एक नगर में मार्टिन नाम का एक मोची रहा करता था। नीचे के तल्ले में एक तंग कोठरी उसकी थी। वहाँ से खिड़की की राह सड़क नजर आती, जहाँ आने-जानेवालों के चेहरे तो नहीं, पर पैर दिखाई दिया करते थे। मार्टिन लोगों के जूतों से ही उनको पहचानने का आदी हो गया था। क्योंकि वहाँ एक मुद्दत से रहता था और बहुतेरे लोगों को जानता था। पास-पड़ोस में शायद कोई जोड़ा जूता होगा जो उसके हाथों न निकला हो। सो खिड़की की राह वह अपना ही काम देखा करता। कुछ जोड़ियों में उसने तला बैठाया था तो कुछ में और मरम्मत की थी। कुछ ऐसे भी होते कि पूरे-के-पूरे उसी के बनाए हुए। काम की मार्टिन को कमी नहीं थी, क्योंकि काम वह सच्चाई से करता था। माल अच्छा लगाता और दाम भी वाजिब से ज़्यादा नहीं लेता था। बड़ी बात यह थी कि वह वचन का पक्का था। जिस दिन की माँग होती अगर उस दिन पूरा करके दे सकता तो वह काम ले लेता था, नहीं तो साफ़ कह देता था। वादे करके झुठलाता नहीं था। इसलिए आस-पास सरनाम था और काम की उसके पास कभी कमी नहीं होती थी। यों आदमी वह नेक था और नीति की राह उसने कभी नहीं छोड़ी। और उमर ज़्यादा होने पर तो वह और भी आत्मा की भलाई की और ईश्वर की ब...