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घटा (कहानी) | Ghataa : मार्टी जोनपोल्वी

अगस्त से वह असंतुष्ट था, जबकि उस महीने से मालूम नहीं क्यों उसे सबसे ज़्यादा उम्मीदें थीं। महीने की शुरुआत बरसाती थी। केवल पूर्णमासी के बाद दिन बड़े, स्वच्छ और नीले हुए। एक समतल रेल यार्ड से रेलवे लाइन चट्टानों को काटती हुई जाती थी। उत्तरी छोर के क्षितिज पर एक बड़ी घटा बढ़ी आ रही थी। अजीब प्रभाव था—बादल का तना एक अनगढ़ पकड़ में जकड़ा लगता था, मानो वह बहुत नीचे चला गया हो और चट्टानों के कटाव में फँस गया हो। उसने उसे घूरा। ऐसा लगा, मानो वह बादल की झुर्रीदार बाज़ू पर कोई काला दाग़ देख रहा हो। उसके चारों ओर की हवा विरल हो गई, उसे चक्कर आने लगे, साँस लेना कठिन हो गया। अनुभव तेज़ी से एक धुँधली संवेदना में बदल गया। झुर्री की ओर का बादल का धब्बा ग़ायब हो गया था, उसकी एक फ़ीते जैसी पूँछ निकल आई थी और नज़रों से ऐसे ग़ायब हो गई थी, जैसे कोई ग़लत चित्र रेटीना से ओझल हो जाता है। काफ़ी दिनों के बाद उसे मुक्ति का ऐसा अनुभव हुआ, पता नहीं कब और कहाँ से—यह केवल एक संवेदना थी, अनुभूति का बचा हुआ एक अंश, उस क्षण से उपजा, या फिर सारी ज़िंदगी से। उसने सोचा कि घटा की ऊपरी परत से शायद सुदूर आने वाले पतझड़ को...