बूढ़ी मिसेज वाँग को भी निश्चय ही पता था कि युद्ध हो रहा था। हर व्यक्ति को ज्ञात था कि यह युद्ध एक दीर्घावधि से जारी था और जापानी चीनियों की निर्दयता से हत्या कर रहे थे। पर अभी तक यह बात प्रमाणित नहीं थी और इसको केवल अफ़वाह ही समझा जाता था, क्योंकि वाँगस का कोई आदमी नहीं मारा गया था। पीले दरिया के मैदानी किनारे पर स्थित वाँगस के गाँव ने, जो मिसेज वाँग का ख़ानदानी गाँव था, कभी किसी जापानी को नहीं देखा था। यही कारण था कि वे लोग केवल कभी-कभार जापानियों के बारे में बातें ही करके रह जाते थे। यह आरंभिक गर्मियों की एक शाम थी। मिसेज वाँग खाना खाकर नित्य की तरह दरिया की रोकथाम के लिए बाँधे गए पुश्ते पर पानी का चढ़ाव देखने के लिए आ गई। वह जापानियों से अधिक उस दरिया से भयभीत थी। वह उस दरिया की भयंकरता से अच्छी तरह अवगत थी। एक-एक करके गाँव के बाक़ी लोग भी मिसेज वाँग के पीछे ही पुश्ते पर चढ़ गए और दरिया के पानी को देखने लगे, जो साँपों की किसी टोली की तरह लहरा-लहरा कर पुश्ते की ऊँचाई को चाट रहा था। “इस मौसम में मैंने दरिया के पानी में इतना चढ़ाव कभी नहीं देखा।” मिसेज वाँग ने कहा, फिर वह अपने पोते लिटल ...