एक अचंभा अैसा देख्या
संत पीपाएक अचंभा अैसा देख्या।
सोतत रे काहू बिरलै पेख्या॥
नाद ब्यंद थै रहै नियारा।
सो पद परमत भया उजियारा॥
त्रिकुटी मध्य ज्योति जे कहिये।
ताहू थैं अगम अगोचर लहिये॥
त्रिबिधि थान त्रिदेव थैं रहिता।
त्रिगुण अतीत निरंतर रमता॥
जन पीपा सतगुरि बलिहारी।
जाके सबदौं मिल्यों हो मुरारी॥
अपने मन उजियारो, आन न दीखे काही॥
एकै चाम रूधिर अर सांसा, छोट मोट तन मांही।
एकै मारग तैं सब आया, एकै मारग जाही॥
एकौ मात पिता सबही के, विप्र छुद्र कोई नांही।
पीपो जो जन भरम भुलाने, तैं ढुलरात सदा ही॥
जाथै बेगि मिले राम राया॥
खणि-खणि मूली खाइये।
भ्रमि-भ्रमि तीरथ न्हाइये॥
कोटि बैद संगि फिरिये।
तऊ देखता मरिये॥
केई राजा केई राना।
केई पाति साह सुलताना॥
बहुनाइक जौ फिरिये।
तऊ देखता मरिये॥
ऊँचा कोट मरोड़ा।
तहाँ नहीं धन तोड़ा॥
दरि बघिलै घोड़ा हाथी।
तेरे संगि न आवै साथी॥
पीपौ प्रणवै अंतर्जामी।
तूं जनमि-जनमि मैरो स्वामी॥
मेहि जनम का पासा।
तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥
सरणाई बिजै पंजर, सखि रामइया वाई॥
लोह कौ साँकल पाई तूटै हो घण दै धाइ।
मोह कौ साँकल कैसे तूटै हो रामइया राई॥
देखी विद्या देख्यौ दान, देखी काया कृतम तन।
साधु संगति बिन मेरौ, कहीं न मानै मन॥
देख्यौ पुनर देख्यौ पाप, सकल जग देख्या संताप।
प्रणवत पीपौ नरहरि, उद्यमी लै आयै आए॥
तौ लोक बेद अरू कलिजुग मिलि करि भगति रसातलि देते॥
आगम-निगम कहत ए पांडे, फल भागौत लगायौ।
रजस-तामस-सातिग कथि-कथि, यूँ यहु जगत भुलायौ॥
बकता सुरता दोन्यूँ भूले, दुनिया सबै भुलाई।
कल्पवृच्छ की छाया बैठे, तौ क्यूँ न कल्पना जाई॥
सर्गुण कथि-कथि मिष्ट खवाया, काया रोग बढ़ाया।
निर्गुण नींव पिया नहिं गुरगामि, यूँ अटकी जीव विकाया॥
अंध लकुटिया अंध गही है, परत कूप कत थोरै।
अबरण बरण दुइै रस अंजन, आँखि सबनि की फौरे॥
हमसे पतित कहा कहि रहते, कौण प्रतीति मन धरते।
नाना बाणी देखि सुणि श्रवननि, बहु माराग अनसरते॥
करि हरि भगति, भगति कण लीना, त्रिविध रहित थिति मोहे।
पाखंड रूप भेष सब कंकर, ग्यान सूपक सोहे॥
तिरगुण रहित भक्ति भगवंतहि, बिराला कोई पावै।
दया होई जौ कृपा नाथ की, तौ नाम कबीरा गाई॥
भगति प्रताप राखिऐ कमनि, निज जन आप पढ़ाया।
नाम कबिरा साच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया॥
कै म्हारे मंदिर बसौ, कै ले चालौ लार॥
जे तू आयो पाहुनौ, महा अधिक रंगि राच।
निरति निकालू ह्यो रह्यो, कहूँ देख्यो जात॥
आस्यां अर फिर ज्यासां, रहस्यां धरि धरि वारि।
चोरी को चाकर क्यूं रहे, या प्रीतड़ी निवारी॥
सतरा विधि भोजन कियो, इमरत किया आहार।
तऊ न थिराना पाहुना, अंत काल की बार॥
जन पीपा की विनती, जे जन सदा सचेत।
बहुरि न जग में आवसी, ज्यों हरी सूं लायो हेत॥
भोजन बिना पखावज बाजै नाद न रीझै कोई॥
आठ अबारी आठ सवारी, सौलह दै गोपाला।
इतना मोही एक घटावै, आलै धारी माला॥
सावन लाडू सेव सुहाली, लापसड़ी पच धारी।
इतना देस्यो देव दया करि, तो होसी भक्ति थारी॥
रोटी बिना न रंग रहे माधो, पाखंड लोग पतीजे।
पीपा कहे सुन अंतरयामी, भक्ति अखंड मोहि दीजै॥
बीज मांहि ज्यों बिरछ दिखे, बिरछ मांहि ज्यों छाया॥
नी मांहि ज्यों सुन्न देखिये, सुन्न अनंत आकास।
निअच्छर से अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा।
रखे मोहिं ज्यों किरन दीखे, किरन मांहि परकासा।
जैसे जीव ब्रह्म परमातम, जीव मांझ ज्यो धांसा।
सांसा माहि सब्द पर मीटें, अरथ शब्द के माहिं।
ब्रह्म से जीव, जीव से ब्रह्म, यों पीपै लगा सदा ही॥
एक लै आनंद होई मंझा देवा॥
छेही द्रुमति और की आसा।
सैइलै गौव्यंद राई चरण निवासा॥
नारी कौ सेवग नरक दुवार।
आतम एक न ग्यान बिचार॥
इहि उनमान जपै जन पीपा।
तार्यो त्रिलोचन नामदेव छीपा॥
रंक बापड़ो रतन पायो।
हेत करि-करि हिरदै लायो॥
पाँच पदारथ हीरे जड़िया।
प्रणवै पीपा हाथि चढ़ियाँ॥
अंबरीश धू नारद साषी॥
जौ तुम्ह गिरवर तो मैं मोरा।
जौ तुम्ह चंदा राम तौ मैं चकोरा।
जे तुम सरवर तौ मैं मंछा।
जे तुम गऊ राम तौ मैं बच्छा॥
जौ तुम तीरथ तौ मैं जांही।
जे तुम देवा राम तौ मैं पाती॥
पीपा प्रणवै अंतरजामी।
मैं तेरौ सेवग तूँ मैरौ स्वामी॥
इण घट अंदर सात समन्दर, इण में नव लख तारा रे॥
इण घट अंदर अणहद गूंजे, इण में सब संसारा रे।
पीपा के तो घणो भरसो, इण भज सांई म्हारा रै॥
तहाँ सखि जहाँ तेरे पाई॥
अलख निरंजन निर्मल हरी।
तहाँ राखि जहाँ निर्मल पुरी॥
सकल निरंतर सब घटि स्वामी।
अंतकालि हरि अंतर्जामी॥
पीपौ प्रणवै परम निधान।
भक्ति च्यंतामणि द्यौ हरिदान॥
जिनि भजे हरि चरण जीते चार पौबरण, जाकी जाति अछोप छीपा।
ब्यास में लेखिये सनक में पेखिये, नामा की नामना सपत दीपा॥
जाकै ईदि बकरीद गऊ रह वध करै, मानिये सेख सहींद पीरा।
बापि जैसी करी पूत्य अैसे धरी, नाँत नवखंड प्रसिद्ध कबीरा॥
जाके कुटंब के ढेढ ढोर ढोवत फिरै, अजहूँ बनारसी आसपासा।
षटक्रम सहित बिप्र डंडबत करै, प्रगट नीसाण रैदास दासा॥
जपत जे नरा चरन कँवलापति, तास समतुलि नहीं आन कोई।
आप है एक अनेक हेतु बिसतर्यो, आंति एक कौ एक सौई॥
दसूँ दिस धाई जस रहया भरपूरि कारि, कौण मारग गये खोज पाँऊ।
दास पीपा कहै कठिन कलिकाल में, भगत भगवंत भजि पार पाँऊ॥
आप ही ब्रिछ बीज अंकुरा, आप फूल फल छाया॥
आप ही सूरज किरन परकास्या, आप ब्रह्म जीव माया।
अंत अनंत सुन्न नभ आपै, साँस सबद अरथाया॥
मच्छर निसाचर सच्छर आपे, आपै जग जीव समाया।
अलख सलख सब एकौ सांई, सारा जग भरमाया॥
आतम में परमातम दीखै, छाया मांहि माया।
छाया माया आपै सबहि, पीपे सांच लखाया॥
सब जग राख्यौ माया बांधी॥
ना को पुरिष नहीं को नारी।
ना कोई दाता ना कोई भिखारी॥
ना कोई रांक नहीं को राना।
लघु दीरघ झूठ करि जाना॥
प्रणव्रत पीपा सब जग पेख्यां।
बाजीगर अभि अंतरि देख्या॥
गगन गंगा भवन गंगा, विविध गंगा नाराइण संगा॥
अढ़सठि तीरथ जीवन चंगा, राम के नाँइ परवाल ले अंगा।
पीपौ कह जोगेसुर सोई, मुखि हिरदै जाकै ऐकै होई॥
नर देही सुमरन कू दीन्ही, मों पापी ते कछु न सरी॥
गरभवास दस मास अधै मुख, तहाँ न मेरी सुध बिसरी।
पावक जरत राखी हरि लीन्हे, जहाँ ऐसी कंचन देह धरी॥
गुरु प्रताप साध की संगत, इन मिली मेरी धीर धरी।
नहीं तो इत फारि मोही खाते, बांटि लेत जम डरी डरी॥
बरनौं कहाँ पाप बहु कीन्हैं, आदि अंत सूं देह भरी।
पीपो पतित पावन तुम, बांह गहे की लाज हरी॥
आवागमन विद्या मेरे तन की, हरि बिन कौण छुड़ाई॥
जोनी फिरै ताहि नाहिं पूजौ, जपूँ अजोनी संभा।
चंद सूर दोई दीपक जोया, गगन रच्या बिन थंभा॥
मनि हरि जान्या हरि मन जान्या, पूरब प्रीति सगाई।
हरि रंगि राच्य रस्या मेरा मन, सो रँग कबहुँ न जाई॥
मन की चिंता सबही डहक्या, भरम भूत होइ लाग्या।
पीपौ कहैं सकल जग सोई, हरि सुमिरै ते जाग्या॥
सीख हमारी मानि लै, हरिभज जनम सुधारि॥
हाथी घोड़ा गाँव गढ़ डूंगर, सत द्वारे धन धाम।
थामैं जिवडी घालि कैं, तैं भज्यों न राजा राम॥
मुलमुल कागा पहन तो, चलतो घुड़लां री जोड़ी।
अंतकाल जम आय पहुँचो, राख्यों तिणा ज्यूं तोड़ी॥
सुबुधि बुहारि हाथिलै, कुबधि जोड़ो झारी।
पीपो कहै म्हारी आतमा, तू राम रतन उर धारी॥
कायागढ़ खोजताँ मैं नौ निधि पाई॥
काया देवल काया देव, काया पूजा पाती।
काया धूप दीप नइबेद, काया तीरथ जाती।
काया माँहे अड़सठि तीरथ, काया मांहै कासी।
काया माँहे कँवलापती, बैकुंठबासी॥
जे ब्रह्मंडे सोई प्यंडे जे खौजै सो पावै।
पीपौ प्रणवै परमतत्त रे, सतगुरू मिलै लखावै॥
सर्वजीव में तू ही व्यापक, ताकौं मैं नहीं तोड़ो॥
बिनसि जाई ताको नहीं पूजो, अबिनासी नहीं पाँऊ।
बैदौ थरपि देहु रै आण्या, ताको मैं नहीं ध्याऊँ॥
सालिगराम न पूजौ स्वामी, यहु तौ देव न होई।
सो पूजौ जो रहे निरंतरि, अविगत लखै न कोई॥
अलख निरंजन तू अबिनासी, तेरी गति किनँहु न जानी।
पीपा पूजि जगणीना, के पाथर के पानी॥
भूपति भोपाल ग्वाल, मीर मलिक होते॥
जाकै बाई आनि तेज पवन चलते दल भारी।
लंकापति हारि गयौ, रावण सौ अहंकारी॥
ममता गति वोट कीन्ही, खेल पसार्यो माया।
भर्म जड़ी वाइ डोरू, बीजागर बाया॥
लखा खोहणि खीजि गए, कैरो पांडौ लड़ते।
बसुधा किनी न जीतो पीपा, दोउ गरब करते॥
तू काहू कौ ना को तेरा, ज्यूँ उपना त्यूं खीणा॥
राजपाट अबला बहुतेरी, होत घोड़ा हाथी।
परमहंस जबकिया पयाना, बिरचि रहे सब साथी॥
जे नर छाँह छत्र की चलते, दुनिमान महिराणा।
नवणि कंरते जालण लागे, जब तन भया बिराणा॥
पीपा कहै पदारथ पाया, अंध न देखै कोई।
इम्रत नाम राम का मीठा, मै पीउंगा रस सोई॥
नहिं तो जन्म वृथा जगि भरना॥
जा दिनि भजसि गोव्यंद नामा।
ता दिन प्रान पतन करि रामा॥
आप उधारि लै यहु मत नीका।
राम नाम जपि रे प्रणवै पीपा॥
सीख हमारी मानि लै, हरिभज जनम सुधारि॥
हाथी घोड़ा गाँव गढ़ डूंगर, सत द्वारे धन धाम।
थामैं जिवड़ौ घालि कैं, तैं भज्यों न राजा राम।
मुलमुल कागा पहन तो, चलतो घुड़लां री जोड़ी।
अंतकाल जम आय पहुँचो, राख्यों तिणा ज्यूं तोड़ी।
सुबुधि बुहारि हाथिलै, कुबधि जोड़ो झारी।
पीपो कहै म्हारी आतमां, तू राम रतन उर धारी॥
चिंता नांई दुख सुख परे देह पै, चरण कमल कर ध्यानौ।
हो चेतन तजौ भरम ने, खांड धूरि सम जानौ॥
जैसे चातक स्वाति बूंद बिन, प्रान समरपन ठानौ।
पीपा जैहि राम भजन बिना, काल रूप तेही जानौ॥
सरणाई बिजै पंजर, सखि रामइया वाई॥
लोह कौ साँकल कैसे तूटै हो घण दै धाइ।
मोह कौ साँकल कैसे तूटै हो रामइया राई॥
देखी विद्या देख्यौ दान, देखी काया कृतम तन।
साधु संगति बिन मेरौ कहीं न मानै मन॥
देख्यौ पुंन'र देख्यौ पाप, सकल जग देख्या संताप।
प्रणवत पीपौ नरहरि, उद्यमी लै आयै आप॥
चंद न होता सूर न होता, होता दिवस न राती।
ब्रह्मा न होता सूद्र न होता, तब करता कौण भँराती॥
माइ न होती बाप न होता, होता कर्म न काया।
हमें न होता तुम्हें न होता, कहौ कहाँ थै आया॥
वर्ण न होता विचार न होता, मोह न होता माया।
रजस तापस श्रातिगन होता, अविगत आप उपाया॥
खेचर भूचर सिंगी मुद्रा, गुरु प्रसादे पाया।
पीपौ प्रणवै परमतत्त रे, सब जग धंधै लाया॥
संत धरम की महिला सांची।
ना कोई बरनी ना कोई बांची॥
जिन बरनी तिन कही अधूरी।
सतगुरु बिन जिन कही सो कूरी॥
हरि ही संत संत ही सांई।
संत हरि में अंतर नाहीं॥
पीपो ज्यों जल बीच मीन है।
त्यौं संतन में समा पीव है॥
तौ लोक बेद अरू कलिजुग मिलि करि, भगति रसातलि देते॥
आगम निगम कहत ए पांडे, फल भागौत लगायौ।
रजस तामस सातिग कथि-कथि, यूँ यहु जगत भुलायो॥
बकता सुरता इन्यूँ भूले, दुनिया सबै भुलाई।
कल्पवृच्छ की छाया बैठे, तौ क्यूँ न कल्पना जाई॥
सर्गुण कथि-कथि मिष्ट खवाया, काया रोग बढ़ाया।
निर्गुण नींव पिया नहिं गुरगामि, यूँ अटकी जीव विकाया॥
अंध लकुटिया अंध गही है, परत कूप कत थोरै।
अबरण बरण दुई रस अंजन, आँखि सबनि की फौरे॥
हमसे पतित कहा कहि रहते, कौण प्रतीति मन धरते।
नाना बाणी देखि सुणि श्रवननि, बहु मारग अनसरते॥
करि हरि भगति भगति कण लीना, त्रिविध रहित थिति मोहे।
पाखंड रूप भेष सब कंकर, ग्यान सूपक सोहै॥
तिरगुण रहित भक्ति भगवंतहि, बिराला कोई पावै।
दया होई जौ कृपा नाथ की, तौ नाम कबीरा गाई॥
भगति प्रताप राखिए कमनि, निज जन आप पढ़ाया।
नाम कबिरा साच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया॥
जाथै बेगि मिले राम राया॥
खणि-खणि मूली खाइये।
भ्रमि-भ्रमि तीरथ न्हाइये॥
कोटि बैद संगि फिरिये।
तऊ देखतां मरिये॥
केई राजा केई राना।
केई पाति साह सुलताना॥
बहुनाइक जौ फिरिये।
तऊ देखतां मरिये॥
ऊँचा कोट मरोड़ा।
तहाँ नहीं धन तोड़ा॥
दरि बघिलै घोड़ा हाथी।
तेरे संगि न आवै साथी॥
पीपौ प्रणवै अंतर्जामी।
तूं जनमि मैरो स्वामी॥
मेहि जनम का पासा।
तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥
घर बैठा तीरथ को धावें, तीर्थ जाई पछितावै।
तिहि तीरथ कौ चलि रे जियरा, पुनरपि जन्म न आवै॥
तीरथ करि-करि जगत भुलाया, खोज्या तिनि हरि पाया।
कष्ट पषाण सबनि में कैसौ, जैसा त्रिभुवन राया॥
विद्या आखिर देव दिज पूजा, इहि बेसामि बिगूता।
पीपा कहै प्रगट परमेश्वर, जन जागे जग सूता॥
बीज मांहि ज्यों बिरछ दिखे, बिरछ मांहि ज्यों छाया॥
कनी मांहि ज्यों सुन्न देखिये, सुन्न अनंत आकारा।
निअच्छर से अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा॥
रखे मोहिं ज्यों किरन दीखे, किरन मांहि परकासा।
जैसे जीव ब्रह्म परमातम, जीव मांझ ज्यों धांसा॥
सांसा मांहि सबद पर मीटे, अरथ सबद के मांहि।
ब्रह्म से जीव, जीव से ब्रह्म, यों पीपै लगा सदा ही॥
सोतत रे काहू बिरलै पेख्या॥
नाद ब्यंद थै रहै नियारा।
सो पद परमत भया उजियारा॥
त्रिकुटी मध्य ज्योति जे कहिये।
ताहू थैं अगम अगोचर लहिये॥
त्रिबिधि थान त्रिदेव थैं रहिता।
त्रिगुण अतीत निरंतर रमता॥
जन पीपा सतगुरि बलिहारी।
जाके सबदौं मिल्यों हो मुरारी॥
संतो एक राम सब माही
संत पीपा
संतो एक राम सब मांही।अपने मन उजियारो, आन न दीखे काही॥
एकै चाम रूधिर अर सांसा, छोट मोट तन मांही।
एकै मारग तैं सब आया, एकै मारग जाही॥
एकौ मात पिता सबही के, विप्र छुद्र कोई नांही।
पीपो जो जन भरम भुलाने, तैं ढुलरात सदा ही॥
जियरा करि रे कोई उपाया
संत पीपा
जियरा करि रे कोई उपाया।जाथै बेगि मिले राम राया॥
खणि-खणि मूली खाइये।
भ्रमि-भ्रमि तीरथ न्हाइये॥
कोटि बैद संगि फिरिये।
तऊ देखता मरिये॥
केई राजा केई राना।
केई पाति साह सुलताना॥
बहुनाइक जौ फिरिये।
तऊ देखता मरिये॥
ऊँचा कोट मरोड़ा।
तहाँ नहीं धन तोड़ा॥
दरि बघिलै घोड़ा हाथी।
तेरे संगि न आवै साथी॥
पीपौ प्रणवै अंतर्जामी।
तूं जनमि-जनमि मैरो स्वामी॥
मेहि जनम का पासा।
तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥
देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ
संत पीपा
देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ।सरणाई बिजै पंजर, सखि रामइया वाई॥
लोह कौ साँकल पाई तूटै हो घण दै धाइ।
मोह कौ साँकल कैसे तूटै हो रामइया राई॥
देखी विद्या देख्यौ दान, देखी काया कृतम तन।
साधु संगति बिन मेरौ, कहीं न मानै मन॥
देख्यौ पुनर देख्यौ पाप, सकल जग देख्या संताप।
प्रणवत पीपौ नरहरि, उद्यमी लै आयै आए॥
जै कलि नाम कबीर न होते
संत पीपा
जै कलि नाम कबीर न होते।तौ लोक बेद अरू कलिजुग मिलि करि भगति रसातलि देते॥
आगम-निगम कहत ए पांडे, फल भागौत लगायौ।
रजस-तामस-सातिग कथि-कथि, यूँ यहु जगत भुलायौ॥
बकता सुरता दोन्यूँ भूले, दुनिया सबै भुलाई।
कल्पवृच्छ की छाया बैठे, तौ क्यूँ न कल्पना जाई॥
सर्गुण कथि-कथि मिष्ट खवाया, काया रोग बढ़ाया।
निर्गुण नींव पिया नहिं गुरगामि, यूँ अटकी जीव विकाया॥
अंध लकुटिया अंध गही है, परत कूप कत थोरै।
अबरण बरण दुइै रस अंजन, आँखि सबनि की फौरे॥
हमसे पतित कहा कहि रहते, कौण प्रतीति मन धरते।
नाना बाणी देखि सुणि श्रवननि, बहु माराग अनसरते॥
करि हरि भगति, भगति कण लीना, त्रिविध रहित थिति मोहे।
पाखंड रूप भेष सब कंकर, ग्यान सूपक सोहे॥
तिरगुण रहित भक्ति भगवंतहि, बिराला कोई पावै।
दया होई जौ कृपा नाथ की, तौ नाम कबीरा गाई॥
भगति प्रताप राखिऐ कमनि, निज जन आप पढ़ाया।
नाम कबिरा साच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया॥
बहुरि बसिरै पाहुणा
संत पीपा
बहुरि बसिरै पाहुणा, पूछि हमारी सार।कै म्हारे मंदिर बसौ, कै ले चालौ लार॥
जे तू आयो पाहुनौ, महा अधिक रंगि राच।
निरति निकालू ह्यो रह्यो, कहूँ देख्यो जात॥
आस्यां अर फिर ज्यासां, रहस्यां धरि धरि वारि।
चोरी को चाकर क्यूं रहे, या प्रीतड़ी निवारी॥
सतरा विधि भोजन कियो, इमरत किया आहार।
तऊ न थिराना पाहुना, अंत काल की बार॥
जन पीपा की विनती, जे जन सदा सचेत।
बहुरि न जग में आवसी, ज्यों हरी सूं लायो हेत॥
राम तेरी भूखा भक्ति न होई
संत पीपा
राम तेरी भूखा भक्ति न होई।भोजन बिना पखावज बाजै नाद न रीझै कोई॥
आठ अबारी आठ सवारी, सौलह दै गोपाला।
इतना मोही एक घटावै, आलै धारी माला॥
सावन लाडू सेव सुहाली, लापसड़ी पच धारी।
इतना देस्यो देव दया करि, तो होसी भक्ति थारी॥
रोटी बिना न रंग रहे माधो, पाखंड लोग पतीजे।
पीपा कहे सुन अंतरयामी, भक्ति अखंड मोहि दीजै॥
साधो ब्रह्म अलख लखाया
संत पीपा
साधो ब्रह्म अलख लखाया।बीज मांहि ज्यों बिरछ दिखे, बिरछ मांहि ज्यों छाया॥
नी मांहि ज्यों सुन्न देखिये, सुन्न अनंत आकास।
निअच्छर से अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा।
रखे मोहिं ज्यों किरन दीखे, किरन मांहि परकासा।
जैसे जीव ब्रह्म परमातम, जीव मांझ ज्यो धांसा।
सांसा माहि सब्द पर मीटें, अरथ शब्द के माहिं।
ब्रह्म से जीव, जीव से ब्रह्म, यों पीपै लगा सदा ही॥
भगति तेरी जीवनि मेरी
संत पीपा
भगति तेरी जीवनि मेरी।एक लै आनंद होई मंझा देवा॥
छेही द्रुमति और की आसा।
सैइलै गौव्यंद राई चरण निवासा॥
नारी कौ सेवग नरक दुवार।
आतम एक न ग्यान बिचार॥
इहि उनमान जपै जन पीपा।
तार्यो त्रिलोचन नामदेव छीपा॥
रंक बापड़ो रतन पायो।
हेत करि-करि हिरदै लायो॥
पाँच पदारथ हीरे जड़िया।
प्रणवै पीपा हाथि चढ़ियाँ॥
तूँ मेरा तरवर मैं जन पांखी
संत पीपा
तूँ मेरा तरवर मैं जन पांखी।अंबरीश धू नारद साषी॥
जौ तुम्ह गिरवर तो मैं मोरा।
जौ तुम्ह चंदा राम तौ मैं चकोरा।
जे तुम सरवर तौ मैं मंछा।
जे तुम गऊ राम तौ मैं बच्छा॥
जौ तुम तीरथ तौ मैं जांही।
जे तुम देवा राम तौ मैं पाती॥
पीपा प्रणवै अंतरजामी।
मैं तेरौ सेवग तूँ मैरौ स्वामी॥
इण घट अंदर बाग बगीचा
संत पीपा
इण घट अंदर बाग बगीचा, इण में सिरजन हारा रे।इण घट अंदर सात समन्दर, इण में नव लख तारा रे॥
इण घट अंदर अणहद गूंजे, इण में सब संसारा रे।
पीपा के तो घणो भरसो, इण भज सांई म्हारा रै॥
सुकरि मैरो मन अनंत न जाई
संत पीपा
सुकरि मैरो मन अनंत न जाई।तहाँ सखि जहाँ तेरे पाई॥
अलख निरंजन निर्मल हरी।
तहाँ राखि जहाँ निर्मल पुरी॥
सकल निरंतर सब घटि स्वामी।
अंतकालि हरि अंतर्जामी॥
पीपौ प्रणवै परम निधान।
भक्ति च्यंतामणि द्यौ हरिदान॥
भगवंत नहिं भजन होई
संत पीपा
भगवंत नहिं भजन होई।जिनि भजे हरि चरण जीते चार पौबरण, जाकी जाति अछोप छीपा।
ब्यास में लेखिये सनक में पेखिये, नामा की नामना सपत दीपा॥
जाकै ईदि बकरीद गऊ रह वध करै, मानिये सेख सहींद पीरा।
बापि जैसी करी पूत्य अैसे धरी, नाँत नवखंड प्रसिद्ध कबीरा॥
जाके कुटंब के ढेढ ढोर ढोवत फिरै, अजहूँ बनारसी आसपासा।
षटक्रम सहित बिप्र डंडबत करै, प्रगट नीसाण रैदास दासा॥
जपत जे नरा चरन कँवलापति, तास समतुलि नहीं आन कोई।
आप है एक अनेक हेतु बिसतर्यो, आंति एक कौ एक सौई॥
दसूँ दिस धाई जस रहया भरपूरि कारि, कौण मारग गये खोज पाँऊ।
दास पीपा कहै कठिन कलिकाल में, भगत भगवंत भजि पार पाँऊ॥
मन आप दरसाया
संत पीपा
मन आप दरसाया।आप ही ब्रिछ बीज अंकुरा, आप फूल फल छाया॥
आप ही सूरज किरन परकास्या, आप ब्रह्म जीव माया।
अंत अनंत सुन्न नभ आपै, साँस सबद अरथाया॥
मच्छर निसाचर सच्छर आपे, आपै जग जीव समाया।
अलख सलख सब एकौ सांई, सारा जग भरमाया॥
आतम में परमातम दीखै, छाया मांहि माया।
छाया माया आपै सबहि, पीपे सांच लखाया॥
माधवे नट विद्या मांडी
संत पीपा
माधवे नट विद्या मांडी।सब जग राख्यौ माया बांधी॥
ना को पुरिष नहीं को नारी।
ना कोई दाता ना कोई भिखारी॥
ना कोई रांक नहीं को राना।
लघु दीरघ झूठ करि जाना॥
प्रणव्रत पीपा सब जग पेख्यां।
बाजीगर अभि अंतरि देख्या॥
तू मेरे तीरथ तूँ मेरे कासी
संत पीपा
तू मेरे तीरथ तूँ मेरे कासी, सेइये गोविंदराइ सकल निवासी।गगन गंगा भवन गंगा, विविध गंगा नाराइण संगा॥
अढ़सठि तीरथ जीवन चंगा, राम के नाँइ परवाल ले अंगा।
पीपौ कह जोगेसुर सोई, मुखि हिरदै जाकै ऐकै होई॥
तैं प्रभु मो सूं बहुत करी
संत पीपा
तैं प्रभु मो सूं बहुत करी।नर देही सुमरन कू दीन्ही, मों पापी ते कछु न सरी॥
गरभवास दस मास अधै मुख, तहाँ न मेरी सुध बिसरी।
पावक जरत राखी हरि लीन्हे, जहाँ ऐसी कंचन देह धरी॥
गुरु प्रताप साध की संगत, इन मिली मेरी धीर धरी।
नहीं तो इत फारि मोही खाते, बांटि लेत जम डरी डरी॥
बरनौं कहाँ पाप बहु कीन्हैं, आदि अंत सूं देह भरी।
पीपो पतित पावन तुम, बांह गहे की लाज हरी॥
भाई रे राम अमल मेरा मन राता
संत पीपा
भाई रे राम अमल मेरा मन राता, बिसरौं तौ बाइडि आई।आवागमन विद्या मेरे तन की, हरि बिन कौण छुड़ाई॥
जोनी फिरै ताहि नाहिं पूजौ, जपूँ अजोनी संभा।
चंद सूर दोई दीपक जोया, गगन रच्या बिन थंभा॥
मनि हरि जान्या हरि मन जान्या, पूरब प्रीति सगाई।
हरि रंगि राच्य रस्या मेरा मन, सो रँग कबहुँ न जाई॥
मन की चिंता सबही डहक्या, भरम भूत होइ लाग्या।
पीपौ कहैं सकल जग सोई, हरि सुमिरै ते जाग्या॥
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा
संत पीपा
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा पाहुणों दिन चारि।सीख हमारी मानि लै, हरिभज जनम सुधारि॥
हाथी घोड़ा गाँव गढ़ डूंगर, सत द्वारे धन धाम।
थामैं जिवडी घालि कैं, तैं भज्यों न राजा राम॥
मुलमुल कागा पहन तो, चलतो घुड़लां री जोड़ी।
अंतकाल जम आय पहुँचो, राख्यों तिणा ज्यूं तोड़ी॥
सुबुधि बुहारि हाथिलै, कुबधि जोड़ो झारी।
पीपो कहै म्हारी आतमा, तू राम रतन उर धारी॥
अनत न जाऊँ राजा राम की दुहाई
संत पीपा
अनत न जाऊँ राजा राम की दुहाई।कायागढ़ खोजताँ मैं नौ निधि पाई॥
काया देवल काया देव, काया पूजा पाती।
काया धूप दीप नइबेद, काया तीरथ जाती।
काया माँहे अड़सठि तीरथ, काया मांहै कासी।
काया माँहे कँवलापती, बैकुंठबासी॥
जे ब्रह्मंडे सोई प्यंडे जे खौजै सो पावै।
पीपौ प्रणवै परमतत्त रे, सतगुरू मिलै लखावै॥
पूजा कौण करो जगजीवन
संत पीपा
पूजा कौण करो जगजीवन, पाती कौंण चहोड़ौ।सर्वजीव में तू ही व्यापक, ताकौं मैं नहीं तोड़ो॥
बिनसि जाई ताको नहीं पूजो, अबिनासी नहीं पाँऊ।
बैदौ थरपि देहु रै आण्या, ताको मैं नहीं ध्याऊँ॥
सालिगराम न पूजौ स्वामी, यहु तौ देव न होई।
सो पूजौ जो रहे निरंतरि, अविगत लखै न कोई॥
अलख निरंजन तू अबिनासी, तेरी गति किनँहु न जानी।
पीपा पूजि जगणीना, के पाथर के पानी॥
देवा नटवर गति नाचि गए
संत पीपा
देवा नटवर गति नाचि गए दुनिया में केते।भूपति भोपाल ग्वाल, मीर मलिक होते॥
जाकै बाई आनि तेज पवन चलते दल भारी।
लंकापति हारि गयौ, रावण सौ अहंकारी॥
ममता गति वोट कीन्ही, खेल पसार्यो माया।
भर्म जड़ी वाइ डोरू, बीजागर बाया॥
लखा खोहणि खीजि गए, कैरो पांडौ लड़ते।
बसुधा किनी न जीतो पीपा, दोउ गरब करते॥
मन रै कहाँ भूलौ मति हीणा
संत पीपा
मन रै कहाँ भूलौ मति हीणा।तू काहू कौ ना को तेरा, ज्यूँ उपना त्यूं खीणा॥
राजपाट अबला बहुतेरी, होत घोड़ा हाथी।
परमहंस जबकिया पयाना, बिरचि रहे सब साथी॥
जे नर छाँह छत्र की चलते, दुनिमान महिराणा।
नवणि कंरते जालण लागे, जब तन भया बिराणा॥
पीपा कहै पदारथ पाया, अंध न देखै कोई।
इम्रत नाम राम का मीठा, मै पीउंगा रस सोई॥
तो जी जै गोव्यंद चरना
संत पीपा
तो जी जै गोव्यंद चरना।नहिं तो जन्म वृथा जगि भरना॥
जा दिनि भजसि गोव्यंद नामा।
ता दिन प्रान पतन करि रामा॥
आप उधारि लै यहु मत नीका।
राम नाम जपि रे प्रणवै पीपा॥
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा
संत पीपा
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा, पाहुणों दिन चारि।सीख हमारी मानि लै, हरिभज जनम सुधारि॥
हाथी घोड़ा गाँव गढ़ डूंगर, सत द्वारे धन धाम।
थामैं जिवड़ौ घालि कैं, तैं भज्यों न राजा राम।
मुलमुल कागा पहन तो, चलतो घुड़लां री जोड़ी।
अंतकाल जम आय पहुँचो, राख्यों तिणा ज्यूं तोड़ी।
सुबुधि बुहारि हाथिलै, कुबधि जोड़ो झारी।
पीपो कहै म्हारी आतमां, तू राम रतन उर धारी॥
प्रीत की रीति अनोखी जानौ
संत पीपा
प्रीत की रीति अनोखी जानौ।चिंता नांई दुख सुख परे देह पै, चरण कमल कर ध्यानौ।
हो चेतन तजौ भरम ने, खांड धूरि सम जानौ॥
जैसे चातक स्वाति बूंद बिन, प्रान समरपन ठानौ।
पीपा जैहि राम भजन बिना, काल रूप तेही जानौ॥
देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ
संत पीपा
देव भ्रमतौ-भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ।सरणाई बिजै पंजर, सखि रामइया वाई॥
लोह कौ साँकल कैसे तूटै हो घण दै धाइ।
मोह कौ साँकल कैसे तूटै हो रामइया राई॥
देखी विद्या देख्यौ दान, देखी काया कृतम तन।
साधु संगति बिन मेरौ कहीं न मानै मन॥
देख्यौ पुंन'र देख्यौ पाप, सकल जग देख्या संताप।
प्रणवत पीपौ नरहरि, उद्यमी लै आयै आप॥
क्या तेरा क्या मेरा मनाँ
संत पीपा
क्या तेरा क्या मेरा मनाँ, जैसे तरवर पँख बसेरा मनाँ॥चंद न होता सूर न होता, होता दिवस न राती।
ब्रह्मा न होता सूद्र न होता, तब करता कौण भँराती॥
माइ न होती बाप न होता, होता कर्म न काया।
हमें न होता तुम्हें न होता, कहौ कहाँ थै आया॥
वर्ण न होता विचार न होता, मोह न होता माया।
रजस तापस श्रातिगन होता, अविगत आप उपाया॥
खेचर भूचर सिंगी मुद्रा, गुरु प्रसादे पाया।
पीपौ प्रणवै परमतत्त रे, सब जग धंधै लाया॥
सोई दिन सांचा जा दिन संत मिलाई
संत पीपा
सोई दिन सांचा जा दिन संत मिलाई।संत धरम की महिला सांची।
ना कोई बरनी ना कोई बांची॥
जिन बरनी तिन कही अधूरी।
सतगुरु बिन जिन कही सो कूरी॥
हरि ही संत संत ही सांई।
संत हरि में अंतर नाहीं॥
पीपो ज्यों जल बीच मीन है।
त्यौं संतन में समा पीव है॥
जै कलि नाम कबीर न होते
संत पीपा
जै कलि नाम कबीर न होते।तौ लोक बेद अरू कलिजुग मिलि करि, भगति रसातलि देते॥
आगम निगम कहत ए पांडे, फल भागौत लगायौ।
रजस तामस सातिग कथि-कथि, यूँ यहु जगत भुलायो॥
बकता सुरता इन्यूँ भूले, दुनिया सबै भुलाई।
कल्पवृच्छ की छाया बैठे, तौ क्यूँ न कल्पना जाई॥
सर्गुण कथि-कथि मिष्ट खवाया, काया रोग बढ़ाया।
निर्गुण नींव पिया नहिं गुरगामि, यूँ अटकी जीव विकाया॥
अंध लकुटिया अंध गही है, परत कूप कत थोरै।
अबरण बरण दुई रस अंजन, आँखि सबनि की फौरे॥
हमसे पतित कहा कहि रहते, कौण प्रतीति मन धरते।
नाना बाणी देखि सुणि श्रवननि, बहु मारग अनसरते॥
करि हरि भगति भगति कण लीना, त्रिविध रहित थिति मोहे।
पाखंड रूप भेष सब कंकर, ग्यान सूपक सोहै॥
तिरगुण रहित भक्ति भगवंतहि, बिराला कोई पावै।
दया होई जौ कृपा नाथ की, तौ नाम कबीरा गाई॥
भगति प्रताप राखिए कमनि, निज जन आप पढ़ाया।
नाम कबिरा साच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया॥
जियरा करि रे कोई उपाया
संत पीपा
जियरा करि रे कोई उपाया।जाथै बेगि मिले राम राया॥
खणि-खणि मूली खाइये।
भ्रमि-भ्रमि तीरथ न्हाइये॥
कोटि बैद संगि फिरिये।
तऊ देखतां मरिये॥
केई राजा केई राना।
केई पाति साह सुलताना॥
बहुनाइक जौ फिरिये।
तऊ देखतां मरिये॥
ऊँचा कोट मरोड़ा।
तहाँ नहीं धन तोड़ा॥
दरि बघिलै घोड़ा हाथी।
तेरे संगि न आवै साथी॥
पीपौ प्रणवै अंतर्जामी।
तूं जनमि मैरो स्वामी॥
मेहि जनम का पासा।
तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥
हरि को मर्म न कोई जाणै
संत पीपा
हरि को मर्म न कोई जाणै, जैसा भाव तैसी सिध होई।घर बैठा तीरथ को धावें, तीर्थ जाई पछितावै।
तिहि तीरथ कौ चलि रे जियरा, पुनरपि जन्म न आवै॥
तीरथ करि-करि जगत भुलाया, खोज्या तिनि हरि पाया।
कष्ट पषाण सबनि में कैसौ, जैसा त्रिभुवन राया॥
विद्या आखिर देव दिज पूजा, इहि बेसामि बिगूता।
पीपा कहै प्रगट परमेश्वर, जन जागे जग सूता॥
साधो ब्रह्म अलख लखाया
संत पीपा
साधो ब्रह्म अलख लखाया।बीज मांहि ज्यों बिरछ दिखे, बिरछ मांहि ज्यों छाया॥
कनी मांहि ज्यों सुन्न देखिये, सुन्न अनंत आकारा।
निअच्छर से अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा॥
रखे मोहिं ज्यों किरन दीखे, किरन मांहि परकासा।
जैसे जीव ब्रह्म परमातम, जीव मांझ ज्यों धांसा॥
सांसा मांहि सबद पर मीटे, अरथ सबद के मांहि।
ब्रह्म से जीव, जीव से ब्रह्म, यों पीपै लगा सदा ही॥
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