एक
एक दिन किसान के घर एक बालक जनमा। उसने अपने भाग्य सराहे और बड़ा कृतार्थ हुआ। ख़ुश-ख़ुश एक पड़ोसी के घर गया कि आप इस बालक के धर्म-पिता बन जाएँ। पर ग़रीब के बेटे को कौन अपनाए! सो पड़ोसी ने इनकार कर दिया। तब दूसरे पड़ोसी से कहा, उसने भी इनकार कर दिया। इस पर बेचारा किसान घर-घर घूमा; लेकिन कोई उसके बालक का धर्म-पिता बनने को राज़ी न हुआ। यह देख वह दूसरे गाँव चला। चलते-चलते राह में एक आदमी मिला। पूछने लगा, जयरामजी की, भाई चौधरी, कहाँ जा रहे हो?
किसान बोला, “भगवान की दया हुई कि जीवन को सारथ करने और बुढ़ापे में सहारा होने घर में हमारे उजियाला जनमा है। मरने पर वही हमारी मिट्टी लगाएगा और हमारी आत्मा को दया-धर्म से सींचेगा। लेकिन मैं ग़रीब हूँ और गाँव में कोई उसका धर्म-पिता बनने को राज़ी नहीं है। सो मैं उसके धर्म-पिता की खोज में जा रहा हूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, चाहो तो मैं धर्म-पिता बन सकता हूँ।
किसान सुनकर प्रसन्न हुआ और धन्यवाद देने लगा। फिर सोचकर बोला, यह तो आपने मुझे धन्य किया; लेकिन अब सोचता हूँ कि धर्म-माता के लिए मैं किसे कहूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, धर्म-माँ के लिए सुनो, सीधे उस नगर में जाओ। वहाँ चौक में एक पत्थर की हवेली होगी। सामने नीली खिड़कियाँ दीखेंगी। वहाँ पहुँचोगे तो द्वार पर ही तुम्हें मकान के मालिक मिलेंगे। उनसे कहना कि अपनी बेटी को बालक की धर्म-माता बन जाने दें।
किसान सुनकर अचकचा आया। बोला, एक धनी आदमी से ऐसी बात के कैसे कहूँगा? वह मुझे तिरस्कार से देखेंगे और अपनी लड़की को पास न आने देंगे।
सो चिंता न करो। तुम जाओ, कहो तो। और कल सबेरे तैयारी रखना। मैं ठीक संस्कार के वक़्त पहुँच जाऊँगा।
किसान घर लौट आया। फिर उन धनी व्यापारी की तलाश में शहर की तरफ़ गया। चौक में पहुँचकर उसने बहली खोली, और मकान की ड्यौढ़ी पर पहुँचा था कि सेठ वहीं मिले। पूछने लगे—कहाँ चौधरी, क्या चाहते हो?
किसान ने कहा कि भगवान ने दया की है और घर में दीपक जनमा है। वही हमारी आँखों का तारा है, बुढ़ापे का सहारा है और मौत के बाद हमारे प्रेत को पानी देगा। बड़ी मेहरबानी होगी जो आप अपनी बेटी को उसकी धर्म-माता बनने दें।
व्यापारी ने पूछा, संस्कार कब है?
कल सबेरे।
अच्छी बात है। तसल्ली रखो। कल सबेरे संस्कार के समय वह आ जाएगी।
अगले दिन माता आ गई, धर्म-पिता भी आ गए और शिशु का संस्कार होते ही धर्म-पिता चले गए। किसी को पता भी नहीं चला कि वह कौन है, कहाँ रहते हैं। न वह फिर दिखे।
दो
बालक चाँद की तरह बढ़ने लगा। माँ-बाप के उछाह का पूछना क्या! बढ़कर माता-पिता के लिए छोटी उमर से ही वह सहाई होने लगा। तंदुरुस्त था और काम को उद्यत, चतुर और आज्ञाकारी। दस बरस का हुआ कि लिखना पढ़ना सीखने के लिए उसे मदरसे में भेजा गया। जो और पाँच बरस में सीखते वह एक ही बरस में सीख गया और कुछ ही अरसे में वहाँ की सब विद्या उसने समाप्त कर दी।
पूजा-दशहरे के दिन आए और छुट्टियों में वह अपनी धर्म-माता को प्रणाम करने गया। जाकर चरण छुए और सामने भेंट रखी।
फिर लौटकर घर आया तो माँ-बाप से उसने पूछा, “जी, धर्म-पिता कहाँ रहते हैं? इस विजयदशमी के दिन मैं उनको प्रणाम करना चाहता हूँ और दक्षिणा भेंट दूँगा।
पिता ने कहा, “बेटे, तुम्हारे धर्म-पिता का हमें कुछ पता नहीं है। हमें अक्सर उनका ख़याल आता है। तुम्हारा नाम-संस्कार हुआ उसी रोज़ से उनकी कोई ख़बर नहीं मिली। यह तक मालूम नहीं कि कहाँ रहते हैं और अब हैं भी कि नहीं।
पुत्र बोला कि माता जी और पिता जी, आप दोनों मुझे इजाज़त दीजिए। मैं अपने धर्म-पिता की खोज में जाऊँगा। उन्हें खोजकर रहूँगा और उनके चरणों की रज लूँगा।
माता-पिता ने बालक को अनुमति दे दी और वह अपने धर्म-पिता की खोज में चल पड़ा।
तीन
घर से निकल वह सीधी सड़क चल दिया। घंटों चलता रहा। चलते-चलते एक मुसाफ़िर मिला। उसने पूछा कि लड़के, तुम कहाँ जा रहे हो?
लड़के ने जवाब दिया, मैं धर्म-माता के दर्शन करने और उन्हें प्रणाम करने गया था। फिर घर जाकर मैंने धर्म-पिता के बारे में पूछा, जिससे उनके भी दर्शन पाऊँ और चरण छू सकूँ। लेकिन मेरे माता-पिता भी उनका पता नहीं जानते हैं। कहने लगे कि मेरा संस्कार हुआ था, उसके बाद से ही उनकी कोई ख़बर नहीं मिली, जाने जीते भी हैं कि नहीं। लेकिन मैं ज़रूर अपने धर्म-पिता के दर्शन चाहता हूँ। सो मैं उसी खोज में निकला हूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, तुम्हारा धर्म-पिता तो मैं ही हूँ।
बालक सुनकर कृतार्थ हुआ। उसने उनके चरणों में मस्तक नवाया। फिर पूछने लगा कि धर्म-पिता, आप अब किधर जा रहे हैं? हमारी तरफ़ जा रहे हों तो मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।
पथिक ने कहा कि अभी तो मेरे पास तुम्हारे घर चलने का समय नहीं है। जगह-जगह बहुत काम है। लेकिन कल सबेरे मैं अपनी जगह पहुँच जाऊँगा। तब वहाँ आकर तुम मुझे मिलना।
लेकिन धर्म-पिता, मुझे जगह का पता कैसे चलेगा?
“सुनो, अपने घर से सबेरे सामने सूरज की सीध में चलते चले जाना। चलते-चलते जंगल आ जाएगा। जंगल को पार करना। फिर एक घाटी में पहँचोगे। घाटी में पहुँचकर वहाँ बैठना और थोड़ा विश्राम करना। पर चौकस होकर देखते रहना कि आस-पास क्या होता है। फिर घाटी के परले किनारे तुम्हें एक बग़ीचा दिखेगा। वहाँ मकान होगा, जिसकी छत सुनहरी झलकती होगी। वही मेरा घर है। तुम सीधे दरवाज़े पर आना-वहाँ तुम्हें मैं ख़ुद खड़ा मिलूँगा।
चार
बालक ने धर्म-पिता के कहे अनुसार किया। वह उठकर सूर्य-भगवान की तरफ़ चलता चला गया। चलते-चलते वन आया। उसे पार करने पर घाटी आई। घाटी में क्या देखता है कि ऊँचा एक बरगद का पेड़ खड़ा है। उसकी एक शाख पर रस्सी बँधी है। रस्सी से एक भारी लकड़ी का लट्ठ लटका हुआ है। लट्ठ के नीचे लकड़ी की बड़ी-सी कठौती रखी है जो शहद से भरी हुई है। बालक यह देखकर अचरज में हुआ कि क्यों इस तरह शहद भरा हुआ रखा है और उसके ठीक ऊपर लकड़ी का लट्ठ क्यों लटक रहा है। लेकिन अचरज का समय भी नहीं मिला कि उसे किसी के उधर जाने की आहट सुनाई दी। देखा तो क्या है कि रीछ चले आ रहे हैं एक रीछनी है, पीछे-पीछे तीन बच्चे हैं। दो तो नन्हें-नन्हें हैं, एक तगड़ा है। रीछनी सूँघती-सूँघती शहद की कठौती तक सीधी पहुँच गई। बच्चे भी पीछे लगे रहे। वहाँ पहुँचकर उसने शहद में मुँह डाल दिया और चाटने लगी और बच्चों ने भी चारों ओर से उसे घेर लिया। वे भी नाँद पर चढ़कर लदर-पदर शहद चाटने लगे।
थोड़ा ही चाटने पाए होंगे कि ऊपर का लट्ठ आया और उन बच्चों के बदन में आकर लगा। रीछनी ने मुँह से उस लट्ठ को परे हटा दिया। हटकर वह गया कि लौटकर अब फिर आ गया था। रीछनी ने यह देखकर दूसरी बार अपने पंजों से उस लट्ठे को धकिया दिया। वह दूर चला गया। लेकिन फिर उतने ही ज़ोर से लौटा। लौटकर इस बार ज़ोर से वह एक बच्चे की पीठ और दूसरे के सिर से टकराया। बच्चे दर्द के मारे चीख़ते-चिल्लाते भागे। उनकी माँ ने यह देखकर ग़ुस्से के साथ उस लट्ठ की लकड़ी को अपने अगले हाथों में भींचकर पकड़ा और उठाकर ज़ोर से फेंक दिया।
लट्ठ दूर चला गया और मौक़ा देखकर वह रीछ का जवान पट्टा आया और नाँद में मुँह डाल चटचट शहद खाने लगा। देखा-देखी छोटे बच्चे भी चले आए। लेकिन वे पास पहुँचे न होंगे कि लट्ठ लौटकर आया और इस ज़ोर से उस जवान बेटे के सिर में लगा कि वह वहीं ढेर हो गया। रीछनी को इस पर और ग़ुस्सा चढ़ा। झुँझलाकर उसने लट्ठ को ज़ोर से पकड़ा और पूरी शक्ति से उसे परे फेंक दिया। जिस डाल से बँधा था उससे भी ऊँचा वह जा पहुँचा-इतना ऊँचा कि रस्सी ढिला गई। इस बीच रीछनी फिर नाँद पर आ गई और बच्चे भी उसी किनारे आ लगे। लट्ठा ऊँचा चलता गया, ऊँचा चलता गया, आख़िर वह रुका और फिर गिरना शुरू हुआ। जैसे-जैसे नीचे गिरता, ज़ोर उसका बढ़ता जाता था। आख़िर पूरे बल से रीछनी के सिर में जाकर लगा। लगना था कि रीछनी लोट-पोट हो गई। उसके पाँव आसमान में हिलते रहे और वहीं जान दे दी। बच्चे वन में भाग गए।
पाँच
बालक अचरज में भरा यह देखता रहा। फिर उसने आगे की राह पकड़ी। जंगल पार कर घाटी के परले किनारे उसे एक आलीशान बग़ीचा मिला। वहाँ था एक महल-का-महल। छत उसकी सुनहरी झकझकाती थी। महल के दरवाज़े पर बालक को धर्म-पिता मिले। मुस्कुराकर उन्होंने बालक का स्वागत किया और दरवाज़े में से उसे अंदर ले गए। लड़के ने जो सपने में भी नहीं देखा वह सचमुच में यहाँ था। क्या बहार, आनंद! फिर धर्म-पिता उसे महल के अंदर ले गए। वहाँ की विभूति का तो कहना ही क्या! वह अपूर्व थी। धर्म-पिता ने चलकर बालक को महल का एक-एक कमरा दिखाया। उसकी तो आँखें न ठहरती थीं। एक-से-एक बढ़-चढ़कर ऐसी शोभा और ज्योति और उल्लास था कि—
आख़िर एक कमरे पर पहुँचे जहाँ का दरवाज़ा मुहरबंद था। धर्म-पिता ने कहा कि यह दरवाज़ा देखते हो न। इसमें ताला नहीं है, बस मुहरबंद है। वह खुल सकता है, लेकिन ख़बरदार, उसे खोलना नहीं। तुम यहाँ रहो, जी चाहे जहाँ फिरो। यहाँ का सब तुम्हारा है। सब भोग और सब आराम। लेकिन मेरी एक ताकीद है। यह दरवाज़ा मत खोलना। जो कहीं तुमने उसे खोला, तो याद कर लो जंगल में तुमने क्या देखा था।
यह कहकर धर्म-पिता अंतर्धान हो गए। लड़का उस महल में रहता रहा। वहाँ वह सुख और आनंद थे कि तीस साल ऐसे बीत गए जैसे तीन घंटे। जब एक-एक कर तीस साल गुज़र गए तो एक दिन धर्म-पुत्र मुहरबंद दरवाज़े के पास से गुज़र रहा था। वह ठिठका और अचरज में आकर सोचने लगा कि धर्म-पिता ने इस कमरे में जाने की मनाही क्यों की थी।
सोचने लगा कि ज़रा देखने में क्या हर्ज़ है। यह सोचकर उसका दरवाज़े को हाथ से तनिक-सा धकियाना था कि मुहर गिर गई और दरवाज़ा खुल गया। अंदर देखता क्या है कि और सभी से बढ़कर और बड़ा यह हाल है। बीच में उसके सिंहासन रखा है। कुछ देर वह उस ख़ाली हाल के वैभव को देखता हुआ इधर-उधर घूमता रहा। अनंतर सीढ़ी चढ़ वह सिंहासन पर जा पहुँचा और वहाँ बैठ गया।
बैठकर देखता है कि सिंहासन से टिककर शासन-दंड रखा हुआ है। उसने उसे हाथ में ले लिया। उसका हाथ में लेना था कि हाल की सब दीवारें हवा हो गईं। धर्मपुत्र ने देखा तो सारी दुनिया उसके सामने बिछी थी और लोग जो कुछ वहाँ कर-धर रहे थे, सब उसे दिखता था। वह सामने देखने लगा कि समंदर फैला है और जहाज़ उस पर आ-जा रहे हैं। दाएँ हाथ अजब-अजब तरह की जंगली जातियाँ बसी हुई हैं।
बाएँ, हिंदुस्तान के अलावा और लोग बसे दिखते हैं। चौथी तरफ़ मुँह जो उसने मोड़ा तो देखा कि उसकी आँख के आगे समूचा हिंदुस्तान फैला है और उसी के जैसे लोग घूम-फिर रहे हैं।
उसने सोचा कि देखें कि हमारे घर क्या हो रहा है और खेती-बाड़ी का क्या हाल है। उसने अपने बाप के खेतों को देखा कि बालें खड़ी हैं और पकने के नज़दीक हैं। वह अंदाज़ लगाने लगा कि फ़सल कितने की बैठेगी। इतने में उसे गाड़ी में कोई आता दिखाई दिया। रात का वक़्त था। धर्मपुत्र ने सोचा कि पिता ही होंगे, रात को गल्ला ढो ले जाना चाहते हैं। लेकिन देखता क्या है कि वह आदमी तो है नत्थूसिंह जोकि एक नंबरी चोर है। रात को आया है कि चुराकर खेत का सारा नाज भर ले जाए। यह देख धर्मपुत्र को ग़ुस्सा आ गया। उसने पुकारकर कहा, बापा, ओ बापा, उठो हमारे खेत से नाज चुराया जा रहा है।
बाप रात को अपनी मढ़या में चौकन्ना होकर सोया करता था। वह एकदम जाग बैठा। सोचा कि मैंने सपने में सही, लेकिन अपने खेत का नाज चोरी होते देखा है। चलूँ, देखूँ क्या बात है। भागकर वह खेत में आया तो वहाँ देखता है कि नत्थूसिंह मौजूद है। हल्ला मचाकर पास-पड़ोसवालों को भी उसने इकट्ठा कर लिया और नत्थूसिंह की ख़ूब मरम्मत बनाई। उसे पीटा-कूटा और बाँधकर थाने ले गए।
उसके बाद धर्मपुत्र ने शहर की ओर निगाह उठाई, जहाँ धर्ममाता रहती थीं। अब उनका विवाह हो गया था। इस घड़ी वह चैन की नींद सो रही थीं। इतने में उनका पति उठा और दबे पाँव घर से निकल चला। धर्मपुत्र ने वहीं से पुकारकर कहा, “माँ, उठो, उठो, देखो तुम्हारा पति अपने किस कुकर्म के लिए घर से निकल चला है।
इस पर धर्म—माँ झट से उठीं और कपड़े पहनकर उस कुलटा के यहाँ पहुँची जहाँ पति गया था। जाकर उस नारी को ख़ूब बुरा-भला सुनाया, मारा-पीटा और बाहर खदेड़ दिया।
इसके बाद धर्मपुत्र ने अपने पेट की माँ का ख़याल किया। वह अपने घर में छप्पर के तले सो रही थीं। देखता क्या है कि एक चोर घर में घुस गया है और बक्स का ताला तोड़ रहा है जिसमें माँ की जमा-जोखों रखी है। इतने में माँ जग उठीं। यह देख डाकू ने गंडासा ऊपर उठा माँ पर वार करना चाहा।
यह देख धर्मपुत्र से रहा न गया और उसने उस दुष्ट पर हाथ का शासन-दंड खींचकर मारा। वह जाकर कनपटी पर लगा और चोर वहीं का वहीं ढेर हो गया।
छः
धर्मपुत्र का चोर को मारना था कि दीवारें फिर चारों ओर घिर आईं और हॉल जैसे-का-तैसा हो गया।
उसी समय दरवाज़ा खुला और धर्मपिता अंदर आते दिखाई दिए। वहाँ पहुँच, हाथ पकड़कर उन्होंने धर्मपुत्र को सिंहासन से नीचे उतारा और अपने साथ ले चले। बोले, “तुमने मेरा कहना नहीं माना और मना करने पर दरवाज़ा खोला, यह पहली ग़लती। सिंहासन पर जा बैठे और शासन-दंड हाथ में ले लिया यह दूसरी ग़लती। उसके बाद यह तुमने तीसरी ग़लती की जिससे दुनिया में अँधेरा फैला जा रहा है। ऐसे तो तुम घड़ीभर सिंहासन पर और रहते तो आधी दुनिया बरबाद हो चुकी थी।
यह कहकर धर्म-पिता अपने साथ धर्मपुत्र को फिर सिंहासन पर ले गए और शासन-दंड अपने हाथ में रखा। दीवारें फिर उसी तरह सामने से ग़ायब हो गईं और दुनिया का सब कुछ दिखाई देने लगा।
धर्म-पिता ने कहा, “अब देखो, देखते हो न कि तुमने अपने पिता के हक़ में क्या किया। नत्थूसिंह को एक साल की सज़ा हुई। अब जो वापस आया है तो जेल से बची-खुची और बुराइयाँ सीख आया है। रहा-सहा भी अब वह पक्का हो गया है। देखते नहीं कि उसने अब तुम्हारे बाप के दो बैल चुरा लिए हैं और खलिहान में आग लगाए दे रहा है। सो अपने लिए ये बीज तुमने बोए!
और सचमुच धर्मपुत्र ने देखा कि आँख-आगे उसके बाप का खलिहान आग की लपटों में धू-धू करके जल रहा है।
उसके बाद धर्म-पिता ने वह दृश्य दूर कर दिया और दूसरी तरफ़ देखने को कहा, “देखो, यह तुम्हारी धर्म-माता के पति हैं। एक साल हुआ कि उन्होंने बीबी को छोड़ दिया है। अब औरों के पीछे लगे हैं। उनकी पहली प्रेयसी की हालत देखते हो? वह कितनी पतिता हो गई है। दुःख से पत्नी का हाल भी बेहाल है। ग़म के मारे उन्हें दौरे पड़ने लगे हैं। सो यह सेवा तुमने अपनी धर्म-माता की की है।
धर्म-पिता ने यह दृश्य भी फिर हटा दिया। अब उसके आगे अपने गाँव का मकान था। वहाँ देखता है कि उसकी माँ रो रही है और अपने अपराधों की क्षमा माँग रही है। पछतावा करती सिर धुनती कह रही है, हाय, भला होता मुझे चोर उसी रात मार डालता। फिर मुझे ऐसे भोग तो न भोगने होते!
धर्म-पिता ने कहा, “देखते हो? यह है जो तुमने अपनी माँ के लिए करके रखा है!
वह पर्दा भी दूर हुआ। फिर धर्म-पिता ने सामने देखने को कहा। अब जो उसने देखा तो दो वार्डर जेलख़ाने के आगे एक डाकू को पकड़े खड़े हैं।
धर्म-पिता ने कहा, पहचानते हो? इस आदमी के सिर पर दस ख़ून हैं। वह ख़ुद कर्म-फल का भोग लेकर अपने आप उतरता। लेकिन उसको मारकर उसके पाप तुमने बढ़ाकर अब अपने सिर ले लिए हैं। अब उन सब पापों के लिए तुम्हें जवाब देना होगा। यह हैं जो तुमने अपने हक़ में किया है! याद करो, रीछनी ने लट्ठ को एक बार हटा कर अपने बच्चों को चोट पहुँचाई। फिर हटाया तो अपने जवान बेटे को खोया। तीसरी बार ज़ोर से हटाया तो अपनी जान से हाथ धो बैठी। वही तुमने किया है। अब मैं तुमको तीस साल और देता हूँ कि दुनिया में जाओ और डाकू के और अपने पापों के लिए प्रायश्चित करो। प्रायश्चित पूरा नहीं करोगे तो तुमको उसकी जगह लेनी होगी।
धर्मपुत्र ने पूछा, उसके पाप का उतारा मुझे कैसे करना होगा, पिता।
दुनिया में जो बदी लाने के तुम भागी हो उसे मिटाना तुम्हारा काम है। उतना कर लोगे, तो उस डाकू के और तुम्हारे दोनों के पापों का उतारा हो जाएगा।
धर्मपुत्र ने पूछा, मैं दुनिया की बदी को कैसे मिटाऊँगा, पिता?
धर्म-पिता ने कहा, जाओ, सूरज की दिशा में सीधे चलते चले जाना। चलते-चलते एक खेत मिलेगा, जहाँ कुछ आदमी होंगे। देखना कि वे क्या कर रहे हैं और जो तुम जानते हो उन्हें बतलाना। फिर आगे बढ़ना। ऐसे ही बढ़ते जाना। राह में जो देखो याद रखना। चौथे दिन तुम एक वन में पहुँचोगे। उस वन के बीचों-बीच एक कुटी मिलेगी। वहाँ एक साधु रहता है। जाकर जो हुआ हो सब सुनाना। वह बताएगा कि तुम्हें क्या करना होगा। उसका कहा कर चुकोगे तब डाकू के और तुम्हारे अपने पापों का उतारा पूरा हो जाएगा।
यह कहकर धर्म-पिता ने उसको महल के दरवाज़े से बाहर कर दिया।
सात
धर्मपुत्र अपनी राह बढ़ चला। सोचता जाता था कि मैं जगत में से बदी का नाश कैसे करूँगा। बदकारों का नाश हो, ऐसे ही तो बदी का नाश होता है। उन्हें जेल में डाल दिया जाए या उनका अंत कर दिया जाए। तब फिर बिना औरों का पाप अपने ऊपर लिए बदी से लड़ना कैसे होगा?
धर्मपुत्र ने बहुतेरा विचारा, पर निश्चय पर नहीं आ सका। वह चला चलता गया। चलते-चलते एक खेत आया। वहाँ ख़ूब घनी और ऊँची गेहूँ की बालें खड़ी थीं। बस बालें पक ही गई थीं और काटने को तैयार थीं। इतने में क्या देखता है कि एक बछड़ा खेत में घुस गया है। उसे खेत में मुँह मारते देख कुछ लोग लाठी ले उसके पीछे पड़ गए हैं। खेत में से वे उसे कभी उधर खदेड़ते हैं, कभी इधर।
बछड़ा बाहर भागने के लिए खेत के जिस किनारे आकर लगता कि उधर ही कुछ लोग सामने मिलते हैं। डर के मारे वह फिर भीतर लौट जाता है। सब जने खेत में से होकर इधर-उधर उसका पीछा कर रहे हैं और खेत ख़ूब रौंदा जा रहा है। इधर यह है, उधर बाहर सड़क पर खड़ी एक औरत रो रही है कि हाय रे, मेरे बछड़े को ये लोग भगा-भगा कर मारे डाल रहे हैं!
धर्मपुत्र ने उन किसानों को कहा, तुम लोग यह क्या कर रहे हो? सब जने खेत से बाहर आ जाओ। यह औरत अपने बछड़े को आप बुला लेगी।
आदमियों ने ऐसा किया। वह स्त्री भी खेत के किनारे आकर पुकारने लगी, आओ भैया, आओ मुनवा, यहाँ आओ। बछड़े ने कान खड़े किए। एक पल सुनता रहा। फिर अपने आप भाग आया और मचलकर अपना मुँह स्त्री की गोद में ऐसे मारने लगा और ऐसी किलोल करने लगा कि वह बेचारी गिरते-गिरते बची। सब आदमी इससे ख़ुश हुए, स्त्री ख़ुश थी और बछड़ा भी मगन दिखाई देता था।
धर्मपुत्र फिर वहाँ से आगे बढ़ा। सोचने लगा कि ऐसे ही बदी-से-बदी फैलती है। जितना आदमी बुराई के पीछे पड़ते हैं, वह उतनी ही बढ़ती है। मालूम होता है बुराई-बुराई से दूर नहीं होगी। फिर कैसे दूर होगी, यह भी ठीक पता नहीं था। बछड़े ने तो अपनी मालकिन का कहना मान लिया और चलो सब ठीक हुआ। पर कहना न मानता तो उसे खेत से बाहर करने का क्या उपाय था?
धर्मपुत्र फिर सोच में पड़ गया और किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका। ख़ैर, वह बढ़ता ही गया।
आठ
चलते-चलते एक गाँव मिला। गाँव के पार परले किनारे उसने रात भर टिकने को जगह माँगी। घर की मालकिन अकेली थी और घर की सफ़ाई कर रही थी। उसने उसे ठहरा लिया। घर के अंदर धर्मपुत्र पीढ़े पर बैठा, स्त्री को काम करते देखने लगा। वह बुहारी से फ़र्श झाड़ चुकी थी, अब चीज़बस्त झाड़न से झाड़ने लगी। सबके बाद उस धूल-भरे मैले झाड़न से उसने ज़ोर-ज़ोर से मेज़ पोंछनी शुरू की। कई बार पोंछी, पर मेज़ साफ़ नहीं होती थी। कपड़े के मैल की लकीरें रह ही जाती थीं। यह देख वह दूसरे सिरे से हाथ फेरकर पोंछना शुरू करती। पर पहली लकीरें मिटतीं तो उनकी जगह दूसरी बन जातीं। फिर उसने सबकी सब मेज़ फिर दुबारा साफ़ की। लेकिन फिर वही बात। मैल की लकीरें अब भी मौजूद। धर्मपुत्र कुछ देर चुपचाप देखता रहा। फिर बोला, माई, तुम यह क्या कर रही हो?
'भैया, देखते हो कि मैं सफ़ाई कर रही हूँ। त्यौहार सिर पर है पर यह मेज़ साफ़ ही नहीं होती। मैं तो थक आई।
धर्मपुत्र बोला, मेज़ झाड़ने से पहले झाड़न को तो साफ़ कर लो, माई।
स्त्री ने वैसा ही किया। तब मेज़ भी साफ़ चमक आई।
स्त्री ने कहा, तुमने भली बात बतलाई, भैया तुम्हारा एहसान मानती हूँ।
अगले सवेरे यहाँ से विदा ले धर्मपुत्र अपनी राह आगे बढ़ लिया। काफ़ी दूर चलने पर एक वन का किनारा आया। वहाँ देखा कि देहात के कुछ लोग लोहे की मोटी हाल लेकर उसे मोड़ना चाह रहे हैं। और पास आया तो देखता है—कई लोग मिलकर लोहे का सिरा पकड़कर ज़ोर लगा रहे हैं। वे घूम तो रहे हैं, पर हाल मुड़ती नहीं।
खड़ा होकर वह उन्हें देखने लगा। लोग चक्कर लगाते हैं, पर लोहा नहीं मुड़ता। बात यह थी कि जिस चीज़ में लोहा अटका रखा था, वह चीज़ ख़ुद लोगों के घूमने के साथ घूम जाती थी। यह देख धर्मपुत्र ने कहा, भाइयो, यह आप क्या कर रहे हैं?
देखते तो हो कि हम पहिए की हाल मोड़ रहे हैं। सब कर लिया, थककर चूर हुए जा रहे हैं। पर यह हाल मुड़ती ही नहीं।
धर्मपुत्र ने कहा, पहले उसे तो थिर कर लो जहाँ हाल अटका रखी है। नहीं तो आपके घूमने के साथ वह भी घूम जाएगी। यों हाल कैसे मुड़ेगी?
किसानों ने बात मान ली। वैसा किया तो काम ठीक चलने लगा।
वह रात उन लोगों के साथ बिता अगले दिन धर्मपुत्र आगे बढ़ा। सारा दिन और सारी रात वह चलता रहा। आख़िर तड़का होते उसे कुछ बनजारे मिले। वह भी फिर वहीं रह गया। बनजारे बैलों का सौदा-वौदा कर चुके थे। अब आगे की तैयारी में आग जलाना चाह रहे थे। सूखी छिपटी और पात-फूँस वग़ैरह इकट्ठा करके उन्होंने दियासलाई दिखाई। वह जल नहीं पाई कि ऊपर से हरी घास का ढेर रख दिया। कुछ धुआँ उठा, घास में सिसकारी-सी हुई और आग बुझ गई। बनजारे फिर सूखी छिपटियाँ बीनकर लाए, फिर जलाया और फिर वैसी ही गीली घास ऊपर ला रखी। आग फिर नहीं जली और बुझ गई। इस तरह बहुत देर तक बार-बार चेष्टा करते रहे। पर आग जलती ही न थी।
उस समय धर्मपुत्र ने कहा, दोस्तो, घास ऊपर रखने में जल्दी न करो। पहले सूखी लकड़ी ठीक तरह जल चले, तब ऊपर कुछ रखना। आग एक बार लहक आने दो, फिर चाहे जितनी घास ऊपर रख देना।
बनजारों ने बात मान ली। पहले आग ख़ूब जल जाने दी। इस तरह ज़रा देर में आग लपटें दे उठी।
धर्मपुत्र कुछ देर उनके साथ रहा, फिर अपनी राह आगे हो लिया। चलता रहा, चलता रहा। सोचता जाता था कि तीन बातें जो उसने देखी हैं, उनका क्या मतलब हो सकता है। लेकिन उसे थाह छू नहीं मिलती थी।
नौ
धर्मपुत्र दिनभर चलता रहा। संध्या समय दूसरे बड़े जंगल का किनारा आया। वहाँ साधु की कुटिया मिली। उस पर जाकर धर्मपुत्र ने खटखटाया। अंदर से आवाज़ ने कहा, कौन है?
धर्मपुत्र, मैं एक बड़ा पापी हूँ जिसे अपने और एक-दूसरे के भी पापों का प्रायश्चित करना है।
यह सुनकर साधु बाहर आए।
वह पाप कौन हैं जिन्हें दूसरे के लिए तुम्हें उठाना पड़ रहा है? धर्मपुत्र ने साधु को सब बातें सुना दीं। धर्म-पिता की बात कहा, रीछनी और उसके बच्चों की घटना सुनाई, मुहरबंद कमरे और सिंहासन का हाल बताया। फिर धर्म-पिता ने जो आदेश देकर उसे भेजा था, वह कह सुनाया। रास्ते में जो किसान बछड़े का पीछा करने में ख़ूब खेत रौंद रहे थे और कैसे फिर बछड़ा मालिक की पुकार पर अपने आप खेत से बाहर आ गया, वह सुनाया। अंत में बोला कि यह तो मैं देख चुका हूँ कि बुराई का मेट बुराई से नहीं किया जा सकता। पर यह समझ में नहीं आता कि उसे फिर मिटाया कैसे जा सकता है। मुझे बतलाएँ कि यह कैसे किया जाए।
साधु ने कहा, और कुछ तुमने रास्ते में देखा हो तो बताओ?
धर्मपुत्र ने बतला दिया कि कैसे मेज़ साफ़ करती औरत देखी थी और कुछ देहाती हाल मोड़ते हुए मिले थे और बनजारे आग जलाना चाह रहे थे।
साधु सब सुनते रहे। फिर कुटिया में गए और अंदर से एक पुराना कुल्हाड़ा लेकर आए। कहा, मेरे साथ आओ।
कुछ दूर जाने पर साधु ने एक पेड़ बताया। कहा, इसे काट डालो।
धर्मपुत्र ने यह पेड़ काट गिराया।
साधु ने कहा, अब इसके तीन टुकड़े करो।
धर्मपुत्र ने पेड़ के तीन टुकड़े कर दिए।
इस पर साधु फिर कुटिया में गए और वहाँ से कुछ जलती लकड़ियाँ लाए, बोले, इनसे तीनों टुकड़ों को आग दे दो।
धर्मपुत्र ने आग जलाई और पेड़ के उन बड़े-बड़े तीनों टुकड़ों को उनमें डाल दिया। जलते-जलते उनकी जगह तीन काले कुंदे ठूँठ रह गए।
साधु ने कहा, अब इनको धरती में गाड़ दो, ऐसे कि आधे धरती में रहें, आधे ऊपर।
धर्मपुत्र ने वैसा ही किया।
पानी भरकर लाओ। लाकर इन ठूँठों की जड़ में सींच दो। पहले ठूँठ को सींचो, जैसे अब देखो, वहाँ सामने पहाड़ी की तलहटी में एक नदी है। वहाँ से मुँह में कि तुमने पहले स्त्री को सीख दी थी। दूसरे को सींचो, क्योंकि हाल मोड़ने वाले किसानों को उपदेश दिया था। और इस तीसरे को बनजारों के नाम पर सींचे जाओ। जब इनमें जड़ें जम आएँगी और कल्ले फूटने लगेंगे और उन काले ठूँठों की जगह सेब के दरख़्त हो आएँगे तब तुम भी समझ जाओगे कि आदमी में बुराई को कैसे मेटा जाना चाहिए। तब तुम्हारे सब पाप धुल जाएँगे।
इतना कहकर साधु अपनी कुटिया में चले गए। धर्मपुत्र बहुत देर तक सोचता-विचारता रहा। लेकिन साधु की बात का भेद न पा सका। तो भी साधु ने जैसा बताया था वैसा ही करना उसने शुरू कर दिया।
दस
धर्मपुत्र नदी पर गया, मुँह में पानी लिया और लौटकर पहले ठूँठ में सींच दिया। बार-बार इसी तरह मुँह में पानी ला-लाकर वह तीनों ठूँठों को सींचता रहा। जब उसे बहुत भूख लगी और थकान से चूर हो आया, तो कुटिया की तरफ़ चला कि साधु से कुछ खाने को माँग ले। इधर-उधर देखने पर उसे कुटिया में कुछ सूखी हुई रोटी मिल गई। थोड़ा खाकर उसने भूख शांत की और भीतर कुटी का दरवाज़ा खोला तो देखता है कि साधु की देह वहाँ मृतक पड़ी हुई है। तब वह मृतक देह के कर्म के लिए लकड़ी जमा करने में लगा। दिन में यह किया, रात को मुँह में पानी ला-लाकर ठूँठ सींचने में लगा रहा। रात भर, जब तक बना, वह ऐसा ही करता रहा।
अगले दिन पास के गाँव के कुछ लोग साधु के लिए खाना लेकर वहाँ पहुँचे। आकर देखते हैं कि साधु का तो शरीरांत हो गया है। अपनी जगह वह धर्मपुत्र को छोड़ गए हैं और उसको आशीर्वाद भी दिया है। सो साधु की देह का क्रिया-कर्म किया और जो खाना लाए थे धर्मपुत्र को भेंट कर दिया।
धर्मपुत्र साधु की जगह रहता रहा। लोग जो खाने को दे जाते थे उससे गुज़र करता और साधु के आदेशानुसार उसी नदी से मुँह में भरकर पानी लाता और उन जले ठूँठों पर सींच देता।
इस तरह एक साल बीत गया। इस बीच बहुत लोग उसके दर्शन को आए। उसकी खयाति दूर-दूर फैल गई। लोगों में शोहरत हो गई कि एक पहुँचा हुआ संत है जो आत्मा के उद्धार के लिए पहाड़ी की तलहटी की नदी से मुँह में पानी लेकर आता है और जले ठूँठ सींचता है। सो ठठ-के-ठठ लोग दर्शन करने वहाँ पहुँचने लगे। मालदार, धनी, व्यापारी लोग वहाँ आते और भेंट उपहार लाते। पर वह उसमें अपने तन जितनी चीज़ रखता। बाक़ी सब ग़रीबों को बाँट देता।
इस तरह धर्मपुत्र रहने लगा। आधे दिन ठूँठ में पानी सींचता, बाक़ी आधा दिन आने-जानेवालों से मिलने-बताने में जाता। वह सोचने लगा कि बुराई को मिटाने और पाप धोने के लिए यही तरीक़ा शायद होगा।
एक दिन कुटिया में बैठा था कि कोई आदमी घोड़े पर सवार उधर से निकला। अपनी मौज़ में वह तराने गाता हुआ चला जा रहा था। धर्मपुत्र कुटी से बाहर आया कि कौन आदमी है। देखा कि एक अच्छा मज़बूत जवान है, चुस्त कपड़े हैं और ख़ूब जीन-वीन से लैस एक बढ़िया घोड़े पर सवार है।
धर्मपुत्र ने रोककर पूछा, तुम कौन हो जी, और कहाँ जा रहे हो? लगाम खींचकर उस आदमी ने कहा, मैं डाकू हूँ। ऐसे ही घूमा करता हूँ और जो हाथ लगता है उसे पार करता हूँ। शिकार जितने ज़्यादा मिलते हैं उतनी ही ख़ुशी के मैं गीत गाता हूँ।
धर्मपुत्र के जी में दहल समा गई। सोचने लगा कि ऐसे आदमी में से बदी को कैसे मिटाया जा सकता है। जो अपने आप भक्ति-श्रद्धा में मेरे पास आते हैं उनको कहना तो आसान है और वे अपने गुनाह सहज मान लेते हैं। लेकिन यह तो अपने पाप ही की डींग मारता है।
मन में यह सोच उसने उधर से मुँह मोड़ लिया। ख़याल आया कि अब मैं कैसे करूँगा। यह डाकू यहीं आस-पास घूमता रहेगा और मेरे दर्शन को आने वाले लोग डर के मारे रुक जाएँगे, वे आना-जाना छोड़ देंगे। इससे उनकी भलाई भी रुक जाएगी। और मैं भी भला फिर कैसे रहूँगा?
इसलिए फिर लौटकर उसने डाकू को पुकारकर कहा, यहाँ बहुत लोग मेरे पास आया करते हैं। वे पाप की डींग भरते नहीं आते, बल्कि पछतावे से भरे हुए आते हैं। वे भगवान से क्षमा की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर का डर हो तो तुम भी अपने पापों की क्षमा माँगो। और जो तुम्हारे दिल में पछतावे की कमी न हो तो यहाँ से चले जाओ और फिर कभी इधर न आना। मुझे मत सताना और मेरे पास आने वाले आदमियों को भी मत सताना। अगर नहीं मानोगे तो ईश्वर से सजा पाओगे।
डाकू ठठ मारकर हँसने लगा। बोला, मुझे ईश्वर का डर नहीं है और तुम्हारी बात की परवा नहीं है। तुम कोई मेरे मालिक नहीं हो। तुम अपनी धर्माई पर रहते हो, तो मैं अपनी डकैती पर रहता हूँ। रहना सभी को है। बुढ़िया औरतें जो पास आएँ उन्हीं को पट्टी पढ़ाया करो। मुझे तुमसे सीखने को कुछ नहीं है। और जो ईश्वर की बात तुमने कही, सो इसी नाम पर कल मैं रोज़ से दो ज़्यादा आदमियों को जमघट लगाऊँगा। तुम्हें भी मैं मार सकता हूँ, लेकिन अभी में अपने हाथ ख़राब करना नहीं चाहता। पर देखना, आयंदा मेरी राह न काटना।
इस तरह धमकी देकर डाकू एड़ लगा अपना घोड़ा दौड़ा ले गया। वह फिर लौटकर नहीं आया और धर्मपुत्र पहले की तरह पूरे आठ साल वहाँ शांति से रहता रहा।
ग्यारह
एक रात धर्मपुत्र अपनी कुटी में बैठा था। ठूँठों में पानी दे चुका था। अब ज़रा विश्राम का समय था। उसकी निगाह रास्ते पर लगी थी कि कोई आएगा। वह जैसे प्रतीक्षा में था। लेकिन उस दिन भर कोई नहीं आया। वह शाम तक अकेला बैठा रहा। उसका जी अकेलेपन से ऊब गया। उसे सूना-सूना लगने लगा। उसे पिछली बातें याद आने लगीं। याद आया कि डाकू ने ताने से कहा था कि तुम अपनी धर्माई पर जीते हो, मैं अपनी डकैती पर रहता हूँ। इस पर उसे विचार हुआ कि साधु ने बताया था वैसे मैं नहीं रह रहा हूँ। उन्होंने मुझ पर एक प्रायश्चित डाला था। लेकिन उसमें से मैं तो खाने-कमाने लगा हूँ और गुज़र भी पाने लगा हूँ। होते-होते भक्तों का चढ़ावे का ऐसा आदी हो गया हूँ कि अब वे नहीं आते तो जी ऊबता है और सूना लगता है। जब लोग आते हैं तो मुझे इसीलिए ख़ुशी होती है न कि वे मेरी धर्माई की तारीफ़ करते हैं। यह तो रहने की ठीक विधि नहीं है। मैं प्रशंसा के मोह में बहक रहा हूँ। अपने पुराने पाप तो क्या उतारता, और नए जोड़े जा रहा हूँ। यहाँ से कहीं दूर दूसरी तरफ़ जंगल में मुझे चले जाना चाहिए, जहाँ लोग मुझे पा न सकें। वहाँ फिर मैं ऐसे रहूँगा कि पुराने पाप धुलते जाएँ और नया कोई जमा न हो।
यह मन में धारकर थैली में कुछ रूखी रोट बटोर, एक फावड़ा ले, धर्मपुत्र कुटी छोड़ चल दिया। बराबर घाटी में उसे एक एकांत जगह की याद थी। सोचा कि बस वहाँ पहुँचकर एक गुफ़ा-सी अपने लिए खोदकर तैयार कर लूँगा और लोगों से छुटकारा पाऊँगा।
अपना थैला लटकाए और फावड़ा लिए वह जा रहा था कि उसी की तरफ़ आते हुए डाकू के क़दम उसे सुनाई दिए। धर्मपुत्र को डर लग आया और वह तेज़ क़दम बढ़ चला। लेकिन डाकू ने उसे पकड़ लिया। पूछा, कहाँ जा रहे हो?”
धर्मपुत्र ने कहा, “मैं लोगों से दूर चला जाना चाहता हूँ। कहीं ऐसी जगह रहना चाहता हूँ जहाँ कोई पास न आए।
यह सुनकर डाकू को अचरज हुआ। बोला, लोग पास नहीं आएँगे तो तुम्हारा गुज़ारा कैसे होगा?
धर्मपुत्र को यह सूझा भी नहीं था। डाकू की बात से याद आया कि हाँ, आहार तो आदमी के लिए ज़रूरी है। बोला, जो परमात्मा की दया हो जाएगी उसी पर बसर कर लूँगा।
डाकू ने कुछ नहीं कहा और आगे बढ़ लिया।
धर्मपुत्र सोचने लगा कि मैंने डाकू से अपने रंग-ढंग बदलने के बारे में इस बार क्यों नहीं कहा। शायद अब उसे पछतावा हो। आज तो उसका रुख़ कुछ मुलायम मालूम होता था। अब की उसने मुझे मारने की भी धमकी नहीं दी।
यह सोचकर उसने डाकू को पुकारकर कहा कि सुनते हो, अभी तुम्हें अपने गुनाहों की माफ़ी माँगनी चाहिए। ईश्वर से तो सदा बच नहीं सकते।
यह सुनकर डाकू ने घोड़ा मोड़ पेटी में से खंजर निकाला और धर्मपुत्र को मारने को हुआ। धर्मपुत्र यह देखकर चौंका और सहमा हुआ सीधा अंदर जंगल में बढ़ गया।
डाकू ने उसका पीछा नहीं किया। बस ज़ोर से सुनाकर कहा, दो बार मैं तुम्हें छोड़ चुका हूँ। अगली बार जो कहीं तुमने मुझे टोका, तो तुम्हारी ख़ैर नहीं है, यह समझ लेना।
यह कहकर डाकू अपने रास्ते हो लिया।
उस शाम धर्मपुत्र ठूँठ में पानी देने जो पहुँचता है कि क्या देखता है कि उनमें से एक ठूँठ कल्ले दे रहा है और उसमें से नन्हें सेब की कोंपले चली हैं!
बारह
सबसे अपने को छिपाकर धर्मपुत्र बिलकुल अकेला रहने लगा। रोटी ख़त्म हो गई तो उसने सोचा कि चलूँ, खाने के लिए कहीं कुछ कंद-मूल देखूँ। यह सोचकर वह कुछ दूर चला था कि देखता क्या है कि एक पेड़ की टहनी पर अँगोछे में बँधी रोटियाँ लटकी हुई हैं। उसने वे रोटियाँ ले लीं और जब तक बना, उन पर गुज़ारा करता रहा।
वे ख़त्म हो गईं तो उसी पेड़ पर दुबारा वैसे ही अँगोछा लटका मिला। इस तरह उसका गुज़ारा होता रहा। बस अब कुछ बात थी तो डाकू का डर बाक़ी था। आस-पास कहीं जाते-आते उसकी आहट सुनता तो सहम कर दुबक रहता था। सोचता कि कहीं ऐसा न हो कि मैं अपने पाप धो न पाऊँ, उससे पहले ही डाकू मुझे मार दे।
इस तरह दस साल और हो गए। एक तो उनमें सेब का पेड़ होकर हरिया आया था, लेकिन और दो ठूँठ के ठूँठ रहे। एक सवेरे धर्मपुत्र जल्दी उठा और काम पर पहुँचा। ठूँठ की ज़मीन को मुँह के पानी से काफ़ी गीली करते उसे ख़ूब मेहनत पड़ी। आख़िर थककर वह आराम करने लगा। बैठे-बैठे सोचने लगा। सोचा कि मैंने पाप किया है, इसी से मैं मौत से डरता हूँ। ईश्वर की मर्ज़ी कौन जानता है। हो सकता है कि मौत से ही मेरे पाप धुलनेवाले हों। तब उसका भी स्वागत किए बिना मैं कैसे रह सकता हूँ।
यह ख़याल करके मन आया ही था कि उधर से घोड़े पर सवार जाने किसे गाली देता हुआ डाकू उस तरफ़ ही आता मालूम हुआ। धर्मपुत्र ने सोचा कि सिवा ईश्वर के किसी और से मेरा कुछ बन-बिगड़ क्या सकता है। यह सोचकर वह आगे बढ़कर डाकू को मिला। देखता क्या है कि डाकू अकेला नहीं है। पीछे घोड़े से एक और आदमी बँधा है। मुँह उसका बंद है और हाथ-पैर कसे हुए हैं। वह आदमी कुछ नहीं कर रहा है, पर डाकू उसे मन आई गाली दिए जा रहा है।
धर्मपुत्र बढ़ता हुआ जाकर घोड़े के सामने खड़ा हो गया। पूछा, इस आदमी को कहाँ ले जा रहे हो?
डाकू ने जवाब दिया, जंगल के अंदर लिए जा रहा हूँ। यह एक मालदार बनिए का बेटा है, पर बताता नहीं है कि बाप का माल कहाँ छिपा है। सो कोड़ों से इसकी ख़बर लूँगा तब बताएगा।
यह कहकर वह घोड़े को एड़ लगाने को हुआ कि धर्मपुत्र ने घोड़े की रास पकड़ ली और जाने नहीं दिया। कहा, इस आदमी को छोड़ दो। डाकू को ग़ुस्सा चढ़ आया और उसने मारने को हाथ उठाया—
क्या, तुम भी कुछ मज़ा चखना चाहते हो? जो इस आदमी को मार मिलेगी वह तुम भी चाहो तो वैसी कहो। मैं कह चुका हूँ कि ज़्यादा करोगे तो मेरे हाथ से जान खोओगे। सुना? अब रास छोड़ो।
लेकिन धर्मपुत्र डरा नहीं। बोला, तुम जा नहीं पाओगे। मुझे तुम्हारा डर नहीं है। बस एक ईश्वर का मुझे डर है उसका हुक्म है कि मैं तुम्हें न जाने दूँ। इस आदमी को तुम छोड़ दो।
डाकू को ग़ुस्सा तो आया, लेकिन उसने चाक़ू निकालकर उस आदमी के बँध काट दिए और उसे आज़ाद कर दिया। फिर बोला, अब जाओ, तुम दोनों चले जाओ। और ख़बरदार, जो फिर मेरी राह आड़े आए।
वह वैश्यपुत्र तो घोड़े की पीठ से खिसक चट भाग गया। डाकू भी घोड़े पर सवार हो चलने को था कि धर्मपुत्र ने फिर उसे रोका और कहा कि देखो, अपनी इस बदी से बाज आओ। लेकिन डाकू सब चुपचाप सुनता रहा। आख़िर बिना कुछ बोले वह चला गया।
अगले दिन धर्मपुत्र फिर ठूँठ में पानी देने गया। और अचरज की बात देखो कि दूसरा ठूँठ भी हरा हो रहा था। उसमें भी सेब के पेड़ की कोपलें फूटने लगी थीं!
तेरह
दस साल और बीते। धर्मपुत्र एक दिन शांति से बैठा था। न कोई कामना थी, न आशंका। प्रसन्नता से मन भरा आता था।
सोचा, ईश्वर ने आदमी को कैसी-कैसी न्यामतें बख़्शी हैं। फिर भी नाहक वह कैसा हैरान और परेशान रहता है। क्यों वह ख़ुश नहीं रहता। क्या उसे अड़चन है?...
फिर आदमी ख़ुद जो अपने लिए मुसीबत पैदा करता है और बुराई के बीज बोता है, उसके फल याद कर धर्मपुत्र का जी भर आया। उसने सोचा कि जैसे मैं रहा हूँ, वैसे ही रहते जाना ग़लत है। मुझे चाहिए कि जो सीखा है, चलूँ और वह औरों को भी सिखाऊँ। जो पाता हूँ, सब को दूँ।
यह विचार मन में आना था कि डाकू के घोड़े की टाप उसे सुन पड़ी। लेकिन वह उसे रोकने नहीं बढ़ा। सोचा कि उसे कहने-सुनने से क्या फ़ायदा है। वह कुछ समझ नहीं सकता।
पहले तो यह विचार आया; फिर मन बदल गया और धर्मपुत्र बढ़कर सड़क पर आ पहुँचा। आते हुए डाकू को देखा कि वह उदास है, आँखें उसकी झुकी हुई हैं। धर्मपुत्र को देखकर दया आई और पास पहुँचकर उसकी रानों पर हाथ रखकर उसने कहा, भाई, अपने आप पर अब रहम करो। तुम्हारे अंदर ईश्वर का वास है। तुम तक़लीफ़ पाते हो इसी से औरों को सताते हो। नतीजा यह कि आगे के लिए और तक़लीफ़ जमा करते जा रहे हो। लेकिन ईश्वर तुम्हें प्यार करता है और तुम्हें अपनाने को सदा तैयार है। देखो, अपने को बिलकुल बरबाद न करो। अभी बदल सकते हो।
पर डाकू नाराज़ होकर अपनी राह चलने को हुआ। बोला, अपने काम-से-काम रखो—
लेकिन धर्मपुत्र ने डाकू को और कस के पकड़ लिया और उसकी आँखों से तार-तार आँसू गिरने लगे।
डाकू ने इस पर आँख उठाई और धर्मपुत्र की तरफ़ देखा। जाने कैसे और कितनी देर देखता रहा। फिर एकाएक घोड़े से नीचे उतर वह धर्मपुत्र के चरणों में घुटनों आ बैठा।
बोला, तुमने आख़िर मुझे जीत ही लिया, भाई! बीस साल तक मैं अड़ा रहा, लेकिन आख़िर तुमने मुझे जीत ही लिया। अब जो चाहे मेरा करो, मैं तुम्हारे हाथ हूँ और बेबस हूँ। जब तुमने पहले मुझे सीख देने की कोशिश की, उससे मुझे और ग़ुस्सा चढ़ आया था। पर तुम जब लोगों से अपने-आप को दूर ले गए तब मुझे तुम्हारे शब्दों पर ख़याल हुआ। क्योंकि तब मैंने देखा कि उन लोगों से तुम्हें अपनी कोई गरज नहीं है। उसी दिन के बाद से मैं तुम्हें खाना पहुँचाने लगा। मैं ही पेड़ पर अँगोछा बाँध जाया करता था।
धर्मपुत्र को याद आई वही पुरानी बात। उस स्त्री की मेज़ तभी साफ़ झड़ सकी थी जब झाड़न को साफ कर लिया गया था। इसी तरह जब कोई अपनी परवाह और गरज छोड़कर अपने दिल को साफ़ कर लेगा तभी वह दूसरों के दिल की सफ़ाई कर सकेगा।
डाकू आगे बोला, जब मैंने देखा कि तुम्हें मौत का डर नहीं है उस समय से मेरा दिल भी बदल चला।
और धर्मपुत्र को याद आई वह हाल मोड़ने की घटना। जब तक एक जगह लोहे का सिरा किसी थिर चीज़ में नहीं अटका दिया गया कि हाल नहीं मुड़ी। ऐसे ही जब तक मौत का डर दूर कर जीवन को ईशनिष्ठान में स्थिर नहीं कर लिया गया तब तक इस आदमी के अक्खड़ मन पर क़ाबू पाना भी नहीं हो सका।
डाकू ने कहा, लेकिन मेरा मन तब तो पिघलकर पानी-पानी हो आया जब करुणा के मारे तुम्हारी आँखों से अपने लिए मैंने आँसू ढरते देखे।
धर्मपुत्र सत्य की यह महिमा सुनकर मग्न हो आया। फिर वह अपने ठूँठों के पास गया और डाकू को भी साथ ले गया। जाकर दोनों देखते हैं तो तीसरे ठूँठ में भी सेब का कल्ला फूट गया है और हरी झाँकी दे रहा है! उस समय धर्मपुत्र को याद आया कि बनजारों की घास तब तक आग न पकड़ सकी थी जब तक पहले छिपटियाँ अच्छी तरह न सुलग लेने दी गई थीं। इस तरह जब उसका अपना दिल सहानुभूति की गरमी से जलने—जैसा हो गया था तभी वह दूसरे के दिल को अपनी लौ से जगा भी सका, पहले नहीं।
और धर्मपुत्र ने इस भाँति प्रकाश पाने और अपने पापों के क्षय हो जाने पर बहुत आभार और आनंद माना।
फिर उसने डाकू को अपनी सारी जीवन-कथा कह सुनाई। इस भाँति अपना सब मर्म उसे भेंट करने के अनंतर धर्मपुत्र ने शरीर छोड़ दिया। डाकू ने उसकी देह की अंत्येष्टि की और धर्मपुत्र के कहे अनुसार ही रहने लगा। धर्मपुत्र से जो उसने पाया था, सब कहीं उसी का वितरण करने में वह लग गया।
एक दिन किसान के घर एक बालक जनमा। उसने अपने भाग्य सराहे और बड़ा कृतार्थ हुआ। ख़ुश-ख़ुश एक पड़ोसी के घर गया कि आप इस बालक के धर्म-पिता बन जाएँ। पर ग़रीब के बेटे को कौन अपनाए! सो पड़ोसी ने इनकार कर दिया। तब दूसरे पड़ोसी से कहा, उसने भी इनकार कर दिया। इस पर बेचारा किसान घर-घर घूमा; लेकिन कोई उसके बालक का धर्म-पिता बनने को राज़ी न हुआ। यह देख वह दूसरे गाँव चला। चलते-चलते राह में एक आदमी मिला। पूछने लगा, जयरामजी की, भाई चौधरी, कहाँ जा रहे हो?
किसान बोला, “भगवान की दया हुई कि जीवन को सारथ करने और बुढ़ापे में सहारा होने घर में हमारे उजियाला जनमा है। मरने पर वही हमारी मिट्टी लगाएगा और हमारी आत्मा को दया-धर्म से सींचेगा। लेकिन मैं ग़रीब हूँ और गाँव में कोई उसका धर्म-पिता बनने को राज़ी नहीं है। सो मैं उसके धर्म-पिता की खोज में जा रहा हूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, चाहो तो मैं धर्म-पिता बन सकता हूँ।
किसान सुनकर प्रसन्न हुआ और धन्यवाद देने लगा। फिर सोचकर बोला, यह तो आपने मुझे धन्य किया; लेकिन अब सोचता हूँ कि धर्म-माता के लिए मैं किसे कहूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, धर्म-माँ के लिए सुनो, सीधे उस नगर में जाओ। वहाँ चौक में एक पत्थर की हवेली होगी। सामने नीली खिड़कियाँ दीखेंगी। वहाँ पहुँचोगे तो द्वार पर ही तुम्हें मकान के मालिक मिलेंगे। उनसे कहना कि अपनी बेटी को बालक की धर्म-माता बन जाने दें।
किसान सुनकर अचकचा आया। बोला, एक धनी आदमी से ऐसी बात के कैसे कहूँगा? वह मुझे तिरस्कार से देखेंगे और अपनी लड़की को पास न आने देंगे।
सो चिंता न करो। तुम जाओ, कहो तो। और कल सबेरे तैयारी रखना। मैं ठीक संस्कार के वक़्त पहुँच जाऊँगा।
किसान घर लौट आया। फिर उन धनी व्यापारी की तलाश में शहर की तरफ़ गया। चौक में पहुँचकर उसने बहली खोली, और मकान की ड्यौढ़ी पर पहुँचा था कि सेठ वहीं मिले। पूछने लगे—कहाँ चौधरी, क्या चाहते हो?
किसान ने कहा कि भगवान ने दया की है और घर में दीपक जनमा है। वही हमारी आँखों का तारा है, बुढ़ापे का सहारा है और मौत के बाद हमारे प्रेत को पानी देगा। बड़ी मेहरबानी होगी जो आप अपनी बेटी को उसकी धर्म-माता बनने दें।
व्यापारी ने पूछा, संस्कार कब है?
कल सबेरे।
अच्छी बात है। तसल्ली रखो। कल सबेरे संस्कार के समय वह आ जाएगी।
अगले दिन माता आ गई, धर्म-पिता भी आ गए और शिशु का संस्कार होते ही धर्म-पिता चले गए। किसी को पता भी नहीं चला कि वह कौन है, कहाँ रहते हैं। न वह फिर दिखे।
दो
बालक चाँद की तरह बढ़ने लगा। माँ-बाप के उछाह का पूछना क्या! बढ़कर माता-पिता के लिए छोटी उमर से ही वह सहाई होने लगा। तंदुरुस्त था और काम को उद्यत, चतुर और आज्ञाकारी। दस बरस का हुआ कि लिखना पढ़ना सीखने के लिए उसे मदरसे में भेजा गया। जो और पाँच बरस में सीखते वह एक ही बरस में सीख गया और कुछ ही अरसे में वहाँ की सब विद्या उसने समाप्त कर दी।
पूजा-दशहरे के दिन आए और छुट्टियों में वह अपनी धर्म-माता को प्रणाम करने गया। जाकर चरण छुए और सामने भेंट रखी।
फिर लौटकर घर आया तो माँ-बाप से उसने पूछा, “जी, धर्म-पिता कहाँ रहते हैं? इस विजयदशमी के दिन मैं उनको प्रणाम करना चाहता हूँ और दक्षिणा भेंट दूँगा।
पिता ने कहा, “बेटे, तुम्हारे धर्म-पिता का हमें कुछ पता नहीं है। हमें अक्सर उनका ख़याल आता है। तुम्हारा नाम-संस्कार हुआ उसी रोज़ से उनकी कोई ख़बर नहीं मिली। यह तक मालूम नहीं कि कहाँ रहते हैं और अब हैं भी कि नहीं।
पुत्र बोला कि माता जी और पिता जी, आप दोनों मुझे इजाज़त दीजिए। मैं अपने धर्म-पिता की खोज में जाऊँगा। उन्हें खोजकर रहूँगा और उनके चरणों की रज लूँगा।
माता-पिता ने बालक को अनुमति दे दी और वह अपने धर्म-पिता की खोज में चल पड़ा।
तीन
घर से निकल वह सीधी सड़क चल दिया। घंटों चलता रहा। चलते-चलते एक मुसाफ़िर मिला। उसने पूछा कि लड़के, तुम कहाँ जा रहे हो?
लड़के ने जवाब दिया, मैं धर्म-माता के दर्शन करने और उन्हें प्रणाम करने गया था। फिर घर जाकर मैंने धर्म-पिता के बारे में पूछा, जिससे उनके भी दर्शन पाऊँ और चरण छू सकूँ। लेकिन मेरे माता-पिता भी उनका पता नहीं जानते हैं। कहने लगे कि मेरा संस्कार हुआ था, उसके बाद से ही उनकी कोई ख़बर नहीं मिली, जाने जीते भी हैं कि नहीं। लेकिन मैं ज़रूर अपने धर्म-पिता के दर्शन चाहता हूँ। सो मैं उसी खोज में निकला हूँ।
मुसाफ़िर ने कहा, तुम्हारा धर्म-पिता तो मैं ही हूँ।
बालक सुनकर कृतार्थ हुआ। उसने उनके चरणों में मस्तक नवाया। फिर पूछने लगा कि धर्म-पिता, आप अब किधर जा रहे हैं? हमारी तरफ़ जा रहे हों तो मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।
पथिक ने कहा कि अभी तो मेरे पास तुम्हारे घर चलने का समय नहीं है। जगह-जगह बहुत काम है। लेकिन कल सबेरे मैं अपनी जगह पहुँच जाऊँगा। तब वहाँ आकर तुम मुझे मिलना।
लेकिन धर्म-पिता, मुझे जगह का पता कैसे चलेगा?
“सुनो, अपने घर से सबेरे सामने सूरज की सीध में चलते चले जाना। चलते-चलते जंगल आ जाएगा। जंगल को पार करना। फिर एक घाटी में पहँचोगे। घाटी में पहुँचकर वहाँ बैठना और थोड़ा विश्राम करना। पर चौकस होकर देखते रहना कि आस-पास क्या होता है। फिर घाटी के परले किनारे तुम्हें एक बग़ीचा दिखेगा। वहाँ मकान होगा, जिसकी छत सुनहरी झलकती होगी। वही मेरा घर है। तुम सीधे दरवाज़े पर आना-वहाँ तुम्हें मैं ख़ुद खड़ा मिलूँगा।
चार
बालक ने धर्म-पिता के कहे अनुसार किया। वह उठकर सूर्य-भगवान की तरफ़ चलता चला गया। चलते-चलते वन आया। उसे पार करने पर घाटी आई। घाटी में क्या देखता है कि ऊँचा एक बरगद का पेड़ खड़ा है। उसकी एक शाख पर रस्सी बँधी है। रस्सी से एक भारी लकड़ी का लट्ठ लटका हुआ है। लट्ठ के नीचे लकड़ी की बड़ी-सी कठौती रखी है जो शहद से भरी हुई है। बालक यह देखकर अचरज में हुआ कि क्यों इस तरह शहद भरा हुआ रखा है और उसके ठीक ऊपर लकड़ी का लट्ठ क्यों लटक रहा है। लेकिन अचरज का समय भी नहीं मिला कि उसे किसी के उधर जाने की आहट सुनाई दी। देखा तो क्या है कि रीछ चले आ रहे हैं एक रीछनी है, पीछे-पीछे तीन बच्चे हैं। दो तो नन्हें-नन्हें हैं, एक तगड़ा है। रीछनी सूँघती-सूँघती शहद की कठौती तक सीधी पहुँच गई। बच्चे भी पीछे लगे रहे। वहाँ पहुँचकर उसने शहद में मुँह डाल दिया और चाटने लगी और बच्चों ने भी चारों ओर से उसे घेर लिया। वे भी नाँद पर चढ़कर लदर-पदर शहद चाटने लगे।
थोड़ा ही चाटने पाए होंगे कि ऊपर का लट्ठ आया और उन बच्चों के बदन में आकर लगा। रीछनी ने मुँह से उस लट्ठ को परे हटा दिया। हटकर वह गया कि लौटकर अब फिर आ गया था। रीछनी ने यह देखकर दूसरी बार अपने पंजों से उस लट्ठे को धकिया दिया। वह दूर चला गया। लेकिन फिर उतने ही ज़ोर से लौटा। लौटकर इस बार ज़ोर से वह एक बच्चे की पीठ और दूसरे के सिर से टकराया। बच्चे दर्द के मारे चीख़ते-चिल्लाते भागे। उनकी माँ ने यह देखकर ग़ुस्से के साथ उस लट्ठ की लकड़ी को अपने अगले हाथों में भींचकर पकड़ा और उठाकर ज़ोर से फेंक दिया।
लट्ठ दूर चला गया और मौक़ा देखकर वह रीछ का जवान पट्टा आया और नाँद में मुँह डाल चटचट शहद खाने लगा। देखा-देखी छोटे बच्चे भी चले आए। लेकिन वे पास पहुँचे न होंगे कि लट्ठ लौटकर आया और इस ज़ोर से उस जवान बेटे के सिर में लगा कि वह वहीं ढेर हो गया। रीछनी को इस पर और ग़ुस्सा चढ़ा। झुँझलाकर उसने लट्ठ को ज़ोर से पकड़ा और पूरी शक्ति से उसे परे फेंक दिया। जिस डाल से बँधा था उससे भी ऊँचा वह जा पहुँचा-इतना ऊँचा कि रस्सी ढिला गई। इस बीच रीछनी फिर नाँद पर आ गई और बच्चे भी उसी किनारे आ लगे। लट्ठा ऊँचा चलता गया, ऊँचा चलता गया, आख़िर वह रुका और फिर गिरना शुरू हुआ। जैसे-जैसे नीचे गिरता, ज़ोर उसका बढ़ता जाता था। आख़िर पूरे बल से रीछनी के सिर में जाकर लगा। लगना था कि रीछनी लोट-पोट हो गई। उसके पाँव आसमान में हिलते रहे और वहीं जान दे दी। बच्चे वन में भाग गए।
पाँच
बालक अचरज में भरा यह देखता रहा। फिर उसने आगे की राह पकड़ी। जंगल पार कर घाटी के परले किनारे उसे एक आलीशान बग़ीचा मिला। वहाँ था एक महल-का-महल। छत उसकी सुनहरी झकझकाती थी। महल के दरवाज़े पर बालक को धर्म-पिता मिले। मुस्कुराकर उन्होंने बालक का स्वागत किया और दरवाज़े में से उसे अंदर ले गए। लड़के ने जो सपने में भी नहीं देखा वह सचमुच में यहाँ था। क्या बहार, आनंद! फिर धर्म-पिता उसे महल के अंदर ले गए। वहाँ की विभूति का तो कहना ही क्या! वह अपूर्व थी। धर्म-पिता ने चलकर बालक को महल का एक-एक कमरा दिखाया। उसकी तो आँखें न ठहरती थीं। एक-से-एक बढ़-चढ़कर ऐसी शोभा और ज्योति और उल्लास था कि—
आख़िर एक कमरे पर पहुँचे जहाँ का दरवाज़ा मुहरबंद था। धर्म-पिता ने कहा कि यह दरवाज़ा देखते हो न। इसमें ताला नहीं है, बस मुहरबंद है। वह खुल सकता है, लेकिन ख़बरदार, उसे खोलना नहीं। तुम यहाँ रहो, जी चाहे जहाँ फिरो। यहाँ का सब तुम्हारा है। सब भोग और सब आराम। लेकिन मेरी एक ताकीद है। यह दरवाज़ा मत खोलना। जो कहीं तुमने उसे खोला, तो याद कर लो जंगल में तुमने क्या देखा था।
यह कहकर धर्म-पिता अंतर्धान हो गए। लड़का उस महल में रहता रहा। वहाँ वह सुख और आनंद थे कि तीस साल ऐसे बीत गए जैसे तीन घंटे। जब एक-एक कर तीस साल गुज़र गए तो एक दिन धर्म-पुत्र मुहरबंद दरवाज़े के पास से गुज़र रहा था। वह ठिठका और अचरज में आकर सोचने लगा कि धर्म-पिता ने इस कमरे में जाने की मनाही क्यों की थी।
सोचने लगा कि ज़रा देखने में क्या हर्ज़ है। यह सोचकर उसका दरवाज़े को हाथ से तनिक-सा धकियाना था कि मुहर गिर गई और दरवाज़ा खुल गया। अंदर देखता क्या है कि और सभी से बढ़कर और बड़ा यह हाल है। बीच में उसके सिंहासन रखा है। कुछ देर वह उस ख़ाली हाल के वैभव को देखता हुआ इधर-उधर घूमता रहा। अनंतर सीढ़ी चढ़ वह सिंहासन पर जा पहुँचा और वहाँ बैठ गया।
बैठकर देखता है कि सिंहासन से टिककर शासन-दंड रखा हुआ है। उसने उसे हाथ में ले लिया। उसका हाथ में लेना था कि हाल की सब दीवारें हवा हो गईं। धर्मपुत्र ने देखा तो सारी दुनिया उसके सामने बिछी थी और लोग जो कुछ वहाँ कर-धर रहे थे, सब उसे दिखता था। वह सामने देखने लगा कि समंदर फैला है और जहाज़ उस पर आ-जा रहे हैं। दाएँ हाथ अजब-अजब तरह की जंगली जातियाँ बसी हुई हैं।
बाएँ, हिंदुस्तान के अलावा और लोग बसे दिखते हैं। चौथी तरफ़ मुँह जो उसने मोड़ा तो देखा कि उसकी आँख के आगे समूचा हिंदुस्तान फैला है और उसी के जैसे लोग घूम-फिर रहे हैं।
उसने सोचा कि देखें कि हमारे घर क्या हो रहा है और खेती-बाड़ी का क्या हाल है। उसने अपने बाप के खेतों को देखा कि बालें खड़ी हैं और पकने के नज़दीक हैं। वह अंदाज़ लगाने लगा कि फ़सल कितने की बैठेगी। इतने में उसे गाड़ी में कोई आता दिखाई दिया। रात का वक़्त था। धर्मपुत्र ने सोचा कि पिता ही होंगे, रात को गल्ला ढो ले जाना चाहते हैं। लेकिन देखता क्या है कि वह आदमी तो है नत्थूसिंह जोकि एक नंबरी चोर है। रात को आया है कि चुराकर खेत का सारा नाज भर ले जाए। यह देख धर्मपुत्र को ग़ुस्सा आ गया। उसने पुकारकर कहा, बापा, ओ बापा, उठो हमारे खेत से नाज चुराया जा रहा है।
बाप रात को अपनी मढ़या में चौकन्ना होकर सोया करता था। वह एकदम जाग बैठा। सोचा कि मैंने सपने में सही, लेकिन अपने खेत का नाज चोरी होते देखा है। चलूँ, देखूँ क्या बात है। भागकर वह खेत में आया तो वहाँ देखता है कि नत्थूसिंह मौजूद है। हल्ला मचाकर पास-पड़ोसवालों को भी उसने इकट्ठा कर लिया और नत्थूसिंह की ख़ूब मरम्मत बनाई। उसे पीटा-कूटा और बाँधकर थाने ले गए।
उसके बाद धर्मपुत्र ने शहर की ओर निगाह उठाई, जहाँ धर्ममाता रहती थीं। अब उनका विवाह हो गया था। इस घड़ी वह चैन की नींद सो रही थीं। इतने में उनका पति उठा और दबे पाँव घर से निकल चला। धर्मपुत्र ने वहीं से पुकारकर कहा, “माँ, उठो, उठो, देखो तुम्हारा पति अपने किस कुकर्म के लिए घर से निकल चला है।
इस पर धर्म—माँ झट से उठीं और कपड़े पहनकर उस कुलटा के यहाँ पहुँची जहाँ पति गया था। जाकर उस नारी को ख़ूब बुरा-भला सुनाया, मारा-पीटा और बाहर खदेड़ दिया।
इसके बाद धर्मपुत्र ने अपने पेट की माँ का ख़याल किया। वह अपने घर में छप्पर के तले सो रही थीं। देखता क्या है कि एक चोर घर में घुस गया है और बक्स का ताला तोड़ रहा है जिसमें माँ की जमा-जोखों रखी है। इतने में माँ जग उठीं। यह देख डाकू ने गंडासा ऊपर उठा माँ पर वार करना चाहा।
यह देख धर्मपुत्र से रहा न गया और उसने उस दुष्ट पर हाथ का शासन-दंड खींचकर मारा। वह जाकर कनपटी पर लगा और चोर वहीं का वहीं ढेर हो गया।
छः
धर्मपुत्र का चोर को मारना था कि दीवारें फिर चारों ओर घिर आईं और हॉल जैसे-का-तैसा हो गया।
उसी समय दरवाज़ा खुला और धर्मपिता अंदर आते दिखाई दिए। वहाँ पहुँच, हाथ पकड़कर उन्होंने धर्मपुत्र को सिंहासन से नीचे उतारा और अपने साथ ले चले। बोले, “तुमने मेरा कहना नहीं माना और मना करने पर दरवाज़ा खोला, यह पहली ग़लती। सिंहासन पर जा बैठे और शासन-दंड हाथ में ले लिया यह दूसरी ग़लती। उसके बाद यह तुमने तीसरी ग़लती की जिससे दुनिया में अँधेरा फैला जा रहा है। ऐसे तो तुम घड़ीभर सिंहासन पर और रहते तो आधी दुनिया बरबाद हो चुकी थी।
यह कहकर धर्म-पिता अपने साथ धर्मपुत्र को फिर सिंहासन पर ले गए और शासन-दंड अपने हाथ में रखा। दीवारें फिर उसी तरह सामने से ग़ायब हो गईं और दुनिया का सब कुछ दिखाई देने लगा।
धर्म-पिता ने कहा, “अब देखो, देखते हो न कि तुमने अपने पिता के हक़ में क्या किया। नत्थूसिंह को एक साल की सज़ा हुई। अब जो वापस आया है तो जेल से बची-खुची और बुराइयाँ सीख आया है। रहा-सहा भी अब वह पक्का हो गया है। देखते नहीं कि उसने अब तुम्हारे बाप के दो बैल चुरा लिए हैं और खलिहान में आग लगाए दे रहा है। सो अपने लिए ये बीज तुमने बोए!
और सचमुच धर्मपुत्र ने देखा कि आँख-आगे उसके बाप का खलिहान आग की लपटों में धू-धू करके जल रहा है।
उसके बाद धर्म-पिता ने वह दृश्य दूर कर दिया और दूसरी तरफ़ देखने को कहा, “देखो, यह तुम्हारी धर्म-माता के पति हैं। एक साल हुआ कि उन्होंने बीबी को छोड़ दिया है। अब औरों के पीछे लगे हैं। उनकी पहली प्रेयसी की हालत देखते हो? वह कितनी पतिता हो गई है। दुःख से पत्नी का हाल भी बेहाल है। ग़म के मारे उन्हें दौरे पड़ने लगे हैं। सो यह सेवा तुमने अपनी धर्म-माता की की है।
धर्म-पिता ने यह दृश्य भी फिर हटा दिया। अब उसके आगे अपने गाँव का मकान था। वहाँ देखता है कि उसकी माँ रो रही है और अपने अपराधों की क्षमा माँग रही है। पछतावा करती सिर धुनती कह रही है, हाय, भला होता मुझे चोर उसी रात मार डालता। फिर मुझे ऐसे भोग तो न भोगने होते!
धर्म-पिता ने कहा, “देखते हो? यह है जो तुमने अपनी माँ के लिए करके रखा है!
वह पर्दा भी दूर हुआ। फिर धर्म-पिता ने सामने देखने को कहा। अब जो उसने देखा तो दो वार्डर जेलख़ाने के आगे एक डाकू को पकड़े खड़े हैं।
धर्म-पिता ने कहा, पहचानते हो? इस आदमी के सिर पर दस ख़ून हैं। वह ख़ुद कर्म-फल का भोग लेकर अपने आप उतरता। लेकिन उसको मारकर उसके पाप तुमने बढ़ाकर अब अपने सिर ले लिए हैं। अब उन सब पापों के लिए तुम्हें जवाब देना होगा। यह हैं जो तुमने अपने हक़ में किया है! याद करो, रीछनी ने लट्ठ को एक बार हटा कर अपने बच्चों को चोट पहुँचाई। फिर हटाया तो अपने जवान बेटे को खोया। तीसरी बार ज़ोर से हटाया तो अपनी जान से हाथ धो बैठी। वही तुमने किया है। अब मैं तुमको तीस साल और देता हूँ कि दुनिया में जाओ और डाकू के और अपने पापों के लिए प्रायश्चित करो। प्रायश्चित पूरा नहीं करोगे तो तुमको उसकी जगह लेनी होगी।
धर्मपुत्र ने पूछा, उसके पाप का उतारा मुझे कैसे करना होगा, पिता।
दुनिया में जो बदी लाने के तुम भागी हो उसे मिटाना तुम्हारा काम है। उतना कर लोगे, तो उस डाकू के और तुम्हारे दोनों के पापों का उतारा हो जाएगा।
धर्मपुत्र ने पूछा, मैं दुनिया की बदी को कैसे मिटाऊँगा, पिता?
धर्म-पिता ने कहा, जाओ, सूरज की दिशा में सीधे चलते चले जाना। चलते-चलते एक खेत मिलेगा, जहाँ कुछ आदमी होंगे। देखना कि वे क्या कर रहे हैं और जो तुम जानते हो उन्हें बतलाना। फिर आगे बढ़ना। ऐसे ही बढ़ते जाना। राह में जो देखो याद रखना। चौथे दिन तुम एक वन में पहुँचोगे। उस वन के बीचों-बीच एक कुटी मिलेगी। वहाँ एक साधु रहता है। जाकर जो हुआ हो सब सुनाना। वह बताएगा कि तुम्हें क्या करना होगा। उसका कहा कर चुकोगे तब डाकू के और तुम्हारे अपने पापों का उतारा पूरा हो जाएगा।
यह कहकर धर्म-पिता ने उसको महल के दरवाज़े से बाहर कर दिया।
सात
धर्मपुत्र अपनी राह बढ़ चला। सोचता जाता था कि मैं जगत में से बदी का नाश कैसे करूँगा। बदकारों का नाश हो, ऐसे ही तो बदी का नाश होता है। उन्हें जेल में डाल दिया जाए या उनका अंत कर दिया जाए। तब फिर बिना औरों का पाप अपने ऊपर लिए बदी से लड़ना कैसे होगा?
धर्मपुत्र ने बहुतेरा विचारा, पर निश्चय पर नहीं आ सका। वह चला चलता गया। चलते-चलते एक खेत आया। वहाँ ख़ूब घनी और ऊँची गेहूँ की बालें खड़ी थीं। बस बालें पक ही गई थीं और काटने को तैयार थीं। इतने में क्या देखता है कि एक बछड़ा खेत में घुस गया है। उसे खेत में मुँह मारते देख कुछ लोग लाठी ले उसके पीछे पड़ गए हैं। खेत में से वे उसे कभी उधर खदेड़ते हैं, कभी इधर।
बछड़ा बाहर भागने के लिए खेत के जिस किनारे आकर लगता कि उधर ही कुछ लोग सामने मिलते हैं। डर के मारे वह फिर भीतर लौट जाता है। सब जने खेत में से होकर इधर-उधर उसका पीछा कर रहे हैं और खेत ख़ूब रौंदा जा रहा है। इधर यह है, उधर बाहर सड़क पर खड़ी एक औरत रो रही है कि हाय रे, मेरे बछड़े को ये लोग भगा-भगा कर मारे डाल रहे हैं!
धर्मपुत्र ने उन किसानों को कहा, तुम लोग यह क्या कर रहे हो? सब जने खेत से बाहर आ जाओ। यह औरत अपने बछड़े को आप बुला लेगी।
आदमियों ने ऐसा किया। वह स्त्री भी खेत के किनारे आकर पुकारने लगी, आओ भैया, आओ मुनवा, यहाँ आओ। बछड़े ने कान खड़े किए। एक पल सुनता रहा। फिर अपने आप भाग आया और मचलकर अपना मुँह स्त्री की गोद में ऐसे मारने लगा और ऐसी किलोल करने लगा कि वह बेचारी गिरते-गिरते बची। सब आदमी इससे ख़ुश हुए, स्त्री ख़ुश थी और बछड़ा भी मगन दिखाई देता था।
धर्मपुत्र फिर वहाँ से आगे बढ़ा। सोचने लगा कि ऐसे ही बदी-से-बदी फैलती है। जितना आदमी बुराई के पीछे पड़ते हैं, वह उतनी ही बढ़ती है। मालूम होता है बुराई-बुराई से दूर नहीं होगी। फिर कैसे दूर होगी, यह भी ठीक पता नहीं था। बछड़े ने तो अपनी मालकिन का कहना मान लिया और चलो सब ठीक हुआ। पर कहना न मानता तो उसे खेत से बाहर करने का क्या उपाय था?
धर्मपुत्र फिर सोच में पड़ गया और किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका। ख़ैर, वह बढ़ता ही गया।
आठ
चलते-चलते एक गाँव मिला। गाँव के पार परले किनारे उसने रात भर टिकने को जगह माँगी। घर की मालकिन अकेली थी और घर की सफ़ाई कर रही थी। उसने उसे ठहरा लिया। घर के अंदर धर्मपुत्र पीढ़े पर बैठा, स्त्री को काम करते देखने लगा। वह बुहारी से फ़र्श झाड़ चुकी थी, अब चीज़बस्त झाड़न से झाड़ने लगी। सबके बाद उस धूल-भरे मैले झाड़न से उसने ज़ोर-ज़ोर से मेज़ पोंछनी शुरू की। कई बार पोंछी, पर मेज़ साफ़ नहीं होती थी। कपड़े के मैल की लकीरें रह ही जाती थीं। यह देख वह दूसरे सिरे से हाथ फेरकर पोंछना शुरू करती। पर पहली लकीरें मिटतीं तो उनकी जगह दूसरी बन जातीं। फिर उसने सबकी सब मेज़ फिर दुबारा साफ़ की। लेकिन फिर वही बात। मैल की लकीरें अब भी मौजूद। धर्मपुत्र कुछ देर चुपचाप देखता रहा। फिर बोला, माई, तुम यह क्या कर रही हो?
'भैया, देखते हो कि मैं सफ़ाई कर रही हूँ। त्यौहार सिर पर है पर यह मेज़ साफ़ ही नहीं होती। मैं तो थक आई।
धर्मपुत्र बोला, मेज़ झाड़ने से पहले झाड़न को तो साफ़ कर लो, माई।
स्त्री ने वैसा ही किया। तब मेज़ भी साफ़ चमक आई।
स्त्री ने कहा, तुमने भली बात बतलाई, भैया तुम्हारा एहसान मानती हूँ।
अगले सवेरे यहाँ से विदा ले धर्मपुत्र अपनी राह आगे बढ़ लिया। काफ़ी दूर चलने पर एक वन का किनारा आया। वहाँ देखा कि देहात के कुछ लोग लोहे की मोटी हाल लेकर उसे मोड़ना चाह रहे हैं। और पास आया तो देखता है—कई लोग मिलकर लोहे का सिरा पकड़कर ज़ोर लगा रहे हैं। वे घूम तो रहे हैं, पर हाल मुड़ती नहीं।
खड़ा होकर वह उन्हें देखने लगा। लोग चक्कर लगाते हैं, पर लोहा नहीं मुड़ता। बात यह थी कि जिस चीज़ में लोहा अटका रखा था, वह चीज़ ख़ुद लोगों के घूमने के साथ घूम जाती थी। यह देख धर्मपुत्र ने कहा, भाइयो, यह आप क्या कर रहे हैं?
देखते तो हो कि हम पहिए की हाल मोड़ रहे हैं। सब कर लिया, थककर चूर हुए जा रहे हैं। पर यह हाल मुड़ती ही नहीं।
धर्मपुत्र ने कहा, पहले उसे तो थिर कर लो जहाँ हाल अटका रखी है। नहीं तो आपके घूमने के साथ वह भी घूम जाएगी। यों हाल कैसे मुड़ेगी?
किसानों ने बात मान ली। वैसा किया तो काम ठीक चलने लगा।
वह रात उन लोगों के साथ बिता अगले दिन धर्मपुत्र आगे बढ़ा। सारा दिन और सारी रात वह चलता रहा। आख़िर तड़का होते उसे कुछ बनजारे मिले। वह भी फिर वहीं रह गया। बनजारे बैलों का सौदा-वौदा कर चुके थे। अब आगे की तैयारी में आग जलाना चाह रहे थे। सूखी छिपटी और पात-फूँस वग़ैरह इकट्ठा करके उन्होंने दियासलाई दिखाई। वह जल नहीं पाई कि ऊपर से हरी घास का ढेर रख दिया। कुछ धुआँ उठा, घास में सिसकारी-सी हुई और आग बुझ गई। बनजारे फिर सूखी छिपटियाँ बीनकर लाए, फिर जलाया और फिर वैसी ही गीली घास ऊपर ला रखी। आग फिर नहीं जली और बुझ गई। इस तरह बहुत देर तक बार-बार चेष्टा करते रहे। पर आग जलती ही न थी।
उस समय धर्मपुत्र ने कहा, दोस्तो, घास ऊपर रखने में जल्दी न करो। पहले सूखी लकड़ी ठीक तरह जल चले, तब ऊपर कुछ रखना। आग एक बार लहक आने दो, फिर चाहे जितनी घास ऊपर रख देना।
बनजारों ने बात मान ली। पहले आग ख़ूब जल जाने दी। इस तरह ज़रा देर में आग लपटें दे उठी।
धर्मपुत्र कुछ देर उनके साथ रहा, फिर अपनी राह आगे हो लिया। चलता रहा, चलता रहा। सोचता जाता था कि तीन बातें जो उसने देखी हैं, उनका क्या मतलब हो सकता है। लेकिन उसे थाह छू नहीं मिलती थी।
नौ
धर्मपुत्र दिनभर चलता रहा। संध्या समय दूसरे बड़े जंगल का किनारा आया। वहाँ साधु की कुटिया मिली। उस पर जाकर धर्मपुत्र ने खटखटाया। अंदर से आवाज़ ने कहा, कौन है?
धर्मपुत्र, मैं एक बड़ा पापी हूँ जिसे अपने और एक-दूसरे के भी पापों का प्रायश्चित करना है।
यह सुनकर साधु बाहर आए।
वह पाप कौन हैं जिन्हें दूसरे के लिए तुम्हें उठाना पड़ रहा है? धर्मपुत्र ने साधु को सब बातें सुना दीं। धर्म-पिता की बात कहा, रीछनी और उसके बच्चों की घटना सुनाई, मुहरबंद कमरे और सिंहासन का हाल बताया। फिर धर्म-पिता ने जो आदेश देकर उसे भेजा था, वह कह सुनाया। रास्ते में जो किसान बछड़े का पीछा करने में ख़ूब खेत रौंद रहे थे और कैसे फिर बछड़ा मालिक की पुकार पर अपने आप खेत से बाहर आ गया, वह सुनाया। अंत में बोला कि यह तो मैं देख चुका हूँ कि बुराई का मेट बुराई से नहीं किया जा सकता। पर यह समझ में नहीं आता कि उसे फिर मिटाया कैसे जा सकता है। मुझे बतलाएँ कि यह कैसे किया जाए।
साधु ने कहा, और कुछ तुमने रास्ते में देखा हो तो बताओ?
धर्मपुत्र ने बतला दिया कि कैसे मेज़ साफ़ करती औरत देखी थी और कुछ देहाती हाल मोड़ते हुए मिले थे और बनजारे आग जलाना चाह रहे थे।
साधु सब सुनते रहे। फिर कुटिया में गए और अंदर से एक पुराना कुल्हाड़ा लेकर आए। कहा, मेरे साथ आओ।
कुछ दूर जाने पर साधु ने एक पेड़ बताया। कहा, इसे काट डालो।
धर्मपुत्र ने यह पेड़ काट गिराया।
साधु ने कहा, अब इसके तीन टुकड़े करो।
धर्मपुत्र ने पेड़ के तीन टुकड़े कर दिए।
इस पर साधु फिर कुटिया में गए और वहाँ से कुछ जलती लकड़ियाँ लाए, बोले, इनसे तीनों टुकड़ों को आग दे दो।
धर्मपुत्र ने आग जलाई और पेड़ के उन बड़े-बड़े तीनों टुकड़ों को उनमें डाल दिया। जलते-जलते उनकी जगह तीन काले कुंदे ठूँठ रह गए।
साधु ने कहा, अब इनको धरती में गाड़ दो, ऐसे कि आधे धरती में रहें, आधे ऊपर।
धर्मपुत्र ने वैसा ही किया।
पानी भरकर लाओ। लाकर इन ठूँठों की जड़ में सींच दो। पहले ठूँठ को सींचो, जैसे अब देखो, वहाँ सामने पहाड़ी की तलहटी में एक नदी है। वहाँ से मुँह में कि तुमने पहले स्त्री को सीख दी थी। दूसरे को सींचो, क्योंकि हाल मोड़ने वाले किसानों को उपदेश दिया था। और इस तीसरे को बनजारों के नाम पर सींचे जाओ। जब इनमें जड़ें जम आएँगी और कल्ले फूटने लगेंगे और उन काले ठूँठों की जगह सेब के दरख़्त हो आएँगे तब तुम भी समझ जाओगे कि आदमी में बुराई को कैसे मेटा जाना चाहिए। तब तुम्हारे सब पाप धुल जाएँगे।
इतना कहकर साधु अपनी कुटिया में चले गए। धर्मपुत्र बहुत देर तक सोचता-विचारता रहा। लेकिन साधु की बात का भेद न पा सका। तो भी साधु ने जैसा बताया था वैसा ही करना उसने शुरू कर दिया।
दस
धर्मपुत्र नदी पर गया, मुँह में पानी लिया और लौटकर पहले ठूँठ में सींच दिया। बार-बार इसी तरह मुँह में पानी ला-लाकर वह तीनों ठूँठों को सींचता रहा। जब उसे बहुत भूख लगी और थकान से चूर हो आया, तो कुटिया की तरफ़ चला कि साधु से कुछ खाने को माँग ले। इधर-उधर देखने पर उसे कुटिया में कुछ सूखी हुई रोटी मिल गई। थोड़ा खाकर उसने भूख शांत की और भीतर कुटी का दरवाज़ा खोला तो देखता है कि साधु की देह वहाँ मृतक पड़ी हुई है। तब वह मृतक देह के कर्म के लिए लकड़ी जमा करने में लगा। दिन में यह किया, रात को मुँह में पानी ला-लाकर ठूँठ सींचने में लगा रहा। रात भर, जब तक बना, वह ऐसा ही करता रहा।
अगले दिन पास के गाँव के कुछ लोग साधु के लिए खाना लेकर वहाँ पहुँचे। आकर देखते हैं कि साधु का तो शरीरांत हो गया है। अपनी जगह वह धर्मपुत्र को छोड़ गए हैं और उसको आशीर्वाद भी दिया है। सो साधु की देह का क्रिया-कर्म किया और जो खाना लाए थे धर्मपुत्र को भेंट कर दिया।
धर्मपुत्र साधु की जगह रहता रहा। लोग जो खाने को दे जाते थे उससे गुज़र करता और साधु के आदेशानुसार उसी नदी से मुँह में भरकर पानी लाता और उन जले ठूँठों पर सींच देता।
इस तरह एक साल बीत गया। इस बीच बहुत लोग उसके दर्शन को आए। उसकी खयाति दूर-दूर फैल गई। लोगों में शोहरत हो गई कि एक पहुँचा हुआ संत है जो आत्मा के उद्धार के लिए पहाड़ी की तलहटी की नदी से मुँह में पानी लेकर आता है और जले ठूँठ सींचता है। सो ठठ-के-ठठ लोग दर्शन करने वहाँ पहुँचने लगे। मालदार, धनी, व्यापारी लोग वहाँ आते और भेंट उपहार लाते। पर वह उसमें अपने तन जितनी चीज़ रखता। बाक़ी सब ग़रीबों को बाँट देता।
इस तरह धर्मपुत्र रहने लगा। आधे दिन ठूँठ में पानी सींचता, बाक़ी आधा दिन आने-जानेवालों से मिलने-बताने में जाता। वह सोचने लगा कि बुराई को मिटाने और पाप धोने के लिए यही तरीक़ा शायद होगा।
एक दिन कुटिया में बैठा था कि कोई आदमी घोड़े पर सवार उधर से निकला। अपनी मौज़ में वह तराने गाता हुआ चला जा रहा था। धर्मपुत्र कुटी से बाहर आया कि कौन आदमी है। देखा कि एक अच्छा मज़बूत जवान है, चुस्त कपड़े हैं और ख़ूब जीन-वीन से लैस एक बढ़िया घोड़े पर सवार है।
धर्मपुत्र ने रोककर पूछा, तुम कौन हो जी, और कहाँ जा रहे हो? लगाम खींचकर उस आदमी ने कहा, मैं डाकू हूँ। ऐसे ही घूमा करता हूँ और जो हाथ लगता है उसे पार करता हूँ। शिकार जितने ज़्यादा मिलते हैं उतनी ही ख़ुशी के मैं गीत गाता हूँ।
धर्मपुत्र के जी में दहल समा गई। सोचने लगा कि ऐसे आदमी में से बदी को कैसे मिटाया जा सकता है। जो अपने आप भक्ति-श्रद्धा में मेरे पास आते हैं उनको कहना तो आसान है और वे अपने गुनाह सहज मान लेते हैं। लेकिन यह तो अपने पाप ही की डींग मारता है।
मन में यह सोच उसने उधर से मुँह मोड़ लिया। ख़याल आया कि अब मैं कैसे करूँगा। यह डाकू यहीं आस-पास घूमता रहेगा और मेरे दर्शन को आने वाले लोग डर के मारे रुक जाएँगे, वे आना-जाना छोड़ देंगे। इससे उनकी भलाई भी रुक जाएगी। और मैं भी भला फिर कैसे रहूँगा?
इसलिए फिर लौटकर उसने डाकू को पुकारकर कहा, यहाँ बहुत लोग मेरे पास आया करते हैं। वे पाप की डींग भरते नहीं आते, बल्कि पछतावे से भरे हुए आते हैं। वे भगवान से क्षमा की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर का डर हो तो तुम भी अपने पापों की क्षमा माँगो। और जो तुम्हारे दिल में पछतावे की कमी न हो तो यहाँ से चले जाओ और फिर कभी इधर न आना। मुझे मत सताना और मेरे पास आने वाले आदमियों को भी मत सताना। अगर नहीं मानोगे तो ईश्वर से सजा पाओगे।
डाकू ठठ मारकर हँसने लगा। बोला, मुझे ईश्वर का डर नहीं है और तुम्हारी बात की परवा नहीं है। तुम कोई मेरे मालिक नहीं हो। तुम अपनी धर्माई पर रहते हो, तो मैं अपनी डकैती पर रहता हूँ। रहना सभी को है। बुढ़िया औरतें जो पास आएँ उन्हीं को पट्टी पढ़ाया करो। मुझे तुमसे सीखने को कुछ नहीं है। और जो ईश्वर की बात तुमने कही, सो इसी नाम पर कल मैं रोज़ से दो ज़्यादा आदमियों को जमघट लगाऊँगा। तुम्हें भी मैं मार सकता हूँ, लेकिन अभी में अपने हाथ ख़राब करना नहीं चाहता। पर देखना, आयंदा मेरी राह न काटना।
इस तरह धमकी देकर डाकू एड़ लगा अपना घोड़ा दौड़ा ले गया। वह फिर लौटकर नहीं आया और धर्मपुत्र पहले की तरह पूरे आठ साल वहाँ शांति से रहता रहा।
ग्यारह
एक रात धर्मपुत्र अपनी कुटी में बैठा था। ठूँठों में पानी दे चुका था। अब ज़रा विश्राम का समय था। उसकी निगाह रास्ते पर लगी थी कि कोई आएगा। वह जैसे प्रतीक्षा में था। लेकिन उस दिन भर कोई नहीं आया। वह शाम तक अकेला बैठा रहा। उसका जी अकेलेपन से ऊब गया। उसे सूना-सूना लगने लगा। उसे पिछली बातें याद आने लगीं। याद आया कि डाकू ने ताने से कहा था कि तुम अपनी धर्माई पर जीते हो, मैं अपनी डकैती पर रहता हूँ। इस पर उसे विचार हुआ कि साधु ने बताया था वैसे मैं नहीं रह रहा हूँ। उन्होंने मुझ पर एक प्रायश्चित डाला था। लेकिन उसमें से मैं तो खाने-कमाने लगा हूँ और गुज़र भी पाने लगा हूँ। होते-होते भक्तों का चढ़ावे का ऐसा आदी हो गया हूँ कि अब वे नहीं आते तो जी ऊबता है और सूना लगता है। जब लोग आते हैं तो मुझे इसीलिए ख़ुशी होती है न कि वे मेरी धर्माई की तारीफ़ करते हैं। यह तो रहने की ठीक विधि नहीं है। मैं प्रशंसा के मोह में बहक रहा हूँ। अपने पुराने पाप तो क्या उतारता, और नए जोड़े जा रहा हूँ। यहाँ से कहीं दूर दूसरी तरफ़ जंगल में मुझे चले जाना चाहिए, जहाँ लोग मुझे पा न सकें। वहाँ फिर मैं ऐसे रहूँगा कि पुराने पाप धुलते जाएँ और नया कोई जमा न हो।
यह मन में धारकर थैली में कुछ रूखी रोट बटोर, एक फावड़ा ले, धर्मपुत्र कुटी छोड़ चल दिया। बराबर घाटी में उसे एक एकांत जगह की याद थी। सोचा कि बस वहाँ पहुँचकर एक गुफ़ा-सी अपने लिए खोदकर तैयार कर लूँगा और लोगों से छुटकारा पाऊँगा।
अपना थैला लटकाए और फावड़ा लिए वह जा रहा था कि उसी की तरफ़ आते हुए डाकू के क़दम उसे सुनाई दिए। धर्मपुत्र को डर लग आया और वह तेज़ क़दम बढ़ चला। लेकिन डाकू ने उसे पकड़ लिया। पूछा, कहाँ जा रहे हो?”
धर्मपुत्र ने कहा, “मैं लोगों से दूर चला जाना चाहता हूँ। कहीं ऐसी जगह रहना चाहता हूँ जहाँ कोई पास न आए।
यह सुनकर डाकू को अचरज हुआ। बोला, लोग पास नहीं आएँगे तो तुम्हारा गुज़ारा कैसे होगा?
धर्मपुत्र को यह सूझा भी नहीं था। डाकू की बात से याद आया कि हाँ, आहार तो आदमी के लिए ज़रूरी है। बोला, जो परमात्मा की दया हो जाएगी उसी पर बसर कर लूँगा।
डाकू ने कुछ नहीं कहा और आगे बढ़ लिया।
धर्मपुत्र सोचने लगा कि मैंने डाकू से अपने रंग-ढंग बदलने के बारे में इस बार क्यों नहीं कहा। शायद अब उसे पछतावा हो। आज तो उसका रुख़ कुछ मुलायम मालूम होता था। अब की उसने मुझे मारने की भी धमकी नहीं दी।
यह सोचकर उसने डाकू को पुकारकर कहा कि सुनते हो, अभी तुम्हें अपने गुनाहों की माफ़ी माँगनी चाहिए। ईश्वर से तो सदा बच नहीं सकते।
यह सुनकर डाकू ने घोड़ा मोड़ पेटी में से खंजर निकाला और धर्मपुत्र को मारने को हुआ। धर्मपुत्र यह देखकर चौंका और सहमा हुआ सीधा अंदर जंगल में बढ़ गया।
डाकू ने उसका पीछा नहीं किया। बस ज़ोर से सुनाकर कहा, दो बार मैं तुम्हें छोड़ चुका हूँ। अगली बार जो कहीं तुमने मुझे टोका, तो तुम्हारी ख़ैर नहीं है, यह समझ लेना।
यह कहकर डाकू अपने रास्ते हो लिया।
उस शाम धर्मपुत्र ठूँठ में पानी देने जो पहुँचता है कि क्या देखता है कि उनमें से एक ठूँठ कल्ले दे रहा है और उसमें से नन्हें सेब की कोंपले चली हैं!
बारह
सबसे अपने को छिपाकर धर्मपुत्र बिलकुल अकेला रहने लगा। रोटी ख़त्म हो गई तो उसने सोचा कि चलूँ, खाने के लिए कहीं कुछ कंद-मूल देखूँ। यह सोचकर वह कुछ दूर चला था कि देखता क्या है कि एक पेड़ की टहनी पर अँगोछे में बँधी रोटियाँ लटकी हुई हैं। उसने वे रोटियाँ ले लीं और जब तक बना, उन पर गुज़ारा करता रहा।
वे ख़त्म हो गईं तो उसी पेड़ पर दुबारा वैसे ही अँगोछा लटका मिला। इस तरह उसका गुज़ारा होता रहा। बस अब कुछ बात थी तो डाकू का डर बाक़ी था। आस-पास कहीं जाते-आते उसकी आहट सुनता तो सहम कर दुबक रहता था। सोचता कि कहीं ऐसा न हो कि मैं अपने पाप धो न पाऊँ, उससे पहले ही डाकू मुझे मार दे।
इस तरह दस साल और हो गए। एक तो उनमें सेब का पेड़ होकर हरिया आया था, लेकिन और दो ठूँठ के ठूँठ रहे। एक सवेरे धर्मपुत्र जल्दी उठा और काम पर पहुँचा। ठूँठ की ज़मीन को मुँह के पानी से काफ़ी गीली करते उसे ख़ूब मेहनत पड़ी। आख़िर थककर वह आराम करने लगा। बैठे-बैठे सोचने लगा। सोचा कि मैंने पाप किया है, इसी से मैं मौत से डरता हूँ। ईश्वर की मर्ज़ी कौन जानता है। हो सकता है कि मौत से ही मेरे पाप धुलनेवाले हों। तब उसका भी स्वागत किए बिना मैं कैसे रह सकता हूँ।
यह ख़याल करके मन आया ही था कि उधर से घोड़े पर सवार जाने किसे गाली देता हुआ डाकू उस तरफ़ ही आता मालूम हुआ। धर्मपुत्र ने सोचा कि सिवा ईश्वर के किसी और से मेरा कुछ बन-बिगड़ क्या सकता है। यह सोचकर वह आगे बढ़कर डाकू को मिला। देखता क्या है कि डाकू अकेला नहीं है। पीछे घोड़े से एक और आदमी बँधा है। मुँह उसका बंद है और हाथ-पैर कसे हुए हैं। वह आदमी कुछ नहीं कर रहा है, पर डाकू उसे मन आई गाली दिए जा रहा है।
धर्मपुत्र बढ़ता हुआ जाकर घोड़े के सामने खड़ा हो गया। पूछा, इस आदमी को कहाँ ले जा रहे हो?
डाकू ने जवाब दिया, जंगल के अंदर लिए जा रहा हूँ। यह एक मालदार बनिए का बेटा है, पर बताता नहीं है कि बाप का माल कहाँ छिपा है। सो कोड़ों से इसकी ख़बर लूँगा तब बताएगा।
यह कहकर वह घोड़े को एड़ लगाने को हुआ कि धर्मपुत्र ने घोड़े की रास पकड़ ली और जाने नहीं दिया। कहा, इस आदमी को छोड़ दो। डाकू को ग़ुस्सा चढ़ आया और उसने मारने को हाथ उठाया—
क्या, तुम भी कुछ मज़ा चखना चाहते हो? जो इस आदमी को मार मिलेगी वह तुम भी चाहो तो वैसी कहो। मैं कह चुका हूँ कि ज़्यादा करोगे तो मेरे हाथ से जान खोओगे। सुना? अब रास छोड़ो।
लेकिन धर्मपुत्र डरा नहीं। बोला, तुम जा नहीं पाओगे। मुझे तुम्हारा डर नहीं है। बस एक ईश्वर का मुझे डर है उसका हुक्म है कि मैं तुम्हें न जाने दूँ। इस आदमी को तुम छोड़ दो।
डाकू को ग़ुस्सा तो आया, लेकिन उसने चाक़ू निकालकर उस आदमी के बँध काट दिए और उसे आज़ाद कर दिया। फिर बोला, अब जाओ, तुम दोनों चले जाओ। और ख़बरदार, जो फिर मेरी राह आड़े आए।
वह वैश्यपुत्र तो घोड़े की पीठ से खिसक चट भाग गया। डाकू भी घोड़े पर सवार हो चलने को था कि धर्मपुत्र ने फिर उसे रोका और कहा कि देखो, अपनी इस बदी से बाज आओ। लेकिन डाकू सब चुपचाप सुनता रहा। आख़िर बिना कुछ बोले वह चला गया।
अगले दिन धर्मपुत्र फिर ठूँठ में पानी देने गया। और अचरज की बात देखो कि दूसरा ठूँठ भी हरा हो रहा था। उसमें भी सेब के पेड़ की कोपलें फूटने लगी थीं!
तेरह
दस साल और बीते। धर्मपुत्र एक दिन शांति से बैठा था। न कोई कामना थी, न आशंका। प्रसन्नता से मन भरा आता था।
सोचा, ईश्वर ने आदमी को कैसी-कैसी न्यामतें बख़्शी हैं। फिर भी नाहक वह कैसा हैरान और परेशान रहता है। क्यों वह ख़ुश नहीं रहता। क्या उसे अड़चन है?...
फिर आदमी ख़ुद जो अपने लिए मुसीबत पैदा करता है और बुराई के बीज बोता है, उसके फल याद कर धर्मपुत्र का जी भर आया। उसने सोचा कि जैसे मैं रहा हूँ, वैसे ही रहते जाना ग़लत है। मुझे चाहिए कि जो सीखा है, चलूँ और वह औरों को भी सिखाऊँ। जो पाता हूँ, सब को दूँ।
यह विचार मन में आना था कि डाकू के घोड़े की टाप उसे सुन पड़ी। लेकिन वह उसे रोकने नहीं बढ़ा। सोचा कि उसे कहने-सुनने से क्या फ़ायदा है। वह कुछ समझ नहीं सकता।
पहले तो यह विचार आया; फिर मन बदल गया और धर्मपुत्र बढ़कर सड़क पर आ पहुँचा। आते हुए डाकू को देखा कि वह उदास है, आँखें उसकी झुकी हुई हैं। धर्मपुत्र को देखकर दया आई और पास पहुँचकर उसकी रानों पर हाथ रखकर उसने कहा, भाई, अपने आप पर अब रहम करो। तुम्हारे अंदर ईश्वर का वास है। तुम तक़लीफ़ पाते हो इसी से औरों को सताते हो। नतीजा यह कि आगे के लिए और तक़लीफ़ जमा करते जा रहे हो। लेकिन ईश्वर तुम्हें प्यार करता है और तुम्हें अपनाने को सदा तैयार है। देखो, अपने को बिलकुल बरबाद न करो। अभी बदल सकते हो।
पर डाकू नाराज़ होकर अपनी राह चलने को हुआ। बोला, अपने काम-से-काम रखो—
लेकिन धर्मपुत्र ने डाकू को और कस के पकड़ लिया और उसकी आँखों से तार-तार आँसू गिरने लगे।
डाकू ने इस पर आँख उठाई और धर्मपुत्र की तरफ़ देखा। जाने कैसे और कितनी देर देखता रहा। फिर एकाएक घोड़े से नीचे उतर वह धर्मपुत्र के चरणों में घुटनों आ बैठा।
बोला, तुमने आख़िर मुझे जीत ही लिया, भाई! बीस साल तक मैं अड़ा रहा, लेकिन आख़िर तुमने मुझे जीत ही लिया। अब जो चाहे मेरा करो, मैं तुम्हारे हाथ हूँ और बेबस हूँ। जब तुमने पहले मुझे सीख देने की कोशिश की, उससे मुझे और ग़ुस्सा चढ़ आया था। पर तुम जब लोगों से अपने-आप को दूर ले गए तब मुझे तुम्हारे शब्दों पर ख़याल हुआ। क्योंकि तब मैंने देखा कि उन लोगों से तुम्हें अपनी कोई गरज नहीं है। उसी दिन के बाद से मैं तुम्हें खाना पहुँचाने लगा। मैं ही पेड़ पर अँगोछा बाँध जाया करता था।
धर्मपुत्र को याद आई वही पुरानी बात। उस स्त्री की मेज़ तभी साफ़ झड़ सकी थी जब झाड़न को साफ कर लिया गया था। इसी तरह जब कोई अपनी परवाह और गरज छोड़कर अपने दिल को साफ़ कर लेगा तभी वह दूसरों के दिल की सफ़ाई कर सकेगा।
डाकू आगे बोला, जब मैंने देखा कि तुम्हें मौत का डर नहीं है उस समय से मेरा दिल भी बदल चला।
और धर्मपुत्र को याद आई वह हाल मोड़ने की घटना। जब तक एक जगह लोहे का सिरा किसी थिर चीज़ में नहीं अटका दिया गया कि हाल नहीं मुड़ी। ऐसे ही जब तक मौत का डर दूर कर जीवन को ईशनिष्ठान में स्थिर नहीं कर लिया गया तब तक इस आदमी के अक्खड़ मन पर क़ाबू पाना भी नहीं हो सका।
डाकू ने कहा, लेकिन मेरा मन तब तो पिघलकर पानी-पानी हो आया जब करुणा के मारे तुम्हारी आँखों से अपने लिए मैंने आँसू ढरते देखे।
धर्मपुत्र सत्य की यह महिमा सुनकर मग्न हो आया। फिर वह अपने ठूँठों के पास गया और डाकू को भी साथ ले गया। जाकर दोनों देखते हैं तो तीसरे ठूँठ में भी सेब का कल्ला फूट गया है और हरी झाँकी दे रहा है! उस समय धर्मपुत्र को याद आया कि बनजारों की घास तब तक आग न पकड़ सकी थी जब तक पहले छिपटियाँ अच्छी तरह न सुलग लेने दी गई थीं। इस तरह जब उसका अपना दिल सहानुभूति की गरमी से जलने—जैसा हो गया था तभी वह दूसरे के दिल को अपनी लौ से जगा भी सका, पहले नहीं।
और धर्मपुत्र ने इस भाँति प्रकाश पाने और अपने पापों के क्षय हो जाने पर बहुत आभार और आनंद माना।
फिर उसने डाकू को अपनी सारी जीवन-कथा कह सुनाई। इस भाँति अपना सब मर्म उसे भेंट करने के अनंतर धर्मपुत्र ने शरीर छोड़ दिया। डाकू ने उसकी देह की अंत्येष्टि की और धर्मपुत्र के कहे अनुसार ही रहने लगा। धर्मपुत्र से जो उसने पाया था, सब कहीं उसी का वितरण करने में वह लग गया।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें