श्रीमती मूनी एक कसाई की बेटी थीं। वो ऐसी औरत थीं जो बात दबाकर रख सकती थीं, इरादे की पक्की भी। उन्होंने अपने पिता के फ़ोरमैन से शादी कर ली और एक कसाई की दुकान खोल ली स्प्रिंग गार्डन के पास ही। लेकिन ससुर की मौत के बाद से ही श्रीमान मूनी पर जैसे शैतान सवार हो गया। वह पीने लगे, दुकान के पैसे बरबाद करने लगे और उधार में डूबने लगे। उन्हें क़सम-तौबा दिलाने का कोई फ़ायदा नहीं था—वह सब क़समें तोड़ देते थे। ग्राहकों के सामने ही अपनी बीवी से झगड़ने और ख़राब मीट ख़रीदने की वजह से उन्होंने अपना कारोबार ठप कर लिया था। एक रात अपनी बीवी के पीछे हँसिया लेकर दौड़ पड़े और श्रीमती मूनी को अपने पड़ौसी के घर शरण लेनी पड़ी। उस दिन के बाद दोनों अलग रहने लगे। वह पादरी के पास गईं और पति से तलाक ले लिया बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी के साथ। वह उन्हें न पैसे देती थीं, न खाना और न घर में जगह। और इसीलिए मजबूरन उन्हें अपना नाम शेरिफ़ के आदमी के रूप में दर्ज़ करना पड़ा। वह एक बेतरतीब झल्ले से, कुछ झुके से पियक्कड़ इंसान थे, जिसके बेरंग सफ़ेद चेहरे पर सफ़ेद मूछें थीं और छोटी-छोटी गुलाबी डोरों वाली अधमुँदी आँखों के ऊप...