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जनवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बस अड्डे पर (कहानी) | Bas Adde Par : नजीब महफूज़

बादल घिर आए और इतने गहरा गए मानों रात हो आई हो। हल्की-हल्की बूँदें पड़ने लगीं। सड़क की धूल ठंडी हवाओं ने झाड़ दी थी, बस उसकी उमस भरी गंध रह गई थी। राहगीर तेज़-तेज़ भागे जा रहे थे। कुछ लोग बस-स्टॉप की शेड के नीचे सिमट आए थे। यह साधारण-सा दृश्य ठहरा-ठहरा ही रह गया होता, अगर बग़ल की गली से एक आदमी निकलकर पागलों की तरह दौड़ता सामने वाली गली में न चला गया होता। उसके पीछे-पीछे लोगों का हुजूम था। वे चिल्ला रहे थे—’चोर-चोर, पकड़ो पकड़ो!’ शोर कम होते-होते अचानक बंद हो गया। बूंदाबाँदी रुकी नहीं। सड़क तक़रीबन सुनसान थी, बस कुछ लोग बस स्टॉप के शेड के नीचे खड़े थे। कुछ बस का इंतज़ार कर रहे थे, कुछ भीग जाने के डर से बूंदाबाँदी रुकने के इंतज़ार में खड़े थे। दौड़ा-दौड़ी की आवाज़ें फिर आने लगीं। वे नज़दीक आते जा रहे थे, उनकी आवाज़ें तेज़ हो रही थीं। सामने दिखने लगा था कि कुछ लोगों ने चोर को पकड़ रखा था। आसपास खड़े नौजवान ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहे थे चिल्ला रहे थे। रास्ते में उसने भागने की कोशिश भी की, लेकिन उन्होंने पकड़ लिया और लात-जूतों से उसकी ख़बर लेने लगे। इस ज़बरदस्त पिटाई के बीच वह हवा में हाथ-पाँव...

घटा (कहानी) | Ghataa : मार्टी जोनपोल्वी

अगस्त से वह असंतुष्ट था, जबकि उस महीने से मालूम नहीं क्यों उसे सबसे ज़्यादा उम्मीदें थीं। महीने की शुरुआत बरसाती थी। केवल पूर्णमासी के बाद दिन बड़े, स्वच्छ और नीले हुए। एक समतल रेल यार्ड से रेलवे लाइन चट्टानों को काटती हुई जाती थी। उत्तरी छोर के क्षितिज पर एक बड़ी घटा बढ़ी आ रही थी। अजीब प्रभाव था—बादल का तना एक अनगढ़ पकड़ में जकड़ा लगता था, मानो वह बहुत नीचे चला गया हो और चट्टानों के कटाव में फँस गया हो। उसने उसे घूरा। ऐसा लगा, मानो वह बादल की झुर्रीदार बाज़ू पर कोई काला दाग़ देख रहा हो। उसके चारों ओर की हवा विरल हो गई, उसे चक्कर आने लगे, साँस लेना कठिन हो गया। अनुभव तेज़ी से एक धुँधली संवेदना में बदल गया। झुर्री की ओर का बादल का धब्बा ग़ायब हो गया था, उसकी एक फ़ीते जैसी पूँछ निकल आई थी और नज़रों से ऐसे ग़ायब हो गई थी, जैसे कोई ग़लत चित्र रेटीना से ओझल हो जाता है। काफ़ी दिनों के बाद उसे मुक्ति का ऐसा अनुभव हुआ, पता नहीं कब और कहाँ से—यह केवल एक संवेदना थी, अनुभूति का बचा हुआ एक अंश, उस क्षण से उपजा, या फिर सारी ज़िंदगी से। उसने सोचा कि घटा की ऊपरी परत से शायद सुदूर आने वाले पतझड़ को...

धूप का टुकड़ा (कहानी) | Dhoop Ka Tukaraa : यासुनारी कवाबाता

मेरी आयु उन दिनों चौबीस वर्ष की थी। पतझड़ का मौसम था। सागर तट की एक आरामगाह में मेरी भेंट उस लड़की से हुई। यह प्यार की शुरुआत थी। उस लड़की ने अकस्मात् अपना सिर ऊपर उठाया और फिर अपने चेहरे को किमोनो की आस्तीन के पीछे छिपा दिया। जब मेरा ध्यान उसकी इस हरकत की ओर गया तो मुझे लगा कि मैंने अनजाने ही अपनी पुरानी बुरी आदत को दोहराया होगा? यह सोच कर मैं परेशान हो गया और मेरे चेहरे पर दर्द का अहसास उभर आया। ‘मैं तुम्हारी ओर टकटकी बाँधे देख रहा था। क्यों यही बात है न?’ ‘हाँ, किंतु यह बुरी नज़र नहीं थी।’ उसकी आवाज़ कोमल थी और उसके शब्द स्वाभाविक थे। मैंने स्वयं को हलका-सा महसूस किया। ‘किंतु मेरे इस प्रकार घूरने से तुम्हें कष्ट हुआ होगा?’ ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं—तुम चिंता मत करो।’ उसने अपने किमोनो की आस्तीन चेहरे से हटा ली। उसके हाव-भाव से लगता था कि उसे अपना चेहरा दिखाने में शर्म महसूस हो रही है। मैंने अपनी गर्दन घुमा ली और समुद्र की ओर देखने लगा। अपने निकट बैठे लोगों की ओर घूर-घूर कर देखने की मेरी-पुरानी आदत है। मैंने अनेक बार अपनी इस आदत छुटकारा पाने के बारे में सोचा था, किंतु अपने आसपास के...

शहर (कहानी) | Shahar : हरमन हेस

‘ऐसा लगता है अब हम लोग कहीं पहुँच रहे हैं। इंजीनियर ज़ोर से बोल पड़ा; जैसे ही लोगों, कोयलें, औज़ारों और खाद्य-पदार्थों से भरी हुई दूसरी ट्रेन उस नए इलाके में पहुँची, जहाँ कल ही रेल की पटरियाँ बिछाई गई थीं। घास भरी ज़मीन के उस अछूते विस्तार में सूरज की सुनहली किरणें चमक रही थीं। दूर क्षितिज पर पेड़ों से भरे पहाड़ नीले कुहासे में नहा रहे थे। हरे-भरे मैदान में कोयलें, राख, काग़ज़ और टिन का ढेर उतर रहा था, शोर-गुल हो रहा था और जंगली कुत्ते और बैल यह सब देख रहे थे। आरा मशीन की पहली कर्कश आवाज़ दूर जंगलों को चीरती चली गई, बंदूक़ की पहली गूँज मेघों की गड़गड़ाहट की तरह पर्वतों पर तैर गई, लोहे पर भारी हथौड़े की पहली चोट की ‘घन’ आवाज़ हुई। टिन की छत की एक झोंपड़ी खड़ी हुई, दूसरे दिन लकड़ी का एक घर, फिर दिनों-दिन पत्थर के मकान दिखाई पड़ने लगे। जंगली कुत्ते और बैल वहाँ से दूरी रखने लगे, ज़मीन जोती जाने लगी और उसमें फसल उगी। पहले ही बसंत में वह ज़मीन हरी फसलों से भर गई। वहाँ खेत, अस्तबल और अनाज-घर बनाए गए, ज़मीन काट कर सड़कें बन गईं। रेलवे स्टेशन बन कर खड़ा हुआ और उसका उद्घाटन भी हो गया। इसके तुरंत...

पागल की डायरी (कहानी) | Paagal Ki Daayaree : लू शुन

दो भाई थे। उनके नाम नहीं बताऊँगा। मेरे स्कूल के दिनों के साथी थे। दोनों से ही अच्छा मेल-जोल था। परंतु कई वर्ष तक मेल-मुलाक़ात न हो सकी और संपर्क टूट गया। कुछ महीने पहले सुना कि उनमें से एक बहुत बीमार है। मैं अपने गाँव लौट रहा था, सोचा रास्ते में उन लोगों के यहाँ भी होता चलूँ। उनके घर गया तो एक ही भाई से मुलाकात हुई। उसने बताया कि छोटा भाई बीमार था।मित्र ने कहा, “तुम्हारे दिल में कितना स्नेह है। हम लोगों का ख़याल कर इतनी दूर से मिलने के लिए आए हो। अब छोटे भाई की तबीयत ठीक है। उसे सरकारी नौकरी मिल गई है, वहीं गया है।” बड़े भाई ने हँसते-हँसते दो मोटी-मोटी जिल्दों में लिखी डायरी मुझे दिखाई और बोला कि अगर कोई इस डायरी को पढ़ ले तो भाई की बीमारी का रहस्य समझ जाएगा और अपने पुराने दोस्त को दिखा देने में हर्ज़ भी क्या है। मैं डायरी ले आया और उसे पढ़ डाला। समझ गया कि बेचारा नौजवान अजीब आतंक और मानसिक यंत्रणा से पीड़ित था। लिखावट बहुत उलझी-उलझी और असंबद्ध थी। कुछ बेसिरपैर के आरोप भी थे। पृष्ठों पर तारीखें नहीं थीं। जगह-जगह स्याही के रंग और लिखावट के अंतर से अनुमान हो सकता था कि ये जब-तब आगे-पीछे ...

क़िस्सा अनजाने द्वीप का (कहानी) | Qissaa Anajaane Dveep Ka : जोसे सारामागो

एक आदमी ने राजा का दरवाज़ा खटखटाया और कहा, ‘मुझे एक नाव चाहिए!’ राजा के महल में कई दरवाज़े थे। आदमी ने जिसे खटखटाया, वह याचिकाओं वाला दरवाज़ा था। राजा अपना सारा वक़्त तोहफ़ों वाले दरवाज़े पर अपने लिए आने वाले तोहफ़ों के बीच गुज़ारता था। इस व्यस्तता के चलते जब भी उसे याचिकाओं वाले दरवाज़े पर किसी के खटखटाने की आवाज़ सुनाई देती तो पहले वह उसे अनसुना करने की कोशिश करता, लेकिन जब खटखटाहट बंद होने की जगह कानों के पर्दों को फाड़ना शुरू करती और आस-पड़ोस के लोगों की नींद में पड़ता ख़लल बदनामी का कारण बनने लगता (कैसा राजा है यह, जो अपना दरवाज़ा तक नहीं खोलता, लोग झल्लाकर कहते), तब उस शोर से निजात पाने का कोई और रास्ता न पाकर राजा अपने प्रथम सचिव को बुला भेजता कि जाकर पता लगाओ, फ़रियादी को क्या चाहिए? प्रथम सचिव फ़ौरन द्वितीय सचिव को आवाज़ देता, द्वितीय सचिव तृतीय सचिव को, तृतीय सचिव अपने प्रथम सहायक को आदेश देता, जो तुरंत द्वितीय सहायक पर हुक़्म चलाता और इस तरह पदानुक्रम से आदेश नीचे चलता हुआ बेचारी सफ़ाई-पोछे वाली औरत तक पहुँचता, जो बहरहाल किसी और को हुक़्म न दे पाने की मजबूरी में अधखुले किवाड़ क...

वह (कहानी) | Vah : लुइजी पिरांडेलो

जिस दिन उन लोगों का विवाह होना निश्चित हुआ, उसी दिन से बर्तोलीनो ने अपनी भावी पत्नी को कहते सुना-जानते हो न, मेरा असली नाम लीना नहीं है। मेरा नाम है करोलीना, किंतु ‘वे’ मुझे लीना कह कर पुकारते थे। इसी कारण तभी से मेरा नाम लीना ही रह गया है। ओह! बहुत ही सज्जन थे वे। वह देखो उनकी तसवीर, कह कर लीना ने एक बड़े फ़ोटोग्राफ़ की ओर उँगली उठाई। बर्तोलीनो ने देखा, उसकी भावी पत्नी के प्रथम पति सिनोर कोसिमो ताद्देयी उसकी ओर मृदु मुस्कान के साथ टोपी उठा रहे हैं। अपने अनजाने में बर्तोलीनो ने मृत सज्जन के अभिवादन के प्रत्युत्तर में अपना माथा क़रीब आधा झुका लिया था। ताद्देयी एक विख्यात मूर्तिकार थे। उनके निधन के उपरांत उनकी तसवीर को दीवाल पर से उतार कर रखने की बात उनकी विधवा पत्नी लीना सारूल्ली के मन में एक बार भी न आई और आती भी क्यों? उनके प्रति लीना की कृतज्ञता भी तो कम नहीं है। उसका मान-सम्मान, घर-द्वार सुंदर-सुंदर तमाम सामान, ये सब कुछ तो वे ही रख गए हैं। भावी द्वितीय पति की हैरानी के भाव की ओर तनिक भी ध्यान न देती हुई लीना ने आगे कहा-असल में मैं नाम बदलना नहीं चाहती थी, परंतु वे जो कहते थे, उसक...

छह बरस के बाद (कहानी) | Chhah Baras Ke Baad : कैथरीन मैंसफ़ील्ड

और फिर, छह बरसों के बाद इसने उसे दोबारा देखा। वह बाँस से बनी उन छोटी-छोटी मेज़ों में से एक पर बैठा था। मेज़ काग़ज़ से बने डेफोडिल फूलों के जापानी गुलदस्ते से सजी हुई थी। सामने फलों की एक बड़ी प्लेट रखी हुई थी और वह अपने उसी ख़ास अंदाज से संतरा छील रहा था, जिसे वह ख़ूब पहचानती थी और इसी वजह से इसने उसे फ़ौरन पहचान लिया। उसने भी अपने भीतर अचानक पहचान लिए जाने को एक झटके के साथ महसूस किया। क्योंकि जैसे ही उसने सिर उठाया था, उन दोनों की आँखें मिली थीं। नामुमकिन! वह एकदम से पहचान ही नहीं पाया! वह मुस्कराई; इसने त्यौरियाँ चढ़ा लीं। वह उसके क़रीब आई। उसने पल भर के लिए आँखें बंद कीं, पर आँखें खोलते ही उसका चेहरा चमक उठा, जैसे अँधेरे कमरे में माचिस की तीली जलाने से होता है। उसने संतरा रख दिया और कुर्सी पीछे की तरफ़ खिसका दी। इसने गर्माहट भरा अपना हाथ दस्ताने में से बाहर निकाला और उसके हाथ में दे दिया। “वैरा”, यह विस्मय से चिल्लाया “कितनी अजीब बात है। वाक़ई एक क्षण के लिए तो मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया। क्या तुम बैठोगी नहीं? तुमने खाना खाया? कॉफ़ी लोगी?” वह हिचकिचाई पर फिर बोली, “ठीक है, कॉ...