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वैतरणी (कहानी) | Vaitaranee : मिलोवन जिलास

एकबारगी यह समझ पाना संभव नहीं था कि क्या हुआ और कैसे हुआ कि दोनों बहनें—एलिज़ाबेथ और कैटरीना पूरे तीस बरस तक कस्बे के बाक़ी बाशिंदों से और तकरीबन हर प्राणी से एकदम कटकर अलग-थलग ज़िंदगी बसर करती रहीं। दोनों बहनें किसी बड़े ज़मींदार की बेटियाँ थीं और आलम यह था कि प्रथम विश्वयुद्ध से पहले, आस्ट्रिया-हंगरी युग में, अभिजात वर्ग के लोग और बड़े-बड़े अफ़सर-अहलकार तक इनके तलुवे चाटने को उद्यत रहते थे। हालाँकि वे अपनी ख़ूबसूरती की बदौलत कम, कुलीन घराने में जन्म लेने और अपनी धन-दौलत की वजह से ज़्यादा जानी जाती थीं। सुनते हैं कि कभी इनकी मँगनी भी हुई थी, लेकिन पुराने राजतंत्र ने अंतिम घड़ियाँ गिनते हुए जितने मोरचे खोले थे, उनमें से किसी मोरचे पर इनके मंगेतर खेत रहे थे। सो, दोनों बहनें युद्धकाल में अपनी जातीय-प्रथा के अनुसार, सामाजिक प्रतिष्ठा और शिक्षा-दीक्षा की लाज रखते हुए और वैधव्य की-सी पीड़ा झेलते हुए सतवंती नारी की तरह दुनिया-जहान से कटकर जीवन व्यतीत कर रही थीं। क़स्बे के लोग तो उन दिनों भी यह मानते थे कि ये बहनें एक-दूसरे से कभी जुदा नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे दो देह, एक प्राण थीं ‘दो बहनें’...