कंपाउंड के एक कोने में खेलते-खेलते अचानक कुछ याद आया और जब मैं घर दौड़कर आया तो माँ घर के सामने एक खटिया पर बैठ चुकी थी। तेल वाले चमकीले कप्तान सिगरेट टिन के डिब्बे से पैसे निकाल रही माँ ने आलमारी से लोहे का एक प्लेट अचानक निकाला और चावल का पतीला खोलते हुए मुझसे कहा— “अरे कतूरे, तू खेल में इतना मगन हो गया है। जाओ तेल के खुए में तुम्हारे लिए पकौड़े रखे हैं, मैं वापसी में ख़रीद लाई थी।” मेरी माँ सारी सुबह दस बीसे के लगभग तेल एक खुए और सफ़ेद डिब्बों में डालकर एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में घूमते हुए बेचा करती थी। इसके चलते उसके सिर के बाल पर चाँदी का रंग आना शुरू हो गया था। माथे के ऊपर के केशों, बीच-बीच पसीने की चुहचुहाती बूँदें जल्द पूरे चेहरे को भिगोती छोटी-छोटी नालियों के रूप में बहने लगतीं। “जाओ जाकर पकौड़े ले लो।” माँ ने कहा। वह दस, पाँच रुपए और एक रुपए के नोटों को करीने से एक-दूसरे के ऊपर रख रही हैं। मैंने तेल की ट्रे में से पकौड़े उठा लिए और भोजन की प्लेट में डालकर माँ के पास बैठ गया। लाल-लाल टमाटरों को तेल में पकाकर बत्तख़ के अंडों की सब्ज़ी तैयार की गई थी—उसमें मिली सब्ज़ी के...