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नारंगी की ख़ुशबू (कहानी) | Naarangee Ki Khushaboo : तलत सकैरिक

कोई नहीं हिसाब लगा पा रहा था उसकी बची हुई साँसों का और न ही समझ पा रहा था उन आँसुओं को जो लगातार उसकी आँखों से बह गालों पर फैल रहे थे! सिर्फ़ अब्दुल खैर स्वयं महसूस कर रहे थे कि अब उसकी ज़िंदगी के कुछ पल ही बचे हैं। जबकि डॉक्टरों ने उसकी पत्नी को आश्वासन दे रखा था कि वह जल्द ही ठीक हो जाएगा। अब्दुल खैर गहरी सोच में डूबा हुआ था। उसकी ज़िंदगी के पेड़ की पत्तियाँ झड़ चुकी थीं, आख़री पत्ती भी डाल छोड़ने वाली थी। यह उसे साफ़ नज़र आ रहा था! वह किस लिए रो रहा था, उसको बयान करना बचे हुए लम्हों में कठिन था। अब्दुल खैर ने अपनी आँखें बंद कर ली। पत्नी, बच्चों और रिश्तेदारों की शक्लें धुँधली पड़ने लगीं! वह धीरे से बुदबुदाया। “तुम में से कौन है, जो मेरे लिए नारंगी ला सकता है?” “लेकिन बाबा...” सभी उसकी इच्छा सुनकर चकित रह गए। केवल बड़ा बेटा हिम्मत करके बोला तो उसकी बात बीच में ही काट कर उसने कहा— “मैं जानता हूँ कि यह नारंगी का मौसम नहीं है, लेकिन मुझे नारंगी चाहिए। मेरे लिए बिना नारंगी के मरना मुश्किल है।” सभी ने गर्दन और हाथ हिलाए और नहीं समझ पाए कि सत्तर वर्ष के इस बुजुर्ग को नारंगी क्यों चाहिए...