घुड़दौड़ के मैदान के सामने से निकलने वाली सड़क की शुरुआत की वह हरे रंग की इमारत कभी इलाक़े का सबसे भव्य घर था। इधर कुछ वर्षों से सीमेंट की इमारतें खड़ी हो जाने पर अब उस घर की वह भव्यता जाती रही थी। उसकी पहचान अभी भी बनी हुई थी। वक़्त के साथ उदास पड़कर फाटक पर उसका नेमप्लेट आज भी अपनी पहचान इन दो शब्दों में लिए हुए था, “अपना जहान”। अपने परिवार को भी दाऊद ने हमेशा अपना जहान माना था। और आज भी इलाक़े के लोग उसे दोमंज़िला ही कह जाते थे। गाँव की अपनी ज़मीन और अपने घर को बेच कर दाऊद सुलेमान इसलिए शहर आ गया था, ताकि उसके दोनों लड़के गाँव के पिछड़े पड़े लड़कों से अपनी अलग पहचान बना सकें। शां-दे-मार्स के सामने की कोर्दरी गली में ज़मीन ख़रीदने से पहले जब उसने मरियम से कहा था कि बच्चों के हित के लिए अब उन लोगों को शहर में जा बसना चाहिए तो उसकी पत्नी तैयार नहीं हुई थी। बोली थी— —ना बाबा, हम शहर में नहीं ना रह सकब। हुवाँ के लोगन के त ज़बान ही हमार समझ में ना आवेला। दाऊद सुलेमान को अपनी भोली-भाली बीवी को समझाने में तीन दिन लग गए थे। बाद में मरियम को अपनी खाविंद की यह बात जँच गई थी कि वहाँ के लोगों...