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आचार्य भिक्षु रचनावां काव्य खंड : Aacharya Bhikshu Ke Kavya Khand

आचार्य भिक्षु परिचय जन्म–निधन 1726 – 1803 जन्म स्थान मारवाड़, राजस्थान प्रमुख पहचान तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक प्रमुख रचनाएँ भिक्षु के पद एवं धार्मिक साहित्य रचनाएँ द्रोपदी रो बखांण आचार्य भिक्षु दूहा हाहाकार हुवो घणो, अमरकंका नगरी मांय। राजधानी पड़ी भागी बिखरी, देखी नें डरप्यो राय॥ हिवे पदमनाभ राजा मन चिंतवे, हूं जीवां बचूं किण ठाम। जो शरणे जावूं द्रोपदी तणे, तो कृष्ण न ले म्हारो नाम॥ इम विचारने नीकल्यो, ओर न कोई साथ। शरणे आयो द्रोपदी तणे, ओ बोल्यो जोड़ी हाथ॥ तुझ शरणे हूं आवियो, इम बोल्यो राजान। जब द्रोपदी राजा नें कहे, ते सुणो सुरत दे कान॥ चौपाई हिवे द्रोपदी कहे सुण राय, आय वणी ताहरे जी। थे मोटो करे अन्याय, शरणे आया मांहरे जी॥ कृष्णजी तीन खंड रा नाथ, त्याने तें खिजाविया जी। थारी अकाले करवा घात, सताब सूं आविया जी॥ ओ तो शूर वीर बलवंत, प्राक्रम त्यारों अति घणो जी। त्यां कीधो वेर्‌या नो अंत, साहमा मंड्या तिण तणो जी॥ त्यानें पाछा भागण रो नेम, विरुद लियां वहे जी। जो उवे आधो काढे एम, तो मरजाद में कुण रहे जी॥ जो तूं जीवणो वांछे राजान, केई दिन ताहरो जी। तो तूं छोड़ दे निज अभिमान...
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गोपालप्रसाद व्यास – हिंदी व्यंग्य के लोकप्रिय कवि की कविताएँ : Gopal Prasad Vyas Kavita

गोपालप्रसाद व्यास – हिंदी व्यंग्य के लोकप्रिय कवि जन्म 13 फ़रवरी 1915 निधन 28 मई 2005 गोपालप्रसाद व्यास हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और लेखक थे। अपनी सरल, चुटीली और व्यंग्यपूर्ण भाषा के माध्यम से उन्होंने समाज और रोजमर्रा के जीवन की विसंगतियों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में हास्य के साथ-साथ सामाजिक चेतना और गहरी मानवीय समझ भी दिखाई देती है। हिंदी हास्य-व्यंग्य साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। आराम करो / गोपालप्रसाद व्यास एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो? इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो" हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो। आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है आराम सुधा की एक बूँद, तन का दुबलापन खोती है आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है इसलिए तुम्हें...