रणी होता है। वह सार्थकता का अनुभव नहीं करता, कर्म नहीं खोज पाता। श्रद्धा जरूर लेता है- मगर ज्यादा कर्महीन श्रद्धा ज्ञानी को बहुत ‘बोर’ करती है।


दिगंबर मुनि और श्वेतांबर मुनि आपस में कैसे देख रहे थे, यह मैं जांच रहा था। लेखक की दो नहीं सौ आंखें होती हैं। दिगंबर अपने को सर्वहारा का मुनि मानता है और श्वेतांबर मुनि को संपन्न समाज का। यह मैं समझ गया- उनके तेवर से।


मैंने आरंभ में कहा भी- “सभ्यता के विकास का क्रम होता है। जब हेण्डलूम, पावरलूम, कपड़ा मिल नहीं थी तब विश्व के हर समाज का ऋषि और शास्ता कम से कम कपड़े पहनता था; क्योंकि जो भी अच्छे कपड़े बन पाते थे, उन्हें सामंत वर्ग पहनता था। तब लंगोटी लगाना या नंगा रहना दुनिया भर में संत का आचार होता था।”


“पर अब हम फाइन से फाइन कपड़ा बनाते और बेचते हैं, पर अपने मुनियों को नंगा रखते हैं। यह भी क्या पाप नहीं है?”


मुनि मेरी बात सुनकर गंभीर हो गए और सोचने लगे, पर समारोह वाले हंसने और ताली पीटने लगे। और मैंने देखा एक मुनि उनके इस ओछे व्यवहार से खिन्न हैं। मैंने सोचा कि मुनि से कहूं कि हम दोनों मिलकर सिर पीट लें। शर्म की बात पर जिस समाज के लोगों को हंसी आये- इस बात पर मुनि और ‘साधु’ दोनों रो लें।


पर इसके बाद जब मुनि बोले तो उन्होंने घोर हिंसा की शैली में अहिंसा समझायी। कुछ शब्द मुझे अभी भी याद हैं, “पाखण्डियों, क्या संत को सर्टिफिकेट देने का समारोह करते हो? तुम्हारे सर्टिफिकेट से संत को कोई परमिट या नौकरी मिल जाएगी? पाप की कमाई खाते हो। झूठ बोलते हो। सत्य की बात करते हो। बेईमानी से परिग्रह करते हो। बताओ ये चार-पांच मंजिलों की इमारतें क्या सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह से बनी हैं?”


मैं दंग रह गया। मुनि का चेहरा लाल था क्रोध से। वे किसी सच्चे क्रांतिकारी की तरह बोल रहे थे; क्योंकि उन्होंने शरीर ढांकने को कपड़ा लेने का किसी से अहसान नहीं लेना था।


सभा में सन्नाटा।


लगातार सन्नाटा।


और मुनि पूसे क्रोध के साथ सारी बनावट और फरेब को नंगा कर रहे थे।


अंत में मुझे अध्यक्षीय भषण देना लाजिमी था। मैं देख रहा था कि तीस-चालीस साल के गुट में युवक लोग पांच-छ: ठिकानों पर बैठे इंतजार कर रहे थे कि मैं क्या कहता हूं।


मैंने बहुत छोटा धन्यवाद जैसा भाषण दिया। मुनियों और विद्वानों का आभार माना और अंत में कहा- “एक बात मैं आपके सामने स्वीकार करना चाहता हूं। मैंने और आपने तीन घंटे ऊंचे आदर्शों की, सदाचरण की, प्रेम की, दया की बातें सुनीं। पर मैं आपके सामने साफ कहता हूं कि तीन घंटे पहले जितना कमीना और बेईमान मैं था, उतना ही अब भी हूं। मेरी मैंने कह दी। आप लोगों की आप लोग जानें।”


इस पर भी क्या हुआ- हंसी खूब हुई और तालियां पिटीं।


उन्हें मजा आ गया।


एक और बड़े लोगों के क्लब में मैं भाषण दे रहा था। मैं देश की गिरती हालत, महंगाई, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार पर बोल रहा था और खूब बोल रहा था।


मैं पूरी पीड़ा से, गहरे आक्रोश से बोल रहा था। पर जब मैं ज्यादा मार्मिक हो जाता, वे लोग तालियां पीटते थे। मैंने कहा- हम लोग बहुत पतित हैं। तो वे ताली पीटने लगे।


उन्हे मजा आ रहा था और शाम एक अच्छे भाषण से सफल हो रही थी।


और मैं इन समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं, तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसें और ताली पीटें, उसमें क्या कभी कोई क्रांतिकारी हो सकता है?


होगा शायद। पर तभी होगा, जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबड़े टूटेंगे।


उखड़े खंभे – Ukhde Khambhe | Harishankar Parsai

 कुछ साथियों के हवाले से पता चला कि कुछ साइटें बैन हो गयी हैं। पता नहीं यह कितना सच है लेकिन लोगों ने सरकार को कोसना शुरू कर दिया। अरे भाई,सरकार तो जो देश हित में ठीक लगेगा वही करेगी न! पता नहीं मेरी इस बात से आप कितना सहमत हैं लेकिन यह है सही बात कि सरकार हमेशा देश हित के लिये सोचती है। मैं शायद ठीक से अपनी बात न समझा सकूँ लेकिन मेरे पसंदीदा लेखक ,व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने इसे अपने एक लेख उखड़े खम्भे में बखूबी बताया है।


यहां जानकारी के लिये बता दिया जाये कि भारत के प्रथम प्रधान मंत्री स्व.जवाहरलाल नेहरू ने एक बार घोषणा की थी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों पर लटका दिया जायेगा।]


एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जायेगा।


सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की,आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।


शाम तक वे इंतजार करते रहे कि अब मुनाफाखोर टांगे जायेंगे- और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।


लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,”महाराज,आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जायेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।”


राजा ने कहा,”कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जायेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही,सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।


भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,”पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।”


राजा ने कहा,”तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जायेगा।”


तभी दूसरा बोल उठा,”पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।”


राजा ने जवाब दिया,”नहीं,ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।”


लोगों ने पूछा,” तो कितने दिन बाद वे लटकाये जायेंगे।”


राजा ने कहा,”आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।”


लोग दिन गिनने लगे।


सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया,फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!


उन्हें खम्भे के पास एक मजदूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मजदूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।


उन्होंने शिकायत की ,”महाराज, आप मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे ,पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मजदूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।”


राजा ने मजदूर से पूछा,”क्यों रे,किसके हुक्म से तुम लोगोंने खम्भे उखाड़े?”


उसने कहा,”सरकार ,ओवरसियर साहब ने हुक्म दिया था।”


तब ओवरसियर बुलाया गया।


उससे राजा ने कहा,” क्यों जी तुम्हें मालूम है ,मैंने आज मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?”


उसने कहा,”जी सरकार!”


“फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?”


“सरकार,इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जायें।”


अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।


बिजली इंजीनियर से कैफियत तलब की गयी,तो उसने हाथ जोड़कर कहा,”सेक्रेटरी साहब का हुक्म मिला था।”


विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा,खम्भे उखाड़ने का हुक्म तुमने दिया था।”


सेक्रेटरी ने स्वीकार किया,”जी सरकार!”


राजा ने कहा,” यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ,तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।”


सेक्रेटरी ने कहा,”साहब ,पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!”


राजा ने पूछा,”यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?


सेक्रेटरी ने कहा,”मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।”


राजा ने पूछा,”कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?”


सेक्रेटरी ने कहा,”बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार।घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।”


विशेषज्ञ ने निवेदन किया,” सरकार ,मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है ,पर मैं जानता हूँ कि इस वक्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे जमीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पावरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता ,न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।


लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफाखोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे ,जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।


उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं:-


सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये


श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख


श्रीमती इंजीनियर -१ लाख


श्रीमती विशेषज्ञ - २५ हजार


श्रीमती ओवरसियर-५ हजार


उसी सप्ताह ‘मुनाफाखोर संघ’ के हिसाब में नीचे लिखी रकमें ‘धर्मादा’ खाते में डाली गयीं-


कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये


विधवाश्रम को- १ लाख


क्षय रोग अस्पताल को- १ लाख


पागलखाने को-२५ हजार


अनाथालय को- ५ हजार


ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड – Greeting Card aur Ration Card | Harishankar Parsai

 मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं- इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड. ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और समृद्धि प्राप्त करूँ. अभी अपने शुभचिन्तक बने हुए हैं जो सुख दिए बिना चैन नहीं लेंगे. दिवाली पर कम से कम उन्हें याद तो आती है कि इस आदमी का सुखी होना अभी बकाया है. वे कार्ड भेज देते हैं कि हम तो सुखी हैं ही, अगर तुम भी हो जाओ, तो हमें फिलहाल कोई एतराज़ नहीं.


मेरा राशन कार्ड मेरे सुख की कामना कर रहा है. मगर राशन कार्ड बताता है कि इस हफ़्ते से गेहूँ की मात्रा आधी हो गयी है. राशन कार्ड मे ग्रीटिंग कार्ड को काट दिया. ऐसा तमाचा मारा कि खूबसूरत ग्रीटिंग कार्डजी के कोमल कपोल रक्तिम हो गए.शुरु से ही राशन कार्ड इस ग्रीटिंग कार्ड की ओर गुर्राकर देख रहा था. जैसे ही मैं ग्रीटिंग कार्ड पढ़कर खुश हुआ, राशन कार्ड ने उसकी गर्दन दबाकर कहा- क्यों बे साले, ग्रीटिंग कार्ड के बच्चे, तू इस आदमी को सुखी करना चाहता है? जा, इसका गेहूँ आधा कर दिया गया. बाकी काला-बाज़ार से खरीदे या भूखा रहे.


बेचारा ग्रीटिंग कार्ड दीनता से मेरी ओर देख रहा है. मैं क्या करूँ? झूठों की रक्षा का ठेका मुझे थोड़े ही मिला है. जिन्हें मिला है उनके सामने हाथ जोड़ो. मेरे राशन कार्ड को तेरी झूठ बर्दाश्त नहीं हुई. इन हालात में सुख का झूठी आशा लेकर तू क्यों आया? ग्रीटिंग कार्ड राष्ट्रसंघ के शान्ति प्रस्तावों की तरह सुन्दर पर प्रभावहीन है. राशन कार्ड खुरदरा और बदसूरत है, पर इसमें अनाज है. मेरे लिए यही सत्य है. और इस रंगीन चिकनाहट में सत्यहीन औपचारिक शुभेच्छा है. ग्रीटिंग कार्ड सत्य होता अगर इसके साथ एक राशन कार्ड भी भेजा गया होता और लिखा होता- हम चाहते हैं कि तुम सुख प्राप्त करो. इस हेतु हम एक मरे हुए आदमी के नाम से जाली राशन कार्ड बनवाकर भेज रहे हैं. जब तक धाँधली चले सस्ता अनाज लेते जाना और सुखी रहना. पकड़े जाने पर हमारा नाम मत बताना. संकट के वक्त शुभचिंतक का नाम भूल जाना चाहिए.


मित्रों से तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये कार्ड ने भेजें. शुभकामना इस देश में कारगर नहीं हो रही हैं. यहाँ गोरक्षा का जुलूस सात लाख का होता है और मनुष्य रक्षा का सिर्फ एक लाख का. दुनिया भर में शुभकामना बोझ हो गयी है. पोप की शुभकामना से एक बम कम नहीं गिरता. मित्रों की ही इच्छा से कोई सफल, सुखी और समृद्ध कैसे हो जाएगा? सफलता के महल का प्रवेश द्वार बंद है. इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है. जिन्हें घुसना है नाक पर रुमाल रखकर घुस जाते हैं. पास ही इत्र सने रुमालों के ठेले खड़े हैं. रुमाल खरीदो, नाक पर रखो और नाबदान में से घुस जाओ सफलता और सुख के महल में. एक आदमी खड़ा देख रहा है. कोई पूछता है- घुसते क्यों नहीं? वह कहता है- एक नाक होती तो घुस जाते. हमारा तो हर रोम एक नाक है. कहाँ-कहाँ रुमाल लपेटें.


एक डर भी है. सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त भी हो जाए, तो पता नहीं कितने लोग बुरा मान जाएँ. संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं. मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है. जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है. संकट में तपी हुई मित्रता उत्कर्ष में खोटी निकलती मैंने देखी है. एक बेचारे की चार कविताएँ छप गईं, तो चार मित्र टूट गए. आठ छपने पर पूरे आठ टूट गये. दो कवि सम्मेलनों में जमने से एक स्थानीय कवि के कवि-मित्र रूठ गए. तीसरे कवि सम्मेलन में जब वह ‘हूट’ हुआ, तब जाकर मित्रता अपनी जगह लौटी.


ग्रीटिंग कार्डों पर अपना भरोसा नहीं. 20 सालों से इस देश को ग्रीटिंग कार्डों के सहारे चलाया गया है. अम्बार लग गए हैं. हर त्योहार पर देशवासियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए जाते हैं- 15 अगस्त और 26 जनवरी पर, संसद के अधिवेशन पर, पार्टी के सम्मेलन पर. बढ़िया सुनहले रंगों के मीठे शब्दों के ग्रीटिंग्स- देशवासियों, बस इस साल तुम सुखी और समृद्ध हो जाओ. ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है.


बारात की वापसी – Baraat ki Wapsi | Harishankar Parsai

 बारात में जाना कई कारण से टालता हूँ । मंगल कार्यों में हम जैसी चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है। महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिये। किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गये थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका यह शोध है कि महाभारत का युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्णमेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता।


सारे युद्ध प्रौढ़ कुंवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं। 1948 में तेलंगाना में किसानों का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुंवारे विनोवस भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था। उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ।


..........


अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायराम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था। कहने लगे, " बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है। " हम लोगों ने कहा - ' अब किशोरों जैसी बारात तो होगी नही। अब तो ऐसी बारात ऐसी होगी- किसी को भगा कर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुम जमानत देने वाले। ऐसी बारात होगी। चाहो तो बैण्ड भी बजवा सकते हो।"


.........


विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है। विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है। लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मे जा रही है। पाव ताकत छिपाने मे जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, - तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।


यह बात मैंने उस दिन एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के वार्षिकोत्सव में कही थी। कहा था, “तुम लोग क्रांतिकारी तरुण-तरुणियां बनते हो। तुम इस देश की आधी ताकत को बचा सकते हो। ऐसा करो जितनी लड़कियां विश्वविद्यालय में हैं, उनसे विवाह कर डालो। अपने बाप को मत बताना। वह दहेज मांगने लगेगा। इसके बाद जितने लड़के बचें, वे एक-दूसरे की बहन से शादी कर लें। ऐसा बुनियादी क्रांतिकारी काम कर डालो और फिर जिस सिगड़ी को जमीन पर रखकर तुम्हारी मां रोटी बनाती है, उसे टेबिल पर रख दो, जिससे तुम्हारी पत्नी सीधी खड़ी होकर रोटी बना सके। बीस-बाईस सालों में सिगड़ी ऊपर नहीं रखी जा सकी और न झाडू में चार फुट का डंडा बांधा जा सका। अब तक तुम लोगों ने क्या खाक क्रांति की है।”


छात्र थोड़े चौंके। कुछ ही-ही करते भी पाये गये। मगर कुछ नहीं।


एक तरुण के साथ सालों मेहनत करके मैंने उसके खयालात संवारे थे। वह शादी के मंडप में बैठा तो ससुर से बच्चे की तरह मचलकर बोला, “बाबूजी, हम तो वेस्पा लेंगे, वेस्पा के बिना कौर नहीं उठायेंगे।” लड़की के बाप का चेहरा फक। जी हुआ, जूता उतारकर पांच इस लड़के को मारूं और पच्चीस खुद अपने को। समस्या यों सुलझी कि लड़की के बाप ने साल भर में वेस्पा देने का वादा किया, नेग के लिए बाजार से वेस्पा का खिलौना मंगाकर थाली में रखा, फिर सबा रुपया रखा और दामाद को भेंट किया। सबा रुपया तो मरते वक्त गोदान के निमित्त दिया जाता है न। हां, मेरे उस तरुण दोस्त की प्रगतिशीलता का गोदान हो रहा था।


बारात यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ , खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार बोझ हो जाता है । अगर जी भर दहेज न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है। मैं सावधानी बरतता हूँ कि बारात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ।


एक बारात की वापसी मुझे याद है।


हम पांच मित्रों ने तय किया कि शाम ४ बजे की बस से वापस चलें। पन्ना से इसी कम्पनी की बस सतना के लिये घण्टे-भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुंच जायेंगे। हममें से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था, इसलिये वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं बस डाकिन है।


बस को देखा तो श्रद्धा उभर पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदीयों के अनुभव के निशान लिये हुए थी। लोग इसलिए सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!


बस-कम्पनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमनें उनसे पूछा-यह बस चलती है? वह बोले-चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमनें कहा-वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने-आप चलती है यह? उन्होंने कहा-हां जी और कैसे चलेगी?


गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने-आप चलती है!


हम आगा-पीछा करने लगे। पर डाक्टर मित्र ने कहा-डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विशवनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी। हम बैठ गये। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे, जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आखें कह रही थी - आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है सो जायेगा - राजा, रंक, फ़कीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।


इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा लगा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। कांच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गये। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था हमारी सीट के नीचे इंजन है।


बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दुसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता, सीट बॉडी को छोड़ कर आगे निकल गयी। कभी लगता कि सीट को छोड़ कर बॉडी आगे भागे जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेद-भाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हमपर बैठी है।


एकाएक बस रूक गयी। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस कम्पनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएंगे, जैसे मां बच्चे के मुंह में दूध की शीशी लगाती है।


बस की रफ्तार अब पन्द्रह-बीस मील हो गयी थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरींग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ हरे-हरे पेड़ थे, जिन पर पंछी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इन्तज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।


एकाएक फिर बस रूकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं, पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। कम्पनी के हिस्सेदार कह रहे थे - बस तो फर्स्ट क्लास है जी! ये तो इत्तफाक की बात है। क्षीण चांदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो। हमें ग्लानी हो रही थी कि इस बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अन्त्येष्टी करनी पड़ेगी।


हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गयी थी।


धीरे-धीरे वृद्धा की आखों की ज्योति जाने लगी। चांदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती - निकल जाओ बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।


एक पुलिया के उपर पहुंचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। बस बहुत ज़ोर से हिलकर थम गयी। अगर स्पीड में होती तो उछल कर नाले में गिर जाती। मैंने उस कम्पनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा भाव से देखा। वह टायरों क हाल जानते हैं, फिर भी जान हथेली पर ले कर इसी बस से सफर करते हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान-भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते, तो देवता बांहें पसारे उसका इन्तज़ार करते। कहते - वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।


दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी - पन्ना, क्या, कहीं भी, कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िन्दगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक की ओर प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गये। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गये। चिन्ता जाती रही। हंसी मज़ाक चालू हो गया।


ठण्ड बढ़ रही थी । खिड़कियाँ खुली ही थीं। डाक्टर ने कहा - ' गलती हो गयी। 'कुछ' पीने को ले आता तो ठीक रहता । ' एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फौरन उतरा । ड्राइवर से बोला - 'जरा रोकना ! नारियल ले आऊँ । आगे मढ़िया पर फोड़ना है । डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया । छागलों मे भर कर हम लोगों ने पीना शुरु किया ।


इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। पन्ना से पहले ही सारे मुसाफिर उतर चुके थे । बस कम्पनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गये। बस शहर मे अपने ठिकाने पर रुकी। कम्पनी के दो मालिक रजाइयों मे दुबके बैठे थे। रात का एक बजा था। हम पाँचों उतरे। मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा। डाक्टर भी मेरे पास खड़ा हो कर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा। बाकि तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे। उनकी गर्म डाँट हम सुन रहे थे। पर वे निराश लौटे। बस-मालिकों ने कह दिया था, सतना की बस तो चार- पाँच घण्टे पहले जा चुकी थी। अब लौटती होगी। अब तो बस सवेरे ही मिलेगी।


आसपास देखा, सारी दुकानें, होटल बन्द। ठण्ड कड़ाके की। भूख भी खूब लग रही थी। तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया। पाँचेक मिनट मे उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था। बड़े अदब से मुझसे कहने लगा," सर, नाराज़ मत होइए। सरदार जी कुछ इंतजाम करेंगे। सर,सर उन्हें अफ़सोस है कि आपको तक़लीफ़ हुई। "


अभी डाक्टर बेतकुल्लफी से बात कर रहा था और अब मुझे 'सर' कह रहा है। बात क्या है? कही ठर्रा ज्यादा असर तो नहीं कर गया। मैने कहा, "यह तुमने क्या 'सर-सर' लगा रखी है ? "


उसने वैसे ही झुक कर कहा, " सर, नाराज़ मत होइए ! सर, कुछ इंतजाम हुआ जाता है। "


मुझे तब भी कुछ समझ में नही आया। डाक्टर भी परेशान था कि मैं कुछ समझ क्यों नही रहा हूँ। वह मुझे अलग ले गया और समझाया, " मैने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद सदस्य हो। इधर जांच करने आए हो।मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम. पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है। मैने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी। वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतजाम कर देगा। ज़रा थोड़ा एम. पी. पन तो दिखाओ। उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो। "


मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गयी है। यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कोई रुप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे -बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है।


मैने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा तो ठीक संसद सदस्य की तरह। आते ही सरदारजी से रोब से पूछा, " सरदारजी, आर. टी. ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है? "


सरदारजी घबरा उठे। डाक्टर खुश कि मैने फर्स्ट क्लास रोल किया है।


रोबदार संसद सदस्य का एक वाक्य काफ़ी है, यह सोंचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा। सरदारजी ने वहीं मेरे लिये कुर्सी डलवा दी। वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था। मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा। याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा। गाँधीवादी होने के नाते, वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे।


मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। झूठ यदि जम जाये तो सत्य से ज्यादा अभय देता है। मैं वहीं बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला, " बाबू , यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो जरा कलेक्टर को इत्तिला कर दो। वह ग़ाड़ी का इंतजाम कर देंगे। "


डाक्टर वहीं से बोला, " सर, बस एक मिनट! जस्ट ए मिनट सर !" थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नयी बस निकलवायी। मुझे सादर बैठाया गया। साथियों को बैठाया। बस चल पड़ी।


मुझे एम. पी. पन काफी भाड़ी पड़ रहा था। मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था। डाक्टर बार बार 'सर' कहता था और बस का मालिक 'हुज़ूर'।


सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने मे पहुँचे तब डाक्टर ने कहा, " अब तीन घण्टे लगातार तुम मुझे 'सर' कहो। मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है।"


Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *