एक आदमी ने राजा का दरवाज़ा खटखटाया और कहा, ‘मुझे एक नाव चाहिए!’ राजा के महल में कई दरवाज़े थे। आदमी ने जिसे खटखटाया, वह याचिकाओं वाला दरवाज़ा था। राजा अपना सारा वक़्त तोहफ़ों वाले दरवाज़े पर अपने लिए आने वाले तोहफ़ों के बीच गुज़ारता था। इस व्यस्तता के चलते जब भी उसे याचिकाओं वाले दरवाज़े पर किसी के खटखटाने की आवाज़ सुनाई देती तो पहले वह उसे अनसुना करने की कोशिश करता, लेकिन जब खटखटाहट बंद होने की जगह कानों के पर्दों को फाड़ना शुरू करती और आस-पड़ोस के लोगों की नींद में पड़ता ख़लल बदनामी का कारण बनने लगता (कैसा राजा है यह, जो अपना दरवाज़ा तक नहीं खोलता, लोग झल्लाकर कहते), तब उस शोर से निजात पाने का कोई और रास्ता न पाकर राजा अपने प्रथम सचिव को बुला भेजता कि जाकर पता लगाओ, फ़रियादी को क्या चाहिए? प्रथम सचिव फ़ौरन द्वितीय सचिव को आवाज़ देता, द्वितीय सचिव तृतीय सचिव को, तृतीय सचिव अपने प्रथम सहायक को आदेश देता, जो तुरंत द्वितीय सहायक पर हुक़्म चलाता और इस तरह पदानुक्रम से आदेश नीचे चलता हुआ बेचारी सफ़ाई-पोछे वाली औरत तक पहुँचता, जो बहरहाल किसी और को हुक़्म न दे पाने की मजबूरी में अधखुले किवाड़ क...