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टिकटों का संग्रह (कहानी) | Tikaton Ka Sangrah : कारेल चापेक

“इसमें कोई संदेह नहीं,” बूढ़े सज्जन श्री कारास ने कहा, “अगर कोई अपने अतीत का लेखा-जोखा करे, तो उसे अपनी ज़िंदगी में ही अलग-अलग क़िस्म की ज़िंदगियों के सूत्र मिल सकते हैं। यह संयोग की ही बात है कि किसी एक दिन वह ग़लती से—या शायद अपनी इच्छा से—एक ख़ास क़िस्म की ज़िंदगी चुन लेता है और आख़िर तक उसे निभाए ले जाता है। सबसे शोचनीय बात यह है कि वे दूसरी ज़िंदगियाँ—जिन्हें उसने नहीं चुना...मरती नहीं। किसी-न-किसी रूप में वे उसके भीतर जीवित रहती हैं। हर आदमी को उनमें एक अजीब-सी पीड़ा महसूस होती है...जैसे टाँग के कट जाने पर पीड़ा होती है। “मेरी उम्र कोई दस वर्ष की रही होगी, जब मैंने टिकट जमा करने शुरू कर दिए। मेरे पिता को मेरा यह शौक एक आँख नहीं सुहाता था। वह शायद सोचते थे कि एक बार मुझे यह लत पड़ गई तो पढ़ाई-लिखाई के प्रति मेरा ध्यान उखड़ जाएगा। किंतु मेरा एक मित्र था—लोयजीक चेपेल्का। मेरी तरह उसे भी विदेशी टिकट जमा करने का बेहद शौक था। लोयजीक के पिता ‘बैरल ऑर्गान’ बजाकर परिवार का पालन-पोषण करते। वह एक आवारा क़िस्म का लड़का था—मुँह पर चेचक के दाग़ थे, किंतु मेरा उसके प्रति गहरा लगाव था...कुछ उसी तरह...