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प्रेमजी प्रेम री कवितावां : Premji Prem Kavita (Rajasthani)

प्रेमजी ‘प्रेम’ हाड़ौती अंचल के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। उनका जन्म 1943 में कोटा जिले के घघटाना गाँव में हुआ था और 1993 में उनका निधन हुआ। उन्होंने हाड़ौती बोली में कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी और अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में हाड़ौती अंचल के लोकजीवन, प्रकृति, संस्कृति और आम लोगों की संवेदनाओं की झलक मिलती है। उनकी चर्चित कृति ‘म्हारी कवितावां’ के लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।

Premji Prem
Premji Prem 

 

अछूत

कठी चाल्या पटैल जी?
जीमबा!
दूरो हट्
भट जे मत..!
खम्मा, घणो खम्मा पटैल जी!
हटूं छूं,
पण जीं बांस की छाबड़ी मैं
परोसगारी होवगी,
वां भी तो म्हारा अछूत हाथां सूं ई
बणी छै।

आंकड़ा का फूल

नीमड़ी नमोळ्यां लागीं, आंकड़ा कै फूल।
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
चन्दरमा की जान मैं तारां की गाड्यां चाली रै,
छोटी-छोटी बादळ्यां बण-बण अर लाड्यां चाली रै,
ऊपर सूं आकासगंगा रही गगन मैं झूल।
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
कतनी बार बादळा समदर जळ भर, सरवर पै आया?
कतनी बार बादळ्यां नैं अम्बर सूं आंसू ढुळकाया?
कितनी बार तांवड़ा सूं परणी आंगण की धूळ?
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
साथणियां की लेर बारणै बैठ पचेटा म्हूं खेलूं,
मार खाकटो, सावली माथा पै सूं कांधा पै ल्यूं,
शरमा जाऊं, छोरा म्हारी हंसै देख जद भूल।
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥

बाट न्हाळतां

आया क्यूं न हाल तांई,
म्हारा मन का मीत री?
मारती फालकड़ी खदी,
आंगणां मैं बैठती।
खदी फाटी बोरी लेती,
पोळ मैं जा लेटती।
अठी उंठी सूं आती-जाती,
लेर अपासी उठती
झनन-झनन जाती
बारणां मैं देकती।
कांई होग्यो हरणी चढ़गी,
कचर्यो आयो माथा पै।
पीपळी पै हाळी हाळण
चांदो आग्यो माथा पै।
बैलां की न्हं टोकर्‌यां
न्हं बालमजी का गीत री।
आया क्यूं न हाल तांईं
म्हारा मन का मीत री॥
झींगर की झणकार
श्यां सट्ट मैं गरणावै छै
गंदकड़ा को बोलबो
घणो ई सरमावै छै
पूरब आडी कुत्तो बोल्यो
कोई-कोई आवै छै
बाड़ा बांधी गाय रांभी
हीरा मोती आवै छै।
कुत्तो बोल्यां घड़ी बीतगी
छागी श्यां सट्ट हो
पोळ मैं सूं भीतर चाली
कर्‌या बारणा पट्ट हो
मन ही मन मैं धीरां
गुणगुणावै यो ई गीत री।
आया क्यूं न हाल तांई
म्हारा मन का मीत री॥
चाल हीरा चाल मोती
गांव आडी चाल रै
चन्दरमा धरती सूं मलग्यो
सूनी सरवर पाळ रै
जोत खोल्या जूड़ो खोल्यो
पटकी कांधै हाळ रै
न्हाळती वा बाट होसी
बेगो-बेगो चाल रै।
बेगो-भाग्यो-दौड़्यो-भाग्यो
अर उतावळो चाल्यो छै
गलगलियां छूटी हिवड़ा मैं
तन उमंग में हाल्यो छै
खेत का खलाणा का
यो गातो चाल्यो गीत री।
चाल्यो घर की आडी चाल्यो
हाळी, मन को मीत री॥
खोल म्हारी रूपाळी
दरवाजो बेगो खोल री,
सुणतां ई हिवड़ो हरख्यो
तन-मन गयो डोल री।
भागी-भागी चाली-बेगी
दौड़ी पूगी पोळ री
शरमातां-शरमातां ऊं नैं
दियो बारणो खोल री।
ववांड़ अठी खोल्या पण
ऊंठी कूकड़ो ई बोलग्यो
मन का मीठा लाडूड़ां मैं
जहर बैरी घोळग्यो।
बीतगी या रात, छोडो
रात की रंगरीत री।
आया पण मोड़ा ई आया
म्हारा मन का मीत री॥

बच्यारौ म्हूं

रामजी की चिड़िया
रामजी कौ खेत
फेर म्हूं कुण?
म्हारौ कांई?
कांई म्हूं अर कांईं म्हारी ज्यात?
पेट भर्‌यां पाछै भी
चांच भर’र उड ज्या छै
चड़कल्यां
चड़कल्यांन का पळ र्‌या छै
पूरा का पूरा खांनदांन
अर म्हूं
बणर्‌यो छूं गंगाराम
रामजी की चड़कल्यां
आवै छै, खावै छै
रामजी कौ खेत।
म्हूं बादळ्यां को मनवार करूं छूं
म्हूं खरार-खरूर करूं छूं
म्हूं ई पटकूं छूं खाद-बीज
पण रामजी का राज में
म्हारा गोफ्या कै आगै
ऊभी होज्या छै
बाप-दादां की बात
रामजी की चिड़िया
रामजी कौ खेत
खावौ री चड़कल्यां
भर-भर पेट।

बाळपणा का ख्याल

कोई पाछा कर दे,
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
द्याड़ी का चूंतरा की लीमड़ी का हींदळा,
चक-चक मूंग्या चीला पोता बांदरवाळां बीजणा।
कांवळी की छांवळी को लेरां-लेरां भागबो,
संझ्या ढळतां सोबो, पहरां का तड़का को जागबो।
दादा की दलकारी अर भावज की मीठी गाळ।
माथै आतो पणघट पगल्यां पींदै दबतो माळ।
कोई पाछा कर दे,
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
आमल्यां की झामल्यां का काचा-पाका खोर्‌या
झक्कर सूं पाक्या डगळ्या जो झोळ्यां भर-भर सोर्‌या
मोतीदह मैं सांपड़वा सूं भैंचक को डर लागबो,
डाफा लेती गुल्ली कै पाछै राड़ी मैं भागबो।
चांदणी की भरी तळाई डूंगर बांधी पाळ,
माथा पै ऊंदो लटक्यो तारां सूं भरियो थाळ।
कोई पाछा कर दे,
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
आंगणां मैं रेवड़्यां सूं आंबा ला’र उगावणो,
चींट्यां नै चुग्गो, चिड़कल नैं घूघर जा’र चुगावणो।
मावस की रातां मैं दखणी लीमड़ा की पाती,
पून्यू मैं भाभू रोताणी सोळा सांवत गाती।
झूठा भैरूंजी भड़काता रतन्या-छगन्या ग्वाळ।
पंछीड़ा गाता बूंळ्या, संकर्‌या टेरती जाळ।
कोई पाछा करदे
म्हारा बाळपणा का ख्याल।

बसंत कै दिन

तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥
सरस्यूं की कळियां केसरिया
गारा की डळियां केसरिया
सूरज उगतो सो केसरिया
पंछी चुगतो सो केसरिया
थांकी साड़ी भी केसरिया म्हारी।
बणज्यारा की लेरां केसरिया बणज्यारी॥
केसरिया सोना को रथ
केसरिया छै पगडंडी
सांचो हरदो केसरिया
काळो हिवड़ो पाखंडी
केसरिया थारी बाणी
केसरिया म्हारी बोली
पूरब का बादळ नै भी
केसरिया आंख्यां खोली
केसरिया तन मत द्यो, केसरिया पिचकारी।
तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥
केसरिया फूल हजारा
केसरिया कळी कनेरी
केसरिया जळ की लहरां
केसरिया बाळू ढेरी
केसरिया म्हारी नथड़ी
केसरिया थांको मूंडो
केसरिया अस्ताचळ में
सूरज भी धंसतो ऊंडो
केसरिया मीठी लागै छै बातां थारी।
तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥

बोध

आप बोल्या-
''कविता मांडो!''
म्हूं नै कविता कर दी।
आप बोल्या-
''ब्होत बढ़िया कविता छै!''
म्हारा होटां पै
मरी-मरी हांसी आगी।
म्हूं अपणी कविता पै
न्हं हरक्यो,
आप की बात पै हांस्यो।
ऑर्डर मलतां ईं
सप्लाई कर्‌या
सीमेंट जसी
म्हारी कविता
अब म्हं नै सोबा न्हं दे।
बार-बार
सपनां में आवै छै,
बोलै छै!
जस्यां वां का क्हबा पै
थं नै म्हारी रचना करी
उस्यां ईं-
म्हारां क्हबा पै
वां को
मण्यो मसक दै।

चतराम

जणां-जणां की
मजाल कोई म्हं
जे बांच ले,
गा ले।
संस्कार अर सीख
जीं नै मल्या होवै
वै ई पढ सकै छै
म्हारा बोल,
गा सकै छै म्हारा आखर
इबारत बांचबा सूं प्हली
संस्कार सूं जुड़ो।
फड़ पै मंड्यौ
एक चतराम छूं म्है।

ढूमलो

म्हारा आगला बड़ां मैं
अर म्हूं मैं
अतनो सोक फरक छै
ज्यां कागदां पै वां नै
दिमाग का खून सूं
कविता रची छी,
वां कागदां को
ढूमलो बण’र
म्हैं
परचूनी सामान सूं भर्‌यो छूं।

गीतां को गेलो

भरी भरमन्या को भरमायो।
म्हूं गीतां कै गेलै आयो॥
सारी धरती म्हारी बाड़ी
सारा तारा म्हारा माळी।
चन्दरमा आदोळ्यो, सूरज
लाग्यो छै बाड़ी सूं हाळी।
दन दन को रूखाळ तांवड़ो
रात चांदणी करै रुखाळी।
बादळ पाणत करै, बीजळी
क्यार्‌यां खोदै ले’र कुदाळी।
म्हूं गीतां को धन नपजाऊं
करूं लावणी, लाण लदाऊं
खुसियां सूं हांसू म्हूं,
गीतां सूं मल मल मळक्यो, मुसकायो॥
म्हारा मनड़ा की पीड़ा
कै म्हूं जाणूं कै आंखर जाणै।
भूली भटकी बातां काणै
कद आ बैठै ठाम ठकाणै।
अमगी अमगी फरै भावना
कुण बातां को भाव पछाणै
अटक्या अटक्या आंखर बैठै
ऊं ठाणै कद, कद ईं ठाणै।
म्हूं सपना छन्दां में तोलूं
म्हूं दोहां कै मूंडै बोलूं
मन में पाळूं बाणी में ढाळूं

हडूडो

रात-दन
भोगूं छूं
एक हडूडो
सोच-बच्यार को!
बच्यार आवै छै
कुस्तमपछाड़ा होवै छै
सूगली सीक हांसी हांस’र
चली ज्या छै
ठोस निरणै खडै
तो कविता मांडूं।

जातरा

एकजद जद भी बूझ्यो
जातरा को गेलोलोगां नै नाळो-नाळो बतायो।
म्हूं बना बतायां ईंईं मुकाम तांईचल्यो आयो।
दोभावना नै अरथाबो,अरथ नै आखर देबो
आखर-आखर की माळा पोबोफेर चड़ी चुप्पी
भीतर ई भीतर चालवो।या कशी जातरा छै?
तू सोचै छैकै म्है चाल र्‌यो छूंजमाना भर सूंआगै 
भाग र्‌यो छूं।चंदरमा कतनो ई भागैधरती सूं 
ऊं को गरजोड़ोन्हं टूट सकैया कशी जातरा छै?

झूंठो बणज

मत कर झूंठो बणज फकीर!
थारा करमां मैं कोई न्हं
बाण्यां बट्टा की लकीर॥
बळदां का करमां मैं जूड़ो
बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां मैं बिसकुट
मोटी मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां मैं बिजळी
करमां नाच लखायो मोर।
बांदर बणग्यो साहूकार
बल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलो धर्‌यां बरफ को रूप
पाप कमावै सरवर तीर॥
राजा की रेखां मैं राज
चोरां की रेखां मैं जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै
खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग
कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां मैं गंगा
समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया
कोई पावै पचरंग चीर॥
देणो चावै तो अन्नाता
सब नैं देदे छप्पर फाड़।
म्हांनैं का पाया दुतकारा
थां नैं पायो गहरो लाड़।
कागा चुग चुग खावै चाम
चुग चुग मोती खावै हंस।
थारो बेटो कान्ह कन्हैयो
म्हारो बेटो बणग्यो कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा
कोई जनम जीवतां पीर॥
मछळी का करमां पाताळ
चन्दरमा पायो आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी
हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां मैं पाणी
फागण का करमां मैं रंग।
चोकीदार करै नगराणी
रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो
लेवण तू पायो तकदीर॥

झूठौ बणज

मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
बळदां का करमां में जूड़ौ, बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां में बिसकुट, मोती मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां में बिजळी, कस्यां नाच लखायौ मोर।
बांदर बणग्यौ साहूकार, बिल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलौ धस्यां बरफ को रूप, पाप कमावै सरवर तीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
राजा की रेखा में राज, चोरां की रेखां में जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै, खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग, कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां में गंगा, समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया, कोई पावै पचरंग चीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
देणौ चावै तौ अन्नदाता, सब नै देवै छप्पर फाड़।
म्हांनै का पाया दुतकारा, थां नै पायौ गहरौ लाड़।
कागा चुग-चुग खावै चाम, चुग-चुग मोती खावै हंस।
थारौ बेटौ कान्ह-कन्हैयौ, म्हारौ बेटौ बणग्यौ कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा, कोई जनम जीवतां पीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
मछली का करमां पाताळ, चंदरमा पायौ आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी, हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां में पाणी, फागण का करमां में रंग।
चोकीदार करै नगराणी, रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो, लेवण तू पायो तकदीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।

जोर

नीचै सूं ऊपर तांई को,
अेडी सूं चोटी तांई को,
भीतर सूं बारै तांईं को,
कतनो ई
जोर लगा ले
यो जमानो।
पण
म्हारै तांई
मोल न्हं ले सकै।
जुग जुग सूं
लगा रयो छै,
म्हारी बोली।
पण बोली न्हं छूट री
म्हारै जश्या
केई ओर
आया
बक्या
अर
चली ग्या।
कठी ग्या?
म्हूं न्हं जाणूं।
वै सब
म्हारै जश्या हो सकै छै
‘म्हूं’, न्हं हो सकै।
वै तो आया ई
बकबा की खातर छा।
म्हूं न्हं आयो।
वै सब
म्हारी आडी
झांकै छै
टुकर-टुकर
क्ह दे छै,
‘स्साला बेवकूफ!
जमाने की रफ्तार
नहीं जानता।'
म्हूं सोचूं छूं
रफ्तार जाणतो
तो
आतो,
बकतो,
भाग जातो।
बरसां सूं
अेक ठाम पै
ऊबो छूं
हिंवाळा ज्यूं
अटल-अडिग।
म्हूं,
जमाना की रफ्तार न्हं जाणूं।
वै,
ठहराव की जोर न्हं जाणै
रफ्तार की लार
भागबा में
जोर की जरूरत कोई न्हं।

काळ

काळ,
मन को भाव छै!
काळ को भय,
मन सूं खाड देबो
मरद को काम छै।
तू भी छै कईं मरद?

काळ-दुकाळ

जळ रै जळ नरमळ कर मन
अपणां सूं छळ कतना दन
नैण-नीर पी’र जी रही है बावड़ी!
नखरा कर-कर निकळ गई बैरण बळ खा’र बादळ्यां
मदगाळी मानती नहीं मन की मनवार बादळ्यां
जतनी-जतनी अरज करी चढगी गिगनार बादळ्यां
मरूथळ का भाग मैं कोई लिख दे दो च्यार बादळ्यां
जळ रै जळ धरती कतनां दन
पातदार होठ सीं रही फसल खड़ी!
देवदूत काळ को सगो खेतां की खणक लूटग्यो
बदरंगी भोर हो गई संझ्यां को धनक टूटग्यो
काळ-काळ-काळ कूकता कोयल को कंठ छूटग्यो
एक गंध घुटण सूं मरी पुरवा को सांस टूटग्यो
जळ रै जळ मोळाया बन
खेतां सूं छळ कतना दन
सपना संवळाता जावै घड़ी-घड़ी!

कांई होसी?

होठां की कोरां दांतां सूं पकड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
कांटां की डाळी मूठी मैं जकड़्यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
पाणी मैं रहणो, मंगर सूं झगड़यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
चन्दण का मूठ्या सूं माथो रगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
सूळां की क्यार्‌यां लागी
छनवाड़्यां का ओधक नीचा गेलां मैं।
गरमाई जागी-जागी
बहताळ्यां का आडा-ऊंळा रेला मैं।
दारू-बादळ का ऊंचा उठता धोरां मैं।
गळता की गांठ्यां गळगी
आसाढ़ां की काची-कोरो पोरां मैं।
भूल्या-बसर्‌यां पण गेला मैं बगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
अधजळ गागर ढुळ-ढुळ ज्या
पणघट सूं पोळां आती पगडंडी पै।
डैंकड़ बैठै उड-उड ज्या
मंदरियां की ऊंची उडती झंडी पै।
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै?
हुळस-हुळस हिवड़ो हुळसै
पाटण की पैड़्यां बैठ्या पाखंडी को।
उफण-उफण ऊंचो उठतो
ऊंडो बैठ्यो भाव सांझ की मंडी को।
सूरज नैं आंख्यां सूं पकड्यां-पकड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।

कतनी ई बार

हिया मैं हलोळां जद लेबा लागी हचकी,
ओळ्यूं-दोल्यूं कानां मैं पड़ी थांकी टचकी,
भोळो-भाळो जीवड़ो पंख पसार,
उड़’र उतरग्यो डूंगर पार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार।
पहर्‌यो थांनै लहर्‌यो मन बादळी को ठहर्‌यो,
सरम्यां मरग्यो चांदो होस चांदणी नैं नंह र्‌यो।
आंख्यां की कोरां पै जद खींच्यो मोटो काजळ,
आंथूणी दिसा मैं भेळा होग्या संदा बादळ।
नथड़ी मैं नथ लीनो सारो तारामंडळ,
बाळां बीचै बांध्यो थांनै अंधेरा को जंगळ।
कांचळी की कसणां मैं डूंगर कसग्या।
छाना-मूना रह जावां जिया ईं समझा’र
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥
राखड़ी मैं राखी होगी म्हां को भी तो सीर,
नैणां मैं मंडी तो होगी म्हां की तसबीर।
हींगळू मैं उघड़्यो तो होवैगो म्हां को नांव,
मंहदी हाळा पगल्या आता होगा म्हां कै गांव।
आझंक्या मैं खुल-खुल जाती होंगी मीठी नींद,
पाका रंग का सांवरिया मन मोवन भोळा बींद।
घुटकां ले-ले पीता होगा बछोवां को जहर,
ढळती संझ्या, काळी रातां सातूं-आठूं पहर।
आंगणा का आता होगा पोळ नैं बच्यार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥

खोज

क्यूं जी,
कठी छै भ्रष्टाचार?
बता तो द्यूं
पण
पैली
पांच को नोट ला...!

नारायण सिंह भाटी की कविताएँ (राजस्थानी) : Narayan Singh Bhati Kavita


अनोखै लाल रौ तबला वादन

आ बोल विहूणै ताल री
उर ईथर थिरकण में।
थिरक थिरक नै थड़ी करती
अनोखै हाथां सू अनोखी
सिरजणा कै—
सूरज ने चंदै रा, दो
कटि छिबता छवोलियां सू
ध्वनि रा फूल उछाळती
पुररवा रै अंतैपुर में
ऊतरै है
अत आतुर-उर उरवसी
सुरंगण!
आरजदळ सांवठी सेन री
अडोमड़ ऊपड़ती अस टापां
इण धर संस्कृति स्रोण में
साखीजै है
जीवण री जोमीली गत
गरजणा
कै
नटराजी-निरत उमंग अगै
विन नतैक नतैण ज्यू
लाखू लास्य जगावती
उद्वैलीजै है
अरथहीण कळा में चिरंतण अरथ री
उद्वैलणा।

बाधौ बिणज

आम आदमी खातर
हर छिण आप ताई सिकरावणौ
जीवण विराज है
वो आपरी ही उधेड़ ने सींवे
हर औसर ने आपर मारफत
दूजां तांई सिकरावणो
वधतौ बिणज है
जिको जुग-जांमी ही जीवै
पण कवि पूरै जीवण ने
पूरण खातर सिकरावै, औ
बाधौ बिराज है
पाखरां री अमरता हो पीवै।

च्यार गीत

मिळिया तौ करो रे लोभीडां
अपणै आप सूं।
प्यारी रै मन पीव मिलण री
मावड़ पूत सपूत सूं।
ग्यांनी रै मन गुरू मिलण री
पिंडत मिंत प्रवीण सूं।
बिणज करणिये नै नहिं बेळा
जर आछटतै सूप सूं।
करम खेत रा खांतीलां री
राह मिळै ना रूप सूं।
भरियौ पाव आध नै निरखै
पूण पुरीजै आप सूं।
मद री मांखी मद में डूबी
पार पड़ी न पांख सूं।
मिळियां तौ करौ रे लोभीड़ा
अपणै आप सूं।
मिनख मिनख री मजबूरी रौ
गाहक बण गरवीजै।
मजबूरी मोटी मांनेतण
ओढै नितरा पीळा
करमी धरमी पिंडत जोधा
खपग्या के खांतीला।
पगड़ी साटै पीळौ आवै
जद मांनेतण धीजै
साटै सारू हाटां जावै
पांणी पुरसां छीजै।
मिनख मिनख री मजबूरी रौ
गाहक बण गरबीजै।
बिना जुगत जाजम नहिं जमणी
इसौ जगत रौ धारौ
अटकळ बिन आंटौ नहिं आवै
कर कर मैनत हारौ।
बिन जुगती के खप खप मरग्या
धाप धान नहिं खायौ।
घर सायर मिनखां रै घाटौ
सांसै राज जमायौ।
जुग रै मठ री जुगत पुजारण
नखरा जो नर झेलै।
सगळै ही थोकां समरथ व्है
निरभै पासा खेलै।
आखर री औकात किती सी
रस रसणा री धारां
बिन बींध्यौ मोती किम सोहै
सरसत हंदै हारां।
सर सारा भाथोड़ भरीज्या
कोइक पारथ साधै
दस मुख सूंटी इमरत कूंपौ
कोइ रांम नै लाधै।
जीवण सधियां आखर साधै
अरथ न आय उधारा।
जूंझारां री जांन गयां बिन
सजै न सीस उतारा॥

दुर्गादास

धीरज न इत्तौ धारै हियौ
कै आसरा थारौ जस दरसाऊं प्रबंध मांही,
बंधियौ न किणी बंधेज मन-पत
सौ बंधै किम अमीणा छंद मांही?
दोयण कुण थारा दुर्गदास?
दोयण मां-भोम रा तुझ दोयण
न हिंदुआं हेत हय पाड़िया,
न मुगल बाढवा बाढाळी झाली,
करम-खेतरा मांझी आसोत—
थारी कीरत माणसां पंथ हाली।
काळी घणघोर घटा ऊमटी—
अचांणी तेग-वेग सूं विपदची
धमकिया धू प्राची
औरंग चौरंग घटा ओसरी,
अटा चढ देखियौ नर नारियां
काळी छबकाळी कांठळ विस चूंवणी
कांकड़ कमी।
मां भू भरिया दृग
हिये कंपकंपी
रूं-रूं विस छांवळ हहरियौ
अरडायौ आडावळौ
लूणी सिथळ गात थई
कुरळाया कायर मोर
सरणाटौ चहुं और छायो।
जदै बण आंधी उचटियौ मरू-भोमरा,
आसरे सांस अेक भेळ कीन्हौ
पीन्हौ विस जेण कोड घणै
मां भोम रै उर इमरत दीन्हौ॥
तिण दिन सूं दुर्ग बण दुर्गदास
अड़ियौ आडावळै आंटीलौ,
चढि्यौ न जेण रंग औरंग रंग—
रंग है वां तुरंगा जेण थूं चढ्यौ।
पतै रो चेटक जग चावौ
थें किता चेटक छिटकाया
केण पतौ?
न जाणूं रूप-रंग ज्यांरौ
त्यांरी खुरताळन धम-धमी
अेथ सांभळूं।
बखत रा बखतरां चीरणी
अस-हींस आभड़ै करण-पटां
सोही संगीत सांचौ देस प्रेम चौ
जुगां नगारां बाजणौ॥
भोगिया छप्पन भोग
बिखै रा थें
छप्पन भाखरां
खाई खमखारियां भुज तोलणां
रीस पीणां।
न पूरौ पय पीधौ
मेघ बदळै रा वाद बावळा
थे पाई घड़-फुलवाड़ी
सैल धारां॥
अस रा असवार ऊजळा
रह्यौ ऊजळे वागां
ऊजळी खागां
ऊजळै मनां
राखियौ खत ऊजळौ
पण असल रंगरेज आसरा
थें रंगियो कसूंबल धरा-पोमचौ
बिनां कर रांगियां॥
थें काढिया अबखा ऊनाळा-
उकळतै धोरां,
बळबळतै भाखरां,
कळवळतं नीरां,
प्रचंड लूआं अंग प्रखाळीजियौ।
उकळियौ रगत रंग राचणौ
हीयौ न अकळियौ
म्रग प्यास रा पंथ बांधणा
बांधिया जेथ बंधिया
सर आसरा॥
सरणाती सियाळू रातां
सिहरतै रूखां
हाली हमीरहठ डकरेल डांफरां,
धारा चौ नीर धूजतौ पोढियौ,
पड़तै पाळै केहरी खोह सूता,
करणौत हिये-खोह प्रण जागै,
चंचळां पांखरां नीर चुवै॥
केई—
रस-भींजी
सुहांणी
सुरंग रैणां
आई छाई गई रसा।
पवनियौ प्रीतम संदेस लियां,
नाजुकड़ी नींद रौ पांण गह्यां,
बरसां डूंगरां बनां भटकियौ,
थूं न भेटीजियौ।
विहांणै विहांणै काग उडाया सही कांमणी
पण भुज फड़कणां
तुझ हियो न फड़कियौ॥
प्रण पाळ थू ऊंचौ प्रिथीपाळ सूं
थारौ अस ऊंचौ असमांन सूं
थूं और असवारां नित ऊंचौ,
पण सही जाणजे
आसरा इळा में
थांसूं ही थारौ जस ऊंचौ॥

गवरी रौ गावणौ

थारै कंठां सूं ढळती
आ राग
जाणै उसा ळी सुरंगां सूं
ओटै रळकीजतौ
किरणां रौ कामणियौ उछाळ
काचै रंग रौ
घुळ-घुळ कूंपळां में कांपणौ,
पांगरणौ हेत रौ
पवनियै रै पांख
हेताळू हियै रौ
रसमसियै तालां माथै
रपटणौ,
तीखौड़े तिबारै रै तार सूं
फूटती फुंहार रौ
नखताळी किरणां सूं केळीजणौ,
लखियोड़ै लोटण कबूतर रौ
औळखियै खोळां में
लुट-लुट लोटणौ,
सधियोड़ै जुगल सारंग रो
मींट सूं मींट नै पोवणो
अे भंवर-लैराळी गायण!
इसड़ौ रीझाऊं थारो
काळजियै री कोर सूं गावणौ।

घूमर

सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
घूमर घालै जद गौरड़ियां
समदर झोला खाय
चकरी चढती धरणी दीसै
पवन पंथ पलटाय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
डीगा डूंगर डिगमिग डोलै
सूरज निम निम आय
रूंख रमण नै पड़े ताखड़ा
नदियां बळ खा जाय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
चोटी जांणै बासंग छिड़ियौ
लहरियौ लहराय
बाजूबंद में बंधियौ जोबन
लूंबां लग झुर आय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
रंग कसूंबल चुवै हथाळी
लागै पोयण पांव
चंपे केरी डाळ विलूंबै
कदळी बन रै मांय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
कुण जांणै कद कंथ-मोरियौ
बाड़ी घर ले जाय
इण बाबल रै आंगणिये में
दो दिन तो लहराय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।

जीवता अैनांण

केई कांमरू कोचरियां तो उडगी
पण कोचर हाल रैगी है
इग नुवादियोड़ी माणसी रै
डरूं-फरूं हिये हेट,
अै खपणी खोगांळां खाली रियां ही
नवी कुचमाद री कोख रा बचिया
फेरू वां में पांगरै
लारलौ इतियास
इणी जापां रो जोखौ है,
इण खातर इणनै भरण रौ
जाझौ जतन करतां
म्हारी घणी रूपाळी रातां रा
अजपा औजका
सपनीजती पलकां तळै आफळै
नवी पीढी रौ पाणी
पतियांणसी कोई दिन
इण रा अै आखरां में उथलीजता
जीवता अैनांण।

लेणौ देणौ

धरती ने अेक दांणो देवौ
तो वा सैकडू कणूका पाछा देवै
सत राखणीया समाज सूं लेवं उतरौ हो
नोलो नीठ पाछौ देवै
धरती री धणियाय मोटी
कोई री आ औकात कठे?
पण म्हारो लेणौ इणी समाज सूं
नै देणो सैकड़ा जुगां सारू है
इणी खातर
आज रै समाज रा आंकिया टणकेल!
म्हने अेक रोझड़े जिता ही लखावै
ज्यां रो भागणौ नै भिड़करणो
बहकणी ने बुहारणौ
खावणो ने खिडावणी
आपरै अंग ताई पूगै
म्हां खातर अै जतना रा खेत
अेक सावत सिस्टी है
जिण में हूँ आज ने बाबू तो वो
पीढ़ियां लग पांगरे।

मांड में मूमल री धुन सुणतां

मुळकती चांनणी रा आकळ मोह ज्यूं
पिळू-पिळू अन्तर भरी रूप-तळाई माथै-
तिरै थारी प्रीत रौ सतरंग लैरियो
जिण में झीणौ-झीणौ झांकै है-
काजळिया नैणां रौ सम्मोहण-जाळ
नागण वेणी री लय लहरणी मे।
सुरां’ळी रंग रळी रौ रळाव
सुतर-सरोवर डोब डोहण नै
हींजरतै हियै रौ बारण बंध आफळै।

पण मिनख नै समझावणौ दोरौ है।

करसणियै बाप री
कन्यावळ-सी भूख
बाखोटिया- बिछड़ियां
हिरणी री हूक
जिसी ही
पवीतर है
इण धरती री कूख।
जुग जंतर रा आंतरां में
आ ही अपणास छोड जाऊं
तौ मुंआं ही मुखातर पाऊं
जोयोड़ी जोत रौ कांई जोवणौ है
होवतै काम रो काई होवणौ है
अणु नै उधेड़णौ सोरौ है
पण मिनख नै समझावणौ दोरौ है।
हे मन रा करणहार
औ ही करण ने
च्यार दिन फेरूं मांगूं।

मीरां

(लांबी कविता री चौथी किरण रौ अेक अंस)
चिड़ियां री चहक सुण
प्राची रै पीळै पोतड़ियां
जागियौ बाळ प्रभात
हौळै-हौळै बीसरै
हालरियां री बात,
नीतरियै अंबर सर
मुख आब उजाळ
बैन बयार आंचळ
चख कंवळ संवार
केळ कणदोरै खिली
कूंपळ कूंवळी रौ
काजळियौ काढ,
चुटकी बजाई कचनार
विहंस सुणी अस हींस।
रांणै विक्रम रा भेज्या
सिरायत सिरदार
तातै तुरंगां आया पूगता।
हेलै सागै राळी मीरां बाग
जांण्यौ-जैमल आयौ होसी
भेळी उतारसां आरती,
पण देखतां मेवाड़ी पागां रा पेच
हुई अंत अणमणी,
धरणी टिकै ना आगै ऊठियोड़ा
हिय हय पौड़
सागे जागा गरणावती आफळै
मन रथ धुरी।
सबद खुलै उण पैल
बंधियौ सरणाटो गाढै गाढ,
थिर पलकां रथ रज थिरकतां
मीरां सुणिया जोजरै कंठ रा
आडा डौढ़ा बोल,
करी बतळावण
मुक्तकेसी कंवराणी सीधै बोल में-
'मोड़ा आया रे मांनीता सिरदार!
वा बेळा तौ कदे बीतगी,
म्हारी सार सुरछा रौ
कांई बतावौ मूंछळां मोद
मीरां तौ मार लिया जग छळ मीर
अै अमीर भलांई भंवौ
किरण रौ कांई कर लै कांवळा।'
'थे कांई देवौ बर बर में
सातियां री साख,
थांरी अरधंगी नै सूंपियौ
थे सेजां रौ नै चिता रौ ई आध
जे वै जूंझती जीवण थारै जोड़
थे जग रौ कोई समर नीं हारता।
पण वांरा कर कुरियोड़ा रैग्या
गढपतियां रै बारणै
चिता लग रह्यौ-
वारै चित रौ चोज,
म्हारा कर खुला किरतार रै बारणै
मुक्त चित्त चीन्हौ है चक्रधर चाल में।'
कहजो राणाजी नै
सावळ संभाळ राखै
मतां नै मेवाड़ कांई है कवै रै कांसां रौ
भेळौ मोह?
हूं तौ मिंदर मिंदर मूरत संवार
कर लेसूं प्राण पाळणा।
हमें नहीं म्हरा हाडकां में
मेड़तियां रौ सीर
सीसोद्यां रौ कदेको ही ऊठग्यौ,
मोड़ियां मुड़ै ना लागी लगन
रथवाह म्हांरी सांसां रौ सौदागर
सांम्ही आयग्यौ।
नारी हठ जांण रावत कह्या
जूनी जाजम रा ठीमर बोल-
'थां में नहीं म्हांरो सीर
पण म्हांरौ तौ है
थांरी सौ पीढियां री लाज में।'
'लाज तौ रैसी नरां!
आतम रै आपांण
ना रहै-
नारी रै नथ घालियां।
थे लेजौ थांरौ पीढियां सूं सीर
मीरां तौ मैरांण तिर आई अेकली
अेकली ही जावै है अगलै धांम,
थांरा अरथ अडांणां सूं
ढबिया ढबै ना
इण पथ रा-
अै पांणी पंथा घोड़ला।

मूमल

जुगां री जोत रूप री रास
मिनख रै सपनां रो सिणगार
झुरै है रंग री महफिल बीच
माड़ेची मूमल थारै लार
जुगां रो धरती है रैवास
जिकण में रूप रंग नै राग
आपरै मझ जोबन ऊफाण
चढंतां ऊतरिया दिन लाग
पण कोई मूमल थारै रूप
मिनख रै हियै घालियो हाथ
मरग्या माणस करै बखाण
अमर है थारी रंग-भर रात
फूल्यो किण बाड़ी में फूल
हिये किण सजियो कंवळै हार,
भटकै भंवरा आज अधीर
राग नै सौरम रै मझदार
राग री पांख्यां लागी रूप
उडी जद जुग रा अंबर चीर
करोड़ां कंठां कियो रैवास
अलेखां हिवड़ां री थूं पीड़
जदे लग बन में बासग नाग
बाड़ियां चंपो, दाड़म, दाख
लुळकती कंवळी केळू-कांब
जकां री भरै सूवटा साख
जदे लग हिंगळू हाटां मांय
मिनख रै कंठ हियो अर नैण
तदे लग कर-कर मूमल कोड
सांईणी-झुरसी थारा सैण

मुमतांज रौ मोह

सौ बकरां रा रगत सूं फळे
अेक अंगूर-बेल
केई जूनी कैवत औगाळतां औगाळतां
केई सुहाग रातां रा मसोसिया गीत
अेकण सागै आज इज
थारी कबर सूं बरकता बारै आया,
जोबनिये री जूनी मजबूरी मोरिया
जिसमी-फूल
इतिहास री बिलखती बावळ बिगताया।
उरण रूप रूधणी
मुगल मनसब री मुकळाई रौ काट
सेवट वां सांकळां नै खायगौ,
हजार बरसां रै इतियास रौ
मेछ मांगीगर वीर हजारौ
हमें घणी फुरसत में
नीची नाड़ कियां
इण धौळियै भाटां बैठी
धौळी धट रातां में रमी रमै।
उण अतीत रौ इतरौ निसरडौ धीजौ
अठै आतां
इतरै मरियोड़ै पाणी री गुमटाई गूंग नै
इण ढालै
मकरांणी पैठ सूं परोटै॥

पासाण सुंदरी

थूं कुण ऊभी
हे सयाण सूरत
पासाण मूरत
नगन देह
भगन गेह
अतीत री कळा द्रस्टि तळै
जोवै केई जुग सूं
भाव भंगिमा भरिया
थारा अंग-अंग
झलती जोड़ी रा
प्राण पिया री बाट
हे प्रीतपनी परणेतण पूतळी
केई नैण निरख-निरख
निकळिया होसी
थारै गेह बार
पण हूं बतळाऊं
अबोली बोल!
कण थनैं मिलण वचन दे’र
वचन हारियो
जिणरो—
अेक पग ऊभी
अेकटक
थूं पंथ निहारै
हे ओळूं उळझी
संकोचण सुंदरी
इण ऊंचै पयोधरां
ऊंडी धीरज धरण कळा
किण सूं सीखी?
हे कळाजायी कामणी
म्हे तो गीत सुण्यो
काव्य पढ्यो
आंख देख्यो—
केई'क झुरती विरहणियां रा
वैरी विरह ताप
लाखीणा तन खीण किया
पण थूं तो
जुग बित्यां ही
जोबन मदमाती
अर अजै लग गमकै
निरत रत काम री कामण धुनी
थारै अंग-अंग री
मिजाज-भरी मंगेजण मरोड़ में...
हे उफणतै जोबन री
पासाण गोरड़ी!
थळ जायी
विरह ताप झुळसी
सकल गजगमण गोरियां रा
तरळ नैण मोती
किण किरतार कारीगर रै
प्रिया रूप साधना सांचै
आय सांगळिया
जिण खांतीलै
अमर खांत कर
थनैं सिरजी संवारी—
उरज पीण
कठी खीण
वसन हीण
वचन बंध अचंचळ सुंदरी
विरह समंद तळबळती
चिर प्रीत अगन री—
अखंड जोत
काळ हथेळी बिच
थां आगळ अस्टपौर जगै
तिण सूं पड़ियै काजळ रा कूंपला
किण चतर नार चोरिया
हे सयनहीण
पंथ लीण
पासाण सुंदरी!

समै रौ रींछ

रींछ री खाल ओड्यां
औ समै
सदियां सदियां रा सिराणा सूंघतौ
चाल्यौ इज जावै है
पण कोई नै ठा कोनी
किण दिस?
नै क्यूं?
केई भूसागड़जी दरसणिया दाव
लगाय लगाय टुरग्या
अर इण री गत परखता परखता
खुद बिगतीजग्या।
औ कितरा हो करमां रा कीड़ीनगरौ
थूंड री अेक रूंबड़ी सूं थूं डाय
अदीठ पेट दाखल करै,
कितरा ही ओढाई रा रूखां माथै
ऊंधौ चढ
इंसानी ऊरबां रा मद-जाळा चूस
कोरै उसासां रौ छछौ अंबरा छोडतौ जावै।
सगळी चीजां
ठावौ-ठाव दीसै जद लग इज दीसै
पण इण री रमत-रीछीं री अेक रपट में
परलं रा पंख पसरता दीसै।
तौ ई धर रै धोरी में धीजै री सांस है
रींछ रै राज में इज मदारी रौ बास है।

समै रो गज

मिनखा जूण री अेकल पड़
हाडकां रै रावण हत्थै री
तांत हेटै
मढ़ी मढ़ाई मजबूरियां रो
पलट-पलट नै पीड़ीजतौ
रीकणौ रियाज है।
पण अचंभौ इणरौ कोनी
और तौ इणरौ है कै
अंकोड़ै सूं लेय
ओटम तक लांबौ
समै रै तुजरबै रौ गज
फेरूं ही आदमी रै हाथ में है
कवि जद चावै
उणरौ पुणचौ पकड़
रियाज रौ रूपक बदळ देवै
पण अै औसर रा आड़तिया
समै माथै आवतै सुर में
आपरौ अठताळौ
मांडै ही ऊंधाय देवै।

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