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सिग्नल मैन (कहानी) | Signal Main : चार्ल्स डिकेंस

“हैलो? वहाँ नीचे!” जब उसने पुकारे जाने की आवाज़ सुनी, वह अपनी छोटी-सी कोठरी के बाहर खड़ा था, उसके हाथ में झंडी थी। जहाँ वह खड़ा था वहाँ से बिना किसी शंका के यह समझना बेहद आसान था कि आवाज़ कहाँ से आई है, पर फिर भी ऊपर देखने की बजाए, जहाँ ठीक उसके सिर के ऊपर एक नोकदार चट्टान पर मैं खड़ा था, वह घूमा और नीचे रेलवे लाइन की तरफ़ देखने लगा। उसकी इस हरकत में कुछ ख़ास था, पर क्या यह मैं समझ नहीं पा रहा था? जिस नुकीली चट्टान पर मैं खड़ा था उसकी आड़ में वह ढँक-सा गया था और मुझे भी आग उगलते सूरज से बचने के लिए आँखों को हाथ से ढँकना पड़ा, उसके बाद ही मैं उसे देख सका। “अरे भाई! ज़रा सुनो तो?” वह रेलवे लाइन की तरफ़ देख रहा था, वह मुड़ा और उसने आँखें उठाईं तो ठीक अपने ऊपर मुझे खड़ा पाया। “ ‘क्या, कोई रास्ता है जिससे मैं नीचे आकर तुमसे बात कर सकूँ?’ कोई जवाब दिए बग़ैर वह मुझे देखता रहा और मैंने भी अपनी बात दोहराई नहीं और उसे देखता रहा, तभी ज़मीन और हवा में एक अस्पष्ट-सा कंपन हुआ, जो तत्काल तेज़ स्पंदन में बदल गया और फिर तेज़ी से सरपट भागती ट्रेन वहाँ से गुज़री, मैं झटके से पीछे हटा, मानो वह मुझे ...