नानबाई, अत्तारी, क़स्साबी की छोटी-मोटी दुकानें, दो क़हवेखाने, एक हेयर सैलून, दूसरी प्रकार की अन्य दुकानें ज़िंदगी की प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति और भूख को शांत करने का स्रोत बनीं, मैदान बरामीन के चारों तरफ़ बिखरी, एक मामूली से बाज़ार का दृश्य उत्पन्न कर रही थीं। मैदान और मैदान के रहने वाले इस तपती दोपहर में सूरज की गर्मी से क़बाब हुए, दोपहर के ढलते और शाम की नर्म ठंडी बयार के साथ रात के पसरने की आरज़ू करते थे। आदमी, जानवर, पेड़, दुकानें सभी इस गर्मी से अधमरे अलसाए से पड़े थे। सारा काम ठप्प पड़ा हुआ था। आसमान पर धूल ख़ाक़ का ग़ुबार जमा था, जो ट्राफ़िक के धुएँ से बीच में और गहरा हो जाता था। मैदान के एक तरफ़ चिनार के पुराने पेड़ों की कतारें थी, जिनके चौड़े तने अंदर से खोखले होकर टेड़े-मेढ़े हो गए थे और आड़ी-तिरछी उनकी शाखाएँ फिर भी पत्तियों से भरी हुई थी। इन्हीं पेड़ों की छाया में एक तख़्त पड़ा था, जिस पर दो लड़के कद्दू के नमकीन बीज का टोकरा और खीर का पतीला लिए बैठे होते। ठीक उसी के सामने क़हवेखाने से निकलता गंदा काला पानी जो कूड़े की अधिकता से रुक-रुक कर बहता था, जारी रहता था। केवल एक...