एक अचंभा अैसा देख्या संत पीपा एक अचंभा अैसा देख्या। सोतत रे काहू बिरलै पेख्या॥ नाद ब्यंद थै रहै नियारा। सो पद परमत भया उजियारा॥ त्रिकुटी मध्य ज्योति जे कहिये। ताहू थैं अगम अगोचर लहिये॥ त्रिबिधि थान त्रिदेव थैं रहिता। त्रिगुण अतीत निरंतर रमता॥ जन पीपा सतगुरि बलिहारी। जाके सबदौं मिल्यों हो मुरारी॥ संतो एक राम सब माही संत पीपा संतो एक राम सब मांही। अपने मन उजियारो, आन न दीखे काही॥ एकै चाम रूधिर अर सांसा, छोट मोट तन मांही। एकै मारग तैं सब आया, एकै मारग जाही॥ एकौ मात पिता सबही के, विप्र छुद्र कोई नांही। पीपो जो जन भरम भुलाने, तैं ढुलरात सदा ही॥ जियरा करि रे कोई उपाया संत पीपा जियरा करि रे कोई उपाया। जाथै बेगि मिले राम राया॥ खणि-खणि मूली खाइये। भ्रमि-भ्रमि तीरथ न्हाइये॥ कोटि बैद संगि फिरिये। तऊ देखता मरिये॥ केई राजा केई राना। केई पाति साह सुलताना॥ बहुनाइक जौ फिरिये। तऊ देखता मरिये॥ ऊँचा कोट मरोड़ा। तहाँ नहीं धन तोड़ा॥ दरि बघिलै घोड़ा हाथी। तेरे संगि न आवै साथी॥ पीपौ प्रणवै अंतर्जामी। तूं जनमि-जनमि मैरो स्वामी॥ मेहि जनम का पासा। तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥ देव भ्रमतौ-भ्र...