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कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan -3

होरी खेलौंगी, घर आये चिदानंद कन्त

(राग धमाल सारंग)
होरी खेलौंगी, घर आये चिदानंद कन्त ।।टेक ।।
शिशिर मिथ्यात गयो आई अब, कालकी लब्धि बसन्त ।।होरी. ।।
पिय सँग खेलनको हम सखियो! तरसीं काल अनन्त ।
भाग फिरे अब फाग रचानों, आयो बिरहको अन्त ।।१ ।।होरी. ।।
सरधा गागरमें रुचिरूपी, केसर घोरि तुरन्त ।
आनँद नीर उमंग पिचकारी, छोड़ो नीकी भन्त ।।२ ।।होरी. ।।
आज वियोग कुमति सौतनिकै, मेरे हरष महन्त ।
`भूधर' धनि यह दिन दुर्लभ अति, सुमति सखी विहसन्त ।।३ ।।होरी. ।।

कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan -2

अब मेरे समकित सावन आयो

(राग मलार)
अब मेरे समकित सावन आयो ।।टेक ।।
बीति कुरीति मिथ्या मति ग्रीषम, पावस सहज सुहायो ।।
अनुभव दामिनि दमकन लागी, सुरति घटा घन छायो ।
बोलै विमल विवेक पपीहा, सुमति सुहागिनि भायो ।।१ ।।अब मेरे. ।।
गुरुधुनि गरज सुनत सुख उपजै, मोर सुमन विहसायो ।
साधक भाव अंकूर उठे बहु, जित तित हरष सवायो ।।२ ।।अब मेरे. ।।
भूल धूल कहिं भूल न सूझत, समरस जल झर लायो ।
`भूधर' को निकसै अब बाहिर, निज निरचू घर पायो ।।३ ।।अब मेरे.

सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया

(राग सोरठ)
सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया ।।टेक ।।
टुक विश्वास किया जिन तेरा, सो मूरख पछताया ।।
आपा तनक दिखाय बीज१ ज्यों, मूढमती ललचाया ।
करि मद अंध धर्म हर लीनौं, अन्त नरक पहुँचाया ।।१ ।।सुनि. ।।
केते कंत किये तैं कुलटा, तो भी मन न अघाया ।
किसही सौं नहिं प्रीति निबाही; वह तजि और लुभाया ।।२ ।।सुनि. ।।
`भूधर' छलत फिरै यह सबकों, भौंदू करि जग पाया ।
जो इस ठगनी कों ठग बैठे, मैं तिनको सिर नाया ।।३ ।।सुनि. ।।

अज्ञानी पाप धतूरा न बोय

(राग सोरठ)
अज्ञानी पाप धतूरा न बोय ।।टेक ।।
फल चाखन की बार भरै दृग, मरि है मूरख रोय ।।
किंचित् विषयनि सुख के कारण, दुर्लभ देह न खोय ।
ऐसा अवसर फिर न मिलैगा, इस नींदड़ी न सोय ।।१ ।।अज्ञानी. ।।
इस विरियां मैं धर्म-कल्प-तरु, सींचत स्याने लोय ।
तू विष बोवन लागत तो सम, और अभागा कोय ।।२ ।।अज्ञानी. ।।
जो जग में दुखदायक बेरस, इसही के फल सोय ।
यों मन `भूधर' जानिकै भाई, फिर क्यों भोंदू होय ।।३ ।।अज्ञानी. ।।

ऐसी समझके सिर धूल

ऐसी समझके सिर धूल ।।टेक ।।
धरम उपजन हेत हिंसा, आचरैं अघमूल ।।
छके मत-मद पान पीके रहे मनमें फूल ।
आम चाखन चहैं भोंदू, बोय पेड़ बबूल ।।१ ।।ऐसी. ।।
देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल ।
धर्म नगकी परख नाहीं, भ्रम हिंडोले झूल ।।२ ।।ऐसी. ।।
लाभ कारन रतन विणजै, परखको नहिं सूल ।
करत इहि विधि वणिज `भूधर', विनस जै है मूल ।।३ ।।ऐसी. ।।

चित्त! चेतनकी यह विरियां रे

(राग सोरठ)
चित्त! चेतनकी यह विरियां रे ।।टेक ।।
उत्तम जनम सुतन तरूनापौ, सुकृत बेल फल फरियां रे ।।
लहि सत-संगतिसौं सब समझी, करनी खोटी खरियां रे ।
सुहित संभाल शिथिलता तजिदैं, जाहैं बेली झरियां रे ।।१ ।।चित. ।।
दल बल चहल महल रूपेका, अर कंचनकी कलियां रे ।
ऐसी विभव बढ़ी कै बढ़ि है, तेरी गरज क्या सरियां रे ।।२ ।।चित. ।।
खोय न वीर विषय खल साटैं, ये क्रोड की घरियां रे ।
तोरि न तनक तगा हित `भूधर' मुकताफलकी लरियां रे ।।३ ।।चित. ।।

गरव नहिं कीजै रे, ऐ नर

(राग ख्याल)
गरव नहिं कीजै रे, ऐ नर निपट गंवार ।।टेक ।।
झूठी काया झूठी माया, छाया ज्यों लखि लीजै रे ।।१ ।।गरव. ।।
कै छिन सांझ सुहागरु जोबन, कै दिन जगमें जीजै रे ।।२ ।।गरव. ।।
बेगा चेत विलम्ब तजो नर, बंध बढ़ै थिति छीजै रे ।।३ ।।गरव. ।।
`भूधर' पलपल हो है भारी, ज्यों ज्यों कमरी भीजै रे ।।३ ।।गरव. ।।

निपट गंवार बीरा! थारी बान बुरी परी रे, बरज्यो मानत नाहिं

(राग सोरठ)
बीरा! थारी बान बुरी परी रे, बरज्यो मानत नाहिं ।।टेक ।।
तू हटसौं ऐसै रमै रे, दीवे पड़त पतंग ।।१ ।।बीरा. ।।
ये सुख हैं दिन दोयकै रे, फिर दु:ख की सन्तान ।
करै कुहाड़ी लेइकै रे, मति मारै पग जान ।।२ ।।बीरा. ।।
तनक न संकट सहि सकै रे! छिनमें होय अधीर ।
नरक विपति बहु दोहली रे, कैसे भरि है वीर ।।३ ।।बीरा. ।।
भव सुपना हो जायेगा रे, करनी रहेगी निदान ।
`भूधर' फिर पछतायगा रे, अबही समझि अजान ।।४ ।।बीरा. ।।

मन हंस! हमारी लै शिक्षा हितकारी!

(राग काफी)
मन हंस! हमारी लै शिक्षा हितकारी!
श्रीभगवान चरन पिंजरे वसि, तजि विषयनि की यारी ।।
कुमति कागलीसौं मति राचो, ना वह जात तिहारी ।
कीजै प्रीत सुमति हंसीसौं, बुध हंसन की प्यारी ।।१ ।।मन. ।।
काहेको सेवत भव झीलर, दुखजलपूरित खारी ।
निज बल पंख पसारि उड़ो किन, हो शिव सरवर चारी ।।२ ।।मन. ।।
गुरुके वचन विमल मोती चुन, क्यों निज वान विसारी ।
ह्वै है सुखी सीख सुधि राखें, `भूधर' भूलैं ख्वारी ।।३ ।।मन. ।।

सो मत सांचो है मन मेरे

(राग धनासरी)
सो मत सांचो है मन मेरे ।
जो अनादि सर्वज्ञप्ररूपित, रागादिक बिन जे रे ।।
पुरुष प्रमान प्रमान वचन तिस, कल्पित जान अने रे ।
राग दोष दूषित तिन बायक, सांचे हैं हित तेरे ।।१ ।।सो मत. ।।
देव अदोष धर्म हिंसा बिन, लोभ बिना गुरु वे रे ।
आदि अन्त अविरोधी आगम, चार रतन जहँ ये रे ।।२ ।।सो मत. ।।
जगत भर्यो पाखंड परख बिन, खाइ खता बहुतेरे ।
`भूधर' करि निज सुबुद्धि कसौटी, धर्म कनक कसि ले रे ।।३ ।।सो मत. ।।

मन मूरख पंथी, उस मारग मति जाय रे

(राग ख्याल)
मन मूरख पंथी, उस मारग मति जाय रे ।।टेक ।।
कामिनि तन कांतार जहाँ है, कुच परवत दुखदाय रे ।।
काम किरात बसै तिह थानक, सरवस लेत छिनाय रे ।
खाय खता कीचक से बैठे, अरु रावनसे राय रे ।।१ ।।मन. ।।
और अनेक लुटे इस पैंडे, वरनैं कौन बढ़ाय रे ।
वरजत हों वरज्यौ रह भाई, जानि दगा मति खाय रे ।।२ ।।मन. ।।
सुगुरु दयाल दया करि `भूधर', सीख कहत समझाय रे ।
आगै जो भावै करि सोई, दीनी बात जताय रे ।।३ ।।मन. ।।

सब विधि करन उतावला, सुमरनकौं सीरा

(राग काफी)
सब विधि करन उतावला, सुमरनकौं सीरा ।।टेक ।।
सुख चाहै संसार में, यों होय न नीरा ।।
जैसे कर्म कमावे है, सो ही फल वीरा!
आम न लागै आकके, नग होय न हीरा ।।१ ।।सब विधि. ।।
जैसा विषयनिकों चहै न रहै छिन धीरा ।
त्यों `भूधर' प्रभुकों जपै, पहुँचे भव तीरा ।।२ ।।सब विधि. ।।

आयो रे बुढ़ापो मानी, सुधि बुधि बिसरानी

(राग बंगला)
आयो रे बुढ़ापो मानी, सुधि बुधि बिसरानी ।।टेक ।।
श्रवन की शक्ति घटी, चाल चालै अटपटी,
देह लटी, भूख घटी, लोचन झरत पानी ।।१ ।।आया रे. ।।
दांतनकी पंक्ति टूटी, हाड़नकी संधि छूटी,
कायाकी नगरि लूटी, जात नहिं पहिचानी ।।२ ।।आया रे. ।।
बालोंने वरन फेरा, रोगों ने शरीर घेरा,
पुत्रहू न आवे नेरा, औरोंकी कहा कहानी ।।३ ।।आया रे. ।।
`भूधर' समुझि अब, स्वहित करैगो कब,
यह गति ह्वै है जब, तब पिछतै हैं प्राणी ।।४ ।।आया रे. ।।

चरखा चलता नाहीं (रे) चरखा हुआ पुराना (वे)

(राग आसावरी)
चरखा चलता नाहीं (रे) चरखा हुआ पुराना (वे) ।।
पग खूंटे दो हालन लागे, उर मदरा खखराना ।
छीदी हुई पांखड़ी पांसू, फिरै नहीं मनमाना ।।१ ।।
रसना तकली ने बल खाया, सो अब कैसै खूटै ।
शब्द-सूत सूधा नहिं निकसे, घड़ी-घड़ी पल-पल टूटै ।।२ ।।
आयु मालका नहीं भरोसा, अंग चलाचल सारे ।
रोज इलाज मरम्मत चाहे, वैद्य बढ़ई हारे ।।३ ।।
नया चरखला रंगा-चंगा, सबका चित्त चुरावै ।
पलटा वरन गये गुन अगले, अब देखैं नहिं भावै ।।४ ।।
मोटा मही कातकर भाई!, कर अपना सुरझेरा ।
अंत आग में इंर्धन होगा, `भूधर' समझ सवेरा ।।५ ।।

काया गागरि, जोझरी, तुम देखो चतुर विचार हो

(राग श्रीगौरी)
काया गागरि, जोझरी, तुम देखो चतुर विचार हो ।।टेक ।।
जैसे कुल्हिया कांचकी, जाके विनसत नाहीं वार हो ।।
मांसमयी माटी लई अरु, सानी रुधिर लगाय हो ।
कीन्हीं करम कुम्हारने, जासों काहूकी न वसाय हो ।।१ ।।काया. ।।
और कथा याकी सुनौं, यामैं अध उरध दश ठेह हो ।
जीव सलिल तहाँ थंभ रह्यौ भाई, अद्भुत अचरज येह हो ।।२ ।।काया. ।।
यासौं ममत निवारकैं, नित रहिये प्रभु अनुकूल हो ।
`भूधर' ऐसे ख्याल का भाई, पलक भरोसा भूल हो ।।३ ।।काया. ।।

गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में

(राग भैरवी)
गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में ।।
चोकस करत रहत है नाहीं, ज्यों अंजुलि जल झरती में ।
तैसे तेरी आयु घटत है, बचै न बिरिया मरती में ।।१ ।।
कंठ दबै तब नाहिं बनेगो, काज बनाले सरती में ।
फिर पछताये कुछ नहिं होवै, कूप खुदै नहीं जरती में ।।२ ।।
मानुष भव तेरा श्रावक कुल, यह कठिन मिला इस धरती में ।
`भूधर' भवदधि चढ़ नर उतरो, समकित नवका तरती में ।।३ ।।

जगत जन जूवा हारि चले

(राग विहाग)
जगत जन जूवा हारि चले ।।टेक ।।
काम कुटिल संग बाजी मांडी, उन करि कपट छले ।।जगत. ।।
चार कषायमयी जहँ चौपरि, पासे जोग रले ।
इस सरवस उत कामिनी कौड़ी, इह विधि झटक चले ।।१ ।।जगत. ।।
कूर खिलार विचार न कीन्हों, ह्वै है ख्वार भले ।
बिना विवेक मनोरथ काके, `भूधर' सफल फले ।।२ ।।जगत. ।।

जग में श्रद्धानी जीव जीवन मुकत हैंगे

(राग बङ्गाला)
जगमें श्रद्धानी जीव जीवन मुकत हैंगे ।।टेक ।।
देव गुरु सांचे मानैं, सांचो धर्म हिये आनैं ।
ग्रन्थ ते ही सांचे जानैं, जे जिन उकत हैंगे ।।१ ।।जगमें. ।।
जीवनकी दया पालैं, झूठ तजि चोरी टालें ।
परनारी भालैं नैंन जिनके लुकत हैंगे ।।२ ।।जगमें. ।।
जिय में सन्तोष धारैं, हियैं समता विचारैं ।
आगैंको न बंध पारैं, पाछैंसौं चुकत हैंगे ।।३ ।।जगमें. ।।
बाहिज क्रिया आराधैं, अन्दर सरूप साधैं ।
`भूधर' ते मुक्त लाधैं, कहूँ न रुकत हैंगे ।।४ ।।जगमें. ।।

वे कोई अजब तमासा, देख्या बीच जहान वे, जोर तमासा सुपनेका-सा

जोर तमासा सुपनेका-सा
वे कोई अजब तमासा, देख्या बीच जहान वे, जोर तमासा सुपनेका-सा
एकौंके घर मंगल गावैं, पूरी मनकी आसा ।
एक वियोग भरे बहु रोवैं, भरि भरि नैन निरासा ।।१ ।।वे कोई.।।
तेज तुरंगनिपै चढ़ि चलते, पहिरैं मलमल खासा ।
रंक भये नागे अति डोलैं, ना कोइ देय दिलासा ।।२ ।।वे कोई. ।।
तरकैं राज तखत पर बैठा, था खुश वक्त खुलासा ।
ठीक दुपहरी मुद्दत आई, जंगल कीना वासा ।।३ ।।वे कोई. ।।
तन धन अथिर निहायत जगमें, पानी माहिं पतासा ।
`भूधर' इनका गरब करैं जे, धिक तिनका जनमासा ।।४ ।।वे कोई. ।।

सुनि सुजान! पाँचों रिपु वश करि

(राग कल्याण)
सुनि सुजान! पांचों रिपु वश करि, सुहित करन असमर्थ अवश करि ।
जैसै जड़ खखार का कीड़ा, सुहित सम्हाल सकैं नहिं फंस करि ।।
पांचन को मुखिया मन चंचल, पहले ताहि पकर, रस कस करि ।
समझ देखि नायक के जीतै, जै है भाजि सहज सब लशकरि ।।१ ।।
इंद्रियलीन जनम सब खोयो, बाकी चल्यो जात है खस करि ।
`भूधर' सीख मान सतगुरुकी, इनसों प्रीति तोरि अब वश करि ।।२ ।।

अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी

(राग सोरठ)
अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी । अलख अमूरति की जोरी ।।अहो. ।।
इतमैं आतम राम रंगीले, उतमैं सुबुद्धि किसोरी ।
या कै ज्ञान सखा संग सुन्दर, वाकै संग समता गोरी ।।१ ।।अहो. ।।
सुचि मन सलिल दया रस केसरि, उदै कलश में घोरी ।
सुधी समझि सरल पिचकारी, सखिय प्यारी भरि भरि छोरी ।।२ ।।अहो. ।।
सत गुरु सीख तान धुरपद की, गावत होरा होरी ।
पूरब बंध अबीर उड़ावत, दान गुलाल भर झोरी ।।३ ।।अहो. ।।
`भूधर' आजि बड़े भागिन, सुमति सुहागिन मोरी ।
सो ही नारि सुलक्षिनी जगमैं, जासौं पतिनै रति जोरी ।।४ ।।अहो. ।।

कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan

लगी लो नाभिनंदनसों

(राग सोरठ)
लगी लो नाभिनंदन सों ।
जपत जेम चकोर चकई, चन्द भरता को ।।
जाउ तन-धन जाउ जोवन, प्रान जाउ न क्यों ।
एक प्रभु की भक्ति मेरे, रहो ज्यों की त्यों।।१ ।।
और देव अनेक सेवे, कछु न पायो हौं ।
ज्ञान खोयो गाँठिको, धन करत कुवनिज ज्यों ।।२ ।।
पुत्र-मित्र कलत्र ये सब, सगे अपनी गों ।
नरक कूप उद्धरन श्रीजिन, समझ `भूधर' यों।।३ ।।

भगवन्त भजन क्यों भूला रे

== भगवन्त भजन क्यों भूला रे ==
(राग सोरठ)

भगवन्त भजन क्यों भूला रे ।।टेक ।।
यह संसार रैन का सुपना, तन धन वारि बबूला रे ।।
इस जीवन का कौन भरोसा, पावक में तृण-पूलारे ।
काल कुदार लिये सिर ठाड़ा, क्या समझै मन फूला रे ।।१ ।।
स्वारथ साधै पाँच पाँव तू, परमारथ को लूला रे ।
कहु कैसे सुख पैहै प्राणी, काम करै दुखमूला रे ।।२ ।।
मोह पिशाच छल्यो मति मारै, निज कर कंध वसूला रे ।
भज श्रीराजमतीवर `भूधर', दो दुरमति सिर धूला रे ।।३ ।।

जग में जीवन थोरा, रे अज्ञानी जागि

(राग ख्याल)

जग में जीवन थोरा, रे अज्ञानी जागि ।।टेक ।।
जनम ताड़ तरुतैं पड़ै, फल संसारी जीव ।
मौत महीमैं आय हैं, और न ठौर सदीव ।।१ ।।जगमें .।।
गिर-सिर दिवला जोइया, चहुंदिशि बाजै पौन ।
बलत अचंभा मानिया, बुझत अचंभा कौन ।।२ ।।जगमें .।।
जो छिन जाय सो आयुमैं, निशि दिन ढूकै काल ।
बाँधि सकै तो है भला, पानी पहिली पाल ।।३ ।।जगमें .।।
मनुष देह दुर्लभ्य है, मति चूकै यह दाव ।
भूधर राजुल कंतकी, शरण सिताबी आव ।।४ ।।जगमें .।।

मेरे मन सूवा, जिनपद पींजरे वसि, यार लाव न बार रे

(राग सोरठ)

मेरे मन सूवा, जिनपद पिंजरे वसि, यार लाव न बार रे ।।टेक ।।
संसार सेमलवृक्ष सेवत, गयो काल अपार रे ।
विषय फल तिस तोड़ि चाखे, कहा देख्यौ सार रे ।।१ ।।
तू क्यों निचिन्तो सदा तोकों, तकत काल मंजार रे ।
दाबै अचानक आन तब तुझे, कौन लेय उबार रे ।।२ ।।
तू फंस्यो कर्म कुफन्द भाई, छूटै कौन प्रकार रे ।
तैं मोह-पंछी-वधक-विद्या, लखी नाहिं गंवार रे ।।३ ।।
है अजौं एक उपाय `भूधर', छूटै जो नर धार रे ।
रटि नाम राजुल-रमन को, पशुबंध छोड़न हार रे ।।४ ।।

अरे! हाँ चेतो रे भाई

(राग ख्याल)

अरे! हाँ चेतो रे भाई ।।
मानुष देह लही दुलही, सुघरी उघरी सतसंगति पाई।।१ ।।
जे करनी वरनी करनी नहिं, ते समझी करनी समझाई ।।२ ।।
यों शुभ थान जग्यो उर ज्ञान, विषै विषपान तृषा न बुझाई ।।३ ।।
पारस पाय सुधारस `भूधर', भीखके मांहि सु लाज न आई ।।४ ।।

जपि माला जिनवर नामकी

(राग सारङ्ग)
जपि माला जिनवर नाम की ।
भजन सुधारससों नहिं धोई, सो रसना किस काम की ।।जपि. ।।
सुमरन सार और सब मिथ्या, पटतर धूंवा नाम की ।
विषम कमान समान विषय सुख, काय कोथली चाम की ।।१ ।।जपि. ।।
जैसे चित्र-नाग के मांथै, थिर मूरति चित्राम की ।
चित आरूढ़ करो प्रभु ऐसे, खोय गुंडी परिनाम की ।।२ ।।जपि. ।।
कर्म बैरि अहनिशि छल जोवैं, सुधि न परत पल जाम की ।
`भूधर' कैसैं बनत विसारैं, रटना पूरन राम की ।।३ ।।जपि. ।।

थाँकी कथनी म्हानै

(राग ख्याल)

थांकी कथनी म्हानै प्यारी लगै जी, प्यारी लगै म्हारी भूल भगै जी ।।
तुम हित हांक बिना हो श्रीगुरु, सूतो जियरो कांई जगै जी ।।
मोहनिधूलि मेलि म्हारे मांथै, तीन रतन म्हारा मोह ठगै जी ।
तुम पद ढोकत सीस झरी रज, अब ठगको कर नाहिं वगै जी ।।१ ।।
टूट्यो चिर मिथ्यात महाज्वर, भागां मिल गया वैद्य मगै जी ।
अन्तर अरुचि मिटी मम आतम, अब अपने निजदर्व पगै जी ।।२ ।।
भव वन भ्रमत बढ़ी तिसना तिस, क्योंहि बुझै नहिं हियरा दगै जी ।
`भूधर' गुरु उपदेशामृतरस, शान्तमई आनंद उमगै जी ।।३ ।।

भवि देखि छबी भगवान की

(राग सारङ्ग)

भवि देखि छबी भगवान की ।।टेक ।।
सुन्दर सहज सोम आनन्दमय, दाता परम कल्यानकी ।।भवि. ।।
नासादृष्टि मुदित मुखवारिज, सीमा सब उपमान की ।
अंग अडोल अचल आसन दिढ़, वही दशा निज ध्यान की ।।१ ।।भवि. ।।
इस जोगासन जोगरीतिसौं, सिद्धि भई शिवथानकी ।
ऐसें प्रगट दिखावै मारग, मुद्रा धात पखान की ।।२ ।।भवि. ।।
जिस देखें देखन अभिलाषा, रहत न रंचक आनकी ।
तृपत होत `भूधर' जो अब ये, अंजुलि अम्रतपान की ।।३ ।।भवि. ।।

जिनराज चरन मन मति बिसरै

जिनराज चरन मन मति बिसरै ।।टेक ।।
को जानैं किहिंवार कालकी, धार अचानक आनि परै ।।
देखत दुख भजि जाहिं दशौं दिश पूजन पातकपुंज गिरै ।
इस संसार क्षारसागरसौं, और न कोई पार करै ।।१ ।।
इक चित ध्यावत वांछित पावत, आवत मंगल विघन टरै ।
मोहनि धूलि परी माँथे चिर, सिर नावत ततकाल झरै ।।२ ।।
तबलौं भजन संवार सयानैं, जबलौं कफ नहिं कंठ अरै ।
अगनि प्रवेश भयो घर `भूधर', खोदत कूप न काज सरै ।।३ ।।

जिनराज ना विसारो, मति जन्म वादि हारो

(राग पंचम)

जिनराज ना विसारो, मति जन्म वादि हारो ।
नर भौ आसान नाहिं, देखो सोच समझ वारो।।जिनराज ।।
सुत मात तात तरुनी, इनसौं ममत निवारो ।
सबहीं सगे गरजके, दुखसीर नहिं निहारो ।।१ ।।जिनराज ।।
जे खायं लाभ सब मिलि, दुर्गति में तुम सिधारो ।
नट का कुटंब जैसा यह खेल यों विचारो ।।२ ।।जिनराज ।।
नाहक पराये काजै, आपा नरक में पारो ।
`भूधर' न भूल जगमैं, जाहिर दगा है यारो ।।३ ।।जिनराज ।।

पुलकन्त नयन चकोर पक्षी

(हरिगीतिका)

पुलकन्त नयन चकोर पक्षी, हँसत उर इन्दीवरो ।
दुर्बुद्धि चकवी बिलख बिछुरी, निविड़ मिथ्यातम हरो ।।
आनन्द अम्बुज उमगि उछर्यो, अखिल आतम निरदले ।
जिनवदन पूरनचन्द्र निरखत, सकल मनवांछित फले ।।१ ।।
मुझ आज आतम भयो पावन, आज विघ्न विनाशियो ।
संसार सागर नीर निवट्यो, अखिल तत्त्व प्रकाशियो ।।
अब भई कमला किंकरी मुझ, उभय भव निर्मल ठये ।
दु:ख जरो दुर्गति वास निवरो, आज नव मंगल भये ।।२ ।।
मनहरन मूरति हेरि प्रभुकी, कौन उपमा लाइये ।
मम सकल तनके रोम हुलसे, हर्ष और न पाइये ।।
कल्याणकाल प्रतक्ष प्रभुको, लखें जो सुर नर घने ।
तिस समय की आनन्द महिमा, कहत क्यों मुखसों बने ।।३ ।।
भर नयन निरखे नाथ तुमको, और बांछा ना रही ।
मन ठठ मनोरथ भये पूरन, रंक मानो निधि लही ।।
अब होय, भव-भव भक्ति तुम्हरी, कृपा ऐसी कीजिये ।
कर जोर `भूधरदास' बिनवै, यही वर मोहि दीजिये ।।४ ।।

नैननि को वान परी, दरसन की

(राग ख्याल)

नैननि को वान परी, दरसन की ।।टेक ।।
जिन मुखचन्द चकोर चित मुझ, ऐसी प्रीति करी ।।नैन. ।।
और अदेवन के चितवनको अब चित चाह टरी ।
ज्यों सब धूलि दबै दिशि दिशिकी, लागत मेघझरी ।।१ ।।नैन. ।।
छबि समाय रही लोचनमें, विसरत नाहिं घरी ।
`भूधर' कह यह टेव रहो थिर, जनम जनम हमरी ।।२ ।।नैन. ।।

प्रभु गुन गाय रै, यह औसर फेर न पाय रे

(राग ख्याल)
प्रभु गुन गाय रै, यह औसर फेर न पाय रे ।।टेक ।।
मानुष भव जोग दुहेला, दुर्लभ सतसंगति मेला ।
सब बात भली बन आई, अरहन्त भजौ रे भाई ।।१ ।।प्रभु. ।।
पहले चित-चीर संभारो कामादिक मैल उतारो ।
फिर प्रीति फिटकरी दीजे, तब सुमरन रंग रंगीजे ।।२ ।।प्रभु. ।।
धन जोर भरा जो कूवा, परिवार बढ़ै क्या हूवा ।
हाथी चढ़ि क्या कर लीया, प्रभु नाम बिना धिक जीया ।।३ ।।प्रभु. ।।
यह शिक्षा है व्यवहारी, निहचै की साधनहारी ।
`भूधर' पैडी पग धरिये, तब चढ़ने को चित करिये ।।४ ।।प्रभु. ।।

सुन ज्ञानी प्राणी, श्री गुरु सीख सयानी

(राग सोरठ)
सुन ज्ञानी प्राणी, श्री गुरु सीख सयानी ।।टेक ।।
नरभव पाय विषय मति सेवो, ये दुरगति अगवानी ।।सुन. ।।
यह भव कुल यह तेरी महिमा, फिर समझी जिनवानी ।
इस अवसर में यह चपलाई, कौन समझ उर आनी ।।१ ।।सुन. ।।
चंदन काठ-कनक के भाजन, भरि गंगा का पानी ।
तिल खलि रांधत मंदमती जो, तुझ क्या रीस बिरानी ।।२ ।।सुन. ।।
`भूधर' जो कथनी सो करनी, यह बुद्धि है सुखदानी ।
ज्यों मशालची आप न देखै, सो मति करै कहानी ।।३ ।।सुन. ।।

वे मुनिवर कब मिलि है उपगारी

(राग मलार)
वे मुनिवर कब मिलि है उपगारी ।।टेक ।।
साधु दिगम्बर नगन निरम्बर, संवर भूषणधारी ।।वे मुनि. ।।
कंचन-काच बराबर जिनकैं, ज्यौं रिपु त्यौं हितकारी ।
महल-मसान मरन अरु जीवन, सम गरिमा अरु गारी ।।१ ।।वे मुनि. ।।
सम्यग्ज्ञान प्रधान पवन बल, तप पावक परजारी ।
सेवत जीव सुवर्ण सदा जै, काय-कारिमा टारी ।।२ ।।वे मुनि. ।।
जोरि जुगल कर `भूधर' बिनवै, तिन पद ढोक हमारी ।
भाग उदय दरसन जब पाऊँ, ता दिनकी बलिहारी ।।३ ।।वे मुनि. ।।

सो गुरुदेव हमारा है साधो

(राग सोरठ)
सो गुरुदेव हमारा है साधो ।।टेक ।।
जोग-अगनि मैं जो थिर राखैं, यह चित्त चंचल पारा है ।।
करन-कुरंग खरे मदमाते, जप-तप खेत उजारा है ।
संजम-डोर-जोर वश कीने, ऐसा ज्ञान-विचारा है ।।१ ।।सो गुरु. ।।
जा लक्ष्मीको सब जग चाहै, दास हुआ जग सारा है ।
सो प्रभु के चरनन की चेरी, देखो अचरज भारा है ।।२ ।।सो गुरु. ।।
लोभ-सरप के कहर जहर की, लहरि गई दु:ख टारा है ।
`भूधर' ता रिषि का शिष्य हूजे, तब कछु होय सुधारा है ।।३ ।।सो गुरु. ।।

अब पूरी कर नींदड़ी, सुन जिया रे! चिरकाल

अब पूरी कर नींदड़ी, सुन जिया रे! चिरकाल तू सोया ।
माया मैली रातमें, केता काल विगोया ।।अब. ।।
धर्म न भूल अयान रे! विषयों वश वाला ।
सार सुधारस छोड़के, पीवै जहर पियाला ।।१ ।।अब. ।।
मानुष भवकी पैठ में जग विणजी आया ।
चतुर कमाई कर चले, मूढ़ौं मूल गुमाया ।।२ ।।अब. ।।
तिसना तज तप जिन किया, तिन बहु हित जोया ।
भोग मगन शठ जे रहे, तिन सरवस खोया ।।३ ।।अब. ।।
काम विथा पीड़ित जिया, भोगहि भले जानैं ।
खाज खुजावत अंगमें, रोगी सुख मानैं ।।४ ।।अब. ।।
राग उरगनी जोरतैं, जग डसिया भाई!
सब जिय गाफिल हो रहे, मोह लहर चढ़ाई ।।५ ।।अब. ।।
गुरु उपगारी गारुड़ी, दुख देख निवारैं ।
हित उपदेश सुमंत्रसों, पढ़ि जहर उतारैं ।।६ ।।अब. ।।
गुरु माता गुरु ही पिता, गुरु सज्जन भाई ।
`भूधर' या संसारमें, गुरु शरनसहाई ।।७ ।।अब. ।।

भलो चेत्यो वीर नर तू, भलो चेत्यो वीर

(राग सोरठ)
भलो चेत्यो वीर नर तू, भलो चेत्यो वीर ।।टेक ।।
समुझि प्रभुके शरण आयो, मिल्यो ज्ञान वजीर ।।भलो. ।।
जगतमें यह जनम हीरा, फिर कहाँ थो धीर ।
भलीवार विचार छांड्यो, कुमति कामिनी सीर ।।१ ।।भलो. ।।
धन्य धन्य दयाल श्रीगुरु सुमरि गुणगंभीर ।
नरक परतैं राखि लीनों, बहुत कीनी भीर ।।२ ।।भलो. ।।
भक्ति नौका लही भागनि, कितक भवदधि नीर ।
ढील अब क्यों करत `भूधर', पहुँच पैली तीर ।।३ ।।भलो. ।।

देखो भाई! आतमदेव बिराजै

(राग गौरी)
देखो भाई! आतमदेव बिराजै ।।टेक ।।
इसही हूठ हाथ देवलमैं, केवलरूपी राजै ।।
अमल उजास जोतिमय जाकी, मुद्रा मंजुल छाजै ।
मुनिजनपूज अचल अविनाशी, गुण बरनत बुधि लाजै ।।१ ।।देखो. ।।
परसंजोग समल प्रतिभासत, निज गुण मूल न त्याजै ।
जैसे फेटक पखान हेतसों, श्याम अरुन दुति साजैं ।।२ ।।देखो. ।।
`सोऽहं' पद समतासो ध्यावत, घटहीमैं प्रभु पाजै ।
`भूधर' निकट निवास जासुको, गुरु बिन भरम न भाजै ।।३ ।।देखो. ।।

अन्तर उज्जवल करना रे भाई!

(राग सोरठ)
अन्तर उज्जल करना रे भाई! ।।टेक ।।
कपट कृपान तजै नहिं तबलौ, करनी काज न सरना रै ।।
जप-तप-तीरथ-यज्ञ-व्रतादिक आगम अर्थ उचरना रे ।
विषय-कषाय कीच नहिं धोयो, यों ही पचि पचि मरना रे ।।१ ।।अन्तर. ।।
बाहिर भेष क्रिया उर शुचिसों, कीये पार उतरना रे ।
नाहीं है सब लोक-रंजना, ऐसे वेदन वरना रे ।।२ ।।अन्तर. ।।
कामादिक मनसौं मन मैला, भजन किये क्या तिरना रे ।
`भूधर' नील वसन पर कैसैं, केसर रंग उछरना रे ।।३ ।।अन्तर. ।।

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