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निःस्वार्थ मित्रता (कहानी) | Nihsvaarth Mitrataa : ऑस्कर वाइल्ड

एक दिन सुबह तालाब के किनारे रहने वाली छछूँदर ने अपने बिल में से अपना सिर निकाला। उसकी मूँछें कड़ी और भूरी थीं और उसकी पूँछ काले वाल्ट्यूब की तरह थी। इस समय बत्तख के छोटे-छोटे बच्चे तालाब में तैर रहे थे और उनकी माँ बुड्ढी बत्तख उन्हें यह सिखा रही थी कि पानी में किस तरह सिर के बल खड़ा होना चाहिए। “जब तक तुम सिर के बल खड़ा होना नहीं सीखोगे, तब तक तुम ऊँची सोसायटी के लायक नहीं बन सकोगे।” बत्तख उन्हें समझा रही थी और बार-बार उसे ख़ुद करके दिखला रही थी, किंतु बच्चे उसकी ओर कुछ भी ध्यान नहीं दे रहे थे, क्योंकि वे इतने छोटे थे कि अभी सोसायटी का महत्व नहीं समझते थे। “कैसे नालायक बच्चे हैं” छछूँदर चिल्लाई, “इन्हें तो डुबो देना चाहिए!” “नहीं जी! अभी तो ये बच्चे हैं और फिर माँ कभी डुबोने का विचार कर सकती है!” आह! माँ की भावनाओं से तो अभी मैं अपरिचित हूँ! वास्तव में मैं अभी अविवाहित हूँ और रहूँगी भी! यों प्रेम अच्छी चीज़ होती है, किंतु मित्रता उससे भी बड़ी चीज़ होती है!” “यह तो ठीक है, किंतु मित्रता का कर्तव्य तुम क्या समझती हो?” एक जलपक्षी ने पूछा जो पास के एक नरकुल की डाल पर बैठा हुआ यह वार्त...