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मिलन शून्य में (कहानी) | Milan Shoony Mein : नदीन गोर्डिमर

रोज़ सवेरे उसे भेजा जाता था बेकर की दुकान पर। गाँव की बिल्लियों की तरह काली-काली दीवारों में से निकल कर बाहर आ जाते थे वे काले उपनिवेशी फ्रेंच बच्चे जो उसके क़दमों के निशानों पर क़दम रख कर उसका पीछा करते थे। वह यह तो नहीं समझ पाता था कि वे बच्चे क्या बातें करते थे, मगर वह उनकी हँसी को समझ लेता था और मान लेता था कि वे उसे एक अजनबी की तरह देख रहे हैं। घर से निकलते ही, हर गली, हर दरवाज़े, हर पगडंडी पर चलते-चलते, पीछे मुड़कर वह अधडरी मुद्रा में देखता और उन बच्चों की अनचाही उपस्थिति से घबराया डरी-डरी नज़रों से यह भाँपने की कोशिश करता कि आख़िर वे ऐसा क्यों करते हैं? बच्चों ने बेकर की दुकान तक उसका पीछा नहीं किया। शायद बेकर उन बच्चों को अपने तक आने ही नहीं देता था। वे बच्चे बड़े ग़रीब दिखते थे और उन्हें मालूम था कि बेकर उन्हें एक प्रकार का चोर मानता था, ऐसा चोर, जो घर पर पड़े काले नीग्रो शिशुओं के लिए ब्रेड चुराया करते थे। वह अपने दक्षिण अफ़्रीकी घर से कभी बेकरी पर नहीं गया। वहाँ तो एक काला बेकरी वाला साइकिल की घंटी टनटनाता गली के भौंकते कुत्तों से डरता-बचता यार्ड में आता था और एक सफ़ेद और एक ब...