प्रभाकर माचवे की कविताएँ : Prabhakar Machwe Kavita
प्रभाकर माचवे (1917–2001) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक, आलोचक और अनुवादक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़े प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने कविता, कहानी, निबंध और आलोचना सहित साहित्य की कई विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में बदलते समय, मनुष्य के अनुभव और जीवन की जटिलताओं को सहज भाषा में व्यक्त किया गया है। साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण हिंदी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
गेहूँ की सोच
प्रभाकर माचवे
काँप रहीं खेतों में गेहूँ की बालियाँमेंड़ पर बैठा है भूमिजन चिलम पीता, खाँसता।
सोचती हैं बालियाँ—
‘यहाँ से हमें तोड़-तोड़
बच्चे ले जाएँगे,
जलाएँगे होली में
(गाएँगे गालियाँ
बजाएँगे तालियाँ)
याकि हमें जोड़-जोड़
खेतिहर अनजान
बेचेंगे किसी लाभकर्मी निरे ख़ुदग़र्ज़ बनिए को
(बोवेंगे यह कपास, वह जूट; हाय हम में ही फूट!)
बहुत कुछ जाएगा लगान
कुछ जाएगी क़र्ज-क़िस्त
बाक़ी रह जाएगी—
झोंपड़ियों की उन भूखी अँतड़ियों के लिए सूखी
एक बेर रोटी—!
क्या यह नीति खोटी नहीं?
गेहूँ के मोती-से दाने जो पसीने से
उगाए, अरे बदे हों उसी के भाग
आँसू के दाने सिर्फ़!
सींचे वही ख़ून जो लगाए वह सीने से,
और आँख मीच खाएँ वे कि जिन्हें जीने से
उतरने में कीमख़ाब गड़ती हो...!
छिः ऐसे जीने से बेहतर नहीं है क्या
होली में जल जाना?
होली में जल जाना क्या है बुरा?
क्या हैं बुरी गालियाँ?
सोचती हैं बालियाँ...
जब तक नहीं आसान मिलती हैं तालियाँ
मानव के कोष-दोष-जन्य घोर असंतोष
संचय की,
विनिमय के वैषम्य के मदहोश तालों की।
देशोद्धारकों से
प्रभाकर माचवे
मृदुल नींद नीड़ की गोद मेंऔर परों की सेज नरम,
बाहर झुलसी हवा बह रही
रह-रह कर लू तेज़ गरम,
बाहर अर्धनग्न पीड़ा,
भीतर क्रीड़ा-लबरेज़ हरम,
करुणा के आँगन में, नेता,
दे थोड़ी-सी भेज शरम!
काशी के घाट पर
प्रभाकर माचवे
निशि मेघाकुल...अमित असित धूमिल मेघों से भरा हुआ नभ का पड़ाव
शशि की झिलमिल—
छोटी-सी लहरों में डगमग पथहीन नाव
किस मृगनैनी की चपल-चपल—
चितवन की सुधि से परिचालित युव-मनोभाव!
शशि न, किसी का दिल
रह-रह कस के, स्मर कर प्रिय का दुराव—
छिन में आलोकित हो उठती शत-शत तरंग
मन में आलोड़ित सौ उमंग, सिहरते अंग
उड़-उड़ जाते हैं सुधि-विहंग
कुछ दिशा-रहित, कुछ लक्ष्य-भ्रांत।
कुछ सखा-सहित, कुछ यों असंग—
सब ही अशांत;
ज्योत्स्ना का छिन में कुम्हलाता।
लहरिल सम्मोहक मदिर मान
जोगी हो मोहातुर गाता
मन में तुषार-मय विदा-गान :
‘प्रत्यक्ष भाव जब सपनों की संचित रुझान
जब बाँध रखे वक्ष से वक्ष
बाँहों में भर कर विकल बाँह
जाना था किसने नेह राह का
यह विषाक्त भवितव्य, आह!
बँधना प्राणों से मुक्त प्राण
है दक्ष-यज्ञ का संविधान
उर की ऊमा का लक्ष-लक्ष अंशों में पाना मरण-दान!
अब डोंगी भी हिल-डोल उठी, पाकर गंगा का दूर तीर
मनुआ अधीर, नयन के नीर से बोझिल गहरी बिसुध पीर
छितरा-छितरा-सा व्योमघाट पर छायाभा का अजब साथ—
आख़िर उर में भी डोल उठी, कुछ मावस, कुछ रुपहली रात!
छू चली पुरातन नेह-वात
रोमल हो उठे गात-गात।
टिम-टिम तारा ऊपर सभीत
खेया का कंपित-कंठ गीत
आ भर लें हिय में तुझे मीत
आ पास और उत्कटता से
उत्ताल लहर की मर्ज़ी पर
खो दें जीवन पल-कल्प-प्रहर;
एकांत सत्य बहते रहना—
निज बिथा किसी से क्या कहना?
सुधि-संबल ले चिर-एकाकी
बस सफ़र-सफ़र;
आ पास और तन्मयता से—
अब इन लहरों की मर्ज़ी पर,
मिल कर जीवन में जीवन-स्वर,
हो जाएँ अमर, निर्भर, अंतर
उत्ताल तरंगों की गति पर—
क्या पता कहाँ आना-जाना क्या कूलों की परवाह, पिया!
इस क्षण दो होंठों में गाना दो होंठों में हो चाह, पिया!
वह हिलराता मदमाता हो, मौजे लेता दरियाव, पिया!
मेघों में मुँह ढाँके मयंक, सुधि मन में गिनती घाव, पिया!
छलना
प्रभाकर माचवे
हेमंती संध्या है, सूरज जल्दी ही डूबा जाता है—मन भी आज अकारज चिर-प्रवास से क्यों ऊबा जाता है?
फ़सल कट गई, कहीं गड़रिया बचे-खुचे पशु हाँक रहा है,
सांध्य-क्षितिज पर कोई अंजन, म्लान-गूढ़ छवि आँक रहा है।
बचे-खुचे पंछी भी लौटे, घर का मोह अजब बलमय है,
मानव से प्रकृति की छलना, प्रकृति से मानव छलमय है!
मेघ-मल्लार
प्रभाकर माचवे
मालव की संध्याएँमेघल अवसाद-लदी!
कोमल-मधु-याद बँधी—
सजल, शीत, बह बयार।
मन का सब व्यथा-भार
बह चले निराधार
निराकार...
मन में सुधि उतर चली।
दूर-दूर की लहरी
व्यापक चली रोम-रोम।
आनत काली बदली
ज्यों दाहक चैत में भी
नाप रही पूर्व व्योम—
‘होम, स्वीट होम'!
मैं खींच रहा हूँ आज अकाज लकीरें
आ भर दे उनमें रंग-रूप तू पी रे!
मैं तालहीन स्वरहीन छेड़ता वंशी,
तू भर दे उसमें नाद-माधुरी धीरे!
कुछ रिक्त हो चली दुनिया मेरे मन-सी।
कुछ रिक्त हो चली जगती इस जीवन-सी
तुम निज आर्द्रा घिर-घर कर क्षण-भर छा दो—
संतुष्ट हो चले हिय की प्यासी हँसी।
तुम अलस-भाव से प्राण, मलार कँपा दो
जो बरस पड़े सहसा याँ सावन-भादों,
यों सरस हो उठे अवनि-दिशा-घर-अंबर
हो जाएँ एक सब बिछुड़ी तन-मनसा दो!
आपाट लगे... हो गई निहाल प्रतीची
उस क्षितिज-कोर तक गीली गुलाल सींची
किसी प्रतीक्षिता ने हेमल-रेखा खींची।
निज बिथा सघन, घन छोरहीन तू कह ले
करव-पंखी, किरमिजी, असित मटमैले
यक्ष के विधुर उच्छ्वास गगन तक फैले।
बदली-गुंठन में विस्तृत वन-गिरि आवृत
घन नील लेख से क्षितिज रेख भी संवृत
अग-जग में विश्रुत मात्र निदारुण निभृत।
गोधूलि मेघमय, सुधा-करुण यह वेला
घर विहग लौटते, तिमिर उरग भी फैला
जा रहा पान्थ अश्रांत अशांत अकेला।
कविता क्या है?
प्रभाकर माचवे
कविता क्या है? कहते हैं जीवन का दर्शन है—आलोचन,(वह कूड़ा जो ढँक देता है बचे-खुचे पत्रों में के स्थल)।
कविता क्या है? स्वप्न श्वास है उन्मन कोमल,
(जो न समझ में आता कवि के भी ऐसा है वह मूरखपन)।
कविता क्या है? आदिम-कवि की दृग-झारी से बरसा वारी—
(वे पंक्तियाँ जो कि गद्य हैं कहला सकती नहीं बिचारी)!
डरू संस्कृति
प्रभाकर माचवे
जो कुछ करना भाई वह सब करना, लेकिन डरते-डरते!जीना हो तो डरते-डरते, मरना लेकिन डरते-डरते!
प्रेम करो तो चोरी-छुपके, देख-फेंक कर दाएँ-बाएँ,
स्त्री से रति भी डरते-डरते (कहीं न आबादी बढ़ जाए)
दफ़्तर में अफ़सर से डरते, साहस कहीं भी न दिखलाओ
गाड़ी में ड्राइवर से डरते, चिकनी-चुपड़ी गाते जाओ!
कहीं तुम्हारे मित्र उभरते, कहीं तुम्हारे पुत्र उभरते,
हों तो उनकी सभी उमंगों पर डालो तुम पानी ठंडा
ध्यान रखो मुर्ग़ी बन पाए कहीं न यह इच्छा का अंडा!
कोई मिले अपरिचित चाहे, कर जोड़ो, जोड़ो दो बाँहें।
सभी धर्म हैं प्यारे रस्ते, नेता हैं साक्षात् फ़रिश्ते।
दीवारों पर टाँगो भैया, गांधी, शिवजी और सुरैया,
एक साथ ही एक पाँत में, तस्वीरों को करो नमस्ते!
साँसें लो डॉक्टर से डर के, रोटी लो बेकर से डर के!
वसंतागम
प्रभाकर माचवे
गा रे गा हरवाहे दिल चाहे वही तानखेतों में पका धान
मंजरियों में फैला आमों का गंध-ध्यान
आज बने हैं कल के ज्यों निशान,
फूलों में फलने के हैं प्रमाण!
खेतिहर लड़की की भोली-सी आँखों में, निंबुओं की फाँकों में
मुस्काता अज्ञान, हँसता है सब जहान,
खेतों में पका धान!
मधुऋतु रानी महान्,
मानिनी, बसंती रंग चोली झलके जिसकी,
ढलके आँचल धानी लहरा-सा,
आँखों में आकर्षण भी ख़ासा,
युग-युग का प्यासा-सा छलके दिलासा जहाँ,
उतरी उन सरसों के खेतों पर मायाविनि।
हल्के-हल्के-हल्के।
फूल में छिपे निशान हैं फल के।
उतरी वासंतिका,
तहलका-सा छाया तरु-दुनिया में, छुटा भान,
स्वागत में कोकिला का पिंडुकी का जुटा गान।
‘आशा ही आशा है'
आज अनिर्बंध, उष्ण, अरुण प्रेम-परिभाषा
पल्लव की पल्लव से सुरभिमय यही भाषा—
‘आशा ही आशा है...’
वासंती की दिगंत-रिनिनिनमयि शिंजनियाँ,
पड़ती जो भनक कान,
परिवर्तित लक्ष-लक्ष श्रुतियों में रोम-रोम,
पंखिल हैं पंचप्राण!
गा रे गा हरवाहे, छेड़ मन चाहे राग
खेतों में मचा फाग।
प्रेम : एक परिभाषा
प्रभाकर माचवे
प्रेम क्या किसी मृदूष्ण स्पर्श का भिखारी?प्रेम वो प्रपात
गीत दिवारात
गा रहा अशांत
प्रेम आत्मा-विस्मृत पर लक्ष्य-च्युत शिकारी।
प्रेम वह प्रसन्न
खेत में निरन्न
दुर्भिक्षावसन्न
सृजक कृषक खड़ा दीन अन्नाधिकारी।
वृष्टि
प्रभाकर माचवे
वर्षा,जिसने कर्षक को आकर्षा।
स्वस्थ, मस्त बूँदों ने आकर,
विपदग्रस्त धरती को स्पर्शा।
सहसा जलमय हुए झील, रत्नाकर,
नाले, नदियाँ, निर्झर!
यकसाँ जन-जन का मन हर्षा।
झरर-झरर-झर
ये संघर्षातुर झड़ियाँ, या
झन-झन-झन बजती-सी कड़ियाँ;
व्योम-समर-भू में झूमे जो
मत्त मेघ के महासैन्य को वाताहत करने को उद्यत,
धरती जिसकी लू से झुलसी थी
वह पुनः गुरिल्ला दल-सी—
बही हवा दुर्धर्षा!
ऐसी वर्षा!
हहर-हहर कर—
बाढ़ आ गई क्षुद्र पीन नद में भी,
ढहे कगारे जीर्ण-समाज-व्यवस्था-से, गतिहारे आदर्शों से।
गेहूँ-सा मटमैला फैला पात्र नदी का।
दूर-दूर तक इंक़लाब-से बद्दल जिनका पार न दीखा।
कीच मचा,
औ’
धारा जो कि स्वर्ग से गिरती
धारा आज धरा से मिलती, तभी उसे मिलता छुटकारा।
गर्म श्वास यों निकले नर्म रसा से—
निःक्षत्रिय करने को मानो आज उठ खड़ी
सरोष जनता ले कर फरसा,
ऐसी वर्षा!
राही से
प्रभाकर माचवे
इस मुसाफ़िरी का कुछ न ठिकाना, भइया!याँ हार बन गया अदना दाना, भइया।
है पता न कितनी और दूर है मंज़िल
हम ने तो जाना केवल जाना, भइया!
तकरार न करना जाना है एकाकी
हमराह बचेगा कौन भला अब बाक़ी
जब संबल भी सब एक-एक कर छुटता
बस बची एक झाँकी उन नक़्शे-पा की।
छुट चले राह में नए-पुराने साथी
मिट गई मार्गदर्शक यह कंपित बाती
नंगी प्रकृति वीरान भयावन आगे।
मैं जाता हूँ, आओ, हो जिस की छाती!
मैं और ख़ाली चा की प्याली
प्रभाकर माचवे
एकआज प्रात ही कुछ धुँधली है, पाटल कलिका की पलकों पर—पहली रिमझिम की बूँदें हैं। हरित, स्नात, चेतोहर कोंपल।वर्षा का दिन, बादल अनगिन, निरख रहा हूँ मलिन व अमलिनएक-एक छिन चुके सुखाशा के साथी, अब हूँ संगी बिन...मुझे कौन दे संजीवन? दिल का थाला कब से ख़ाली हैशून्य दिशाएँ आँधी-लक्षण, मैं हूँ, यह चा की प्याली है।बादल सागर की आशीषें, या कि धरित्री का प्रतिऋण है?करुण-सजल बातास, अकेलापन क्यों मानव को दारुण है?क्यों है दाहक चाह कि मस्ती में कोई सपना झकझोरूँक्यों यह नाहक़ राह सत्य की भाती नहीं, आह दिल चोरूँ?खिला बाग़ है, मिला चोंच, भीगे पर सिमटाए दो चिड़ियाँबिजली के तारों पर टप्-टप् टूट रहीं बूँदों की कड़ियाँ!आसमान है म्लान कहीं से सुनता हूँ भूपाली की गत...क्यों हैं ये दीवारें अधबिच? क्या था गत औ’ कौन अनागत!दोआधी जागृति, आधा सपना। मन में घुमड़न धूम मची रेसरिता तट पर सिकता फैली, रजत चाँदनी नरम बिछी रे!गत उत्कट है, भूखी-सी उस पार बज रही दूर नफ़ीरीउस गत में है बाट किसी की जोही गई व ठाठ अमीरीमैं अपने सूने कमरे में मोटे ग्रंथों में डूबा—जूझ रहा हूँ उस मस्तिष्क-प्रधान शिला से, कब ऊबा हूँ?क्या है ‘प्रमा', और क्या ‘मोनेड', क्या है यह।'अध्यास’, ‘प्रकृति’?क्या फ़िख्टे की अलग धारणा? ब्रैडले की मान्यता विकृति?सब मरुभूमि प्रायः लगते हैं बूढ़े, कुरूप ये दर्शन-गुरुबिस्मिल्ला ही ग़लत, न करते हैं क्यों शुरुआत जीवन से?सुरूँ की तरुधारा... ताज मंद-गंध, लोभान' रु अगुरुपुरूरवा मुझमें जागा है : विवस्त्र ऊरु तिर रहे मन में...‘छिः’ कोई आकर यों बोला ‘छाया है यह क्षणिक-शरीरी'फिर भी आन जुड़े थे होंठों से क्यों होंठ कभी वे शीरीं!तीनडाली-डाली पर कलियाँ हैं, उन्नत-भाल तमाल, चिर-हरे,पर्ण-वर्ण-संचय, फ़व्वारे, युक्लिप्टस के पेड़ छरहरे;उपवन ही ठहरा फिर क्यों न अनेकों होंगे वाँ ख़ुश-चेहरेपर इस चह-चह के पीछे है क्या कोई गहरे में ‘वह' रेजिस की विफल अनंत प्रतीक्षा में बैठा हूँ याँ एकाकीमाली आता है, सुगंध के रहने देता सुमन न बाक़ी।रूप-गंध का समाँ बँधा है, पर सब कुछ लगता जाली हैकिसने पेठ यहाँ अंतरतम की वह सचाई पा ली है?दूर दिशाएँ नहा रही हैं, झीना ‘जीवन-पट' छोड़ा हैबुद्धि-भेद की सीमाएँ हैं, दृष्टि-ज्ञान थोड़ा-थोड़ा हैकब तक मग़ज़ मारता बैठूँ तुमसे कांट और बोज़ाँ केतर्क घुला जाता है बाँके, उधड़ रहे सीने के टाँके...जीवन धोखा है, तो हो, यह प्यार कभी जोखों से ख़ाली?यह सब एक विराट व्यंग्य है, मैं हूँ, सच, औ’ चा की प्याली!बीसवीं सदी
प्रभाकर माचवे
बीसवीं सदी ने हमें क्या दिया?मोटर, रेल, विमान, क्रांतियाँ
यह बेतार, सवाक् चित्रपट,
काग़ज़-मुद्रा, आर्थिक-संकट,
गति-अतिशयता, वेगातुरता...
कहीं प्रपीड़न, कहीं प्रचुरता!
इन सारे आविष्कारों ने
जग को उन्नत किस तरह किया?
क्रय-विक्रय के संस्कारों ने
और आलसी हमें कर दिया।
बढ़ती शोषण-यंत्र-क्रिया
बीसवीं सदी ने यही दिया?
जबकि एक वाहन नवीन—
आया, त्यों, हो उसमें सवार
कितने समझे निज को कुलीन।
औ' श्रमिक बिचारा मलिन-दीन
हो गया हमें ही नागवार।
इसको ही संस्कृति-प्रगति कहा?
बीसवीं सदी ने यही दिया?
जबकि किसी के घर अनेक—
जलते हों विद्युद्दीप, देख!
तब होगी ही कोई कुटिया
जिसमें जलता होगा न दिया!
बीसवीं सदी ने यही दिया?
उन्मूलित कर दी दान-दया!
जब रूस विश्व के साम्य-राज्य
की करता इतनी बड़ी बात,
तब भारत में भी क्यों अनाज
भेजा? यह तो है सिर्फ़ स्वार्थ!
बीसवीं सदी ने यही दिया?
मानव को मानव का भक्षण
मानव को निज-संरक्षण का।
परवाना सबको बाँट दिया—
जीवन-संघर्ष बढ़ा याँ तक
उस हाथ दिया, इस हाथ लिया!
देखा न पुण्य अथवा पातक,
जिसने मारा, बस वही जिया।
बीसवीं सदी ने यही दिया?
पूँजी के युग का अस्तकाल,
यह है जब सुन लो यही हाल :
इक ओर पड़ेगा रे अकाल,
दूसरी ओर धन से बिहाल!
पूँजीशाही के अंतर्गत
बढ़ता जाएगा जब विरोध
आदर्श हो चले सब स्वर्गत,
वास्तवता का जग पड़ा बोध,
सबका ही पर्दाफ़ाश किया,
बीसवीं सदी ने यही दिया?
यहाँ मुक्ति की प्रबल चाह
प्रभाकर माचवे
यहाँ मुक्ति की प्रबल चाह है उसी एक दुर्दांत शक्ति की—हमें न कोई पनाह अथवा शरण चाहिए अंध-भक्ति की!
यहाँ सरल अंतर दो परस्परातुर, और चाहिए भी क्या?
हमें न किंचिनमात्र ज़रूरत किसी तर्क की, किसी युक्ति की
कापालिक
प्रभाकर माचवे
कापालिक हँसता है।पगले तू क्यों उस में फँसता है? रे दुनियादारी!
यह महीन मलमल की सारी
उसके नीचे नरम गुलाबी चोली से ये कसे हुए
पीनोन्नत स्तन
यह कुंकुम-अक्षत से चर्चित माथा, यह तन
किसी सुहागिन की अर्थी पर
बड़ी-बड़ी चीलों के मानो तीक्ष्ण चक्षु ये बसे हुए पर,
जीवन याँ सस्ता है
मरना यहाँ नहीं डँसता है
कापालिक हँसता है।
मरघट
औघड़ का मठ
चट-चट-खट-खट जलती हड्डी-मज्जा, झटपट
कुत्ते भौंक रहे हैं, हो-हो—
स्यारों की यकसाँ चिल्लाहट, छीन, औ' झपट!
नदी किनारा
डूब रहा सायं-तारा
चीख किसी पंछी की चीं-चीं
जिसके अंडों और घोंसले पर भूखे-से
किसी बाज़ ने छापा मारा।
क्या यों इकटक देख रहे हो
सुंदर सत्य तुम्हारा, वैसा
यही असुंदर सत्य हमारा।
परवशता है।
और नदी की धारा में भी, लो कृशता है,
मोह-छोह हमको ग्रसता है
कापालिक हँसता है।
यही प्यार की नाटक-भाषा
यही दिलजलों का न तमाशा!
मरी सुहागिन, दो दिन बीते
त्यों ही नए ब्याह की आशा?
पंछी चीं-चीं कर थकने पर
पुनः नया तरु
नया-नया घर, नवीन कोटर
यही तुम्हारी प्रामाणिकता?
जिसका अर्थ क्षणिकता।
सिकता-सिकता केवल सिकता
किसने पाया है रे ‘जीवन’?
वह तो ‘पारा'।
यहाँ आज सब कुछ है बिकता
हृदय और ईमान, देवता!
सब ममता की यहाँ दिखावट
शून्य, खोखली और बनावट।
सभी स्वार्थमय यहाँ बुलाहट,
किसने पाई सच्ची आहट...
किसने जाना वह रस्ता है
किसने पाया वह रस्ता है
कापालिक केवल हँसता है
अट्टहास करता है, आँखें लाल-लाल
चहुँ ओर डाल
हँसता है
कापालिक केवल हँसता है।
सॉनेट
प्रभाकर माचवे
मैंने जितना नारी, तुमको याद किया है, प्यार दिया है,तुमने भी क्या कभी भूल से सोचा था कैसा है यह मनु?
मैंने क्या अपराध किया जो तुमने यों इसरार किया है
जाने कैसे विद्युत्कर्षण से परसित है तन-मन-अणु-अणु।
तुम मेरे मानस की संगिनि, चपल विहंगिनि, नीड़ कि शाखा?
तुम मेरे मन की राका की एकमात्र नक्षत्र-विशाखा;
तुम हो मृगा या कि आर्द्रा हो? नहीं, रोहिणी, तुम अनुराधा,
तुम छायापथ, ज्योति-शिखा तुम, तुम उल्का, आलोक-शलाका,
संशय के सघनांधकार में विद्युन्माला अयि अचुंबिते!
तुम हरिणी, मालिनी, शिखरिणी, वसंततिलका, द्रुतविलंबिते
तुम छंदों की आदि-प्रेरणा, प्रथम श्लोक की पृथुल वेदना,
तुम स्रग्धरा या कि मंदाक्रांता, ओ आर्या, गीति स्तंभिते!
मैं गतिहारा यति-सा ग्रह से शून्य प्रभाकर, मैं वैनायक
तुम रागिनी और मैं गायक, तुम हो प्रत्यंचा मैं सायक!
चार और पंक्तियाँ
प्रभाकर माचवे
जब दिल ने दिल को जान लियाजब अपना-सा सब मान लिया
तब ग़ैर-बिराना कौन बचा
यदि बचा सिर्फ़ तो मौन बचा
रेखा-चित्र
प्रभाकर माचवे
संझा है धुँधली, खड़ी भारी पुलिया देख,गाता कोई बैठ वाँ, अंध भिखारी एक।
दिल का बिल्कुल नेक है, करुण गीत की टेक—
‘साईं के परिचै बिना अंतर रहिगो रेख'।...
(उसे काम क्या तर्क से, एक कि ब्रह्म अनेक!)
उसकी तो सीधी सहज कातर गहिर गुहार :
चाहे सारा अनसुनी कर जाए संसार!
कोलाहल, आवागमन, नारी-नर बेपार,
वहीं रूप के हाट में, जुटे मनचले यार।
रूपज्वाला पर कई लेते आँखें सेक—
कई दान के गर्व में देते सिक्के फेंक!
कोई दरद न गुन सका, ठिठका नहीं छिनेक,
औ’ उस अंधे दीन की रुकी न यकसाँ टेक—
‘साईं के परिचै बिना अंतर रहिगौ रेख!'
चार पंक्तियाँ
प्रभाकर माचवे
निर्जन की जिज्ञासा है निर्झर की तुतली बोली मेंविटपों के हैं प्रश्नचिह्न विहगों की वन्य ठिठोली में
इंगित है ‘कुछ और पूछ लूँ' इंद्रचाप की रोली में
संशय के दो कण लाया हूँ आज ज्ञान की झोली में।
अश्वत्थ
प्रभाकर माचवे
एकसंध्या की उदास छायाएँपीपल का यह सघन बसेरालौट रहा खग-कुल आकुल-मनकोलाहल मय प्रति कोटर-वनसुदूर एकाकी तारक ज्योंगीत अकेला-सा यह मेरा...दोभूरे नभ में रात उतरतीशिशिर साँझ की धुँधली वेलापीपल का विराट श्यामल वपुखड़ा हुआ कंकाल अकेलाएक चील का क्षीण घोंसलाक्षीण, तीज की पीत शशिकलाअटके हैं ज्यों जीर्ण देह मेंबचा मोह का तंतु विषैला।तीनमधु-ऋतु की सकाल अरुणालीउसी एक पीपल की झाँकीपुनः पनप कर हरी कोंपलों नेविवसन शाखें भी ढाँकींफिर से आ बसते हैं पाखीजग में लहरी नूतनता कीपर मैं वैसा ही बाक़ी हूँवैसी ही कड़ियाँ एकाकी।वह एक
प्रभाकर माचवे
वह एकमैला-सा कुर्ता पहने बेच रहा अख़बार :
'अरजुन, स्वराज, जन्मभूमि, आज, अधिकार—’
दो पैसे या कि चार-चार।
कहता है वह पुकार
आज चीन-जापान लड़ाई,
कल हिटलर की चढ़ाई,
और परसों श्री गांधी का उपवास...
वह क्या समझता है राजनीति? ख़ाक-धूल!
उसे क्या पता है यह फैला कहाँ तक है।
मैला जीवन-दुकूल!
उसको न परवाह कांग्रेस नैया की पतवार—
वाम-पक्ष पे है या हराम पक्ष पे है,
वह जानता है माहवार
तनखा साढ़े तीन कल्दार।
उसको हैं जिन्ना, बोस,
हिटलर, पटेल, घोष,
ये सब बस निरे नाम
उसका तो फ़क़त काम
चिल्लाना बार-बार
तीन मरे, दस घायल—
दंगा, बम फटे, या कल मर गए फ़लाँ-फ़लाँ।
यों ही चला करता है दुनिया का दौरान।
उसको न रंजो-गम उसको तो एक भान—
बेचना ये समाचार—
चाहे सम हो कि विषम!
वह एक मशीन
जिसमें इस दुनिया के गोले के प्रत्येक
कोने से आती जो ख़बरें हैं रंगीन श्री-हीन,
सब बनके अक्षर ढल जाती हैं, छप कर के जो निकलीं
लक्ष-लक्ष चक्षुओं से निगली गईं वे और
बिक भी गईं गली-गली में। कि चौबीस
घंटों के बाद पुनः बासी। यह खड़-खड़-खड़
दैनिक की ‘रोटरी' की प्यास बड़ी संगीन...
वह एक!
निम्न मध्य-वर्ग
प्रभाकर माचवे
नोन-तेल-लकड़ी की फ़िक़्र में लगे घुन-से,मकड़ी के जाले-से, कोल्हू के बैल-से।
मकाँ नहीं रहने को, फिर भी ये धुन से
गंदे, अँधियारे और बदबू-भरे, दड़बों में
जनते हैं बच्चे।
शहर की तमाम नालियों की जो सड़ाँध है
न घुस पाती इन के दिमाग़ में, नथुनों में।
पुर्ज़ों-से बेजान,
बीस-बीस पच्चीस
माहवार रुपयों पर जीते हैं।
इनके हैं कोई नहीं विश्वास अथवा मत।
जैसा कहा सबने, त्यों,
इनने भी गर्दन हिलाई,
पुनः कर्मरत।
इनके यों जीने में कौन-सा बचा मतलब?
आशा कौन-सी है इन्हें,
फिर भी ये जीते हैं,
उच्च-मध्यवर्ग की नक़ल करते
बोल-चाल, रहन-सहन, कपड़ों में रस्मों में।
लहू नहीं, गोमूत्र बहता इन जिस्मों में,
इसी से सदा डरते क्रांति में नवीनता से घबराते।
पीटते लकीर।
औ' मुहल्ले में इनके जो आता है
सदा देने बुड्ढा फ़क़ीर,
वह भी तो जानता है।
इनकी इस दासत्व-जर्जरित मनसा की नस-नस, सो
कहता है—‘काम में तरक़्क़ी हो,
ओहदा बढ़े,
कमाने वालों की ख़ैर रहे,
औलाद बढ़ती रहे,
मिल जाए पाव-भर आटा',
जबकि इनका ही
इस विराट आर्थिक विपन्नता की
चक्की में पिस-पिस कर
बन रहा महीन ख़ुद आटा है।
पालतू
प्रभाकर माचवे
पहले उसने पाले कुछ पिल्लेबड़े हुए, भाग गए;
पालीं कुछ बिल्लियाँ, वे
दोस्तों को दे दीं।
फिर पालीं कुछ लाल मछलियाँ,
वे मर गईं।
पाला एक तोता, जो उड़ गया।
जोड़े का एक बचा।
उठा गई मित्र की बिडाली उसे
पालने की यह आदत
कम न हुई।
सुना है कि आजकल, रखे हैं कुछ आदमी
पालतू :
फ़ालतू!
होगा क्या उनका?
(मार देंगे पड़ोसी के बड़े बम?
फिर भी नहीं होंगे कम)।