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प्रेमजी प्रेम री ग़ज़ल : Premji Prem Ghazal (Rajasthani)

 प्रेमजी ‘प्रेम’ हाड़ौती अंचल के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। उनका जन्म 1943 में कोटा जिले के घघटाना गाँव में हुआ था और 1993 में उनका निधन हुआ। उन्होंने हाड़ौती बोली में कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी और अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में हाड़ौती अंचल के लोकजीवन, प्रकृति, संस्कृति और आम लोगों की संवेदनाओं की झलक मिलती है। उनकी चर्चित कृति ‘म्हारी कवितावां’ के लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।  आंगण में उग आया थापा थूर बचता रीज्यौ आंगण में उग आया थापा थूर बचता रीज्यौ बचता रीज्यौ हां-हां रोज हजूर बचता रीज्यौ आज हथेळी में रक्हाल की आज क्यूं ब्वार भायलां को चै खुल्यी कपूर बचता रीज्यौ जतना मीठा होठ कड़ा उतना बचना बरसां सूं यो कौ यो ई दस्तूर बचता रीज्यौ दुख सांसां का सरणाटां कै पास छै सुख नजर्‌यां न्हं पूगै जतनौ दूर बचता रीज्यौ बचता रीज्यो आंगण में उग आया थापाथूर, बचता रीज्यो बचता रीज्यो, हां-हां रोज हजूर, बचता रीज्यो आज हथेळी में रै क्हाल की आस कसी? बैवार भायलां को छै खुलो कपूर, बचता रीज्यो जतना मीठा होठ, कड़ी उतनी बातां ब...
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प्रेमजी प्रेम री कवितावां : Premji Prem Kavita (Rajasthani)

प्रेमजी ‘प्रेम’ हाड़ौती अंचल के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। उनका जन्म 1943 में कोटा जिले के घघटाना गाँव में हुआ था और 1993 में उनका निधन हुआ। उन्होंने हाड़ौती बोली में कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी और अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में हाड़ौती अंचल के लोकजीवन, प्रकृति, संस्कृति और आम लोगों की संवेदनाओं की झलक मिलती है। उनकी चर्चित कृति ‘म्हारी कवितावां’ के लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। Premji Prem    अछूत कठी चाल्या पटैल जी? जीमबा! दूरो हट् भट जे मत..! खम्मा, घणो खम्मा पटैल जी! हटूं छूं, पण जीं बांस की छाबड़ी मैं परोसगारी होवगी, वां भी तो म्हारा अछूत हाथां सूं ई बणी छै। आंकड़ा का फूल नीमड़ी नमोळ्यां लागीं, आंकड़ा कै फूल। म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥ चन्दरमा की जान मैं तारां की गाड्यां चाली रै, छोटी-छोटी बादळ्यां बण-बण अर लाड्यां चाली रै, ऊपर सूं आकासगंगा रही गगन मैं झूल। म्हारा मन मैं चभै, कुंआरापण को तीखो सूळ॥ कतनी बार बादळा समदर जळ भर, सरवर पै आया? कतनी बार बादळ्यां नैं अम्बर सूं आंसू ढुळकाया? ...

हनुमानबाहुक अर्थ सहित तुलसीदास जी : Hanuman Bahuk Rachna Meaning

हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध रचना है। तुलसीदास हिंदी साहित्य के महान कवि और रामभक्ति परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं। उन्होंने भगवान राम के प्रति अपनी गहरी भक्ति को अनेक रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया। ‘रामचरितमानस’, ‘विनय पत्रिका’, ‘कवितावली’ और ‘दोहावली’ उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। ‘हनुमान बाहुक’ में भगवान हनुमान की स्तुति और उनके प्रति भक्तिभाव व्यक्त किया गया है। यह रचना श्रद्धा, विश्वास और हनुमान जी की कृपा की भावना से जुड़ी हुई है। हिंदी भक्ति साहित्य में तुलसीदास का विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। हनुमानबाहुक / भाग 1 : तुलसीदास श्री गणेशाय नमः श्री जानकीवल्लभो विजयते मदगोस्वामितुलसीदासकृत हनुमानबाहुक छप्पय सिंधु-तरन, सिय सोच हरन, रबि-बालबरन-तनु। भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥ गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव। जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव॥ कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकट। गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-बिकट॥1॥ भावार्थ - जिनके शरीर का रंग उदयकाल के सूर्य के समान है, जो समुद्र लाँघकर श्री जानकीजी के शोक को हरने वाले, आजानुबाहु, ...

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविताएँ : Suryakant Tripathi Nirala Kavita

 सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1896–1961) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि और लेखक थे। वे छायावाद के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में प्रकृति, मानव जीवन, सामाजिक विषमता, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदनाओं के भाव दिखाई देते हैं। ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘सरोज स्मृति’, ‘वह तोड़ती पत्थर’ और ‘कुकुरमुत्ता’ उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में शामिल हैं। निराला ने हिंदी कविता को नई भाषा, नए भाव और स्वतंत्र अभिव्यक्ति दी। उनका साहित्य अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ था। हिंदी साहित्य में अपने मौलिक और प्रभावशाली लेखन के कारण निराला का विशेष स्थान है। Suryakant Tripathi Nirala राम की शक्ति-पूजा सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' रवि हुआ अस्त : ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर, शतशेलसंवरणशील, नीलनभ-गर्ज्जित-स्वर, प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद-कौशल-समूह,— राक्षस-विरुद्ध प्रत्यूह,—क्रुद्ध-कपि-विषम—हूह, विच्छुरितवह्नि—राजीवनयन-हत-लक्ष्य-बाण, लोहितलोचन-रावण-मदमोचन-महीयान, राघव-लाघव-रावण-वारण—गत-युग्म-प्रहर, उद...