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प्रभाकर माचवे की कविताएँ : Prabhakar Machwe Kavita

प्रभाकर माचवे (1917–2001) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक, आलोचक और अनुवादक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़े प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने कविता, कहानी, निबंध और आलोचना सहित साहित्य की कई विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में बदलते समय, मनुष्य के अनुभव और जीवन की जटिलताओं को सहज भाषा में व्यक्त किया गया है। साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण हिंदी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। गेहूँ की सोच प्रभाकर माचवे काँप रहीं खेतों में गेहूँ की बालियाँ मेंड़ पर बैठा है भूमिजन चिलम पीता, खाँसता। सोचती हैं बालियाँ— ‘यहाँ से हमें तोड़-तोड़ बच्चे ले जाएँगे, जलाएँगे होली में (गाएँगे गालियाँ बजाएँगे तालियाँ) याकि हमें जोड़-जोड़ खेतिहर अनजान बेचेंगे किसी लाभकर्मी निरे ख़ुदग़र्ज़ बनिए को (बोवेंगे यह कपास, वह जूट; हाय हम में ही फूट!) बहुत कुछ जाएगा लगान कुछ जाएगी क़र्ज-क़िस्त बाक़ी रह जाएगी— झोंपड़ियों की उन भूखी अँतड़ियों के लिए सूखी एक बेर रोटी—! क्या यह नीति खोटी नहीं? गेहूँ के मोती-से दाने जो पसीने...