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श्रीनरेश मेहता की कविताएँ : Shrinaresh Mehta Kavita

 श्रीनेश मेहता (1922–2000) हिंदी के प्रमुख कवि, लेखक और नई कविता के महत्वपूर्ण रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनका जन्म मध्य प्रदेश के शाजापुर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़े रहे और उन्होंने कविता को नए विषयों, विचारों और भाषा के साथ आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में प्रकृति, प्रेम, मनुष्य के जीवन, संस्कृति और बदलते समय की अनुभूतियाँ दिखाई देती हैं। भारतीय परंपरा और आधुनिक जीवन को साथ रखकर देखने की उनकी अपनी दृष्टि थी। माध्यम मैं , उत्सवा , अरण्या और चैत्या उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। धूप की भाषा श्रीनरेश मेहता धूप की भाषा-सी खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया! शॉल-सा कंधों पर पड़ा यह फाल्गुन चैत्र-सा तपने लगेगा! केश सुखा लेने के बाद ढीला जूड़ा बना तुम तो लौट जाओगी, परंतु तुम्हें क्या पता, कि तुम— इस गवाक्ष आकाश और बालुकणों जैसे रिसते इस नि:शब्द समय से कहीं अधिक मुझमें एक मर्म एक प्रसंग बन कर लिखी जा चुकी हो प्रिया! इस प्रकार लिखा जाना ही पुरालेख होता है हवा, तुम्हारा ...
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प्रभाकर माचवे की कविताएँ : Prabhakar Machwe Kavita

प्रभाकर माचवे (1917–2001) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक, आलोचक और अनुवादक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़े प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने कविता, कहानी, निबंध और आलोचना सहित साहित्य की कई विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में बदलते समय, मनुष्य के अनुभव और जीवन की जटिलताओं को सहज भाषा में व्यक्त किया गया है। साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण हिंदी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। गेहूँ की सोच प्रभाकर माचवे काँप रहीं खेतों में गेहूँ की बालियाँ मेंड़ पर बैठा है भूमिजन चिलम पीता, खाँसता। सोचती हैं बालियाँ— ‘यहाँ से हमें तोड़-तोड़ बच्चे ले जाएँगे, जलाएँगे होली में (गाएँगे गालियाँ बजाएँगे तालियाँ) याकि हमें जोड़-जोड़ खेतिहर अनजान बेचेंगे किसी लाभकर्मी निरे ख़ुदग़र्ज़ बनिए को (बोवेंगे यह कपास, वह जूट; हाय हम में ही फूट!) बहुत कुछ जाएगा लगान कुछ जाएगी क़र्ज-क़िस्त बाक़ी रह जाएगी— झोंपड़ियों की उन भूखी अँतड़ियों के लिए सूखी एक बेर रोटी—! क्या यह नीति खोटी नहीं? गेहूँ के मोती-से दाने जो पसीने...

गिरिजाकुमार माथुर की कविताएँ : Girija Kumar Mathur Kavita

 गिरिजाकुमार माथुर (1919–1994) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और अनुवादक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के गुना ज़िले के अशोकनगर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम, प्रकृति, मानवीय अनुभव और बदलते समय की झलक मिलती है। भाषा और शिल्प के नए प्रयोग उनकी रचनाओं की खासियत रहे। उनकी प्रमुख कृतियों में नाश और निर्माण , धूप के धान , शिलापंख चमकीले और जो बंध नहीं सका शामिल हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए Girija Kumar Mathur इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए : गिरिजाकुमार माथुर इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश ले लो ये शब्द गीत भी कहीं न सो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें नेह फूल नाजुक न...

राहत इंदौरी की ग़ज़लें : Rahat Indori Ghazal Hindi

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो : राहत इंदौरी आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो ले तो आए शाइरी बाज़ार में 'राहत' मियाँ क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के : राहत इंदौरी तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के आते जाते हैं कई रंग मिरे चेहरे पर लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद ...

शकेब जलाली की नज़्में : Shakeb Jalali Nazm Hindi

मुजरिम : शकेब जलाली यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है जिस के फ़ुट-पाथ फ़क़ीरों से अटे रहते हैं ख़स्ता कपड़ों में ये लिपटे हुए मरियल ढाँचे ये भिकारी कि जिन्हें देख के घिन आती है हड्डियाँ जिस्म की निकली हुई पिचके हुए गाल मैले सर में जुएँ, आज़ा से टपकता हुआ कोढ़ रूह बीमार, बदन सुस्त, निगाहें पामाल हाथ फैलाए पड़े रहते हैं रोगी इंसान चंद बेवाओं के मदक़ूक़ से पीले चेहरे कुछ हवस-कार निगाहों में उतर जाते हैं जिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीने चंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं शिद्दत-ए-फ़ाक़ा से रोते हुए नन्हे बच्चे एक रोटी के निवाले से बहल जाते हैं या सर-ए-शाम ही सो जाते हैं भूके प्यासे माँ की सूखी हुई छाती को दबा कर मुँह में चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सर अपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिए या कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा कर चार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं क्या फ़क़त रहम की हक़दार हैं नंगी रूहें? क्यूँ ये इंसानों पे इंसान तरस खाते हैं? क्यूँ इन्हें देख के एहसास-ए-तही-दस्ती है अक्सर औक़ात मैं कतरा के निकल जाता हूँ? यही रस्ता मिरी मंज़िल की त...

शकेब जलाली की ग़ज़लें : Shakeb Jalali Ghazal Hindi

शकेब जलाली (1934–1966) आधुनिक उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनका वास्तविक नाम सैयद हसन रिज़वी था और उनका जन्म जलाली, अलीगढ़ में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी प्रमुख कृति ‘रौशनी ऐ रौशनी’ है, जो उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई। उनकी शायरी में अकेलापन, जीवन की विडंबना, स्मृति और गहरी मानवीय संवेदना के साथ आधुनिक बिंबों का अनूठा प्रयोग मिलता है। कम समय के साहित्यिक जीवन के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नया और आधुनिक लहजा दिया। ‘आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो-चार गिरे’ और ‘आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर’ उनके चर्चित कलाम में शामिल हैं। आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे : शकेब जलाली आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे जितने उस पेड़ के फल थे पस-ए-दीवार गिरे ऐसी दहशत थी फ़ज़ाओं में खुले पानी की आँख झपकी भी नहीं हाथ से पतवार गिरे मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ जिस तरह साया-ए-दीवार पे दीवार गिरे तीरगी छोड़ गए दिल में उजाले के ख़ुतूत ये सितारे मिरे घर टूट के बेकार गिरे क्या हवा हाथ में तलवार लिए फिरती थी क्यूँ मुझे ...