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मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 4 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 4

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

भारत-भारती / वर्तमान खंड / रईसों के सपूत

जब याद आती है बड़ों के उन सपूतों की कथा,
उनके सखा, संगी, विदुषक और दूतों की कथा।
तब निकल पड़ते हैं हृदय से वचन ऐसे दुख भरे—
होवें न ऐसे पुत्र चाहे हो कुल-क्षय हे हरे!
यों तो सभी का बीतता है बाल्यकाल विनोद में,
वे किंतु सोते-जागते रहते सदा हैं गोद में।
इस भाँति पल कर प्यार में जब वे सपूत बड़े हुए,
उत्पात उनके साथ ही घर में अनेक खड़े हुए!
श्रीमान शिक्षा दे उन्हें तो श्रीमती कहती वहीं—
“घेरो न लल्ला को हमारे, नौकरी करनी नहीं!”
शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी;
लो मूर्खते! जीती रहो, रक्षक तुम्हारे हैं धनी॥
तीतर, लवे, मेंढ़े, पतंगे वे लड़ाते हैं कभी,
वे दूसरों के व्यर्थ झगड़े मोल लाते हैं कभी।
दस, बीस उनके दुर्व्यसन हों तो गिने भी जा सकें,
पथ या विपथ है कौन ऐसा वे न जिस पर आ सकें!
निकले कि फिर दस पाँच चिड़ियाँ मार लाना है उन्हें,
बंदूक ले, वन-जंतुओं पर बल दिखाना है उन्हें।
घातक! तुम्हारी तो सहज ही शाम को यह सैर है,
पर उन अभागों से कहो, किस जन्म का यह बैर है?
आया जहाँ यौवन उन्हें बस भूत मानों चढ़ गया,
जीवन सफल करणार्थ अब उनमें अपव्यय बढ़ गया!
सौंदर्य के शशि-लोक में सब ओर उनके चर उड़े,
गुंडे, 'पसीने की जगह लहू' बहाने को जुड़े॥
संगीत के मर्मज्ञ उनसे आज वे ही दीखते,
हैं आप भी उनमें बहुत गाना-बजाना सीखते।
यदि रंडियों के साथ वे ठेका लगाते हैं कभी—
तो क्या हुआ? अपनी प्रिया पर प्रेम रखते हैं सभी!
रहती उन्हीं के ठाठ की है धूम मेलों में सदा,
आगे मिलेंगे वे थियेटर और खेलों में सदा।
वे नाच-मुजरे और जलसे हैं उन्हीं से लग रहे,
हैं यार लोगों के उन्हीं से भाग्य जग में जग रहे॥
यों कुछ दिनों घर फूँक कौतुक देख कर नंगे हुए।
फिर क्या हुआ? 'सरकार' थे जो दीन भिखमंगे हुए,
हँसने लगा संसार उनको यार छोड़ गए सभी,
लुच्चे लफंगे भी किसी के मीत होते हैं कभी?
आशा भविष्यत् की हमारी क्या इन्हीं पर लग रही?
क्या पुन्नरक से अंत में हमको उबारेंगे यही?
बेड़ा इन्हीं से पार होगा क्या स्वदेश-समाज का?
होगा सु-दृढ़ फिर राज्य किसके हाथ से कलिराज का?

भारत-भारती / अतीत खंड / आत्माभिमान

निश्चय यवन राजत्व में ही हम पतित थे हो चुके, बल और वैभव आदि अपना थे सभी कुछ खो चुके। पर यह दिखाने का कि भारत पूर्व में ऐसा न था, आत्मावलंबी भी हुए कुछ लोग हममें सर्वथा॥ महाराणा प्रतापसिंह राजा प्रताप-समान तब भी शूरवीर यहाँ हुए, स्वाधीनता के भक्त ऐसे श्रेष्ठ और कहाँ हुए? सुख मान कर बरसों भयंकर सर्व दुःखों को सहा, पर व्रत न छोड़ा, शाह की बस तुर्क ही मुख से कहा॥ जौहर चित्तौर चंपक ही रहा यद्यपि यवन अलि हो गए, धर्मार्थ हल्दीघाट में कितने सुभट बलि हो गए! कुल-मान जब तक प्राण तब तक, यह नहीं तो वह नहीं, मेवाड़ भर में वक्तृताएँ गूँजती ऐसी रहीं॥ विख्यात वे जौहर यहाँ के आज भी हैं लोक में, हम मग्न हैं उन पद्मिनी-सी देवियों के शोक में! आर्य स्त्रियाँ निज धर्म पर मरती हुई डरती नहीं, साद्यन्त सर्व सतीत्व-शिक्षा विश्व में मिलती यहीं॥ शिवाजी फिर भी दिखाई देश में जिसने महाराष्ट्रच्छटा— दुर्दांत आलमगीर का भी गर्व जिससे था घटा। उस छत्रपति शिवराज का है नाम ही लेना अलम्, है सिंह-परिचय के लिए बस 'सिंह' कह लेना अलम्॥

भारत-भारती / अतीत खंड / विकास में ह्रास

पर ठीक वैसा ही हमारा यह प्रसिद्ध विकास है—
जैसा कि बुझने के प्रथम बढ़ता प्रदीप-प्रकाश है।
हो बौद्ध लक्ष्य-भ्रष्ट सहसा घोर नास्तिक ही रहे,
सँभले न फिर हम आर्य भी, इस भाँति विषयों में बहे!॥
यद्यपि सनातन धर्म्म की ही अंत में जय-जय रही,
भगवान शंकर ने भगा दी बौद्ध-भ्रांति भयावही।
पर हाय! हम चेते नहीं फँस कर कलह के जाल में,
क्या फूट की जड़ फैलती है फूट कर पाताल में!
बढ़ने लगा विग्रह परस्पर, क्रांतियाँ होने लगीं,
अनुदारता मय स्वार्थ के वश भ्रांतियाँ होने लगीं।
जिसमें हुआ कुछ बल वही अधिकार पर मरने लगा,
सौभाग्य भय खाकर भगा दुर्भाग्य जय पाकर जगा॥
बहु तुच्छ रजवाड़े बने, साम्राज्य सब कट छँट गया;
यों भूरि भागों में हमारा दीन भारत बँट गया!
जो एक अनुपम रत्न था परिणत कणों में हो गया,
वह मूल्य और प्रकाश सारा टूटते ही खो गया॥
आचार और विचार तक ही यह विभेद बढ़ा नहीं,
बहु भिन्न भाषाएँ हुई, फैली विषमता सब कहीं।
आलाप करना भी परस्पर क्लेश हमको हो गया,
निज देश में ही हा विधे! परदेश हमको हो गया॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / प्राचीन चिह्न

प्राचीनता के चिह्न भी क्या अब तुम्हारे रह गए?
खँडहर खड़े हैं कुछ सही, पर आज वे भी हैं नए।
सुनते यही हैं हाय! हम जा पहुँचते हैं जब वहाँ,
कोई हमें वे मत कहो, देखो न, अब हम वे कहाँ!”
उन मंदिरों के ढोर ऊँचे, आद्रि-रूप,उजाड़ हैं;
हाँ पूर्वजों की बैठकों पर दीखते अब झाड़ हैं,
वे झाड़ मर्मर-मिस पवन में भर रहे ये शब्द हैं—
“जो थे यहाँ उनको हुए बीते अनेकों अब्द हैं॥
जिन श्रेष्ठ सौधों में सुगायक श्रुति-सुधा थे घोलते,
निशि-मध्य टोलों पर उन्हीं के आज उल्लू बोलते!
सोते रहो हे हिंदुओं! हम मौज करते हैं यहाँ”,
प्राचीन चिह्न विनष्ट यां किस जाति के होंगे कहाँ?
श्रुति, शास्त्र और पुराण का होता जहाँ प्रिय-पाठ था,
सुंदर, सुखद, शुचि सत्त्व गुण का एक अद्भुत ठाठ था।
जंबुक अचानक अब वहाँ की शांति करते भंग हैं,
आकाश के बहु रंग-जैसे भूमि के भी ढंग हैं॥
आमोद बरसाती जहाँ थी यज्ञ-धूममयी घटा,
यश-तुल्य जिस आमोद की थी स्वर्ग में छाई छटा।
अब प्लेग जैसी व्याधियों की है वहाँ फली हवा,
चलती नहीं जिस पर धुरंधर डाक्टरों की भी दवा!

भारत-भारती / अतीत खंड / महाभारत

क्या देर लगती है बिगड़ते, जब बिगड़ने पर हुए?
फिर क्या परमशत्रु बंधु ही तैयार बनने पर हुए।
आखिर महाभारत-समर का साज सज ही तो गया,
डंका हमारे नाश का बेरोक बज ही तो गया!
हाँ सोचनीय, परंतु, ऐसा कलह भी होगा नहीं,
तू ही बता हे काल! ऐसा हाल देखा है कहीं?
हा! बंधुओं के ही करों से बंधु कितने कट मरे,
यह भव्य भारत अंत में बन ही गया मरघट हरे!
इस सर्वनाशी युद्ध का वह दृश्य कैसा घोर था,
उस ओर था यदि पुत्र तो लड़ता पिता इस ओर था!
संतान ही के रक्त में यह मातृभूमि सनी यहाँ,
उस स्वर्ग की-सी वाटिका की हाय! राख बनी यहाँ॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / स्त्रियाँ

होगी यहाँ तक कर्कशा क्या लेखनी! तू परवशा—
गृहदेवियों की जो हमारी लिख सके तू दुर्दशा?
किस भाँति देखोगे यहाँ, दर्शक! दृगों को मींच लो,
यह दृश्य है क्या देखने का, दृष्टि अपनी खींच लो॥
अनुकूल आद्याशक्ति को सुखदायिनी जो स्फूर्ति है,
सद्धर्म की जो मूर्ति और पवित्रता की पूर्ति है।
नर-जाति की जननी तथा शुभ शांति की स्त्रोतस्वती,
हा देव! नारी-जाति की कैसी यहाँ हैं दुर्गति!
होती रहीं गार्गी अनेकों और मैत्रेयी जहाँ,
अब है अविद्या-मूर्ति-सी कुल-नारियाँ होती वहाँ!
क्या दोष उनका किंतु जो उनमें गुणों की है कमीं?
हा! क्या करें वे जब कि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं॥
बी.ए. गृहस्वामी विदित किंतु क्या है स्वामिनी?
कैसे कहें, हा! हैं अशिक्षारूपिणी वे भामिनी!
अत्युक्ति क्या, दिन-रात का-सा भेद जो इसको कहें;
दांपत्य-भाव भला हमारे धाम में कैसे रहें?
बहु कुशलता-सूचक कथाएँ जानती थीं जो कभी,
अब कलह-कुशला है हमारी गृहणियाँ प्राय: सभी।
हा! बन रहे हैं गृह हमारे विप्रहस्थल-से यहाँ,
दो नारियाँ भी हैं जहाँ वाग्बाण बरसेंगे वहाँ!
रखतीं यही गुण वे कि गंदे गीत गाना जानतीं,
कुल, शील, लज्जा उस समय कुछ भी नहीं वे मानतीं!
हँसते हुए हम भी अहो! वे गीत सुनते सब कहीं,
रोदन करो हे भाइयो! यह बात हँसने की नहीं!
है ध्यान पति से भी अधिक आभूषणों का अब उन्हें,
तब तुष्ट हों तो हों कि मढ़ दो मंडनों से जब उन्हें।
है यह उचित ही, क्योंकि जब ज्ञान से हैं दूषिता—
क्या फिर भला आभूषणों से भी न हों वे भूषिता?
अत्यल्प भी अपराध पर डंडे उन्हें हम मारते,
पर हेतु उनकी मूर्खता का सोचते न विचारते।
हैं हाय! दोषी तो स्वयं देते उन्हें हम दंड हैं,
आश्चर्य क्या फिर पा रहे जो दुःख आज अखंड हैं॥
ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे।
भागे न क्यों हमसे भला फिर दूर सारी सिद्धियाँ,
पातीं स्त्रियाँ आदर जहाँ रहती वहीं सब ऋद्धियाँ॥
हम डूबते हैं आप तो अघ के अँधेरे कूप में—
है किंतु रखना चाहते उनकी सती के रूप में;
निज दक्षिणाङ्ग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं,
वामांग में चंदन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त हैं!
क्या कर नहीं सकतीं भला यदि शिक्षिता हों नारियाँ?
रण-रंग, राज्य, सु-धर्म-रक्षा, कर चुकीं सुकुमारियाँ।
लक्ष्मी, अहल्या, बायजाबाई, भवानी पद्मिनी—
ऐसी अनेकों देवियाँ हैं आज जा सकती गिनी॥
सोचो, नरों से नारियाँ किस बात में हैं कम हुई?
मध्यस्थ वे शास्त्रार्थ में हैं भारतीय के सम हुई।
हैं धन्य थेरी-तुल्य गाथा-कवित्रियाँ वे सर्वथा,
कवि हो चुकी हैं विज्जका, विजया, मधुरवाणी यथा॥
निज नारियों के साथ यदि कर्तव्य अपना पालते,
अज्ञान के गहरे गढ़े में जो न उनको डालते,
तो आज नर यों मूर्ख होकर पतित क्यों होते यहाँ?
होती जहाँ जैसी स्त्रियाँ वैसे पुरुष होते वहाँ॥
पाले हुए पशु-पक्षियों का ध्यान तो रखते सभी,
पर नारियों की दुर्दशा क्या देखते हैं हम कभी?
हमने स्वयं पशु-वृत्ति का साधन बना डाला उन्हें,
संतान-जनने मात्र को वसनान्न दे पाला उन्हें॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / ब्राह्मण

उन अग्रजन्मा ब्राह्मणों की हीनता तो देख लो,
भू-देव थे जो आज उनकी दीनता तो देख लो।
थे ब्रह्म-मूर्ति यथार्थ जो अब मुग्ध जड़ता पर हुए,
जो पीर थे देखो, वही भिश्ती, बावर्ची, खर हुए!
वह वेद का पढ़ना-पढ़ाना अब न उनमें दीखता,
वह यज्ञ का करना-कराना कौन उनमें सीखता?
बस पेट को ही आज उनमें दान देना रह गया,
है कर्म उनमें एक ही अब दान लेना रह गया!
कुछ 'शीघ्र-बोध' रटा कि फिर वे गणक-पुंगव बन गए,
पंचांग पकड़ा और बस सर्वज्ञता में सन गए!
संकल्प तक भी शुद्ध वे साद्यंत कह सकते नहीं,
वे पखरवाए पाद-पंकज किंतु रह सकते नहीं॥
संदेह है, जप के समय क्या मंत्र जपते मौन वे,
हैं 'ॐ नमः' वा 'हा! निमंत्रण' पाठ करते कौन वे!
निश्चय नहीं दृग बंद कर वे लीन हैं भगवान में—
या दक्षिणा की मंजु मुद्रा देखते हैं ध्यान में!
जिन ब्राह्मणों ने लोभ को संतत तिरस्कृत था किया,
देखा, उन्हीं के वंशजों को आज उसने ग्रस लिया।
अब आप उनकी दक्षिणा पहले नियत कर दीजिए—
फिर निंद्य से भी निंद्य उनसे काम करवा लीजिए!
आचार उनका आज केवल रह गया 'असनान' में,
जप, तप तथा वह तेज अब है शेष बाह्य-विधान में!
वे भ्रष्ट यद्यपि हो रहे हैं डूब कर अज्ञान में,
जाते मरे हैं किंतु फिर भी वंश के अभिमान में!
था हाय! जिनके पूर्वजों ने धन्य धरणीतल किया,
इस लोक की, परलोक की, प्रश्नावली को हल किया।
सर्वत्र देखो, आज वे कैसे तिरस्कृत हो रहे,
खोकर तपोबल, ज्ञान-धन, जीते हुए मृत हो रहे॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी दशा

पर हाय! अब भी तो नहीं निद्रा हमारी टूटती,
कैसी कुटेवें हैं कि जो भी नहीं हैं छूटती।
बेसुध अभी तक हैं, न जाने कौन ऐसा रस पिया?
देखा बहुत कुछ किंतु हमने सब बिना देखा किया!
हैं घट गए संप्रति हमारे चरित ऐसे सर्वथा,
कवि-कल्पना-सी जान पड़ती पूर्वजों की वह कथा!
आश्चर्य क्या जो फिर हमें वह युक्ति-युक्त जँचे नहीं,
छोटे दिलों में भी बड़ी बातें समा सकती कहीं?
गायक मदन शिशु जो कहीं होता पुरातन काल में,
होते कहीं ये भीमकर्मा राममूर्ति न हाल में,
लेते न संप्रति जन्म जो वे आधुनिक अर्जुन कई,
इनकी कथा भी कल्पना की दौड़ कहलाती नई॥
सारे जगत में जब परा-विद्या प्रमुखता पाएगी—
उत्पत्ति भारत में तथा उसकी बताई जाएगी।
तब भी कदाचित् मुँह बना कर कह उठेंगे हम यही—
क्यों जी, हमारे पूर्वजों की यह कथा क्या है सही॥
संसार रूप शरीर में जो प्राण रूप प्रसिद्ध था,
सब सिद्धियों में जो कभी संपूर्णता से सिद्ध था।
हा हंत! जोते जो वही अब हो रहा म्रियमाण है,
अब लोक-रूप-मयंक में भारत कलंक-समान है!
हा देव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ?
हैं काल की घातों कि कल की आज हैं बातें कहाँ?
क्या थे तथा अब क्या हुआ हम, जानता बस काल है;
भगवान जाने, काल की कैसी निराली चाल है॥

भारत-भारती / अतीत खंड / विचार

वह भद्र भारत सर्वदा भू-लोक-नेता सिद्ध है,
संसार में सब से अधिक स्वाधीनचेता सिद्ध है।
उन्मादिनी माया स्वयं उसको भुला पाती नहीं,
पुनरागमन की बंधता भी है उसे भाती नहीं॥
है लक्ष्य केवल मुक्ति ही उसके अतुल उद्देश्य का,
है दास भी तो वह उसी बैकुण्ठपति विश्वेश का।
साक्षी स्वयं इस बात के उसके वही सुविचार हैं-
संसार के साहित्य के जो सार हैं, आधार हैं॥

मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 3 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 3

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

भारत-भारती / अतीत खंड / प्राचीन भारत की एक झलक

समयावरण से पार करके ऐतिहासिक दृष्टि को, जो देखते हैं आज भी हम पूर्णकालिक सृष्टि को। तो दीखता है दृश्य ऐसा भारतीय-विकास का, प्रतिबिंब एक सजीव है जो स्वर्ग या आकाश का॥ भारतभूमि ब्राह्मो-स्वरूपा, जन्मदात्री, ज्ञान-गौरव-शालिनी, प्रत्यक्ष लक्ष्मीरूपिणी, धन-धान्य-पूर्णा, पालिनी। दुर्द्धर्ष रुद्राणो स्वरूपा शत्रु सृष्टि-लयंकरी, वह भूमि भारतवर्ष की है भूरि भावों से भरी॥ वे ही नगर, वन, शैल, नदियाँ जो कि पहले थीं यहाँ, है आज भी, पर आज वैसी जान पड़ती हैं कहाँ? कारण कदाचित है यही, बदले स्वयं हम आज हैं, अनुरूप ही अपनी दशा के दीखते सब साज हैं॥ भवन चित्रित घनों से होड़ कर जो व्योम में फहरा रहे, वे केतु उन्नत मंदिरों के किस तरह लहरा रहे! इन मंदिरों में से अधिक अब भूमि-तल में दब गए, अवशिष्ट ऐसे दीखते हैं-अब गए या तब गए! जल-वायु पीयूष सम पीकर जिसे होता प्रसन्न शरीर है, आलस्य-नाशक, बल-विकाशक उस समय का नीर है। है आज भी वह, किंतु अब पड़ता न पूर्व प्रभाव है, यह कौन जाने नीर बदला या शरीर स्वभाव है? उत्साहपूर्वक दे रहा जो स्वास्थ्य वा दीर्घायु है, कैसे कहें, कैसा मनोरम उस समय का वायु है। भगवान जानें, आज कल वह वायु चलता ही नहीं, अथवा हमारे पास होकर वह निकलता ही नहीं? प्रभात क्या ही पुनीत प्रभात है, कैसी चमकती है मही; अनुरागिणी ऊषा सभी को कर्म में रत कर रही। यद्यपि जगाती है हमें भी देर तक प्रतिदिन वही, पर हम अविध निद्रा-निकट सुनते कहाँ उसकी कही? गंगादि नदियों के किनारे भीड़ छवि पाने लगी, मिल कर जल ध्वनि में गल ध्वनि अमृत बरसाने लगी। सरवर इधर श्रुति-मंत्र लहरी, उधर जल-लहरी अहा! तिस पर उमंगों की तरंगें, स्वर्ग में अब क्या रहा॥ दान सुस्नान के पीछे यथाक्रम दान की बारी हुई, सर्वस्व तक के त्याग की सानंद तैयारी हुई! दानी बहुत हैं किंतु याचक अल्प हैं उस काल में, ऐसा नहीं जैसी कि अब प्रतिकूलता है हाल में॥ दिनकर द्विजों से अर्ध्य पाकर उठ चला आकाश में, अति शोभित हो उठी स्वर्ण-वर्ण-प्रकाश में। वह आंतरिक आलोक इस आलोक में ही मिल गया, रवि का मुकुट धारण किया, स्वाधीन भारत खिल गया॥ गोपालन जो अन्य धात्री के सदृश सबको पिलाती दुग्ध है, (है जो अमृत इस लोक का, जिस पर अमर भी मुग्ध हैं।) वे धेनुएँ प्रत्येक ग्रह में हैं दुही जाने लगीं, या शक्ति की नदियाँ वहाँ सर्वत्र लहराने लगीं॥ घृत आदि के आधिक्य से बल-वीर्य्य का सु-विकास है, क्या आजकल का-सा कहीं भी व्याधियों का वास है? है उस समय गो-वंश पलता, इस समय मरता वही! क्या एक हो सकती कभी यह और वह भारत मही॥ होमाग्नि निर्मल पवन जिसकी शिखा को तनिक चंचल कर उठी, होमाग्नि जल कर द्विज-गृहों में पुण्य-परिमल भर उठी। प्राची दिशा के साथ भारतभूमि जगमग जग उठी, आलस्य में उत्साह की-सी आग देखो, लग उठी॥ देवालय नर-नारियों का मंदिरों में आगमन होने लगा, दर्शन, श्रवण, कीर्तन, मनन से मग्न मन होने लगा। ले ईश-चरणामृत मुदित राजा-प्रजा अति चाव से, कर्त्तव्य, दृढ़ता की विधा बनने लगी सम भाव से॥ श्रद्धा सहित किस भाँति हरि का पुण्य पूजन हो रहा, वर वेद-मंत्रों में मनोहर कीर्ति-कूजन हो रहा। अखिलेश की उस आर्तिहरिणी आरती को देख लो, असमर्थ, मूक-समान, मुखरा भारती को देख लो॥ अतिथि सत्कार अपने अतिथियों से वचन जाकर गृहस्थों ने कहे- सम्मान्य! आप यहाँ निशा में कुशलपूर्वक तो रहे? हमसे हुई हो चूक जो कृपया क्षमा कर दीजिए- अनुचित न हो तो, आज भी, यह गेह पावन कीजिए”॥ पुरुष पुरुष-प्रवर उस काल के कैसे सदाशय हैं अहा! संसार को उनका सुयश कैसा समुज्वल कर रहा! तन में अलौकिक कांति है, मन में महा सुख-शांति है; देखो न, उनको देख कर होती सुरों की भ्रांति है!!! मस्तिष्क उनका ज्ञान का विज्ञान का भांडार है, है सूक्ष्म बुद्धि-विचार उनका, विपुल बल-विस्तार है। नव नव कलाओं का कभी लोकार्थ आविष्कार है, अध्यात्म तत्वों का कभी उद्धार और प्रचार है॥ स्त्रियाँ पूजन किया पति का स्त्रियों ने, भक्ति-पूर्ण विधान से, आँचल पसार, प्रणाम कर, फिर की विनय भगवान से विश्वेश! हम अबला जनों के बल तुम्हीं हो सर्वदा, पतिदेव में मति, गति तथा दृढ़ ही हमारी रति सदा”॥ हैं प्रीति और पवित्रता की मूर्ति-सी वे नारियाँ, हैं गेह में वे शक्तिरूपा, देह में सुकुमारियाँ, गृहिणी तथा मंत्री स्वपति की, शिक्षिता हैं वे सती, ऐसी नहीं हैं वे कि जैसी आजकल की श्रीमती॥ घर का हिसाब-किताब सारा है उन्हीं के हाथ में, व्यवहार उनके हैं दयामय सब किसी के साथ में। वे पाक-शास्त्र-विशारदा हैं और वैद्यक-जानतीं, सबको सदा संतुष्ट रखना धर्म्म अपना मानतीं॥ आलस्य में अवकाश को वे व्यर्थ ही खोती नहीं, दिन क्या, निशा में भी कभी पति से प्रथम सोती नहीं। सीना, पिरोना, चित्रकारी जानती हैं वे सभी- संगीत भी, पर गीत गंदे वे नहीं गातीं कभी॥ संसार-यात्रा में स्वपति की वे अटल अश्रान्ति हैं, हैं दुःख में वे धीरता, सुख में सदा वे शांति हैं। शुभ सांत्वना हैं शोक में वे और ओषधि रोग में, संयोग में संपत्ति हैं, बस है विपत्ति वियोग में॥ संतान जब हैं स्त्रियाँ यों देवियाँ, संतान क्यों उत्तम न हो? उन बालकों के सरल, सुंदर भाव तो देखो, अहो! ऊषाऽगमन से जाग वे भी ईशगुण गाने लगे- या कंज फूले देख बंदी भृंग उड़ जाने लगे! हैं हृष्ट-पुष्ट शरीर से, माँ-बाप के वे प्राण हैं- जो सर्वदा करते दृगों की भाँति उनका बाण हैं। वे जायँ जब तक गुरुकुलों में, ज्ञान का घर है जहाँ- तब तक उन्हें कुछ-कुछ पढ़ाती आप माताएँ यहाँ॥ है ठीक पुत्रों के सदृश ही पुत्रियों का मान भी, क्या आज की-सी है दशा, जो हो न उनका ध्यान भी! हैं उस समय के जन न अब से जो उन्हें समझ बला! होंगे न दोनों नेत्र किसको एक से प्यारे भला? देखो, अहा वे पुत्रियाँ हैं या विभव की वृद्धियाँ, अवतीर्ण मानों हैं हुई प्रत्यक्ष उनके ऋद्धियाँ। हा! अब उन्हीं के जन्म से हम डूबते हैं शोक में, पर हो न उनका जन्म तो हों पुत्र कैसे लोक में? तपोवन मृग और सिंह तपोवनों में साथ हो फिरने लगे, शुचि होम-धूम उठे कि सुंदर सुरभि-घन घिरने लगे! ऋषि-मुनि मुदित मन से यथा-विधि हवन क्या करने लगे- उपकार मूलक पुण्य के भांडार से भरने लगे॥ वे सौम्य ऋषि, मुनि आजकल के साधुओं जैसे नहीं; कोई विषय जिनसे छिपा हो विज्ञ वे ऐसे नहीं। हस्तामलक-जैसे उन्हें प्रत्यक्ष तीनों काल हैं, शिवरूप हैं, तोड़े उन्होंने बंधनों के जाल हैं॥ वे ग्रंथ जो सर्वत्र ही गुरु मान से मंडित हुए- पढ़ कर जिन्हें संसार के तत्त्वज्ञजन पंडित हुए। जो आज भी थोड़े बहुत हैं नष्ट होने से बचे, हैं वे उन्हीं तप के धनी ऋषि और मुनियों के रचे॥ कुशपाणि पाकर भी उन्हें डरता स्वयं वज्री सदा, हैं तुच्छ उनके निकट यद्यपि उस सुरप की संपदा। यद्यपि उटजवासी तदपि वह तत्त्व उनके पास है, आकर अलेक्जेंडर-सदृश सम्राट बनता दास है! गुरुकुल विद्यार्थियों ने जागकर गुरुदेव का वंदन किया, निज नित्यकृत्य समाप्त करके अध्ययन में मन दिया। जिस ब्रह्मचर्य-व्रत बिना है आज हम सब रो रहे- उसके सहित वे धीर होकर वीर भी हैं हो रहे॥ पाठ आधार आर्यों के अटल जातीय-जीवन-प्राण का- है पाठ कैसा हो रहा श्रुति, शास्त्र और पुराण का। हे राम! हिंदू जाति का सब कुछ भले ही नष्ट हो, पर यह सरस संगीत उसका फिर यहाँ सु-स्पष्ट हो॥ फ़ीस पढ़ते सहस्रों शिष्य हैं पर फ़ीस ली जाती नहीं, वह उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर बेच दी जाती नहीं। दे वस्त्र भोजन भी स्वयं कुलपति पढ़ाते हैं उन्हें, बस, भक्ति से संतुष्ट हो दिन-दिन बढ़ाते हैं उन्हें॥ भिक्षा वे ब्रह्मचारी जिस समय, गुरुदेव के आदेश से, पहुँचे नहीं भिक्षार्थ पुर में, बालरूप महेश-से। ले सात्त्विकी भिक्षा, प्रथम ही, गृहिणियाँ हर्षित बड़ीं- करने लगीं उनकी प्रतीक्षा, द्वार पर हो कर खड़ीं॥ है आज कल की भाँति वह भिक्षा नहीं अपमान की, है प्रार्थनीय गृही जनों को यह व्यवस्था दान की। वे ब्रह्मचारी भिक्षुवर ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं- भूपाल भी, पथ छोड़ कर, उन पर दिखाते भक्ति हैं॥ राजा देखा, महीपति उस समय के हैं प्रजा-पालक सभी, रहते हुए उनके किसी को कष्ट हो सकता कभी? किस भाँति पावें कर, न यदि वे न्याय से शासन करें, जो वे अनीति करें कहीं तो वेन की गति से मरें॥ अनिवार्यशिक्षा हैं खोजने से भी कहीं द्विज मूर्ख मिल सकते नहीं, अनिवार्य शिक्षा के नियम हैं जो कि हिल सकते नहीं। यदि गाँव में द्विज एक भी विद्या न विधिपूर्वक पढ़े- तो दंड दे उसको नृपति, फिर क्यों न यों शिक्षा बढ़े॥ है नित्य विप्रों के यहाँ बस, ज्ञान-चर्चा दीखती, शुक-सारिकाएँ भी जहाँ शास्त्रार्थ करना सीखती। कोई जगत को सत्य, कोई स्वप्न मात्र बता रहा, कोई शकुनि उनमें वहाँ मध्यस्थ भाव जता रहा॥ चारित्र्य देखो कि सबके साथ सबका निष्कपट बर्ताव है, सबमें परस्पर दीख पड़ता प्रेम का सद्भाव है। कैसे फले-फूल भला वे जो न हिल मिल कर रहे? वे आर्य ही क्या, यदि कभी परिवाद निज मुख से कहें॥ ठग और चोर कहीं नहीं हैं धर्म का अति ध्यान है, देखे न देखे और कोइ, देखता भगवान है। सूना पड़ा हो माल कोई किंतु जा सकता नहीं कोई प्रलोभन शांत मन को है भुला सकता नहीं॥ यदि झूठ कहने पर किसी का टिक रहा सर्वस्व भी, तो भी कहेगा सत्य ही वह क्यों कि मरना है कभी। पंचायतों में समय पर, दृष्टांत ऐसे दीखते, हैं धर्म का सब पाठ मानों गर्भ में ही सीखते॥ हैं भाव सबके आननों पर ईश्वरीय प्रसाद के, इस लोक में उनके हृदय आधार है प्रह्लाद के। मरते नहीं वह मौत वे जो फिर उन्हें मरना पड़े, करते नहीं वह काम उनको नाम जो धरना पड़े॥ बस, विश्वपति में नित्य सबकी वृत्तियाँ हैं लग रहीं, अन्तःकरण में ज्ञानमणि की ज्योतियाँ हैं जग रहीं। कर्तव्य का ही ध्यान उनको है सदा व्यवहार में, वे 'पद्मपत्रमिवाम्भसा' रहते सुखी संसार में॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / धर्म की दशा

था धर्म-प्राण प्रसिद्ध भारत, बन रहा अब भी वही;
पर प्राण के बदले गले में आज धार्मिकता रही!
धर्मोपदेश सभा भवन की भित्ति में टकरा रहा,
आडंबरों को देख कर आकाश भी चकरा रहा!
बस कागज़ी घुड़दौड़ में है आज इति कर्तव्यता,
भीतर मलिनता हो भले ही किंतु बाहर भव्यता।
धनवान ही धाम्मिक बने यद्यपि अधर्मासक्त हैं,
है लाख में दो चार सुहृदय शेष बगुला भक्त हैं॥
अनुकूल जो अपने हुए वेही यहाँ सद्ग्रंथ हैं;
जितने पुरुष अब हैं यहाँ उतने समझ लो पंथ हैं।
यों फूट की जड़ जम गई, अज्ञान आकर अड़ गया,
हो छिन्न-भिन्न समाज सारा दीन-दुर्बल पड़ गया॥
श्रुति क्यों न हो, प्रतिकूल हैं जो स्थल वही प्रक्षिप्त हैं,
विक्षिप्त से हम दंभ में आपाद-मस्तक लिप्त हैं!
आक्षेप करना दूसरों पर धर्मनिष्ठा है यहाँ,
पाखंडियों ही की अधिकतर अब प्रतिष्ठा है यहाँ!
हम आड़ लेकर धर्म की अब लीन हैं विद्रोह में,
मत ही हमारा धर्म है, हम पड़ रहे हैं मोह में!
है धर्म बस निःस्वार्थता ही, प्रेम जिसका मूल है;
भूले हुए हैं हम इसे, कैसी हमारी भूल है?
जिसके लिए संसार अपना सर्वकाल ऋणी रहा,
उस धर्म की भी दुर्दशा हमने उठा रखी न हा!
जो धर्म सुख का हेतु है, भव-सिंधु का जो सेतु है,
देखो, उसे हमने बनाया अब कलह का केतु है!!
उद्देश है बस एक, यद्यपि पथ अनेक प्रमाण हैं,
रुचि-भिन्नता किए गए जो ज्ञान से निर्माण हैं।
पर अब पथों को ही यहाँ पर धर्म हैं हम मानते!
करके परस्पर घोर निंदा व्यर्थ ही हठ ठानते॥
प्रभु एक किंतु असंख्य उसके नाम और चरित्र हैं,
तुम शैव, हम वैष्णव, इसी से हा अभाग्य! अमित्र हैं।
तुम ईश को निर्गुण समझते, हम सगुण भी जानते,
हा! अब इसी से हम परस्पर शत्रुता हैं मानते!
हिंदू सनातन धर्म के ऐसे पवित्र विधान हैं,
संसार में सबके लिए जो मान्य एक समान हैं।
धृति, शांति, शौच, दया, क्षमा, शम, दम, अहिंसा, सत्यता;
पर हाय! इनमें से किसी का आज हममें है पता?
विख्यात हिंदू-धर्म ही सच्चा सनातन धर्म है,
वह धर्म ही धारण क्रिया का नित्य कर्ता-कर्म है।
परमार्थ की-संसार की भी सिद्धि का वह धाम है,
पर वाद और विवाद में ही आज उसका नाम है!

भारत-भारती / वर्तमान खंड / तीर्थ और तीर्थ-पंडे

आरंभ से ही जो हमारे मुख्य धर्म-क्षेत्र हैं—
अब देख कर उनकी दशा आँसू बहाते नेत्र हैं।
हा! गूढ़ तत्त्वों का पता ऋषि-मुनि लगाते थे जहाँ—
सबसे अधिक अविचार का विस्तार है संप्रति वहाँ!
वे तीर्थ जो प्रभु की प्रभा से पूर्ण ही पूजित हुए—
राजर्षि-युत ब्रह्मर्षियों के कंठ से कूजित हुए,
अब तीर्थ-गुरु ही हैं अधिक उनको कलंकित कर रहे,
हा! स्वर्ग के सु-स्थान में हम नरक अंकित कर रहे!
वे तीर्थ-पंडे हैं जिन्होंने स्वर्ग का ठेका लिया;
है निंद्य कर्म न एक ऐसा हो न जो उनका किया!
वे हैं विद्या के पुरोहित, प्रविधि के आचार्य हैं,
लड़ना-झगड़ना और अड़ना मुख्य उनके कार्य हैं॥
वे आप तो हैं ही पतित, कामी, कुपथगामी बड़े—
पर पाप के भागी हमें भी हैं बनाने को खड़े।
हम-भस्म में घृत के सदृश देते उन्हें जो दान हैं—
बस वे उसी से दुर्व्यसन के जोड़ते सामान हैं॥

भारत-भारती / अतीत खंड / आदर्श

आदर्श-जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए?
सत्कार्य्य-भूषण आर्य्य-गण जितने यहाँ पर हैं हुए।
हैं रह गए यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे,
पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे॥
गौतम, वशिष्ठ-समान मुनिवर ज्ञान-दायक थे यहाँ,
मनु, याज्ञवल्क्य-समान सत्तम विधि-विधायक थे यहाँ।
वाल्मीकि वेदव्यास से गुण-गान गायक थे यहाँ,
पृथु, पुरु, भरत, रघु-से अलौकिक लोकनायक थे यहाँ॥
लक्ष्मी नहीं, सर्वस्व जाने, सत्य छोड़ेंगे नहीं;
अंधे बनें पर सत्य से संबंध तोड़ेंगे नहीं।
निज सुत-मरण स्वीकार है पर वचन की रक्षा रहे,
है कौन जो उन पूर्वजों के शील की सीमा कहे?॥
सर्वस्व करके दान जो चालीस दिन भूखे रहे,
अतिथि सत्कार में फिर भी न जो रूखे रहे।
पर-तृप्ति कर निजतृप्ति मानी रन्तिदेव नरेश ने,
ऐसे अतिथि संतोष-कर पैदा किए इस देश ने॥
आमिष दिया अपना जिन्होंने श्येन-भक्षण के लिए,
जो बिक गए चाण्डाल के घर सत्य-रक्षण के लिए!
दे दीं जिन्होंने अस्थियाँ परमार्थ हित जानी जहाँ,
शिवि, हरिश्चंद्र, दधीच से होते रहे दानी यहाँ॥
सत्पुत्र पुरु से थे जिन्होंने तात-हित सब कुछ सहा,
भाई भरत-से थे जिन्होंने राज्य भी त्यागा अहा!
जो धीरता के, वीरता के प्रौढ़तम पालक हुए,
प्रह्लाद, ध्रुव, कुश, लव तथा अभिमन्यु-सम बालक हुए॥
वह भीष्म का इन्द्रिय दमन, उनकी धरा-सी धीरता,
वह शील उनका और उनकी वीरता, गंभीरता।
उनकी सरलता और उनकी वह विशाल विवेकता,
है एक जन के अनुकरण में सब गुणों की एकता॥
वर वीरता में भी सरसता वास करती थी यहाँ,
पर साथ ही वह आत्म-संयम था यहाँ का-सा कहाँ?
आकर करे रति-याचना जो उर्वशी-सी भामिनी,
फिर कौन ऐसा है, कह जो मत कहो यों कामिनी”॥
यदि भूल कर अनुचित किसी ने काम कर डाला कभी,
तो वह स्वयं नृप के निकट दण्डार्थ जाता था तभी।
अब भी 'लिखित मुनि' का चरित वह लिखित है इतिहास में,
अनुपम सुजनता सिद्ध है जिसके अमल आभास में॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / साहित्य

उस सांप्रतिक साहित्य पर भी ध्यान देना चाहिए, उसकी अवस्था भी हमें कुछ जान लेना चाहिए। मृत हो कि जीवित, जाति का साहित्य जीवन-चित्र है, वह भ्रष्ट है तो सिद्ध फिर वह जाति भी अपवित्र है॥ जिस जाति का साहित्य था स्वर्गीय भावों से भरा— करने लगा अब बस विषय के विष-विटप को वह हरा! श्रुति, शास्त्र, सूत्र पुराण, रामायण, महाभारत हटे, वे नायिकाभेदादि उनके स्थान में हैं आ डटे!! हम तो हुए ही पतित पर दुर्भाव जो भरते गए— सुकुमार भावी सृष्टि को भी वे पतित करते गए! हा! उच्च भावों को वही क्रम आज भी है खो रहा, अश्लील ग्रंथों से हमारा शील चौपट हो रहा! अब सिद्ध हिंदी ही यहाँ की राष्ट्र-भाषा हो रही, पर है वही सबसे अधिक साहित्य के हित रो रही! रीते पड़े अब तक अहो! उसके अखिल भांडार हैं, तुलसी तथा सूरादि के कुछ रत्न ही आधार हैं!! कविता उद्देश कविता का प्रमुख शृंगार रस ही हो गया, उन्मत्त होकर मन हमारा अब उसी में खो गया! कवि-कर्म कामुकता बढ़ाना रह गया देखो जहाँ, वह वीर रस भी समर-समर में हो गया परिणत यहाँ॥ सोचो, हमारे अर्थ है यह बात कैसे शोक की— श्रीकृष्ण की हम आड़ लेकर हानि करते लोक की। भगवान को साक्षी बना कर यह अनंगोपासना! है धन्य ऐसे कविवरों को, धन्य उनकी वासना!! उपन्यास है और औपन्यासिकों का एक नूतन दल यहाँ, फैला रहा है जो निरंतर और भी हलचल यहाँ! दौरात्म्य ही अब लोक-रुचि पर हो रहा है सब कहीं, हो स्वार्थ! तेरी जय, अरे, तू क्या करा सकता नहीं? वे रुचि-विघातक ग्रंथ ज्यों ही सैर करने की छुए, स्वीया हुईं कुलटा बहुत, अनुकूल बहुधा शठ हुए! ये भाव हम गिरते हुओं पर और पत्थर-से गिरे, दब कर हृदय जिनसे हमारे हो गए जर्जर निरे!! जो उपन्यास यहाँ सुशिक्षाप्रद कह कर बिक रहे, उनमें अधिक अविचार की ही नींव पर हैं टिक रहे। उनके कु-पात्रों में नरक की आग ऐसी जागती, अपनी सुरुचि भी पाठकों की दूर जिससे भागती! साद्यंत उनमें असंभवता घन-घटा सी छा रही, दुर्भाव की दुर्गंधि उनसे अंत तक है आ रही। आई कहानी भी न कहनी और हम इतना बके, 'जीवन प्रभात' न 'चंद्रशेखर' एक भी हम लिख सके! लिक्खाड़ ऐसे ही यहाँ साहित्य-रत्न कहा रहे, वे वीर वैतरणी नदी का हैं प्रवाह बहा रहे। वे हैं नरक के दूत किंवा सूत हैं कलिराज के! वे मित्ररूपी शत्रु ही हैं देश और समाज के॥ क्या मुँह दिखावेंगे भला परलोक में वे ही कहें? जो कुछ नहीं आता उन्हें तो मौन ही फिर वे रहें! पर मौन वे कैसे रहें, निरुपाय क्या भूखों मरें? मर जाए क्यों न समाज सारा, पाकिटें उनकी भरें!! पत्र हैं पत्र भी प्रायः परस्पर द्वेष-भाव न छोड़ते, दलबंदियाँ करते हुए जी के फफोले फोड़ते। बीड़ा लिए जो देश-हित का पथ हमें दिखला रहे— हठ, पक्षपात तथा हमें कुत्सा वही सिखला रहे!

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारे पूर्वज

उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,
गाते नहीं उनके हमीं गुण, गा रहा संसार है।
वे धर्म्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
उनसे वही गंभीर थे, वर वीर थे, ध्रुव धीर थे॥
उनके अलौकिक दर्शनों से दूर होता पाप था,
अति पुण्य मिलता था तथा मिटता हृदय का ताप था।
उपदेश उनके शांतिकारक थे निवारक शोक के,
सब लोक उनका भक्त था, वे थे हितैषी लोक के॥
लखते थे अघ की ओर थे वे, अघ न लखता था उन्हें;
वे धर्म्म को रखते सदा थे, धर्म्म रखता था उन्हें।
वे कर्म्म से हो कर्म्म का थे नाश करना जानते,
करते वही थे वे जिसे कर्तव्य थे वे मानते॥
वे सजग रहते थे सदा दुख-पूर्ण तृष्णा-भ्रांति से,
जीवन बिताते थे सदा संतोष-पूर्वक शांति से।
इस लोक में उस लोक से वे सुख पाते न थे,
हँसते हुए आते न थे, रोते हुए जाते न थे॥
जिनकी पूर्व सुगंधि से इन्द्रिय मधुपगण थे हिले,
सद्भाव-सरजित वर जहाँ पर नित्य रहते थे खिले।
लहरें उठाने में जहाँ व्यवहार-मारुत लग्न था,
उन्मत्त आत्मा-हंस उनके मानसों में मग्न था॥
ये ईश-नियमों को कभी अवहेलना करते न थे,
सन्मार्ग में चलते हुए वे विघ्न से डरते न थे।
अपने लिए वे दूसरों का हित कभी हरते न थे,
चिंता-अपूर्ण, अशांतिपूर्वक वे कभी मरते न थे॥
वे मोह-बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे, स्वाधीन थे;
संपूर्ण सुख-संयुक्त थे, वे शांति-शिखरासीन थे।
मन से, वचन से, कर्म्म से वे प्रभु-भजन में लीन थे,
विख्यात ब्रह्मानंद-नद के वे मनोहर मीन थे॥
उनके चतुर्दिक-कीर्ति-पट को है असंभव नापना,
की दूर देशों में उन्होंने उपनिवेश स्थापना।
पहुँचे जहाँ वे अज्ञता का द्वार जाने रुक गया,
वे झुक गए जिस ओर को संसार मानों झुक गया॥
वर्णन उन्होंने जिस विषय का है किया, पूरा किया;
मानों प्रकृति ने ही स्वयं साहित्य उनका रच दिया।
चाहे समय को गति कभी अनुकूल उनके हो नहीं,
हैं किंतु निश्चल एक से सिद्धांत उनके सब कहीं॥
वे मेदिनी तल में सुकृत के बीज बोते थे सदा,
परदुःख देख दयालुता से द्रवित होते थे सदा।
वे सत्त्वगुण-शुभ्रांशु से तम-ताप खोते थे सदा,
निश्चिन्त विन-विहान सुख की नींद सोते थे सदा॥
वे आर्य्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते न थे;
वे स्वार्थ-रत ही मोह की मदिरा कभी पीते न थे।
संसार के उपकार-हित जब जन्म लेते थे सभी,
निश्चेष्ट होकर किस तरह से बैठ सकते थे कभी?॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी विद्या-बुद्धि

पांडित्य का इस देश में सब ओर पूर्ण विकास था,
बस, दुर्गुणों के ग्रहण में ही अज्ञता का वास था।
सब लोग तत्त्व-ज्ञान में संलग्न रहते थे यहाँ-
हाँ व्याध भी वेदांत के सिद्धांत कहते थे यहाँ!
जिसकी प्रभा के सामने रवि तेज भी फीका पड़ा,
अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा!
मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले,
मानों सभी जन ईश की ज्योति-छटा में थे मिले॥
समझा प्रथम किसने जगत में गूढ़ सृष्टि-महत्त्व को?
जाना कहो किसने प्रथम जीवन-मरण के तत्त्व को?
आभास ईश्वर जीव का कैवल्य तक किसने दिया?
सुनलो, प्रतिध्वनि हो रही, यह कार्य्य आर्यों ने किया॥
हम वेद, वाकोवाक्य-विद्या, ब्रह्मविद्या-विज्ञ थे,
नक्षत्र-विद्या, क्षत्र-विद्या, भूत-विद्याऽभिज्ञ थे।
निधि, नीति-विद्या, राशि-विद्या, पित्र्य-विद्या में बढ़े,
सर्पादि-विद्या, देव-विद्या, दैव-विद्या थे पढ़े॥
आए नहीं थे स्वप्न में भी जो किसी के ध्यान में,
वे प्रश्न पहले हल हुए थे एक हिंदुस्तान में?
सिद्धांत मानव जाति के जो विश्व में वितरित हुए,
बस, भारतीय तपोवनों में थे प्रथम निश्चित हुए॥
थे योग-बल से वश हमारे नित्य पाँचों तत्त्व भी,
मर्त्यत्व में वह शक्ति थी रखता न जो अमरत्व भी।
संसार-पथ में वह हमारी गति कहीं रुकती न थी,
विस्तृत हमारी आयु वह चिरकाल तक चुकती न थी॥
जो श्रम उठा कर यत्न से की जाय खोज जहाँ-तहाँ,
विश्वास है, तो आज भी योगी मिलें ऐसे यहाँ
जो शून्य में संस्थित रहें, भोजन बिना न कभी मरे;
अविचल समाधिस्थित रहें, द्रुत देह परिवर्तित करें॥
हाँ, वह मनःसाक्षित्व-विद्या की विलक्षण साधना;
वह मेस्मरेजिमर की महत्ता, प्रेत-चक्राराधना।
कारक और भी वे आधुनिक बहु वृद्धियाँ,
कहना वृथा है, है हमारे योग की लघु सिद्धियाँ॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारा साहित्य

साहित्य का विस्तार अब भी है हमारा कम नहीं;
प्राचीन किंतु नवीनता में अन्य उसके सम नहीं।
इस क्षेत्र से ही विश्व के साहित्य-उपवन हैं बने,
इसको उजाड़ा काल ने आघात कर यद्यपि घने॥
फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में,
जागी यहीं थी जग रही जो ज्योति अब संसार में।
इंजील और कुरान आदिक थे न तब संसार में-
हमको मिला था दिव्य वैदिक बोध जब संसार में॥
जिनकी महत्ता का न कोई पा सका है भेद हो,
संसार में प्राचीन सब से हैं हमारे वेद ही।
प्रभु ने दिया यह ज्ञान हमको सृष्टि के आरंभ में,
है मूल चित्र पवित्रता का सभ्यता के स्तंभ में॥
विख्यात चारों वेद मानों चार सुख के सार हैं,
चारों दिशाओं के हमारे वे जय-ध्वज चार हैं
वे ज्ञान-गरिमाऽगार हैं, विज्ञान के भांडार है;
वे पुण्य-पारावार हैं, आचार के आधार हैं॥
जो मृत्यु के उपरांत भी सबके लिए शांति प्रदा-
है उपनिषद्विद्या हमारी एक अनुपम संपदा।
इस लोक को परलोक से करती वही एकत्र है,
हम क्या कहें, उसकी प्रतिष्ठा हो रही सर्वत्र है॥
उन सूत्र-ग्रंथों का अहा! कैसा अपूर्ण महत्त्व है,
अत्यल्प शब्दों में वहाँ संपूर्ण शिक्षा-तत्त्व है।
उन ऋषि-गणों ने सूक्ष्मता से काम कितना है लिया,
आश्चर्य है, घट में उन्होंने सिंधु को है भर दिया॥
उस दिव्यदर्शन-शास्त्र में है कौन हमसे अग्रणी?
यूनान, यूरुप, अरब आदि हैं हमारे ही ऋणी।
पाए प्रथम जिनसे जगत ने दार्शनिक संवाद हैं-
गौतम, कपिल, जैमिन, पतंजलि, व्यास और करणाद हैं॥
दृष्टांत दर्शन ही हमारी उच्चता के हैं बड़े,
हैं कह रहे सबसे वही संसार में होकर खड़े-
“हे विश्व! भारत के विषय में फिर कुशंकाएँ करो-
हम दर्शनों का साम्य पहले आज भी आगे धरो॥
यह क्या हुआ कि अभी तो रो रहे थे ताप से,
हैं, और अब हँसने लगे वे आप अपने आप से।
ऐं क्या कहा, निज चेतना पर आ गई उनकी हँसी,
गीता-श्रवण के पूर्व थी जो मोह-माया में फँसी॥
रचते कहीं मन्वादि ऋषि वे धर्मशास्त्र न जो यहाँ,
कानून ताजीरात जैसे आज वे बनते कहाँ?
उन संहिताओं के विमल वे विधि-निषेध विधान हैं-
या लोक में, परलोक में, वे शांति के सोपान हैं॥
निज नीति-विद्या का हमें रहता यहाँ तक गर्व था-
हम आप जिस पथ पर चले सत्पथ वही है सर्वथा।
सामान्य नीति समेत ऐसे राजनैतिक ग्रंथ हैं-
संसार के हित जो प्रथम पुण्याचरण के पंथ हैं
चाणक्य से नीतिज्ञ थे हम और निश्चल निश्चयी,
जिनके विपक्षी राजकुल की भी इतिश्री हो गई।
है विष्णुशर्मा ने घड़े में सिंधु सचमुच भर दिया-
कहकर कहानी ही जड़ों को पूर्ण पंडित कर दिया!॥
वृत्तांत पहले व्योम का प्रकटित हमीं ने था किया,
वह क्रांति मंडल था हमीं से अन्य देशों ने लिया।
थे आर्य्यभट,आचार्य भास्कर-तुल्य ज्योतिर्विद यहाँ,
अब भी हमारे 'मान मंदिर' वर्णनीय नहीं कहाँ?॥
जिस अंक-विद्या के विषय में वाद का मुँह बंद है,
वह भी यहाँ के ज्ञान-रवि की रश्मि एक अमंद है।
डर कर कठोर कलंक से, वा सत्य के आतंक से-
कहते अरब वाले अभी तक 'हिंदसा' ही अंक से॥
उन 'सुल्व-सूत्रों' के जगत में जन्मदाता है हमीं,
रेखागणित के आदि ज्ञाता या विधाता हैं हमीं।
हमको हमारी वेदियाँ पहले इसे दिखला चुकीं-
निज रम्य-रचना-हेतु वे रेखागणित सिखला चुकीं॥
आकार देख प्रकार थे हम जान जाते आप ही,
वे शास्त्र 'सामुद्रिक' सरीखे थे बनाते आप ही।
विज्ञान से भी 'फलित ज्योतिष' हो रहा अब सिद्ध है,
यद्यपि अविज्ञों से हुआ वह निंद्य और निषिद्ध है॥
प्राचीन हो जो है न, जिससे अन्य भाषाएँ बनीं;
भाषा हमारी देववाणी श्रुति-सुधा से है सनी।
है कौन भाषा यों अमर व्युत्पत्ति रूपी प्राण से?
हैं अन्य-भाषा-शव उसके सामने म्रियमाण से॥
निकला जहाँ से आधुनिक वह भिन्न भाषा तत्त्व है,
रखती न भाषा एक भी संस्कृत-समान महत्त्व है।
पाणिनि-सदृश वैयाकरण संसार भर में कौन है?
इस प्रश्न का सर्वत्र उत्तर उत्तरोत्तर मौन है॥
उस वैद्यविद्या के विषय में अधिक कहना व्यर्थ है,
सुश्रुत, चरक रहते हुए संदेह रहना व्यर्थ है।
अनुवादकतो आज भी उपहार उनके पा रहे,
हैं आर्य्य आयुर्वेद के सब देश सद्गुण गा रहे॥
थे हार जात अन्य देशी वैद्यवर जिस रोग से-
हम भस्म करते थे उसे बस भस्म के ही योग से।
थे दूर देशों के नृपति हमको बुलाकर मानते,
इतिहास साक्षी है, हमें सब थे जगद्गुरु जानते॥
है आज कल की डाक्टरी जिससे महामहिमा मयी,
वह 'आसुरी' नामक चिकित्सा है यहीं से ली गई।
नाड़ी-नियम-युत रोग के निश्चित निदान हुए यहाँ,
सब औषधों के गुण समझकर रस-विधान हुए यहाँ॥
कविवर्य्य शेक्सपियर तथा होमर सदा सम्मान्य हैं,
विख्यात फिरदौसी-सदृश कवि और भी अन्यान्य हैं।
पर कौन उनमें मनुज-मन को मुग्ध इतना कर सके,
वाल्मीकि, वेदव्यास, कालीदास जितना कर सके॥
संसार भर के ग्रंथ-गिरि पर चित्त से पहले चढ़ो,
उपरांत रामायण तथा गीता-प्रथित भारत पढ़ो।
कोई बतादो फिर हमें, ध्वनि सुन पड़ी ऐसी कहाँ?
हे हरि! सुनें केवल यही ध्वनि अंत में हम हों जहाँ॥
यद्यपि अतुल अगणित हमारे/ग्रंथ-रत्न नए नए,
बहु बार अत्याचारियों से नष्ट-भ्रष्ट किए गए।
पर हाय! आज रहीं सहीं भी पोथियाँ यों कह रहीं-
क्या तुम वही हो! आज तो पहचान तक पड़ते नहीं॥

भारत-भारती / अतीत खंड / महत्ता

जो पूर्व में हमको अशिक्षित या असभ्य बता रहे,
वे लोग या तो अज्ञ हैं या पक्षपात जता रहे।
यदि हम अशिक्षित थे, कहें तो सभ्य वे कैसे हुए?
वे आप ऐसे भी नहीं थे आज हम जैसे हुए॥
ज्यों-ज्यों प्रचुर प्राचीनता की खोज बढ़ती जाएगी,
त्यों-त्यों हमारी उच्चता पर ओप चढ़ती जाएगी।
जिस ओर देखेंगे हमारे चिह्न दर्शक पाएँगे;
हमको गया बतलाएँगे, जब जो जहाँ तक जाएँगे॥
पाए हमीं से तो प्रथम सबने अखिल उपदेश हैं,
हमने उजड़ कर भी बसाए दूसरे बहु देश हैं।
यद्यपि महाभारत-समर था मरण भारत के लिए,
यूनान-जैसे देश फिर भी सभ्य हमने कर दिए॥
हमने बिगड़ कर भी बनाए जन्म के बिगड़े हुए;
मरते हुए भी हैं जगाए मृतक-तुल्य पड़े हुए।
गिरते हुए भी दूसरों को हम चढ़ाते ही रहे,
घटते हुए भी दूसरों को हम बढ़ाते ही रहे॥
कल जो हमारी सभ्यता पर थे हँसे अज्ञान से-
वे आज लज्जित हो रहे हैं अधिक अनुसंधान से।
जो आज प्रेमी हैं हमारे भक्त कल होंगे वही,
जो आज व्यर्थ विरक्त हैं अनुरक्त कल होंगे यही॥
सब देश विद्याप्राप्ति को सन्तत यहाँ आते रहे,
सुरलोक में भी गीत ऐसे देव-गण गाते रहे-
हैं धन्य भारतवर्ष-वासी, धन्य भारतवर्ष है;
सुरलोक से भी सर्वथा उसका अधिक उत्कर्ष है”॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारा उद्भव

शुभ शांति-मय शोभा जहाँ भव बंधनों को खोलती,
हिल मिल मृगों से खेल करती सिंहिनी थी डोलती।
स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ,
उन ऋषि गणों से ही हमारा था हुआ उद्भव यहाँ॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / व्यापार

इस रत्नगर्भा भूमि पर हा दैव ऐसी दीनता,
है शोच्य कृषि से कम नहीं व्यापार की भी हीनता।
जिस देश के वाणिज्य की सर्वत्र धूम मची रही—
क्या पर मुखापेक्षी नहीं है आज पद-पद पर वही?
अब रख नहीं सकते स्वयं हम लाज भी अपनी अहो!
रखते विदेशी वस्त्र उसको, सभ्य हैं हम, क्यों न हो!
करती अपेक्षा अपनी पूर्ण जो जितनी जहाँ—
वह जाति उतनी ही समुन्नति प्राप्त करती है वहाँ॥
जो वस्तु देखो,'मेडइन' इँगलैंड, इटली, जर्मनी,
जापान, फ्रांस, अमेरिका वा अन्य देशों की बनी।
होकर सजीव मनुष्य हम निर्जीव से हैं हो रहे,
घर में लगा कर आग अपने बेखबर हैं सो रहे!
कुल-नारियाँ जिनको हमारी हैं करों में धारतीं—
सौभाग्य का शुभ-चिह्न जिनको हैं सदैव विचारतीं।
वे चूड़ियाँ तक हैं विदेशी देख लो, बस हो चुका;
भारत स्वकीय सुहाग भी परकीय करके खो चुका!
वे तुच्छ सुइयाँ भी विदेशी जो न हमको मिल सकें—
तो फिर पहनने के हमारे वस्त्र भी क्या सिल सकें?
माचिस विदेशी जो न लें तो हम अँधेरे में रहें,
हैं क्षुद्र छड़ियों तक विदेशी और आगे क्या कहें?
केवल विदेशी वस्तु ही क्यों, अब स्वदेशी है कहाँ?
वह वेष-भूषा और भाषा, सब विदेशी है यहाँ!
गुण मात्र छोड़ विदेशियों के हम उन्हीं में सन गए,
कैसी नकल की,वाह! हम नक्काल पूरे बन गए!
गर्दभ बना था सिंह उसकी खाल को पाकर कभी,
पर सिंह के से गुण कहाँ? हँसने लगे उसको सभी।
इस माँति के नरपुंगवों को क्या यहाँ बढ़ती नहीं?
पर हाय! काले भाल पर लाली कभी चढ़ती नहीं॥
संप्रति स्वदेशी की हमें है गंध भी भाती नहीं,
खस, केवड़ा, बेला, चमेली चित्त में आती नहीं।
मस्तक न 'लेवेंडर' बिना अब मस्त होता है अहो!
बस शौक़ पूरा हो हमारा, देश ऊजड़ क्यों न हो!
सब स्वाभिमान डुबा चुके जो पूर्व-पारावार में—
आश्चर्य है, हम आज भी हैं जी रहे संसार में;
किंवा इसे जीना कहें तो फिर कहें मरना किसे?
जीता कहाँ है वह नहीं है ध्यान कुछ अपना जिसे!
आती विदेशों से यहाँ सब वस्तुएँ व्यवहार की,
धन-धान्य जाता है यहाँ से, यह दशा व्यापार की!
कैसे न फैले दीनता, कैसे न हम भूखों मरे?
ऐसी दशा में देश की भगवान ही रक्षा करें॥
जिस वस्तु को हम दूसरों को बेचते हैं 'एक' में,
लेते उसी को 'बीस' में हैं डूब कर अविवेक में!
जो देश कच्चा माल ही उत्पन्न करके शांत है,
उसका पतन एकांत है, सिद्धांत यह निर्भ्रान्त है॥
रालीब्रदर इत्यादि को हम बेचते जो माल हैं,
लेते वही पंद्रह गुने तक मूल्य में तत्काल हैं!
आता विलायत से यहाँ वह माल नाना रूप में,
आश्चर्य क्या फिर हम पड़े हैं जो अँधेरे कूप में॥
हम दूसरों को पाँच सौ की बेचते हैं जब रुई,
सानंद कहते हैं कि हमको आय क्या अच्छी हुई।
पर दूसरे कहते कि ठहरो, वस्त्र जब हम लाएँगे—
तब और पैंतालीस सौ लेकर तुम्हीं से जाएँगे॥
हा! आप आगे दौड़ कर हम दीनता को ले रहे,
लेकर खिलौने काँच आदिक अन्न-धन हैं दे रहे!
आवश्यकीय पदार्थ अपने यदि बनाते हम यहीं,
जो हानि होकर ये हमारी दुर्दशा होती नहीं॥
लेकर विदेशी टीन हम सानंद चाँदी दे रहे,
देकर तथा सोना निरंतर है गिलट हम ले रहे।
हम काँच लेकर दूसरों को दे रहे हीरे खरे,
निज रक्त के बदले महोदक ले रहे हैं हा हरे!
क्या इस पुरातन देश में था समय ऐसा भी कभी—
अपनी प्रयोजन-पूर्ति जय करते स्वयं थे हम सभी?
हाँ, यह न होता तो कभी का नाश हो जाता यहाँ,
इसका अभी तक चिह्न भी क्या दृष्टि में आता यहाँ॥
जो दिव्य दर्शन शास्त्र की विख्यात है जन्मस्थली,
पहले जहाँ पर अंकुरित हो सभ्यता फूली-फली।
संगीत, कविता, शिल्प की जननी वही भारत मही,
होगी किसे स्पर्धा कहे जो पर मुखापेक्षी रही!
इतिहास में इस देश की वाणिज्य वृद्धि प्रसिद्ध है,
अन्यान्य देशों से वहाँ संबंध इसका सिद्ध है।
बन कर यहाँ हर वस्तुएँ सर्वत्र ही जाती रहीं,
नर-रचित कहलाती न थीं, सुर-रचितर कहलाती रहीं॥
हिंदू-कला-कौशल्य पर संसार मुग्ध बना रहा,
जग में बिना संकोच सबने अद्वितीय उसे कहा।
'हारूँ रशीद' तथा प्रतापी 'शार्लमेंगन' की सभा,
है हो चुकी विस्मित निरख कर भारतीय-पट-प्रभा॥
सब वस्तुएँ उपहार के ही योग्य बनती थीं यहाँ,
संसार में होती उन्हीं की माँग थी देखो जहाँ।
तब तो अतुल वैभव रहा, त्रुटि थी न कोई आय में;
सच है कि रमती है रमा वाणिज्य में, व्यवसाय में॥
है आज कश्मीरे विदेशी नाम पर जिनके चले,
बनते दुशाले हाय! थे काश्मीर में कैसे भले!
है विदित बंगाली किनारी धोतियों की आज भी,
पर है विदेशी आज वह, आती न हमको लाज भी!
ढाके,चँदेरी आदि की कारीगरी अब है कहाँ?
हा! आज हिंदू-नारियों की कुशलता सब है कहाँ?
थी वह कला या क्या, कि ऐसी सूक्ष्म थी, अनमोल थी,
सौ हाथ लंबे सूत की बस आध रत्ती तोल थी॥
रखा नली में बाँस को जो थान कपड़े का नया,
आश्चर्य अंबारी सहित हाथी उसी से ढक गया।
ये वस्त्र कितने सूक्ष्म थे, कर लो कई जिनकी तहें—
शहज़ादियों के अंग फिर भी झलकते जिनमें रहें!
थे मुग्ध वस्त्रों पर हमारे अन्य देशी सर्वथा,
यूरोप के ही साहबों को हम सुनाते हैं कथा।
वे लोग वस्त्रों को यहाँ के थे सदैव सराहते,
निज देश के पट मुफ़्त में भी थे न लेना चाहते॥
जिस भाँति भारतवर्ष का व्यापार नष्ट किया गया,
कर से तथा प्रतिरोध से जिस भाँति भ्रष्ट किया गया।
वर्णन वृथा है उस विषय का, सोचना अब है यही—
किस भाँति उसकी वृद्धि हो, जैसे कि पहले थी रही॥
यदि हम विदेशी माल से मुँह मोड़ सकते हैं नहीं—
तो हाय! उसका मोह भी क्या छोड़ सकते हैं नहीं?
क्या बंधुओं के हित तनिक भी त्याग कर सकते नहीं?
निज देश पर क्या अल्प भी अनुराग कर सकते नहीं?

भारत-भारती / अतीत खंड / मुसलमानों का प्रवेश

देखो न होगी ऐक्य की ऐसी किसी ने छिन्नता, बढ़ कर महा मत भिन्नता फैली भयंकर खिन्नता। आखिर अहले इसलाम दल को हम बुला कर ही रहे, स्वातन्त्र्य को, मानों सदा को, हम सुला कर ही रहे॥ जयचंद और पृथ्वीराज क्या थे यवन, पाते न प्रश्रय यदि अधम जयचंद्र से? जयशील पृथ्वीराज हारे अंत में छल-छंद से। हा! देश का दीपक बुझा, भीषण अँधेरा छा गया; निज कर्म्म के फल-भोग का वह काल आगे आ गया॥ क्या पा लिया जयचंद ने निज देश का हित हार के? है कह रहे कन्नौज के वे सौध-धुस्स पुकार के— जर्जर हुए भी आज तक हम इसलिए हैं जी रहे, अब भी सजग हो जाएँ वे विद्वेष-विष जो पी रहे॥

रण-निमंत्रण

कौरव तथा पांडव परस्पर विजय की आशा किए,
होने लगे जब प्रकट प्रस्तुत युद्ध करने के लिए।
उस समय निज-निज पक्ष के राजा बुलाने को वहाँ,
भेजे गए युग पक्ष से ही दक्ष दूत जहाँ-तहाँ॥
फिर शीघ्र ही श्रीकृष्ण को निज ओर करने युद्ध में,
देने उन्हें रण का निमंत्रण निज-विपक्ष-विरुद्ध में।
लेने तथा साहाय्य उनसे और सर्व-प्रकार का,
दैवात् सुयोधन और अर्जुन संग पहुँचे द्वारका॥
उस समय सुंदर सेज ऊपर सो रहे भगवान थे,
गंभीर नीरव शांत सुस्थिर सिंधुसम छविमान थे।
ओढ़े मनोहर पीतपट अति भव्य रूप निधान थे,
प्रत्यूष-आतप-सहित शुचि यमुना-सलिल-उपमान थे॥
मुकुलित विलोचन युग्म उनके इस प्रकार ललाम थे,
भीतर मधुप मूँदे हुए ज्यों सुप्त सरसिजल श्याम थे।
कच-गुच्छ मुखमंडल सहित यों सोहते अभिराम थे,
घेरे हुए ज्यों सूर्य को घन सघन शोभा धाम थे॥
नीलारविंद समान तनु की अति मनोहर कांति से,
शुचि हार-मुक्ता दीखते थे नीलमणि ज्यों भ्रांति से।
थे चिह्न कंधों में विविध यों कुंडलों के सोहते,
मन्मथ-लिखित मानो वशीकर मंत्र थे मन मोहते॥
नि:श्वास नैसर्गिक सुरभि यों फैल उनकी थी रही,
ज्यों सुकृति-कीर्ति गुणी जनों की फैलती है लहलही।
सुकपोल करतल पर ललित यों दर्शनीय विशेष था,
मृदु-नवल-पल्लव-सेज पर ज्यों पड़ा नक्षत्रेश था॥
शय्या-वसन-संघर्ष से जो हो रहे अति क्षीण थे,
उन अंगरागों से रुचिर यों अंग उनके पीन थे।
ज्यों शरद ऋतु में धवल घन के विरल खंडों से सदा,
होती सुनिर्मल नील नभ की छवि-छटा मोद प्रदा॥
था शयन-पाटांबर अरुण, झालर लगी जिसमें हरी;
उस पर तनिक तिरछे पड़े थे पीतपट ओढ़े हरी।
वह दिव्य शोभा देख करके ज्ञात होता था यही—
मानों पुरंदर-चाप सुंदर कर रहा शोभित मही॥
ऐसे समय में शीघ्रता से पहुँच दुर्योधन वहाँ,
श्रीकृष्ण के सिर ओर बैठा रुचिर आसन था जहाँ।
कुछ देर पीछे फिर वहाँ आकर बिना ही कुछ कहे,
हरि के पदों की ओर अर्जुन नम्रता से स्थित रहे॥
उस काल उन दोनों सहित शोभित हुए अति विष्णु यों,
कंदर्प और वसंत-सेवित सो रहे हों जिष्णु ज्यों।
फिर एक दूजे को परस्पर तुच्छ मन में लेखते,
हरि जागरण की बाट दोनों रहे ज्यों-त्यों देखते॥
उस समय दोनों के हृदय में भाव बहु उठने लगे,
पर कह सके कुछ भी न वे जब तक न पुरुषोत्तम जगे।
दो ओर से आते हुए युग जल-प्रवाह बहे-बहे,
मानो मनोरम शैल से हों बीच ही मैं रुक रहे॥
कुछ देर में जब भक्तवत्सल देवकीनंदन जगे,
तब देख अर्जुन को प्रथम बोले वचन प्रियता-पगे।
है कुशल तो सब भाँति भारत! आज भूल पड़े कहाँ?
जो कार्य मेरे योग्य हो प्रस्तुत सदा मैं हूँ यहाँ॥
कहते हुए यों सेज पर निज पूर्व तनु के भाग से,
पर्यंक-तकिए के सहारे बैठ कर अनुराग से।
सब जान कर भी पार्थ को निज वचन कहने के लिए,
दृग-कमल उनकी ओर हरि ने मुदित हो प्रेरित किए॥
तब देख उनकी ओर हँस कर कुछ विचित्र विनोद से,
निज सिर झुकाते हुए उनको नम्र होकर मोद से।
करते हुए कुरुनाथ का मुख-तेज निष्प्रभ-सा तथा,
यों कह सुनाई पार्थ ने संक्षेप में अपनी कथा—॥
“होते सुलभ सुख-भोग जिससे भागते भव-रोग हैं,
सो कृपा जिन पर आपकी सकुशल सदा हम लोग हैं।
संप्रति समर-साहाय्य-हित, कर विनय, सुख पाकर महा,
मैं हुआ देने ‘रण-निमंत्रण’ प्राप्त सेवा में यहाँ॥”
कर्तव्य ही कुरुनाथ अपना सोचता जब तक रहा,
कर लिया तब पार्थ ने यों कार्य निज ऊपर कहा।
यह शीघ्र घटना देख कर अति चकित-सा वह रह गया,
सब गर्व उसका उस समय नैराश्य-नद में बह गया॥
धिक्कार तब देता हुआ वह प्रथम आने के लिए,
मन के विकारों को किसी विध रोक कर अपने हिए।
श्रीकृष्ण से मिल कर तथा पाकर उचित सत्कार को,
कहने लगा इस भाँति उनसे त्याग सोच-विचार को॥
“आया प्रथम गोविंद! हूँ मैं आपके शुभ धाम में,
अतएव मुझको दीजिए साहाय्य इस संग्राम में।
मैं और अर्जुन आपको दोनों सदैव समान हैं,
पर प्रथम आए को अधिकतर मानते मतिमान हैं।”
श्रीकृष्ण बोले —“कहे तुमने उचित वचन विवेक से,
तुम और पांडव हैं हमें दोनों सदा ही एक से।
तब प्रथम आने के वचन भी सब प्रकार यथार्थ हैं,
पर प्रथम दृग्गोचर हुए मुझको यहाँ पर पार्थ हैं॥
जो हो, करूँगा युद्ध मैं साहाय्य दोनों ओर मैं,
पालन करूँगा यह किसी विध आत्मकर्म कठोर मैं।
दस कोटि निज सेना करूँगा एक ओर सशस्त्र मैं,
केवल अकेला ही रहूँगा एक ओर निरस्त्र मैं॥
दो भाग निज साहाय्य के इस भाँति हैं मैंने किए,
स्वीकार तुम दोनों करो, हो जो जिसे रुचिकर हिए।
रण-खेत में निज ओर से सेना लड़ेगी सब कहीं,
पर युद्ध की है बात क्या, मैं शस्त्र भी लूँगा नहीं॥”
सुन कर वचन यों पार्थ ने स्वीकार श्रीहरि को किया,
कुरुनाथ ने नारायणी दश कोटि सेना को लिया।
तब पार्थ से हँस कर वचन कहने लगे भगवान यों—
“स्वीकृत मुझे तुमने किया है त्याग सैन्य महान क्यों?”
गंभीर होकर पार्थ ने तब यह उचित उत्तर दिया—
“था चाहिए करना मुझे जो, है वही मैंने किया।
है सैन्य क्या, मुझको जगत भी तुम बिना स्वीकृत नहीं,
श्रीकृष्ण रहते हैं जहाँ सब सिद्धियाँ रहती वहीं॥”

भारत-भारती / वर्तमान खंड / अविद्या

ये सब अ-शिक्षा के कुफल हैं, वास है जिसका यहाँ;
अध्यात्म विद्या का भवन हा! आज वह भारत कहाँ?
धिक्कार है, हम खो चुके हैं आज अपना ज्ञान भी;
खोकर सभी कुछ अंत में खोया महाधन मान्य भी!
हा! सैकड़े पीछे यहाँ दस भी सुशिक्षित जन नहीं!
हाँ, चाह कुलियों की कहीं हो, तो मिलेंगे सब कहीं!!
हतभाग्य भारत! जो कभी गुरुभाव से पूजित रही—
करती भुवन में भृत्यता संतान अब तेरी वही!!!
छाई अविद्या की निशा है, हम निशाचर बन रहे;
हा! आज ज्ञानाऽभाव से वीभत्स रस में सन रहे!
हे राम! इस ऋषि भूमि का उद्धार क्या होगा नहीं?
हम पर कृपा कर आपका अवतार क्या होगा नहीं?
विद्या बिना अब देख लो, हम दुर्गुणों के दास हैं;
हैं तो मनुज हम, किंतु रहते दनुजता के पास हैं।
दाएँ तथा बाएँ सदा सहचर हमारे चार हैं—
अविचार, अँधाचार हैं, व्यभिचार, अत्याचार हैं!
हा! गाढ़तर तमसावरण से आज हम आच्छन्न हैं,
ऐसे विपन्न हुए कि अब सब भाँति मरणासन्न हैं!
हम ठोकरें खाते हुए भी होश में आते नहीं,
जड़ हो गए ऐसे कि कुछ भी जोश में आते नहीं!

भारत-भारती / वर्तमान खंड / कृषि और कृषक

अब पूर्व की-सी अन्न की होती नहीं उत्पत्ति है,
पर क्या इसी से अब हमारी घट रही संपत्ति है?
यदि अन्य देशों को यहाँ से अन्न जाना बंद हो—
तो देश फिर संपन्न हो, क्रंदन रुके, आनंद हो॥
वह उर्वरापन भूमि का कम हो गया है, क्यों न हो?
होता नहीं कुछ यत्न उसका, यत्न कैसे हो, कहो?
करते नहीं कृषक परिश्रम, और वे कैसे करें?
कर-वृद्धि है जब साथ तब क्यों वे वृथा श्रम कर मरें?
सौ में पचासी जन यहाँ निर्वाह कृषि पर कर रहे,
पाकर करोड़ों अर्द्धभोजन सर्द आहें भर रहे।
जब पेट की ही पड़ रही फिर और की क्या बात है;
'होती नहीं है भक्ति भूखे' उक्ति यह विख्यात है॥
कृषि-कर्म को उत्कर्षता सर्वत्र विश्रुत है सही,
पर देख अपने कृषकों को चित्त में आता यही—
हा दैव! क्या जीते हुए आजन्म मरना था उन्हें?
भिक्षुक बनाते पर विधे! कर्षक न करना था उन्हें॥
कृषि में अपेक्षा वृष्टि की रहती हमें अब है सदा,
होता जहाँ वैषम्य उसमें क्या कहें फिर आपदा।
रहता अवर्षण से हो! अब जो हमारा हाल है,
दृष्टांत उसका इन दिनों गुजरात का दुष्काल है॥
था एक ऐसा भी समय पड़ता अकाल न था यहाँ,
हो या न हो वर्षा जलाशय थे यथेष्ट जहाँ-तहाँ।
भारत पढ़ो, देवर्षि ने है क्या युधिष्ठिर से कहा—
“कृषि-कार्य वर्षा की अपेक्षा के बिना तो हो रहा?
केवल अवर्षण ही नहीं, अतिवृष्टि का भी कष्ट है;
बढ़ कर प्रलय-सम प्रबल जल सर्वस्व करता नष्ट है;
“दैवोऽपि दुर्बलघातकः” अथवा अभाग्य कहें इसे?
किंवा कहो, निज कर्म का मिलता नहीं है फल किसे?
अब ऋतु-विपर्यय तो यहाँ आवास ही-सा है किए,
होती प्रकृति में भी विकृति हा! भाग्यहीनों के लिए।
हेमंत में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है,
पावस-निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है!
हो जाए अच्छी भी फसल पर लाभ कृषकों को कहाँ?
खाते, खवाई, बीज-ऋण से हैं रँगे रखे यहाँ।
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में,
अधपेट रह कर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में!
पानी बना कर रक्त का, कृषि कृषक करते हैं यहाँ,
फिर भी अभागे भूख से दिन-रात मरते हैं यहाँ।
सब बेचना पड़ता उन्हें निज अन्न वह निरुपाय है,
बस चार पैसे से अधिक पड़ती न दैनिक आय है!
जब अन्य देशों के कृषक संपत्ति में भरपूर हैं—
लाते कि जिनसे आठ रुपया रोज़ के मजदूर हैं।
तब चार पैसे रोज़ ही पाते यहाँ कर्षक अहो!
कैसे चले संसार उनका, किस तरह निर्वाह हो?
बीता नहीं बहु काल उस औरंगजेबी को अभी,
करके स्मरण जिसका कि हिंदू काँप उठते हैं सभी;
उस दुःसमय का चावलों का आठ मन का भाव है,
पर आठ सेर नहीं रहा अब, क्या अपूर्व अभाव है॥
होती नहीं है कृषि यहाँ पूरी तरह से अब कभी,
यद्यपि शुभाशा चित्त में होती हमें है जब कभी।
पाला कहीं, ओले कहीं, लगता कहीं कुछ रोग है,
पहले शुभाशा, फिर निराशा, दैव! कैसा योग है?
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा-सा जल रहा,
चल रहा सनसन पवन, तन से पसीना ढल रहा!
देखो, कृषक शोणित सुखा कर हल तथापि चला रहे,
किस लोभ से इस आँच में वे निज शरीर जला रहे!
मध्याह्न है, उनकी स्त्रियाँ ले रोटियाँ पहुँची वहीं,
हैं रोटियाँ रूखी, खबर है शाक की हमको नहीं!
संतोष से खाकर उन्हें वे, काम में फिर लग गए,
भर पेट भोजन पा गए तो भाग्य मानों जग गए!॥
उन कृषक-बंधुओं की दशा पर नित्य रोती है दया,
हिम, ताप, वृष्टि-सहिष्णु जिनका रंग काला पड़ गया!
नारी-सुलभ सुकुमारता उनमें नहीं है नाम को,
वे कर्कशानी क्यों न हों, देखो न उनके काम को!!
गोबर उठातीं, थापती हैं, भोगतीं, आयास वे,
कृषि काटतीं, लेतीं परोहे, खोदती हैं घास वे!
गृहकार्य जितने और हैं करतीं वही संपन्न हैं,
तो भी कदाचित् ही कभी भर पेट पाती अन्न हैं॥
कुछ रात रहते जाग कर चक्की चलाने बैठतीं,
हम सच कहेंगे, उस समय वे गीत गाने बैठतीं!
पर क्या कहें, उस गीत से क्या लाभ पाने बैठतीं,
वे सुख बुलाने बैठतीं, या दुख भुलाने बैठतीं!!
घनघोर वर्षा हो रही है, गगन गर्जन कर रहा,
घर से निकलने को कड़क कर वज्र वर्जन कर रहा!
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं,
किस लोभ से वे आज भी लेते नहीं विश्राम हैं?
बाहर निकलना मौत है, आँधी अँधेरी रात है,
आ:शीत कैसा पड़ रहा है, थरथराता गात है!
तो भी कृषक ईंधन जलाकर खेत पर हैं जागते,
वह लाभ कैसा है न जिसका लोभ अब भी त्यागते॥
यह अन्न तो लेंगे विदेशी, लाभ क्या उनको कहो?
मिलता उन्हें जो अर्द्धभोजन विघ्न उसमें भी न हो!
कहते इसी से हैं कि क्या आजन्म मरना था उन्हें!
भिक्षुक बनाते पर विधे! कर्षक न करना था उन्हें!
हैं वे सभ्य तथा अशिक्षित, भाव उनके भ्रष्ट हैं;
दुख-भार से सुविचार मानों हो गए सब नष्ट हैं!
अपनी समुन्नति के उन्हें कुछ भी उपाय न सूझते,
अपना हिताहित भी न कुछ वे हैं समझते चूकते!!
सज्ञान कैसे हों, उन्हें संयोग ही मिलता नहीं,
विख्यात कमलालय कमल भी दिन बिना खिलता नहीं!
है पेट से ही पेट की पड़ती उन्हें, वे क्या करें!
वे ग्वाल हो जीते रहें या छात्र बन भूखों मरें?
संप्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उसको ज्ञान है,
है वायु कैसा चल रहा, इसका न कुछ भी ध्यान है!
मानों भुवन से भिन्न उनका दूसरा ही लोक है,
शशि-सूर्य हैं, फिर भी कहीं उसमें नहीं आलोक है!
भर पेट भोजन ही चरम सुख वे अकिंचन मानते,
पर साथ ही दुर्भाग्यवश दुर्लभ उसे हैं जानते!
दिन दुःख के हैं भर रहे करते हुए संतोष वे,
लाचार हैं, निज भाग्य को ही दे रहे हैं दोष वे॥
उनको निरंतर दुःख ने अब कर दिया यों दीन है—
सुख-कल्पना तक से हुआ उनका हृदय अब हीन है!
आलोक का अनुभव कभी जन्मांध कर सकते नहीं,
मरु-जंतु सहसा सुरसरी का ध्यान धर सकते नहीं॥
ग्रामीण गीत यदा कदा ये गान करते हैं सही,
है फाग उनका राग बहुधा और उत्सव भी वही।
पर चित्त को वे दीन जन किस भाँति बहलाया करें?
क्या आँसुओं से ही उसे वे नित्य नहलाया करें?॥
तुम सभ्य हो,'मार्केट' जिनका सात सागर पार है,
पर ग्राम की वह हाट ही उनका 'बड़ा बाजार' है।
तुम हो विदेशों से मँगाते माल लाखों का यहाँ,
पर वे अकिंचन नमक-गुड़ ही मोल लेते हैं वहाँ॥
करते सहर्ष प्रदर्शिनी की सैर तुम कौतुक भरी,
(क्या लाभ उससे ही उठाते, बात है, यह दूसरी।)
वे हो सका तो ग्राम्य-मेले देख कर ही धन्य हैं,
मनिहार की दूकान से जिनमें सुदृश्य न अन्य हैं॥
तुम दार्शनिक हो ईश का अस्तित्व सत्य न मानते;
हैं भूत-प्रेतों से अधिक वे भी न उसको जानते।
हा देव! इस ऋषि भूमि का यह आज कैसा हाल है!
तू काल! सचमुच काल ही है, क्रूर और कराल है॥
पाठक! न यह कह बैठना, छेड़ा कहाँ का राग है,
यह फूल कैसा है कि इसमें गंध है, न पराग है?
है यह कथा नीरस तदपि इसमें हमारा भाग है,
निकले बिना बाहर नहीं रहती हृदय की आग है॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / मंदिर और महंत

कैसी भयंकर अब हमारी तीर्थ यात्रा हो रही,
उन मंदिरों में ही विकृति की पूर्ण मात्रा हो रही!
अड्डे-अखाड़े बन रहे हैं ईश के आवास भी,
आती नहीं है लोक-लज्जा अब हमारे पास भी॥
हा! पुण्य के भांडार में हैं भर रहीं अघ-राशियाँ,
हैं देव आप महंतजी ही, देवियाँ हैं दासियाँ!
तन, मन तथा धन भक्तजन अर्पण किया करते जहाँ—
वे भंड साधु सुकर्म का तर्पण किया करते वहाँ!!
अब मंदिरों में रामजनियों के बिना चलता नहीं,
अश्लील गीतों के बिना वह भक्ति-फल फलता नहीं।
वे चीरहरणादिक वहाँ प्रत्यक्ष लीला-जाल हैं,
भक्त-स्त्रियाँ हैं गोपियाँ, गोस्वामि ही गोपाल हैं!!!

भारत-भारती / वर्तमान खंड / दुर्भिक्ष

दुर्भिक्ष मानों देह धर के घूमता सब ओर है,
हा! अन्न! हा! हा! अन्न का रव गूँजता घनघोर है!
सब विश्व में सौ वर्ष में, रण में भरे जितने हरे!
जन चौगुने उनसे यहाँ दस वर्ष में भूखों मरे॥
उड़ते प्रभंजन से यथा तप-मध्य सूखे पत्र हैं,
लाखों यहाँ भूखे भिखारी घूमते सर्वत्र हैं!
है एक चिथड़ा ही कमर में और खप्पर हाथ में,
नंगे तथा रोते हुए बालक विकल हैं साथ में॥
आवास या विश्राम उनका एक तरुतल मात्र है,
बहु कष्ट सहने से सदा काला तथा कृश गात्र है!
हेमंत उनको है कँपाता, तप तपाता है तथा,
है झेलनी पड़ती उन्हें सिर पर विषम वर्षा-व्यथा!
वह पेट उनका पीठ से मिल कर हुआ क्या एक है?
मानों निकलने को परस्पर हड्डियों में टेक है!
निकले हुए हैं दाँत बाहर, नेत्र भीतर हैं धँसे;
किन शुष्क आतों में न जाने प्राण उनके हैं फँसे!
अविराम आँखों से बरसता आँसुओं का मेह है,
है लटपटाती चाल उनकी, छटपटाती देह है!
गिर कर कभी उठते यहाँ, उठ कर कभी गिरते वहाँ;
घायल हुए से घूमते हैं वे अनाथ जहाँ-तहाँ॥
हैं एक मुट्ठी अन्न को वे द्वार-द्वार पुकारते,
कहते हुए कातर वचन सब ओर हाथ पसारते—
दाता! तुम्हारी जय रहे, हमको दया कर दीजियो,
माता! मरे, हा! हा! हमारी शीघ्र ही सुध लीजियो”
कृमि, कीट, खग, मृग आदि भी भूखे नहीं सोते कभी,
पर वे भिखारी स्वप्न में भी भूख से रोते सभी!
वे सुप्त हैं या मृत कि मूर्च्छित, कुछ समझ पड़ता नहीं;
मूर्च्छा कि मृत्यु अवश्य है, यह नींद की जड़ता नहीं!
है काँखता कोई कहीं, कोई कहीं रोता पड़ा;
कोई विलाप प्रलाप करता, ताप है कैसा कड़ा।
हैं मृत्यु-रमणी पर प्रणयि-सम वे अभागे मर रहे,
जब से बुभुक्षा कुट्टनी ने उस प्रिया के गुण कहे!॥
नारी-जनों की दुर्दशा हमसे कहीं जाती नहीं,
लज्जा बचाने को अहो! जो वस्त्र भी पाती नहीं।
जननी पड़ी है और शिशु उसके हृदय पर मुख धरे,
देखा गया है, किंतु वे माँ-पुत्र दोनों हैं मरे!
जो कुलवती हैं भीख भी वे माँग सकती हैं नहीं,
मर जायँ चाहे किंतु झोली टाँग सकती हैं नहीं।
संतान ने आकर कहा—'माँ! रात तो होने लगी,
भूखे रहा जाता नहीं माँ?' हाय! माँ रोने लगी॥
है खोलती सरकार यद्यपि काम शीघ्र अकाल के,
होती सभाएँ, और खुलते सत्र आटे-दाल के।
पूरा नहीं पड़ता तदपि, वह त्राहि कम होती नहीं;
कैसी विषमता है कि कुछ भी हाय! सम होती नहीं॥
प्रायः सदा दुर्भिक्ष ऐसा है बना रहता जहाँ,
आश्चर्य क्या यदि फिर निरंतर नीचता फैले वहाँ।
करता नहीं क्या पाप भूखा! पेट! हो तेरा बुरा,
है! छोड़ती सुत तक नहीं उरगी क्षुधा से आतुरा!
शासक यहाँ जो दोषियों को साँकलों से कस रहे,
जो अंडमान समान टापू है यहाँ से बस रहे।
फिर भी दिनोंदिन बढ़ रहा जो घोर घटना-जाल है,
है हेतु इसका और क्या, दुर्भिक्ष या दुष्काल है॥
कुल, जाति-पाँति न चाहिए, यह सब रहे या जाए रे;
बस एक मुट्ठी अन्न हमको चाहिए अब हाय रे!
इस पेट पापी के लिए ही हम विधर्मी बन रहे,
निज धर्म-मानस से निकल अघ-पंक में हैं सन रहे॥
जिन दूर देशों में हमारे धर्म के झंडे उड़े-
आकर स्वयं जिनके तले दिन-दिन वहाँ के जन जुड़े।
तजना पड़े हमको वहीं के धर्म पर निज धर्म को!
हा! देखती है क्या बुभुक्षा-राक्षसी दुष्कर्म को!
हे धर्म्म और स्वदेश! तुमको बार-बार प्रणाम है,
हा! हम अभागों का हुआ क्या आज यह परिणाम है!
हमको क्षमा करियो, क्षुधा-वश हम तुम्हें हैं खो रहे,
होकर विधर्मी हाय! अब हम हैं विदेशी हो रहे॥
आनंद-नद में मग्न थे जिस देश के वासी सभी,
सुर भी तरसते थे जहाँ पर जन्म लेने को कभी।
हा! आज उसकी यह दशा, संताप छाया सब कहीं,
सुर क्या, असुर भी अब यहाँ का जन्म चाहेंगे नहीं॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / दारिद्रय

रहता प्रयोजन से प्रचुर पूरित जहाँ धन-धान्य था,
जो 'स्वर्ण-भारत' नाम से संसार में सम्मान्य था!
दारिद्र्य दुर्द्धर अब वहाँ करता निरंतर नृत्य है,
आजीविका अवलंब बहुधा भृत्य का ही कृत्य है!!
देखो जिधर अब बस उधर ही है उदासी छा रही,
काली निराशा की निशा सब ओर से है आ रही।
चिंता-तरंगें चित्त को बेचैन रखती हैं सदा,
अब नित्य ही आती यहाँ पर एक नूतन आपदा॥

भारत-भारती / अतीत खंड / राजत्व और शासन

हम भूप होकर भी कभी होते न भोगाऽसक्त थे,
रह कर विरक्त विदेह जैसे आत्मयोगासक्त थे।
कर्तव्य के अनुरोध से ही कार्य करते थे सभी,
राजत्व में भी फिर भला हम भूल सकते थे कभी?
हाँ मेदिनी-पति भी यहाँ के भक्त और विरक्त थे,
होते प्रजा के अर्थ ही वे राज्यकार्य्यासक्त थे।
सुत-तुल्य ही वे सौम्य उसको मानते थे सर्वदा,
होता प्रजा का अर्थ ही 'संतान' संस्कृत में सदा॥
देते प्रजाहित ही बढ़ा कर प्राप्त-कर वे सर्वथा,
ले भूमि से जल रवि उसे देता सहस्र गुना यथा।
बन कर नृत-स्थानीय भी हरते प्रजा का सोच थे,
करते तदर्थ न पुत्र के भी त्याग में संकोच थे॥
हैं मद्यपी कायर न मेरे राज्य में तस्कर कहीं,
व्यभिचारिणी तो फिर कहाँ जब एक व्यभिचारी नहीं।
यों सत्यवादी नृप बिना संकोच कहते थे यहाँ,
कोई बता दे विश्व में शासक हुए ऐसे कहाँ?

भारत-भारती / वर्तमान खंड / गो-वध

है कृषि प्रधान प्रसिद्ध भारत और कृषि की यह दशा!
होकर रसा यह नीरसा अब हो गई है कर्कशा।
अच्छी उपज होती नहीं है, भूमि बहु परती पड़ी;
गोवंश का वध ही यहाँ है याद आता हर घड़ी!
यूरोप में कल के हलों से काम होता है सही,
जुत क्यों न जाती हो अरब में ऊँट के हल से मही।
गो-वंश पर ही किंतु है यह देश अवलंबित सदा,
पर दीन भारत! हाय तेरे भाग्य में है क्या बदा!॥
है भूमि बंध्या हो रही, वृष-जाति दिन-दिन घट रही;
घी-दूध दुर्लभ हो रहा, बल-वीर्य की जड़ कट रही।
गो-वंश के उपकार की सब ओर आज पुकार है;
तो भी यहाँ उसका निरंतर हो रहा संहार है!
वह भी समय था एक जो अब स्वप्न जा सकता कहा,
घी तीस सेर विशुद्ध रुपए में हमें मिलता रहा।
देहात में भी सेर भर से अधिक मिलता नहीं!
दुर्बल हुए हम आज यों-तनुभार भी मिलता नहीं॥
दाँतों तले तृण दाबकर हैं दीन गायें कह रहीं—
हम पशु तथा तुम हो मनुज, पर योग्य क्या तुमको यही?
हमने तुम्हें माँ की तरह है दूध पीने को दिया,
देकर कसाई को हमें तुमने हमारा वध किया!
जो जन हमारे मांस से निज देह पुष्टि विचार के—
उदरस्थ हमको कर रहे हैं, क्रूरता से मार के।
मालूम होता है सदा, धारे रहेंगे देह वे—
या साथ ही ले जाएँगे उसको बिना संदेह वे!
हा! दूध पीकर भी हमारा पुष्ट होते हो नहीं,
दधि, घृत तथा तक्रादि से भी तुष्ट होते हो नहीं।
तुम खून पीना चाहते हो, तो यथेष्ट वही सही;
नर-योनि हो, तुम धन्य हो, तुम जो करो थोड़ा वही!
क्या वश हमारा है भला, हम दीन हैं, बलहीन हैं;
मारो कि पालो, कुछ करो तुम, हम सदैव अधीन हैं।
प्रभु के यहाँ से भी कदाचित् आज हम असहाय हैं,
इससे अधिक क्या कहें, हा! हम तुम्हारी गाय हैं॥
बच्चे हमारे भूख से रहते समक्ष धीर हैं,
करके न उनका सोच कुछ देती तुम्हें हम क्षीर हैं।
चर कर विपिन में घास फिर आती तुम्हारे पास हैं,
होकर बड़े वे वत्स भी बनते तुम्हारे दास हैं॥
“जारी रहा क्रम यदि यहाँ यों ही हमारे नाश का—
तो अस्त समझो सूर्य भारत-भाग्य के आकाश का।
जो तनिक हरयाली रही वह भी न रहने पाएगी,
यह स्वर्ण-भारत-भूमि बस मरघट-मही बन जाएगी!
बहुधा हमारे हेतु ही विग्रह यहाँ होता खड़ा;
सहवासियों में बैर का जो बीज बोता है बड़ा।
जो हे मुसलमानो! हमें कुर्बान करना धर्म है—
तो देश की यों हानि करना क्या नहीं दुष्कर्म है?
बीती अनेक शताब्दियाँ जिस देश में रहते तुम्हें,
क्या लाज आवेगी उसे अपना 'वतन' कहते तुम्हें?
तुम लोग भारत को कभी समझो अरब से कम नहीं,
यद्यपि जगत में और कोई देश इसके सम नहीं॥
जिस देश के वर-वायु से सकुटुंब तुम हो जी रहे,
मिष्ठान जिसका खा रहे, पीयूष-सा जल पी रहे।
जो अंत में तनु को तुम्हारे ठौर देगा गोद में,
कर्तव्य क्या तुमको नहीं रखना उसे आमोद में॥
जिसमें बुजुर्गों के तुम्हारे हैं शरीर मिले हुए,
जिसने उगाए हैं वहाँ छायार्थ वृक्ष खिले हुए।
क्या मान्य 'मरारिव' की तरह तुमको न होगी वह धरा?
अजमेर की दरगाह का कर ध्यान सोचो तो ज़रा॥
हिंदू हमें जब पालते हैं धर्म अपना मान के,
रक्षा करो तब तुम हमारी देश-हित ही जान के।
यदि तुम कहो—अब हम कलों से काम ले लेंगे सभी,
तो पूछती हैं हम कि क्या वे दूध भी देंगी कभी?
हिंदू तथा तुम सब चढ़े हो एक नौका पर यहाँ,
जो एक का होगा हित तो दूसरे का हित कहाँ?
सप्रेम हिल-मिल कर चलो, यात्रा सुखद होगी तभी;
पीछे हुआ सो हो गया, अब सामने देखो सभी॥
हा! शोचनीय किसे नहीं गो वंश का यह ह्रास है?
इस पाप से ही बढ़ रहा क्या यह हमारा त्रास है!
घृत और दुग्धाभाव से दुर्बल हुए हम रो रहे,
होकर अशक्त, अकाल में ही काल-कवलित हो रहे॥
जो नित्य नूतन व्याधियाँ करती यहाँ आखेट हैं,
क्या दीन-दुर्बल ही अधिक होते न उनकी भेट हैं?
'देवोऽपि दुर्बलघातकः' फिर याद आता है यहाँ,
'छिद्रोष्वनर्था' वाक्य पर भी ध्यान जाता है यहाँ॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / संगीत

हैं पंडितों की राय यह—संगीत भी साहित्य है,
श्रुति-मार्ग से मन को सुधा-रस वह पिलाता नित्य है।
विष किंतु उसमें भी यहाँ हमने मिला कर रख दिया,
हतभाग्य घुल-घुल कर मरा जिसने कि यह रस चख लिया॥
जो मंजु मानस में तरंगें था उठाता भक्ति की—
अब आग भड़काता वही संगीत विषयासक्ति की!
हमने बने को भी बिगाड़ा, याद रखना है इसे,
लो, रम्य रस में विष मिलाना और कहते हैं किसे?
संगीत में जब से मदन की मूर्ति अंकित हो गई,
वह भावुकों की भक्तिवाणी भी कलंकित हो गई!
करते प्रकट थे हाय! वे जिससे अनन्योपासना,
बढ़ने लगी देखो, उसी से अब विषय की वासना!
गिर जाए कुछ गंगांबु भी अस्पृश्य नाली में कभी,
तो फिर उसे अपवित्र ही बतलाएँगे निश्चय सभी।
यों भक्तिरस भी सन गया अश्लीलता के नील में,
गुड़ भी बनेगा नमक यदि पड़ जाए साँभर झील में॥
कविता तथा संगीत ने हमको गिराया और भी,
सच पूछिए तो अब कहीं हमको नहीं है ठौर भी।
हा! जो कलाएँ थीं कभी अत्युच्च भावोद्गारिणी,
विपरीतता देखो कि अब वे हैं अधोगतिकारिणी!

भारत-भारती / अतीत खंड / हिंदू

इस काल में भी हिंदुओं में धीरता कुछ शेष थी, निज पूर्वजों की वीरता, गंभीरता कुछ शेष थी। फैली विशेष विलासिता थी किंतु थी कुछ भक्ति भी, हम घट चले थे किंतु फिर भी शेष थी कुछ शक्ति भी॥ विक्रमादित्य विक्रम कि जिनका आज भी संवत् यहाँ है चल रहा— ध्रुव-धर्म को ऐसे नृपों का उस समय भी बल रहा। जिनसे अनेकों देश-हितकर पुण्यकार्य किए गए; जो शक यहाँ शासक बने थे सब निकाल दिए गए॥ नर-रूप-रत्नों से सजी थी वीर विक्रम की सभा, अब भी जगत में जागती है जगमगी जिनकी प्रभा। जाकर सुनो, उज्जैन मानों आज भी यह कह रही— मैं मिट गई, पर कीर्ति मेंरी तब मिटेगी जब मही॥ भोज विद्यानुरागी भोज भी कैसा सदाशय भूप था— विख्यात कवियों के लिए जो कल्पवृक्ष-स्वरूप था। साहित्य के उद्यान में वह पुण्यकाल बसंत है, वे-वे प्रसून खिले कि अब भी सुरभि-पूर्ण दिगंत है॥

भारत-भारती / अतीत खंड / बौद्ध काल

भारत-गगन में उस समय फिर एक वह झंडा उड़ा—
जिसके तले, आनंद से, आधा जगत आकर जुड़ा।
वह बौद्धकालिक सभ्यता है विश्व भर में छा रही,
अब भी जिसे अवलोकने को भूमि खोदी जा रही!
वर्णन विदेशी यात्रियों ने उस समय का जो दिया,
पढ़कर तथा सुनकर उसे किसने नहीं विस्मय किया?
बनते न विद्या प्राप्त कर ही वे यहाँ बुधवर्य्य थे—
श्री भी यहाँ की देख कर करते महा आश्चर्य थे॥
तब भी कला-कौशल यहाँ का था जगत के हित नया,
है फाहियान विलोक जिसको मुग्ध होकर कह गया—
यह काम देवों का किया है, मनुज कर सकते नहीं—
दृग देखकर जिसको कभी श्रम मान कर थकते नहीं!
था सार्वभौम अशोक का कैसा प्रताप बढ़ा-चढ़ा,
विस्तार जिसके राज्य का था अन्य देशों तक बढ़ा।
थे गुप्तवंशी नृप, न धर्म-द्वेष जिनको इष्ट था;
तात्पर्य, तब भी भूमि पर भारत बहुत उत्कृष्ट था॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / वैश्य

जो ईश के ऊरुज अत: जिन पर स्वदेश स्थिति रही,
व्यापार, कृषि, गो-रूप में, दुहते रहे जो सब मही।
वे वैश्य भी अब पतित होकर नीच पद पाने लगे,
बनियें कहा कर वैश्य से 'बक्काल' कहलाने लगे!
वह लिपि, कि जिसमें 'सेठ' को 'सठ' ही लिखेंगे सब कहीं,
सीखी उन्होंने और उनकी हो चुकी शिक्षा वही!
हा! वेद के अधिकारियों में आज ऐसी मूढ़ता,
है शेष उनके 'गुप्त' पद में किन गुणों की गूढ़ता?
कौशल्य उनका यहाँ बस तोलने में रह गया,
उद्यम तथा साहस दिवाला खोलने में रह गया!
करने लगे हैं होड़ उनके वचन कच्चे सूत से,
करते दिवाली पर परीक्षा भाग्य की वे घृत से!
वाणिज्य या व्यवसाय का होता शऊर उन्हें कहीं,
तो देश का धन यों कभी जाता विदेशों को नहीं।
है अर्थ सट्टा-फाटका उनके निकट व्यापार का,
कुछ पार हैं देखो भला उनके महा अविचार का?
बस हाय पैसा! हाय पैसा!! कर रहे हैं वे सभी,
पर गुण बिना पैसा भला क्या प्राप्त होता है कभी?
सबसे गए बीते नहीं क्या आज वे हैं दीखते,
वे देख सुन कर भी सभी कुछ क्या कभी कुछ सीखते?
बस अब विदेशों से मँगा कर बेचते हैं माल वे,
मानों विदेशी वाणिजों के हैं यहाँ दल्लाल वे।
वेतन सदृश कुछ लाभ पर वे देश का धन खो रहे,
निद्रव्य कारीगर यहाँ के हैं उन्हीं को रो रहे॥
उनका द्विजत्व विनष्ट है, है किंतु उनको खेद क्या?
संस्कार-हीन जघन्यजों में और उनमें भेद क्या?
उपवीत पहने देख उनको धर्म-भाग्य सराहिए,
पर तालियों के बाँधने को रज्जु भी तो चाहिए!
चंदा किसी शुभ कार्य में दो चार सौ जो है दिया,
तो यज्ञ मानों विश्वजित ही है उन्होंने कर लिया!
बनवा चुके मंदिर, कुआँ या धर्मशाला जो कहीं,
हा स्वार्थ, तो उनके सदृश सुर भी सुयश भागी नहीं!!
औदार्य उनका दीखता है एक मात्र विवाह में,
वह जाए चाहे वित्त सारा नाच-रंग-प्रवाह में!
वे वृद्ध होकर भी पता रखते विषय की थाह का,
मरे भी जी उठें वे नाम सुन कर ब्याह का!
उद्योग-बल से देश का भांडार जो भरते रहे,
फिर यज्ञ आदि सुकर्म में जो व्यय उसे करते रहे।
वे आज अपने आप ही अपघात अपना कर रहे,
निज द्रव्य खोकर घोर अघ के घट निरंतर भर रहे॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / साधु-संत

वे भूरि संख्यक साधु जिनके पंथ-भेद अनंत है—
अवधूत, यति, नागा, उदासी, संत और महंत हैं।
हा! वे गृहस्थों से अधिक हैं आज रागी दीखते,
अत्यल्प हो सच्चे विरागी और त्यागी दीखते॥
जो कामिनी-कांचन न छूटा फिर विराग रहा कहाँ?
पर चिह्न तो वैराग्य का अब है जटाओं में यहाँ!
भूखों मरे कि जटा रखा कर साधु कहलाने लगे,
चिमटा लिया,'भस्मी' रमाई, माँगने-खाने लगे!!
संख्या अनुद्योगी जनों की ही न उनसे बढ़ रही—
शुचि साधुता पर भी कुयश की कालिमा है चढ़ रही।
है भस्म-लेपन से कहीं मन की मलिनता छूटती?
हा! साधु-मर्यादा हमारी दिनों-दिन टूटती!
यदि ये हमारे साधु ही कर्तव्य अपना पालते—
तो देश का बेड़ा कभी का पार ये कर डालते।
पर हाय! इनमें ज्ञान तो बस राम का ही नाम है,
दम की चिलम में लौ उठाना मुख्य इनका काम है!

मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 2 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 2

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

पंचवटी

पूर्वाभास
[1]
पूज्य पिता के सहज सत्य पर, वार सुधाम, धरा, धन को, चले राम, सीता भी उनके पीछे चलीं गहन वन को। उनके भी पीछे लक्ष्मण थे, कहा राम ने कि “तुम कहाँ? विनत वदन से उत्तर पाया— तुम मेरे सर्वस्व जहाँ॥”
[2]
सीता बोलीं कि ये पिता की, आज्ञा से सब छोड़ चले, पर देवर, तुम त्यागी बनकर, क्यों घर से मुहँ मोड़ चले?” उत्तर मिला कि “आर्य्ये, बरबस, बना न दो मुझको त्यागी, आर्य-चरण-सेवा में समझो, मुझको भी अपना भागी॥
[3]
“क्या कर्त्तव्य यही है भाई?” लक्ष्मण ने सिर झुका लिया, “आर्य आपके प्रति इस जन ने, कब-कब क्या कर्त्तव्य किया? प्यार किया है तुमने केवल! ”सीता यह कह मुसकाईं, किंतु राम की उज्ज्वल आँखें, सफल सीप-सी भर आईं॥
पंचवटी
[1]
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानो झीम रहे हैं तरु भी, मंद पवन के झोंकों से॥
[2]
पंचवटी की छाया में है, सुंदर पर्ण-कुटीर बना, उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना, जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है? भोगी कुसमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥
[3]
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किए, राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिए। बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है, जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
[4]
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है, तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है। वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी, विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
[5]
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता; आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता। बीच-बीच में इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी, मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई-नई—
[6]
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा; है स्वच्छंद सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा? बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप, पर कितने एकांत भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
[7]
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको, सदा सबेरा होने पर। और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है, शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।
[8]
सरल तरल जिंन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है, अति आत्मीया प्रकृति हमारे साथ उन्हीं से रोती है! अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है, पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
[9]
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात, वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात। अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की। किंतु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!
[10]
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे, व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे! कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक; पर अपना हित आप नहीं क्या कर सकता है यह नरलोक!
[11]
मझली माँ ने क्या समझा था, कि मैं राजमाता हूँगी, निर्वासित कर आर्य राम को, अपनी जड़ें जमा लूँगी। चित्रकूट में किंतु उसे ही, देख स्वयं करुणा थकती, उसे देखते थे सब, वह थी, निज को ही न देख सकती॥
[12]
अहो! राजमातृत्व यही था, हुए भरत भी सब त्यागी। पर सौ सो सम्राटों से भी हैं सचमुच वे बड़भागी। एक राज्य का मूढ़ जगत ने, कितना महामूल्य रक्खा, हमको तो मानो वन में ही है विश्वानुकूल्य रक्खा॥
[13]
होता यदि राजत्व मात्र ही, लक्ष्य हमारे जीवन का, तो क्यों अपने पूर्वज उसको, छोड़ मार्ग लेते वन का? परिवर्तन ही यदि उन्नति है, तो हम बढ़ते जाते हैं, किंतु मुझे तो सीधे-सच्चे, पूर्व-भाव ही भाते हैं॥
[14]
जो हो, जहाँ आर्य रहते हैं, वहीं राज्य वे करते हैं, उनके शासन में वनचारी, सब स्वच्छंद विहरते हैं। रखते हैं सयत्न हम पुर में, जिन्हें पींजरों में कर बंद; वे पशु-पक्षी भाभी से हैं, हिले यहाँ स्वयमपि, सानंद!
[15]
करते हैं हम पतित जनों में, बहुधा पशुता का आरोप; करता है पशु वर्ग किंतु क्या, निज निसर्ग नियमों का लोप? मैं मनुष्यता को सुरत्व की, जननी भी कह सकता हूँ, किंतु पतित को पशु कहना भी, कभी नहीं सह सकता हूँ॥
[16]
आ आकर विचित्र पशु-पक्षी, यहाँ बिताते दोपहरी, भाभी भोजन देतीं उनको, पंचवटी छाया गहरी। चारु चपल बालक ज्यों मिलकर, माँ को घेर खिझाते हैं, खेल-खिलाकर भी आर्य्या को, वे सब यहाँ रिझाते हैं!
[17]
गोदावरी नदी का तट यह, ताल दे रहा है अब भी, चंचल-जल कल-कल कर मानो, तान दे रहा है अब भी! नाच रहे हैं अब भी पत्ते, मन-से सुमन महकते हैं, चंद्र और नक्षत्र ललककर, लालच भरे लहकते हैं॥
[18]
वैतालिक विहंग भाभी के, संप्रति ध्यान लग्न-से हैं, नए गान की रचना में वे, कवि-कुल तुल्य मग्न-से हैं। बीच-बीच में नर्तक केकी, मानो यह कह देता है— मैं तो प्रस्तुत हूँ देखें कल, कौन बड़ाई लेता है॥
[19]
आँखों के आगे हरियाली, रहती है हर घड़ी यहाँ, जहाँ-तहाँ झाड़ी में झिरती है झरनों की झड़ी यहाँ। वन की एक-एक हिमकणिका, जैसी सरस और शुचि है, क्या सौ-सौ नागरिक जनों की, वैसी विमल रम्य रुचि है?
[20]
मुनियों का सत्संग यहाँ है, जिन्हें हुआ है तत्व-ज्ञान, सुनने को मिलते हैं उनसे, नित्य नए अनुपम आख्यान। जितने कष्ट-कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गंध उन्हें उतना ही अत्र तत्र सर्वत्र मिला।
[21]
शुभ सिद्धांत वाक्य पढ़ते हैं, शुक-सारी भी आश्रम के, मुनि कन्याएँ यश गाती हैं, क्या ही पुण्य-पराक्रम के। अहा! आर्य्य के विपिन राज्य में, सुखपूर्वक सब जीते हैं, सिंह और मृग एक घाट पर आकर पानी पीते हैं।
[22]
गुह, निषाद, शबरों तक का मन, रखते हैं प्रभु कानन में, क्या ही सरल वचन रहते हैं, इनके भोले आनन में! इन्हें समाज नीच कहता है, पर हैं ये भी तो प्राणी, इनमें भी मन और भाव हैं, किंतु नहीं वैसी वाणी॥
[23]
कभी विपिन में हमें व्यंजन का, पड़ता नहीं प्रयोजन है, निर्मल जल मधु कंद, मूल, फल आयोजनमय भोजन है। मनःप्रसाद चाहिए केवल, क्या कुटीर फिर क्या प्रसाद? भाभी का आह्लाद अतुल है, मझली माँ का विपुल विषाद!
[24]
अपने पौधों में जब भाभी, भर-भर पानी देती हैं, खुरपी लेकर आप निरातीं, जब वे अपनी खेती हैं, पाती हैं तब कितना गौरव, कितना सुख, कितना संतोष! स्वावलंब की एक झलक पर, न्योछावर कुबेर का कोष॥
[25]
सांसारिकता में मिलती है, यहाँ निराली निस्पृहता, अत्रि और अनसूया की-सी होगी कहाँ पुण्य-गृहता! मानो है यह भुवन भिन्न ही, कृत्रिमता का काम नहीं; प्रकृति अधिष्ठात्री है इसकी, कहीं विकृति का नाम नहीं॥
[26]
स्वजनों की चिंता है हमको, होगा उन्हें हमारा सोच, यही एक इस विपिन-वास में, दोनों ओर रहा संकोच। सब सह सकता है, परोक्ष ही, कभी नहीं सह सकता प्रेम, बस, प्रत्यक्ष भाव में उसका, रक्षित-सा रहता है क्षेम॥
[27]
इच्छा होती है स्वजनों को, एक बार वन ले आऊँ, और यहाँ की अनुपम महिमा, उन्हें घुमाकर दिखलाऊँ। विस्मित होंगे देख आर्य्य को, वे घर की ही भाँति प्रसन्न, मानो वन-विहार में रत हैं, वे वैसे ही श्रीसंपन्न॥
[28]
यदि बाधाएँ हुईं हमें तो, उन बाधाओं के ही साथ, जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहनशक्ति भी आई हाथ। जब बाधाएँ न भी रहेंगी, तब भी शक्ति रहेगी यह, पुर में जाने पर भी वन की स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह॥
[29]
नहीं जानती हाय! हमारी माताएँ आमोद-प्रमोद, मिली हमें है कितनी कोमल, कितनी बड़ी प्रकृति की गोद। इसी खेल को कहते हैं क्या, विद्वज्जन जीवन-संग्राम? तो इसमें सुनाम कर लेना है कितना साधारण काम!
[30]
“बेचारी ऊर्मिला हमारे लिए व्यर्थ रोती होगी, क्या जाने वह, हम सब वन में, होंगे इतने सुख-भोगी! मग्न हुए सौमित्रि चित्र-सम, नेत्र निमीलित एक निमेष, फिर आँखें खोलें तो यह क्या, अनुपम रूप, अलौकिक वेश!
[31]
चकाचौंध-सी लगी देखकर, प्रखर ज्योति की वह ज्वाला, निस्संकोच, खड़ी थी सम्मुख, एक हास्यवदनी बाला! रत्नाभरण भरे अंगों में, ऐसे सुंदर लगते थे— ज्यों प्रफुल्ल बल्ली पर सौ-सौ, जुगनू जगमग जगते थे!
[32]
थी अत्यंत अतृप्त वासना, दीर्घ दृगों से झलक रही, कमलों की मकरंद-मधुरिमा, मानो छवि से छलक रही। किंतु दृष्टि थी जिसे खोजती, मानो उसे पा चुकी थी, भूली-भटकी मृगी अंत में अपनी ठौर आ चुकी थी।
[33]
कटि के नीचे चिकुर-जाल में, उलझ रहा था बायाँ हाथ, खेल रहा हो ज्यों लहरों से, लोल कमल भौंरों के साथ, दायाँ हाथ लिए था सुरभित-चित्र विचित्र-सुमन-माला, टाँगा धनुष कि कल्पलता पर, मनसिज ने झूला डाला!
[34]
पर संदेह-दोल पर ही था, लक्ष्मण का मन झूल रहा, भटक भावनाओं के भ्रम में, भीतर ही था भूल रहा। पड़े विचार-चक्र में थे वे, कहाँ न जाने कूल रहा; आज जागरित-स्वप्न-शाल यह, सम्मुख कैसा फूल रहा!
[35]
देख उन्हें विस्मित विशेष वह, सुस्मितवदनी ही बोली- (रमणी की मूरत मनोज्ञ थी, किंतु न थी सूरत भोली) “शूरवीर होकर अबला को, देख सुभग, तुम थकित हुए; संसृति की स्वाभाविकता पर, चंचल होकर चकित हुए!
[36]
प्रथम बोलना पड़ा मुझे ही, पूछी तुमने बात नहीं, इससे पुरुषों की निर्ममता, होती क्या प्रतिभास नहीं? सँभल गए थे अब तक लक्ष्मण, वे थोड़े से मुसकाए, उत्तर देते हुए उसे फिर, निज गंभीर भाव लाए—
[37]
सुंदरी, मैं सचमुच विस्मित हूँ, तुमको सहसा देख यहाँ, ढलती रात, अकेली अबला, निकल पड़ी तुम कौन कहाँ? पर अबला कहकर अपने को, तुम प्रगल्भता रखती हो, निर्ममता निरीह पुरुषों में, निस्संदेह निरखती हो!
[38]
पर मैं ही यदि परनारी से, पहले संभाषण करता, तो छिन जाती आज कदाचित् पुरुषों की सुधर्मपरता। जो हो, पर मेरे बारे में, बात तुम्हारी सच्ची है, चंडि, क्या कहूँ, तुमसे, मेरी, ममता कितनी कच्ची है॥
[39]
माता, पिता और पत्नी की, धन की, धरा-धाम की भी, मुझे न कुछ भी ममता व्यापी, जीवन परंपरा की भी, एक किंतु उन बातों से क्या, फिर भी हूँ मैं परम सुखी, ममता तो महिलाओं में ही होती है हे मंजुमुखी॥
[40]
शूरवीर कहकर भी मुझको, तुम जो भीरु बताती हो, इससे सूक्ष्मदर्शिता ही तुम, अपनी मुझे जताती हो? भाषण-भंगी देख तुम्हारी, हाँ, मुझको भय होता है, प्रमदे, तुम्हें देख वन में यों, मन में संशय होता है।
[41]
कहूँ मानवी यदि मैं तुमको, तो वैसा संकोच कहाँ? कहूँ दानवी तो उसमें है, यह लावण्य कि लोच कहाँ? वनदेवी समझूँ तो वह तो, होती है भोली-भाली, तुम्हीं बताओ कि तुम कौन हो, हे रंजित रहस्यवाली?
[42]
“केवल इतना कि तुम कौन हो, बोली वह-हा निष्ठुर कांत! यह भी नहीं-चाहती हो क्या, कैसे हो मेरा मन शांत? मुझे जान पड़ता है तुमसे, आज छली जाऊँगी मैं, किंतु आ गई हूँ जब तब क्या, सहज चली जाऊँगी मैं?
[43]
समझो मुझे अतिथि ही अपना, कुछ आतिथ्य मिलेगा क्या? पत्थर पिघले, किंतु तुम्हारा, तब भी हृदय हिलेगा क्या? किया अधर-दंशन रमणी ने, लक्ष्मण फिर भी मुसकाए, मुसकाकर ही बोले उससे-हे शुभ मूर्तिमती माये!
[44]
तुम अनुपम ऐश्वर्य्यवती हो, एक अकिंचन जन हूँ मैं, क्या आतिथ्य करूँ, लज्जित हूँ, वन-वासी, निर्धन हूँ मैं। रमणी ने फिर कहा कि मैंने, भाव तुम्हारा जान लिया, जो धन तुम्हें दिया है विधि ने, देवों को भी नहीं दिया!
[45]
किंतु विराग भाव धारणकर, बने स्वयं यदि तुम त्यागी, तो ये रत्नाभरण वार दूँ, तुम पर मैं हे बड़भागी! धारण करूँ योग तुम-सा ही, भोग-लालसा के कारण, पर कर सकती हूँ मैं यों ही, विपुल-विघ्न-बाधा वारण॥
[46]
इस व्रत में किस इच्छा से तुम, व्रती हुए हो, बतलाओ? मुझमें वह सामर्थ्य है कि तुम, जो चाहो सो सब पाओ। धन की इच्छा हो तुमको तो, सोने का मेरा भू-भाग, शासक, भूप बनो तुम उसके, त्यागो यह अति विषम विराग॥
[47]
और किसी दुर्जय वैरी से, लेना है तुमको प्रतिशोध, तो आज्ञा दो, उसे जला दे, कालानल-सा मेरा क्रोध। प्रेम-पिपासु किसी कांता के, तपस्कूप यदि खनते हो, सचमुच ही तुम भोले हो, क्यों मन को यों हनते हो?
[48]
अरे, कौन है, वार न देगी, जो इस यौवन-धन पर प्राण? खाओ इसे न यों ही हा! हा! करो यत्न से इसका त्राण। किसी हेतु संसार भार-सा, देता हो यदि तुमको ग्लानि, तो अब मेरे साथ उसे तुम, एक और अवसर दो दानि!”
[49]
लक्ष्मण फिर गंभीर हो गए, बोले-“धन्यवाद धन्ये! ललना सुलभ सहानुभूति है, निश्चय तुममें नृपकन्ये! साधारण रमणी कर सकती है ऐसे प्रस्ताव कहीं? पर मैं तुमसे सच कहता हूँ कोई मुझे अभाव नहीं॥
[50]
तो फिर क्या निष्काम तपस्या करते हो तुम इस वय में? पर क्या पाप न होगा तुमको, आश्रम के धर्म्मक्षय में? 'मान लो कि वह न हो, किंतु इस, तप का फल तो होगा ही, फिर वह स्वयं प्राप्त भी तुमसे, क्या न जाएगा भोगा ही?
[51]
वृक्ष लगाने की ही इच्छा, कितने ही जन रखते हैं, पर उनमें जो फल लगते हैं, क्या वे उन्हें न चखते हैं? लक्ष्मण अब हँस पड़े और यों, कहने लगे- दुहाई है! सेंतमेंत की तापस पदवी, मैंने तुमसे पाई है॥
[52]
यों ही यदि तप का फल पाऊँ, तो मैं इसे न चक्खूँगा, तुमसे जन के लिए यत्न से, उसको रक्षित रक्खूँगा। हँसी सुंदरी भी, फिर बोली- यदि वह फल मैं ही होऊँ, तो क्या करो, बताओ? बस अब, क्यों अमूल्य अवसर खोऊँ?”
[53]
“तो मैं योग्य पात्र खोजूँगा, सहज परंतु नहीं यह काम, “मैंने खोज लिया है उसको, यद्यपि नहीं जानती नाम। फिर भी वह मेरे समक्ष है, चौंके लक्ष्मण, बोले-कौन? केवल 'तुम' कहकर रमणी भी, हुई तनिक लज्जित हो मौन॥
[54]
पाप शांत हो, पाप शांत हो, कि मैं विवाहित हूँ बाले!” “पर क्या पुरुष नहीं होते हैं, दो-दो दाराओं वाले? नर कृत शास्त्रों के सब बंधन, हैं नारी को ही लेकर, अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले ही कर बैठे नर!”
[55]
तो नारियाँ शास्त्र रचना पर, क्या बहु पति का करें विधान? पर उनके सतीत्व-गौरव का, करते हैं नर ही गुणगान। मेरे मत में एक ओर हैं, शास्त्रों की विधियाँ सारी, अपना अन्तःकरण आप है, आचारों का सुविचारी॥
[56]
नारी के जिस भव्य-भाव का, साभिमान भाषी हूँ मैं, उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं बहुविवाह-विभ्राट, क्या कहूँ, भद्रे, मुझको क्षमा करो; तुम कुशला हो, किसी कृती को, करो कहीं कृतकृत्य, वरो।”
[57]
पर किस मन से वरूँ किसी को? वह तो तुम से हरा गया! “चोरी का अपराध और भी, लो यह मुझ पर धरा गया? झूठा? प्रश्न किया प्रमदा ने, और कहा-मेरा मन हाय! निकल गया है मेरे कर से, होकर विवश, विकल, निरुपाय!
[58]
कह सकते हो तुम कि चंद्र का, कौन दोष जो ठगा चकोर? किंतु कलाधर ने डाला है, किरण-जाल क्यों उसकी ओर? दीप्ति दिखाता यदि न दीप तो, जलता कैसे कूद पतंग? वाद्य-मुग्ध करके ही फिर क्या, व्याध पकड़ता नहीं कुरंग?
[59]
लेकर इतना रूप कहो तुम, दीख पड़े क्यों मुझे छली? चले प्रभात वात फिर भी क्या, खिले न कोमल कमल-कली? कहने लगे सुलक्षण लक्ष्मण- हे विलक्षणे, ठहरो तुम; पवनाधीन पताका-सी यों, जिधर-तिधर मत फहरो तुम।
[60]
जिसकी रूप स्तुति करती हो, तुम आवेग युक्त इतनी, उसके शील और कुल की भी, अवगति है तुमको कितनी?” उत्तर देती हुई कामिनी, बोली अंग शिथिल करके- है नर, यह क्या पूछ रहे हो, अब तुम हाय! हृदय हरके?
[61]
अपना ही कुल-शील प्रेम में पड़कर नहीं देखतीं हम, प्रेम-पात्र का क्या देखेंगी, प्रिय हैं जिसे लेखतीं हम? रात बीतने पर है अब तो, मीठे बोल बोल दो तुम, प्रेमातिथि है खड़ा द्वार पर, हृदय-कपाट खोल दो तुम।
[62]
हा नारी! किस भ्रम में है तू, प्रेम नहीं यह तो है मोह; आत्मा का विश्वास नहीं यह, है तेरे मन का विद्रोह! विष से भरी वासना है यह, सुधा-पूर्ण वह प्रीति नहीं; रीति नहीं, अनरीति और यह, अति अनीति है, नीति नहीं॥
[63]
आत्म-वंचना करती है तू, किस प्रतीति के धोखे से, झाँक न झंझा के झोंके में, झुककर खुले झरोखे से! शांति नहीं देगी तुझको यह, मृगतृष्णा करती है क्रांति, सावधान हो मैं पर नर हूँ, छोड़ भावना की यह भ्रांति॥
[64]
इसी समय पौ फटी पूर्व में, पलटा प्रकृति-पटी का रंग। किरण-कंटकों से श्यामांबर फटा, दिवा के दमके अंग। कुछ-कुछ अरुण, सुनहली कुछ-कुछ, प्राची की अब भूषा थी, पंचवटी की कुटी खोलकर, खड़ी स्वयं क्या ऊषा थी!
[65]
अहा! अंबरस्था ऊषा भी, इतनी शुचि सस्फूर्ति न थी, अवनी की ऊषा सजीव थी, अंबर की-सी मूर्ति न थी। वह मुख देख, पांडु-सा पड़कर, गया चंद्र पश्चिम की ओर; लक्ष्मण के मुँह पर भी लज्जा, लेने लगी अपूर्व हिलोर॥
[66]
चौंक पड़ी प्रमदा भी सहसा, देख सामने सीता को, कुमुद्वती-सी दबी देख वह, उस पद्मिनी पुनीता को। एक बार ऊषा की आभा, देखी उसने अंबर में, एक बार सीता की शोभा, देखी विगताडंबर में।
[67]
एक बार अपने अंगों की, ओर दृष्टि उसने डाली, उलझ गई वह किंतु, बीच में थी विभूषणों की जाली। एक बार फिर वैदेही के, देखे अंग अदूषण वे, सनक्षत्र अरुणोदय ऐसे रखते थे शुभ भूषण वे॥
[68]
हँसने लगे कुसुम कानन के, देख चित्र-सा एक महान, विकच उठीं कलियाँ डालों में, निरख मैथिली की मुसकान॥ कौन-कौन से फूल खिले हैं, उन्हें गिनाने लगा समीर, एक-एक कर गुन-गुन करके, जुड़ आई भौंरों की भीर॥
[69]
नाटक के इस नए दृश्य के, दर्शक थे द्विज लोग वहाँ, करते थे शाखासनस्थ वे, समधुप रस का भोग वहाँ। झट अभिनयारम्भ करने को, कोलाहल भी करते थे, पंचवटी की रंगभूमि को, प्रिय भावों से भरते थे॥
[70]
सीता ने भी उस रमणी को देखा लक्ष्मण को देखा, फिर दोनों के बीच खींच दी, एक अपूर्व हास्य-रेखा। देवर, तुम कैसे निर्दय हो, घर आए जन का अपमान, किसके पर-नर तुम, उसके जो, चाहे तुमको प्राण-समान?
[71]
याचक को निराश करने में, हो सकती है लाचारी, किंतु नहीं आई है आश्रय, लेने को यह सुकुमारी। देने ही आई है तुमको, निज सर्वस्व बिना संकोच, देने में कार्पण्य तुम्हें हो, तो लेने में क्या है सोच?”
[72]
उनके अरुण चरण-पद्मों में, झुक लक्ष्मण ने किया प्रणाम, आशीर्वाद दिया सीता ने-“हों सब सफल तुम्हारे काम!” और कहा-सब बातें मैंने, सुनी नहीं तुम रखना याद; कब से चलता है बोलो यह, नूतन शुक-रंभा-संवाद?
[73]
बोलीं फिर उस बाला से वे, सुस्मितपूर्वक वैसे ही- “अजी, खिन्न तुम न हो, हमारे, ये देवर हैं ऐसे ही। घर में ब्याही बहू छोड़कर, यहाँ भाग आए हैं ये, इस वय में क्या कहूँ, कहाँ का, यह विराग लाए हैं ये!
[74]
किंतु तुम्हारी इच्छा है तो, मैं भी उन्हें मनाऊँगी, रहो यहाँ तुम अहो! तुम्हारा, वर मैं इन्हें बनाऊँगी। पर तुम हो ऐश्वर्य्यशालिनी, हम दरिद्र वन-वासी हैं, स्वामी-दास स्वयं हैं हम निज, स्वयं स्वामिनी दासी हैं॥
[75]
पर करना होगा न तुम्हें कुछ, सभी काम कर लूँगी मैं, परिवेषण तक मृदुल करों से, तुम्हें न करने दूँगी मैं। हाँ, पालित पशु-पक्षी मेरे, तंग करें यदि तुम्हें कभी, उन्हें क्षमा करना होगा तो, कह रखती हूँ इसे अभी!”
[76]
रमणी बोली-“रहे तुम्हारा, मेरा-रोम-रोम सेवी, कहीं देवरानी यदि अपनी, मुझे बना लो तुम देवी! सीता बोलीं-वन में तुम सी, एक बहिन यदि पाऊँगी, तो बातें करके ही तुमसे, मैं कृतार्थ हो जाऊँगी॥
[77]
इस भामा विषयक भाभी को, अविदित भाव नहीं मेरे, लक्ष्मण को संतोष यही था, फिर भी थे वे मुँह फेरे। बोल उठे अब-इन बातों में क्या रक्खा है हे भाभी! इस विनोद में नहीं दीखती, मुझे मोद की आभा भी।
[78]
तो क्या मैं विनोद करती हूँ! बोली उनसे वैदेही, अपने लिए रूक्ष हो तुम क्यों, होकर भी भ्रातृ-स्नेही? आज ऊर्मिला की चिंता यदि, तुम्हें चित्त में होती है, कि वह विरहिणी बैठी मेरे लिए निरंतर रोती है।
[79]
“तो मैं कहती हूँ, वह मेरी बहिन न देगी तुमको दोष, तुम्हें सुखी सुनकर पीछे भी, पावेगी सच्चा संतोष। प्रिय से स्वयं प्रेम करके ही, हम सब कुछ भर पाती हैं, वे सर्वस्व हमारे भी हैं, यही ध्यान में लाती हैं॥
[80]
जो वरमाला लिए, आप ही, तुमको वरने आई हो, अपना तन, मन, धन सब तुमको, अर्पण करने आई हो, मज्जागत लज्जा तजकर भी, तिस पर करे स्वयं प्रस्ताव, कर सकते हो तुम किस मन से, उससे भी ऐसा बर्ताव?
[81]
मुसकाए लक्ष्मण, फिर बोले-किस मन से मैं कहूँ भला? पहले मन भी तो हो मेरे, जिससे सुख-दुख सहूँ भला!” अच्छा ठहरो कह सीता ने, करके ग्रीवा-भंग अहा! “अरे, अरे’’, न सुना लक्ष्मण का, देख उटज की ओर कहा—
[82]
“आर्य्यपुत्र, उठकर तो देखो, क्या ही सुप्रभात है आज, स्वयं सिद्धि-सी खड़ी द्वार पर, करके अनुज-वधू का साज!” क्षण भर में देखी रमणी ने, एक श्याम शोभा बाँकी! क्या शस्यश्यामल भूतल ने, दिखलाई निज नर-झाँकी!
[83]
किंवा उतर पड़ा अवनी पर, कामरूप कोई घन था, एक अपूर्व ज्योति थी जिसमें जीवन का गहरापन था! देखा रमणी ने चरणों में, नत लक्ष्मण को उसने भेंट, अपने बड़े क्रोड़ में विधु-सा, छिपा लिया सब ओर समेट॥
[84]
सीता बोलीं- “नाथ, निहारो, यह अवसर अनमोल नया; तुम्हारे प्राणानुज का, तप सुरेंद्र भी डोल गया! माना, इनके निकट नहीं है, इंद्रासन की कुछ गिनती, किंतु अप्सरा की भी क्यों ये, सुनते नहीं नम्र विनती?
[85]
तुम सबका स्वभाव ऐसा ही, निश्चल और निराला है, और नहीं तो आई, लक्ष्मी, कौन छोड़ने वाला है? कुम्हला रही देख लो, कर में, स्वयंवरा की वरमाला, किंतु कुंठ देवर ने अपना, मानो कुंठित कर डाला॥
[86]
मुसकाकर राघव ने पहले, देखा तनिक अनुज की ओर, फिर रमणी की ओर देखकर कहा अहा! ज्यों बोले मोर— “शुभे, बताओ कि तुम कौन हो, और चाहती हो तुम क्या? छाती फूल गई रमणी की, क्या चंदन है, कुमकुम क्या!
[87]
बोली वह-पूछा तो तुमने- शुभे, चाहती हो तुम क्या? इन दशनों-अधरों के आगे, क्या मुक्ता हैं, विद्रुम क्या? मैं हूँ कौन वेश ही मेरा, देता इसका परिचय है, और चाहती हूँ क्या, यह भी, प्रकट हो चुका निश्चय है॥
[88]
जो कह दिया, उसे कहने में, फिर मुझको संकोच नहीं, अपने भावी जीवन का भी, जी में कोई सोच नहीं। मन में कुछ वचनों में कुछ हो, मुझमें ऐसी बात नहीं; सहज शक्ति मुझमें अमोघ है, दाव, पेंच या घात नहीं॥
[89]
मैं अपने ऊपर अपना ही रखती हूँ, अधिकार सदा, जहाँ चाहती हूँ, करती हूँ, मैं स्वच्छंद विहार सदा। कोई भय मैं नहीं मानती, समय-विचार करूँगी क्या? डरती हैं बाधाएँ मुझसे, उनसे आप डरूँगी क्या?
[90]
अर्द्धयामिनी होने पर भी, इच्छा हो आई मन में, एकाकिनी घूमती-फिरती, आ निकली मैं इस वन में। देखा आकर यहाँ तुम्हारे, प्राणानुज ये बैठे हैं, मूर्ति बने इस उपल शिला पर, भाव-सिंधु में पैठे हैं
[91]
सत्य मुझे प्रेरित करता है, कि मैं उसे प्रकटित कर दूँ, इन्हें देख मन हुआ कि इनके आगे मैं उसको धर दूँ। वह मन, जिसे अमर भी कोई, कभी क्षुब्ध कर सका नहीं; कोई मोह, लोभ भी कोई, मुग्ध, लुब्ध कर सका नहीं।
[92]
इन्हें देखती हुई आड़ में, बड़ी देर मैं खड़ी रही, क्या बतलाऊँ किन हावों में, किन भावों में पड़ी रही? फिर मानो मन के सुमनों से, माला एक बना लाई, इसके मिस अपने मानस की, भेंट इन्हें देने आई॥
[93]
पर ये तो बस-'कहो, कौन तुम?' करने लगे प्रश्न छूँछा, यह भी नहीं चाहती हो क्या', जैसा अब तुमने पूँछा। चाहे दोनों खरे रहें या, निकलें दोनों ही खोटे; बड़े सदैव बड़े होते हैं, छोटे रहते हैं छोटे॥
[94]
तुम सबको यह हास्य भले ही, करता हो मेरा उपहास, किंतु स्वानुभव, स्वविचारों पर, है मुझको पूरा विश्वास। तो अब सुनो, बड़े होने से, तुमसें बड़ी बड़ाई है, दृढ़ता भी है, मृदुता भी है, इनमें एक कड़ाई है॥
[95]
पहनो कांत, तुम्हीं यह मेरी, जयमाला-सी वरमाला, बने अभी प्रासाद तुम्हारी, यह एकांत पर्णशाला! मुझे ग्रहण कर इस भामा के, भूल जाएँगे ये भ्रू-भंग, हेमकूट, कैलास आदि पर, सुख भोगोगे मेरे संग॥
[96]
मुसकाईं मिथिलेशनंदिनी-प्रथम देवरानी, फिर सौत! अंगीकृत है मुझे, किंतु तुम, माँगो कहीं न मेरी मौत। मुझे नित्य दर्शन भर इनके, तुम करती रहने देना, कहते हैं इसको ही अँगुली, पकड़ प्रकोष्ठ पकड़ लेना!
[97]
रामानुज ने कहा कि “भाभी, है यह बात अलीक नहीं- औरों के झगड़े में पड़ना, कभी किसी को ठीक नहीं। पंचायत करने आई थीं, अब प्रपंच में क्यों न पड़ो, वंचित ही होना पड़ता है, यदि औरों के लिए लड़ो॥
[98]
राघवेंद्र रमणी से बोले-बिना कहे भी बह वाणी, आकृति से ही प्रकृति तुम्हारी, प्रकटित है हे कल्याणी! निश्चय अद्भुत गुण हैं तुम में, फिर भी मैं यह कहता हूँ— गृहत्याग करके भी वन में, सपत्नीक मैं रहता हूँ॥
[99]
किंतु विवाहित होकर भी यह, मेरा अनुज अकेला है, मेरे लिए सभी स्वजनों की, कर आया अवहेला है। इसके एकांगी स्वभाव पर तुमने भी है ध्यान दिया, तदपि इसे ही पहले अपने प्रबल प्रेम का दान दिया॥
[100]
एक अपूर्व चरित लेकर जो, उसको पूर्ण बनाते हैं, वे ही आत्मनिष्ठ जन जग में, परम प्रतिष्ठा पाते हैं। यदि इसको अपने ऊपर तुम, प्रेमासक्त बना लोगी, तो निज कथित गुणों की सबको, तुम सत्यता जना दोगी॥
[101]
जो अंधे होते हैं बहुधा, प्रज्ञाचक्षु कहाते हैं, पर हम इस प्रेमांध बंधु को, सब कुछ भूला पाते हैं। इसके इसी प्रेम को यदि तुम, अपने वश में कर लोगी, तो मैं हँसी नहीं करता हूँ, तुम भी परम धन्य होगी।”
[102]
भेद दृष्टि से फिर लक्ष्मण को, देखा स्वगुण-गर्जनी ने, वर्जन किया किंतु लक्ष्मण की, अधरस्थिता तर्जनी ने! बोले वे–“बस, मौन कि मेरे लिए हो चुकी मान्या तुम, यों अनुरक्ता हुईं आर्य्य पर, जब अन्यान्य वदान्या तुम॥
[103]
प्रभु ने कहा कि तब तो तुमको, दोनों ओर पड़े लाले, मेरी अनुज-वधू पहले ही, बनी आप तुम हे बाले!” हुई विचित्र दशा रमणी की, सुन यों एक-एक की बात, लगें नाव को ज्यों प्रवाह के, और पवन के भिन्नाघात!
[104]
कहा क्रुद्ध होकर तब उसने- “तो अब मैं आशा छोडूँ! जो संबंध जोड़ बैठी थी, उसे आप ही अब तोडूँ? किंतु भूल जाना न इसे तुम, मुझमें है ऐसी भी शक्ति, कि झकमार कर करनी होगी, तुमको फिर मुझ पर अनुरक्ति।
[105]
मेरे भृकुटि-कटाक्ष तुल्य भी, ठहरेंगे न तुम्हारे चाप, बोले तब रघुराज- तुम्हारा, ऐसा ही क्यों न हो प्रताप। किंतु प्राणियों के स्वभाव की होती है ऐसी ही रीति, परवशता हो सकती है पर, होती नहीं भीति में प्रीति॥
[106]
इतना कहकर मौन हुए प्रभु, और तनिक गंभीर हुए, पर सौमित्रि न शांत रह सके, उन्मुख वे वरवीर हुए— “और इसे तुम भी न भूलना, तुम नारी होकर इतना- अहम्भाव जब रखती हो तब, रख सकते हैं नर कितना?
[107]
झंकृत हुई विषम तारों की, तंत्री-सी स्वतंत्र नारी, “तो क्या अबलाएँ सदैव ही, अबलाएँ हैं-बेचारी? नहीं जानते तुम कि देखकर, निष्फल अपना प्रेमाचार, होती हैं अबलाएँ कितनी, प्रबलाएँ अपमान विचार!
[108]
पक्षपातमय सानुरोध है, जितना अटल प्रेम का बोध, उतना ही बलवत्तर समझो, कामिनियों का वैर-विरोध। होता है विरोध से भी कुछ अधिक कराल हमारा क्रोध, और, क्रोध से भी विशेष है, द्वेष-पूर्ण अपना प्रतिशोध॥
[109]
देख क्यों न लो तुम, मैं जितनी सुंदर हूँ उतनी ही घोर, दीख रही हूँ जितनी कोमल, हूँ उतनी ही कठिन-कठोर!' सचमुच विस्मयपूर्वक सबने देखा निज समक्ष तत्काल- वह अति रम्य रूप पल भर में, सहसा बना विकट-कराल!
[110]
सबने मृदु मारुत का दारुण, झंझा-नर्तन देखा था, संध्या के उपरांत तमी का, विकृतावर्तन देखा था! काल-कीट-कृत वयस-कुसुम का क्रम से कर्तन देखा था! किंतु किसी ने अकस्मात् कब, यह परिवर्तन देखा था!
[110]
गोल कपोल पलटकर सहसा, बने भिड़ों के छत्तों-से, हिलने लगे उष्ण साँसों से, ओंठ लपालप लत्तों से! कुंदकली से दाँत हो गए, बढ़ बारह की डाढ़ों से, विकृत, भयानक और रौद्र रस, प्रगटे पूरी बाढ़ों-से?
[111]
जहाँ लाल साड़ी थी तनु में, बना चर्म का चीर वहाँ, हुए अस्थियों के आभूषण, थे मणिमुक्ता-हीर जहाँ! कंधों पर के बड़े बाल वे, बने अहो! आँतों के जाल, फूलों की वह वरमाला भी, हुई मुंडमाला सुविशाल!
[112]
हो सकते थे दो द्रुमाद्रि ही, उसके दीर्घ शरीर-सखा; देख नखों को ही जँचती थी, वह विलक्षणी शूर्पणखा! भय-विस्मय से उसे जानकी, देख न तो हिल-डोल सकीं, और न जड़ प्रतिमा-सी वे कुछ, रुद्र कुंठ से बोल सकीं॥
[113]
अग्रज और अनुज दोनों ने, तनिक परस्पर अवलोका, प्रभु ने फिर सीता को रोका, लक्ष्मण ने उसको टोका। सीता सँभल गई जो देखी, रामचंद्र की मृदु मुसकान, शूर्पणखा से बोले लक्ष्मण, सावधान कर उसे सुजान-
[114]
मायाविनि, उस रम्य रूप का, था क्या बस परिणाम यही? इसी भाँति लोगों को छलना, है क्या तेरा काम यही? विकृत परंतु प्रकृत परिचय से, डरा सकेगी तू न हमें, अबला फिर भी अबला ही है, हरा सकेगी तू न हमें!
[115]
बाह्य सृष्टि-सुंदरता है क्या, भीतर से ऐसी ही हाय! जो हो, समझ मुझे भी प्रस्तुत करता हूँ मैं वही उपाय, कि तू न फिर छल सके किसी को, मारूँ तो क्या नारी जान, विकलांगी ही तुझे करूँगा, जिससे छिप न सके पहचान
[116]
उस आक्रमणकारिणी के झट, लेकर शोणित तीक्ष्ण कृपाण, नाक कान काटे लक्ष्मण ने, लिए न उसके पापी प्राण्, और कुरूपा होकर तब वह, रुधिर बहाती, बिललाती, धूल उड़ाती आँधी ऐसी, भागी वहाँ से चिल्लाती
[117]
गूँजा किया देर तक उसका, हाहाकार वहाँ फिर भी, हुईं उदास विदेहनंदिनी, आतुर एवं अस्थिर भी होने लगी हृदय में उनके, वह आतंकमयी शंका, मिट्टी में मिल गई अंत में, जिससे सोने की लंका
[118]
हुआ आज अपशकुन सबेरे, कोई संकट पड़े न हा! कुशल करे कर्त्तार उन्होंने लेकर एक उसाँस कहा लक्ष्मण ने समझाया उनको- आर्य्ये, तुम निःशंक रहो, इस अनुचर के रहते तुमको, किसका डर है, तुम्हीं कहो
[119]
नहीं विघ्न-बाधाओं को हम, स्वयं बुलाने जाते हैं, फिर भी यदि वे आ जाएँ तो, कभी नहीं घबड़ाते हैं मेरे मत में तो विपदाएँ, हैं प्राकृतिक परीक्षाएँ, उनसे वही डरें, कच्ची हों, जिनकी शिक्षा-दीक्षाएँ॥
[120]
कहा राम ने कि यह सत्य है, सुख-दुख सब हैं समयाधीन, सुख में कभी न गर्वित होवे, और न दुख में होवे दीन। जब तक संकट आप न आवें, तब तक उनसे डर माने, जब वे आ जावें तब उनसे, डटकर शूर समर ठाने॥
[121]
यदि संकट ऐसे हों जिनको, तुम्हें बचाकर मैं झेलूँ, तो मेरी भी यह इच्छा है, एक बार उनसे खेलूँ। देखूँ तो कितनी विघ्नों की, वहन-शक्ति रखता हूँ मैं, कुछ निश्चय कर सकूँ कि कितनी, सहन शक्ति रखता हूँ मैं॥
[122]
नहीं जानता मैं, सहने को, अब क्या है अवशेष रहा? कोई सह न सकेगा, जितना, तुमने मेरे लिए सहा!” “आर्य्य, तुम्हारे इस किंकर को, कठिन नहीं कुछ भी सहना, असहनशील बना देता है, किंतु तुम्हारा यह कहना॥
[123]
सीता कहने लगीं कि “ठहरो, रहने दो इन बातों को, इच्छा तुम न करो सहने की, आप आपदाघातों को। नहीं चाहिए हमें विभव-बल, अब न किसी को डाह रहे, बस, अपनी जीवन-धारा का, यों ही निभृत प्रवाह बहे॥
[124]
हमने छोड़ा नहीं राज्य क्या, छोड़ी नहीं राज्य निधि क्या? सह न सकेगा कहो, हमारी, इतनी सुविधा भी विधि क्या? विधि की बात बड़ों से पूछो, वे ही उसे मानते हैं; मैं पुरुषार्थ पक्षपाती हूँ इसको सभी जानते हैं।
[125]
यह कहकर लक्ष्मण मुसकाए, रामचंद्र भी मुसकाए, सीता मुसकाईं विनोद के, पुनः प्रमोद भाव छाए। “रहो, रहो पुरुषार्थ यही है, -पत्नी तक न साथ लाए; कहते कहते वैदेही के, नेत्र प्रेम से भर आए॥
[126]
चलो नदी को घड़े उठा लो, करो और पुरुषार्थ क्षमा, मैं मछलियाँ चुगाने को कुछ, ले चलती हूँ धान, समा। घड़े उठाकर खड़े हो गए, तत्क्षण लक्ष्मण गद्गद्-से, बोल उठे मानो प्रमत्त हो, राघव महा मोद-मद से-
[127]
तनिक देर ठहरो मैं देखूँ, तुम देवर भाभी की ओर, शीतल करूँ हृदय यह अपना, पाकर दुर्लभ हर्ष-हिलोर!” यह कहकर प्रभु ने दोनों पर, पुलकित होकर सुध-बुध भूल, उन दोनों के ही पौधों के बरसाए नव विकसित फूल॥

भारत-भारती / अतीत खंड / कला-कौशल

अब लुप्त-सी जो हो गईं रक्षित न रहने से यहाँ,
सोचो, तनिक कौशल्य की इतनी कलाएँ थी कहाँ?
लिपि-बद्ध चौंसठ नाम उनके आज भी हैं दीखते,
दश-चार विद्या-विज्ञ होकर हम जिन्हें थे सीखते॥
हाँ, शिल्प-विद्या वृद्धि में तो थी यहाँ यों अति हुई-
होकर महाभारत इसी से देश की दुर्गति हुई!
मय-कृत भवन में यदि सुयोधन थल न जल को जानता-
तो पांडवों के हास्य पर यों शत्रुता क्यों ठानता?
प्रस्तर-विनिर्मित पुर यहाँ थे और दुर्ग बड़े-बड़े,
अब भी हमारे शिल्प गुण के चिह्न कुछ-कुछ हैं खड़े।
भू-गर्भ से जब तब निकलती वस्तुएँ ऐसी यहाँ-
जो पूछ उठती हैं कि ऐसी थी हुई उन्नति कहाँ?
वह सिंधु-सेतु बचा अभी तक, दक्षिणी मंदिर बचे?
कब और किसने, विश्व में, यों शिल्प-चित्र कहाँ रचे?
वह उच्च यमुनास्तंभ लोहस्तंभ-युक्त निहार लो,
प्राचीन भारत की कला-कौशल्य-सिद्धि विचार लो॥
बहु अभ्रभेदी स्तूप अब भी उच्च होकर कह रहे-
संसार के किस शिल्प ने जल-पात इतने हैं सहे?
शत-शत गुहाएँ साथ ही गुंजार करके कह रहीं-
प्राचीन ही वा शिल्प इतना कौन है? कोई नहीं॥
हैं जो यवन राजत्व के वे कीर्ति चिह्न बढ़े-चढ़े,
वे भी अधिकतर हैं हमारे शिल्पियों के ही गढ़े।
अन्यत्र भी तो है यवन-कुल की विपुल कारीगरी,
है किंतु भारत के सदृश क्या वह मनोहरता भरी?
निज चित्रकारी के विषय में क्या कहें, क्या क्रम रहा;
प्रत्यक्ष है या चित्र है, यों दर्शकों को भ्रम रहा।
इतिहास, काव्य, पुराण, नाटक, ग्रंथ जितने दीखते,
सब से विदित है, चित्र-रचना थे यहाँ सब सीखते॥
होती न यदि वह चित्र विद्या आदि से इस देश में-
तो धैर्य धरते किस तरह प्रेमी विरह के क्लेश में?
अब तक मिलेगा सूक्ष्म वर्णन चित्र के प्रति भाग का,
साहित्य में भी चित्र-दर्शन हेतु है अनुराग का॥
थी चित्रकार यहाँ स्त्रियाँ भी चित्ररेखा-सी कभी,
संलग्न कुशल नायक हमारे नाटकों में हैं सभी।
लिखते कहीं दुष्यंत हैं भोली प्रिया की छवि भली,
करती कहीं प्रिय-चित्र-रचना प्रेम से रत्नावली॥
अब चित्रशालाएँ हमारी नाम शेष हुई यहाँ,
पर आज भी आदर्श उनके हैं अनेक जहाँ-तहाँ।
अब भी अजेंटा की गुफाएँ चित्त को हैं मोहती;
निज दर्शकों के धन्य रव से गूँज कर हैं सोहती॥
होता न मूर्ति-विधान यदि साधन हमारे देश का,
पूजन न षोडश-विधि यहाँ होता सगुण सर्वेश का।
अनुभव न होता एक सीमा में असीमाधार का,
होता निदर्शन भी न उस हृदयस्थ रूपोद्गार का॥
निज रूप से भी दूसरे जन जिस समय अज्ञान थे-
हम उस समय प्रभु-मूर्ति का प्रत्यक्ष करते ध्यान थे।
ऐसा न करते तो भला हम भक्ति प्रकटाते कहाँ?
दर्शन-विलंबाकुल दृगों को हाय! ले जाते कहाँ?
अब तक पुराने खँडहरों में, मंदिरों में भी कहीं,
बहु मूर्तियाँ अपनी कला का पूर्ण परिचय दे रहीं।
प्रकटा रही हैं भग्न भी सौंदर्य की परिपुष्टता,
दिखला रही हैं साथ ही दुष्कर्मियों की दुष्टता॥
लोकोक्ति है 'गाना तथा रोना किसे आता नहीं',
पर गान जो शास्त्रीय है उत्पत्ति उसकी है यहीं।
आकर भयंकर भाव जिस संगीत में अब हैं भरे,
हरि को रिझा कर हम उसी से साम गान किया करे॥
आती सु-चेतनता जिन्हें सुन कर जड़ों में भी अहो!
आई कहाँ से गान में वे राग-रागिनियाँ कहो?
हैं सब हमारी ही कलाएँ ललित और मनोहरी,
थी कौतुकों में भी हमारे ऐंद्रजालिकता भरी॥
अभिनय कला के सूत्रधर भी आदि से ही आर्य्य हैं-
प्रकटे भरत मुनि से यहाँ इस शास्त्र के आचार्य्य हैं।
संसार में अब भी हमारी है अपूर्ण शकुंतला,
है अन्य नाटक कौन उसका साम्य कर सकता भला॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / समाज

हिंदू समाज कुरीतियों का केंद्र जा सकता कहा, ध्रुव धर्म पथ में कुप्रथा का जाल सा है बिछ रहा। सु-विचार के साम्राज्य में कु-विचार की अब क्रांति है, सर्वत्र पद-पद पर हमारी प्रकट होती भ्रांति है॥ बेजोड़ विवाह प्रति वर्ष विधवा-वृन्द की संख्या निरंतर बढ़ रही, होता कभी आकाश है, फटती कभी हिल कर मही। हा! देख सकता कौन ऐसे दग्धकारी दाह को? फिर भी नहीं हम छोड़ते हैं बाल्य-वृद्ध-विवाह को! अंधपरंपरा सब अंग दूषित हो चुके हैं अब समाज-शरीर के, संसार में कहला रहे हैं हम फ़कीर लकीर के! क्या बाप-दादों के समय की रीतियाँ हम तोड़ दें? वे रुग्ण हों तो क्यों न हम भी स्वस्थ रहना छोड़ दें! वर-कन्या-विक्रय बिकता कहीं वर है यहाँ बिकती तथा कन्या कहीं, क्या अर्थ के आगे हमें अब इष्ट आत्मा भी नहीं! हा! अर्थ, तेरे अर्थ हम करते अनेक अनर्थ हैं, धिक्कार, फिर भी तो नहीं संपन्न और समर्थ हैं? क्या पाप का धन भी किसी का दूर करता कष्ट है? उस प्राप्तकर्ता के सहित वह शीघ्र होता नष्ट है। आश्चर्य क्या है, जो दशा फिर हो हमारी भी वही, पर लोभ में पड़ कर हमारी बुद्धि अब जाती रही! धनोपार्जन हैं धन कमाने के हमारे और हो साधन यहाँ, होंगे कमाऊ और उद्यमशील ऐसे जन कहाँ? हमको बुराई कुछ नहीं कोई कहे जो ठग हमें, अत्यंत हीन-चरित्र अब तो जानता है जग हमें॥ निज स्वत्व, पर-संपत्ति पर कोई जमाता है यहाँ, कोई शकुनि का अनुकरण कर धन कमाता है यहाँ। कहने चले फिर लाज क्या, रसने! परंतु हरे! हरे! ठग, चोर, वंचक और कितने घूस खोर यहाँ भरे!!! सच हो कि झूँठ, किसी-किसी का साक्ष्य पर ही लक्ष है, परलोक में कुछ हो, यहाँ तो लाभ ही प्रत्यक्ष है! सत्कार जामाता-सदृश आहार में, उपहार में, सोचो, भला है लाभ ऐसा और किस व्यापार में॥ कर के मिलावट ही, विदेशी खाँड़ में गुड़ को यथा, हरते बहुत हैं देश के धन-धर्म दोनों सर्वथा। यों हो स्वदेशी में विदेशी माल बिकता है यहाँ! होगा कहो स्वार्थाग्नि में यों सत्य का स्वाहा कहाँ? अब विज्ञ व्यवसायी जनों की ओर भी तो कुछ बढ़ो, उन चारु चित्र विचित्र वर विज्ञापनों को तो पढ़ो। मानों वहाँ बैकुंठ का ही चमत्कार भरा पड़ा! हा! वंचना का बाह्य-दर्शन है मनमोहक बड़ा॥ कोई सुधा देकर हमें देता अमरता है वहाँ, दे यंत्र-मंत्र, अभीष्ट कोई सिद्ध करता है वहाँ! कुछ लाभ हो कि न हो हमें पर यह अवश्य यथार्थ है, उन 'सत्यवक्ता' सज्जनों का सिद्ध होता स्वार्थ है॥ अपकारकर्ता धूर्त वे उपकारियों के वेश में, हा! लूटपाट मचा रहे हैं दिन दहाड़े देश में। उनके विकृत विज्ञापनों से पूर्ण रहते पत्र हैं, एजेंट जेंटलमैन बनकर घूमते सर्वत्र हैं॥ माँगना खाना कर-युक्त भी क्या कार्य करना चाहते हैं हम कभी? क्या हम कुलीन कुली बनें? होगा न हमसे श्रम कभी। है मान रखा काम हमने माँगना आराम का, जीते यहाँ पर हैं बहुत खाकर सदैव हराम का! हम नीच को ऊँचा बनाते भीख के पीछे कभी, बनते कभी हम आप योगी और संतादिक सभी। कोई गिने, कितने यहाँ पर माँगने के ढंग हैं, नट-तुल्य पल-पल में बदलते हम अनेकों रंग है! दासत्व दासत्व करना भी हमें आया न अच्छी रीति से, करते उसे भी हम अधम हैं अब अधर्म-अनीति से! वह स्वामि-कार्य बने कि बिगड़े किंतु अपना काम हो, इस नीचता की नीचता का अब कहो, क्या नाम हो? अधिकार हम योग भी पाकर उसे उपयोग में लाते नहीं, सामर्थ्य पाकर भी किसी को लाभ पहुँचाते नहीं? जैसे बने हम दूसरों को हानि ही करते सदा, अधिकार पाकर और भी अघ के घड़े भरते सदा! न्यायालयों में भी निरंतर घूस खाते हैं हमीं, रक्षक पुलिस को भी यहाँ भक्षक बनाते हैं हमीं। कर्तृत्व का फल हम प्रज्ञा पर बल दिखाना जानते, हम दीन-दुखियों के रुदन को गान-सम हैं मानते! अभियोग हा! हिंस्र पशुओं के सदृश हममें भरी है क्रूरता, करके कलह अब हम इसी में समझते हैं शूरता। खोजो हमें यदि जब कि इस घर में न सोते ही पड़े, होंगे वकीलों के अड़े अथवा अदालत में खड़े! न्यायालयों में नित्य ही सर्वस्व खोते सैकड़ों, प्रति वार, पग-पग पर, वहाँ हैं खर्च होते सैकड़ों। फिर भी नहीं हम चेतते हैं दौड़ कर जाते वहीं, लघु बात भी हम पाँच मिल कर आप निपटाते नहीं॥ विपथ देखो जहाँ विपरीत पथ ही हाय! हमने है लिया, श्रीराम के रहते हुए आदर्श रावण को किया! हम हैं सुयोधन के अनुज तज कर युधिष्ठिर को अहो! सोचो भला, तब फिर हमारा पतन दिन-दिन क्यों न हो? नशेबाज़ी हम मत्त हैं, हम पर चढ़ा कितने नशों का रंग है, चंडू, चरस, गाँजा, मदक, अहिफेन, मदिरा, भंग है। सुनलो ज़रा, हममें यहाँ कैसी कहावत है चली- “पीता न गाँजे की कली उस मर्द से औरत भली”! क्या मर्द है हम वाह वा! मुख-नेत्र पीले पड़ गए; तनु सूख कर काँटा हुआ, सब अंग ढीले पड़ गए। मर्दानगी फिर भी हमारी देख लीजे कम नहीं- ये भिनभिनाती मक्खियाँ क्या मारते हैं हम नहीं! अँगरेज वणिकों ने नशे की लौ लगाई है हमें, हम दोष देते हैं कि तब यह मौत आई है हमें| पर व्यर्थ है यह दोष देना, हैं हम दोषी बड़े; हम लोग कहने से किसी के क्यों कुएँ में गिर पड़े? जो मस्त होकर तत्वमसि का गान करते थे सदा- स्वच्छंद ब्रह्मानंद-रस का पान करते थे सदा। मद्यादि मादक वस्तुओं से मत्त हैं अब हम वही, करते सदैव प्रलाप हैं, सुध-बुध सभी जाती रही! दो चार आने रोज़ के भी जो कुली मज़दूर हैं- संध्या-समय वे भी नशे में दीख पड़ते चूर हैं। मर जाएँ चाहे बाल-बच्चे भूख के मारे सभी, पर छोड़ सकते हैं नहीं उस दुर्व्यसन को वे कभी! शुचिता विदित जिनका वही हम आज कैसे भ्रष्ट हैं, किस भाँति दोनों लोक अपने कर रहे हम नष्ट हैं। हम आर्य हैं पर अब हमारे चरित कैसे गिर गए, हम दुर्गुणों से घिर गए हैं, सद्गुणों से फिर गए! आत्मविस्मृति हम आज क्या से क्या हुए, भूले हुए हैं हम इसे; है ध्यान अपने मान का हममें बताओ अब किसे? पूर्वज हमारे कौन थे, हम को नहीं यह ज्ञान भी, है भार उनके नाम पर दो अंजली जल-दान भी! होकर नितांत परावलंबी पशु-सदृश हम जी रहे, हा! कालकूट सभी परस्पर फूट का हैं पी रहे! हम देखते सुनते हुए भी देखते सुनते नहीं, पढ़ना सभी है व्यर्थ उनका जो कभी गुनते नहीं॥ मात्सर्य अब एक हममें दूसरे को देख सकता है नहीं, बैरी समझता बंधु को भी, है समझ ऐसी यहीं! कुत्ते परस्पर देख कर है दूर से ही भूंकते, पर दूसरे को एक हम कब काटने से चूकते? हों एक माँ के सुत कई व्यवहार सबके भिन्न हों, संभव नहीं यह किंतु जो संबंध-बंधन छिन्न हों। पर यह असंभव भी यहाँ प्रत्यक्ष संभव हो रहा, राष्ट्रीय भाव-समूह मानों सर्वदा को सो रहा! अनुदारता यदि एक अद्भुत बात कोई ज्ञात मुझको हो गई- तो हाय! मेरे साथ ही संसार से वह खो गई। उसको छिपा रखूँ न मैं तो कौन पूछेगा मुझे; कितने प्रयोग-प्रदीप इस अनुदारता से हैं बुझे! गृह कलह इस गृह कलह के अर्थ भारत-भूमि रणचंडी बनी, जीवन शांतिपूर्ण सबके, दीन हो अथवा धनी! जब यह दशा है गेह की, क्या बात बाहर की कहें? है कौन सहृदय जन न जिसके अब यहाँ आँसू बहें? उद्दण्ड उग्र अनैक्य क्षय कर दिया है क्षेम का, विद्वेष ने पद हर लिया है आज पावन प्रेम का। ईर्ष्या हमारे चित्त से क्षण मात्र भी हटती नहीं, दो भाइयों में भी परस्पर अब यहाँ पटती नहीं! इस गृह-कलह से ही, कि जिसकी नींव है विचार की- निंदित कदाचित है प्रथा अब सम्मिलित परिवार की। पारस्परिक सौहार्द अपना अन्यथा अश्रान्त था, हाँ, सु-“वसुधैव कुटुम्बकम्,” सिद्धांत यह एकांत था॥ व्यभिचार व्यभिचार ऐसा बढ़ रहा है, देख लो, चाहे जहाँ; जैसा शहर, अनुरूप उसके एक 'चकला' है वहाँ! जाकर जहाँ हम धर्म-धन खोते सदैव सहर्ष हैं, होते पतित, कंगाल, रोगी सैकड़ों प्रतिवर्ष हैं॥ वह कौन धन है, दुर्व्यसन में हम जिसे खोते नहीं? उत्सव हमारे बार बंधुओं के बिना होते नहीं! सर्वत्र डोंड़ी पिट रही है अब उन्हीं के नाम की, मानों अधिष्ठात्री वही हैं अब यहाँ शुभ-काम की॥ था शेष लिखने के लिए क्या इस अभागे को यही? भगवान्! भारतवर्ष की कैसी अधोगति हो रही! यदि अंत हो जाता हमारा त्यागते ही शील के, तो आज टीके तो न लगते आर्यकुल को नील के॥ हा! वे तपोधन ऋषि कहाँ, संतान हम उनकी कहाँ? थी पुण्यभूमि प्रसिद्ध जो हा! आज ऐसा अघ वहाँ! बस दीप से कज्जल सदृश निज पूर्वजों से हम हुए, वे लोक में आलोक थे पर हम निविड़तर तम हुए॥ आडंबर यद्यपि उड़ा बैठे कमाई बाप-दादों की सभी, पर ऐंठ वह अपनी भला हम छोड़ सकते हैं कभी! भूषण बिके, ऋण भी बढ़े, पर धन्य सब कोई कहे; होली जले भीतर न क्यों, बाहर दिवाली ही रहे॥ गुण, ज्ञान, गौरव, मान, धन यद्यपि सभी कुछ खो चुके, गजभुक्त शून्य कपित्थ-सम निःसार अब हम हो चुके। पर हैं दबाते दीनता श्वेतांबरों में भूल से! संभव कभी है अग्नि को भी दाब रखना तूल से? दबती कहीं आडंबरों से बहुत दिन तक दीनता? मिलता नहीं फिर क़र्ज़ भी, होती यहाँ तक हीनता! उद्योग तो हम क्या करेंगे जो अपव्यय कर रहे, पर हाँ, हमारे हाथ से हैं दीन-दुर्बल मर रहे॥ अब आय तो है घट गई, पर व्यय हमारा बढ़ गया, तिस पर विदेशी सभ्यता का भूत हम पर चढ़ गया। ऋण-भार दिन-दिन बढ़ रहा है दब रहे हैं हम यहाँ, देना जिन्हें हो, कुछ नहीं भी पास उनके हैं कहाँ? मतिभ्रंश निज पूर्वजों का हास्य करना है हमारा खेल-सा, लगता हृदय में मेल हमको अति भयंकर शेल-सा। कोई कहे हित की उसे हम शत्रु समझेंगे वहीं, मधु मय अपथ्य अभीष्ट है, कटु पथ्य हमको प्रिय नहीं॥ रहते गुणों से तो सदा हम लोग कोसों दूर हैं, परलोक में अपनी प्रशंसा चाहते भरपूर हैं! हम तेल ढुलका कर दिए को हैं जलाना चाहते, काटे हुए तरु में मनोहर फल फलाना चाहते! गुणों की स्थिति बस भाग्य की ही भावना में रह गया उद्योग है, आजीविका है नौकरी में, इंद्रियों में भोग है। परतंत्रता में अभयता, भय राज-दंड-विधान में, व्यवसाय है बैरिस्टरी या डाक्टरी दूकान में॥ है चाटुकारी में चतुरता, कुशलता छल-छद्म में, पांडित्य पर निंदा-विषय में, शूरता है सद्म में! इस मौन में गंभीरता है, है बड़प्पन वेश में, जो बात और कहीं नहीं वह है हमारे देश में॥ कारीगरी है शेष अब साक्षी बनाने में यहाँ, है सत्य या विश्वास केवल कसम खाने में यहाँ। है धैर्य तर्क-वितर्क में, योग में ही तत्व है! अवशिष्ट दारोगागरी में सत्त्व और महत्त्व है! निज अर्थ-साधन में हमारी रह गई अब भक्ति है, है कर्म बस दासत्व में, अब स्वर्ण में ही शक्ति है। गौरव जताने में यहाँ उत्साह का लगता पता, बस बाद में है वाग्मिता, पर-अनुकरण में सभ्यता॥ निज धर्म के बलिदान ही में आज यज्ञ-विधान है, है ज्ञान नास्तिक-भाव में, अब नींद में ही ध्यान है। है योग पाशव-वृत्ति में ही, हाय! कैसी व्याधि है, बस मृत्यु में ही रह गई अब भारतीय समाधि है! स्वाधीनता निज धर्म-बंधन तोड़ देने में रही, आस्वाद आमिष में, सुरा में सरलता जाती कही! संगीत विषयालाप में, पर-दुःख में परिहास है, अश्लील वर्णन मात्र में ही अब कवित्व-निवास है! बहु वर्ण रूप उपाधियों में रह गया अब मान है; बहुधा अपव्यय में यहाँ अब दीख पड़ता दान है। बस व्यसन और विवाह में अवशिष्ट अब औदार्य है, हा दैव! हिंदू जाति का क्या अंत अब अनिवार्य है॥ है शील प्राय: पूर्वजों में, एकता अभिधान में, उपकार-जन्य कृतज्ञता है धन्यवाद प्रदान में। पोशाक में शुचिता रहौं, बस क्रोध में ही कांति है, अतिदीनता में नम्रता है, स्वप्न में सुख शांति है! दुर्गुण अब है यहाँ क्या? दंभ है, दौर्बल्य है, दृढ़-द्रोह है, आलस्य, ईर्ष्या, द्वेष है, मालिन्य है, मद, मोह है। है और क्या? दुर्बल जनों का सब तरह सिर काटना, पर साथ ही बलवान का है श्वान-सम पग चाटना॥ अपने लिए यदि दूसरों को दुःख देना धर्म हो, यदि ईश-नियमों का निरादर न्याय से सत्कर्म हो। निश्चेष्ट होकर बैठने में हो न पुण्यों की कमीं, तो भुक्ति के भागी हमीं हैं, मुक्ति के भागी हमीं॥ अभाव कर हैं हमारे किंतु अब कर्तृत्व हममें है नहीं, भारतीय परंतु हम बनते विदेशी सब कहीं! रखते हृदय है किंतु हम रखते न सहृदयता वहाँ, हम है मनुज पर हाय! अब मनुजत्व हम में है कहाँ? मन में नहीं है बल हमारे, तेज चेष्टा में नहीं, उद्योग में साहस नहीं, अपमान में न घृणा कहीं: दासत्व में न यहाँ अरुचि है, प्रेम में प्रियता नहीं; हो अंत में आशा कहाँ? कर्तव्य में क्रियता नहीं॥ उत्साह उन्नति का नहीं है, खेद अवनति का नहीं, है स्वल्प-सा भी ध्यान हमको समय की गति का नहीं। हम भीरुता के भक्त हैं, अति विदित विषयासक्त हैं, श्रम से सदैव विरक्त हैं, आलस्य में अनुरक्त हैं॥ विकृति हिंदू-समाज सभी गुणों से आज कैसा हीन है, वह क्षीण और मलीन है, आलस्य में ही लीन है। परतंत्र पद-पद पर विपद में पड़ रहा वह दीन है, जीवन-मरण उसका यहाँ अब एक दैवाधीन है॥ हा! आर्य-संतति आज कैसी अन्य और अशक्त है, पानी हुआ क्या अब हमारी नाड़ियों का रक्त है? संसार में हमने किया बस एक ही यह काम है, निज पूर्वजों का सब तरह हमने डुबाया नाम है! दुःशीलता दासी हमारी, मूर्खता महिषी सदा, है स्वार्थ सिंहासन हमारा मोह मंत्री सर्वदा। यों पाप-पुर में राज-पद हा! कौन पाना चाहता? चढ़ कर गधे पर कौन जन बैकुंठ जाना चाहता? भारत! तुम्हारा आज यह कैसा भयंकर वेष है? है और सब नि:शेष केवल नाम ही अब शेष है! त्रह्मत्व, राजन्यत्व युत वैश्यत्व भी सब नष्ट है, शुद्रत्व और पशुत्व ही अवशिष्ट है, हा! कष्ट है॥ हा दीनबंधो! क्या हमारा नाम ही मिट जाएगा, अब फिर कृपा-कण भी न क्या भारत तुम्हारा पाएगा? हा राम! हा! हा कृष्ण! हा! हा नाथ! हा! रक्षा करो; मनुजत्व दो हमको दयामय! दुःख-दुर्बलता हरो॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी वीरता

थे कर्म्मवीर कि मृत्यु का भी ध्यान कुछ धरते न थे,
थे युद्धवीर कि काल से भी हम कभी डरते न थे।
थे दानवीर कि देह का भी लोभ हम करते न थे,
थे धर्म्मवीर कि प्राण के भी मोह पर मरते न थे!
वे सूर्यवंशी, चंद्रवंशी वीर थे कैसे बली,
जो थे अकेले ही मचाते शत्रु-दल में खलबली।
होते न वे यदि चक्रवर्ती भूप दिग्विजयी यहाँ,
होते भला फिर 'अश्वमेघ' कि 'राजसूय' कहो कहाँ?
थे भीम-तुल्य महाबली, अर्जुन-समान महारथी,
श्रीकृष्ण लीलामय हुए थे आप जिनके सारथी।
उपदेश गीता का हमारा युद्ध का ही गीत है,
जीवन-समर में भी जनों को जो दिलाता जीत है॥
हम थे धनुर्वेदज्ञ जैसे और वैसा कौन था?
जो शब्द-वेधी बाण छोड़े शूर ऐसा कौन था?
हाँ, मत्स्य जैसे लक्ष्य-वेधक धीर-धन्वी थे यहाँ,
रिपु को गिरा कर अस्त्र पीछे लौट आते थे कहाँ?
थी चंचला की-सी चमक या शीघ्रता संधान की,
कृतहस्तता ऐसी कि गति थी हाथ में ही बाण की।
मुँह खोल कुत्ता भूँकने में बंद फिर जब तक करे,
भर जाए मुख तूणीर-सा, पर बात क्या जो वह मरे॥
जिसके समक्ष न एक भी विजयी सिकंदर की चली,
वह चंद्रगुप्त महीप था कैसा अपूर्व महाबली?
जिससे कि सिल्यूकस समर में हार तो था ले गया,
कांधार आदिक देश देकर निज सुता था दे गया!
जो एक सौ-सौ से लड़े ऐसे यहाँ पर वीर थे,
सम्मुख समर में शैल-सम रहते सदा हम धीर थे।
शंका न थी, जब-जब समर का साज भारत ने सजा,
जावा, सुमात्रा, चीन, लंका सब कहीं डंका बजा॥
मोहे विदेशी वीर भी जिस वीरता के गान से,
जिस पर बने हैं ग्रंथ 'रासो' और 'राजस्थान' से।
थी उष्णता वह उस हमारे शेष शोणित की अहा!
जो था महाभारत-समर में नष्ट होते बच रहा॥
रक्षक यवन साम्राज्य के भी राजपूत रहे यहाँ,
पड़ती कठिनता थी जहाँ जाते वही तो थे वहाँ।
नृप मान-कृत काबुल-विजय की बात सबको ज्ञात है,
दृढ़ता शिवाजी के निकट जयसिंह की विख्यात है॥
क्षत्राणियाँ भी शत्रुओं से हैं यहाँ निर्भय लड़ीं,
इतिहास में जिनकी कथाएँ हैं अनेक भरी पड़ीं।
देकर विदा युद्धार्थ पति को प्रेमवल्ली-सी खिली,
यदि फिर न भेंट हुई यहाँ तो स्वर्ग में झट जा मिलीं॥
वह सामरिक सिद्धांत भी औदार्य-पूर्ण पवित्र था,
थी युद्ध में ही शत्रुता, अन्यत्र बैरी मित्र था!
जय-लोभ में भी छल-कपट ने न पाता पास था,
प्रतिपक्षियों को भी हमारे सत्य का विश्वास था॥
पाते न थे जय युद्ध में ही हम सुयश के साथ में,
इंद्रिय तथा मन भी निरंतर थे हमारे हाथ में।
हम धम्म धनु से भक्ति-शर भी छोड़ने में सिद्ध थे,
अतएव अक्षर लक्ष्य भी करते निरंतर विद्ध थे॥
यद्यपि रहे हम वीर ऐसे-विश्व को जब कर सकें,
ऐसे नहीं थे जो समर में शक्र को भी डर सकें।
परराज्य को तो थे सदा हम तुच्छ तृण-सा मानते,
लाचार होकर ही कभी लंका-सदृश रण ठानते॥

भारत-भारती / अतीत खंड / ब्रिटिश राज्य

अन्यायियों का राज्य भी क्या अचल रह सकता कभी?
आखिर हुए अँगरेज शासक, राज्य है जिनका अभी।
संप्रति समुन्नति की सभी हैं प्राप्त सुविधाएँ यहाँ,
सब पथ खुले हैं, भय नहीं विचरो जहाँ चाहो वहाँ॥
अन्याय यवनों का हमें निज दोष से सहना पड़ा,
है किंतु नारायण अहा! न्यायी तथा सकरुण बड़ा!
देते हुए भी कर्म-फल हम पर हुई उसकी दया,
भेजा प्रसिद्ध उदार जिसने ब्रिटिश राज्य यहाँ नया॥
शासन किसी पर जाति का चाहे विवेक-विशिष्ट हो,
संभव नहीं है किंतु जो सर्वांश में वह इष्ट हो।
यह सत्य है, तो भी ब्रिटिश शासन हमें सम्मान्य है,
वह सुव्यवस्थित है तथा आशा-प्रपूर्ण, वरदान्य है॥
संप्रति सभी साधन हमें हैं सुलभ आत्मविकास के,
पथ, रेल, तार मिटा रहे हैं सब प्रयास प्रवास के।
प्राय: चिकित्सालय, मदरसे, डाकघर हैं सब कहीं,
बस, पास पैसा चाहिए फिर कुछ असुविधा है नहीं॥
सचमुच ब्रिटिश साम्राज्य ने हमको बहुत कुछ है दिया,
विज्ञान का वैभव दिखाया समय से परिचित किया।
उससे हमारी कीर्ति का भी हो रहा उपकार है,
बहु पूर्व-चिह्नों का हुआ वा हो रहा उद्धार है॥

भारत-भारती / भविष्यत् खंड / विश्वास

सौ सौ निराशाएँ रहें, विश्वास यह दृढ़ मूल है—
इस आत्म-लीला-भूमि को वह विभु न सकता भूल है।
अनुकूल अवसर पर दयामय फिर दया दिखलाएँगे,
वे दिन यहाँ फिर आएँगे, फिर आएँगे, फिर आएँगे॥

भारत-भारती / अतीत खंड / शक्ति का उपयोग

अन्याय-अत्याचार करना तो किसी पर दूर है,
जिसका किया हमने किया उपकार ही भरपूर है।
पर पीड़ितों का त्राण कर जो दुःख हम खोते नहीं,
तो आज हिंदुस्तान में ये पारसी होते नहीं॥
जाकर कहाँ हमने जलाई आग युद्ध-अशांति की?
थे घूमते सर्वत्र पर हमने कहाँ पर क्रांति की?
करते वही थे हम कि जिससे शांति सुख पावें सभी,
स्वार्थान्ध होकर, पर-हित-व्रत छोड़ सकते थे कभी?
भूले हुओं को पथ दिखाना यह हमारा कार्य्य था,
राजत्व क्या है, जगत हमको मानता आचार्य था।
आतंक से पाया हुआ भी मान कोई मान है?
खिंच जाय जिस पर मन स्वयं सच्चा वही बलवान है॥

भारत-भारती / अतीत खंड / मङ्गलाचरण

मानस भवन में जन जिसकी उतारें आरती
भगवान! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।
हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती है भवगते!
सीतापते! सीतापते!! गीतामते! गीतामते!!॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी सभ्यता

शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे।
संसार को पहले हम ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की॥
'हाँ' और 'ना' भी अन्य जन करना न जब थे जानते,
थे ईश के आदेश तब हम वेदमंत्र बखानते।
जब थे दिगंबर रूप में वे जंगलों में घूमते,
प्रासाद-केतन-पट हमारे चंद्र को थे चूमते॥
जब मांस-भक्षण पर वनों में अन्य जन थे जी रहे,
कृषि-कार्य्य करके आर्य्य तब शुचि सोमरस थे पी रहे।
मिलता न यह सात्त्विक सु-भोजन यदि शुभविष्कार का,
तो पार क्या रहता जगत में उस विकृत व्यापार का?
था गर्व नित्य निजत्व का पर दंभ से हम दूर थे,
थे धर्म-भीरु परंतु हम सब काल सच्चे शूर थे।
सब लोक-सुख हम भोगते थे बांधवों के साथ में,
पर पारलौकिक-सिद्धि भी रखते सदा थे हाथ में॥
थे ज्यों समुन्नति के सुखद उत्तुंग श्रृंगों पर चढ़े,
त्यों ही विशुद्ध विनीतता में हम सभी से थे बढ़े।
भव-सिंधु तरने के लिए आत्मावलंबी धीर ज्यों,
परमार्थ-साधन हेतु थे आतुर परंतु गभीर त्यों॥
यद्यपि सदा परमार्थ ही में स्वार्थ थे हम मानते,
पर कर्म से फल-कामना करना न हम थे जानते।
विख्यात जीवन-व्रत हमारा लोक-हित एकांत था,
'आत्मा अमर है, देह नश्वर,' यह अटल सिद्धांत था॥
हम दूसरों के दुःख को थे दुःख अपना मानते,
हम मानते कैसे नहीं, जब थे सदा यह जानते-
'जो ईश कर्त्ता है हमारा दूसरों का भी वही,
हैं कर्म्म भिन्न परंतु सबमें तत्त्व-समता हो रही॥
बिकते गुलाम न थे यहाँ, हममें न ऐसी रीति थी,
सेवक-जनों पर भी हमारी नित्य रहती प्रीति थी।
वह नीति ऐसी थी कि चाहे हम कभी भूखे रहें,
पर बात क्या, जीते हमारे जो कभी वे दुख सहें॥
अपने लिए आज हम क्यों जी न सकते हों यहाँ,
पर दूसरों ही के लिए जीते जहाँ थे हम जहाँ।
यद्यपि जगत में हम स्वयं विख्यात जीवन-मुक्त थे,
करते तदपि जीवन्मृतों को दिव्य जीवन-युक्त थे॥
थी दूसरों की आपदाहरणार्थ अपनी संपदा,
कहते नहीं थे किंतु हम करके दिखाते थे सदा।
नीचे गिरे को प्रेम से ऊँचा चढ़ाते थे हमीं,
पीछे रहे को घूम कर आगे बढ़ाते थे हमीं॥
संयम-नियम-पूर्वक प्रथम बल और विद्या प्राप्त की,
होकर गृही फिर लोक की कर्तव्य रीति समाप्त की।
हम अंत में भव-बंधनों को थे सदा को तोड़ते,
आदर्श भावी सृष्टिहित थे मुक्ति-पथ में छोड़ते॥
हमको विदित थे तत्त्व सारे नाश और विकाश के,
कोई रहस्य छिपे न थे पृथ्वी तथा आकाश के!
थे जो हज़ारों वर्ष पहले जिस तरह हमने कहे,
विज्ञान-वेत्ता अब वही सिद्धांत निश्चित कर रहे॥
है हानिकारक नीति निश्चय निकटकुल में ब्याह की,
है लाभकारक रीति शव के गाड़ने से दाह की”।
यूरोप के विद्वान भी अब इस तरह कहने लगे!
देखो कि उलटे स्रोत सीधे किस तरह बहने लगे!॥
निज कार्य्य प्रभु की प्रेरणा ही थे नहीं हम जानते,
प्रत्युत उसे प्रभु का किया ही थे सदा हम मानते।
भय था हमें तो बस उसी का और हम किससे डरे?
हाँ, जब मरे हम तब उसी के प्रेम से विह्वल मरे॥
था कौन ईश्वर के सिवा जिसको हमारा सिर झुके?
हाँ, कौन ऐसा स्थान था जिसमें हमारी गति रुके?
सारी धरा तो थी धरा ही, सिंधु भी बँधवा दिया;
आकाश में भी आत्म-बल से सहज हो विचरण किया॥
हम बाह्य उन्नति पर कभी मरते न थे संसार में,
बस मग्न थे अंतर्जगत के अमृत-पारावार में।
जड़ से हमें क्या, जब कि हम थे नित्य चेतन से मिले,
हैं दीप उनके निकट क्या जो पद्म दिनकर से खिले?
रौंदी हुई है सब हमारी भूमि इस संसार की,
फैला दिया व्यापार, कर दी धूम धर्म प्रचार की।
कप्तान 'कोलम्बस' कहाँ था उस समय, कोई कहे?
जब के सु-चिह्न अमेरिका में हैं हमारे मिल रहे॥
हम देखते फिरता हुआ जोड़ा न जो दिन-रात का-
करते कहीं वर्णन भला फिर किस तरह इस बात का?
हम वर-वधू की भाँवरों से साम्य उसका कर चुके,
अब खोजने जाकर जिसे कितने विदेशी मर चुके!
आरंभ जब जो कुछ किया हमने उसे पूरा किया,
था जो असंभव भी उसे संभव हुआ दिखला दिया।
कहना हमारा बस यही था विघ्न और विराम से-
करके हटेंगे हम कि अब मर के हटेंगे काम से॥
यह ठीक है, पश्चिम बहुत ही कर रहा उत्कर्ष है,
पर पूर्व-गुरु उसका यही पुरु वृद्ध भारतवर्ष है।
जाकर विवेकानंद-सम कुछ साधु जन इस देश से,
करते उसे कृतकृत्य हैं अभी अतुल उपदेश से॥
वे जातियाँ जो आज उन्नति-मार्ग में हैं बढ़ रहीं,
सांसारिकी स्वाधीनता की सीढ़ियों पर चढ़ रहीं।
यह तो कहें, यह शक्ति उनको प्राप्त कब कैसे हुई?
यह भी कहें वे दार्शनिक चर्चा वहाँ ऐसे हुई॥
यूनान ही कह दे कि वह ज्ञानी-गुणी कब था हुआ?
कहना न होगा, हिंदुओं का शिष्य वह जब था हुआ।
हमसे अलौकिक ज्ञान का आलोक यदि पाता नहीं,
तो वह अरब-यूरोप का शिक्षक कहा जाता नहीं॥
संसार भर में आज जिसका छा रहा आतंक है,
नीचा दिखा कर रूस को भी जो हुआ निःशंक है।
जयपाणि जो वर्द्धक हुआ है एशिया के हर्ष का,
है शिष्य वह जापान भी इस वृद्ध भारतवर्ष का॥
यूरोप भी जो बन रहा है आज कल मार्मिक मना,
यह तो कहे उसके खुदा का पुत्र कब धार्म्मिक बना?
था हिंदुओं का शिष्य ईसा, यह पता भी है चला,
ईसाइयों का धर्म्म भी है बौद्ध साँचे में ढला॥
संसार में जो कुछ जहाँ फैला प्रकाश-विकास है,
इस जाति की ही ज्योति का उसमें प्रधानाभास है
करते न उन्नति-पथ परिष्कृत आर्य्य जो पहले कहीं,
संदेह है, तो विश्व में विज्ञान बढ़ता या नहीं॥
अनमोल आविष्कार यद्यपि हैं अनेकों कर चुके,
निज नीति, शिक्षा, सभ्यता की सिद्धि का दम भर चुके।
पर पीटते हैं सिर विदेशी आज भी जिस शांति को,
थे हम कभी फैला चुके उसकी अलौकिक कांति को॥
है आज पश्चिम में प्रभा जो पूर्व से ही है गई,
हरते अँधेरा यदि न हम होती न खोज नई-नई।
इस बात की साक्षी प्रकृति भी है अभी तक सब कहीं,
होता प्रभाकर पूर्व से ही उदित, पश्चिम से नहीं॥
अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रसी संवत् यहाँ,
है किंतु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ?
ईसा, मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता,
कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता?॥
सर्वत्र अनुपम एकता का इस प्रकार प्रभाव था-
थी एक भाषा, एक मन था, एक सबका भाव था।
संपूर्ण भारतवर्ष मानों एक नगरी थी बड़ी,
पुर और ग्राम-समूह-संस्था थी मुहल्लों की लड़ी॥
हैं वायु-मंडल में हमारे गीत अब भी गूँजते,
निर्झर, नदी, सागर, नगर, गिरि, वन सभी हैं कूजते।
देखो, हमारा विश्व में कोई नहीं उपमान था,
नरदेव थे हम, और भारत? देव-लोक समान था॥

भारत-भारती / अतीत खंड / आर्य-स्त्रियाँ

केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,
गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
दांपत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में॥
निज स्वामियों के कार्य में सम भाग जो लेतीं न वे,
अनुरागपूर्वक योग जो उसमें सदा देतीं न वे,
तो फिर कहातीं किस तरह 'अर्द्धांगिनी' सुकुमारियाँ?
तात्पर्य यह–अनुरूप ही थीं नरवरों के नारियाँ॥
हारे मनोहत पुत्र को फिर बल जिन्होंने था दिया,
रहते जिन्होंने नव-वधू के सुत-विरह स्वीकृत किया।
द्विज-पुत्र-रक्षा-हित जिन्होंने सुत-मरण सोचा नहीं,
विदुला, सुमित्रा और कुंती-तुल्य माताएँ रहीं॥
बदली न जो, अल्पायु वर भी वर लिया सो वर लिया;
मुनि को सता कर भूल से, जिसने उजित प्रतिफल दिया।
सेवार्थ जिसने रोगियों के था विराम लिया नहीं,
थीं धन्य सावित्री, सुकन्या और अंशुमती यहीं॥
मूँदे रही दोनों नयन आमरण 'गांधारी' जहाँ,
पति-संग 'दमयंती' स्वयं वन-वन फिरी मारी जहाँ।
यों ही जहाँ की नारियों ने धर्म का पालन किया,
आर्य क्या फिर ईश ने जो दिव्यबल उनको दिया॥
अबला जनों का आत्म-बल संसार में वह था नया,
चाहा उन्होंने तो अधिक क्या, रवि-उदय भी रुक गया!
जिस क्षुब्ध मुनि की दृष्टि से जल कर विहग भू पर गिरा,
वह भी सती के तेज सम्मुख रह गया निष्प्रभ निरा॥

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