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प्रेम में भगवान (कहानी) | Prem Mein Bhagavaan : लियो टॉल्स्टॉय

एक नगर में मार्टिन नाम का एक मोची रहा करता था। नीचे के तल्ले में एक तंग कोठरी उसकी थी। वहाँ से खिड़की की राह सड़क नजर आती, जहाँ आने-जानेवालों के चेहरे तो नहीं, पर पैर दिखाई दिया करते थे। मार्टिन लोगों के जूतों से ही उनको पहचानने का आदी हो गया था। क्योंकि वहाँ एक मुद्दत से रहता था और बहुतेरे लोगों को जानता था। पास-पड़ोस में शायद कोई जोड़ा जूता होगा जो उसके हाथों न निकला हो। सो खिड़की की राह वह अपना ही काम देखा करता। कुछ जोड़ियों में उसने तला बैठाया था तो कुछ में और मरम्मत की थी। कुछ ऐसे भी होते कि पूरे-के-पूरे उसी के बनाए हुए। काम की मार्टिन को कमी नहीं थी, क्योंकि काम वह सच्चाई से करता था। माल अच्छा लगाता और दाम भी वाजिब से ज़्यादा नहीं लेता था। बड़ी बात यह थी कि वह वचन का पक्का था। जिस दिन की माँग होती अगर उस दिन पूरा करके दे सकता तो वह काम ले लेता था, नहीं तो साफ़ कह देता था। वादे करके झुठलाता नहीं था। इसलिए आस-पास सरनाम था और काम की उसके पास कभी कमी नहीं होती थी। यों आदमी वह नेक था और नीति की राह उसने कभी नहीं छोड़ी। और उमर ज़्यादा होने पर तो वह और भी आत्मा की भलाई की और ईश्वर की ब...

देर हो, अँधेर नहीं (कहानी) | Der Ho, Andher Nahin : लियो टॉल्स्टॉय

पाटनपुर नगर में हरजीत राय नाम का एक व्यापारी था। उसकी दो दुकानें थीं और रहने का अपना निज का घर। हरजीत जवान था। स्वस्थ शरीर, बाल घुँघराले, हँसता चेहरा। विनोदी स्वभाव का था और गाने का उसे शौक़ था। उमर पर उसे शराब का चस्का भी लगा था और पैसा होने पर उसे रंगरेली सूझती थी। लेकिन शादी हो गई तो उसकी आदतें धीमे-धीमे बदल गईं। ख़ास मौक़ों की बात दूसरी, नहीं तो शराब उसने अब छोड़ दी थी। एक बार वह कातकी के मेले को जा रहा था। जाने लगा और पत्नी से विदा ले रहा था तो वह बोली, “देखो, आज न जाओ, मुझे बुरा सपना दीखा है। हरजीत हँस दिया। बोला, “मैं जानता हूँ कि तुमको यह डर है कि मैं मेले में गया तो बहक जाऊँगा और पैसा बरबाद करके आऊँगा। यही न? बीबी ने कहा कि ठीक मालूम नहीं कि यही डर है कि दूसरा है। लेकिन मुझे बुरा सपना हुआ है। सपने में दीखा कि तुम जब लौटे और टोपी उतारी तो सारे बाल तुम्हारे सफ़ेद-फक पड़े हुए हैं। हरजीत और भी हँसा। बोला, “यह तो और अच्छे भाग्य का सपना है। देख लेना कि इसका फल होगा कि मैं जितना माल ले जाता हूँ, वह सब बिक जाएगा और तुम्हारे लिए तरह-तरह की सौगात लेकर लौटूँगा। इस भाँति उसने परिवार ...

खोखला ढोल (कहानी) | Khokhalaa Dhol : लियो टॉल्स्टॉय

इमेल्यान नाम का एक मज़दूर एक दिन अपने मालिक के काम पर जा रहा था। जाते-जाते एक खेती की मेड़ पर कहीं से मेंढ़क फुदककर उसके सामने आ गया। मेंढ़क इमेल्यान के पैर से कुचल ही गया था कि वह तो इमेल्यान की तरक़ीब से बच गया। इतने में ही सुना कि पीछे से कोई नाम लेकर पुकार रहा है। मुड़कर देखता है कि एक बड़ी सुंदर लड़की है। उस लड़की ने कहा, इमेल्यान, तुम शादी क्यों नहीं कर लेत हो? इमेल्यान ने कहा कि भला मैं शादी कैसे कर सकता हूँ। जो पहने खड़ा हूँ वही कपड़े मेरे पास हैं, और कुछ भी नहीं। सो कौन मुझसे शादी करने को राज़ी होगा? लड़की ने कहा, “तुम कहो तो मैं राज़ी हूँ। मैं बुरी नहीं हूँ। लड़की इमेल्यान के मन को बहुत अच्छी लग रही थी। वह बोला, तुम तो परी दिखती हो। पर मेरा ठौर-ठिकाना भी नहीं है। हम लोग रहेंगे कहाँ और कैसे? लड़की बोली, इसकी क्या सोच-फिकर है! आलस कम किया और मेहनत ज़्यादा की तो अपने लायक़ खाने-पहनने को तो सब कहीं हो जाएगा। इमेल्यान ने कहा, “यह बात है, तो चल, शादी कर लें। लेकिन बताओ कि चलें कहाँ? आओ शहर चलो। सो इमेल्यान और लड़की दोनों शहर चले। वहाँ शहर के परले सिरे पर दूर एक झोंपड़ी में ...

जीवन-मूल (कहानी) | Jeevan-mool : लियो टॉल्स्टॉय

एक एक रैदास-मोची अपने स्त्री-बच्चों के साथ एक किसान की झोंपड़ी में रहा करता था। नाम था ननकू। उसके पास अपनी ज़मीन नहीं थी, न घर। रोज़ जूते गाठकर रोज़ी चलाता था। पर काम का भाव सस्ता था और अनाज का महँगा। सो जो कमाता था, खाना जुटाने में ख़र्च हो जाता। स्त्री-मर्द के बीच जाड़ों के लिए बस एक लोई थी। वह भी चिथड़े हो चली थी। यह दूसरा साल था कि दोनों सोचते थे कि अबके दोहर-लिहाफ़ बनवाएँगे। सो जाड़ों के दिनों तक ननकू ने उसके लिए कुछ पैसा बचा भी लिया था। पाँच का एक नोट घर के बक्स की तलहटी में रखा था और कोई इतना ही पैसा बस्ती में लोगों से उसे लेना निकलता था। सो एक सवेरे कंबल-लोई लेने के ख़याल से ननकू बस्ती जाने को तैयार हुआ। उसने कुरता पहना, उस पर बीबी के बदन की मिरजई, और ऊपर एक गाढ़े की चादर डाल ली। नोट जेब में रखा। झाड़ से एक डंडा तोड़ सहारे को हाथ में लिया, और कलेऊ करके राम-नाम ले रवाना हो लिया। सोचा कि जो पाँच रुपए बस्ती में लेने निकलते हैं, वे भी उगाह लूँगा। सो पाँच तो वे, पाँच ए—दस रुपए में जाड़े के लिए ख़ासे गरम कपड़े हो जाएँगे। बस्ती में आया और अपने कर्ज़दार एक किसान के घर गया। लेकिन किसा...

धर्मपुत्र (कहानी) | Dharmaputr : लियो टॉल्स्टॉय

एक एक दिन किसान के घर एक बालक जनमा। उसने अपने भाग्य सराहे और बड़ा कृतार्थ हुआ। ख़ुश-ख़ुश एक पड़ोसी के घर गया कि आप इस बालक के धर्म-पिता बन जाएँ। पर ग़रीब के बेटे को कौन अपनाए! सो पड़ोसी ने इनकार कर दिया। तब दूसरे पड़ोसी से कहा, उसने भी इनकार कर दिया। इस पर बेचारा किसान घर-घर घूमा; लेकिन कोई उसके बालक का धर्म-पिता बनने को राज़ी न हुआ। यह देख वह दूसरे गाँव चला। चलते-चलते राह में एक आदमी मिला। पूछने लगा, जयरामजी की, भाई चौधरी, कहाँ जा रहे हो? किसान बोला, “भगवान की दया हुई कि जीवन को सारथ करने और बुढ़ापे में सहारा होने घर में हमारे उजियाला जनमा है। मरने पर वही हमारी मिट्टी लगाएगा और हमारी आत्मा को दया-धर्म से सींचेगा। लेकिन मैं ग़रीब हूँ और गाँव में कोई उसका धर्म-पिता बनने को राज़ी नहीं है। सो मैं उसके धर्म-पिता की खोज में जा रहा हूँ। मुसाफ़िर ने कहा, चाहो तो मैं धर्म-पिता बन सकता हूँ। किसान सुनकर प्रसन्न हुआ और धन्यवाद देने लगा। फिर सोचकर बोला, यह तो आपने मुझे धन्य किया; लेकिन अब सोचता हूँ कि धर्म-माता के लिए मैं किसे कहूँ। मुसाफ़िर ने कहा, धर्म-माँ के लिए सुनो, सीधे उस नगर में जाओ। ...