सुबह ही-सुबह इधर अख़बार वाले ने अख़बार फेंक़ा उधर ख़्वाजा साहब ने दरवाज़ा खटखटाया। “करामत मियाँ, अख़बार आ गया...।” “जी, आ गया है। आइए, तशरीफ़ रखिए।” यह मेरे नाश्ता करने और दफ़्तर जाने का वक़्त होता है। हमारा ड्राइंग और डाइनिंग कम्बाइंड है। इधर मैं बेगम के साथ मिलकर नाश्ता कर रहा हूँ, उधर ड्राइंग-रूम में ख़्वाजा साहब अख़बार पढ़ने में व्यस्त हैं। “ख़्वाजा साहब, आइये, नाश्ता कीजिए।” “बेटे बिस्मिल्लाह करो।” “नाश्ता नहीं करते तो चाय ही पी लीजिए। ” “नहीं, बेटे मैं तो बस अख़बार पर एक नज़र डालने के लिए आया हूँ।” “वह ठीक है, मगर साथ में चाय भी हो जाए तो क्या हर्ज़ है? कोई अजनबियत तो नहीं है। “बेटे, मैं—इस घर में ख़ुदा अपनी रहमतें निछावर करे—सैयद साहब के वक़्त से आ रहा हूँ। अब तुम उनकी निशानी हो भला तुमसे अजनबियत बरतूंगा।” बजा कहा! असल में तो वालिद साहब से उनकी दोस्ती थी। जाड़े-गर्मी, बरसात, रोज़ सुबह को दरवाज़ा खटखटाना, उनके पास बैठकर अख़बार पढ़ना, बातें करना और चले जाना। मगर उनके इंतकाल के बाद भी वह शिष्टाचार बना रहा। उसी तरह सुबह को आकर अख़बार पढ़ना और चले जाना। बाक़ी किसी बात से मतल...