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बस अड्डे पर (कहानी) | Bas Adde Par : नजीब महफूज़

बादल घिर आए और इतने गहरा गए मानों रात हो आई हो। हल्की-हल्की बूँदें पड़ने लगीं। सड़क की धूल ठंडी हवाओं ने झाड़ दी थी, बस उसकी उमस भरी गंध रह गई थी। राहगीर तेज़-तेज़ भागे जा रहे थे। कुछ लोग बस-स्टॉप की शेड के नीचे सिमट आए थे। यह साधारण-सा दृश्य ठहरा-ठहरा ही रह गया होता, अगर बग़ल की गली से एक आदमी निकलकर पागलों की तरह दौड़ता सामने वाली गली में न चला गया होता। उसके पीछे-पीछे लोगों का हुजूम था। वे चिल्ला रहे थे—’चोर-चोर, पकड़ो पकड़ो!’ शोर कम होते-होते अचानक बंद हो गया।
बूंदाबाँदी रुकी नहीं। सड़क तक़रीबन सुनसान थी, बस कुछ लोग बस स्टॉप के शेड के नीचे खड़े थे। कुछ बस का इंतज़ार कर रहे थे, कुछ भीग जाने के डर से बूंदाबाँदी रुकने के इंतज़ार में खड़े थे।
दौड़ा-दौड़ी की आवाज़ें फिर आने लगीं। वे नज़दीक आते जा रहे थे, उनकी आवाज़ें तेज़ हो रही थीं। सामने दिखने लगा था कि कुछ लोगों ने चोर को पकड़ रखा था। आसपास खड़े नौजवान ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहे थे चिल्ला रहे थे। रास्ते में उसने भागने की कोशिश भी की, लेकिन उन्होंने पकड़ लिया और लात-जूतों से उसकी ख़बर लेने लगे। इस ज़बरदस्त पिटाई के बीच वह हवा में हाथ-पाँव भाँज रहा था।
वहाँ बस-स्टॉप के शेड में खड़े लोगों की निगाहें उसी लड़ाई पर टिकी थीं।
—’हाय! कितनी बुरी तरह मार रहे हैं उसे।’
—‘चोरी से बड़ा अपराध तो यें कर रहे हैं।’
—‘देखो, वहाँ उस बिल्डिंग के बाहर पुलिस वाला भी खड़ा देख रहा है।’
—‘लेकिन उसने तो अपना मुँह दूसरी ओर घुमा लिया।’
बारिश तेज़ होती जा रही थी और अब चाँदी के तारों की तरह लटकती दिखने लगी थी। बाकी सड़क एक़दम सुनसान थी, सिवाए उन लड़ने वालों के...
सिवाए बस-स्टॉप के शेड में खड़े लोगों के...
चोर को पीट-पाटकर वे सब उसे वहाँ घेरे खड़े थे, कानफाड़ आवाज़ में पता नहीं क्या चीख़ चिल्ला रहे थे। बारिश से बेख़बर वे लोग पता नहीं किस बहस में उलझे हुए थे, कोई नहीं समझ सकता था। उनके कपड़े बदन से चिपक रहे थे, लेकिन वे बहस में उलझे हुए थे। बारिश पर उनका कोई ख़ास ध्यान नहीं था। चोर की हरकतों से लग रहा था कि वह अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन किसी को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह ऐसे हाथ हिला रहा था कि भाषण दे रहा हो। लेकिन एक तो वह इतनी दूर था और दूसरे बारिश की आवाज़, कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह भाषण दे रहा था और लोग खड़े होकर उसे सुन रहे थे। बारिश हो रही थी, वे उसे चुपचाप देख रहे थे।
बस-स्टॉप के शेड में खड़े लोगों की आँखें उसी पर लगी थीं।
—‘वैसे यह समझ में नहीं आ रहा कि पुलिस वाला कुछ कर क्यों नहीं रहा है?’ पहले वाले आदमी ने फिर पूछा, मानों अपने आपसे।
—‘वही तो, उसी से तो मुझे लग रहा है कि यह किसी फिल्म का सीन है। शूटिंग चल रही लगती है।’ दूसरा आदमी बोला।
—‘लेकिन पिटाई तो सचमुच ही होती लग रही है।’
—‘लेकिन इस बारिश में चलती यह बहस, यह भाषणबाज़ी। इसको क्या कहेंगे आप?’
अचानक कोई हरकत हुई। चौराहे की ओर से दो कारें तूफ़ानी गति से आती दिखीं। ऐसा लग रहा था कि एक गाड़ी दूसरी का पीछा कर रही हो, जो काफ़ी ख़तरनाक दिख रही थी। आगे वाली गाड़ी भीषण रफ़्तार में भागी जा रही थी, दूसरी उसको छूने-छूने को थी।
अचानक सामने वाली गाड़ी के ड्राइवर ने इतना तेज़ ब्रेक लगाया कि दूर तक सड़क पर वह गाड़ी फिसलती चली गई। इस बीच दूसरी गाड़ी ने उसमें तेज़ी से ठोकर मार दी। इतनी ज़ोर से कि उसकी आवाज़ से फिज़ा गूँज उठी। दोनों ही गाड़ियाँ पलट गईं और ज़ोर का धमाका हुआ। दोनों ही गाड़ियों में आग लग गई। रिमझिम बारिश की फिज़ा चीख़-पुकारों से गूँज उठी।
लेकिन दुर्घटना स्थल की ओर कोई नहीं बढ़ा। चोर का भाषण नहीं रुका, नहीं आसपास से कोई कुछ मीटर ही दूर पड़े दोनों गाड़ियों के मलबे की ओर बढ़ा, जिनमें कुछ ही देर पहले आग लगी थी।
उन लोगों ने उस पर वैसे ही कोई ध्यान नहीं दिया, जैसे बारिश पर उनका कोई ध्यान नहीं था। बस-स्टॉप के उस शेड के नीचे खड़े एक आदमी की नज़र ख़ून में लथपथ एक आदमी पर पड़ी। वह दुर्घटना के शिकारों में एक था, जिसने गाड़ी के नीचे से रेंगकर निकलने की कोशिश की और मुँह के बल भरभराकर गिर पड़ा।
—‘बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है, नहीं?’ पहला बोला।
—‘लेकिन पुलिस वाला तो हिलना ही नहीं चाहता।’ दूसरा बोला।
—‘आसपास कोई टेलिफोन हो शायद।’
लेकिन वहाँ से कोई हिला नहीं, बारिश का भय सबको था। बारिश काफ़ी तेज़ थी, बीच-बीच में बिजली की कड़क भय पैदा करती थी।
चोर का भाषण लगता था पूरा हो चुका था, वह सुनने वालों के मुक़ाबले अधिक निश्चित दिख रहा था। अचानक वह अपने कपड़े ज़मीन से उठाने लगा। उस समय तक वह नंगा ही खड़ा था। उसने अपने कपड़े उन गाड़ियों के मलबे पर फेंक दिए, बरसात की झड़ी ने जिनकी आग को ठंडा कर दिया था। वह इधर से उधर ऐसे टहलने लगा था, मानों अपने नंग-धड़ंग बदन का प्रदर्शन कर रहा हो।
वह दो क़दम आगे बढ़ा, फिर वापस। फिर बड़े ही मोहक ढंग से नाचने लगा। इस बीच उसे खदेड़ने वाले लोग तालियाँ पीट रहे थे। चारों ओर से नौजवानों ने घेरा बना रखा था।
बस-स्टॉप के शेड के नीचे खड़े लोग साँस थामे यह नज़ारा देख रहे थे।
—‘अगर यह किसी फिल्म का सीन नहीं है तो पागलपन ही है।’ पहला बोला।
—‘मुझे इसमें कोई शक नहीं कि यह किसी फिल्म की शूटिंग ही है और वह पुलिस वाला भी कलाकारों में एक है और इसीलिए वहाँ खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा है।’ दूसरे ने अपनी बात जोड़ी।
—‘और वह कार हादसा?’
—‘क्या पता कोई स्पेशल इफ़ेक्ट हो? क्या पता सामने किसी खिड़की से सिनेमा का निर्देशक ही झाँकता मिल जाए।’
उस शेड के सामने एक खिड़की खुली दिखाई दे रही थी, वहाँ से कोई आवाज़ आ रही थी, जिसने सबका ध्यान खींचा। एक तरफ़ तालियों की थपक, ऊपर से बारिश की झमक लेकिन फिर भी उधर सबका ध्यान चला गया। एक बना-ठना आदमी खिड़की से दिखने लगा। खिड़की पर आकर उसने एक ख़ास तरह से सीटी बजाई। थोड़ी देर बाद बिल्डिंग की एक और खिड़की खुली और वहाँ एक औरत प्रकट हुई। वह भी ख़ासी बनी-सँवरी थी। सीटी का जवाब उसने सिर हिलाकर हामी भरते हुए दिया। वे दोनों ही अपनी-अपनी खिड़कियों से ओझल हो गए। कुछ देर बाद दोनों ही बिल्डिंग से एकसाथ निकलते दिखे। बिना बारिश की परवाह किए दोनों हाथ में हाथ डाले चलते रहे। वे गाड़ियों के मलबे के पास आकर खड़े हो गए, आपस में कुछ बतियाते हुए दोनों अपने कपड़े उतारने लगे। वे बिल्कुल नंगे हो गए।
औरत गाड़ी के बाहर पड़े मृत व्यक्ति की लाश पर सिर रखकर लेट गई। पुरुष भी उसकी बगल में लेट गया। दोनों गुत्थमगुत्था हो गए। इस बीच उस चोर का नाचना, मजमे का ताली बजाना और बारिश की झमाझम, सब चलते रहे।
—‘यह तो भयानक है।’ पहला बोला।
—‘अगर यह फिल्म का सीन है तो भी भयानक है। अगर सचमुच का सीन है तो पागलपन ही कहा जा सकता है।’ दूसरा बोला।
—‘और वह पुलिस वाला उधर सिगरेट सुलगा रहा है।’
अचानक लगभग ख़ाली-सी पड़ी उस सड़क पर नया कुछ धड़कने लगा। दक्षिण दिशा से ऊँटों का एक कारवाँ आ रहा था। वे अपना खेमे नाचते चोर के उस मजमे से कुछ ही दूर गाड़ने लगे।
उत्तर दिशा से एक बस यूरोपीय सैलानियों को लेकर आ गई। वह उस नाचते चोर के मजमे से कुछ पीछे की ओर रुक गई। बस में सवार लोग इधर-उधर फैल गए। वे उस प्रेमालिंगन, चोर के नाच, मौत और बारिश से बेख़बर ही दिख रहे थे।
फिर पता नहीं कहाँ से बहुत सारे राज मजदूर आ गए। पीछे से ट्रकों में भरकर पत्थर, सीमेंट आदि आने लगे। आनन-फानन में उन मज़दूरों ने वहाँ बड़ा ही सुंदर एक मकबरा बना दिया। उसके बगल में एक ऊँचा सिंहासन लगाकर, उसे फूलों से सजाने लगे—बारिश हो ही रही थी।
—‘ऐसा लग रहा है मानों हम सपना देख रहे हों।’ पहले ने कहा।
—‘एक दु:स्वप्न, अब यहाँ से निकल लेना चाहिए।’ दूसरे ने कहा।
—’नहीं! इंतज़ार करते हैं। ‘
—‘किस बात का?’
—‘सुखद अंत का।’
—‘या प्रोड्यूसर से बोल दो, वह तबाह हो जाएगा।’
इस बीच कारवाँ सवारों और यूरोपियों में लड़ाई होने लगी। बाकी लोग नाचने-गाने लगे। उस मकबरे के इर्द-गिर्द कई जोड़े आए और गुत्थमगुत्था हो गए। एकदम नग्न। चोर और ज़ोर ज़ोर से नाचने लगा। अचानक सब कुछ अपने चरम पर अ गया। हत्या और नृत्य, संभोग और मृत्यु, बिजली और वर्षा।
एक लंबा-तगड़ा आदमी हाथ में दूरबीन लिए प्रकट हुआ। वह भीड़ से बचता-बचाता सड़क को चारों ओर से दूरबीन से देख-देखकर कहने लगा-बुरा नहीं है...बुरा नहीं है।’
भीड़ भर की निगाहें उस ओर जा लगीं।
—‘क्या यही है?’ पहले ने जैसे प्रश्न पूछा ही।
—‘हाँ, यही निर्देशक है।’ दूसरे ने जैसे जवाब दिया।
वह बिना किसी को देखे सड़क की ओर देखकर बुदबुदा रहा था—‘इसी तरह लगे रहो, नहीं तो हर चीज़ शुरुआत से शुरू कर दूँगा।’
पहले ने आगे बढ़कर साहस करते हुए पूछा—‘तो आप ही निर्देशक हैं?’
वह बिना कोई जवाब दिए अपने काम में लगा रहा। इतने में धड़ से कटा एक सिर लुढ़कता हुआ बस स्टॉप की ओर आया। वह उसकी ओर देखकर बुदबुदाने लगा—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।’
‘लेकिन यह सचमुच का सिर है और सचमुच ख़ून बह रहा है।’ दूसरा आदमी उस पर चिल्लाया।
उस आदमी ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। दूरबीन से उसने गुत्थमगुत्था जोडों को देखा और जैसे आदेश दिया—‘आसन बदल लो, नहीं तो ऊबाऊ लगने लगेगा।’
—‘देखिए, यह सचमुच का सिर है और आपको बताना पड़ेगा कि यह सब क्या हो रहा है?’ —कहते हुए दोनों उसकी ओर बढ़े।
अचानक वह दूरबीन वाला आदमी ऐसे पीछे मुड़ा, जैसे वह अपने आपको उनके पीछे छुपा लेना चाहता हो। अचानक वह बूढ़ा और बीमार दिखने लगा। अचानक वह आदमी उस तेज़ बारिश में तेजी से भागा, पता नहीं कहाँ से उसके पीछे कुछ लोग भागने लगे।
फिर दृश्य से सब ग़ायब हो गए। हत्या, संभोग, नृत्य और बारिश रह गए।
—‘चलो, कम से कम वह निर्देशक तो नहीं था।’ पहला बोला।
—‘फिर, यह था कौन?’
—‘शायद चोर।’
—‘शायद लुटेरा।’
—‘या शायद वह और उसका पीछा करने वाले सिनेमा के सीन का ही हिस्सा रहे हों।’
—‘ये सारी सचमुच की घटनाएँ हैं और इनका किसी फिल्म के दृश्य से कुछ लेना-देना नहीं है।’
—‘इस सबका तो यही तर्क बचता है।’
—‘हमें यहाँ से हर हाल में भाग लेना चाहिए।’
—‘कहीं हमें किसी जाँच दल के सामने गवाही न देनी पड़े।’
—‘कुछ उम्मीद की जा सकती है।’
कहने वाला आदमी पुलिस की ओर बढ़ा और चिल्लाया—‘सार्जेंट!’
उस सिपाही ने खिन्नता से बारिश की ओर देखा, अपना ओवरकोट चढ़ाया और उसकी ओर यानी शेड की ओर बढ़ा। उसने दोनों को सख्ती से घूरते हुए पूछा—‘क्या बात है?”
बिना आँखें हटाए वह बोला—‘इस बस स्टॉप का एक-एक आदमी बस में चढ़कर जा चुका है। तुम यहाँ क्यों खड़े हो?’
‘वह देखिए, आदमी का सिर!’ —पहला आदमी बोला।
—‘अपने-अपने पहचान-पत्र दिखाओ।’
पहचान-पत्रों के निरीक्षण के बाद वह क्रूर हँसी हँसते हुए बोला, ‘आपके यहाँ जमा होने का मकसद क्या था? यहाँ क्यों जुटे थे आप सब?’
उन्होंने एक-दूसरे को देखा और मासूमियत से बोले—‘हममें से कोई पहले से एक-दूसरे को नहीं जानता था।’
‘तुम्हारा यह झूठ चलने वाला नहीं है।’
वह सिपाही दो क़दम पीछे हटा। बंदूक़ से निशाना साधकर उसने घोड़ा दबा दिया। निशाना अचूक था। दोनों एक के बाद एक कटे पेड़ की तरह गिर गए। उनके शरीर तो बस स्टॉप के शेड के नीचे थे और सिर बाहर पैदल चलने वाली पटरी पर बारिश में भीग रहे थे।

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घटा (कहानी) | Ghataa : मार्टी जोनपोल्वी

अगस्त से वह असंतुष्ट था, जबकि उस महीने से मालूम नहीं क्यों उसे सबसे ज़्यादा उम्मीदें थीं। महीने की शुरुआत बरसाती थी। केवल पूर्णमासी के बाद दिन बड़े, स्वच्छ और नीले हुए।
एक समतल रेल यार्ड से रेलवे लाइन चट्टानों को काटती हुई जाती थी। उत्तरी छोर के क्षितिज पर एक बड़ी घटा बढ़ी आ रही थी। अजीब प्रभाव था—बादल का तना एक अनगढ़ पकड़ में जकड़ा लगता था, मानो वह बहुत नीचे चला गया हो और चट्टानों के कटाव में फँस गया हो।
उसने उसे घूरा। ऐसा लगा, मानो वह बादल की झुर्रीदार बाज़ू पर कोई काला दाग़ देख रहा हो। उसके चारों ओर की हवा विरल हो गई, उसे चक्कर आने लगे, साँस लेना कठिन हो गया। अनुभव तेज़ी से एक धुँधली संवेदना में बदल गया। झुर्री की ओर का बादल का धब्बा ग़ायब हो गया था, उसकी एक फ़ीते जैसी पूँछ निकल आई थी और नज़रों से ऐसे ग़ायब हो गई थी, जैसे कोई ग़लत चित्र रेटीना से ओझल हो जाता है। काफ़ी दिनों के बाद उसे मुक्ति का ऐसा अनुभव हुआ, पता नहीं कब और कहाँ से—यह केवल एक संवेदना थी, अनुभूति का बचा हुआ एक अंश, उस क्षण से उपजा, या फिर सारी ज़िंदगी से। उसने सोचा कि घटा की ऊपरी परत से शायद सुदूर आने वाले पतझड़ को देख सकते हैं।
हाट की ओर से प्लास्टिक बैग और सब्ज़ी की टोकरियाँ लिए हुए औरतें उसकी ओर आईं। उनमें से कई सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों की ओर चली गईं। एक गहरे रंग के बालों वाला आदमी ग्रीक रेस्तराँ के दरवाज़े की चौखट पर टेक लगाए हुए था। दरवाज़े के ऊपर की लाइट अभी भी जल रही थी, जबकि यह चमकीली दोपहर थी।
रिटायर्ड लोग बाज़ार के छोर वाले सॉसेज बूथ पर जमा थे। वे हर हाट वाले दिन वहाँ होते। लगता था वे अपने जीवन के बचे दिनों से क्या करना है, इसके बारे में अनिश्चित थे। एक उजाड़ पड़ी सड़ी टेबल के कोने पर एक दीन भिखमंगा झुका हुआ बैठा था। एक रिटायर्ड आदमी ने उसे सॉसेज का एक टुकड़ा दिया।
वह हाट की भीड़ के साथ हो लिया और देखने की कोशिश करने लगा कि मटर के ढेर अभी बाज़ार में दीखने लगे हैं या नहीं। शलजम थे, आलू, गाजर, चुकंदर और पतली मूलियाँ थीं।
“सेब! अच्छे सेब। सुनहरे, पारदर्शी, चख कर देखो!”
लड़की का चेहरा संवेदनशील था और लगता था किसी भी क्षण वह रो पड़ेगी। सेब बढ़ाने वाला हाथ दुबला था और अँगुलियाँ पतली।
जब वह सेब खा रहा था, वह लड़की से बातें करने लगा। उसने साल की फसल के बारे में पूछा। उसे ख़ुद इसका गुण और आकार मालूम था; उसके घर पर बग़ीचे में फलों के भार से पेड़ों की डालियाँ झुक गई थीं। उनमें टाँड़ लगानी पड़ी थी। इस साल भी फसल की खपत में मुश्किल होगी। वह अपने आप को जूस स्टैंड पर खड़ा सेबों को कुचलते और निचोड़ते देख रहा था। यह सितंबर या अक्टूबर की शुरुआत होगी। वह सिट्ठी को प्लास्टिक के बैगों में भर बाहर जाएगा, और बाहर की हवा उसकी भोंह को शीतल कर देगी, उसे बताते हुए कि एक साल और बीत गया। सबसे बड़ी बेवक़ूफ़ी का काम जो वह कर सकता था, वह था उस लड़की से सेब ख़रीदना।
जब वह उसकी बातें सुन रहा था, प्रत्येक चीज़ अनोखे ढंग से बदल गई। यह एक सुखद, उन्मुक्त अंदरूनी भावना थी। उसने उत्तरी दिशा में घटा के लिए देखा, पर हाट के आसपास की ऊँची इमारतों ने उसे नज़रों से छुपा रखा था। कोई भी चीज़ अब पहले जैसी नहीं थी। लोग, सब्जियाँ, कबूतर और समुद्री पक्षी, मौसम से भूरी हो गई टेबल, यहाँ तक कि बाज़ार के रास्ते के काले पत्थर भी...मानो वह उन्हें पहली बार देख रहा हो। मानो उसने बाहर की अंधकारपूर्ण और एकाकी दुनिया से निकलकर एक सघन, प्यार, गर्माहट और रौशनी से भरपूर ज़िंदगी में प्रवेश किया हो और पूछ रहा हो—क्या दुनिया ऐसी ही है? ऐसा लगा मानो लड़की के संग बिताया क्षणिक अंतराल सालों-साल रहा हो।
उसने उससे एक किलो सेब ख़रीदे, एक-एक कर उसकी हथेली पर सिक्के गिने। उसका हाथ शीतल और थोड़ा-सा नम था, जैसे भोर में फल। उसकी नज़र लड़की की बाँह पर पड़ी। सुनहरी, पारदर्शी, उसने सोचा।
हाट लोगों से भरी थी, पर उनका अब कोई महत्व नहीं रह गया था और वह बिना सोचे उनके बीच से रास्ता बनाता चला जा सकता था। उसने वही किया, एक हाथ में सेब का थैला और दूसरे हाथ में अधखाया सेब लिया। पता नहीं क्यों वह डरा हुआ था। यह क्या हो रहा था? बाज़ार के छोर की कॉफ़ी दुकान के लिए उसने चारों ओर देखा, जहाँ बाज़ार के फेरीवाले जाया करते थे।
एक मेहराब की भीतरी अहाते के धुँधलके से हौज़ निकला। इससे निकला पानी फ़ुटपाथ के डामर से टकराया और एक ललछोंह धार में बहता हुआ मैनहोल द्वारा निगल लिया गया। लबादा पहने एक आदमी ने उसका नोज़ल पकड़ा हुआ था। उसके नारंगी लबादे की पीठ पर छपा था—इमारत का रखवाला। उसके रबर बूट के ऊपरी भाग नयेपन से चमक रहे थे, सड़क के जीवन को प्रतिबिंबित करते हुए...राह चलते लोग, पानी से बचते हुए, तेज़ी से अपनी राह पर जाते, दिन के ज़रूरी कामों को अपने मन में लिए।
उसे रुकता देख, आदमी ने दोबारा देखा, इस बार ज़्यादा प्रेम से, शायद इसलिए कि कोई उसके नीरस काम में रस ले रहा था। “डेडमैन का बटन। तुमें मालूम है वह क्या है?” डामर से लाल धब्बा निकल गया, और उसने सोचा कि यहाँ रंग की बाल्टी गिर गई थी।
“जुवोनेन लोकोमोटिव का इंजीनियर हुआ करता था,’’ वह अभी भी प्रश्न के बारे में सोच रहा था, जब रखवाला बोलता गया। “उसका अंतिम काम एक ट्राम ड्राइव करना था।” पानी की धार रुक गई। पानी के दबाव ने हौज़ पर तनाव डाला, लेकिन वह तनाव सह गया। हौज़ दोहरा होकर उसकी बाँह पर झूल रहा था, अपने लबादे की निचली पॉकेट से रखवाले ने सिगरेट का पैक निकाला।
“कैब में केवल ड्राइवर रहता है। डेडमैन का बटन, एक स्विच, ड्राइवर के पैर के पास होता है। जब ड्राइव कर रहे होते हैं, उसके ऊपर पैर रखना होता है। अगर ड्राइवर को कुछ होता है, जैसे बीमारी का दौरा, उसके पैर का दबाव रुक जाता है और इमरजेंसी ब्रेक अपने आप लग जाता है। इसी तरह इसे बनाया गया है ।”
आकाश में सूरज ने जगह बदल ली और इमारत की छाया दीवाल के क़रीब आ गई। डामर जो धूप में था गर्मी से भाप छोड़ने लगा और उससे एक तीखी, गंदी गंध उठने लगी।
“एक बार जब जुवोनेन गाड़ी चला रहा था, लोगों ने उसे ड्राइवर की जगह से पैंसेंजर कंपार्टमेंट की ओर भागते देखा। वहाँ उसने ख़ुद को सीधे फ़र्श पर गिरा दिया। तुरंत ही गाड़ी रुक गई। यात्री अवश्य ही थोड़ा डर गए होंगे। जब जुवोनेन अपना हैट खोज रहा था, उस जगह कंडक्टर आया। जुवोनेन ने बताया कि वह अभ्यास कर रहा था। जब वे एक ओवरपास के सामने पहुँचे, उसने सोचा वह क्या करेगा यदि बगल से लट्ठों से भरा एक ट्रक आए और ठीक उसके सामने रुक जाए।”
“और इस उपाय ने काम किया।”
“उस समय। उस तरह की ट्रिक। उसका अनुभव इतना स्पष्ट था कि उसने बिना अस्तित्व वाले ट्रक को देखा। लेकिन ट्रक केवल उसके दिमाग़ में चल रहा था। लोग कहते हैं कि पहले भी उसने वे चीज़ें देखीं थीं, जो औरों को नहीं दीखतीं थीं।”
बाज़ार के छोर पर एक आदमी एक ट्रक में कंद के बोरे चढ़ा रहा था। रखवाले की नज़रें उसी काम पर टिकीं लग रहीं थीं।
“वह गाड़ी वापस स्टेशन तक ले आया। हालाँकि कंडक्टर उसकी बग़ल में ही था। और उसने उसके बाद कोई ट्रक नहीं देखा। यह जॉब पर उसकी अंतिम शिफ़्ट थी। उसकी ड्राइविंग पर तत्काल रोक लगा दी गई।”
रखवाले ने स्प्रे नोजल की पिस्तौल का घोड़ा दबा दिया और फ़व्वारे के फोर्स को ठीक करने लगा। पानी ने फिर से डामर पर चोट की और फिर से लाल हो गया और पानी मैनहोल के ढक्कन की जाली में अदृश्य हो गया।
“यह जुवोनेन का ख़ून है, “उसने कंधे के ऊपर से कहा। “छठी मंज़िल की बाल्कनी से डेढ़ घंटे पहले वह वहाँ गिरा। पता नहीं उसने वहाँ क्या देखा?”
वह कॉफ़ी के लिए नहीं गया। बाज़ार की गलियों में टेबल के बीच से चलते हुए अब उसकी भावनाएँ वही नहीं थीं।
“सेब! अच्छे सेब। सुनहरे, पारदर्शी। चखकर देखो!”
बिना किसी पहचान की झलक के लड़की ने उसे अपने सेब के ढेर के पीछे से देखा। उसे पक्का करने में कुछ समय लगा—अब वह उसे नहीं जानती थी! खोखे के पास, सड़ी मेज़ के कोने पर वह भिखमंगा अभी भी बैठा था, ज़िंदगी से उतना ही बेज़ार जितना वह स्थान था जहाँ वह बैठा था। रिटायर्ड लोगों का समूह छोटा हो गया था।
उसने उसके बग़ल में सेब का थैला रख दिया, भिखमंगे ने काले पत्थरों पर फुदकते व्यस्त कबूतरों से नज़रें उठाईं पर उन आँखों में कोई संदेश नहीं था।
बाद में, चट्टानों को काटती दूर विलीन होती रेलवे लाइन को देखते हुए उसने पाया कि बादलों का बड़ा खंभा उत्तरी आकाश से ग़ायब हो गया है।

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धूप का टुकड़ा (कहानी) | Dhoop Ka Tukaraa : यासुनारी कवाबाता

मेरी आयु उन दिनों चौबीस वर्ष की थी। पतझड़ का मौसम था। सागर तट की एक आरामगाह में मेरी भेंट उस लड़की से हुई। यह प्यार की शुरुआत थी।
उस लड़की ने अकस्मात् अपना सिर ऊपर उठाया और फिर अपने चेहरे को किमोनो की आस्तीन के पीछे छिपा दिया। जब मेरा ध्यान उसकी इस हरकत की ओर गया तो मुझे लगा कि मैंने अनजाने ही अपनी पुरानी बुरी आदत को दोहराया होगा? यह सोच कर मैं परेशान हो गया और मेरे चेहरे पर दर्द का अहसास उभर आया।
‘मैं तुम्हारी ओर टकटकी बाँधे देख रहा था। क्यों यही बात है न?’
‘हाँ, किंतु यह बुरी नज़र नहीं थी।’ उसकी आवाज़ कोमल थी और उसके शब्द स्वाभाविक थे। मैंने स्वयं को हलका-सा महसूस किया।
‘किंतु मेरे इस प्रकार घूरने से तुम्हें कष्ट हुआ होगा?’
‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं—तुम चिंता मत करो।’
उसने अपने किमोनो की आस्तीन चेहरे से हटा ली। उसके हाव-भाव से लगता था कि उसे अपना चेहरा दिखाने में शर्म महसूस हो रही है। मैंने अपनी गर्दन घुमा ली और समुद्र की ओर देखने लगा। अपने निकट बैठे लोगों की ओर घूर-घूर कर देखने की मेरी-पुरानी आदत है। मैंने अनेक बार अपनी इस आदत छुटकारा पाने के बारे में सोचा था, किंतु अपने आसपास के लोगों के चेहरों की ओर न देखने से मुझे अजीब-सी बेचैनी होने लगती। पर जब मेरा ध्यान अपनी इस घूरती नज़र की ओर आता मुझे आत्मग्लानि का अहसास होने लगता। शायद मेरी इस आदत के पीछे मेरे बचपन की कोई घटना थी। बचपन में ही अपने माँ-बाप का साया उठ जाने और घर से बेघर हो जाने के कारण मुझे पराए लोगों के साथ रहना पड़ा। इसीलिए मैं उनके चेहरों के हाव-भाव की पड़ताल करता रहता था। शायद यहीं से मेरी घूरने की आदत की नींव पड़ी होगी—मैं उस लड़की के सामने बैठा सोच रहा था।
मैंने कितनी बार याद करने कोशिश की कि मेरी इस आदत का आधार कितने दिनों में पुख्ता हुआ था। कभी मुझे लगता कि यह आदत मेरे अपने घर में ही पड़ चुकी थी और कभी मुझे लगता कि मेरी परवरिश दूसरे लोगों के द्वारा होने के दिनों में मेरी यह आदत विकसित हुई थी। किंतु मैं किसी अंतिम निर्णय पर न पहुँच पाता।
पर ख़ैर, जब मैंने अपनी नज़र उस लड़की पर से हटा ली तो मेरा ध्यान सागर तट पर फैली पतझड़ी धूप की ओर चला गया। धूप के इस टुकड़े ने विस्मृत हुई एक घटना को ताज़ा कर दिया।
अपने माँ-बाप की मृत्यु के पश्चात् मैं अपने दादा के साथ रहने लगा था। अपने दादा के साथ उस घर में मैं दस वर्ष तक रहा। मेरे दादा दृष्टिहीन थे। पूर्व की ओर दृष्टि करके, अपने सामने कोयले की अँगीठी जलाए मेरे दादा वर्षों से उस कमरे की उसी जगह पर बैठते आ रहे थे। कभी-कभार वह अपना चेहरा दक्षिण की ओर फेर लेते, किंतु मैंने उन्हें उत्तर की ओर मुँह किए कभी नहीं देखा था। एक दिन अचानक मुझे अपने दादा के एक ओर देखने की इस आदत का अहसास हुआ। मैंने और अधिक ध्यान से देखना आरंभ कर दिया। कितनी बार देर तक मैं अपने दादा के सामने बैठा उसके चेहरे पर टकटकी लगाए रहता। मैं इस प्रतीक्षा में रहता कि शायद वे एक बार उत्तर की तरफ़ भी अपना मुँह घुमा लें, किंतु मेरे दादा स्वचालित खिलौने की भाँति हर पाँच मिनट के बाद सिर्फ़ दक्षिण की ओर ही मुँह घुमाते। उनके बार-बार ऐसा करने से मैं उदास हो जाता। मुझे अजीब-सा लगने लगता, किंतु वास्तव में दक्षिण दिशा की ओर एक धूप वाली जगह थी। मुझे हैरानी होती थी कि एक अंधे आदमी को दक्षिण दिशा के उस धूप के टुकड़े का अहसास कैसे हो जाता था?
अब सागर तट की ओर देखते ही मुझे उस धूप के टुकड़े का अहसास हो आया, जिसे मैं भूल चुका था।
उन दिनों मैं अपने दादा के चेहरे को घूरा करता था और इच्छा करता था कि वे उत्तर दिशा की ओर मुँह घुमा लें, क्योंकि वे अंधे थे इसलिए मैं एकटक उनकी ओर देखता रहता था। अब मुझे लग रहा है कि यही बात और लोगों के चेहरों को घूरने की मेरी आदत का आधार बनी होगी। इसका मतलब हुआ कि मेरी इस आदत की बुनियाद मेरे अपने घर में ही पड़ चुकी थी, अर्थात् आदत मेरे मूल स्वभाव से उत्पन्न नहीं हुई। अब मैं स्वयं को आदत के कारण उत्पन्न आत्मग्लानि से बचा सकता था। इस विचार से मैं बेहद ख़ुश हो गया। बड़ी बात थी कि मेरे मन में उस लड़की के लिए निश्चल होने की इच्छा जागृत हो गई थी।
वह लड़की दोबारा बोली—‘मुझे इसकी आदत पड़ गई है, किंतु फिर भी मुझे शर्म आ रही है।’
उसके इस तरह कहने का अर्थ था कि मैं उसके चेहरे की ओर फिर देख सकता हूँ।
मैंने उसकी ओर देखा तो मेरा चेहरा पहले से अधिक चमक रहा था। उसके चेहरे पर लाज की लाली बिखर गई और उसने मारक निगाहों से मेरी ओर देखते हुए कहा —‘मेरे चेहरे का सौंदर्य दिन-प्रतिदिन घटता जाएगा, इसलिए तुम्हारे इस तरह घूरने की मुझे कोई चिंता नहीं है।’ यह कहते समय वह बच्चों की तरह लग रही थी।
मैं मुस्कुराने लगा, मुझे लगा जैसे हमारे संबंधों में विशेष प्रकार की निकटता आ रही हो।
अकस्मात् मेरा मन हुआ कि मैं उस लड़की और अपने दादा की स्मृतियों को साथ लेकर सागर तट पर फैले उस धूप के टुकड़े के निकट चला जाऊँ।

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शहर (कहानी) | Shahar : हरमन हेस

‘ऐसा लगता है अब हम लोग कहीं पहुँच रहे हैं। इंजीनियर ज़ोर से बोल पड़ा; जैसे ही लोगों, कोयलें, औज़ारों और खाद्य-पदार्थों से भरी हुई दूसरी ट्रेन उस नए इलाके में पहुँची, जहाँ कल ही रेल की पटरियाँ बिछाई गई थीं। घास भरी ज़मीन के उस अछूते विस्तार में सूरज की सुनहली किरणें चमक रही थीं। दूर क्षितिज पर पेड़ों से भरे पहाड़ नीले कुहासे में नहा रहे थे। हरे-भरे मैदान में कोयलें, राख, काग़ज़ और टिन का ढेर उतर रहा था, शोर-गुल हो रहा था और जंगली कुत्ते और बैल यह सब देख रहे थे। आरा मशीन की पहली कर्कश आवाज़ दूर जंगलों को चीरती चली गई, बंदूक़ की पहली गूँज मेघों की गड़गड़ाहट की तरह पर्वतों पर तैर गई, लोहे पर भारी हथौड़े की पहली चोट की ‘घन’ आवाज़ हुई। टिन की छत की एक झोंपड़ी खड़ी हुई, दूसरे दिन लकड़ी का एक घर, फिर दिनों-दिन पत्थर के मकान दिखाई पड़ने लगे। जंगली कुत्ते और बैल वहाँ से दूरी रखने लगे, ज़मीन जोती जाने लगी और उसमें फसल उगी। पहले ही बसंत में वह ज़मीन हरी फसलों से भर गई। वहाँ खेत, अस्तबल और अनाज-घर बनाए गए, ज़मीन काट कर सड़कें बन गईं।
रेलवे स्टेशन बन कर खड़ा हुआ और उसका उद्घाटन भी हो गया। इसके तुरंत बाद एक सरकारी भवन बना, फिर एक बैंक। थोड़ी दूरी पर कुछ ही महीने बाद और भी शहर बसे। जगह-जगह से मज़दूर वहाँ आने लगे। किसान और शहरी, व्यापारी और वकील आए। उपदेशक और शिक्षक आए। कुछ ही दिनों में वहाँ एक स्कूल, तीन धार्मिक सभागृह और दो अख़बार शुरू हो गए। पश्चिमी तरफ़ तेल मिला, नए शहर की उन्नति होने लगी। एक ही वर्ष बाद वहाँ पाकेटमार, सेंधमार, भड़वे, बड़ी दुकान, मद्यनिषेधी संगठन, पेरिस का दर्जी और बावेरियाई बीयर पीने के हॉल आदि सब आ गए। पास के शहरों की स्पर्द्धा से और भी प्रेरणा मिली। अब किसी चीज़ की कमी नहीं थी, चुनाव अभियानों से लेकर हड़ताल तक, सिनेमाघरों से आध्यात्मिक केंद्रों तक सब कुछ था। फ्रांसीसी शराब, नार्वेजियाई मछली, इतावली सॉसेज, अँग्रेज़ी ऊन और रूसी कैवियार भी उपलब्ध हो गए थे। दूसरे दर्जे के गायकों, नर्तकियों और संगीतकारों की टोलियाँ भी कार्यक्रम देने के लिए आने लगी थीं।
धीरे-धीरे एक संस्कृति भी विकसित हुई। वह शहर जो बस एक गुमटी से शुरू हुआ था, अब एक स्थाई रिहायिश में बदल गया। मिलने-जुलने और अभिवादन के तरीक़ों में दूसरे शहरों से शायद ही कोई फ़र्क़ था। जिन लोगों ने इस शहर की स्थापना की थी, लोकप्रिय और सम्मानित हो गए थे, वे यहाँ के महत्वपूर्ण लोगों का मुख्य हिस्सा थे। एक युवा पीढ़ी आ गई, जिसके लिए मानो वह शहर सदी से उसका पुराना घर था। वे दिन जब इसकी स्थापना हुई थी, पहली हत्या, पहली प्रार्थना सभा या पहला अख़बार छपा था अब क़िस्से-कहानियों की चीज़ें बन गए।
यह शहर अब आस-पास के क़स्बों, छोटे शहरों पर दबदबा रखता था। जहाँ पहले राख की ढेरियों के साथ झोंपड़ियाँ खड़ी हुई थीं, वहाँ अब बड़ी और खिली-खिली चौड़ी सड़कें और उनके किनारे बैकों, दफ़्तरों, थियेटरों और चर्चों की भव्य अट्टालिकाएँ थीं। रास्तों पर छात्र घूमते हुए विश्वविद्यालय या पुस्तकालय जाते, अस्पताल की गाड़ियाँ दौड़तीं, किसी राजनेता की लिमोज़ीन निकल जाती और लोग उसे रुतबे से देखते। पत्थर और लोहे से बने बीसियों बड़े स्कूलों में हर साल शहर का स्थापना-दिवस गीत और भाषणों के साथ मनाया जाता। पहले वाला अछूता विस्तार अब मैदानों, कारख़ानों, बस्तियों और दर्ज़नों रेलवे लाइनों से भर गया था। रेलवे लाइनों के कारण अब पहाड़ नज़दीक हो गए थे। वहाँ या सुदूर समुद्र के किनारे धनिकों के ग्रीष्मकालीन आवास बए गए थे।
क़रीब सौ साल बाद शहर एक बड़े भूकंप से ध्वस्त हो गया। पर यह फिर खड़ा हुआ। इस बार पत्थर के मकानों की जगह लकड़ी ने, और बड़े भवनों की जगह छोटे मकानों ने ले ली। संकरे रास्तों को ख़त्म कर खुले रास्ते बनाए गए। इसका रेलवे स्टेशन और स्टॉक एक्सचेंज पूरे देश में बड़ा था। पुनर्निर्मित शहर को वास्तुविदों और कलाकारों ने सार्वजनिक भवनों, पार्कों, फ़व्वारों और मूर्तियों से सजाया। नई शताब्दी में यह शहर देश का सबसे धनी और सुंदर शहर माना जाने लगा। सारी दुनिया से राजनीतिज्ञ और वास्तुविद, इंजीनियर और मेयर यहाँ के भवनों, जल-व्यवस्था, प्रशासन और संस्थाओं का अध्ययन करने आने लगे। शहर के नए टाउन-हाल का निर्माण आरंभ हुआ जो दुनिया में सबसे बड़ा और शानदार था। तरक्की और स्थानीय अभियान बढ़ने के साथ-साथ वास्तुकला और स्थापत्य में नफ़ासत बढ़ी और विकसित होता हुआ यह शहर अभियान और सौंदर्य के चमत्कार में बदल गया। शहर के बीच का हिस्सा, जहाँ की इमारतें एक ख़ास हल्के रंग के पत्थरों से बनी थी, चारों तरफ़ से बड़े सुंदर पार्कों से घिरा था। उसके बाद विस्तृत सड़कें, जिनके किनारे घरों की कतारें खड़ी थीं, दूर-देहातों तक जाकर खो जाती थीं। ख़ूब सराहा जाने वाला एक विशाल संग्रहालय था, जहाँ हमेशा देखने वाले आते रहते थे। उसमें सैकड़ों कमरे, हॉल और बरामदे थे,जिसमें शहर का पूरा इतिहास संभाल कर रखा गया था। एक बड़े हिस्से में शहर की पहली झोंपड़ियों, रास्तों आदि की अनुकृतियाँ जंगली जानवरों और ज़मीनों के साथ अपनी संपूर्ण पृष्ठभूमि में बनी हुई थीं। वहाँ टहलते हुए युवा लोग तंबुओं और झोंपड़ियों, ऊबड़खाबड़ पटरियों से आज चमचमाते हुए शहर तक के अपने इतिहास पर विचार करते। अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन और निर्देश में उन्होंने विकास और प्रगति के महान नियमों को समझना सीखा, कैसे अनपढ़ से सुगढ़, बर्बर से मनुष्य, असभ्यता से सभ्यता और अभाव से समृद्धि बनती है।
शहर की समृद्धि और सुविधाएँ बड़ी तेज़ रफ़्तार से बढ़ीं और अगली शताब्दी में वे शिखर पर पहुँच गईं। तब निचले तबकों की एक ख़ूनी क्रांति ने इस गति का अंत कर दिया। भीड़ ने कई तेल की खदानों में आग लगा दी। कारख़ानों, खेतों और गाँवों समेत क्षेत्र के बड़े हिस्से में आगजनी और भारी बर्बादी हुई। हत्याकांडों और अन्य भयानक कांडों के बावजूद शहर बन गया। बाद के वर्षों में यह उबरा ज़रूर, पर पहले जैसी तरक़्क़ी नहीं रही। फिर कोई नया भवन नहीं बना। इन मुश्किल सालों में समुद्र पार कोई जगह तेज़ी से विकसित हुई। वहाँ की ज़मीन अनाज, लोहा, चाँदी और कई नियामतें बहुतायत से देने लगी। नई जगह ने नए उद्यमियों को आकर्षित किया। पुरानी दुनिया की आकांक्षाएँ और प्रयत्न उधर जाने लगे। रातों-रात ज़मीन से शहर खड़े होने लगे। जंगल ग़ायब हो गए। जल प्रपातों को इच्छानुरूप आकार दिया जाने लगा।
धीरे-धीरे वह पुराना सुंदर शहर ग़रीब होने लगा। वह एक समाज का मन और मस्तिष्क तथा कई देशों का बाज़ार और स्टॉक एक्सचेंज नहीं रह गया। नए दौर की उथल-पुथल में यह बस बना रह सका एवं अपनी पुरानी समृद्धि के कुछ टूटे तार बचाए रख सका, इससे अधिक कुछ नहीं। इसके जो निवासी इसे छोड़कर नई दुनिया की ओर नहीं गए, वे कुछ नया नहीं बना सके। व्यापार में ठहराव आ गया था और पैसे बनाने के अवसर बहुत कम रह गए थे। किंतु अब इस पुरानी, सांस्कृतिक भूमि पर अध्यात्मिक जीवन का प्रस्फुटन होने लगा। इस मरते हुए शहर में विद्वान और कलाकार, चित्रकार और कवि पैदा होने लगे, जिन्होंने कभी इस ज़मीन पर पहले मकान बनाए थे। उनके वंशज अब यहाँ देर से उदित हुए कलामय जीवन को देख कर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने काई से आच्छादित बाग़ों की उदास गरिमा के चित्र बनाए जिनमें जर्जर मूर्तियाँ और हरे तालाब थे या वे प्राचीन वीरतापूर्वक युग की उथल-पुथल अथवा पुराने महलों में रह रहे थके लोगों के मूक स्वप्न के बारे में संवेदनशील कविताएँ लिखते थे।
एक बार फिर इस शहर का नाम और ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। चाहे बाहरी दुनिया युद्धों से हिलती रहे और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में व्यस्त रहे—यहाँ के लोग शांतिपूर्ण एकाकीपन और प्राचीन गौरव के स्वप्नों में जी सकते थे। यहाँ की शांत सड़कें फलती-फूलती डालियों से आच्छादित थीं; मौसम की मार झेलते हुए विशाल भवनों के अग्रभाग नि:शब्द चौराहों को देखते होते और काई जमे फ़व्वारे संगीतमय राग सुनाते।
एक या दो सदी तक दुनिया के युवा लोग इस पुराने स्वप्निल शहर को चाहते और सम्मान करते रहे। कवियों और पर्यटकों ने भी इसे सराहा, किंतु जीवन अधिकाधिक दूसरे देशों की ओर मुड़ता जा रहा था। स्वयं इस शहर में पुराने बाशिंदों की अगली पीढ़ियाँ लुप्त होती जा रही थीं। सांस्कृतिक हलचलों का दौर भी बहुत पहले छूट चुका था और अब उसके सड़ते अवशेष ही बाक़ी बचे थे। इसके आस-पास के छोटे-छोटे शहर वीरान और खंडहरों में बदल चुके थे। कभी-कभार विदेशी चित्रकार या पर्यटक यहाँ आते और समय-समय पर जिप्सी दल तथा भगोड़े अपराधियों का वहाँ बसेरा होता।
शहर से थोड़ा हटकर एक भूकंप आया, जिसने पास की नदी की धारा बदल दी। वहाँ की भूमि का एक हिस्सा दलदल में और शेष रेगिस्तान में बदल गया। धीरे-धीरे पहाड़ से पुराना जंगल नीचे उतरने लगा और पुराने ग्रीष्म-आवासों तथा पत्थर के पुलों के भग्नावशेषों को अपने क़ब्ज़े में लेने लगा। विशाल प्रांतर को वीरान देखकर जंगल ने उसे टुकड़े-टुकड़े अपनी गिरफ़्त में लेना आरंभ कर दिया। दलदलों पर रहस्यमय हरियाली छाने लगी और खंडहरों पर बड़े-बड़े पेड़ उग आए।
अंतत: शहर से बाशिंदे उठ गए। जो बचा वह एक अनाम क़िस्म का खंडहर। जंगली और विचित्र क़िस्म के प्राणी उन टूटते खंडहरों में दिखाई देते और कभी सड़कों और बग़ीचों पर अपनी बकरियाँ चराते। दलदलों के बनने के बाद ज्वर का एक दौर आया जिसमें इस तरह की आबादी भी रोगों और व्याधियों से मृत्यु को प्राप्त हुई। अंत में सब कुछ वीरान हो गया।
पुराना टाउन हॉल जो अपने समय का गौरव था, टूटा-फूटा पर अभी लंबा और सीधा खड़ा था। दुनिया भर के गीतों में अभी भी इसकी चर्चा होती थी और पड़ोसी लोगों के बीच इसके बारे में अनेक कहानियाँ प्रचलित थीं। इन पड़ोसी स्थानों के शहर भी उपेक्षित हो चुके थे। उनकी सभ्यताओं का भी पतन हो रहा था। इस शहर से जुड़े नामों और पुरानी भव्यता की चर्चा बच्चों की भुतहा कहानियों में होती थी और कभी-कभी दूर फलते-फूलते देशों से अध्येता कठिन यात्राएँ कर इसके खंडहरों का अध्ययन करने आते। इसके रहस्यों पर उन देशों के स्कूली लड़के ख़ूब चर्चा करते। ठोस सोने के दरवाज़ों और जवाहरात के गुंबदों की बात होती। कहा जाता है कि इस क्षेत्र की खानाबदोश जनजातियों के पास अभी भी उस पुराने, चमत्कारी अतीत के अवशेष सुरक्षित हैं।
लेकिन जंगल और नीचे आते गए, पहाड़ों से समतलों तक। झरनों और नदियों का आगमन और प्रस्थान हुआ। जंगल और बढ़े, धीरे-धीरे पूरे प्रदेश, पुरानी दीवालों, महलों, मंदिरों और संग्रहालयों पर उसने अपनी चादर ओढ़ा दी। लोमड़ी, नेवले, भेड़िये और भालुओं का पूरे विस्तार में निवास हो गया।
एक टूटे महल के खंडहर में एक नया चीड़ वृक्ष खड़ा होने लगा। केवल एक ही साल पहले इसने जंगल के निकट आने की सूचना दी थी। पर अब जब इसने आस-पास देखा तो दूर-दूर तक छोटे-छोटे पेड़ जड़ जमाते खड़े होते जा रहे थे।
‘लगता है, अब हम लोग कहीं पहुँच रहे हैं!’ एक कठफोड़वे ने उल्लास से आवाज़ लगाई, जो एक डाल पर चोट करता जा रहा था और संतोष के साथ बढ़ते जंगल को देख रहा था जिसकी शानदार हरियाली पूरी धरती को आच्छादित करती जा रही थी।

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पागल की डायरी (कहानी) | Paagal Ki Daayaree : लू शुन

दो भाई थे। उनके नाम नहीं बताऊँगा। मेरे स्कूल के दिनों के साथी थे। दोनों से ही अच्छा मेल-जोल था। परंतु कई वर्ष तक मेल-मुलाक़ात न हो सकी और संपर्क टूट गया। कुछ महीने पहले सुना कि उनमें से एक बहुत बीमार है। मैं अपने गाँव लौट रहा था, सोचा रास्ते में उन लोगों के यहाँ भी होता चलूँ। उनके घर गया तो एक ही भाई से मुलाकात हुई। उसने बताया कि छोटा भाई बीमार था।मित्र ने कहा, “तुम्हारे दिल में कितना स्नेह है। हम लोगों का ख़याल कर इतनी दूर से मिलने के लिए आए हो। अब छोटे भाई की तबीयत ठीक है। उसे सरकारी नौकरी मिल गई है, वहीं गया है।” बड़े भाई ने हँसते-हँसते दो मोटी-मोटी जिल्दों में लिखी डायरी मुझे दिखाई और बोला कि अगर कोई इस डायरी को पढ़ ले तो भाई की बीमारी का रहस्य समझ जाएगा और अपने पुराने दोस्त को दिखा देने में हर्ज़ भी क्या है। मैं डायरी ले आया और उसे पढ़ डाला। समझ गया कि बेचारा नौजवान अजीब आतंक और मानसिक यंत्रणा से पीड़ित था। लिखावट बहुत उलझी-उलझी और असंबद्ध थी। कुछ बेसिरपैर के आरोप भी थे। पृष्ठों पर तारीखें नहीं थीं। जगह-जगह स्याही के रंग और लिखावट के अंतर से अनुमान हो सकता था कि ये जब-तब आगे-पीछे लिखी गई चीज़ें होंगी। कुछ बातें संबद्ध भी जान पड़ती थीं और समझ में आ जाती थीं। चिकित्सा विज्ञान में ख़ोज की दृष्टि से उपयोगी हो सकने वाले कुछ पृष्ठों को मैंने नकल कर लिया। डायरी की एक भी बेतुकी बात को मैंने बदला नहीं, बस नाम बदल दिए हैं। हालाँकि दूर देहात के उन लोगों को जानता भी कौन है। शीर्षक स्वयं लेखक का ही दिया हुआ है। यह दिमाग़ ठिकाने आ जाने पर ही दिया होगा। मैंने उसे नहीं बदला।1आज रात चाँद ख़ूब उजला है। तीस वर्ष हो गए, चाँद को नहीं देख पाया। इसलिए आज इस चाँदनी में मन में उत्साह उमड़ता जा रहा है। आज अनुभव कर रहा हूँ कि बीते तीस वर्ष अंधकार में ही बिता दिए; परंतु अब बहुत चौकस रहना होगा। अवश्य कोई बात है। वरना चाओ परिवार का कुत्ता भला दो बार मेरी ओर क्यों घूरता? हाँ, समझता हूँ, मेरी आशंका अकारण नहीं है।2आज अंधेरी रात है। चाँद का कहीं पता नहीं। लक्षण शुभ नहीं हैं। आज सुबह बाहर गया तो बहुत सावधान था। चाओ साहब ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मुझे देखकर डर गए हों, मानो मेरा ख़ून करना चाहते हों। सात-आठ दूसरे लोग भी थे। एक-दूसरे से फुसफुसाकर मेरी बात कर रहे थे और मेरी नज़र से बचने की कोशिश कर रहे थे। जितने लोग मिले, सबका वही हाल था। उनमें जो सबसे डरावना था, मुझे देखते ही दाँत निकालकर हँसने लगा। मैं सिर से पाँव तक काँप पड़ा। समझ गया, इन लोगों ने सब तैयारी कर ली है।मैं डरा नहीं, अपनी राह चलता गया। कुछ बच्चे आगे-आगे जा रहे थे। वे भी मेरी ही बात कर रहे थे। उनकी नज़रें चाओ साहब की ही तरह थीं और चेहरे डर से ज़र्द पड़ गए थे। सोच रहा था, मैंने इन लड़कों का क्या बिगाड़ा है? ये “क्यों, क्या बात है?” क्यों मुझसे ख़फ़ा हैं? रहा नहीं गया तो मैं पुकार बैठा, मगर तब वे सब भाग गए।कुछ समझ नहीं पाता कि चाओ साहब से मेरा क्या झगड़ा है? राह चलते लोगों का मैंने कब क्या बिगाड़ा है? बस, इतना याद है कि बीस वर्ष पहले कू च्यू साहब की वर्षों पुरानी बही पर मेरा पाँव पड़ गया था और कू साहब बहुत नाराज़ हो गए थे। पर कू का चाओ से क्या मतलब? एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं। हो सकता है, चाओ ने इसके बारे में किसी से सुन लिया हो और मुझसे उसका बदला लेने की ठान ली हो। वह राह चलते लोगों को मेरे विरुद्ध भड़काते रहते हैं; पर इन बच्चों को इस सबसे क्या मतलब? ये लोग तो तब पैदा भी नहीं हुए थे। ये लोग मुझे ऐसे घूर-घूर कर क्यों देखते हैं? मानो डरे हुए हों, मेरा ख़ून कर देने की घात में हों। बहुत घबराहट होती है, क्या करूँ? अजब परेशानी है।मैं समझता हूँ इन लोगों ने यह सब ज़रूर अपने माँ-बाप से सीख लिया होगा!3रात में नींद नहीं आती। बिना अच्छी तरह सोचे-विचारे कोई भी बात समझ में नहीं आ सकती।इन लोगों को देखो—कई लोगों को मजिस्ट्रेट कठघरे में बंद करवा चुका है; बहुत से लोग आसपास के अमीर-उमरावों से मार खा चुके हैं; बहुतों की बीवियों को सरकारी अमले के लोग छीन ले गए हैं; कइयों के माँ-बाप साहूकारों से परेशान होकर गले में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर चुके हैं। पर इन सब बातों को याद करके भी इन लोगों की आँखों में कभी इतना ख़ून नहीं उतरा होगा, इन्हें कभी इतना ग़ुस्सा नहीं आया होगा, जितना कि कल देखने में आया।उस औरत को क्या कहूँ? कल गली में अपने लड़के को पीट-पीटकर चीख़ रही थी, “बदमाश कहीं का! तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगी! तेरी बोटी-बोटी काट डालूँगी! तूने मेरा कलेजा जला दिया!” वह बार-बार मेरी तरफ़ देखने लगती थी। मैं काँप उठा, बड़ी घबराहट हुई। क्रूर चेहरे, लंबे-लंबे दाँतों वाले लोग हँसने लगे। बुजुर्ग छन झट आगे बढ़ आया और मुझे पकड़कर घर ले आया।छन मुझे घर लिवा लाया। सब लोग ऐसे बन गए मानो पहचानते ही न हों। मैंने उनकी आँखें पहचानीं। उनकी नज़रों में भी वही गली के लोगों वाली बात थी। मैं अध्ययन-कक्ष में आ गया तो उन्होंने झट दरवाज़ा बंद कर दिया और साँकल लगा दी, जैसे मुर्ग़ी या बत्तख़ को दरबे में बंद कर दिया गया हो। मैं और भी परेशान हो गया।कुछ दिन पहले की बात है। शिशु-भेड़िया गाँव से हमारा एक असामी फसल के चौपट होने की ख़बर देने आया था। उसने मेरे बड़े भाई को बताया कि गाँव के सब लोगों ने मिलकर देहात के एक बदनाम दिलेर गुंडे को घेर लिया और मार-मारकर उसका काम तमाम कर दिया। कुछ लोगों ने उसका सीना फाड़कर दिल और कलेजा निकाल लिया, उन्हें तेल में तला और बांटकर खा गए कि उनका भी हौसला बढ़ जाए। मुझसे रहा नहीं गया और मैं बोल पड़ा। भैया और असामी दोनों मुझे घूरने लगे। बिलकुल ऐसे ही घूर रहे थे, जैसे आज सड़क पर लोगों की नज़रें।यह सब सोचकर एड़ी से चोटी तक सारा बदन सिहर उठता है।ये लोग आदमखोर हैं, ये मुझे भी खा सकते हैं।याद आया, वह औरत कह रही थी, “तेरी बोटी-बोटी काट डालूँगी!” क्रूर चेहरों पर लंबे दाँत निकाले लोग हँस रहे थे, और उस असामी ने जो कहानी सुनाई...ये सब गुप्त संकेत हैं। इन लोगों की बातों में कितना विष भरा है। इनकी हँसी खंजर की धार की तरह काटती है। इनके ये लंबे-लंबे सफ़ेद दाँत आदमियों के हाड़-माँस चबा-चबा कर चमक गए हैं। ये सब आदमखोर हैं। मैं जानता हूँ, यद्यपि मैं कोई बुरा आदमी नहीं, पर जब से कू साहब की बही पर मेरा पाँव पड़ा है, लोग मेरे पीछे पड़ गए हैं। इन लोगों के मन में ऐसी गांठ पड़ गई है कि मैं कुछ कर ही नहीं सकता। ये लोग किसी से एक बार बिगड़ जाते हैं तो उसे बदमाश समझ लेते हैं। ख़ूब याद है, बड़े भाई मुझे निबंध लिखना सिखाया करते थे। कोई आदमी कितना ही भला रहा हो, यदि मैं उसके दोष दिखा देता तो उन्हें बहुत पसंद आता था। साथ ही यदि मैं किसी के दोषों पर पर्दा डाल देता तो कह बैठते, “बहुत ख़ूब! यह तुम्हारी नई सूझ है।” इन लोगों के मन की थाह कैसे पा सकता हूँ—ख़ासकर जब ये लोग किसी को खा जाने की बात सोच रहे हों।बहुत गहराई से विचार किए बिना कुछ समझ पाना कठिन है। याद पड़ता कि आदिम लोग प्राय: नर-माँस खाते थे, पर बिलकुल ठीक याद नहीं पड़ रहा। इस विषय में इतिहास की पुस्तकों में भी ख़ोज करने का यत्न किया, कहीं क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिला। “सद्गुण और सदाचार” यही शब्द सभी पृष्ठों पर मिलते हैं। नींद किसी तरह नहीं आ रही थी, इसलिए बहुत ध्यान से आधी रात तक पढ़ता रहा। जहाँ-तहाँ वास्तविक अभिप्राय समझ में आने लगा। सारी किताब में सब जगह जगह एक ही बात थी, “मनुष्य को खा जाओ”। पुस्तक में लिखी ये सारी बातें, उस असामी की सारी बातें, मेरी ओर कैसे घूर रही हैं, गूढ़ मुस्कुराहट से!मैं भी तो मनुष्य हूँ और ये लोग मुझे खा जाना चाहते हैं।4सुबह कुछ देर से चुपचाप बैठा था। न खाना लेकर कमरे में आया—एक कटोरे में सब्ज़ी थी, दूसरे में भाप से पकाई हुई मछली। मछली की आँखें पथराई हुई सफ़ेद थीं, मुँह खुला हुआ था, जैसे कोई भूखा आदमखोर मुँह खोले हुए हो। मैं खाने लगा, ग्रास निगलता जा रहा था। नहीं मालूम मछली खा रहा या नर-माँस। सब उगल डाला।मैंने छन से कहा, “छन दादा, भैया से कहो इस कोठरी में मेरा दम घुटा जा रहा है, ज़रा आँगन में टहलूँगा।” छन चुपचाप चला गया। तुरंत ही लौटकर आया और उसने दरवाज़ा खोल दिया।मैं कोठरी में ही बैठा रहा, उठा नहीं। सोच रहा था, ये लोग अब क्या करेंगे? यह तो जानता था कि मुझे हाथ से निकल नहीं जाने देंगे। इतना तो निश्चित था। भैया आहिस्ता-आहिस्ता क़दम रखते एक बुजुर्ग को साथ लिए आ पहुँचे। बुड्ढे की ख़ून की प्यासी आँखों में कटार की-सी चमक थी। वह मुझसे आँख नहीं मिलाना चाहता था कि कहीं मैं ताड़ न लूँ, इसलिए गर्दन झुकाए था। चश्मे के भीतर से कनखियों से मेरी ओर देख लेता था।“आज तो तुम्हारी तबीयत बहुत अच्छी लग रही है।” भैया बोले।मैंने हामी भरी।“तुम्हें दिखाने के लिए ही हो साहब को बुलवाया है।” भैया ने कहा।“बहुत अच्छा,” मैंने कहा, पर समझ गया कि यह बुड्ढा असल में एक जल्लाद है, जो हकीम बनकर आया है! मेरी नब्ज़ देखने के बहाने वह मुझे टटोलकर माँस का अनुमान लगा रहा था। इस सेवा के लिए उसे भी मेरे माँस का हिस्सा पाने की आशा थी। इस पर भी मैं डरा नहीं। मैं आदमखोर नहीं हूँ, पर उन लोगों से अधिक साहस मुझमें है। मैंने अपनी दोनों कलाइयाँ आगे बढ़ा दीं, यह सोचकर कि देखूँ क्या करता है? बुड्ढा चौकी पर बैठ गया, आँखें मूँदे मेरी नब्ज़ देखता रहा। कुछ देर सोच में मौन रहा, फिर अपनी धूर्त आँखें खोलकर बोला, “अपने विचारों को भटकने मत दो, फ़िक्र बिलकुल मत करो। कुछ दिनों तक पूरा आराम करो। चैन से रहो, तुम्हारी सेहत बिलकुल ठीक हो जाएगी।”अपने विचारों को भटकने मत दो! बिलकुल फ़िक्र मत करो! कुछ दिन पूरा आराम करो! चैन से रहो! हाँ, जब मैं ख़ूब मोटा हो जाऊँगा तो इन्हें ख़ूब माँस मिलेगा, पर मुझे इससे क्या मिलेगा? यह क्या सेहत का ठीक होना है? यह इन सब आदमखोरों का नर-माँस के लिए लालच और साथ ही भलमनसाहत का दिखावा है। कायरता के कारण ये लोग तुरंत कार्यवाही करने का साहस नहीं कर पाते—यह देखकर हँसी के मारे पेट में बल पड़ने लगते हैं। मेरी हँसी रुक न सकी और मैं ठहाका लगाकर हँस पड़ा। ख़ूब मज़ा आया। मैं जानता था इस हँसी में निर्भीकता और सत्यनिष्ठा छिपी है। भैया और बूढ़े हकीम के चेहरे पीले पड़ गए। वे लोग मेरी निर्भीकता और सत्यनिष्ठा देखकर डर गए।मैं निडर हूँ, साहसी हूँ, इसीलिए तो वे लोग मुझे खा जाने के लिए और अधिक आतुर है, ताकि मेरा दमदार कलेजा खाकर उनका हौसला और बढ़ सके। बूढ़ा हकीम उठकर चल दिया। जाते-जाते भैया के कान में कहता गया, “इसे अभी खाना है!” भैया ने सिर झुकाकर हामी भर ली। अब समझ में आया! विकट रहस्य खुल गया। मन को धक्का तो लगा, पर यह तो होना ही था। मुझे मालूम ही था—मेरा अपना ही भाई मुझे खा डालने के षड्यंत्र में शामिल है!यह आदमखोर मेरा अपना ही बड़ा भाई है!मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!मुझे दूसरे लोग खा जाएँगे, लेकिन फिर भी मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!5कुछ दिनों से दूसरी ही बात मन में आ रही है—हो सकता है हकीम के वेष में बूढ़ा जल्लाद न हो, हकीम ही हो; अगर ऐसा भी है तो भी वह आदमखोर तो है ही। वैद्यों के पुरखे ली शी-चन की जड़ी-बूटियों की पोथी में साफ़ लिखा है कि नर-माँस को उबालकर खाया जा सकता है; सो वह वैद्य आदमखोर नहीं तो क्या है?बड़े भाई का क्या कहना, वे तो आदमखोर हैं ही। जब मुझे पढ़ाते थे तो अपने मुँह से कहते थे, “लोग अपने बेटों को एक दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाते हैं” और एक बार एक बदमाश के लिए उन्होंने कहा था कि उसे मार डालने से ही क्या होगा, “उसका गोश्त खा डालें और उसकी खाल को बिछावन बना लें!’’ तब मेरी उम्र कच्ची थी। सुनकर दिल देर तक धड़कता रहा। जब शिशु-भेड़िया गाँव के असामी ने एक बदमाश का कलेजा निकालकर खा जाने की बात कही थी, तब भी भैया को कुछ बुरा नहीं लगा था। सुनकर चुपचाप सिर हिलाते रहे थे, जैसे ठीक ही हुआ हो। मुझसे छिपा क्या है, वे तो पहले की ही तरह खूँखार हैं। चूँकि “बेटों को एक-दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाना” संभव है, तो फिर हर चीज़ को बदला जा सकता है, हर किसी को खाया जा सकता है। उन दिनों भैया जब ऐसी बातें समझाते थे तो मैं सुन लेता था, सोचता नहीं था। पर अब ख़ूब समझ में आता है कि ऐसी बातें कहते समय उनके मुँह में नर-माँस का स्वाद भर आता होगा और उनका मन मनुष्य को खाने के लिए व्याकुल हो उठता होगा।6घना अंधेरा है। जान नहीं पड़ता रात है या दिन। चाओ परिवार का कुत्ता फिर भौंक रहा है। बब्बरशेर की तरह खूँखार, खरहे की तरह कातर, लोमड़ी की तरह धूर्त।...7 मैं उन लोगों को ख़ूब जानता हूँ। किसी को एकदम मार डालने को ये तैयार नहीं है। ऐसा कर सकने का साहस इन लोगों में नहीं है। परिणाम के भय से इनकी जान निकलती है, इसलिए ये लोग षड्यंत्र रचकर जाल बिछा रहे हैं, मुझे आत्महत्या कर लेने के लिए विवश कर रहे हैं। कुछ दिनों से गली के पुरुषों और स्त्रियों का बरताव देख रहा हूँ और बड़े भाई का रंग-ढंग भी देख रहा हूँ। मैं सब समझता हूँ। ये लोग तो चाहते हैं कि कोई घर की धन्नी से फँदा लगाकर इनके लिए मर जाए। क़त्ल के लिए कोई इन पर उँगली न उठा सके और ये लोग जी भरकर खाएँ। ये लोग इसी बात की कल्पना करके ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे। चाहे कोई आदमी चिंता और संकट से सूख-सूख कर आत्महत्या कर ले और उसके शरीर में रक्त-माँस कुछ भी न रहे, ये लोग उसे भी खाने के लिए लालायित रहते हैं।ये लोग केवल मुरदार गोश्त खाते हैं! याद आता है, एक घिनौने जानवर के बारे में पढ़ा है। उसकी आँखें बड़ी डरावनी होती हैं। हाँ, उसे लकड़बग्घा कहते हैं। लकड़बग्घा अक्सर मुरदार गोश्त खाता है। मोटी से मोटी हड्डी दांतों में चबाकर निगल जाता है। ख़याल आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लकड़बग्घे की जाति भेड़िये से मिलती है और भेड़िया कुत्ते की जाति का होता है। उस दिन चाओ परिवार का कुत्ता बार-बार मेरी ओर देख रहा था। मालूम होता था वह कुत्ता भी षड्यंत्र में शामिल है। बूढ़ा हकीम नजरें झुकाए था, पर मैं तो ताड़ गया!सबसे अधिक दुख तो मुझे अपने बड़े भाई के लिए है। वह भी तो आदमी है, उसे डर क्यों नहीं लगता। मुझे खा डालने के लिए वह भी दूसरों के साथ क्यों मिल गया है! शायद जो होता चला आया है उसे करते जाने में लोग अपराध और दोष नहीं समझते। या मेरा भाई जानता है कि यह अपराध है, पाप है, पर उसने पाप करने के लिए अपना दिल पत्थर-सा बना लिया है?सबसे पहले मैं इसी आदमखोर का भण्डाफोड़ करूँगा। सबसे पहले इसी को पाप से रोकूँगा। 8वास्तव में तो यह तर्क बहुत पहले ही मान लिया जाना चाहिए था...अचानक कोई भीतर आ गया। यही बीस-एक वर्ष का नौजवान होगा। चेहरा उसका ठीक-ठीक नहीं देख सका। उस पर मुस्कुराहट खेल रही थी। लेकिन जब उसने गर्दन झुकाकर मेरा अभिवादन किया तो उसकी मुस्कान बनावटी-सी लगी। मैंने पूछ ही लिया, “बताओ नर-माँस खाना उचित है?”वह मुस्कुराता रहा और बोला, “क्या कहीं अकाल पड़ा है, नर-माँस कोई क्यों खाएगा?”मैं भाँप गया, यह भी उन्हीं के दल का था। मैंने साहस किया और फिर कहा—“मेरी बात का उत्तर दो!”“आख़िर इस प्रश्न का मतलब क्या है? ...क्या मज़ाक कर रहे हो? ...कितना सुहावना मौसम है!”“हाँ मौसम अच्छा है, चाँदनी ख़ूब उजली है। पर तुम मेरी बात का जवाब दो, क्या यह उचित है?”वह कुछ परेशान हो गया और बोला —“नहीं।...”“नहीं, तो फिर लोग ऐसा क्यों करते हैं?”“तुम्हारा मतलब क्या है?”“मेरा मतलब? शिशु-भेड़िया गाँव में लोग नर-माँस खा रहे हैं। तुम पोथियाँ-ग्रंथ उठाकर देख लो। सब जगह यही लिखा है, ताज़ा लाल-लाल अक्षरों में।”वह गुमसुम रह गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया। मेरी ओर घूरकर बोला, “होगा, सदा से ही होता आया है।...“सदा से होता आया है, क्या इसीलिए उचित है?”“मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता। तुम्हें भी इन फिजूल के झगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए। ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए।”मैं झट से उछल पड़ा, आँखें फाड़कर इधर-उधर देखने लगा। वह आदमी ग़ायब हो गया था। मैं पसीना-पसीना हो रहा था। नौजवान की उम्र मेरे भाई से बहुत कम थी, मगर वह भी उन लोगों के साथ था। अपने माँ-बाप से सब सीख लिया है उसने, भगवान जाने, अपने बेटे को भी सिखा चुका होगा! तभी तो ये ज़रा-ज़रा से छोकरे मुझे यों घूर-घूर कर देखते हैं।9दूसरों को खा लेने का लालच, परन्तु स्वयं आहार बन जाने का भय। सबको दूसरों पर संदेह है, सब दूसरों से आशंकित हैं।..यदि इस परस्पर भय से लोगों को मुक्ति मिल सके तो वे निश्शंक होकर काम कर सकते हैं, घूम-फिर सकते हैं, खा-पी सकते हैं, चैन की नींद सो सकते हैं। बस, मन से वह एक विचार निकाल देने की ज़रूरत है। परंतु लोग यह कर नहीं पाते और बाप-बेटे, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र, गुरु-शिष्य, एक दूसरे के जानी दुश्मन और यहाँ तक कि अपरिचित भी एक-दूसरे को खा जाने के षड्यंत्र में शामिल हैं, दूसरों को भी इसमें घसीट रहे हैं और इस चक्कर से निकल जाने को कोई तैयार नहीं।10आज सुबह बड़े भैया से मिलने गया। वे ड्योढ़ी के सामने खड़े आकाश की ओर ताक रहे थे। मैं उनके पीछे दरवाज़े और उनके बीच खड़ा हो गया। बहुत ही विनय से बोला—“हाँ, कहो क्या है?” उन्होंने तुरंत मेरी ओर घूमकर सिर हिलाते हुए इजाज़त दी।“बात कुछ ख़ास नहीं है, पर कह नहीं पा रहा हूँ। भैया, आदिम अवस्था में तो शायद सभी लोग थोड़ा-बहुत नर-माँस खा लेते होंगे। जब लोगों का जीवन बदला, उनके विचार बदले, तो उन्होंने नर-माँस त्याग दिया। वे लोग अपना जीवन सुधारना चाहते थे। इसलिए वे सभ्य बन गए, उनमें मानवता आ गई। परंतु कुछ लोग अब भी खाए जा रहे हैं—मगरमच्छों की तरह। कहते हैं जीवों का विकास होता है, एक जीव से दूसरा जीव बन जाता है। कुछ जीव विकास करके मछली बन गए हैं, पक्षी बन गए हैं, बंदर बन गए हैं। ऐसे ही आदमी भी बन गया है। परंतु कुछ जीवों में विकास की इच्छा नहीं होती। उनका विकास नहीं होता, वे सुधरते ही नहीं, रेंगने वाले जानवर ही बने रहते हैं। नर-माँस खाने वाले असभ्य लोग नर-माँस न खाने वाले मनुष्यों की तुलना में कितना नीचे और लज्जित अनुभव करते होंगे। बंदर की तुलना में रेंगने वाले जानवर नीचे हैं, परंतु नर-माँस न खाने वाले सभ्य लोगों की तुलना में नर-माँस खाने वाले लोग उनसे भी नीचे हैं।“पुराने समय में ई या ने अपने बेटे को उबालकर च्ये और चओ के सामने परोस दिया था। यह एक पुरानी कहानी है। इससे पहले भी जिस दिन से फान कू ने आकाश और पृथ्वी बनाए हैं, ई या के बेटे के ज़माने से श्वी शी-लिन के ज़माने तक मनुष्य एक दूसरे को खाते रहे हैं। श्वी शी-लिन के ज़माने से शिशु-भेड़िया गाँव में पकड़े गए आदमी के जमाने तक यही होता रहा है। पिछले साल शहर में एक अपराधी की गर्दन काट दी गई थी। ख़ून बहता देखकर तपेदिक के एक मरीज़ ने उसके ख़ून में रोटी डुबोकर खा ली थी।“ये लोग मुझे खा जाना चाहते हैं। इन सब लोगों को अकेले रोक पाना तुम्हारे बस का नहीं; पर तुम उनमें क्यों मिल गए हो? ये लोग आदमखोर ठहरे, जो न कर डालें! ये मुझे खा डालेंगे, उसके बाद तुम्हारी भी बारी आएगी। फिर ये लोग आपस में भी एक-दूसरे को नहीं छोड़ेंगे। भैया, अगर तुम लोग आज ही यह रास्ता छोड़ दो, तो सबको चैन मिल जाएगा। माना, बहुत-बहुत पुराने समय से ऐसा ही होता चला आया है, आदमी आदमी को खाता आया है। पर अब, ख़ासकर इस समय तो हम लोग आपस में एक-दूसरे पर दया कर सकते हैं और कह सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा! भैया मुझे विश्वास है कि तुम ऐसा कहोगे। अभी उस दिन वह असामी लगान घटा देने के लिए कह रहा था। तब भी तुमने कह दिया था, ऐसा नहीं हो सकता।”भैया पहले तो बेपरवाही दिखाने को मुस्कुराते रहे, फिर उनकी आँखों में ख़ून उतर आया। जब मैंने उनका भंडाफोड़ कर दिया तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। ड्योढ़ी के बाहर कई लोग जमा थे। चाओ साहब भी अपना कुत्ता लिए खड़े थे सब लोग गर्दनें बढ़ा-बढ़ा कर बड़ी उत्सुकता से भीतर झाँक रहे थे। मैं उनके चेहरे नहीं देख पा रहा था। लगता था कई लोग कपड़े से चेहरा छिपाए हैं। कुछ के चेहरे ज़र्द और डरावने लग रहे थे, कुछ अपनी हँसी दबाए थे। मैं जानता था वे सब आदमखोर हैं, आपस में मिले हुए हैं। पर उनमें आपस में भी एका और मेल कहाँ था। कुछ का ख़याल था कि आदमखोरी सदा से होती आई है और यह कोई बुरी बात नहीं। कुछ मानते थे कि यह अत्याचार है, पर अपना लालच दबा नहीं पाते थे। चाहते थे कि उनका भेद न खुले, इसलिए मेरी बात सुनी तो उन्हें ग़ुस्सा आ गया। पर अपने ग़ुस्से को क़ाबू कर वे होंठ दबाए मुस्कुराते रहे।भैया एक़दम ताव में आ गए और ज़ोर से चिल्ला उठे—“चलो यहाँ से, भाग जाओ सब लोग! किसी का दिमाग़ ख़राब हो गया है और तुम उसका तमाशा देखने आए हो!”मैं उन लोगों की चाल भाँपने लगा था। ये लोग अपनी राह से टलने वाले नहीं, इन लोगों ने पूरा षड्यंत्र रच लिया है। सबने मिलकर मुझे पागल समझ लिया है। ये लोग मुझे ख़त्म कर देंगे तो कोई कुछ कहेगा भी नहीं। सब यही समझेंगे कि पगला था, उसे निबटा दिया। ठीक किया। जब शिशु-भेड़िया गाँव के असामी ने एक बदमाश को मारकर खा जाने की बात कही थी, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा था। तब भी इन लोगों ने यही चाल चली थी। यह इन लोगों की एक पुरानी चाल है।छन भी भीतर चला आया। वह भी बहुत गरम हो रहा था, पर वे लोग मेरा मुँह बंद नहीं कर सके। मैं बोले बिना नहीं माना—“यह ठीक नहीं है, ऐसा मत करो। तुम्हें अपना मन बदलना होगा,” मैंने कहा, “समझ लो, यह अन्याय नहीं चल सकेगा। भविष्य में दुनिया में आदमखोरी नहीं चल सकेगी।”“अगर आदमखोरी नहीं छोड़ोगे तो तुम सब ख़त्म हो जाओगे, एक-दूसरे को खा जाओगे। तुम्हारे घरों में चाहे जितनी संतानें पैदा हों, सभ्य लोग तुम्हें समाप्त कर देंगे। जैसे शिकारी जंगल में भेड़ियों को समाप्त कर देते हैं, जैसे लोग साँपों को ख़त्म कर देते हैं।”छन दादा ने सब लोगों को भगा दिया। भैया चले गए थे। छन ने मुझे कमरे में जाने को कहा। कमरे में घुप अंधेरा था। सिर के ऊपर छत की धनियाँ और कड़ियाँ थिरकती जान पड़ रही थीं। उनका आकार बढ़ता जा रहा था। कुछ पल ऐसे भी खड़खड़ाहट होती रही, फिर छत मुझ पर आ गिरी।छत के बोझ के नीचे हिल सकना संभव नहीं था। वे लोग तो चाहते ही थे कि मैं मर जाऊँ। मैं जानता था कि यह बोझ महज़ ख़याली ही है। इसलिए हिम्मत बाँधी, कंधा लगाया और बाहर निकल आया। मैं पसीना-पसीना हो रहा था, परंतु फिर भी बोले बिना न रह सका— “तुम्हें तुरंत बदलना होगा! अपना मन बदलना होगा! याद रखो, भविष्य में दुनिया में आदमखोरी नहीं चल सकेगी...”11कोठरी का दरवाज़ा बंद रहता है। कभी धूप नहीं दिखाई देती। रोज़ाना दो बार खाना मिल जाता है।मैंने खाना खाने को चापस्टिकें उठाईं तो भैया का ख़याल आ गया, अपनी छोटी बहन की मृत्यु की घटना याद आ गई। वह भैया की ही करतूत थी। तब मेरी बहन केवल पाँच ही वर्ष की थी। कितनी प्यारी और निरीह थी वह! याद आती है तो चेहरा आँखों के सामने घूम जाता है। माँ रो-रो कर बेहाल हो रही थीं।भैया माँ को सांत्वना देकर समझा रहे थे, कारण शायद यह था कि स्वयं ही बेचारी को खा गए थे, इसलिए माँ को इस तरह रोते देखकर उन्हें शर्म आ रही थी। अगर उनमें शर्म होती...भैया मेरी बहन को खा गए थे! नहीं मालूम माँ यह भेद जान सकी थीं या नहीं।मेरा तो ख़याल है कि माँ सब जानती थीं, पर जब माँ रो रही थीं तो उन्होंने साफ़-साफ़ कुछ भी नहीं कहा था। शायद यह सोचकर चुप रही थीं कि कहने की बात नहीं थी। एक घटना और याद है। तब मेरी उम्र चार या पाँच वर्ष रही होगी। मैं आँगन में छाँह में बैठा हुआ था। भैया ने कहा था—एक सपूत का कर्तव्य है कि अपने माता-पिता के बीमार होने पर उनकी औषधि के लिए यदि ज़रूरत हो तो अपने शरीर का माँस भी काटकर और उबालकर प्रस्तुत कर दे। माँ उनकी बात सुनकर समर्थन में चुप रह गई थीं, उन्होंने कोई विरोध नहीं किया था। अगर नर-माँस का एक टुकड़ा खाया जा सकता है, तो पूरे आदमी को भी खाया जा सकता है। और जब माँ के शोक और रुदन की याद आती है तो कलेजा टुकड़े-टुकड़े होने लगता है। कितने निराले ढंग हैं इन लोगों के!12उसे याद करते ही, सोचते ही, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सिर चकरा जाता है। आख़िर यह बात समझ में आई कि उम्रभर से ऐसे लोगों के बीच रह रहा हूँ जो चार हज़ार वर्ष से नर-माँस का आहार करते आ रहे हैं। बड़े भैया ने अभी घर सँभाला ही था कि कुछ दिन बाद छोटी बहन की मृत्यु हो गई। इन्होंने उसके माँस का उपयोग किया ही होगा, पुलाव में या दूसरी तरह। बेखबरी में हम लोग भी खा गए होंगे।संभव है, अनजाने में मैंने अपनी बहन के माँस के कई टुकड़े खा लिए हों, और अब मेरी बारी आई है।...मैं भले ही बेख़बर रहा हूँ, मेरे पुरखे चार हज़ार वर्ष से आदमखोर रहे हैं। मेरे जैसा आदमी किसी सभ्य, वास्तविक मानव को अपना मुँह कैसे दिखा सकता है?13संभव है नई पीढ़ी के छोटे बच्चों ने अभी नर-माँस न खाया हो।इन बच्चों को तो बचा लें!...

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क़िस्सा अनजाने द्वीप का (कहानी) | Qissaa Anajaane Dveep Ka : जोसे सारामागो

एक आदमी ने राजा का दरवाज़ा खटखटाया और कहा, ‘मुझे एक नाव चाहिए!’ राजा के महल में कई दरवाज़े थे। आदमी ने जिसे खटखटाया, वह याचिकाओं वाला दरवाज़ा था। राजा अपना सारा वक़्त तोहफ़ों वाले दरवाज़े पर अपने लिए आने वाले तोहफ़ों के बीच गुज़ारता था। इस व्यस्तता के चलते जब भी उसे याचिकाओं वाले दरवाज़े पर किसी के खटखटाने की आवाज़ सुनाई देती तो पहले वह उसे अनसुना करने की कोशिश करता, लेकिन जब खटखटाहट बंद होने की जगह कानों के पर्दों को फाड़ना शुरू करती और आस-पड़ोस के लोगों की नींद में पड़ता ख़लल बदनामी का कारण बनने लगता (कैसा राजा है यह, जो अपना दरवाज़ा तक नहीं खोलता, लोग झल्लाकर कहते), तब उस शोर से निजात पाने का कोई और रास्ता न पाकर राजा अपने प्रथम सचिव को बुला भेजता कि जाकर पता लगाओ, फ़रियादी को क्या चाहिए? प्रथम सचिव फ़ौरन द्वितीय सचिव को आवाज़ देता, द्वितीय सचिव तृतीय सचिव को, तृतीय सचिव अपने प्रथम सहायक को आदेश देता, जो तुरंत द्वितीय सहायक पर हुक़्म चलाता और इस तरह पदानुक्रम से आदेश नीचे चलता हुआ बेचारी सफ़ाई-पोछे वाली औरत तक पहुँचता, जो बहरहाल किसी और को हुक़्म न दे पाने की मजबूरी में अधखुले किवाड़ की दरार से झाँक कर फ़रियादी से पूछती कि उसे क्या चाहिए? फ़रियादी अपनी फ़रियाद का ब्यौरा देता और फिर दरवाज़े पर खड़ा होकर इंतज़ार करने लगता, ताकि उसकी फ़रियाद उसी रास्ते से वापस एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी तक होती हुई आख़िरकार राजा तक पहुँच सके। राजा चूँकि तोहफ़ों को स्वीकार करने में काफ़ी मसरूफ़ रहता था, इसलिए जवाब देने में उसे काफ़ी वक़्त लगता। लेकिन फिर भी अपनी प्रजा के सुख एवं कल्याण की उसे काफ़ी चिंता रहती और आख़िरकार इस मसले पर वह अपने प्रथम सचिव से लिखित राय माँगता। ज़ाहिर है कि प्रथम सचिव इस आदेश को द्वितीय सचिव के हवाले कर देता और द्वितीय सचिव तृतीय सचिव के, और इस तरह आदेश नीचे चलता हुआ एक बार फिर सफ़ाई-पोछे वाली औरत तक पहुँचता, जिसकी ‘हाँ’ या ‘ना’ इस बात पर निर्भर करती कि उस वक़्त वह किस तरह के मूड़ में है।
लेकिन नाव माँगने वाले आदमी के साथ कुछ अलग ही वाकया हुआ। सफ़ाई-पोछे वाली औरत ने जब किवाड़ की दरार से झाँककर पूछा कि उसे क्या चाहिए, तो उसने औरों की तरह कोई ख़िताब या तमग़ा या रुपया-पैसा माँगने की जगह कहा, मैं राजा से बात करना चाहता हूँ। तुम अच्छी तरह जानते हो कि राजा नहीं आ सकता, क्योंकि वह तोहफ़ों वाले दरवाज़े पर व्यस्त है। औरत ने कहा, तो फिर राजा से जाकर कहो कि जब तक वह स्वयं पता लगाने नहीं आता कि मुझे क्या चाहिए, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा, उस आदमी ने कहा, और यह कह कर वह दरवाज़े की दहलीज़ के आर-पार कंबल ओढ़कर लेट गया। अब हुआ यह कि उसकी इस हरकत से काफ़ी दिक़्क़त पेश आई, क्योंकि उन दरवाज़ों के संचालन से जुड़े प्रोटोकोल के अनुसार एक वक़्त में सिर्फ़ एक फ़रियादी की ही सुनवाई हो सकती थी, जिसका मतलब था कि जब तक एक फ़रियादी महल से आने वाले उत्तर की अपेक्षा कर रहा होता, तब तक कोई दूसरा वहाँ आकर अपनी माँगें नहीं रख सकता था। मोटे तौर पर देखा जाए तो इस प्रावधान से सबसे ज़्यादा फ़ायदा स्वयं राजा को ही होना चाहिए था, क्योंकि जितने कम लोग अपनी दुख भरी फ़रियादों से राजा को परेशान करते, उतना ही अधिक समय उसे तोहफ़ों को स्वीकार कर सहेजने-सम्भालने के लिए मिलता, लेकिन बारीकी से ग़ौर करें तो इसमें दरअसल राजा का नुकसान था, क्योंकि लोगों को जब फ़रियाद के सुने जाने में होने वाली बेहिसाब देरी का पता चलता, तो सार्वजनिक स्तर पर विरोध के स्वर उभरते और समाज में खलबली मचती, जिससे निश्चय ही राजा को मिलने वाले तोहफ़ों की संख्या में गिरावट आनी शुरू हो जाती। इस पेचीदा मसले के पक्ष और विपक्ष पर तीन दिनों तक सावधानी से विचार करने के बाद राजा स्वयं याचिकाओं वाले दरवाज़े जाकर पता लगाने गया कि सामान्य राजनयिक प्रावधानों को ठुकराने वाले उस ख़ुराफ़ाती शख़्स को आख़िर क्या चाहिए?
दरवाज़ा खोल दो, राजा ने सफ़ाई-पोछे वाली औरत को आदेश दिया तो उसने पूछा कि पूरा खोलूँ या सिर्फ़ ज़रा-सा। राजा ज़रा देर के लिए हिचकिचाया, क्योंकि अपने खुले जिस्म को वह गलियों की मामूली हवा नहीं लगने देना चाहता था। लेकिन फिर उसे लगा कि किसी तीसरे व्यक्ति, ख़ासतौर पर सफ़ाई-पोछे वाली एक औरत की उपस्थिति में, प्रजा के एक सदस्य से दरवाज़े की दरार के जरिए बात करना, गोया कि वह उससे डर रहा हो, शाही सम्मान के खिलाफ़ होगा। फिर वह औरत पता नहीं किस-किस से क्या-क्या चुग़ली खाती फिरे।
दरवाज़ा पूरा खोल दो, उसने आदेश दिया। नाव की माँग करने वाले आदमी ने जैसे ही भीतर से कुंडों के खोले जाने की आवाज़ सुनी, वह दहलीज़ से उठ खड़ा हुआ और कंबल को तह लगाकर इंतज़ार करने लगा। फ़रियाद के लिए अगला नंबर लगाने की फिराक़ में जो लोग आस-पास डोल रहे थे, वे भी मामले के जल्दी ही निपटाए जाने की उम्मीद में नज़दीक सिमट आए। चूँकि पूरे शासनकाल में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, राजा के इस अप्रत्याशित आगमन पर न सिर्फ़ दूसरे प्रार्थियों, बल्कि आस-पास रहने वालों को भी काफ़ी आश्चर्य हुआ और वे सभी अपनी-अपनी खिड़कियों से बाहर झाँकने लगे। सिर्फ़ जो आदमी नाव माँगने आया था, वह उसी तरह शांत और सहज बना रहा। उसने ठीक ही अंदाज़ा लगाया था कि चाहे तीन दिन क्यों न लग जाएँ, लेकिन राजा के मन में उस आदमी का चेहरा देखने की उत्सुकता ज़रूर पैदा होगी, जिसने बिना किसी ख़ास कारण असाधारण हिम्मत दिखाते हुए सीधे उसी से बात करने की ज़िद ठानी थी।” उधर अपने ज़बर्दस्त कौतूहल और लोगों के इस मजमे के प्रति नाराज़गी के बीच फँसे राजा ने सारे बड़प्पन को दरकिनार करते हुए एक के बाद एक, दनादन तीन सवाल पूछ डाले। तुम्हें क्या चाहिए, सीधे बताते क्यों नहीं तुम्हें क्या चाहिए, तुम क्या सोचते हो, मेरे पास और कोई काम नहीं है? लेकिन उस आदमी ने सिर्फ़ पहले सवाल का उत्तर देते हुए कहा, मुझे एक नाव चाहिए, उत्तर को सुन कर राजा इस कदर भौंचक्का रह गया कि सफ़ाई-पोछे वाली औरत ने जल्दबाज़ी में उसे बैठने के लिए अपनी फूल की कुर्सी पेश की, जिस पर बैठ कर वह सिलाई-बुनाई का काम करती थी, क्योंकि महल में सफ़ाई के अलावा प्यादों के मोजों की मरम्मत जैसे फुटकर काम भी उसी के ज़िम्मे थे। राजा को कुछ अटपटा-सा महसूस हुआ, क्योंकि वह कुर्सी राजसिंहासन से काफ़ी नीची थी। उस पर अपने पैर ठीक से ज़माने की कोशिश में उसने पहले अपनी टांगें अंदर खींची, फिर दोनों पैर बाहर लटका दिए। इस बीच नाव की माँग करने वाला वह आदमी बहुत धैर्य के साथ अगले सवाल का इंतज़ार करता रहा और क्या हम जान सकते हैं कि तुम्हें यह नाव क्यों चाहिए? आख़िरकार सफ़ाई-पोछे वाली औरत की कुर्सी पर अपने आपको आरामदेह ढंग से जमा चुकने के बाद राजा ने पूछा, अनजाने द्वीप की ख़ोज पर निकलने के लिए, आदमी ने उत्तर दिया। कौन-सा अनजाना द्वीप, राजा ने अपनी हँसी रोकते हुए पूछा, गोया कि उसके सामने समुद्री यात्राओं से आक्रांत कोई नीम पागल इंसान खड़ा हो, जिससे सीधे उलझना ख़तरे से ख़ाली न हो। अनजाना द्वीप, उस आदमी ने फिर कहा, क्या बकवास है, अब कहीं कोई अनजाना द्वीप नहीं है। यह आपसे किसने कहा महाराज कि अब कहीं कोई अनजाना द्वीप नहीं है? अब सारे द्वीप नक़्शों पर आ चुके हैं। नक़्शों पर जो द्वीप हैं, वे सब जाने-पहचाने हैं, तो फिर तुम कौन-से अनजाने द्वीप की ख़ोज में जाना चाहते हो। अगर यह मैं आपको बता दूँ तो फिर वह द्वीप अनजाना कहाँ रह जाएगा। क्या तुमने किसी को उसके बारे में बात करते सुना है, राजा ने इस बार कुछ गंभीर होकर पूछा, नहीं, किसी को भी नहीं...तो फिर तुम कैसे कह सकते हो कि वह है। सिर्फ़ इसलिए कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई अनजाना द्वीप न हो, और तुम यहाँ मुझसे नाव माँगने आए हो। हाँ, मैं आपसे नाव माँगने आया हूँ, लेकिन तुम होते कौन हो मुझसे नाव माँगने वाले। और आप कौन होते हैं मुझे इंकार करने वाले। मैं इस राज्य का सम्राट हूँ और इस राज्य की सारी नावें मेरी हैं।
ये जितनी आपकी हैं, उससे कहीं ज़्यादा आप उनके हैं। क्या मतलब, राजा ने कुछ घबरा कर पूछा। मेरा मतलब है कि उनके बिना आप कुछ भी नहीं हैं, जबकि ये नावें आपके बिना भी समंदर में उतर सकती हैं। हाँ, लेकिन मेरे आदेशों, मेरे मार्गदर्शकों और मेरे नाविकों के बग़ैर नहीं, लेकिन मैं आपके नाविक और मार्गदर्शक कहाँ माँग रहा हूँ? मुझे तो सिर्फ़ एक नाव चाहिए और वह अनजाना द्वीप। वह अगर तुम्हें मिल गया तो क्या वह मेरा होगा? लेकिन महाराज, आपकी चाह तो सिर्फ़ पहले से ख़ोजे जा चुके द्वीपों तक सीमित है। और अनजाने द्वीपों पर भी बशर्ते उन्हें ख़ोज निकाला जाए। लेकिन हो सकता है कि यह द्वीप अपने आपको ख़ोजा ही न जाने दे। तब मैं तुम्हें नाव नहीं दूँगा। आप देंगे महाराज, आप ज़रूर देंगे। आत्मविश्वास और ठंडेपन से बोले गए इन शब्दों को सुनकर याचिकाओं के दरवाज़े पर खड़े दूसरे फ़रियादियों ने, जिनका धैर्य इस बातचीत की शुरूआत के बाद से ही जवाब देने लगा था, उस आदमी के पक्ष में हस्तक्षेप करने का निर्णय ले लिया। उनका यह निर्णय एकता की किसी भावना के तहत नहीं, बल्कि जल्दी-से-जल्दी उससे छुटकारा पाने की इच्छा से प्रेरित था। सो वे सब चिल्लाने लगे, उसे नाव दे दो। राजा ने साफ़-सफ़ाई वाली औरत से पहरेदारों को बुलवा कर सार्वजनिक शांति और अनुशासन बहाल करवाने के लिए मुँह खोला ही था कि सामने के घरों की खिड़कियों से झाँकते बाशिंदे भी उत्साह के साथ इस शोर में शामिल हो गए। उसे नाव दे दो, उसे नाव दे दो। जनादेश के इतने संगठित प्रदर्शन से आक्रांत राजा ने हिसाब लगाया कि इस बीच तोहफ़ों के दरवाज़े से उसके लिए क्या कुछ आकर नहीं लौट गया होगा। उसने हाथ हवा में उठाकर लोगों को ख़ामोश हो जाने का आदेश देते हुए कहा, ठीक है, मैं तुम्हें नाव दे रहा हूँ, लेकिन नाविक तुम्हें ख़ुद जुटाने होंगे, क्योंकि अपने सारे नाविक मुझे पहले से ख़ोजे जा चुके द्वीपों के लिए चाहिए। भीड़ की करतल ध्वनि के शोर में आदमी के धन्यवाद के शब्द डूबकर रह गए। लेकिन उसके हिलते हुए होठों से लगता था कि वह कह रहा है, आप फिक्र न करें महाराज, मैं काम चला लूँगा, और फिर सभी ने राजा को कहते सुना, जाओ, बंदरगाह पर जाकर गोदी के प्रमुख से मिलो, उससे कहना कि मैंने तुम्हें भेजा है और उसे तुम्हें एक नाव देनी है। मेरा कार्ड साथ में ले जाओ। उस आदमी ने कार्ड हाथ में लेकर पढ़ा, जहाँ राजा के नाम के नीचे ‘राजा’ लिखा हुआ था। सफ़ाई-पोछे वाली औरत के कंधे पर कार्ड टिका कर राजा ने उस पर कुछ लिख भी दिया था। इस कार्ड के धारक को एक नाव दे देना। नाव का बहुत बड़ा होना ज़रूरी नहीं, लेकिन वह मज़बूत और समुद्र में चल सकने लायक नाव होनी चाहिए, ताकि अगर कुछ ग़लत हो जाए तो कम से कम मेरी अंतरात्मा मुझे न कचोटे। आदमी ने एक बार फिर धन्यवाद देने के लिए अपना सिर उठाया, लेकिन राजा तब तक जा चुका था और अब सिर्फ़ सफ़ाई-पोछे वाली वह औरत ख़यालों में डूबी उसकी ओर देख रही थी। आदमी दरवाज़े से हटा तो उसके जाते ही सभी दूसरे फ़रियादियों में दरवाज़े तक पहुँचने के लिए धक्का-मुक्की शुरू हो गई। लेकिन दरवाज़ा तब तक बंद हो चुका था। लोगों ने सफ़ाई-पोछे वाली औरत को बुलाने के लिए दरवाज़ा बार-बार खटखटाया, लेकिन वह औरत वहाँ थी ही नहीं, वह तो बाल्टी और झाड़ू हाथ में लिए बाईं हाथ की ओर बने एक और दरवाज़े की ओर मुड़ गई थी, जो निर्णयों का दरवाज़ा था। इस दरवाज़े का इस्तेमाल कभी-कभार ही होता था, लेकिन जब होता था तो पक्के तौर पर होता था। साफ़-सफ़ाई वाली औरत ख़यालों में क्यों डूबी हुई थी, यह भी अब समझा जा सकता था। दरअसल उन्हीं कुछ क्षणों में उसने फैसला कर लिया था कि वह नाव लेने के लिए बंदरगाह की ओर जाते उस आदमी के पीछे जाएगी। उसने तय किया कि महलों में सफ़ाई करने और झाड़ू लगाने की ज़िंदगी बहुत हो चुकी, अब कुछ और करने का समय आ चुका था और उसकी असली रुचि तो जहाज़ों की सफ़ाई करने और झाड़ू लगाने में थी, जहाँ वैसे भी पानी की कोई कमी नहीं होने वाली थी, तो इस तरहे उस आदमी को अंदाज़ा भी नहीं होगा कि इधर उसने नाविकों की भरती शुरू भी नहीं की है और उधर पूरी नाव की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी निभा सकने वाला एक शख़्स ख़ुद उसके पीछे-पीछे चला आ रहा है। भाग्य हमारे साथ इसी तरह का मज़ाक करता है। हम भुनभुना कर सोचते हैं कि बस अब हो गया खेल ख़त्म। क़िस्सा तमाम, छोड़ो, और क़िस्मत हमारे ठीक पीछे खड़ी, हमारे कंधे को छूने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा भी चुकी होती है...।
काफ़ी दूर चलने के बाद वह आदमी बंदरगाह तक पहुँचा और उसने गोदी के प्रमुख से मिलने का आग्रह किया। उसके बाहर आने का इंतज़ार करते हुए वह सोचता रहा कि सामने बंधी नावों में से कौन-सी उसे मिल सकती है? राजा के विज़िटिंग कार्ड पर लिखी गई हिदायतों में कहा गया था कि नाव आकार में बहुत बड़ी नहीं होगी, जिसका मतलब था कि भाप के इंजन वाले स्टीमरों, मालवाहक जहाज़ों और युद्धपोतों को गिनती से बाहर रखा जा सकता था। लेकिन राजा ने यह भी कहा था कि नाव इतनी छोटी भी न हो कि समुद्री हवाओं और लहरों की तेज़ी का मुक़ाबला न कर सकें। नाव सुरक्षित और समुद्र में उतरने लायक होनी चाहिए। ये राजा के शब्द थे। इसका मतलब है कि छोटी नौकाओं और बजरों को छोड़ा जा सकता था, जो सुरक्षित होते हुए भी उन समुद्री यात्राओं के लिए अनुपयुक्त थे, जिन पर निकले बग़ैर अनजाने द्वीपों का पता नहीं लगाया जा सकता था। उस आदमी से कुछ ही फासले पर तेल के पीपों के पीछे छिपी सफ़ाई-पोंछे वाली वह औरत भी किनारे पर खड़ी नावों पर अपनी नज़रें दौड़ा रही थी। मुझे यह वाली पसंद है, उसने मन ही मन सोचा, हालाँकि उसकी राय की फ़िलहाल कोई क़ीमत नहीं थी, और अभी तो उसे नौकरी पर भी नहीं रखा गया था, लेकिन सबसे पहले यह जानना ज़रूरी था कि गोदी के प्रमुख की राय क्या है? प्रमुख ने बाहर आते ही सबसे पहले कार्ड को पढ़ कर उस आदमी को सिर से पाँव तक देखा और फिर सबसे आवश्यक वह सवाल पूछा, जिसे राजा पूछना भूल गया था। तुम्हें नौका सम्भालना आता है और क्या तुम्हारे पास इसे चलाने का लाइसेंस है? नहीं, मैं समुद्र में अपने-आप सीख जाऊँगा, उस आदमी ने कहा। मैं इसकी सलाह नहीं दूँगा, गोदी के प्रमुख ने कहा, मैं स्वयं समुद्री कप्तान हूँ लेकिन फिर भी मुझमें किसी पुरानी नाव में बैठ कर समुद्री यात्रा पर निकल पड़ने का साहस नहीं है। तो फिर मुझे ऐसी नाव दो जिस पर सवार होकर मैं यात्रा पर निकल सकूँ। ऐसी नाव जिसका मैं मान रख सकूँ और जो मेरा मान रख सके। नाविक न होने पर भी तुम बिल्कुल नाविकों की-सी बातें करते हो। अगर मैं नाविकों की-सी बातें करता हूँ तो फिर मेरा नाविक बनना तय ही है। गोदी के प्रमुख ने फिर एक बार राजा के कार्ड को ध्यान से देखा और कहा, तुमने बताया नहीं कि तुम्हें नाव क्यों चाहिए? अनजाने द्वीप की ख़ोज पर निकलने के लिए, लेकिन अब कोई अनजाने द्वीप नहीं बचे हैं। राजा ने भी मुझसे यही कहा था। राजा को द्वीपों के बारे में यह जानकारी मैंने ही दी है। अब तो यह और भी अजीब बात है कि आप समंदर के आदमी होकर कहते हैं कि अब कोई अनजाने द्वीप नहीं बचे हैं, जबकि मैं धरती वाला होकर भी जानता हूँ कि जाने हुए द्वीप भी तब तक अनजाने रहते हैं, जब तक आप स्वयं उन पर क़दम न रख लें, लेकिन, जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, तुम ऐसे द्वीप की तलाश में निकलना चाहते हो, जिस पर आज तक किसी ने भी क़दम न रखा हो। हाँ, लेकिन यह तो वहाँ पहुँचने के बाद ही पता चलेगा। ठीक है, गोदी प्रमुख ने कहा, तुम्हें जिस तरह की नाव चाहिए, वह मैं तुम्हें दे रहा हूँ। कौन-सी वाली। बहुत तज़ुर्बे वाली है यह नाव, उन पुराने दिनों की यादगार, जब लोग अनजाने द्वीपों की ख़ोज पर जाया करते थे। कौन-सी वाली, बल्कि हो सकता है कि इसने कुछ अनजाने द्वीप ख़ोजे भी हों। कौन-सी है वह नाव, वह रही। सफ़ाई-पोंछे वाली औरत ने जैसे ही गोदी प्रमुख की उँगली के इशारे का अनुसरण किया। वह पीपों के पीछे से बाहर निकल कर चिल्लाने लगी, वही मेरी वाली नाव है, वही मेरी वाली नाव है। स्वामित्व के उसके इस अप्रत्याशित एवं सर्वथा नाज़ाएज दावे को नज़रअंदाज करते हुए कहा जा सकता था कि यही वह नाव थी, जिसे उस औरत ने भी पसंद किया था। यह तो पालदार जहाज़ जैसी दिखती है। आदमी ने कहा, हाँ, ऐसा कह सकते हैं, गोदी प्रमुख बोला, इसे पालदार जहाज़ जैसा ही बनाया गया था, इसमें थोड़े-बहुत फेरबदल किए गए। लेकिन फिर भी है यह पालदार जहाज़ ही।
हाँ, इसने अपनी पुरानी शक्ल बरकरार रखी है और इसमें पाल और मस्तूल हैं। यही तो चाहिए अनजाने द्वीपों की ख़ोज पर निकलने के लिए, अपने-आपको और अधिक रोक पाने में असमर्थ सफ़ाई-पोंछे वाली औरत बोली, मेरे लिए तो बस यही नाव ठीक है। तुम कौन हो, आदमी ने पूछा। क्या तुम मुझे नहीं पहचानते। नहीं! मैं सफ़ाई वाली औरत हूँ। मैं समझा नहीं किसकी सफ़ाई, महल की, और किसकी, मैं वही औरत हूँ जिसने तुम्हारे लिए याचिकाओं वाला दरवाज़ा खोला था। तो फिर तुम यहाँ घूमने की बजाए महल की सफ़ाई और दरवाज़े खोलने का काम क्यों नहीं कर रही! क्योंकि एक तो मैं जिन दरवाज़ों को खोलना चाहती थी, वे पहले ही खोले जा चुके हैं और दूसरे अब से मैं सिर्फ़ नावों की सफ़ाई करूँगी। तो फिर तुम अनजाने द्वीप की तलाश में मेरे साथ चलना चाहती हो, हाँ, मैं निर्णयों वाले दरवाज़े से महल को छोड़ आई हूँ। ऐसा है तो फिर जाकर नाव को अंदर से देख लो, उसे साफ़ करने की भी ज़रूरत होगी, लेकिन समुद्री अबाबीलों से बचकर रहना। क्यों, तुम क्या मेरे साथ चलकर अपनी नाव को अंदर से नहीं देखोगे? तुमने तो कहा कि वह तुम्हारी नाव है। वह तो मैंने ऐसे ही कह दिया, क्योंकि नाव मुझे पसंद आई थी। पसंद का इज़हार ही शायद सबसे सुंदर स्वामित्व है, और स्वामित्व शायद पसंद का सबसे बदसूरत इज़हार। गोदी प्रमुख ने इस बातचीत में दख़ल देते हुए कहा, मुझे इस जहाज़ के मालिक को चाबियाँ देनी हैं, तुम दोनों फैसला कर लो कि मालिक कौन है, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता? क्या नावों की भी चाबियाँ होती हैं, आदमी ने पूछा। नहीं, घुसने के लिए नहीं, लेकिन भीतर आल्मारियाँ, लॉकर और कप्तान के खाते भी तो हैं। यह सब मैं इस औरत पर छोड़ता हूँ, आदमी ने कहा और वह नाविकों की तलाश में वहाँ से चल दिया।
सफ़ाई-पोछे वाली औरत ने गोदी प्रमुख के दफ़्तर से चाबियाँ लीं और सीधे नाव पर चली गई, जहाँ दो चीज़ें उसके ख़ास काम आयीं, एक तो उसका शाही झाड़ू और दूसरे आदमी की समुद्री अबाबीलों से बचकर रहने की चेतावनी। नाव तक जाने के तख़्ते पर अभी उसने पैर रखा ही था कि अनगिनत अबाबीलें अपनी चोंचें खोले, ज़ोर से चिल्लाती हुई उस पर झपट पड़ीं, गोया कि वे उसे नोच कर ही खा जाएँगी, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उनका साबका किससे पड़ा है? सफ़ाई-पोछे वाली औरत ने अपनी बाल्टी नीचे रखी, चाबियों को छातियों के बीच घुसाया और तख़्ते पर संतुलन साध कर उसने झाड़ू को किसी तलवार की तरह घुमाना शुरू किया, जिससे देखते ही देखते पक्षियों को वह आक्रामक जत्था तितर-बितर हो गया। अबाबीलों के ग़ुस्से की वजह उसे नाव तक पहुँचने पर पता चली, जब उसने पाया कि वहाँ हर जगह अबाबीलों के घोंसले थे। कुछ ख़ाली, अंडों समेत और कुछ जिनमें बच्चे चोंचें फैलाए खाने का इंतज़ार कर रहे थे। यह सब तो ठीक है, लेकिन तुम्हें यह जगह ख़ाली करनी पड़ेगी, क्योंकि अनजाने द्वीप की ख़ोज में निकलने वाला जहाज़ मुर्ग़ियों के दड़बे जैसा नहीं दिख सकता, औरत ने कहा। ख़ाली घोंसलों को समंदर में फेंकने के बाद उसने बाक़ी को फ़िलहाल वहीं रहने दिया और आस्तीनें चढ़ाकर वह जहाज़ की सफ़ाई में जुट गई। वह कठिन काम जब ख़त्म हुआ तो उसने पालों के बक्से खोलकर उनका निरीक्षण किया, ताकि पता चल सके कि इतने वक़्त तक तेज़ समुद्री हवाओं के खिंचाव को झेले बग़ैर उनकी सिलाई किस हालत में हैं? ये पाल नाव की माँसपेशियों की तरह होते हैं, अगर इनका नियमित इस्तेमाल न हो तो ये ढीले पड़ कर लटक जाते हैं और पालों की सिलाई उनके पुट्ठों की तरह, सफ़ाई वाली औरत ने अपने समुद्री ज्ञान में होते इज़ाफ़े पर ख़ुश होते हुए सोचा। कुछ सिलाइयाँ खुल गई थीं। इन पर उसने सावधानी से निशान लगाया, क्योंकि पिछले ही दिन तक प्यादों के मोजों की मरम्मत के लिए इस्तेमाल होने वाला सुई-धागा इस काम के लिए काफ़ी नहीं था। उसने पाया कि बाक़ी सारे बक्से ख़ाली हैं, बारूद का बक्सा भी ख़ाली था, लेकिन इसमें परेशानी की कोई बात नहीं थी, क्योंकि अनजाने द्वीप की ख़ोज पर निकलने के लिए युद्ध जैसी तैयारी की कोई ज़रूरत नहीं थी। हाँ, उसे इस बात से ज़रूर चिंता हुई कि खाने के बक्सों में अन्न या भोजन का सामान नहीं था। महल में उसे रूखा-सूखा ही नसीब होता था, इसलिए उसे अपनी फ़िक्र नहीं थी। लेकिन उस आदमी का वह क्या करेगी, जो सूरज ढलने के बाद अब किसी भी क्षण लौटेगा और बाक़ी पुरुषों की तरह लौटते ही जो भूख के मारे यूँ शोर मचाने लगेगा, जैसे पूरी दुनिया में सिर्फ़ उसे ही अपना पेट भरने की ज़रूरत हो और अगर अपने साथ वह चन्द भूखे पेट नाविकों को भी ले आया, तब तो और भी मुसीबत हो जाएगी। लेकिन उसकी चिंताएँ अनावश्यक निकलीं। सूरज अभी समंदर में डूबा ही था कि वह आदमी खाड़ी के दूसरी ओर से आता दिखाई दिया। उसके हाथ में खाने का समान था, और वह अकेला, हतोत्साहित-सा चला आ रहा था। सफ़ाई-पोछे वाली औरत उसके स्वागत के लिए जहाज़ के तख़्ते तक चली गई, लेकिन इससे पहले कि वह पूछ सकती कि उसका दिन कैसा गुज़रा, उसने कहा कि घबराओ मत, मैं अपने और तुम्हारे लिए काफ़ी खाना लाया हूँ और नाविक, उसने पूछा। देख तो रही हो, कोई नहीं आया। लेकिन कुछ ने क्या बाद में आने का वादा भी नहीं किया, औरत ने पूछा। उन्होंने कहा कि अब कहीं कोई अनजाने द्वीप नहीं बचे हैं और अगर बचे भी हों तो वे अपने घरों की सुविधा या बड़े यात्री जहाज़ों का आराम छोड़ कर काले समंदर वाले पुराने दिनों की तरह किसी असंभव समुद्री यात्रा पर चलने के लिए तैयार नहीं हैं । और तुमने उनसे क्या कहा। मैंने कहा कि समंदर तो हमेशा काला ही होता है और तुमने उन्हें अनजाने द्वीप के बारे में नहीं बताया। जब मुझे ख़ुद ही नहीं मालूम कि वह अनजाना द्वीप कहाँ है तो मैं उसके बारे में उन्हें कैसे बताता? लेकिन तुम्हें तो यक़ीन है कि वह द्वीप है। हाँ, उतना ही जितना कि मुझे इस समुद्र के काले होने पर यक़ीन है। लेकिन इस वक़्त, जब पानी हरा है और ऊपर का आसमान सुर्ख, मुझे तो यह उतना काला नहीं दिखता। यह सिर्फ़ छलावा है, वैसे ही जैसे कभी-कभी हमें द्वीप पानी की सतह के ऊपर तैरते हुए से लगते हैं। लेकिन नाविकों के बग़ैर तुम काम कैसे चलाओगे, पता नहीं? हम लोग यहीं रह सकते हैं, मुझे तो बंदरगाह पर आने वाली नावों की सफ़ाई का काम मिल जाएगा। मगर तुम, मगर मैं, तुम्हारे पास कोई हुनर, कोई योग्यता या जैसा आजकल कहते हैं, कोई कारोबार तो होना चाहिए। वह मेरे पास था, अब भी है और आगे भी होगा, लेकिन मैं अनजाने द्वीप को ढूँढ़ना चाहता हूँ और उस द्वीप पर पहुँच कर जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ। क्यों, तुम जानते नहीं क्यों? जब तक हम अपने से बाहर न निकलें, हमें पता नहीं चल सकता कि हम कौन हैं। महल में जब राजा के दार्शनिक के पास कोई काम नहीं होता था तो वह मेरे पास बैठ कर मुझे प्यादों के मोजों की मरम्मत करते हुए देखता था और कहता था कि हर आदमी एक द्वीप होता है, लेकिन मैं ठहरी औरत, लिहाजा मुझे लगता कि उसकी बात से मेरा कोई संबंध नहीं है, मगर तुम क्या सोचते हो । यही कि द्वीप को देखने के लिए द्वीप से बाहर आना होगा, यानी अपने आप से आजाद हुए बग़ैर हम अपने आपको नहीं देख सकते। तुम्हारा मतलब है अपने आपसे छुटकारा पाए बग़ैर। नहीं, यह वही बात नहीं हुई। आसमान की सुर्खी अब धीरे-धीरे मिटती जा रही थी और पानी अचानक बैंजनी रंग का दिखाई देने लगा था। अब सफ़ाई वाली औरत को भी यक़ीन हो चला था कि समंदर का पानी सचमुच काला होता है। आदमी ने कहा, चलो फलसफे बघारने का काम राजा के दार्शनिक पर छोड़ दें, क्योंकि उसे इसी काम के पैसे मिलते हैं, और हम लोग चल कर खाना खाएँ, लेकिन औरत नहीं मानी। पहले तुम नाव को अंदर से देख लो, तुमने सिर्फ़ इसे बाहर से ही देखा है। तुम्हें कैसी लगी यह भीतर से? पालों की सिलाई कई जगह से खुल चुकी है, उसकी मरम्मत करनी होगी। तुमने इसके पेंदे तक जाकर देखा, क्या वहाँ काफ़ी पानी है? हाँ थोड़ा-सा है, लेकिन उतना पानी तो नाव के लिए अच्छा होता है। तुम्हें यह बात कैसे पता चली। बस, ऐसे ही, लेकिन कैसे? वैसे ही जैसे तुमने गोदी के प्रमुख से कहा कि तुम समंदर में नाव चलाना सीख जाओगे।
लेकिन अभी हम समंदर में कहाँ हैं, समंदर न सही, पानी में तो हैं। मेरा विश्वास था कि समुद्री यात्रा में दो ही सच्चे गुरू होते हैं, एक समंदर और दूसरी नाव। और आसमान, तुम आसमान को भूल रहे हो। हाँ-हाँ, आसमान और हवाएँ, और बादल, और आसमान, हाँ, आसमान!
उन्हें पूरी नाव का मुआयना करने में पंद्रह मिनट से भी कम लगे। यह बहुत सुंदर है! आदमी ने कहा, लेकिन नाविक न मिले तो मुझे राजा के पास जाकर कहना पड़ेगा कि मुझे अब नाव नहीं चाहिए। कमाल है, तुम तो पहली बाधा पर ही हार मान बैठे। पहली बाधा तो तब आई थी, जब मुझे तीन दिन तक राजा के आने का इंतज़ार करना पड़ा था, तब मैंने हार कहाँ मानी थी? अगर नाविक हमारे साथ आने के लिए राज़ी न हुए तो हमें अकेले ही काम चलाना होगा। तुम्हारा दिमाग़ तो सही है, दो लोग अकेले इतने बड़े जहाज़ को कैसे सम्भालेंगे, मुझे तो सारा समय डैक का नियंत्रण करते रहना होगा और तुम...मैं कैसे समझाऊँ...यह सरासर पागलपन होगा। चलो बाद में देखेंगे, अभी तो चलकर खाना खाएँ...वे ऊपर डेक पर गए, जहाँ आदमी अब भी औरत के पागलपन पर अपना विरोध जताता रहा। वहाँ सफ़ाई वाली औरत ने आदमी द्वारा लाया खाने का सामान खोला। डबलरोटी, बकरी के दूध का पनीर, जैतून और शराब की एक बोतल। चाँद समंदर से एक हाथ ऊपर निकल आया था और मस्तूल से बनती परछाइयाँ उनके क़दमों पर आ गिरी थीं। हमारा जहाज़ बहुत सुंदर है, औरत ने कहा और फिर अपने-आपको सुधारा, मेरा मतलब है तुम्हारा जहाज़। मुझे नहीं लगता कि यह बहुत वक़्त तक मेरा रहेगा। तुम चाहे यात्रा पर निकलो या न निकलो, है तो यह तुम्हारा ही, आख़िर राजा ने इसे तुम्हें दिया है। हाँ, मगर मैंने अनजाने द्वीप की ख़ोज पर जाने के लिए इसे माँगा था। लेकिन वे सारी चीज़ें एक पल से दूसरे पल तक थोड़े ही हो जाती हैं, इनमें वक़्त लगता है, और मेरे दादा तो नाविक न होते हुए भी कहा करते थे कि समंदर में निकलने वालों को पहले ज़मीन पर रह कर तैयारी करनी पड़ती है। लेकिन नाविकों के बग़ैर हम यात्रा पर नहीं निकल सकते? यह मैं सुन चुकी हूँ, और इस तरह की यात्रा के लिए हमें जहाज़ पर एक हजार एक चीज़ें जमा करनी होंगी, जिसमें पता नहीं कितना वक़्त लग जाए, और हमें सही मौसम और ज्वार का ही नहीं, बल्कि लोगों के बंदरगाह तक आकर हमें यात्रा की शुभकामनाएँ देने का भी इंतज़ार करना पड़ेगा। तुम मेरा मज़ाक उड़ा रही हो। बिल्कुल नहीं, जिस आदमी की वजह से मैंने निर्णयों के दरवाज़े से निकल कर महल छोड़ा, उसका मैं मज़ाक कैसे बना सकती हूँ, मुझे माफ़ कर दो, और मैंने भी तय कर लिया है कि चाहे जो हो जाए, मुझे उस दरवाज़े से वापस नहीं जाना। चाँदनी, सफ़ाई करने वाली उस औरत के चेहरे पर सीधी गिर रही थी। सुंदर, बेहद सुंदर, आदमी ने सोचा, लेकिन इस बार वह जहाज़ के बारे में नहीं सोच रहा था। औरत ने कुछ नहीं सोचा, क्योंकि उसने उन तीन दिनों के दौरान ही सब कुछ जान-समझ लिया था, जब बार-बार वह दरवाज़े की दरार से झाँक कर देखती थी कि आदमी अभी वहीं है या चला गया है। रोटी का एक टुकड़ा भी बाकी नहीं बचा, न ही पनीर का एक भी दाना या शराब की एक भी बूँद। जैतूनों की गुठलियाँ उन्होंने पानी में फेंक दीं और अब जहाज़ का डेक फिर से उतना ही साफ था, जितना उस औरत ने रगड़-पोंछ कर उसे बनाया था। एक स्टीमर ने अपना गुर्राहट भरा र्भोंपू बजाया तो औरत ने कहा, हम जाते समय इतना शोर नहीं करेंगे। हालाँकि वे अब भी बंदरगाह पर ही थे, फिर भी गुज़रते स्टीमर से उठती लहरों के थपेड़े उनके जहाज़ को छूते रहे। लेकिन हम शायद इससे भी ज़्यादा डोलेंगे, आदमी ने कहा और वे दोनों हँस दिए, फिर अचानक ख़ामोश हो गए। कुछ देर में उनमें से किसी एक ने कहा कि अब सो जाना चाहिए, लेकिन दूसरे ने उत्तर दिया कि मुझे तो अभी नींद महसूस नहीं हो रही । नीचे बिस्तर हैं, औरत ने कहा । हाँ, उस आदमी ने कहा और वे दोनों उठ खड़े हुए। ठीक है तो फिर सुबह मिलेंगे, मैं इधर दाहिनी तरफ़ जा रही हूँ। और मैं बाईं तरफ़, आदमी ने उत्तर दिया। ओह मैं तो भूल ही गई, वह औरत मुड़ी और उसने अपने एप्रन की जेब में से दो मोमबत्तियाँ निकाल लीं, ये मुझे सफ़ाई करते हुए मिली थीं, लेकिन मेरे पास माचिस नहीं है। मेरे पास है, आदमी ने कहा। औरत ने दोनों हाथों में एक-एक मोमबत्ती पकड़ी तो आदमी ने माचिस जलाई और फिर अपनी हथेलियों के जरिये लौ को हवा से बचाते हुए उसने सावधानी से दोनों बत्तियाँ जला दीं, जिनसे औरत का चेहरा जगमगा उठा। उस आदमी ने फिर सोचा, वह कितनी सुंदर है? लेकिन औरत सोच रही थी कि आदमी के दिमाग़ में सिर्फ़ अनजाना द्वीप ही बसा हुआ है। एक मोमबत्ती उसे थमाते हुए उसने कहा, कहा, अच्छी नींद ले लो, हम कल मिलेंगे। आदमी भी यही बात कुछ अलग शब्दों में कहना चाहता था। लेकिन उसके मुँह से सिर्फ़ निकला, मीठे सपने देखना। कुछ देर बाद जब वह लेटा तो उसे लगा जैसे वह औरत को ढूँढ़ रहा है और वे उस बड़े जहाज़ पर कहीं खो गए हैं।
उसने औरत के लिए मधुर सपनों की कामना की थी, लेकिन उसे ख़ुद सारी रात सपने आते रहे। सपनों में उसने देखा कि उसका जहाज़ समंदर के बीचोंबीच लहरों से जूझ रहा है और उसके तीनों पाल हवा से फूले हुए हैं। वह स्वयं जहाज़ का पहिया घुमा रहा था और नाविक छाँह में बैठे सुस्ता रहे थे। उसकी समझ में नहीं आया कि जिन नाविकों ने अनजाने द्वीप की यात्रा पर चलने से इंकार कर दिया था, वे ही अब उसकी नाव पर क्या कर रहे थे? शायद उन्हें अपने बर्ताव पर अफ़सोस हुआ होगा। उसे बहुत सारे जानवर भी डेक पर घूमते दिखाई दिए, बत्तखें, ख़रगोश, मुर्ग़ियाँ, भेड़-बकरियाँ। उसे याद नहीं कि वह कब उन्हें वहाँ लाया था, लेकिन फिर भी उनका वहाँ होना स्वाभाविक ही लगा, क्योंकि अनजाने द्वीप के रेगिस्तानी होने की स्थिति में ये मवेशी काम आते। नीचे तहखाने की गहराई से उसे घोड़ों के हिनहिनाने, बैलों के रंभाने और गधों के रेंकने के स्वर सुनाई दिए। ये सब यहाँ कैसे आए, इस छोटे से पालदार जहाज़ पर इनके लिए जगह कैसे बनी, उसने आश्चर्य महसूस किया। तभी हवा पलटी और उसने देखा कि लहराते मस्तूल के पीछे औरतों का एक गिरोह है, जो बिना गिने भी संख्या में नाविकों से कम नहीं लग रहा था। वे सब औरताना कामों में व्यस्त थीं और ज़ाहिर है कि यह सपना ही था। क्योंकि असली ज़िंदगी में कोई इस तरह यात्रा नहीं करता। पहिये के पीछे खड़ा वह आदमी सफ़ाई-पोंछे वाली उस औरत को ढूँढ़ता रहा, लेकिन वह नहीं मिली। शायद डेक की धुलाई के बाद थकान से चूर होकर वह दाहिनी ओर वाले हिस्से में आराम कर रही है, उसने सोचा, लेकिन उसे पता था कि ऐसा नहीं है और वह अपने-आपको धोखा दे रहा है। औरत ने शायद आख़िरी घड़ी में फैसला किया था कि वह साथ नहीं चलेगी और तख़्ते पर से होती हुई वह ज़मीन पर कूद गई थी। अलविदा, अलविदा, वह चिल्लाई थी, तुम्हारी आँखें चूँकि अनजाने द्वीप के सिवाय और कुछ नहीं देखतीं, इसलिए मैं जा रही हूँ। लेकिन यह सच नहीं था, क्योंकि आदमी की आँखें अब हर जगह औरत को ढूँढ़ रही थीं। उसी वक़्त आसमान में बादल घिर आए और बारिश होने लगी। जहाज़ के दोनों ओर मिट्टी से भरे बोरों में से अनगिनत पौधे फूट निकले। वे बोरे अनजाने द्वीप पर मिट्टी न मिलने के डर से वहाँ नहीं रखे गए थे, बल्कि उनका मकसद वक़्त की बचत करना था, जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो उन्हें फलों के पौधों को बस यहाँ से वहाँ स्थानांतरित कर देना होगा, इन छोटे खेतों में पकती गेहूँ की बालियों को बाहर रोपना भर होगा और यहाँ पहले से खिली कलियों को बाहर फूलों की क्यारियों में सजा देना होगा। पहिए के पीछे खड़े आदमी ने उन सुस्ता रहे नाविकों से पूछा कि क्या उन्हें कोई उजाड़ अनबसा द्वीप दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई भी द्वीप दिखाई नहीं देता, लेकिन वे ज़मीन का पहला टुकड़ा दिखाई देते ही जहाज़ से उतर जाएँगे, बशर्ते वहाँ रुकने लायक एक बंदरगाह, नशा करने के लिए एक शराबखाना और मौजमस्ती के लिए एक बिस्तर हो, क्योंकि यहाँ इतने सारे लोगों के बीच यह सब नहीं किया जा सकता, तो फिर उस अनजाने द्वीप का क्या होगा? पहिए के पीछे से उस आदमी ने पूछा। अनजाना द्वीप सिर्फ़ तुम्हारे दिमाग़ का एक फितूर है, और राजा के भूगोलशास्त्री भी सारे नक़्शों का अध्ययन कर इस नतीजे पर पहुँच चुके हैं कि पिछले कई वर्षों से कहीं किसी अनजाने द्वीप का अस्तित्व नहीं है। तब तुम शहर में रहने की जगह मेरी यात्रा ख़राब करने मेरे साथ क्यों आए? हमें रहने के लिए एक बेहतर जगह की तलाश थी और हम तुम्हारी यात्रा का फ़ायदा उठाना चाहते थे। यदि ऐसा है तब तुम लोग नाविक नहीं हो। नहीं, हम कभी भी नाविक नहीं थे। लेकिन मैं इस जहाज़ को अकेला चला पाऊँगा। यह तुम्हें राजा से जहाज़ माँगने से पहले सोचना चाहिए था, यह समुंदर तुम्हें जहाज़ चलाना थोड़े ही सिखा सकता है। तभी उस जहाज़ के पहिए के पीछे खड़े आदमी को दूर कहीं ज़मीन दिखाई दी, तो उसने उसके मरीचिका या किसी दूसरी ही दुनिया का भ्रम होने का बहाना कर उसे नज़रअंदाज कर आगे निकल जाने की कोशिश की। लेकिन उन लोगों ने, जो नाविक नहीं थे, विरोध किया और ज़िद पर अड़ गए कि उन्हें वहीं उतरना है। यह द्वीप नक्शे पर मौजूद है, वे चिल्लाए, और अगर तुम हमें वहाँ न ले गए तो हम तुम्हें जान से मार डालेंगे, और तब वह जहाज़ ख़ुद-ब-ख़ुद उस ज़मीन की ओर मुड़ गया और बंदरगाह में प्रवेश कर गोदी के किनारे जा लगा। तुम सब जा सकते हो, पहिये के पीछे खड़े उस आदमी ने कहा तो वे सब एक-के-बाद एक, पहले औरतें और फिर आदमी, जहाज़ से नीचे उतर गए। लेकिन वे अकेले नहीं गए, अपने साथ वे बत्तखें, ख़रगोश और मुर्ग़ियाँ ही नहीं, बल्कि बैल, गधे और घोड़े भी ले गए। यही नहीं, समुद्री अबाबीलें भी अपने बच्चों को चोंचों में दबाकर वहाँ से उड़ गईं। ऐसा पहली बार हुआ था, लेकिन एक-न-एक दिन तो यह होना ही था। पहिए के पीछे खड़ा आदमी चुपचाप उन सबको जाते देखता रहा, लेकिन उसने उनको रोकने की कोशिश नहीं की। कम से कम वे उन पेड़ों, गेहूँ की बालियों, फूलों और मस्तूलों पर चढ़ी लताओं को उसके लिए पीछे छोड़ गए थे। जहाज़ को छोड़ते लोगों की भगदड़ में बहुत से बोरे फट गए थे और मिट्टी सारे डेक पर किसी जुते हुए, ताज़ा बोए गए खेत की शक्ल में फैल गई थी। अब थोड़ी-सी बरसात होने पर वहाँ एक अच्छी-ख़ासी फसल उग सकती थी।
अनजाने द्वीप की यात्रा की शुरूआत से ही किसी ने पहिये के पीछे खड़े उस आदमी को भोजन करते नहीं देखा था। शायद इसीलिए कि वह सिर्फ़ सपने देख रहा था और अपने इन सपनों में अगर वह रोटी के टुकड़े या सेब की कल्पना करता तो वह भी एक विशुद्ध आविष्कार से अधिक कुछ नहीं होता। उन पेड़ों की जड़ें अब जहाज़ के ढाँचे के भीतर पैठने लगी थीं और वह समय दूर नहीं था, जब मस्तूलों और पालों की कोई ज़रूरत बाकी नहीं रह जाती। हवा को सिर्फ़ इन पेड़ों की डालियों को हिलाना होता और यह जहाज़ अपनी मंजिल की ओर चल निकलता। अब वह लहरों के ऊपर तैरता, थिरकता एक जंगल था, जिस पर पता नहीं कैसे, चिड़ियाँ चहचहाने लगी थीं। शायद वे उन पेड़ों के भीतर कहीं छिपी हुई थीं और खेतों में फसल के पकने की आहट पाकर उन्होंने बाहर आने का फैसला कर लिया है, और तब उस आदमी ने जहाज़ के पहिए पर ताला लगाया और हंसिया हाथ में लेकर वह खेत में उतर गया और जब वह कुछ बालियों को काट चुका तो उसने पाया कि एक छाया उसके पीछे आ खड़ी हुई है। जब उसकी नींद खुली तो उसकी बाँहें सफ़ाई वाली औरत की बाँहों के गिर्द थीं और उस औरत की बाँहों ने उसे घेर रखा था। उनके जिस्म और उनके बिस्तर एक-दूसरे में इस तरह गुंथ गए थे कि पता लगा पाना मुश्किल था कि कौन-सा दाहिने हाथ वाला हिस्सा है और कौन-सा बाएँ हाथ वाला। फिर जैसे ही सूर्योदय हुआ, आदमी और औरत अब तक अनाम उस जहाज़ के अगले हिस्से के दोनों तरफ़ सफ़ेद अक्षरों में उसका नाम लिखने में व्यस्त हो गए और दोपहर ढलने से पहले, ज्वार की तेज़ी के साथ ‘अनजाना द्वीप’ आख़िरकार अपनी स्वयं की ख़ोज में समंदर की ओर निकल पड़ा।

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वह (कहानी) | Vah : लुइजी पिरांडेलो

जिस दिन उन लोगों का विवाह होना निश्चित हुआ, उसी दिन से बर्तोलीनो ने अपनी भावी पत्नी को कहते सुना-जानते हो न, मेरा असली नाम लीना नहीं है। मेरा नाम है करोलीना, किंतु ‘वे’ मुझे लीना कह कर पुकारते थे। इसी कारण तभी से मेरा नाम लीना ही रह गया है। ओह! बहुत ही सज्जन थे वे। वह देखो उनकी तसवीर, कह कर लीना ने एक बड़े फ़ोटोग्राफ़ की ओर उँगली उठाई। बर्तोलीनो ने देखा, उसकी भावी पत्नी के प्रथम पति सिनोर कोसिमो ताद्देयी उसकी ओर मृदु मुस्कान के साथ टोपी उठा रहे हैं।
अपने अनजाने में बर्तोलीनो ने मृत सज्जन के अभिवादन के प्रत्युत्तर में अपना माथा क़रीब आधा झुका लिया था। ताद्देयी एक विख्यात मूर्तिकार थे। उनके निधन के उपरांत उनकी तसवीर को दीवाल पर से उतार कर रखने की बात उनकी विधवा पत्नी लीना सारूल्ली के मन में एक बार भी न आई और आती भी क्यों? उनके प्रति लीना की कृतज्ञता भी तो कम नहीं है। उसका मान-सम्मान, घर-द्वार सुंदर-सुंदर तमाम सामान, ये सब कुछ तो वे ही रख गए हैं।
भावी द्वितीय पति की हैरानी के भाव की ओर तनिक भी ध्यान न देती हुई लीना ने आगे कहा-असल में मैं नाम बदलना नहीं चाहती थी, परंतु वे जो कहते थे, उसको मैं ‘ना’ नहीं कह सकती थी। तुम भी मुझे उसी नाम से पुकारना क्यों? ठीक है न! ग़लत तो नहीं समझोगे न?
बर्तोलीनो अचकचा कर बोला—नहीं, अरे...नहीं...हाँ, हाँ, वह तो ठीक ही है। दीवाल पर टंगी बड़ी तसवीर की ओर से वह अपनी आँखें हटा न सका। वे सज्जन उसी की ओर ताकते और मुस्कुराते हुए टोपी उठाए अभिवादन कर रहे थे।
तीन माह पश्चात् जब रिश्तेदार और मित्रगण लीना और उसके पति को हनीमून यात्रा के लिए विदा करने स्टेशन पर आए, तब लीना की प्रिय सखी अर्तेनसिया पोत्ता अपने पति की ओर देखकर एक गहरा नि:श्वास लेती हुई बोली—बेचारा बर्तोलिनो लीना की तरह की लड़की के साथ...
—क्यों, बेचारा क्यों? उसके पति बोल पड़े।
इन महोदय की काफ़ी उम्र हो गई है, लीना की दूसरी शादी की बात उन्होंने ही चलाई थी। इसी कारण इस शादी की किसी प्रकार की भी समालोचना सुनते ही उन्हें क्रोध आता था।
—बेचारा, कहने लायक कौन-सी बात हुई? बर्तोलीनो तो मूर्ख नहीं है, केमेस्ट्री पर उसका असाधारण अधिकार है।
—हाँ, केमेस्ट्री पर है, अर्तेनसिया बोली।
—देखना तुम, बर्तोलीनो बिलकुल यथार्थ पति सिद्ध होगा। केमेस्ट्री की कौन सी बात है? यदि तनिक प्रयास कर वह अपने सारे शोधकार्य छपवा देता तो आज सारे देश में वह एक आदर्श शिक्षक माना जाता। इसके अलावा ऐसा साफ़ दिल वाला नेक इंसान है।
बिल्कुल ठीक कहा, अत्यंत साफ़ दिलवाला नेक आदमी है। लीना के इस द्वितीय हनीमून की बातें सोच कर अर्तेनसिया मन ही मन बिना हँसे न रह सकी। पहली बार भी लीना रोम गई थी। इस बार भी रोम जा रही है। पहली बार था फुर्तीला, धूर्त, उत्साही (कभी-कभी थोड़ा या अधिक उत्साही) सिनोर ताद्देयी, और इस बार उसकी जगह यह छोकरा बर्तोलीनो—गंजा सिर, मासूम चेहरे और अनुभव में बिल्कुल बच्चा है।
ट्रेन छूटने से पहले अनसेलमो चाचा ने बहू से कहा था—बर्तोलीनो की ज़रा देखभाल करना, उसका ज़रा ख़याल रखना। लीना अपने प्रथम: हनीमून के लिए पहले एक बार रोम आ चुकी थी। देश भ्रमण का सारा रहस्य उसे पता है—सारे सफर में वह बर्तोलीनो को लगभग बच्चों की तरह हाथ पकड़ कर ले आई।
अंत में गाड़ी जब रोम पहुंची तो वह पति से बोली—तुम कोई चिंता मत करो, उसकी मैं सब प्रबंध किए लेती हूँ। जो कुली उनका सामान एकत्र कर रहा था, ओर देख कर वह बोली—होटल विक्टोरिया।
स्टेशन के बाहर ही होटल विक्टोरिया की बस इंतज़ार कर रही थी। ड्राइवर को पहचान कर लीना ने उसकी ओर देख कर थोड़ा सिर हिलाया।
—सुंदर होटल है, देखो, छोटा-सा, साफ़-सुथरा, नौकर-चाकर चुस्त हैं, बिल्कुल शहर के बीच में और ख़र्च भी बहुत अधिक नहीं है। छह साल पहले उनके साथ प्रथम हनीमून में आकर मैं इसी होटल में ठहरी थी...तुम्हें भी यह अच्छा लगेगा, देखना।
वह होटल लीना को बिल्कुल घर की तरह लगा। किसी ने उसको पहचाना है, ऐसा प्रतीत नहीं हुआ, लेकिन वह सबको अवश्य ही पहचान सकी है। वह बूढ़ा वही पिप्पो है, छह साल पहले इसी आदमी ने उनकी सेवा-टहल की थी। वह उनको दूसरी मंज़िल में एन.12 नं. कमरे में ले गया, काफ़ी बड़ा कमरा है, भली-भाँति सजाया हुआ, किंतु लीना को वह कमरा पसंद नहीं आया।
—पिप्पो, उन्नीस नं. का कमरा क्या ख़ाली है? पिप्पो पता लगाने गया। उस मौक़े पर लीना को याद आया कि छह वर्ष पूर्व ‘उनके’ साथ भी ऐसा ही हुआ था। ‘उनके’ लिए दूसरी मंज़िल में एक कमरा इन लोगों ने ठीक कर रखा था, लेकिन ‘उन्होंने’ तीसरी मंज़िल का एन-19 नं. का कमरा माँगा।
—सुनते हो? वहीं हम लोग ठीक रहेंगे। शोरगुल कम है, हवा काफ़ी है। वही एक कमरा...
पिप्पो ने लौट कर जब बतलाया कि एन-19 नं. का कमरा ख़ाली है, तो लीना बच्चों की तरह ताली बजा कर हँस पड़ी। ठीक उसी कमरे में वह फिर रहेगी, वही सब असबाबात, उसी तरह सजाया हुआ, जंगले के पास वही छोटी-सी ताक। कितना मज़ा आएगा।
कहने की ज़रूरत नहीं, बर्तोलीनो...लीना की ख़ुशी में हिस्सा न ले सका।
—क्यों जी, यह कमरा तुम्हें पसंद नहीं आ रहा है? लीना ने पूछा।
उदासभाव से बर्तोलीनो ने जवाब दिया—क्या बुरा है, तुम्हें पसंद है तो ठीक ही है। उसके बाद लीना जब कपड़े बदलने पर्दे के पीछे गई तो वह कमरे में पड़े पलंग की ओर देख कर सोचने लगा कि यहीं, इसी बिस्तर पर उसकी पत्नी ने अपनी प्रथम विवाहित रात्रि अपने प्रथम पति सिनोर ताद्देयी के साथ बिताई थी...और बहुत दूर उसकी पत्नी के मकान की दीवाल पर टंगी तसवीर में से सिनोर ताद्देयी की मूर्ति उसकी आँखों के सामने जाग उठी—स्मित हास्य के साथ उसकी ओर देख कर वे टोपी उठा रहे हैं।
हनीमून के वक़्त वे उसी बिस्तर में सोए, उसी रेस्ट्राँ में उन्होंने खाना खाया, वही सब दृश्य भी देखते फिरे, वही सब जादूघर, वही चित्रशालाएँ, वही सब गिरजे, यहाँ तक कि वही सब बाग़-बग़ीचे, जहाँ-जहाँ छह वर्ष पूर्व लीना अपने ‘उनके’ साथ गई थी।
बर्तोलीनो बहुत शर्मीले स्वभाव का आदमी है। किसी तरह भी मुँह खोलकर नहीं कह सका कि लीना के प्रथम पति के उपदेश, अनुभव, रुचि और इच्छा-अनिच्छा का पग-पग पर अनुसरण करते हुए चलना, उसे कितना बुरा लग रहा है। लीना ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया कि उसका तरुण पति उसके व्यवहार से मन ही मन कितना मर्माहत हुआ है। अट्ठारह साल की उम्र में उसकी शादी हुई थी। उस समय वह लगभग बच्ची ही थी। कुछ भी समझती नहीं थी। जानती नहीं थी। उसी भले आदमी अर्थात् ताद्देयी ने उसे शिक्षा-दीक्षा देकर बड़ा किया। वह अपने प्रथम पति की ही सृष्टि है। जो कुछ भी उसके पास है, वह सब कुछ ही क्या उसने ‘उनसे’ नहीं पाया है? यहाँ तक की ‘उनसे’ अलग-थलग कुछ सोचने या अनुभव करने तक की क्षमता भी उसकी लोप हो गई थी।
उसने जो पुनर्विवाह किया है, वह भी सिनोर ताद्देयी के निर्देश के अनुसार है। ‘उन्होंने’ ही उसको सिखाया था कि अश्रुजल से जीवन की शुश्रूषा नहीं होती, जीवित के लिए जीवन और मृत के लिए मृत्यु का होना ज़रूरी है। केवल यही बात याद रखते हुए उसने बर्तोलीनो को पति रूप में ग्रहण किया था और किसी कारण से नहीं। बर्तोलीनो यदि उसे प्यार करता है तो उसकी मर्ज़ी को वह अवश्य ही मानकर चलेगा। और इसका अर्थ है ताद्देयी की इच्छा-अनिच्छा का अनुसरण करना। ‘वे’ ही मालिक हैं, जीवन-रथ के सारथी हैं। किंतु यौवन की अंधी अनभिज्ञता के वशीभूत होकर बर्तोलीनो ने सोचा, अति सामान्य कुछ भी क्या लीना उसे नहीं दे सकती? एक चुंबन, थोड़ा-सा प्यार, उसके प्रथम पति उसे जो कुछ सिखा गए हैं, उससे अलग कुछ? ऐसा कुछ जो उस गत व्यक्ति के प्रभुत्व से लीना को कुछ समय के लिए मुक्त कर सके। लेकिन यह बात प्रकट करने में भी उसे शर्म मालूम होती है और विद्रोह करने की बात तो वह सोच ही नहीं सकता।
हनीमून से लौटकर एक अप्रत्याशित बुरी ख़बर उन लोगों ने सुनी। सिनोर मोत्ता की, जिन्होंने उनकी शादी की बातें चलायी थी, अचानक मृत्यु हो गई। वह ख़ुद जब विधवा हो गई थी, उस समय इन्हीं मोत्ता की पत्नी अर्तेनसिया ने उसके लिए कितना किया था, यह बात क्या लीना भूल सकती थी? वह भी दौड़ गई, अपनी सहेली को सांत्वना प्रदान करने, सहायता करने। लेकिन वह समझ ही नहीं पाई कि पति की मृत्यु के दस दिन बाद भी अर्तेनसिया क्यों इतनी अधिक शोकाकुल है?
—उसे क्या हुआ है, बोलो तो? लौट कर उसने पति से पूछा। पत्नी की नासमझी को देखकर बर्तोलीनो शर्म से लाल पड़ गया।
—इसके माने जो भी कहो तुम, उसके पति का देहांत हो गया है।
—उसके पति? उनका देहांत हो गया है तो क्या हुआ? पिता की उम्र के पति, उसके लिए...
—तो क्या हुआ? क्या वह दु:खी नहीं हो सकती?
—पिता की उम्र के थे, पर पिता तो नहीं थे न? लीना जबरन बोल पड़ी।
लीना की ही बात सही है। अर्तेनसिया ने लक्ष्य किया था कि लीना के मुख से उसके मृत पति के बारे में सुनते-सुनते बर्तोलीनो के मन में घृणा भर गई थी। इसी कारण अर्तेनसिया गहरे दु:ख के भाव को धारण किए हुए उसके मन को भुलाने का प्रयास करने लगी। उसके दु:ख ने बर्तोलीनो को इतने गंभीर रूप से विचलित कर दिया कि उसने पहली बार अपनी स्त्री के ख़िलाफ़ विद्रोह किया।
—तुम...तुम भी क्या रोई नहीं थी?
वह और भी कुछ कहता शायद, किंतु लीना उसे बाधा देकर बोल पड़ी—उसके साथ मेरी तुलना। पहली बात है कि ‘वे’ वे थे!...
पत्नी के मुँह की बात काट कर बर्तोलीनो बोला—वे उस समय बूढ़े नहीं हुए थे, यही न?
—इसके अलावा...मैं भी क्या रोई नहीं थी? हाँ, रोई थी, कितना रोई थी...
लेकिन आख़िर तक मैंने अपने को संभाल लिया था, किंतु अर्तेनसिया क्या कर रही है? केवल रो रही है और रोती ही जा रही है मानो जीवन भर वह रोएगी ही। जानती हूँ, जानती हूँ मैं, यह सब दिखावटी रोना है।
—दिखावटी! असंभव! लीना की बात सुनते ही बर्तोलीनो का क्रोध बढ़ गया। उसे जितना ग़ुस्सा अपनी पत्नी पर आया, उससे कहीं अधिक ग़ुस्सा उसको आया उसके मृत पति पर, उन्हीं सिनोर ताद्देयी पर। वह आदमी जैसे अभी तक उसकी ओर देखता-मुस्कुराता हुआ टोपी उठाए हुए है। अभी तक उसने अपनी इच्छा और मर्ज़ी के वशीभूत कर रखा है, उसकी पत्नी को।
वही चित्र! वही चिरंतन हँसी! अब सहन नहीं होता। जहाँ भी वह जाता है, भूत की तरह पीछे पड़ा रहता है यह। वो है, उसकी आँखों के सामने हँस-हँस कर टोपी उठाकर मानो कह रहा है, अब तुम्हारी बारी है, हाथ-पैर फैलाकर काफ़ी आराम कर लो। यह कमरा किसी समय मेरा ऑफ़िस-रूम था, तुम्हारी केमिस्ट्री-लैब है। जीवित के लिए जीवन, मृत के लिए मृत्यु। सुख से रहो, शांतिपूर्वक काम करो।
शायद वह सोने के कमरे में आया है, वहाँ भी सिनोर ताद्देयी की मूर्ति मुख पर क्रूर हँसी के साथ प्रकट होती है’-आओ, आओ। कहो, अच्छे तो हो? मेरी पत्नी कैसी लग रही है तुम्हें? मैंने उसे अच्छी शिक्षा दी है कि नहीं, बोलो? जीवित के लिए जीवन, मृत के लिए मृत्यु।
नहीं, नहीं, अब बरदाश्त नहीं होता। घर के कोने में वह आदमी विराज रहा है। बर्तोलीनो जैसा निरीह आदमी है, अस्थिर हो उठा, छटपटाने लगा। पत्नी के निकट अपनी मानसिक दशा छिपाने के प्रयत्न में अब वह सफल न हो सका। अंत में मन की भावना को छिपाने की चेष्टा करना ही उसने छोड़ दिया। उसने प्रयत्न किया अव्यवस्थित होने का, अजीब बनने का, जिससे पत्नी की पुरानी आदतों में हलचल पैदा हो, किंतु इस बार भी वह असफल रहा।
—तुम्हारा चाल-चलन बिलकुल ‘इनकी’ ही तरह हो रहा है, तनिक शासन के स्वर में लीना बोली, वे भी बहुत ही बेहिसाबी थे। ओह, बड़े ही सज्जन थे बिचारे!
शीघ्र ही बर्तोलीनो समझ गया कि उसके इस अव्यवस्थित व्यवहार की लीना मन ही मन प्रशंसा कर रही है। उसका यह सब काम लीना को बिल्कुल उसी व्यक्ति की याद दिलाता है, जिसको वह अपनी पत्नी के मन से हटा देना चाहता है अंत में एक बहुत ही बुरी चाल उसके मन में आई।
सही बात तो यह थी कि पत्नी को धोखा देने की उसकी उतनी इच्छा नहीं थी, जितनी थी प्रतिहिंसा की उत्तेजना। उसी व्यक्ति पर उसका आक्रोश है, जिसने उससे पहले ही उसकी पत्नी पर दख़ल जमाया था एवं मर कर भी जिसने उस पर अपना दख़ल नहीं छोड़ा था। उसके अनबूझ, अनभिज्ञ मन में यह धारणा हुई कि यह दुष्टता की चाल उसकी अपनी ही सृष्टि है।
वह सोच ही नहीं सका कि इस कुबुद्धि को अर्तेनसिया ने ही उसके अवचेतन मन में थोड़ा-थोड़ा करके प्रवेश कराया था। जब उसने विवाह नहीं किया था, तब पढ़ाई से उसका ध्यान हटाने की कोशिश अर्तेनसिया ने अनेक बार की थी, पर असफल हुई थी।
कुचक्री अर्तेनसिया अब चाल पर चाल चल रही थी। इधर-उधर करके बर्तोलीनो को उसने बहुत समझाया कि लीना की तरह प्रिय सहेली के साथ प्रवंचना करने में दु:ख से उसकी छाती फट रही है, किंतु बर्तोलीनो को वह बहुत पहले से ही प्यार करती आ रही है, लीना ने तब उसे देखा तक न था। वह प्यार नियति की तरह अनतिक्रम्य है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसमें नियति का कितना हाथ हो सकता है, बर्तोलीनो कुछ सोच ही न सका। बेचारा भला मानस! उसकी गहरी चाल जो इतनी आसानी से सफल हुई, उससे कुछ हताश ही हुआ। उसे लगा, जैसे वह ठगा गया है। अपने पुराने मित्र मोत्ता के कमरे में जब वह अकेला हुआ, थोड़ी ही देर में पश्चात्ताप से उसका मन भर गया। हठात् उसकी नज़र पड़ी, बिस्तर के किनारे फ़र्श पर चमकती हुई कोई चीज़ पड़ी हुई है। छोटी-सी सोने की एक लॉकेट, अवश्य ही अर्तेनसिया के गले की होगी। वह उसे उठा कर अर्तेनसिया के लिए इंतज़ार करने लगा। हिलाते-डुलाते समय उसकी उत्तेजित अंगुलियों के दबाव से अचानक लॉकेट का मुँह खुल गया।
अपनी आँखों पर वह विश्वास न कर सका। लॉकेट के अंदर था छोटे आकार का एक खुदा हुआ चित्र...सिनोर कोसिमो ताद्देयी का वही चित्र...वह मुस्कुरा कर उसकी ओर देखते हुए टोपी उठा रहे हैं।

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छह बरस के बाद (कहानी) | Chhah Baras Ke Baad : कैथरीन मैंसफ़ील्ड

और फिर, छह बरसों के बाद इसने उसे दोबारा देखा। वह बाँस से बनी उन छोटी-छोटी मेज़ों में से एक पर बैठा था। मेज़ काग़ज़ से बने डेफोडिल फूलों के जापानी गुलदस्ते से सजी हुई थी। सामने फलों की एक बड़ी प्लेट रखी हुई थी और वह अपने उसी ख़ास अंदाज से संतरा छील रहा था, जिसे वह ख़ूब पहचानती थी और इसी वजह से इसने उसे फ़ौरन पहचान लिया।
उसने भी अपने भीतर अचानक पहचान लिए जाने को एक झटके के साथ महसूस किया। क्योंकि जैसे ही उसने सिर उठाया था, उन दोनों की आँखें मिली थीं। नामुमकिन! वह एकदम से पहचान ही नहीं पाया! वह मुस्कराई; इसने त्यौरियाँ चढ़ा लीं। वह उसके क़रीब आई। उसने पल भर के लिए आँखें बंद कीं, पर आँखें खोलते ही उसका चेहरा चमक उठा, जैसे अँधेरे कमरे में माचिस की तीली जलाने से होता है। उसने संतरा रख दिया और कुर्सी पीछे की तरफ़ खिसका दी। इसने गर्माहट भरा अपना हाथ दस्ताने में से बाहर निकाला और उसके हाथ में दे दिया।
“वैरा”, यह विस्मय से चिल्लाया “कितनी अजीब बात है। वाक़ई एक क्षण के लिए तो मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया। क्या तुम बैठोगी नहीं? तुमने खाना खाया? कॉफ़ी लोगी?” वह हिचकिचाई पर फिर बोली, “ठीक है, कॉफ़ी ले लूँगी”, और वह उसके सामने आकर बैठ गई।
“तुम बदल गई हो, तुम बहुत ज़्यादा बदल गई हो,” वह उसकी ओर लगातार विस्मय और अधीरता से देखता रहा। “यार, तुम सचमुच बहुत अच्छी लग रही हो। मैंने पहले तुम्हें कभी इतना ख़ूबसूरत नहीं पाया।”
“सच”! इसने अपने चेहरे से रूमाल हटाया और गले तक बंद फर कोट के कॉलर का बटन खोल दिया। “मेरी तबियत कुछ ढीली लग रही है। तुम तो जानते हो मुझसे यह मौसम सहा नहीं जाता।”
“अरे, हाँ, तुम्हें तो जाड़े से नफ़रत है...”
“हाँ मुझे यह सख्त नापसंद है।” वह ठंड से काँप रही थी। “और सबसे बेकार बात तो यह है कि जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं...”
उसने बीच में ही उसे टोका, “क्षमा चाहता हूँ” और बैरे को बुलाने के लिए मेज़ थपथपाने लगा। “थोड़ी कॉफ़ी और क्रीम ले आओ” और फिर दोबारा उसकी ओर मुख़ातिब हो गया, “क्या वाक़ई तुम कुछ नहीं खाओगी? थोड़ा-सा फल तो ले ही सकती हो। यहाँ फल बहुत अच्छे हैं।”
“नहीं शुक्रिया।”
“ठीक है,” हँसते हुए उसने दोबारा संतरा उठा लिया। “हाँ, तो तुम कह रही थीं, जो जितना बूढ़ा होता जाता है।” “उतना ठंडा होता जाता है।” वह हँस पड़ी। हालाँकि वह सोच रही थी उसकी यह आदत, बीच में इस तरह टोकने की—आज भी उसे कितनी अच्छी तरह याद है। और कैसे छह बरस पहले उसकी इस आदत से वह कितनी भड़क उठती थी। उसे हमेशा लगता, मानो बात करते-करते उसने अचानक इसके होंठों पर हाथ दिया हो और उसे भूलकर कुछ और करने लग गया हो और फिर हाथ हटाकर अपनी उसी चौड़ी मुस्कान से उसकी ओर मुख़ातिब हो...“हाँ तो अब हम तैयार हैं। अब सब कुछ निपट गया है।”
“उतना ठंडा होता जाता है!” उसने हँसते हुए उसी के शब्दों को ज्यों का त्यों दोहराया। “ऐ, तुम अब भी वैसी ही बातें करती हो और तुम्हारी एक और बात है, जो बिल्कुल भी नहीं बदली, तुम्हारी ख़ूबसूरत आवाज़—बात करने का तुम्हारा मोहक अंदाज।” अब वह काफ़ी गंभीर था। वह इसकी तरफ़ कुछ झुका, इसने संतरे के छिलकों की ताज़ी, तेज़ ख़ुशबू महसूस की। “तुम्हें सिर्फ़ एक शब्द कहना होगा और कई आवाज़ों के बीच भी मैं तुम्हारी आवाज़ को बख़ूबी पहचान लूँगा। मुझे अक्सर ताज्जुब होता है कि ऐसा क्या है, जो तुम्हारी आवाज़ मेरे दिमाग़ में एक न भूलने वाली याद बनकर रह गई है...क्या तुम्हें वह पहली दोपहर याद है, जो हमने साथ-साथ क्यू गार्डन में बिताई थी। तुम्हें कितना अजीब लगा था कि मुझे किसी भी फूल का नाम नहीं पता था। तुम्हारे सारे नाम बताने के बावजूद मैं आज भी फूलों के नामों से उतना ही अनजान हूँ—यह वाक़ई अजीब विस्मय की बात है कि जब भी सब कुछ ख़ुशनुमा और सुखद होता है और मैं कोई चमकदार, चटक रंग देखता हूँ तो मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है—
‘जिरेनियम, मेरीगोल्ड और वैरबोना’। और मुझे लगता है कि उस विस्मृत भूली-बिसरी भाषा के ये तीन शब्द ही मुझे याद रह गए हैं...तुम्हें वह दोपहर याद है?”
“अरे हाँ, बिल्कुल, बहुत अच्छी तरह याद है”, उसने एक गहरी, लंबी साँस ली। मानों दोनों के बीच रखे उन ख़ूबसूरत काग़ज़ी डेफोडिल के फूलों को भी सहना बहुत मुश्किल लग रहा हो। पर फिर भी उस दोपहर की जो याद उसके ज़ेहन में थी, उससे उसे चाय के टेबल पर एक बेतुका-सा दृश्य ही याद आया—चाइनीज़ पेगोडा में काफ़ी बड़ी संख्या में लोग चाय पी रहे थे और इसने बिल्कुल किसी सनकी आदमी की तरह तुनकमिज़ाजी दिखाई थी, वह अपनी पुआल की टोपी से सबके साथ ठिठौली करता रहा, जबकि उसका यह बर्ताव किसी भी तरह उस मौक़े के अनुकूल नहीं था। चाय पीते हुए केवल कुछ सिरफिरे लोग ही उसके इस व्यवहार का आनंद ले रहे थे और कैसे उसे यह सब झेलना पड़ा था।
पर अब, जब वह बोल रहा था, तो वह याद धुँधली पड़ गई थी। वह ठीक ही कह रहा था। हाँ, वह वाक़ई एक अच्छी दोपहर थी। जिरेनियम, मेरीगोल्ड और वेरबोना तथा ख़ुशनुमा धूप से भरी। उसका ध्यान अंतिम दो शब्दों पर ही अटक गया मानो उसने इन शब्दों को अभी-अभी गाया हो।
उस ख़ुशनुमा धूप के साथ एक और याद जुड़ी हुई थी। उसने ख़ुद को एक लॉन में बैठा पाया था और वह उसके पास लेटा हुआ था, और अचानक काफ़ी देर की चुप्पी के बाद वह घूमा और अपना सिर इसकी गोद में रख दिया था।
“काश” उसने फुसफुसाते हुए कहा था “काश, मैंने ज़हर खा लिया होता और अभी, इसी क्षण मैं मर रहा होता!”
उसी क्षण एक नन्हीं-सी लड़की सफ़ेद फ्राक पहने हाथ में बड़ा लिली का फूल लिए झाड़ी के पीछे से दौड़ते हुए आई। उसने इनकी ओर आँखें फाड़कर देखा था और फिर भागकर चली गई थी। पर वो यह सब नहीं देख पाया था। वह उसके ऊपर झुकी हुई थी।
“ऐ, तुम ऐसा क्यों कहते हो? मैं तो कभी ऐसा नहीं कह सकती।”
पर उसने एक हल्की-सी आह भरी और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ख़ुद के गाल पर रख दिया।
“क्योंकि मैं जानता हूँ मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ—बेइंतहा प्यार और मुझे बहुत दु:ख झेलना पड़ेगा, क्योंकि वैरा तुम मुझे कभी प्यार नहीं करोगी।”
पहले की तुलना में अब वह काफ़ी बेहतर दिखाई दे रहा था। उसका उस सपनीली दुनिया में रहना और हमेशा अनिश्चत रहना अब एकदम ख़त्म हो गया था। अब उसमें एक पुरुषोचित गंभीरता थी, जिसने जीवन में एक मुक़ाम हासिल कर लिया हो, जो आदमी को आत्मविश्वास और सुरक्षा से भर देता है। कुल मिलाकर अब वह काफ़ी प्रभावशाली लग रहा था। उसने पैसे भी ख़ूब कमाए होंगे, उसके कपड़े बढ़िया थे और उस पर फब रहे थे। उसी क्षण उसने अपनी जेब से रशियन सिगरेट की डिब्बी निकाली।
“तुम लोगी?”
“हाँ, मैं लूँगी” उसने उन्हें उठा लिया, “ये बढ़िया सिगरेट लग रहे हैं।”
“हाँ, मेरे ख़याल से ये बढ़िया सिगरेट हैं। मैं इन्हें ख़ास अपने लिए सेंट जेम्स स्ट्रीट में एक मामूली से आदमी से बनवाता हूँ। मैं ज़्यादा धूम्रपान नहीं करता। मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, पर मैं जब भी पीता हूँ मुझे ज़ायक़ेदार और बिल्कुल ताज़ा सिगरेट चाहिए। धुआँ उड़ाना मेरी आदत नहीं, बल्कि सुख का साधन है। बिल्कुल किसी इत्र की तरह। क्या तुम्हें अब भी इत्र बहुत पसंद हैं? जब मैं रूस में था...”
वह बीच में ही बोली “क्या तुम वाक़ई रूस गए हो?”
“अरे हाँ, मैं क़रीब साल भर से ज़्यादा वहाँ रहा था। तुम शायद भूल गई हो, हम हमेशा वहाँ जाने की बातें किया करते थे?”
“नहीं, मैं नहीं भूली हूँ।”
उसके चेहरे पर एक अजीब अधूरी-सी मुस्कान आई और वह कुर्सी के पीछे टिककर बैठ गया। “क्या यह अजीब बात नहीं। मैं वाक़ई उन सभी जगहों पर गया हूँ, जहाँ जाने की हमने योजनाएँ बनाई थीं। हाँ, मैं उन तमाम जगहों पर गया और वहाँ काफ़ी समय तक रहा। जैसा कि तुम कहा करती थी। “वहाँ की हवा को महसूस करना चाहिए।” दरअसल मैंने पिछले तीन साल लगातार यात्राएँ ही की हैं। स्पेन, कोरसीका, साइबेरिया, रूस, मिस्र। अब केवल चीन ही रह गया है और मेरा वहाँ जाने का भी पूरा इरादा है, जब युद्ध समाप्त हो जाएगा।”
जैसे वह बता रहा था—धीरे-धीरे...सिगरेट की राख एश ट्रे में झाड़ते हुए, इसे लगा मानो सालों से उसके अंदर सोया एक अजीब-सा पशु अचानक जाग उठा हो, और उसके भीतर पूरी तरह पसर गया हो और जम्हाई ले रहा हो। उसने अपने कान खड़े कर लिए हैं, कूदकर वह पैरों पर खड़ा हो गया है और अपनी ललचाई, प्यासी नज़रों से उन दूर-दराज़ के इलाक़ों को घूर रहा हो, पर हँसते हुए, धीरे से उसने केवल इतना ही कहा—“मुझे तुमसे ईर्ष्या हो रही है।”
उसने सिर हिलाया ‘‘यह सब बड़ा अद्भुत रहा है, ख़ासकर रूस। रूस में वह सब कुछ है, जिसकी हमने कल्पना की थी और शायद उससे भी बहुत अधिक। मैंने कुछ दिन वोल्गा नदी पर नाव में भी बिताए। क्या तुम्हें मल्लाह का वह गीत याद है, जिसकी धुन तुम अक्सर बजाया करती थीं।?”
“हाँ,” जैसे ही उसने यह कहा वह गीत उसके भीतर बजने लगा।
“क्या तुम अब भी वह धुन बजाती हो?”
“नहीं, मेरे पास पियानो नहीं है।”
वह चकित हो गया। “पर तुम्हारे उस ख़ूबसूरत पियानो का क्या हुआ?”
उसने थोड़ा-सा मुँह बनाया, “सालों पहले बेच दिया।”
“पर तुम्हें तो संगीत का कितना शौक़ था।” उसे अचरज हुआ।
“अब उसके लिए मेरे पास समय नहीं है।” वह बोली। वह कुछ नहीं बोला “नदी पर बिताया जीवन”, वह आगे बताने लगा “कितना कुछ ख़ास तरह का था। एक आध दिन के बाद आपको यह लगता ही नहीं कि आप किसी और जीवन को भी जानते हैं और यह भी ज़रूरी नहीं कि आपको उनकी भाषा की जानकारी हो—नाव पर रहते हुए आपके और उन लोगों के बीच एक बंधन-सा बन जाता है और इतना ही काफ़ी होता है। आप उनके साथ खाते हो, उठते-बैठते हो, पूरा दिन बिताते हो और शाम को शुरू हो जाता है संगीत का एक अंतहीन सिलसिला।”
वह काँपने लगी, उसके भीतर फिर से मल्लाह का गीत, वह पीड़ा भरी धुन ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी। उसने देखा कि एक गहरे रंग की नाव पानी पर चल रही है, नदी के दोनों ओर उदास पेड़ खड़े हैं। वह काँपने लगी...“हाँ, मुझे यह सब बहुत पसंद है।” वह अपना दस्ताना सहलाते हुए बोली।
“रूसी जीवन की लगभग हर चीज़ तुम्हें बेहद पसंद आएगी”, उसने बड़ी आत्मीयता से कहा। “वहाँ सब कुछ इतना अनौपचारिक, इतना आवेश से भरा हुआ, इतना मुक्त है कि कहीं किसी संदेह का सवाल ही नहीं, और फिर वहाँ के किसान कितने अद्भुत हैं। वे इतने बढ़िया इंसान हैं—हाँ, वहाँ सब कुछ ऐसा ही है। यहाँ तक कि जो आदमी घोड़ा गाड़ी चलाता है, वह भी आसपास जो कुछ भी घट रहा है उसका एक हिस्सा लगता है। मुझे याद है एक शाम, हम सब यानी मेरे दो दोस्त और उनमें से एक की बीवी ‘ब्लैक सी’ के किनारे पिकनिक मनाने गए थे। हमने अपना खाना और शैंपेन ली और घास पर बैठकर ही खाने-पीने लगे थे। जब हम खा रहे थे तो गाड़ीवान आया —“थोड़ा-सा सोये का अचार लीजिए”—वह बोला। वह सब कुछ हमारे साथ बाँटना चाहता था। मुझे यह सब इतना अच्छा लगा था। तुम समझ सकती हो न मैं क्या कहना चाहता हूँ?”
और उस क्षण इसे लगा, मानो वह उस रहस्यमय ब्लैक सी के किनारे घास पर बैठी हो। समुद्र बिल्कुल मखमल की तरह काला था और उसकी शांत, मखमली लहरें किनारे पर आकर तरंग पैदा कर रही थीं। उसने सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ी को भी देखा और घास पर बैठे उस दल को भी जिनके चेहरे और हाथ चाँदनी में चमक रहे थे। उस औरत के पीले वस्त्र को भी देखा, जो फैला हुआ था। उसने उसके तह किए हुए छाते को भी देखा जो घास पर इस तरह पड़ा था, जैसे कसीदाकारी करने का मोतियों वाला कोई बड़ा हुक पड़ा हुआ हो। इनसे थोड़ा-सा हटकर घुटने पर कपड़े में अपना खाना लिए बैठा गाड़ीवान भी उसे दिखाई दिया, जो कह रहा था, “सोये का अचार लीजिए” और यद्यपि उसे पता नहीं था कि यह डिल का अचार होता क्या है, फिर भी उसने अंदाज़ लगाया कि हरे काँच की बरनी के भीतर से तोते की चोंच जैसी लाल मिर्च की तरह की कोई चीज़ चमक रही थी। उसने उसे अपने मुँह के भीतर रखकर चूसा; डिल अचार बेहद खट्टा था...
“हाँ, मैं बहुत अच्छी तरह समझ रही हूँ, तुम क्या कहना चाह रहे हो”, वह बोली।
उसके बाद एक क्षण चुप्पी छाई रही। इसी क्षण दोनों ने एक-दूसरे को देखा। अतीत में जब कभी वे इस तरह एक-दूसरे को देखते थे, उन्हें आपस में एक ऐसी असीम समझ का अहसास होता था, जो उनकी आत्माओं में बसी हुई थी। कुछ ऐसे मानो वे एक-दूसरे की बाँहों में खोए हुए शोकमग्न प्रेमियों की तरह समुद्र में कूद पड़ने को तैयार हों। पर अब अचरज की बात यह थी कि उसी ने अपने क़दम पीछे हटा लिए और वह बोला—“तुम कितनी तल्लीनता से सब कुछ सुनती हो। जब तुम अपनी इन बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखती हो तो मुझे लगता है कि मैं तुम्हें वह सब कुछ बता सकता हूँ, जो शायद मैं किसी दूसरे इंसान को कभी नहीं बता पाऊँ।”
क्या उसके स्वर में खिल्ली उड़ाने जैसा कुछ भाव था या यह उसके अपने मन का वहम था? वह कुछ समझ नहीं पाई।
“मैं जब तुमसे मिला नहीं था” वह बोला, “मैंने कभी किसी से अपने बारे में कोई बात नहीं की थी। मुझे वह रात भी अच्छी तरह याद है, जब मैं तुम्हारे लिए एक छोटा-सा क्रिसमस-पेड़ लाया था और तुम्हें अपने बचपन के बारे में सब कुछ बताया था। मैंने बताया था कि कैसे एक दिन मैं इतना दु:खी था कि घर से भागा था और दो दिनों तक अपने अहाते में रखी ठेला गाड़ी के नीचे रहा था। कोई मुझे ख़ोज नहीं पाया था और तुम सुनती रही थी। तुम्हारी आँखें चमक रही थीं और मुझे लगा, जैसे तुम्हारे असर में आकर वह छोटा-सा क्रिसमस पेड़ भी मेरी दास्ताँ सुन रहा था, वैसे ही जैसे परी-कथाओं में होता है।”
पर उस शाम की बात से उसे उस ज़ायक़ेदार मुरब्बे के छोटे डिब्बे की याद आई। उसकी क़ीमत छह या सात पेन्स थी। जो उसे बहुत अधिक लग रही थी और वह इसे सहन नहीं कर पा रहा था। “ज़रा देखो तो इतने छोटे से डिब्बे की इतनी ज़्यादा क़ीमत।” जब तक वह मुरब्बा खाती रही, वह उसे ख़ुशी और अचरज के साथ निहारता रहा।
“नहीं, यह तो एक तरह से पैसे खाना है। तुम इस आकार के छोटे से डिब्बे में सात शिलिंग डाल भी नहीं सकते। ज़रा सोचो ये कितना मुनाफ़ा कमाते होंगे...” और वह किसी जटिल हिसाब-किताब में उलझ गया था। पर अब मछली के उस ज़ायक़ेदार मुरब्बे को अलविदा। क्रिसमस पेड़ मेज़ पर था, और वह नन्हा-सा बच्चा ठेला गाड़ी के नीचे अहाते के कुत्ते पर अपना सिर टिकाकर सो रहा था।
“उस कुत्ते का नाम बीसून था न” वह ख़ुशी से चिल्ला पड़ी।
पर वह कुछ समझ नहीं पाया, “कौन-सा कुत्ता? क्या तुम्हारे पास कोई कुत्ता था? मुझे तो कुत्ते के बारे में बिल्कुल याद नहीं।”
“नहीं, नहीं, मैं तो उस अहाते के कुत्ते की बात कह रही हूँ, जब तुम बहुत छोटे थे।” वह हँसा और उसने सिगरेट की डिब्बी झपटकर खींच ली।
“क्या कोई कुत्ता सचमुच था? मैं तो भूल ही गया हूँ। जैसे यह सब सदियों पहले की बात हो। मुझे विश्वास नहीं होता कि केवल छह साल ही बीते हैं। आज जब मैंने तुम्हें पहचाना तो मुझे अतीत में एक बहुत लंबी छलाँग लगानी पड़ी, उस समय को दोबारा ज़ेहन में लाने के लिए मुझे अपनी पूरी बीती ज़िंदगी के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ा।”
“मैं उस समय बिल्कुल बच्चा था”, वह मेज़ को बजाने लगा। “मैं अक्सर सोचता हूँ कि मैं तुम्हें कितना बोर किया करता था और अब मैं अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि तुमने जो भी लिखा था, वह क्यों लिखा था—हालाँकि उस वक़्त तो तुम्हारे उस ख़त ने बिल्कुल मेरी जान ही ले ली थी। कुछ अरसा पहले दोबारा वह ख़त मेरे हाथ लगा था और उसे पढ़कर मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाया था। कितना बुद्धिमानी से भरा था तुम्हारा ख़त—मेरी बिल्कुल सही तस्वीर खींची थी तुमने।” उसने नज़र ऊपर उठाई।
“तुम नहीं जाओगी?” वह उठने लगी थी।
उसने दोबारा अपना कॉलर बंद कर लिया था और चेहरे पर झीना आवरण डाल लिया था। “नहीं मुझे जाना ही होगा, वह बोली और किसी तरह मुस्कराई। अब वह जान गई थी कि वह उसका मज़ाक उड़ा रहा था।
“अरे, नहीं बाबा! प्लीज़,” वह गिड़गिड़ाया, “कुछ देर तो रुक जाओ” और उसने मेज़ पर से उसका एक दस्ताना उठा लिया और उसे ऐसे पकड़ लिया मानो, उसी से वह उसे रोक लेगा। “आजकल बात करने के लिए मुझे इतने कम लोग मिलते हैं कि मैं बर्बर होता जा रहा हूँ,” वह बोला। “क्या मैंने तुम्हें ऐसा कुछ कह दिया है, जिससे तुम्हें दु:ख पहुँचा है?”
“बिल्कुल नहीं,” वह झूठ बोल गई। पर जब उसने देखा कि वह उसके दस्ताने को कोमलता से धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से सहला रहा है तो उसका ग़ुस्सा काफ़ूर हो गया और उस क्षण वह उसे छह वर्ष पहले जैसा ही लगा...
“उस समय मैं वाक़ई चाहता था,” उसने धीमे स्वर में बोलना शुरू किया, “कि एक तरह से तुम्हारे लिए एक क़ालीन की तरह बन जाऊँ—उस पर तुम चलो, ताकि तुम्हें पत्थर और मिट्टी पर बिल्कुल भी न चलना पड़े और तुम्हें कोई चोट न लगे। मेरे दिल में इससे अधिक कुछ नहीं था—मेरा कोई स्वार्थ न था। हाँ, बाद में मेरी यह इच्छा ज़रूर थी कि मैं केवल क़ालीन नहीं, बल्कि एक जादुई क़ालीन बन जाऊँ और तुम्हें उड़ाकर उन तमाम देशों में ले जाऊँ जहाँ जाने के लिए तुममें इतनी ललक थी।”
जब वह यह बोल रहा था, उसने अपना सिर ऐसे उठाया जैसे वह कुछ पी रहा हो, और उसके भीतर का वह विचित्र पशु एक बार फिर करवट लेने लगा।
“मुझे लगता था कि तुम इस दुनिया में सबसे ज़्यादा तनहा हो,” वह बोलता गया “और फिर भी शायद तुम ही एकमात्र हो जो दुनिया में वाक़ई सही मायने में ज़िंदा है—अपने समय से अलग,” दस्ताने को सहलाते हुए वह बुदबुदाया, “भाग्यशाली।”
हे ईश्वर! उसने यह क्या कर डाला! कैसे उसने अपने नसीब, अपनी ख़ुशी को इस तरह नकार दिया। यही तो एक शख़्स था जो उसे समझता था। क्या अब वाक़ई देर हो चुकी है? क्या देर जैसा कभी कुछ होता है? वह उस दस्ताने की तरह थी, जिसे उसने अपनी उँगलियों में थाम रखा था।
“और फिर यह भी एक सच था कि तुम्हारे कोई दोस्त नहीं थे और न ही तुम लोगों से दोस्ती करती थीं। मैंने यह कैसे जाना था, क्योंकि मेरे भी कोई दोस्त नहीं थे। क्या अब भी सब कुछ वैसा ही है?”
“हाँ,” उसने साँस खींची। “बिल्कुल वैसा ही है। मैं अब भी हमेशा की तरह अकेली हूँ।”
“मैं भी,” वह धीरे से हँसा, “बिल्कुल वैसा ही।” अचानक तेज़ी से उसने उसका दस्ताना उसे वापस किया और अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई। “पर उस समय मुझे जो इतना रहस्यमय लग रहा था, अब मेरे लिए एकदम स्पष्ट है और तुम्हें भी शायद...”
“एक सीधी-सी बात यह है कि हम दोनों इतने अहंकारी, ख़ुद में डूबे हुए थे कि हमारे दिलों में किसी और के लिए कोई जगह ही न थी। क्या तुम जानती हो,” वह चिल्लाया। अब वह फिर अपने उसी दूसरे, एकदम अनजान रूप में आ गया था, “मैं जब रूस में था मैंने मानव-मस्तिष्क की प्रणाली को समझना शुरू किया था और उससे मैंने जाना कि हम बिल्कुल अलग तरह के नहीं थे। यह एक बहुत जानी पहचानी बात है...”
वह चली गई थी। वह वहीं बैठा रहा, हक्का-बक्का एकदम अचंभित...और फिर महिला वेटर से उसने बिल मँगवाया।
“क्रीम को तो छुआ भी नहीं गया है,” वह बोला “प्लीज़ उसके पैसे मत लगाओ!”

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