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दंडद्वीप में (कहानी) | Dandadveep Mein : फ्रांत्स काफ़्का

“कितना अद्भुत यंत्र!” अफ़सर ने कहा और यंत्र की ओर प्रशंसा से देखा। सैलानी कमांडेंट के अनुरोध पर आया हुआ था। एक सिपाही को, जिस पर अवज्ञा का आरोप था, मृत्युदंड दिया जा रहा था। कॉलोनी में किसी को इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। यही कारण था कि चारों ओर पहाड़ियों से घिरी उस रेतीली घाटी में, सिवाय इन चार व्यक्तियों—अफ़सर, सैलानी, सिपाही और क़ैदी के, और कोई नहीं था। क़ैदी एक बेवक़ूफ़ों जैसी शक्ल का आदमी था। उसका मुँह चौड़ा था और सिर के बाल खड़े हुए। उसकी गर्दन, कमर और घुटने ज़ंजीरों से जकड़े हुए थे। ज़ंजीर सिपाही के हाथ में थी। क़ैदी उस आज्ञाकारी कुत्ते की तरह दिखता था, जिसे पहाड़ियों पर घूमने के लिए छोड़ा जा सकता था और दंड के वक़्त सीटी देकर वापस बुलाया जा सकता था। सैलानी को यंत्र में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह उदासीन भाव से क़ैदी के चारों ओर चक्कर काट रहा था। उतनी देर में अफ़सर ने यंत्र का निरीक्षण पूरा कर लिया। जो काम किसी मिस्त्री से कराया जा सकता था, वह काम वह ख़ुद करता था। शायद इसलिए कि वह यंत्र का दिली प्रशंसक था। या शायद इसलिए कि इतना महत्त्वपूर्ण काम किसी और के ज़िम्मे नहीं छोड़ा जा ...