परिचय माधवदास दधवाड़िया राजस्थान (जन्म 1558 मारवाड़) की डिंगल काव्य-परंपरा के प्रमुख कवियों में माने जाते हैं। वे चारण कवि थे और उनकी रचनाओं में भक्ति, वीरता तथा राजस्थानी लोकजीवन की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी भाषा में डिंगल की ओजपूर्ण शैली के साथ भावों की गहराई दिखाई देती है। माधवदास की प्रमुख रचनाओं में ‘रामरासो’ और ‘गजमोख’ का विशेष उल्लेख मिलता है। ‘रामरासो’ में रामकथा को डिंगल काव्य की विशिष्ट शैली में प्रस्तुत किया गया है, जबकि ‘गजमोख’ का संबंध भक्तिपरक काव्य से है। उनकी कविता में धार्मिक आस्था के साथ वीर रस और राजस्थानी संस्कृति की छाप भी दिखाई देती है। माधवदास दधवाड़िया का साहित्य राजस्थान की मध्यकालीन चारण काव्य-परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राम जलम वरणाव रचै अवतार वैकुंठां राव,किसी तैं ऊँच नखित्र कहाव। जंनंमें राम कौसल्या जांम, भरथ जंनमें केकई भाम॥ सत्रघंन लखमंण भ्रात सदोय, सुमित्रा मात जनमें सोय। अनंत प्रथमी भार उतार, इहै चत्र विधितणौ अवतार॥ वधाई वाजा राज दुवार, चत्रविधि मंगळ मंगळाचार। वेदो धुनि विप्र भणै चत्रविधि, सुर नर नाचै नाग प्रसिधि॥ वणे ग्रह वंदरवाळ...
Shiv Kumar Batalvi शिव कुमार बटालवी (1936–1973) पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। उनकी कविताओं में प्रेम, विरह, पीड़ा, अकेलापन और जीवन-मृत्यु जैसे भाव अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त हुए हैं। उनकी रचनाओं में पंजाबी लोकजीवन और लोकभाषा की सहजता के साथ गहरी भावुकता दिखाई देती है। उनकी चर्चित कृति ‘लूणा’ एक काव्य-नाटक है, जिसके लिए उन्हें 1967 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। कम आयु में निधन के बावजूद शिव कुमार बटालवी ने आधुनिक पंजाबी कविता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। बाबा ते मरदानाबाबा ते मरदाना नित्त फिरदे देस बदेस कदे तां विच बनारस काशी करन गुनी संग भेट कच्छ मुसल्ला हत्थ विच गीता अजब फ़कीरी वेस आ आ बैठन गोशट करदे पीर, ब्राहमन, शेख ना कोयी हिन्दू ना कोयी मुसलिम करदा अजब आदेश गंगा उलटा अरघ चड़्हावे सिंजे आपने खेत हउं विच आए हउं विच मोए डरदे उस नूं वेख रब्ब नूं ना उह अलाह आखे ते ना राम महेश कहवे अजूनी कहवे अमूरत निरभाउ, आभेख जंगल नदियां चीर के बेले गांहदे थल दी रेत इक दिन पहुंचे तुरदे तुरदे काम-रूप दे देश बाग़ीं बैठा चेत वण-त्रिन सारा महकीं भर्या लैह लैह करदे खेत राज त्रिया इस नगरी विच अरध न...