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बिहारिनिदेव के पद : Biharinidev Ke Pad

 बिहारिनिदेव 17वीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि माने जाते हैं। वे ब्रजभक्ति की काव्यधारा से जुड़े हुए थे। उनकी रचनाओं में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, अनुराग और भक्ति-भाव की सहज अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने कृष्ण की लीलाओं और भक्ति को पदों के माध्यम से व्यक्त किया। हिंदी के कृष्णभक्ति साहित्य में बिहारिनिदेव का नाम भक्तिकालीन कवियों की परंपरा में लिया जाता है। स्यामाजू के सरन जे सुख न सिराने बिहारिनिदेव स्यामाजू के सरन जे सुख न सिराने। तिन कौं सुख सपनैं न लिख्यौ जे फिरत विविध बौराने॥ सींचत अंड आम की आसा फूल फलै न पिछाने। दरसत परसत खात न जानत आँखि अछत अँधराने॥ बहुरो उद्यम करत निलज ह्वै इंद्र भए न अघाने। ताहू भए अनभए निर्धन निघटि गए पछिताने॥ जरत हरित गीली लकरी लौं तन मन मिलन धुँधाने। ते जानौ आतमहन पसु संसार सोक में साने॥ थोरी आयु मनोरथ लावे बिना बाहु बल ताने। 'बिहारीदास' बिन भए बौरिया बूड़े सबै अयाने॥ हरि भली करी प्रभुता न दई बिहारिनिदेव हरि भली करी प्रभुता न दई। होते पतित अजित इंद्री रत तब हम कछु सुमत्यौ न लई॥ डहकायो बहु जन्म गमायौ कर कुसंग सब बुधि बितई। मान अमा...
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बैजू संगीतकार और कवि के पद : Baiju Ke Pad

 बैजू 15 वीं शताब्दी के प्रसिद्ध संगीतज्ञ और कवि माने जाते हैं। उनका संबंध चंदेरी, मध्य प्रदेश से माना जाता है। वे मध्यकालीन भारतीय संगीत परंपरा के प्रमुख नामों में गिने जाते हैं और ध्रुपद गायन के विकास से उनका नाम जोड़ा जाता है। परंपरा में उन्हें बैजू बावरा के नाम से भी जाना जाता है। उनके जीवन से जुड़ी अनेक कथाएँ लोकप्रचलित हैं, जिनमें उनकी संगीत-साधना और गायन-कौशल का विशेष उल्लेख मिलता है। फागुन गढ़ जो बनाई सखियाँ बैजू फागुन गढ़ जो बनाई सखियाँ, गोपी ग्वालिन सब जुर मिलि आई। अबीर गुलाल की बुरज बनाई, तोप धरी जब बंब घुराई॥ गैंद कुमकुमा गोला चलत है, रंग बूँदन की झरी लगाई। कहै ‘बैजू बावरा’ सुनौ हो गोपाललाल, घेरि लियौ अब जादौं राई॥ प्यारे तू ही ब्रह्मा तू ही विष्नु बैजू प्यारे तू ही ब्रह्मा तू ही विष्नु, तू ही रुद्र तू ही सिव-सक्ति, तू ही सूर्य तू ही गनेस। जल-थल पवन-पानी तू ही, तेज तू ही आकास, तू ही अग्नि तू ही जोति तू ही सुरेस॥ तू ही ऊँच तू ही नी, तू ही है सबहिन के बीच, तू ही चंद तू ही दिनेस। तू ही एक तू ही अनेक, गुरु-चेला तू ही अलेख, ‘बेजू बावरौ’, तोहि सुमरत तोहि तैं कटत कलेस...

प्रतापबाला के पद : Pratapbala Ke Pad

प्रतापबाला (1834) जोधपुर की महारानी और कृष्णभक्त कवयित्री थीं। परिजनों की अकालमृत्यु के कारण उनके मन में संसार की नश्वरता के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ और वे कृष्ण-भक्ति में लीन हो गईं। उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को सरस पदों के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ विरह और वैराग्य के भाव भी दिखाई देते हैं। राजस्थान की कृष्णभक्ति काव्य-परंपरा में प्रतापबाला का नाम उल्लेखनीय है। मो मन परी है यह बान प्रतापबाला मो मन परी है यह बान। चतुरभुज को चरण पठिहरि ना चाहूँ कछु आन। कमल नैन विसाल सुंदर मंद मुख मुसकान॥ सुभग मुकुट सुहावनो सिर लसे कुंडल कान। प्रगट भाल विशाल राजत भौंह मनहुँ कमान॥ अंग-अंग अनंग को छबि पीत पट पहिरान। कृष्णरूप अनूप को मैं धरूँ निसि दिन ध्यान॥ सदा सुमिरूँ रूप पल-पल कला कोटि निधान। जामसुता परताप के भुज चार जीवन-प्रान॥ भजु मन नंदनंदन गिरिधारी प्रतापबाला भजु मन नंदनंदन गिरिधारी। सुख-सागर करुणा को आगर भक्तवछल बनवारी॥ मीरा करमा कुबरी सबरी तारी गौतमनारी। वेद पुरानन में जस गायो ध्याये होवत प्यारी॥ जामसुता को स्याम चतुरभुज ...

बहिणाबाई के पद : Bahinabai Ke Pad

बहिणाबाई 17वीं शताब्दी की प्रसिद्ध कृष्णभक्त कवयित्री और संत थीं। वे महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं। उनकी भक्ति में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, समर्पण और आत्मीयता का भाव प्रमुख रूप से दिखाई देता है। बहिणाबाई ने सरल और सहज भाषा में अपने भक्ति भावों को पदों और अभंगों के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी रचनाओं में सांसारिक जीवन के अनुभवों के साथ ईश्वर के प्रति गहरी आस्था और वैराग्य की भावना भी मिलती है। भक्ति साहित्य की परंपरा में उनका स्थान एक महत्वपूर्ण महिला संत-कवयित्री के रूप में माना जाता है। ये गोकुल चल हो बहिणाबाई ये गोकुल चल हो कहत मुरारी। मेघ तुसार निवारे फनिधर सेवा करे बलिहारी॥ बसुवा अपने कर दीन्हो पालख योंही कीन्हो जमुना के तट आयके देखें पूरन निरंजन॥ पूरन रूप यो देखे जमुना जानीये सबही भाव दोही ठौर भई जमुना नीर तब जानत यो हरि भाव॥ जैसा परवत वैसो नीर हवो जानी के हास पाव लागे जनु बहे जायगे सब दोस॥ जिस चरन को तीरथ शंकर माथा रखीया नीर वो चरन अब प्राप्त भये हो ये जान उधार॥ बहिनी कहे जिसकू हरि भावे, उसकू काल ही धोके बसुदेवा कर आप ही मुरीरी काहे कुं संकट आवे॥ ...

गोस्वामी हरिराय के पद : Goswami Hariray Ke Pad

 गोस्वामी हरिराय (1590–1727) वल्लभ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य, संत और कृष्णभक्त कवि माने जाते हैं। उनका संबंध गोकुल, उत्तर प्रदेश से था। वे पुष्टिमार्ग की भक्ति परंपरा के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति, सेवा और पुष्टिमार्गीय सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं में कृष्ण के प्रति गहरी श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का भाव मिलता है। वल्लभ संप्रदाय की धार्मिक और साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने में उनका विशेष योगदान माना जाता है। झूलौ पालने नंद नंदा गोस्वामी हरिराय झूलौ पालने नंद नंदा। खन-खन खन-खन चूरा बाजें, मन में अति आनंदा॥ ठुन-ठुन ठुन-ठुन घुँघरू बाजें, तनन तनन सी वंसी। नैन कटाच्छ चलावत गिरधर, मंद-मंद मुख हंसी॥ खटखट-खटखट लकुटी बाजै, चटक-चटक बाजै चुटकी। नंद महर घर सोभा निरखत, मोहन मन में अटकी॥ कुहुकुहु-कुहुकुहु कोकिल बोलें, भनन-भनन बोलें भौंरा। पी-पी-पी-पी पपैया बोलें, संगीते सुर दौरा॥ झूझू-झूझू झुनझुन बाजैं, फिरक-फिरक फिरै फिरकी। गुडगुड-गुडगुड गुडकी बाजै, प्रेम मगन मन निरखी॥ ढो-ढो ढो-ढो ढोलक बाजै, गुनन-गुनन...

सरहपा के पद : Sarhapa Ke Pad

सरहपा (सरहपाद) 8वीं शताब्दी के प्रमुख वज्रयानी सिद्ध और सहजिया परंपरा के आरंभिक कवियों में माने जाते हैं। उनका संबंध नालंदा, बिहार से माना जाता है। वे बौद्ध सिद्ध परंपरा के उन संत कवियों में थे, जिन्होंने बाहरी आडंबर और कर्मकांड के बजाय सहज साधना, आत्मबोध और गुरु के महत्व पर जोर दिया। उनकी रचनाएँ अपभ्रंश और प्राचीन लोकभाषा के निकट भाषा में मिलती हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की आरंभिक काव्यधारा के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके पदों में सहज जीवन, साधना और रूढ़ धार्मिक मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य दिखाई देता है। जहि मण पवण ण संचरइ जहि मण पवण ण संचरइ, रवि−ससि णाहिं पवेस॥ तहि बढ चित्त विसाम करु, सरहें कहिअ उएस॥ एक्क करु मा वेण्णि करुख मा करु विण्णि विसेस। एक्कें रंगे रञ्जआ, तिहुअण सअलासेस॥ आइ ण अंत ण मज्झ तहिंख णउ भव णउ णिव्वाण। एहु सो परममहासुह, णउ पर णउ अप्पाण॥ अरे बढ़ सहज गइ पर रज्जह अरे बढ़ सहज गइ पर रज्जह। मा भव−गंध−बंध पहिबज्जह॥ एहु निअ मण सबल चातर स चल। मेलहिं सहाव ट्ठाअ वसइ दोस−णिम्मल॥ जब्बें मण अत्थमणु जाइ, तणु तुट्टइ बंधण। तब्बें सम रसहि मज्झे, णउ सुद्द ण बाम्ह...