सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

Featured Post

धनी धरम दास के पद : Dhani Dharamdas Ji Ke Pad

परिचय धनी धरम दास (15वीं–16वीं शताब्दी) मध्यकालीन संत परंपरा के प्रमुख संत-कवि और कबीर के शिष्य माने जाते हैं। वे निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े थे और उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, आत्मज्ञान तथा बाहरी आडंबरों के विरोध की भावना प्रमुख है। उनकी रचनाओं की विशेषता सहज लोकभाषा में आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति है। ‘धर्मदास की वाणी’ को उनकी प्रमुख काव्य-परंपरा से जोड़ा जाता है और कबीरपंथी साहित्य में उनका विशेष स्थान है। धनुष बान लिये डाढ़ धनी धरमदास धनुष बान लिये डाढ़, जोगिनि एक माया हो। छिहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो॥ झिर झिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो। चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो॥ पिया पिया करत पुकार, पिया नहिं आया हो। पिया बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो॥ कागा हो तुम कारे, कियो बटवारा हो। पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूठहि हो॥ कहैं कबीर धर्मदास, गुरू संग चेला हो। हिल मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो॥ साहब मेटो चूक हमारी धनी धरमदास साहब मेटो चूक हमारी॥टेक॥ बार-बार मोहिं डंड भयो है, चूक भई अति भारी॥ अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिं निहारो। करुनामय तु...
हाल की पोस्ट

राजकमल चौधरी की कविताएँ : Rajkamal Choudhary Ki Kavita

परिचय राजकमल चौधरी (1929–1967) हिंदी और मैथिली के चर्चित कवि, कथाकार एवं उपन्यासकार थे। वे नई कविता और आधुनिकतावादी साहित्य की प्रमुख आवाज़ों में माने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘मुक्तिप्रसंग’, ‘कंकावती’ और ‘मछली मरी हुई’ विशेष रूप से चर्चित हैं। उनकी रचनाओं की विशिष्टता यथार्थवादी दृष्टि, विद्रोही तेवर, नगरीय जीवन की विडंबनाओं और मानवीय संबंधों के जटिल चित्रण में दिखाई देती है। कम आयु में निधन के बावजूद उन्होंने हिंदी और मैथिली साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और उनकी रचनाएँ आज भी आधुनिक भारतीय साहित्य के संदर्भ में पढ़ी जाती हैं। शव-यात्रा का मृत संगीत राजकमल चौधरी स्मृति में महाप्राण निराला को समर्पित समूचा नगर पेट्रोल की गंध में डूबा हुआ... आग लगती है। धड़ाके से ग्लोब फट जाता है, आग लगती है। कहीं कोई सायरन नहीं बजता... मैं पेट्रोल में आग में ग्लोब में  अपने अकेलपन में तुम्हारी मृत्यु के अपराध में, क़ैद हूँ। क़ैदख़ाने में दरवाज़ा नहीं है; दरवाज़ा इस ग्लोब में कभी नहीं था। आओ, पहले हम बहस करें कि क्यों नहीं था दरवाज़ा पहले हम तय करें कि यह क़ैदख़ाना किसने बनाया फ़...

नागार्जुन की कविताएँ : Nagarjun Ki Kavita (Hindi)

परिचय नागार्जुन (1911–1998) हिंदी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार एवं पत्रकार थे। उनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र था और वे प्रगतिशील तथा जनपक्षधर साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘अकाल और उसके बाद’, ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’ और ‘युगधारा’ शामिल हैं। उनकी कविता की विशेषता आम जनता के जीवन, सामाजिक विषमता, राजनीतिक विडंबनाओं और लोकभाषा की सहज अभिव्यक्ति है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969) और मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। वे अपनी निर्भीक, व्यंग्यात्मक और जनसरोकारों से जुड़ी रचनाशीलता के कारण ‘जनकवि’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। बादल को घिरते देखा नागार्जुन अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है, बादल को घिरते देखा है। तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी बड़ी कई झीलें हैं, उनके श्यामल नील सलिल में समतल देशों से आ-आकर पावस की ऊमस से आकुल तिक्त-मधुर बिषतंतु खोजते हंसों को तिरते देखा है। बादल को घिरते देखा ...