प्रेमजी ‘प्रेम’ हाड़ौती अंचल के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। उनका जन्म 1943 में कोटा जिले के घघटाना गाँव में हुआ था और 1993 में उनका निधन हुआ। उन्होंने हाड़ौती बोली में कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी और अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में हाड़ौती अंचल के लोकजीवन, प्रकृति, संस्कृति और आम लोगों की संवेदनाओं की झलक मिलती है। उनकी चर्चित कृति ‘म्हारी कवितावां’ के लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।
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| Premji Prem |
अछूत
कठी चाल्या पटैल जी?जीमबा!
दूरो हट्
भट जे मत..!
खम्मा, घणो खम्मा पटैल जी!
हटूं छूं,
पण जीं बांस की छाबड़ी मैं
परोसगारी होवगी,
वां भी तो म्हारा अछूत हाथां सूं ई
बणी छै।
आंकड़ा का फूल
नीमड़ी नमोळ्यां लागीं, आंकड़ा कै फूल।म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
चन्दरमा की जान मैं तारां की गाड्यां चाली रै,
छोटी-छोटी बादळ्यां बण-बण अर लाड्यां चाली रै,
ऊपर सूं आकासगंगा रही गगन मैं झूल।
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
कतनी बार बादळा समदर जळ भर, सरवर पै आया?
कतनी बार बादळ्यां नैं अम्बर सूं आंसू ढुळकाया?
कितनी बार तांवड़ा सूं परणी आंगण की धूळ?
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
साथणियां की लेर बारणै बैठ पचेटा म्हूं खेलूं,
मार खाकटो, सावली माथा पै सूं कांधा पै ल्यूं,
शरमा जाऊं, छोरा म्हारी हंसै देख जद भूल।
म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥
बाट न्हाळतां
आया क्यूं न हाल तांई,म्हारा मन का मीत री?
मारती फालकड़ी खदी,
आंगणां मैं बैठती।
खदी फाटी बोरी लेती,
पोळ मैं जा लेटती।
अठी उंठी सूं आती-जाती,
लेर अपासी उठती
झनन-झनन जाती
बारणां मैं देकती।
कांई होग्यो हरणी चढ़गी,
कचर्यो आयो माथा पै।
पीपळी पै हाळी हाळण
चांदो आग्यो माथा पै।
बैलां की न्हं टोकर्यां
न्हं बालमजी का गीत री।
आया क्यूं न हाल तांईं
म्हारा मन का मीत री॥
झींगर की झणकार
श्यां सट्ट मैं गरणावै छै
गंदकड़ा को बोलबो
घणो ई सरमावै छै
पूरब आडी कुत्तो बोल्यो
कोई-कोई आवै छै
बाड़ा बांधी गाय रांभी
हीरा मोती आवै छै।
कुत्तो बोल्यां घड़ी बीतगी
छागी श्यां सट्ट हो
पोळ मैं सूं भीतर चाली
कर्या बारणा पट्ट हो
मन ही मन मैं धीरां
गुणगुणावै यो ई गीत री।
आया क्यूं न हाल तांई
म्हारा मन का मीत री॥
चाल हीरा चाल मोती
गांव आडी चाल रै
चन्दरमा धरती सूं मलग्यो
सूनी सरवर पाळ रै
जोत खोल्या जूड़ो खोल्यो
पटकी कांधै हाळ रै
न्हाळती वा बाट होसी
बेगो-बेगो चाल रै।
बेगो-भाग्यो-दौड़्यो-भाग्यो
अर उतावळो चाल्यो छै
गलगलियां छूटी हिवड़ा मैं
तन उमंग में हाल्यो छै
खेत का खलाणा का
यो गातो चाल्यो गीत री।
चाल्यो घर की आडी चाल्यो
हाळी, मन को मीत री॥
खोल म्हारी रूपाळी
दरवाजो बेगो खोल री,
सुणतां ई हिवड़ो हरख्यो
तन-मन गयो डोल री।
भागी-भागी चाली-बेगी
दौड़ी पूगी पोळ री
शरमातां-शरमातां ऊं नैं
दियो बारणो खोल री।
ववांड़ अठी खोल्या पण
ऊंठी कूकड़ो ई बोलग्यो
मन का मीठा लाडूड़ां मैं
जहर बैरी घोळग्यो।
बीतगी या रात, छोडो
रात की रंगरीत री।
आया पण मोड़ा ई आया
म्हारा मन का मीत री॥
बच्यारौ म्हूं
रामजी की चिड़ियारामजी कौ खेत
फेर म्हूं कुण?
म्हारौ कांई?
कांई म्हूं अर कांईं म्हारी ज्यात?
पेट भर्यां पाछै भी
चांच भर’र उड ज्या छै
चड़कल्यां
चड़कल्यांन का पळ र्या छै
पूरा का पूरा खांनदांन
अर म्हूं
बणर्यो छूं गंगाराम
रामजी की चड़कल्यां
आवै छै, खावै छै
रामजी कौ खेत।
म्हूं बादळ्यां को मनवार करूं छूं
म्हूं खरार-खरूर करूं छूं
म्हूं ई पटकूं छूं खाद-बीज
पण रामजी का राज में
म्हारा गोफ्या कै आगै
ऊभी होज्या छै
बाप-दादां की बात
रामजी की चिड़िया
रामजी कौ खेत
खावौ री चड़कल्यां
भर-भर पेट।
बाळपणा का ख्याल
कोई पाछा कर दे,म्हारा बाळपणा का ख्याल।
द्याड़ी का चूंतरा की लीमड़ी का हींदळा,
चक-चक मूंग्या चीला पोता बांदरवाळां बीजणा।
कांवळी की छांवळी को लेरां-लेरां भागबो,
संझ्या ढळतां सोबो, पहरां का तड़का को जागबो।
दादा की दलकारी अर भावज की मीठी गाळ।
माथै आतो पणघट पगल्यां पींदै दबतो माळ।
कोई पाछा कर दे,
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
आमल्यां की झामल्यां का काचा-पाका खोर्या
झक्कर सूं पाक्या डगळ्या जो झोळ्यां भर-भर सोर्या
मोतीदह मैं सांपड़वा सूं भैंचक को डर लागबो,
डाफा लेती गुल्ली कै पाछै राड़ी मैं भागबो।
चांदणी की भरी तळाई डूंगर बांधी पाळ,
माथा पै ऊंदो लटक्यो तारां सूं भरियो थाळ।
कोई पाछा कर दे,
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
आंगणां मैं रेवड़्यां सूं आंबा ला’र उगावणो,
चींट्यां नै चुग्गो, चिड़कल नैं घूघर जा’र चुगावणो।
मावस की रातां मैं दखणी लीमड़ा की पाती,
पून्यू मैं भाभू रोताणी सोळा सांवत गाती।
झूठा भैरूंजी भड़काता रतन्या-छगन्या ग्वाळ।
पंछीड़ा गाता बूंळ्या, संकर्या टेरती जाळ।
कोई पाछा करदे
म्हारा बाळपणा का ख्याल।
बसंत कै दिन
तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥सरस्यूं की कळियां केसरिया
गारा की डळियां केसरिया
सूरज उगतो सो केसरिया
पंछी चुगतो सो केसरिया
थांकी साड़ी भी केसरिया म्हारी।
बणज्यारा की लेरां केसरिया बणज्यारी॥
केसरिया सोना को रथ
केसरिया छै पगडंडी
सांचो हरदो केसरिया
काळो हिवड़ो पाखंडी
केसरिया थारी बाणी
केसरिया म्हारी बोली
पूरब का बादळ नै भी
केसरिया आंख्यां खोली
केसरिया तन मत द्यो, केसरिया पिचकारी।
तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥
केसरिया फूल हजारा
केसरिया कळी कनेरी
केसरिया जळ की लहरां
केसरिया बाळू ढेरी
केसरिया म्हारी नथड़ी
केसरिया थांको मूंडो
केसरिया अस्ताचळ में
सूरज भी धंसतो ऊंडो
केसरिया मीठी लागै छै बातां थारी।
तड़कै ई फूली पूरब में केसरिया क्यारी॥
बोध
आप बोल्या-''कविता मांडो!''
म्हूं नै कविता कर दी।
आप बोल्या-
''ब्होत बढ़िया कविता छै!''
म्हारा होटां पै
मरी-मरी हांसी आगी।
म्हूं अपणी कविता पै
न्हं हरक्यो,
आप की बात पै हांस्यो।
ऑर्डर मलतां ईं
सप्लाई कर्या
सीमेंट जसी
म्हारी कविता
अब म्हं नै सोबा न्हं दे।
बार-बार
सपनां में आवै छै,
बोलै छै!
जस्यां वां का क्हबा पै
थं नै म्हारी रचना करी
उस्यां ईं-
म्हारां क्हबा पै
वां को
मण्यो मसक दै।
चतराम
जणां-जणां कीमजाल कोई म्हं
जे बांच ले,
गा ले।
संस्कार अर सीख
जीं नै मल्या होवै
वै ई पढ सकै छै
म्हारा बोल,
गा सकै छै म्हारा आखर
इबारत बांचबा सूं प्हली
संस्कार सूं जुड़ो।
फड़ पै मंड्यौ
एक चतराम छूं म्है।
ढूमलो
म्हारा आगला बड़ां मैंअर म्हूं मैं
अतनो सोक फरक छै
ज्यां कागदां पै वां नै
दिमाग का खून सूं
कविता रची छी,
वां कागदां को
ढूमलो बण’र
म्हैं
परचूनी सामान सूं भर्यो छूं।
गीतां को गेलो
भरी भरमन्या को भरमायो।म्हूं गीतां कै गेलै आयो॥
सारी धरती म्हारी बाड़ी
सारा तारा म्हारा माळी।
चन्दरमा आदोळ्यो, सूरज
लाग्यो छै बाड़ी सूं हाळी।
दन दन को रूखाळ तांवड़ो
रात चांदणी करै रुखाळी।
बादळ पाणत करै, बीजळी
क्यार्यां खोदै ले’र कुदाळी।
म्हूं गीतां को धन नपजाऊं
करूं लावणी, लाण लदाऊं
खुसियां सूं हांसू म्हूं,
गीतां सूं मल मल मळक्यो, मुसकायो॥
म्हारा मनड़ा की पीड़ा
कै म्हूं जाणूं कै आंखर जाणै।
भूली भटकी बातां काणै
कद आ बैठै ठाम ठकाणै।
अमगी अमगी फरै भावना
कुण बातां को भाव पछाणै
अटक्या अटक्या आंखर बैठै
ऊं ठाणै कद, कद ईं ठाणै।
म्हूं सपना छन्दां में तोलूं
म्हूं दोहां कै मूंडै बोलूं
मन में पाळूं बाणी में ढाळूं
हडूडो
रात-दनभोगूं छूं
एक हडूडो
सोच-बच्यार को!
बच्यार आवै छै
कुस्तमपछाड़ा होवै छै
सूगली सीक हांसी हांस’र
चली ज्या छै
ठोस निरणै खडै
तो कविता मांडूं।
जातरा
एकजद जद भी बूझ्योजातरा को गेलोलोगां नै नाळो-नाळो बतायो।
म्हूं बना बतायां ईंईं मुकाम तांईचल्यो आयो।
दोभावना नै अरथाबो,अरथ नै आखर देबो
दोभावना नै अरथाबो,अरथ नै आखर देबो
आखर-आखर की माळा पोबोफेर चड़ी चुप्पी
भीतर ई भीतर चालवो।या कशी जातरा छै?
तू सोचै छैकै म्है चाल र्यो छूंजमाना भर सूंआगै
भाग र्यो छूं।चंदरमा कतनो ई भागैधरती सूं
ऊं को गरजोड़ोन्हं टूट सकैया कशी जातरा छै?
थारा करमां मैं कोई न्हं
बाण्यां बट्टा की लकीर॥
बळदां का करमां मैं जूड़ो
बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां मैं बिसकुट
मोटी मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां मैं बिजळी
करमां नाच लखायो मोर।
बांदर बणग्यो साहूकार
बल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलो धर्यां बरफ को रूप
पाप कमावै सरवर तीर॥
राजा की रेखां मैं राज
चोरां की रेखां मैं जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै
खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग
कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां मैं गंगा
समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया
कोई पावै पचरंग चीर॥
देणो चावै तो अन्नाता
सब नैं देदे छप्पर फाड़।
म्हांनैं का पाया दुतकारा
थां नैं पायो गहरो लाड़।
कागा चुग चुग खावै चाम
चुग चुग मोती खावै हंस।
थारो बेटो कान्ह कन्हैयो
म्हारो बेटो बणग्यो कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा
कोई जनम जीवतां पीर॥
मछळी का करमां पाताळ
चन्दरमा पायो आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी
हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां मैं पाणी
फागण का करमां मैं रंग।
चोकीदार करै नगराणी
रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो
लेवण तू पायो तकदीर॥
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
बळदां का करमां में जूड़ौ, बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां में बिसकुट, मोती मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां में बिजळी, कस्यां नाच लखायौ मोर।
बांदर बणग्यौ साहूकार, बिल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलौ धस्यां बरफ को रूप, पाप कमावै सरवर तीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
राजा की रेखा में राज, चोरां की रेखां में जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै, खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग, कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां में गंगा, समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया, कोई पावै पचरंग चीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
देणौ चावै तौ अन्नदाता, सब नै देवै छप्पर फाड़।
म्हांनै का पाया दुतकारा, थां नै पायौ गहरौ लाड़।
कागा चुग-चुग खावै चाम, चुग-चुग मोती खावै हंस।
थारौ बेटौ कान्ह-कन्हैयौ, म्हारौ बेटौ बणग्यौ कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा, कोई जनम जीवतां पीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
मछली का करमां पाताळ, चंदरमा पायौ आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी, हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां में पाणी, फागण का करमां में रंग।
चोकीदार करै नगराणी, रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो, लेवण तू पायो तकदीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
अेडी सूं चोटी तांई को,
भीतर सूं बारै तांईं को,
कतनो ई
जोर लगा ले
यो जमानो।
पण
म्हारै तांई
मोल न्हं ले सकै।
जुग जुग सूं
लगा रयो छै,
म्हारी बोली।
पण बोली न्हं छूट री
म्हारै जश्या
केई ओर
आया
बक्या
अर
चली ग्या।
कठी ग्या?
म्हूं न्हं जाणूं।
वै सब
म्हारै जश्या हो सकै छै
‘म्हूं’, न्हं हो सकै।
वै तो आया ई
बकबा की खातर छा।
म्हूं न्हं आयो।
वै सब
म्हारी आडी
झांकै छै
टुकर-टुकर
क्ह दे छै,
‘स्साला बेवकूफ!
जमाने की रफ्तार
नहीं जानता।'
म्हूं सोचूं छूं
रफ्तार जाणतो
तो
आतो,
बकतो,
भाग जातो।
बरसां सूं
अेक ठाम पै
ऊबो छूं
हिंवाळा ज्यूं
अटल-अडिग।
म्हूं,
जमाना की रफ्तार न्हं जाणूं।
वै,
ठहराव की जोर न्हं जाणै
रफ्तार की लार
भागबा में
जोर की जरूरत कोई न्हं।
मन को भाव छै!
काळ को भय,
मन सूं खाड देबो
मरद को काम छै।
तू भी छै कईं मरद?
अपणां सूं छळ कतना दन
नैण-नीर पी’र जी रही है बावड़ी!
नखरा कर-कर निकळ गई बैरण बळ खा’र बादळ्यां
मदगाळी मानती नहीं मन की मनवार बादळ्यां
जतनी-जतनी अरज करी चढगी गिगनार बादळ्यां
मरूथळ का भाग मैं कोई लिख दे दो च्यार बादळ्यां
जळ रै जळ धरती कतनां दन
पातदार होठ सीं रही फसल खड़ी!
देवदूत काळ को सगो खेतां की खणक लूटग्यो
बदरंगी भोर हो गई संझ्यां को धनक टूटग्यो
काळ-काळ-काळ कूकता कोयल को कंठ छूटग्यो
एक गंध घुटण सूं मरी पुरवा को सांस टूटग्यो
जळ रै जळ मोळाया बन
खेतां सूं छळ कतना दन
सपना संवळाता जावै घड़ी-घड़ी!
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
कांटां की डाळी मूठी मैं जकड़्यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
पाणी मैं रहणो, मंगर सूं झगड़यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
चन्दण का मूठ्या सूं माथो रगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
सूळां की क्यार्यां लागी
छनवाड़्यां का ओधक नीचा गेलां मैं।
गरमाई जागी-जागी
बहताळ्यां का आडा-ऊंळा रेला मैं।
दारू-बादळ का ऊंचा उठता धोरां मैं।
गळता की गांठ्यां गळगी
आसाढ़ां की काची-कोरो पोरां मैं।
भूल्या-बसर्यां पण गेला मैं बगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
अधजळ गागर ढुळ-ढुळ ज्या
पणघट सूं पोळां आती पगडंडी पै।
डैंकड़ बैठै उड-उड ज्या
मंदरियां की ऊंची उडती झंडी पै।
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै?
हुळस-हुळस हिवड़ो हुळसै
पाटण की पैड़्यां बैठ्या पाखंडी को।
उफण-उफण ऊंचो उठतो
ऊंडो बैठ्यो भाव सांझ की मंडी को।
सूरज नैं आंख्यां सूं पकड्यां-पकड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
ओळ्यूं-दोल्यूं कानां मैं पड़ी थांकी टचकी,
भोळो-भाळो जीवड़ो पंख पसार,
उड़’र उतरग्यो डूंगर पार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार।
पहर्यो थांनै लहर्यो मन बादळी को ठहर्यो,
सरम्यां मरग्यो चांदो होस चांदणी नैं नंह र्यो।
आंख्यां की कोरां पै जद खींच्यो मोटो काजळ,
आंथूणी दिसा मैं भेळा होग्या संदा बादळ।
नथड़ी मैं नथ लीनो सारो तारामंडळ,
बाळां बीचै बांध्यो थांनै अंधेरा को जंगळ।
कांचळी की कसणां मैं डूंगर कसग्या।
छाना-मूना रह जावां जिया ईं समझा’र
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥
राखड़ी मैं राखी होगी म्हां को भी तो सीर,
नैणां मैं मंडी तो होगी म्हां की तसबीर।
हींगळू मैं उघड़्यो तो होवैगो म्हां को नांव,
मंहदी हाळा पगल्या आता होगा म्हां कै गांव।
आझंक्या मैं खुल-खुल जाती होंगी मीठी नींद,
पाका रंग का सांवरिया मन मोवन भोळा बींद।
घुटकां ले-ले पीता होगा बछोवां को जहर,
ढळती संझ्या, काळी रातां सातूं-आठूं पहर।
आंगणा का आता होगा पोळ नैं बच्यार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥
कठी छै भ्रष्टाचार?
बता तो द्यूं
पण
पैली
पांच को नोट ला...!
झूंठो बणज
मत कर झूंठो बणज फकीर!थारा करमां मैं कोई न्हं
बाण्यां बट्टा की लकीर॥
बळदां का करमां मैं जूड़ो
बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां मैं बिसकुट
मोटी मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां मैं बिजळी
करमां नाच लखायो मोर।
बांदर बणग्यो साहूकार
बल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलो धर्यां बरफ को रूप
पाप कमावै सरवर तीर॥
राजा की रेखां मैं राज
चोरां की रेखां मैं जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै
खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग
कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां मैं गंगा
समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया
कोई पावै पचरंग चीर॥
देणो चावै तो अन्नाता
सब नैं देदे छप्पर फाड़।
म्हांनैं का पाया दुतकारा
थां नैं पायो गहरो लाड़।
कागा चुग चुग खावै चाम
चुग चुग मोती खावै हंस।
थारो बेटो कान्ह कन्हैयो
म्हारो बेटो बणग्यो कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा
कोई जनम जीवतां पीर॥
मछळी का करमां पाताळ
चन्दरमा पायो आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी
हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां मैं पाणी
फागण का करमां मैं रंग।
चोकीदार करै नगराणी
रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो
लेवण तू पायो तकदीर॥
झूठौ बणज
मत कर झूठौ बणज फकीर।थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
बळदां का करमां में जूड़ौ, बोझ्यां मरती जावै नाड़।
कुत्ता का करमां में बिसकुट, मोती मेम जणावै लाड़।
बादळ का करमां में बिजळी, कस्यां नाच लखायौ मोर।
बांदर बणग्यौ साहूकार, बिल्ली बणी करम सूं चोर।
बगलौ धस्यां बरफ को रूप, पाप कमावै सरवर तीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।।
राजा की रेखा में राज, चोरां की रेखां में जेळ।
करमां की रेखां सूं पावै, खूब मसाला नागरबेल।
तोता पावै रंग सुरंग, कागा पावै काळी खाल।
कासी का करमां में गंगा, समदर न्हावै छै बंगाल।
करमां सूं पावै कामळिया, कोई पावै पचरंग चीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
देणौ चावै तौ अन्नदाता, सब नै देवै छप्पर फाड़।
म्हांनै का पाया दुतकारा, थां नै पायौ गहरौ लाड़।
कागा चुग-चुग खावै चाम, चुग-चुग मोती खावै हंस।
थारौ बेटौ कान्ह-कन्हैयौ, म्हारौ बेटौ बणग्यौ कंस।
कोई करमां सूं बणज्यारा, कोई जनम जीवतां पीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
मछली का करमां पाताळ, चंदरमा पायौ आकास।
कठफोड़ा क्यूं फोड़ै लकड़ी, हरण्या उछळै खावै घास।
सावण का करमां में पाणी, फागण का करमां में रंग।
चोकीदार करै नगराणी, रजपूतां की पांती जंग।
बणज्यारा की पांती देबो, लेवण तू पायो तकदीर।
मत कर झूठौ बणज फकीर।
थारा करमां में कोई न्हं, बाण्यां बट्टा की लकीर।
जोर
नीचै सूं ऊपर तांई को,अेडी सूं चोटी तांई को,
भीतर सूं बारै तांईं को,
कतनो ई
जोर लगा ले
यो जमानो।
पण
म्हारै तांई
मोल न्हं ले सकै।
जुग जुग सूं
लगा रयो छै,
म्हारी बोली।
पण बोली न्हं छूट री
म्हारै जश्या
केई ओर
आया
बक्या
अर
चली ग्या।
कठी ग्या?
म्हूं न्हं जाणूं।
वै सब
म्हारै जश्या हो सकै छै
‘म्हूं’, न्हं हो सकै।
वै तो आया ई
बकबा की खातर छा।
म्हूं न्हं आयो।
वै सब
म्हारी आडी
झांकै छै
टुकर-टुकर
क्ह दे छै,
‘स्साला बेवकूफ!
जमाने की रफ्तार
नहीं जानता।'
म्हूं सोचूं छूं
रफ्तार जाणतो
तो
आतो,
बकतो,
भाग जातो।
बरसां सूं
अेक ठाम पै
ऊबो छूं
हिंवाळा ज्यूं
अटल-अडिग।
म्हूं,
जमाना की रफ्तार न्हं जाणूं।
वै,
ठहराव की जोर न्हं जाणै
रफ्तार की लार
भागबा में
जोर की जरूरत कोई न्हं।
काळ
काळ,मन को भाव छै!
काळ को भय,
मन सूं खाड देबो
मरद को काम छै।
तू भी छै कईं मरद?
काळ-दुकाळ
जळ रै जळ नरमळ कर मनअपणां सूं छळ कतना दन
नैण-नीर पी’र जी रही है बावड़ी!
नखरा कर-कर निकळ गई बैरण बळ खा’र बादळ्यां
मदगाळी मानती नहीं मन की मनवार बादळ्यां
जतनी-जतनी अरज करी चढगी गिगनार बादळ्यां
मरूथळ का भाग मैं कोई लिख दे दो च्यार बादळ्यां
जळ रै जळ धरती कतनां दन
पातदार होठ सीं रही फसल खड़ी!
देवदूत काळ को सगो खेतां की खणक लूटग्यो
बदरंगी भोर हो गई संझ्यां को धनक टूटग्यो
काळ-काळ-काळ कूकता कोयल को कंठ छूटग्यो
एक गंध घुटण सूं मरी पुरवा को सांस टूटग्यो
जळ रै जळ मोळाया बन
खेतां सूं छळ कतना दन
सपना संवळाता जावै घड़ी-घड़ी!
कांई होसी?
होठां की कोरां दांतां सूं पकड़्यांकांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
कांटां की डाळी मूठी मैं जकड़्यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
पाणी मैं रहणो, मंगर सूं झगड़यां
कांईं होसी?
दुनियां जाणै छै।
चन्दण का मूठ्या सूं माथो रगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
सूळां की क्यार्यां लागी
छनवाड़्यां का ओधक नीचा गेलां मैं।
गरमाई जागी-जागी
बहताळ्यां का आडा-ऊंळा रेला मैं।
दारू-बादळ का ऊंचा उठता धोरां मैं।
गळता की गांठ्यां गळगी
आसाढ़ां की काची-कोरो पोरां मैं।
भूल्या-बसर्यां पण गेला मैं बगड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
अधजळ गागर ढुळ-ढुळ ज्या
पणघट सूं पोळां आती पगडंडी पै।
डैंकड़ बैठै उड-उड ज्या
मंदरियां की ऊंची उडती झंडी पै।
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै?
हुळस-हुळस हिवड़ो हुळसै
पाटण की पैड़्यां बैठ्या पाखंडी को।
उफण-उफण ऊंचो उठतो
ऊंडो बैठ्यो भाव सांझ की मंडी को।
सूरज नैं आंख्यां सूं पकड्यां-पकड़्यां
कांई होसी?
दुनियां जाणै छै।
कतनी ई बार
हिया मैं हलोळां जद लेबा लागी हचकी,ओळ्यूं-दोल्यूं कानां मैं पड़ी थांकी टचकी,
भोळो-भाळो जीवड़ो पंख पसार,
उड़’र उतरग्यो डूंगर पार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार।
पहर्यो थांनै लहर्यो मन बादळी को ठहर्यो,
सरम्यां मरग्यो चांदो होस चांदणी नैं नंह र्यो।
आंख्यां की कोरां पै जद खींच्यो मोटो काजळ,
आंथूणी दिसा मैं भेळा होग्या संदा बादळ।
नथड़ी मैं नथ लीनो सारो तारामंडळ,
बाळां बीचै बांध्यो थांनै अंधेरा को जंगळ।
कांचळी की कसणां मैं डूंगर कसग्या।
छाना-मूना रह जावां जिया ईं समझा’र
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥
राखड़ी मैं राखी होगी म्हां को भी तो सीर,
नैणां मैं मंडी तो होगी म्हां की तसबीर।
हींगळू मैं उघड़्यो तो होवैगो म्हां को नांव,
मंहदी हाळा पगल्या आता होगा म्हां कै गांव।
आझंक्या मैं खुल-खुल जाती होंगी मीठी नींद,
पाका रंग का सांवरिया मन मोवन भोळा बींद।
घुटकां ले-ले पीता होगा बछोवां को जहर,
ढळती संझ्या, काळी रातां सातूं-आठूं पहर।
आंगणा का आता होगा पोळ नैं बच्यार।
कतनी ई बार, कतनी ई बार॥
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