Aziz Warsi Ghazals / अज़ीज़ वारसी की ग़ज़लें
सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा
अज़ीज़ वारसी
अगस्त 28, 2025 | No Comments |
अज़ीज़ वारसी
अगस्त 28, 2025 | No Comments |
अगस्त 28, 2025 | No Comments |
अगस्त 20, 2025 | No Comments |
है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग़्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
मैं ने पलकों से दर-ए-यार पे दस्तक दी है
मैं वो साइल हूँ जिसे कोई सदा याद नहीं
मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहू
हम से कहते हैं वही अहद-ए-वफ़ा याद नहीं
कैसे भर आईं सर-ए-शाम किसी की आँखें
कैसे थर्राई चराग़ों की ज़िया याद नहीं
सिर्फ़ धुँदलाए सितारों की चमक देखी है
कब हुआ कौन हुआ किस से ख़फ़ा याद नहीं
ज़िंदगी जब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की पाई है सज़ा याद नहीं
आओ इक सज्दा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं कि 'साग़र' को ख़ुदा याद नहीं
वो बुलाएँ तो क्या तमाशा हो
हम न जाएँ तो क्या तमाशा हो
ये किनारों से खेलने वाले
डूब जाएँ तो क्या तमाशा हो
बंदा-पर्वर जो हम पे गुज़री है
हम बताएँ तो क्या तमाशा हो
आज हम भी तिरी वफ़ाओं पर
मुस्कुराएँ तो क्या तमाशा हो
तेरी सूरत जो इत्तिफ़ाक़ से हम
भूल जाएँ तो क्या तमाशा हो
वक़्त की चंद साअ'तें 'साग़र'
लौट आएँ तो क्या तमाशा हो
ये जो दीवाने से दो-चार नज़र आते हैं
इन में कुछ साहिब-ए-असरार नज़र आते हैं
तेरी महफ़िल का भरम रखते हैं सो जाते हैं
वर्ना ये लोग तो बेदार नज़र आते हैं
दूर तक कोई सितारा है न कोई जुगनू
मर्ग-ए-उम्मीद के आसार नज़र आते हैं
मिरे दामन में शरारों के सिवा कुछ भी नहीं
आप फूलों के ख़रीदार नज़र आते हैं
कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र
आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं
हश्र में कौन गवाही मिरी देगा 'साग़र'
सब तुम्हारे ही तरफ़-दार नज़र आते हैं
मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया
ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया
इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके
यज़्दाँ के वाक़िआ'त से घबरा के पी गया
छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार
कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया
मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया
दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत
दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया
काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या
फूलों की वारदात से घबरा के पी गया
'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर
उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया
एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं
वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं
जी में आता है उलट दें उन के चेहरे से नक़ाब
हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं
शम्अ जिस की आबरू पर जान दे दे झूम कर
वो पतिंगा जल तो जाता है फ़ना होता नहीं
अब तो मुद्दत से रह-ओ-रस्म-ए-नज़ारा बंद है
अब तो उन का तूर पर भी सामना होता नहीं
हर शनावर को नहीं मिलता तलातुम से ख़िराज
हर सफ़ीने का मुहाफ़िज़ नाख़ुदा होता नहीं
हर भिकारी पा नहीं सकता मक़ाम-ए-ख़्वाजगी
हर कस-ओ-ना-कस को तेरा ग़म अता होता नहीं
हाए ये बेगानगी अपनी नहीं मुझ को ख़बर
हाए ये आलम कि तू दिल से जुदा होता नहीं
बारहा देखा है 'साग़र' रहगुज़ार-ए-इश्क़ में
कारवाँ के साथ अक्सर रहनुमा होता नहीं
चराग़-ए-तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है
ज़रा नक़ाब उठाओ बड़ा अँधेरा है
अभी तो सुब्ह के माथे का रंग काला है
अभी फ़रेब न खाओ बड़ा अँधेरा है
वो जिन के होते हैं ख़ुर्शीद आस्तीनों में
उन्हें कहीं से बुलाओ बड़ा अँधेरा है
मुझे तुम्हारी निगाहों पे ए'तिमाद नहीं
मिरे क़रीब न आओ बड़ा अँधेरा है
फ़राज़-ए-अर्श से टूटा हुआ कोई तारा
कहीं से ढूँड के लाओ बड़ा अँधेरा है
बसीरतों पे उजालों का ख़ौफ़ तारी है
मुझे यक़ीन दिलाओ बड़ा अँधेरा है
जिसे ज़बान-ए-ख़िरद में शराब कहते हैं
वो रौशनी सी पिलाओ बड़ा अँधेरा है
ब-नाम-ए-ज़ोहरा-जबीनान-ए-ख़ित्ता-ए-फ़िर्दौस
किसी किरन को जगाओ बड़ा अँधेरा है
रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
दो दिन की मसर्रत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
जब जाम दिया था साक़ी ने जब दौर चला था महफ़िल में
इक होश की साअत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
अब वक़्त के नाज़ुक होंटों पर मजरूह तरन्नुम रक़्साँ है
बेदाद-ए-मशिय्यत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
एहसास के मय-ख़ाने में कहाँ अब फ़िक्र-ओ-नज़र की क़िंदीलें
आलाम की शिद्दत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
कुछ हाल के अंधे साथी थे कुछ माज़ी के अय्यार सजन
अहबाब की चाहत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
काँटों से भरा है दामन-ए-दिल शबनम से सुलगती हैं पलकें
फूलों की सख़ावत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
अब अपनी हक़ीक़त भी 'साग़र' बे-रब्त कहानी लगती है
दुनिया की हक़ीक़त क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए
पूछा किसी ने हाल किसी का तो रो दिए
पानी में 'अक्स चाँद का देखा तो रो दिए
नग़्मा किसी ने साज़ पे छेड़ा तो रो दिए
ग़ुंचा किसी ने शाख़ से तोड़ा तो रो दिए
उड़ता हुआ ग़ुबार सर-ए-राह देख कर
अंजाम हम ने 'इश्क़ का सोचा तो रो दिए
बादल फ़ज़ा में आप की तस्वीर बन गए
साया कोई ख़याल से गुज़रा तो रो दिए
रंग-ए-शफ़क़ से आग शगूफ़ों में लग गई
साग़र हमारे हाथ से छलका तो रो दिए
महफ़िलें लुट गईं जज़्बात ने दम तोड़ दिया
साज़ ख़ामोश हैं नग़्मात ने दम तोड़ दिया
हर मसर्रत ग़म-ए-दीरोज़ का उन्वान बनी
वक़्त की गोद में लम्हात ने दम तोड़ दिया
अन-गिनत महफ़िलें महरूम-ए-चराग़ाँ हैं अभी
कौन कहता है कि ज़ुल्मात ने दम तोड़ दिया
आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़
आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया
जिन से अफ़्साना-ए-हस्ती में तसलसुल था कभी
उन मोहब्बत की रिवायात ने दम तोड़ दिया
झिलमिलाते हुए अश्कों की लड़ी टूट गई
जगमगाती हुई बरसात ने दम तोड़ दिया
हाए आदाब-ए-मोहब्बत के तक़ाज़े 'साग़र'
लब हिले और शिकायात ने दम तोड़ दिया
ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा
अब न आएँगे रूठने वाले
दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा
जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल
उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा
छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू
रूठ जाते हैं यार चुप हो जा
हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में
कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा
हादसों की न आँख खुल जाए
हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा
गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र'
टूट जाते हैं तार चुप हो जा
भूली हुई सदा हूँ मुझे याद कीजिए
तुम से कहीं मिला हूँ मुझे याद कीजिए
मंज़िल नहीं हूँ ख़िज़्र नहीं राहज़न नहीं
मंज़िल का रास्ता हूँ मुझे याद कीजिए
मेरी निगाह-ए-शौक़ से हर गुल है देवता
मैं इश्क़ का ख़ुदा हूँ मुझे याद कीजिए
नग़्मों की इब्तिदा थी कभी मेरे नाम से
अश्कों की इंतिहा हूँ मुझे याद कीजिए
गुम-सुम खड़ी हैं दोनों जहाँ की हक़ीक़तें
मैं उन से कह रहा हूँ मुझे याद कीजिए
'साग़र' किसी के हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल-शिआर की
बहकी हुई अदा हूँ मुझे याद कीजिए
वक़्त की 'उम्र क्या बड़ी होगी
इक तिरे वस्ल की घड़ी होगी
दस्तकें दे रही है पलकों पर
कोई बरसात की झड़ी होगी
क्या ख़बर थी कि नोक-ए-ख़ंजर भी
फूल की एक पंखुड़ी होगी
ज़ुल्फ़ बल खा रही है माथे पर
चाँदनी से सबा लड़ी होगी
ऐ 'अदम के मुसाफ़िरो हुश्यार
राह में ज़िंदगी खड़ी होगी
क्यूँ गिरह गेसुओं में डाली है
जाँ किसी फूल की अड़ी होगी
इल्तिजा का मलाल क्या कीजे
उन के दर पर कहीं पड़ी होगी
मौत कहते हैं जिस को ऐ 'साग़र'
ज़िंदगी की कोई कड़ी होगी
अगर बज़्म-ए-हस्ती में औरत न होती
ख़यालों की रंगीन जन्नत न होती
सितारों के दिलकश फ़साने न होते
बहारों की नाज़ुक हक़ीक़त न होती
जबीनों पे नूर-ए-मसर्रत न खिलता
निगाहों में शान-ए-मुरव्वत न होती
घटाओं की आमद को सावन तरसते
फ़ज़ाओं में बहकी बग़ावत न होती
फ़क़ीरों को इरफ़ान-ए-हस्ती न मिलता
अता ज़ाहिदों को इबादत न होती
मुसाफ़िर सदा मंज़िलों पर भटकते
सफ़ीनों को साहिल की क़ुर्बत न होती
हर इक फूल का रंग फीका सा रहता
नसीम-ए-बहाराँ में निकहत न होती
ख़ुदाई का इंसाफ़ ख़ामोश रहता
सुना है किसी की शफ़ाअत न होती
बात फूलों की सुना करते थे
हम कभी शेर कहा करते थे
मिशअलें ले के तुम्हारे ग़म की
हम अंधेरों में चला करते थे
अब कहाँ ऐसी तबीअत वाले
चोट खा कर जो दुआ करते थे
तर्क-ए-एहसास-ए-मोहब्बत मुश्किल
हाँ मगर अहल-ए-वफ़ा करते थे
बिखरी बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों वाले
क़ाफ़िले रोक लिया करते थे
आज गुलशन में शगूफ़े 'साग़र'
शिकवा-ए-बाद-ए-सबा करते थे
बरगश्ता-ए-यज़्दान से कुछ भूल हुई है
भटके हुए इंसान से कुछ भूल हुई है
ता-हद्द-ए-नज़र शोले ही शोले हैं चमन में
फूलों के निगहबान से कुछ भूल हुई है
जिस अहद में लुट जाए फ़क़ीरों की कमाई
उस अहद के सुल्तान से कुछ भूल हुई है
हँसते हैं मिरी सूरत-ए-मफ़्तूँ पे शगूफ़े
मेरे दिल-ए-नादान से कुछ भूल हुई है
हूरों की तलब और मय ओ साग़र से है नफ़रत
ज़ाहिद तिरे इरफ़ान से कुछ भूल हुई है
ऐ हुस्न-ए-लाला-फ़ाम! ज़रा आँख तो मिला
ख़ाली पड़े हैं जाम! ज़रा आँख तो मिला
कहते हैं आँख आँख से मिलना है बंदगी
दुनिया के छोड़ काम! ज़रा आँख तो मिला
क्या वो न आज आएँगे तारों के साथ साथ
तन्हाइयों की शाम! ज़रा आँख तो मिला
ये जाम ये सुबू ये तसव्वुर की चाँदनी
साक़ी कहाँ मुदाम! ज़रा आँख तो मिला
साक़ी मुझे भी चाहिए इक जाम-ए-आरज़ू
कितने लगेंगे दाम! ज़रा आँख तो मिला
पामाल हो न जाए सितारों की आबरू
ऐ मेरे ख़ुश-ख़िराम! ज़रा आँख तो मिला
हैं राह-ए-कहकशाँ में अज़ल से खड़े हुए
'साग़र' तिरे ग़ुलाम! ज़रा आँख तो मिला
झूम कर गाओ मैं शराबी हूँ
रक़्स फ़रमाओ मैं शराबी हूँ
एक सज्दा ब-नाम-ए-मय-ख़ाना
दोस्तो आओ मैं शराबी हूँ
लोग कहते हैं रात बैत चुकी
मुझ को समझाओ मैं शराबी हूँ
आज इन रेशमी घटाओं को
यूँ न बिखराओ मैं शराबी हूँ
हादसे रोज़ होते रहते हैं
भूल भी जाओ मैं शराबी हूँ
मुझ पे ज़ाहिर है आप का बातिन
मुँह न खुलवाओ मैं शराबी हूँ
तारों से मेरा जाम भरो मैं नशे में हूँ
ऐ साकिनान-ए-ख़ुल्द सुनो मैं नशे में हूँ
कुछ फूल खिल रहे हैं सर-ए-शाख़-ए-मय-कदा
तुम ही ज़रा ये फूल चुनो मैं नशे में हूँ
ठहरो अभी तो सुब्ह का मारा है ज़ौ-फ़िशाँ
देखो मुझे फ़रेब न दो मैं नशे में हूँ
नश्शा तो मौत है ग़म-ए-हस्ती की धूप में
बिखरा के ज़ुल्फ़ साथ चलो मैं नशे में हूँ
मेला यूँ ही रहे ये सर-ए-रहगुज़ार-ए-ज़ीस्त
अब जाम सामने ही रखो मैं नशे में हूँ
पायल छनक रही है निगार-ए-ख़याल की
कुछ एहतिमाम-ए-रक़्स करो मैं नशे में हूँ
मैं डगमगा रहा हूँ बयाबान-ए-होश में
मेरे अभी क़रीब रहो मैं नशे में हूँ
है सिर्फ़ इक तबस्सुम-ए-रंगीं बहुत मुझे
'साग़र' ब-दोश लाला-रुख़ो मैं नशे में हूँ
चाक-ए-दामन को जो देखा तो मिला ईद का चाँद
अपनी तक़दीर कहाँ भूल गया ईद का चाँद
उन के अबरू-ए-ख़मीदा की तरह तीखा है
अपनी आँखों में बड़ी देर छुपा ईद का चाँद
जाने क्यूँ आप के रुख़्सार महक उठते हैं
जब कभी कान में चुपके से कहा ईद का चाँद
दूर वीरान बसेरे में दिया हो जैसे
ग़म की दीवार से देखा तो लगा ईद का चाँद
ले के हालात के सहराओं में आ जाता है
आज भी ख़ुल्द की रंगीन फ़ज़ा ईद का चाँद
तल्ख़ियाँ बढ़ गईं जब ज़ीस्त के पैमाने में
घोल कर दर्द के मारों ने पिया ईद का चाँद
चश्म तो वुसअ'त-ए-अफ़्लाक में खोई 'साग़र'
दिल ने इक और जगह ढूँड लिया ईद का चाँद
मुस्कुराओ बहार के दिन हैं
गुल खिलाओ बहार के दिन हैं
दुख़तरान-ए-चमन के क़दमों पर
सर झुकाओ बहार के दिन हैं
मय नहीं है तो अश्क-ए-ग़म ही सही
पी भी जाओ बहार के दिन हैं
तुम गए रौनक़-ए-बहार गई
तुम न जाओ बहार के दिन हैं
हाँ कोई वारदात-ए-साग़र-ओ-मय
कुछ सुनाओ बहार के दिन हैं
तिरी नज़र के इशारों से खेल सकता हूँ
जिगर-फरोज़ शरारों से खेल सकता हूँ
तुम्हारे दामन-ए-रंगीं का आसरा ले कर
चमन के मस्त नज़ारों से खेल सकता हूँ
किसी के अहद-ए-मोहब्बत की याद बाक़ी है
बड़े हसीन सहारों से खेल सकता हूँ
मक़ाम-ए-होश-ओ-ख़िरद इंतिक़ाम-ए-वहशत है
जुनूँ की राह-गुज़ारों से खेल सकता हूँ
मुझे ख़िज़ाँ के बगूले सलाम करते हैं
हया-फ़रोश चनारों से खेल सकता हूँ
शराब ओ शेर के दरिया में डूब कर 'साग़र'
सुरूर-ओ-कैफ़ के धारों से खेल सकता हूँ
अन्य ग़ज़लकारों शायरों की ग़ज़लें / रचनाएं
राजेन्द्र मनचंदा बानी की ग़ज़लें / Rajinder Manchanda Bani Ghazals
शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें / Shariq Kaifi Ghazals
साक़ी फ़ारुक़ी की ग़ज़लें / Saqi Faruqi Ghazals
अगस्त 20, 2025 | No Comments |
वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
इक रात के राही हैं गुज़र जाएँगे इक दिन
यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंग
जैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन
दिल आज भी जलता है उसी तेज़ हवा में
ऐ तेज़ हवा देख बिखर जाएँगे इक दिन
यूँ है कि तआक़ुब में है आसाइश-ए-दुनिया
यूँ है कि मोहब्बत से मुकर जाएँगे इक दिन
यूँ होगा कि इन आँखों से आँसू न बहेंगे
ये चाँद सितारे भी ठहर जाएँगे इक दिन
अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी
ये सब्र का मक़ाम है गिर्या न कर अभी
जिस की सख़ावतों की ज़माने में धूम है
वो हाथ सो गया है तक़ाज़ा न कर अभी
नज़रें जला के देख मनाज़िर की आग में
असरार-ए-काएनात से पर्दा न कर अभी
ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी
दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ न डाल
ऐ रौशनी-फ़रोश अंधेरा न कर अभी
मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला
साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला
मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक
दिल बुझ गया कि रात वो बरहम नहीं मिला
बस अपने सामने ज़रा आँखें झुकी रहीं
वर्ना मिरी अना में कहीं ख़म नहीं मिला
उस से तरह तरह की शिकायत रही मगर
मेरी तरफ़ से रंज उसे कम नहीं मिला
एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए
ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला
मिरा अकेला ख़ुदा याद आ रहा है मुझे
ये सोचता हुआ गिरजा बुला रहा है मुझे
मुझे ख़बर है कि इक मुश्त-ए-ख़ाक हूँ फिर भी
तू क्या समझ के हवा में उड़ा रहा है मुझे
ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ
वो कौन है जो दियों में जला रहा है मुझे
उसी का ध्यान है और प्यास बढ़ती जाती है
वो इक सराब कि सहरा बना रहा है मुझे
मैं आँसुओं में नहाया हुआ खड़ा हूँ अभी
जनम जनम का अंधेरा बुला रहा है मुझे
ये कौन आया शबिस्ताँ के ख़्वाब पहने हुए
सितारे ओढ़े हुए माहताब पहने हुए
तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में
वो मेरी रूह में उतरा हिजाब पहने हुए
मुझे कहीं कोई चश्मा नज़र नहीं आया
हज़ार दश्त पड़े थे सराब पहने हुए
क़दम क़दम पे थकन साज़-बाज़ करती है
सिसक रहा हूँ सफ़र का अज़ाब पहने हुए
मगर सबात नहीं बे-सबील रस्तों में
कि पाँव सो गए 'साक़ी' रिकाब पहने हुए
बदन चुराते हुए रूह में समाया कर
मैं अपनी धूप में सोया हुआ हूँ साया कर
ये और बात कि दिल में घना अंधेरा है
मगर ज़बान से तो चाँदनी लुटाया कर
छुपा हुआ है तिरी आजिज़ी के तरकश में
अना के तीर इसी ज़हर में बुझाया कर
कोई सबील कि प्यासे पनाह माँगते हैं
सफ़र की राह में परछाइयाँ बिछाया कर
ख़ुदा के वास्ते मौक़ा' न दे शिकायत का
कि दोस्ती की तरह दुश्मनी निभाया कर
अजब हुआ कि गिरह पड़ गई मोहब्बत में
जो हो सके तो जुदाई में रास आया कर
नए चराग़ जला याद के ख़राबे में
वतन में रात सही रौशनी मनाया कर
हैं सेहर-ए-मुसव्विर में क़यामत नहीं करते
रंगों से निकलने की जसारत नहीं करते
अफ़्सोस के जंगल में भटकते हैं ख़यालात
रम भूल गए ख़ौफ़ से वहशत नहीं करते
तुम और किसी के हो तो हम और किसी के
और दोनों ही क़िस्मत की शिकायत नहीं करते
मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था
इस वास्ते अपनों से मोहब्बत नहीं करते
ये कह के हमें छोड़ गई रौशनी इक रात
तुम अपने चराग़ों की हिफ़ाज़त नहीं करते
सोच में डूबा हुआ हूँ अक्स अपना देख कर
जी लरज़ उट्ठा तिरी आँखों में सहरा देख कर
प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर
भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देख कर
एक दिन आँखों में बढ़ जाएगी वीरानी बहुत
एक दिन रातें डराएँगी अकेला देख कर
एक दुनिया एक साए पर तरस खाती हुई
लौट कर आया हूँ मैं अपना तमाशा देख कर
उम्र भर काँटों में दामन कौन उलझाता फिरे
अपने वीराने में आ बैठा हूँ दुनिया देख कर
मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा
ये हादिसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा
मैं रक़्स करता रहा सारी उम्र वहशत में
हज़ार हल्क़ा-ए-ज़ंजीर बाम-ओ-दर में रहा
तिरे फ़िराक़ की क़ीमत हमारे पास न थी
तिरे विसाल का सौदा हमारे सर में रहा
ये आग साथ न होती तो राख हो जाते
अजीब रंग तिरे नाम से हुनर में रहा
अब एक वादी-ए-निस्याँ में छुपता जाता है
वो एक साया कि यादों की रहगुज़र में रहा
सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने
वो अंदेशे थे रंग आँखों के गहरे कर लिए हम ने
ख़ुदा की तरह शायद क़ैद हैं अपनी सदाक़त में
अब अपने गिर्द अफ़्सानों के पहरे कर लिए हम ने
ज़माना पेच-अंदर-पेच था हम लोग वहशी थे
ख़याल आज़ार थे लहजे इकहरे कर लिए हम ने
मगर उन सीपियों में पानियों का शोर कैसा था
समुंदर सुनते सुनते कान बहरे कर लिए हम ने
वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है
दिवाली देख ली हम ने दसहरे कर लिए हम ने
आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो
रूह में रौशनी लहजे में चमक पैदा हो
एक शोला मेरी आवाज़ में लहराता है
ख़ून में लहर ख़यालों में ललक पैदा हो
क़त्ल करने का इरादा है मगर सोचता हूँ
तू अगर आए तो हाथों में झिजक पैदा हो
इस तरह अपनी ही सच्चाई पर इसरार न कर
ये न हो और तिरी बात में शक पैदा हो
मुझ से बहते हुए आँसू नहीं लिक्खे जाते
काश इक दिन मेरे लफ़्ज़ों में लचक पैदा हो
जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी
जान का काम फ़क़त जान-फ़रोशी निकला
ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँ
जब कि ये मिलना बिछड़ना मिरी मर्ज़ी निकला
सिर्फ़ रोना है कि जीना पड़ा हल्का बन के
वो तो एहसास की मीज़ान पे भारी निकला
इक नए नाम से फिर अपने सितारे उलझे
ये नया खेल नए ख़्वाब का बानी निकला
वो मिरी रूह की उलझन का सबब जानता है
जिस्म की प्यास बुझाने पे भी राज़ी निकला
मेरी बुझती हुई आँखों से किरन चुनता है
मेरी आँखों का खंडर शहर-ए-मआनी निकला
मेरी अय्यार निगाहों से वफ़ा माँगता है
वो भी मोहताज मिला वो भी सवाली निकला
मैं उसे ढूँढ रहा था कि तलाश अपनी थी
इक चमकता हुआ जज़्बा था कि जाली निकला
मैं ने चाहा था कि अश्कों का तमाशा देखूँ
और आँखों का ख़ज़ाना था कि ख़ाली निकला
इक नई धूप में फिर अपना सफ़र जारी है
वो घना साया फ़क़त तिफ़्ल-ए-तसल्ली निकला
मैं बहुत तेज़ चला अपनी तबाही की तरफ़
उस के छुटने का सबब नर्म-ख़िरामी निकला
रूह का दश्त वही जिस्म का वीराना है
हर नया राज़ पुराना लगा बासी निकला
सिर्फ़ हशमत की तलब जाह की ख़्वाहिश पाई
दिल को बे-दाग़ समझता था जज़ामी निकला
इक बला आती है और लोग चले जाते हैं
इक सदा कहती है हर आदमी फ़ानी निकला
मैं वो मुर्दा हूँ कि आँखें मिरी ज़िंदों जैसी
बैन करता हूँ कि मैं अपना ही सानी निकला
इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते
तू अपने गहन में है तो मैं अपने गहन में
दो चाँद हैं इक अब्र में गह भी नहीं सकते
हम-जिस्म हैं और दोनों की बुनियादें अमर हैं
अब कैसे बिछड़ जाएँ कि ढह भी नहीं सकते
दरिया हूँ किसी रोज़ मुआविन की तरह मिल
ये क्या कि हम इक लहर में बह भी नहीं सकते
ख़्वाब आएँ कहाँ से अगर आँखें हों पुरानी
और सुब्ह तक इस ख़ौफ़ में रह भी नहीं सकते
वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है
मिरी यादों में इक भूला हुआ चेहरा भी रहता है
जब उस की सर्द-मेहरी देखता हूँ बुझने लगता हूँ
मुझे अपनी अदाकारी का अंदाज़ा भी रहता है
मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता
मगर ख़ुद से बिछड़ जाने का अंदेशा भी रहता है
जो मुमकिन हो तो पुर-असरार दुनियाओं में दाख़िल हो
कि हर दीवार में इक चोर दरवाज़ा भी रहता है
बस अपनी बेबसी की सातवीं मंज़िल में ज़िंदा हूँ
यहाँ पर आग भी रहती है और नौहा भी रहता है
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली
इक क़ुल्ज़ुम-ए-हयात की जानिब चली थी उम्र
इक दिन ये जू-ए-तिश्नगी सहरा से आ मिली
ये कैसी बे-हिसी है कि पत्थर हुई है आँख
वैसे तो आँसुओं की कुमक बार-हा मिली
मैं काँप उठा था ख़ुद को वफ़ादार देख कर
मौज-ए-वफ़ा के पास ही मौज-ए-फ़ना मिली
दीवार-ए-हिज्र पर थे बहुत साहिबों के नाम
ये बस्ती-ए-फ़िराक़ भी शोहरत-सरा मिली
फिर रूद-ए-बेवफ़ाई मैं बहता रहा ये जिस्म
ये रंज है कि तेरी तरफ़ से दुआ मिली
वो कौन ख़ुश-नसीब थे जो मुतमइन फिरे
मुझ को तो उस निगाह से उसरत सिवा मिली
ये उम्र उम्र कोई तआक़ुब में क्यूँ रहे
यादों में गूँजती हुई किस की सदा मिली
जिस की हवस के वास्ते दुनिया हुई अज़ीज़
वापस हुए तो उस की मोहब्बत ख़फ़ा मिली
पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला
ये वही जिस्म का आहन है कि मिट्टी निकला
मेरे हम-राह वही तोहमत-ए-आज़ादी है
मेरा हर अहद वही अहद-ए-असीरी निकला
एक चेहरा था कि अब याद नहीं आता है
एक लम्हा था वही जान का बैरी निकला
एक मात ऐसी है जो साथ चली आती है
वर्ना हर चाल से जीते हुए बाज़ी निकला
मौज की तरह बहा दर्द के दरियाओं में
इस तरह ज़िंदा बचा कौन मगर जी निकला
मैं अजब देखने वाला हूँ कि अंधा कहलाऊँ
वो अजब ख़ाक का पुतला था कि नूरी निकला
जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी
जान का काम फ़क़त जान-फ़रोशी निकला
ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँ
जब कि ये मिलना बिछड़ना मिरी मर्ज़ी निकला
सिर्फ़ रोना है कि जीना पड़ा हल्का बन के
वो तो एहसास की मीज़ान पे भारी निकला
इक नए नाम से फिर अपने सितारे उलझे
ये नया खेल नए ख़्वाब का बानी निकला
वो मिरी रूह की उलझन का सबब जानता है
जिस्म की प्यास बुझाने पे भी राज़ी निकला
मेरी बुझती हुई आँखों से किरन चुनता है
मेरी आँखों का खंडर शहर-ए-मआनी निकला
मेरी अय्यार निगाहों से वफ़ा माँगता है
वो भी मोहताज मिला वो भी सवाली निकला
मैं उसे ढूँड रहा था कि तलाश अपनी थी
इक चमकता हुआ जज़्बा था कि जाली निकला
मैं ने चाहा था कि अश्कों का तमाशा देखूँ
और आँखों का ख़ज़ाना था कि ख़ाली निकला
इक नई धूप में फिर अपना सफ़र जारी है
वो घना साया फ़क़त तिफ़्ल-ए-तसल्ली निकला
मैं बहुत तेज़ चला अपनी तबाही की तरफ़
उस के छुटने का सबब नर्म-ख़िरामी निकला
रूह का दश्त वही जिस्म का वीराना है
हर नया राज़ पुराना लगा बासी निकला
सिर्फ़ हशमत की तलब जाह की ख़्वाहिश पाई
दिल को बे-दाग़ समझता था जज़ामी निकला
इक बला आती है और लोग चले जाते हैं
इक सदा कहती है हर आदमी फ़ानी निकला
मैं वो मुर्दा हूँ कि आँखें मिरी ज़िंदों जैसी
बैन करता हूँ कि मैं अपना ही सानी निकला
मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन
बैन करेगा रूह का सन्नाटा इक दिन
जिन में अभी इक वहशी आग के साए हैं
वो आँखें हो जाएँगी सहरा इक दिन
बीत चुका होगा ये ख़्वाबों का मौसम
बंद मिलेगा नींद का दरवाज़ा इक दिन
मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का
अपने पास बुला लेगी दुनिया इक दिन
डूब रहा हूँ झूट और खोट के दरिया में
जाने कहाँ ले जाए ये दरिया इक दिन
मैं भी लूट आऊँगा अपने तआ'क़ुब से
तुम भी मुझ को ढूँढ के थक जाना इक दिन
अन्य ग़ज़लकारों शायरों की ग़ज़लें / रचनाएं
यगाना चंगेज़ी की ग़ज़लें / Yagana Changezi Ghazals
राजेन्द्र मनचंदा बानी की ग़ज़लें / Rajinder Manchanda Bani Ghazals
शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें / Shariq Kaifi Ghazals
अगस्त 20, 2025 | No Comments |
इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने
पहले यार बनाया फिर समझाया हम ने
ख़ुद भी आख़िर-कार उन्ही वा'दों से बहले
जिन से सारी दुनिया को बहलाया हम ने
भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना
अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने
मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
ऐसा मरने का माहौल बनाया हम ने
घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे
तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने
इन लम्हों में किस कि शिरकत कैसी शिरकत
उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हम ने
दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया
फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हम ने
जब 'शारिक़' पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त
फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हम ने
आइने का साथ प्यारा था कभी
एक चेहरे पर गुज़ारा था कभी
आज सब कहते हैं जिस को नाख़ुदा
हम ने उस को पार उतारा था कभी
ये मिरे घर की फ़ज़ा को क्या हुआ
कब यहाँ मेरा तुम्हारा था कभी
था मगर सब कुछ न था दरिया के पार
इस किनारे भी किनारा था कभी
कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल
जो मिरा सारे का सारा था कभी
आज कितने ग़म हैं रोने के लिए
इक तिरे दुख का सहारा था कभी
जुस्तुजू इतनी भी बे-मा'नी न थी
मंज़िलों ने भी पुकारा था कभी
ये नए गुमराह क्या जानें मुझे
मैं सफ़र का इस्तिआ'रा था कभी
इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो
मैं इसी मैदाँ में हारा था कभी
हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा
पढ़ाई चल रही है ज़िंदगी की
अभी उतरा नहीं बस्ता हमारा
मुआ'फ़ी और इतनी सी ख़ता पर
सज़ा से काम चल जाता हमारा
किसी को फिर भी महँगे लग रहे थे
फ़क़त साँसों का ख़र्चा था हमारा
यहीं तक इस शिकायत को न समझो
ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा
तरफ़-दारी नहीं कर पाए दिल की
अकेला पड़ गया बंदा हमारा
तआ'रुफ़ क्या करा आए किसी से
उसी के साथ है साया हमारा
नहीं थे जश्न-ए-याद-ए-यार में हम
सो घर पर आ गया हिस्सा हमारा
हमें भी चाहिए तन्हाई 'शारिक़'
समझता ही नहीं साया हमारा
झूट पर उस के भरोसा कर लिया
धूप इतनी थी कि साया कर लिया
अब हमारी मुश्किलें कुछ कम हुईं
दुश्मनों ने एक चेहरा कर लिया
हाथ क्या आया सजा कर महफ़िलें
और भी ख़ुद को अकेला कर लिया
हारने का हौसला तो था नहीं
जीत में दुश्मन की हिस्सा कर लिया
मंज़िलों पर हम मिलें ये तय हुआ
वापसी में साथ पक्का कर लिया
सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए
एक दिन उस से भी झगड़ा कर लिया
क़ुर्ब का उस के उठा कर फ़ाएदा
हिज्र का सामाँ इकट्ठा कर लिया
गुफ़्तुगू से हल तो कुछ निकला नहीं
रंजिशों को और ताज़ा कर लिया
मोल था हर चीज़ का बाज़ार में
हम ने तन्हाई का सौदा कर लिया
कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं
आँख खुली तो इक सहरा के मुक़ाबिल था मैं
हासिल कर के तुझ को अब शर्मिंदा सा हूँ
था इक वक़्त कि सच-मुच तेरे क़ाबिल था मैं
किस एहसास-ए-जुर्म की सब करते हैं तवक़्क़ो'
इक किरदार किया था जिस में क़ातिल था मैं
कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा
किस को इतनी आसानी से हासिल था मैं
सारी तवज्जोह दुश्मन पर मरकूज़ थी मेरी
अपनी तरफ़ से तो बिल्कुल ही ग़ाफ़िल था मैं
जिन पर मैं थोड़ा सा भी आसान हुआ हूँ
वही बता सकते हैं कितना मुश्किल था मैं
नींद नहीं आती थी साज़िश के धड़के में
फ़ातेह हो कर भी किस दर्जा बुज़दिल था मैं
घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है
तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं
अच्छा तो तुम ऐसे थे
दूर से कैसे लगते थे
हाथ तुम्हारे शाल में भी
कितने ठंडे रहते थे
सामने सब के उस से हम
खिंचे खिंचे से रहते थे
आँख कहीं पर होती थी
बात किसी से करते थे
क़ुर्बत के उन लम्हों में
हम कुछ और ही होते थे
साथ में रह कर भी उस से
चलते वक़्त ही मिलते थे
इतने बड़े हो के भी हम
बच्चों जैसा रोते थे
जल्द ही उस को भूल गए
और भी धोके खाने थे
ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो
वो साथ है तो ज़रा हमारी ख़ुशी तो देखो
बहुत हसीं रात है मगर तुम तो सो रहे हो
निकल के कमरे से इक नज़र चाँदनी तो देखो
जगह जगह सील के ये धब्बे ये सर्द बिस्तर
हमारे कमरे से धूप की बे-रुख़ी तो देखो
दमक रहा हूँ अभी तलक उस के ध्यान से मैं
बुझे हुए इक ख़याल की रौशनी तो देखो
ये आख़िरी वक़्त और ये बे-हिसी जहाँ की
अरे मिरा सर्द हाथ छू कर कोई तो देखो
अभी बहुत रंग हैं जो तुम ने नहीं छुए हैं
कभी यहाँ आ के गाँव की ज़िंदगी तो देखो
ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है
हमें इक दूसरा अच्छा लगा है
समझना है उसे नज़दीक जा कर
जिसे मुझ सा बुरा अच्छा लगा है
ये क्या हर वक़्त जीने की दुआएँ
यहाँ ऐसा भी क्या अच्छा लगा है
सफ़र तो ज़िंदगी भर का है लेकिन
ये वक़्फ़ा सा ज़रा अच्छा लगा है
मिरी नज़रें भी हैं अब आसमाँ पर
कोई महव-ए-दुआ अच्छा लगा है
हुए बरबाद जिस के इश्क़ में हम
वो अब जा कर ज़रा अच्छा लगा है
वो सूरज जो मिरा दुश्मन था दिन भर
मुझे ढलता हुआ अच्छा लगा है
कोई पूछे तो क्या बतलाएँगे हम
कि इस मंज़र में क्या अच्छा लगा है
इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं
अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं
कुछ हवा कुछ दिल धड़कने की सदा
शोर में कुछ सुन नहीं पाता हूँ मैं
बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा
मुंतज़िर आँखों से घबराता हूँ मैं
याद आती है तिरी संजीदगी
और फिर हँसता चला जाता हूँ मैं
फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ
आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं
छुप रहा हूँ आइने की आँख से
थोड़ा थोड़ा रोज़ धुँदलाता हूँ मैं
अपनी सारी शान खो देता है ज़ख़्म
जब दवा करता नज़र आता हूँ मैं
सच तो ये है मुस्तरद कर के उसे
इक तरह से ख़ुद को झुटलाता हूँ मैं
आज उस पर भी भटकना पड़ गया
रोज़ जिस रस्ते से घर आता हूँ मैं
वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी
तमाम बाज़ीगरों को मिरी ज़रूरत थी
वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी
पता नहीं ये तमन्ना-ए-क़ुर्ब कब जागी
मुझे तो सिर्फ़ उसे सोचने की आदत थी
ख़मोशियों ने परेशाँ किया तो होगा मगर
पुकारने की यही सिर्फ़ एक सूरत थी
गए भी जान से और कोई मुतमइन न हुआ
कि फिर दिफ़ाअ' न करने की हम पे तोहमत थी
कहीं पे चूक रहे हैं ये आइने शायद
नहीं तो अक्स में अब तक मिरी शबाहत थी
सियाने थे मगर इतने नहीं हम
ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम
अना की बात अब सुनना पड़ेगी
वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम
अधूरी लग रही है जीत उस को
उसे हारे हुए लगते नहीं हम
हमें तो रोक लो उठने से पहले
पलट कर देखने वाले नहीं हम
बिछड़ने का तिरे सदमा तो होगा
मगर इस ख़ौफ़ को जीते नहीं हम
तिरे रहते तो क्या होते किसी के
तुझे खो कर भी दुनिया के नहीं हम
ये मंज़िल ख़्वाब ही रहती हमेशा
अगर घर लौट कर आते नहीं हम
कभी सोचे तो इस पहलू से कोई
किसी की बात क्यूँ सुनते नहीं हम
अभी तक मश्वरों पर जी रहे हैं
किसी सूरत बड़े होते नहीं हम
जो कहता है कि दरिया देख आया
ग़लत मौसम में सहरा देख आया
डगर और मंज़िलें तो एक सी थीं
वो फिर मुझ से जुदा क्या देख आया
हर इक मंज़र के पस-मंज़र थे इतने
बहुत कुछ बे-इरादा देख आया
किसी को ख़ाक दे कर आ रहा हूँ
ज़मीं का अस्ल चेहरा देख आया
रुका महफ़िल में इतनी देर तक मैं
उजालों का बुढ़ापा देख आया
तसल्ली अब हुई कुछ दिल को मेरे
तिरी गलियों को सूना देख आया
तमाशाई में जाँ अटकी हुई थी
पलट कर फिर किनारा देख आया
बहुत गदला था पानी इस नदी का
मगर मैं अपना चेहरा देख आया
मैं इस हैरत में शामिल हूँ तो कैसे
न जाने वो कहाँ क्या देख आया
वो मंज़र दाइमी इतना हसीं था
कि मैं ही कुछ ज़ियादा देख आया
एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए
अपने माहौल में ख़ुद को देखे हुए
एक दिन हम अचानक बड़े हो गए
खेल में दौड़ कर उस को छूते हुए
सब गुज़रते रहे सफ़-ब-सफ़ पास से
मेरे सीने पे इक फूल रखते हुए
जैसे ये मेज़ मिट्टी का हाथी ये फूल
एक कोने में हम भी हैं रक्खे हुए
शर्म तो आई लेकिन ख़ुशी भी हुई
अपना दुख उस के चेहरे पे पढ़ते हुए
बस बहुत हो चुका आइने से गिला
देख लेगा कोई ख़ुद से मिलते हुए
ज़िंदगी भर रहे हैं अँधेरे में हम
रौशनी से परेशान होते हुए
ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है
इशारों को तिरे पढ़ने की जुरअत अब हुई है
अजब लहजे में करते थे दर-ओ-दीवार बातें
मिरे घर को भी शायद मेरी आदत अब हुई है
गुमाँ हूँ या हक़ीक़त सोचने का वक़्त कब तक
ये हो कर भी न होने की मुसीबत अब हुई है
अचानक हड़बड़ा कर नींद से मैं जाग उठा हूँ
पुराना वाक़िआ' है जिस पे हैरत अब हुई है
यही कमरा था जिस में चैन से हम जी रहे थे
ये तन्हाई तो इतनी बे-मुरव्वत अब हुई है
बिछड़ना है हमें इक दिन ये दोनों जानते थे
फ़क़त हम को जुदा होने की फ़ुर्सत अब हुई है
अजब था मसअला अपना अजब शर्मिंदगी थी
ख़फ़ा जिस रात पर थे वो शरारत अब हुई है
मोहब्बत को तिरी कब से लिए बैठे थे दिल में
मगर इस बात को कहने की हिम्मत अब हुई है
ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है
आँख खुल जाए तो मुसीबत है
जिस्म आया किसी के हिस्से में
दिल किसी और की अमानत है
जान देने का वक़्त आ ही गया
इस तमाशे के बा'द फ़ुर्सत है
उम्र भर जिस के मश्वरों पे चले
वो परेशान है तो हैरत है
अब सँवरने का वक़्त उस को नहीं
जब हमें देखने की फ़ुर्सत है
उस पे उतने ही रंग खुलते हैं
जिस की आँखों में जितनी हैरत है
रोना हो आसान हमारा
इतना कर नुक़्सान हमारा
बात नहीं करनी तो मत कर
चेहरा तो पहचान हमारा
ख़ुश-फ़हमी हो जाएगी हम को
मत रख इतना ध्यान हमारा
पहली चोट में जान गए हम
'इश्क़ नहीं मैदान हमारा
मौत ने आ कर बाँध लिया था
पहले ही सामान हमारा
जीत गया तेरा भोला-पन
हार गया शैतान हमारा
लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी
वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई
अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी
उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे
वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी
किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक
और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी
ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर
लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी
उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं
ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी
अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत
मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी
अन्य ग़ज़लकारों शायरों की ग़ज़लें / रचनाएं
मोमिन ख़ाँ मोमिन की ग़ज़लें / Momin Khan Momin Ghazal
यगाना चंगेज़ी की ग़ज़लें / Yagana Changezi Ghazals
राजेन्द्र मनचंदा बानी की ग़ज़लें / Rajinder Manchanda Bani Ghazals
अगस्त 20, 2025 | No Comments |
ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
मैं ढेर हो गया तूल-ए-सफ़र से डरते हुए
दिखा के लम्हा-ए-ख़ाली का अक्स-ए-ला-तफ़सीर
ये मुझ में कौन है मुझ से फ़रार करते हुए
बस एक ज़ख़्म था दिल में जगह बनाता हुआ
हज़ार ग़म थे मगर भूलते-बिसरते हुए
वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था
कि चुप सी लग गई दोनों को बात करते हुए
अजब नज़ारा था बस्ती का उस किनारे पर
सभी बिछड़ गए दरिया से पार उतरते हुए
मैं एक हादसा बन कर खड़ा था रस्ते में
अजब ज़माने मिरे सर से थे गुज़रते हुए
वही हुआ कि तकल्लुफ़ का हुस्न बीच में था
बदन थे क़ुर्ब-ए-तही-लम्स से बिखरते हुए
जाने वो कौन था और किस को सदा देता था
उस से बिछड़ा है कोई इतना पता देता था
कोई कुछ पूछे तो कहता कि हवा से बचना
ख़ुद भी डरता था बहुत सब को डरा देता था
उस की आवाज़ कि बे-दाग़ सा आईना थी
तल्ख़ जुमला भी वो कहता तो मज़ा देता था
दिन-भर एक एक से वो लड़ता-झगड़ता भी बहुत
रात के पिछले-पहर सब को दुआ देता था
वो किसी का भी कोई नश्शा न बुझने देता
देख लेता कहीं इम्काँ तो हवा देता था
इक हुनर था कि जिसे पा के वो फिर खो न सका
एक इक बात का एहसास नया देता था
जाने बस्ती का वो इक मोड़ था क्या उस के लिए
शाम ढलते ही वहाँ शम्अ' जला देता था
एक भी शख़्स बहुत था कि ख़बर रखता था
एक तारा भी बहुत था कि सदा देता था
रुख़ हवा का कोई जब पूछता उस से 'बानी'
मुट्ठी-भर ख़ाक ख़ला में वो उड़ा देता था
मुझे पता था कि ये हादसा भी होना था
मैं उस से मिल के न था ख़ुश जुदा भी होना था
चलो कि जज़्बा-ए-इज़हार चीख़ में तो ढला
किसी तरह इसे आख़िर अदा भी होना था
बना रही थी अजब चित्र डूबती हुई शाम
लहू कहीं कहीं शामिल मिरा भी होना था
अजब सफ़र था कि हम रास्तों से कटते गए
फिर इस के बा'द हमें लापता भी होना था
मैं तेरे पास चला आया ले के शिकवे-गिले
कहाँ ख़बर थी कोई फ़ैसला भी होना था
ग़ुबार बन के उड़े तेज़-रौ कि उन के लिए
तो क्या ज़रूर कोई रास्ता भी होना था
सराए पर था धुआँ जम' सारी बस्ती का
कुछ इस तरह कि कोई सानिहा भी होना था
मुझे ज़रा सा गुमाँ भी न था अकेला हूँ
कि दुश्मनों का कहीं सामना भी होना था
तमाम रास्ता फूलों भरा है मेरे लिए
कहीं तो कोई दुआ माँगता है मेरे लिए
तमाम शहर है दुश्मन तो क्या है मेरे लिए
मैं जानता हूँ तिरा दर खुला है मेरे लिए
मुझे बिछड़ने का ग़म तो रहेगा हम-सफ़रो
मगर सफ़र का तक़ाज़ा जुदा है मेरे लिए
वो एक अक्स कि पल भर नज़र में ठहरा था
तमाम उम्र का अब सिलसिला है मेरे लिए
अजीब दरगुज़री का शिकार हूँ अब तक
कोई करम है न कोई सज़ा है मेरे लिए
गुज़र सकूँगा न इस ख़्वाब ख़्वाब बस्ती से
यहाँ की मिट्टी भी ज़ंजीर-ए-पा है मेरे लिए
अब आप जाऊँ तो जा कर उसे समेटूँ मैं
तमाम सिलसिला बिखरा पड़ा है मेरे लिए
ये हुस्न-ए-ख़त्म-ए-सफ़र ये तिलिस्म-ख़ाना-ए-रंग
कि आँख झपकूँ तो मंज़र नया है मेरे लिए
ये कैसे कोह के अंदर मैं दफ़्न था 'बानी'
वो अब्र बन के बरसता रहा है मेरे लिए
ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था
क़ाइल ही तिरी बात का अंदर से नहीं था
हर आँख कहीं दौर के मंज़र पे लगी थी
बेदार कोई अपने बराबर से नहीं था
क्यूँ हाथ हैं ख़ाली कि हमारा कोई रिश्ता
जंगल से नहीं था कि समुंदर से नहीं था
अब उस के लिए इस क़दर आसान था सब कुछ
वाक़िफ़ वो मगर सई मुकर्रर से नहीं था
मौसम को बदलती हुई इक मौज-ए-हवा थी
मायूस मैं 'बानी' अभी मंज़र से नहीं था
दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला
मैं कि अक्स-ए-मुंतशिर एक एक मंज़र में अकेला
उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला
सुब्ह का पहला परिंदा आसमाँ भर में अकेला
कौन दे आवाज़ ख़ाली रात के अंधे कुएँ में
कौन उतरे ख़्वाब से महरूम बिस्तर में अकेला
उस को तन्हा कर गई करवट कोई पिछले पहर की
फिर उड़ा भागा वो सारा दिन नगर भर में अकेला
एक मद्धम आँच सी आवाज़ सरगम से अलग कुछ
रंग इक दबता हुआ सा पूरे मंज़र में अकेला
बोलती तस्वीर में इक नक़्श लेकिन कुछ हटा सा
एक हर्फ़-ए-मो'तबर लफ़्ज़ों के लश्कर में अकेला
जाओ मौजो मेरी मंज़िल का पता क्या पूछती हो
इक जज़ीरा दूर उफ़्तादा समुंदर में अकेला
जाने किस एहसास ने आगे नहीं बढ़ने दिया था
अब पड़ा हूँ क़ैद मैं रस्ते के पत्थर में अकेला
हू-ब-हू मेरी तरह चुप-चाप मुझ को देखता है
इक लरज़ता ख़ूब-सूरत अक्स साग़र में अकेला
वो बात बात पे जी भर के बोलने वाला
उलझ के रह गया डोरी को खोलने वाला
लो सारे शहर के पत्थर समेट लाए हैं हम
कहाँ है हम को शब ओ रोज़ तौलने वाला
हमारा दिल कि समुंदर था उस ने देख लिया
बहुत उदास हुआ ज़हर घोलने वाला
किसी की मौज-ए-फ़रावाँ से खा गया क्या मात
वो इक नज़र में दिलों को टटोलने वाला
वो आज फिर यही दोहरा के चल दिया 'बानी'
मैं भूल के नहीं अब तुझ से बोलने वाला
न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था
अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था
इताब था किसी लम्हे का इक ज़माने पर
किसी को चैन न बाहर था और न घर में था
छुपा के ले गया दुनिया से अपने दिल के घाव
कि एक शख़्स बहुत ताक़ इस हुनर में था
किसी के लौटने की जब सदा सुनी तो खुला
कि मेरे साथ कोई और भी सफ़र में था
कभी मैं आब के तामीर-कर्दा क़स्र में हूँ
कभी हवा में बनाए हुए से घर में था
झिजक रहा था वो कहने से कोई बात ऐसी
मैं चुप खड़ा था कि सब कुछ मिरी नज़र में था
यही समझ के उसे ख़ुद सदा न दी मैं ने
वो तेज़-गाम किसी दूर के सफ़र में था
कभी हूँ तेरी ख़मोशी के कटते साहिल पर
कभी मैं लौटती आवाज़ के भँवर में था
हमारी आँख में आ कर बना इक अश्क वो रंग
जो बर्ग-ए-सब्ज़ के अंदर न शाख़-ए-तर में था
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
अभी न बरसे थे 'बानी' घिरे हुए बादल
मैं उड़ती ख़ाक की मानिंद रहगुज़र में था
ख़त कोई प्यार भरा लिख देना
मशवरा लिखना दुआ लिख देना
कोई दीवार-ए-शिकस्ता ही सही
उस पे तुम नाम मिरा लिख देना
कितना सादा था वो इम्काँ का नशा
एक झोंके को हवा लिख देना
कुछ तो आकाश में तस्वीर सा है
मुस्कुरा दे तो ख़ुदा लिख देना
बर्ग-ए-आख़िर ने कहा लहरा के
मुझे मौसम की अना लिख देना
हाथ लहराना हवा में उस का
और पैग़ाम-ए-हिना लिख देना
सब्ज़ को सब्ज़ न लिखना 'बानी'
फ़स्ल लिख देना फ़ज़ा लिख देना
आज इक लहर भी पानी में न थी
कोई तस्वीर रवानी में न थी
वलवला मिस्रा-ए-अव्वल में न था
हरकत मिस्रा-ए-सानी में न थी
कोई आहंग न अल्फ़ाज़ में था
कैफ़ियत कोई मआनी में न थी
ख़ूँ का नम सादा-नवाई में न था
ख़ूँ की बू शोख़-बयानी में न थी
कोई मफ़्हूम तसव्वुर में न था
कोई भी बात कहानी में न थी
रंग अब कोई ख़लाओं में न था
कोई पहचान निशानी में न थी
ख़ुश-यक़ीनी में न था अब कोई नूर
ज़ौ कोई ख़ंदा-गुमानी में न थी
जी सुलगने का धुआँ ख़त में न था
रौशनी हर्फ़-ए-ज़बानी में न थी
रंज भूले हुए वादे का न था
लज़्ज़त अब याद-दहानी में न थी
लो कि जामिद सी ग़ज़ल भी लिख दी
आज कुछ ज़िंदगी 'बानी' में न थी
सद-सौग़ात सकूँ फ़िरदौस सितंबर आ
ऐ रंगों के मौसम मंज़र मंज़र आ
आधे-अधूरे लम्स न मेरे हाथ पे रख
कभी सुपुर्द-ए-बदन सा मुझे मयस्सर आ
कब तलक फैलाएगा धुँद मिरे ख़ूँ में
झूटी सच्ची नवा में ढल कर लब पर आ
मुझे पता था इक दिन लौट के आएगा तू
रुका हुआ दहलीज़ पे क्यूँ है अंदर आ
ऐ पैहम-पर्वाज़ परिंदे दम ले ले
नहीं उतरता आँगन में तो छत पर आ
उस ने अजब कुछ प्यार से अब के लिक्खा 'बानी'
बहुत दिनों फिर घूम लिया वापस घर आ
इधर की आएगी इक रौ उधर की आएगी
कि मेरे साथ तो मिट्टी सफ़र की आएगी
ढलेगी शाम जहाँ कुछ नज़र न आएगा
फिर इस के ब'अद बहुत याद घर की आएगी
न कोई जा के उसे दुख मिरे सुनाएगा
न काम दोस्ती अब शहर भर की आएगी
अभी बुलंद रखो यारो आख़िरी मशअल
इधर तो पहली किरन क्या सहर की आएगी
कुछ और मोड़ गुज़रने की देर है बानी
सदा न गर्द किसी हम-सफ़र की आएगी
मैं चुप खड़ा था तअल्लुक़ में इख़्तिसार जो था
उसी ने बात बनाई वो होशियार जो था
पटख़ दिया किसी झोंके ने ला के मंज़िल पर
हवा के सर पे कोई देर से सवार जो था
मोहब्बतें न रहीं उस के दिल में मेरे लिए
मगर वो मिलता था हँस कर कि वज़्अ-दार जो था
अजब ग़ुरूर में आ कर बरस पड़ा बादल
कि फैलता हुआ चारों तरफ़ ग़ुबार जो था
क़दम क़दम रम-ए-पामाल से मैं तंग आ कर
तिरे ही सामने आया तिरा शिकार जो था
मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं
रो ही पड़ा हूँ कभी न रोने वाला मैं
क्या झोंका था चमक गया तन मन सारा
पता न था फिर राख था होने वाला मैं
लहर थी कैसी मुझे भँवर में ले आई
नदी किनारे हाथ भिगोने वाला मैं
रंग कहाँ था फूल की पत्ती पत्ती में
किरन किरन सी धूप पिरोने वाला मैं
क्या दिन बीता सब कुछ आँख में फिरता है
जाग रहा हूँ मज़े में सोने वाला मैं
शहर-ए-ख़िज़ाँ है ज़र्दी ओढ़े खड़े हैं पेड़
मंज़र मंज़र नज़र चुभोने वाला मैं
जो कुछ है इस पार वही उस पार भी है
नाव अब अपनी आप डुबोने वाला मैं
देखता था मैं पलट कर हर आन
किस सदा का था न जाने इम्कान
उस की इक बात को तन्हा मत कर
वो कि है रब्त-ए-नवा में गुंजान
टूटी बिखरी कोई शय थी ऐसी
जिस ने क़ाएम की हमारी पहचान
लोग मंज़िल पे थे हम से पहले
था कोई रास्ता शायद आसान
सब से कमज़ोर अकेले हम थे
हम पे थे शहर के सारे बोहतान
ओस से प्यास कहाँ बुझती है
मूसला-धार बरस मेरी जान
क्या अजब शहर-ए-ग़ज़ल है 'बानी'
लफ़्ज़ शैतान सुख़न बे-ईमान
अजीब तजरबा था भीड़ से गुज़रने का
उसे बहाना मिला मुझ से बात करने का
फिर एक मौज-ए-तह-ए-आब उस को खींच गई
तमाशा ख़त्म हुआ डूबने उभरने का
मुझे ख़बर है कि रस्ता मज़ार चाहता है
मैं ख़स्ता-पा सही लेकिन नहीं ठहरने का
थमा के एक बिखरता गुलाब मेरे हाथ
तमाशा देख रहा है वो मेरे डरने का
ये आसमाँ में सियाही बिखेर दी किस ने
हमें था शौक़ बहुत उस में रंग भरने का
खड़े हों दोस्त कि दुश्मन सफ़ें सब एक सी हैं
वो जानता है इधर से नहीं गुज़रने का
निगाह हम-सफ़रों पर रखूँ सर-ए-मंज़िल
कि मरहला है ये इक दूसरे से डरने का
लपक लपक के वहीं ढेर हो गए आख़िर
जतन किया तो बहुत सतह से उभरने का
कराँ कराँ न सज़ा कोई सैर करने की
सफ़र सफ़र न कोई हादसा गुज़रने का
किसी मक़ाम से कोई ख़बर न आने की
कोई जहाज़ ज़मीं पर न अब उतरने का
कोई सदा न समाअत पे नक़्श होने की
न कोई अक्स मिरी आँख में ठहरने का
न अब हवा मरे सीने में संसनाने की
न कोई ज़हर मिरी रूह में उतरने का
कोई भी बात न मुझ को उदास करने की
कोई सुलूक न मुझ पे गिराँ गुज़रने का
बस एक चीख़ गिरी थी पहाड़ से यक-लख़्त
अजब नज़ारा था फिर धुँद के बिखरने का
आज तो रोने को जी हो जैसे
फिर कोई आस बंधी हो जैसे
शहर में फिरता हूँ तन्हा तन्हा
आश्ना एक वही हो जैसे
हर ज़माने की सदा-ए-मातूब
मेरे सीने से उठी हो जैसे
ख़ुश हुए तर्क-ए-वफ़ा कर के हम
अब मुक़द्दर भी यही हो जैसे
इस तरह शब गए टूटी है उमीद
कोई दीवार गिरी हो जैसे
यास-आलूद है एक एक घड़ी
ज़र्द फूलों की लड़ी हो जैसे
मैं हूँ और वादा-ए-फ़र्दा तेरा
और इक उम्र पड़ी हो जैसे
बे-कशिश है वो निगाह-सद-लुत्फ़
इक मोहब्बत की कमी हो जैसे
क्या अजब लम्हा-ए-ग़म गुज़रा है
उम्र इक बीत गई हो जैसे
छुपी है तुझ में कोई शय उसे न ग़ारत कर
जो हो सके तो कहीं दिल लगा मोहब्बत कर
अदा ये किस कटे पत्ते से तू ने सीखी है
सितम हवा का हो और शाख़ से शिकायत कर
न हो मुख़िल मिरे अंदर की एक दुनिया में
बड़ी ख़ुशी से बर-ओ-बहर पर हुकूमत कर
वो अपने आप न समझेगा तेरे दिल में है क्या
ख़लिश को हर्फ़ बना हर्फ़ को हिकायत कर
मिरे बनाए हुए बुत में रूह फूँक दे अब
न एक उम्र की मेहनत मिरी अकारत कर
कहाँ से आ गया तू बज़्म-ए-कम-यक़ीनाँ में
यहाँ न होगा कोई ख़ुश हज़ार ख़िदमत कर
कुछ और चीज़ें हैं दुनिया को जो बदलती हैं
कि अपने दर्द को अपने लिए इबारत कर
नहीं अजब इसी पल का हो मुंतज़िर वो भी
कि छू ले उस के बदन को ज़रा सी हिम्मत कर
ख़ुलूस तेरा भी अब ज़द में आ गया 'बानी'
यहाँ ये रोज़ के क़िस्से हैं जी बुरा मत कर
हरी सुनहरी ख़ाक उड़ाने वाला मैं
शफ़क़ शजर तस्वीर बनाने वाला मैं
ख़ला के सारे रंग समेटने वाली शाम
शब की मिज़ा पर ख़्वाब सजाने वाला मैं
फ़ज़ा का पहला फूल खिलाने वाली सुब्ह
हवा के सुर में गीत मिलाने वाला मैं
बाहर भीतर फ़स्ल उगाने वाला तू
तिरे ख़ज़ाने सदा लुटाने वाला मैं
छतों पे बारिश दूर पहाड़ी हल्की धूप
भीगने वाला पँख सुखाने वाला मैं
चार दिशाएँ जब आपस में घुल मिल जाएँ
सन्नाटे को दुआ बनाने वाला मैं
घने बनों में शंख बजाने वाला तू
तिरी तरफ़ घर छोड़ के आने वाला मैं
पैहम मौज-ए-इमकानी में
अगला पाँव नए पानी में
सफ़-ए-शफ़क़ से मिरे बिस्तर तक
सातों रंग फ़रावानी में
बदन विसाल-आहंग हवा सा
क़बा अजीब परेशानी में
क्या सालिम पहचान है उस की
वो कि नहीं अपने सानी में
टोक के जाने क्या कहता वो
उस ने सुना सब बे-ध्यानी में
याद तिरी जैसे कि सर-ए-शाम
धुँद उतर जाए पानी में
ख़ुद से कभी मिल लेता हूँ मैं
सन्नाटे में वीरानी में
आख़िर सोचा देख ही लीजे
क्या करता है वो मन-मानी में
एक दिया आकाश में 'बानी'
एक चराग़ सा पेशानी में
हमें लपकती हवा पर सवार ले आई
कोई तो मौज थी दरिया के पार ले आई
वो लोग जो कभी बाहर न घर से झाँकते थे
ये शब उन्हें भी सर-ए-रहगुज़ार ले आई
उफ़ुक़ से ता-ब-उफ़ुक़ फैलती बिखरती घटा
गई रुतों का चमकता ग़ुबार ले आई
मता-ए-वादा सँभाले रहो कि आज भी शाम
वहाँ से एक नया इंतिज़ार ले आई
उदास शाम की यादों भरी सुलगती हवा
हमें फिर आज पुराने दयार ले आई
न शब से देखी गई बर्ग-ए-आख़िरी की थकन
कि बूँद ओस से उस को उतार ले आई
मैं देखता था शफ़क़ की तरफ़ मगर तितली
परों पे रख के अजब रंग-ज़ार ले आई
बहुत दिनों से न सोए थे हम और आज हवा
कहीं से नींद की ख़ुश्बू उधार ले आई
वो इक अदा कि न पहचान पाए हम 'बानी'
ज़रा सी बात थी आफ़त हज़ार ले आई
चली डगर पर कभी न चलने वाला मैं
नए अनोखे मोड़ बदलने वाला मैं
तुम क्या समझो अजब अजब इन बातों को
आग कहीं हो यहाँ हूँ जलने वाला मैं
बहुत ज़रा सी ओस भिगोने को मेरे
बहुत ज़रा सी आँच, पिघलने वाला मैं
बहुत ज़रा सी ठेस तड़पने को मेरे
बहुत ज़रा सी मौज, उछलने वाला मैं
बहुत ज़रा सा सफ़र भटकने को मेरे
बहुत ज़रा सा हाथ, सँभलने वाला मैं
बहुत ज़रा सी सुब्ह बिकसने को मेरे
बहुत ज़रा सा चाँद, मचलने वाला मैं
बहुत ज़रा सी राह निकलने को मेरे
बहुत ज़रा सी आस, बहलने वाला मैं
शोला इधर उधर कभी साया यहीं कहीं
होगा वो बर्क़-जिस्म सुबुक-पा यहीं कहीं
किन पानियों का ज़ोर उसे काट ले गया
देखा था हम ने एक जज़ीरा यहीं कहीं
मंसूब जिस से हो न सका कोई हादसा
गुम हो के रह गया है वो लम्हा यहीं कहीं
आवारगी का डर न कोई डूबने का ख़ौफ़
सहरा ही आस-पास न दरिया यहीं कहीं
वो चाहता ये होगा कि मैं ही उसे बुलाऊँ
मेरी तरह वो फिरता है तन्हा यहीं कहीं
'बानी' ज़रा सँभल के मोहब्बत का मोड़ काट
इक हादसा भी ताक में होगा यहीं कहीं
बजाए हम-सफ़री इतना राब्ता है बहुत
कि मेरे हक़ में तिरी बे-ज़रर दुआ है बहुत
थी पाँव में कोई ज़ंजीर बच गए वर्ना
रम-ए-हवा का तमाशा यहाँ रहा है बहुत
ये मोड़ काट के मंज़िल का अक्स देखोगे
इसी जगह मगर इम्कान-ए-हादसा है बहुत
बस एक चीख़ ही यूँ तो हमें अदा कर दे
मुआमला हुनर-ए-हर्फ़ का जुदा है बहुत
मिरी ख़ुशी का वो क्या क्या ख़याल रखता है
कि जैसे मेरी तबीअत से आश्ना है बहुत
तमाम उम्र जिन्हें हम ने टूट कर चाहा
हमारे हाथों उन्हीं पर सितम हुआ है बहुत
ज़रा छुआ था कि बस पेड़ आ गिरा मुझ पर
कहाँ ख़बर थी कि अंदर से खोखला है बहुत
कोई खड़ा है मिरी तरह भीड़ में तन्हा
नज़र बचा के मिरी सम्त देखता है बहुत
ये एहतियात-कदा है कड़े उसूलों का
ज़रा से नक़्स पे 'बानी' यहाँ सज़ा है बहुत
देखिए क्या क्या सितम मौसम की मन-मानी के हैं
कैसे कैसे ख़ुश्क ख़ित्ते मुंतज़िर पानी के हैं
क्या तमाशा है कि हम से इक क़दम उठता नहीं
और जितने मरहले बाक़ी हैं आसानी के हैं
वो बहुत सफ़्फ़ाक सी धूमें मचा कर चल दिया
इक अदम-तासीर लहजा है मिरी हर बात का
और जाने कितने पहलू मेरी वीरानी के हैं
उस की आदत है घिरे रहना धुएँ के जाल में
उस के सारे रोग इक अंधी परेशानी के हैं
अन्य ग़ज़लकारों शायरों की ग़ज़लें / रचनाएं
क़तील शिफ़ाई की ग़ज़लें / Qateel Shifai Ghazals
मोमिन ख़ाँ मोमिन की ग़ज़लें / Momin Khan Momin Ghazal
यगाना चंगेज़ी की ग़ज़लें / Yagana Changezi Ghazals
अगस्त 20, 2025 | No Comments |
मुझे दिल की ख़ता पर 'यास' शरमाना नहीं आता
पराया जुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता
मुझे ऐ नाख़ुदा आख़िर किसी को मुँह दिखाना है
बहाना कर के तन्हा पार उतर जाना नहीं आता
मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
दिल-ए-बे-हौसला है इक ज़रा सी ठेस का मेहमाँ
वो आँसू क्या पिएगा जिस को ग़म खाना नहीं आता
सरापा राज़ हूँ मैं क्या बताऊँ कौन हूँ क्या हूँ
समझता हूँ मगर दुनिया को समझाना नहीं आता
ख़ुदी का नश्शा चढ़ा आप में रहा न गया
ख़ुदा बने थे 'यगाना' मगर बना न गया
पयाम-ए-ज़ेर-ए-लब ऐसा कि कुछ सुना न गया
इशारा पाते ही अंगड़ाई ली रहा न गया
हँसी में वादा-ए-फ़र्दा को टालने वालो
लो देख लो वही कल आज बन के आ न गया
गुनाह-ए-ज़िंदा-दिली कहिए या दिल-आज़ारी
किसी पे हँस लिए इतना कि फिर हँसा न गया
पुकारता रहा किस किस को डूबने वाला
ख़ुदा थे इतने मगर कोई आड़े आ न गया
करूँ तो किस से करूँ दर्द-ए-ना-रसा का गिला
कि मुझ को ले के दिल-ए-दोस्त में समा न गया
बुतों को देख के सब ने ख़ुदा को पहचाना
ख़ुदा के घर तो कोई बंदा-ए-ख़ुदा न गया
कृष्ण का हूँ पुजारी अली का बंदा हूँ
'यगाना' शान-ए-ख़ुदा देख कर रहा न गया
क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई
दिल न माने तो क्या करे कोई
न दवा चाहिए मुझे न दुआ
काश अपनी दवा करे कोई
मुफ़लिसी में मिज़ाज शाहाना
किस मरज़ की दवा करे कोई
दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है
वहम की क्या दवा करे कोई
हँस भी लेता हूँ ऊपरी दिल से
जी न बहले तो क्या करे कोई
मौत भी आ सकी न मुँह-माँगी
और क्या इल्तिजा करे कोई
दर्द-ए-दिल फिर कहीं न करवट ले
अब न चौंके ख़ुदा करे कोई
इश्क़-बाज़ी की इंतिहा मालूम
शौक़ से इब्तिदा करे कोई
कोहकन और क्या बना लेता
बन के बिगड़े तो क्या करे कोई
अपने दम की है रौशनी सारी
दीदा-ए-दिल तो वा करे कोई
शम्अ क्या शम्अ का उजाला क्या
दिन चढ़े सामना करे कोई
ग़ालिब और मीरज़ा 'यगाना' का
आज क्या फ़ैसला करे कोई
अदब ने दिल के तक़ाज़े उठाए हैं क्या क्या
हवस ने शौक़ के पहलू दबाए हैं क्या क्या
न जाने सहव-ए-क़लम है कि शाहकार-ए-क़लम
बला-ए-हुस्न ने फ़ित्ने उठाए हैं क्या क्या
निगाह डाल दी जिस पर वो हो गया अंधा
नज़र ने रंग-ए-तसर्रुफ़ दिखाए हैं क्या क्या
इसी फ़रेब ने मारा कि कल है कितनी दूर
इस आज कल में अबस दिन गँवाए हैं क्या क्या
पहाड़ काटने वाले ज़मीं से हार गए
इसी ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या क्या
गुज़र के आप से हम आप तक पहुँच तो गए
मगर ख़बर भी है कुछ फेर खाए हैं क्या क्या
बुलंद हो तो खुले तुझ पे ज़ोर पस्ती का
बड़े-बड़ों के क़दम डगमगाए हैं क्या क्या
ख़ुशी में अपने क़दम चूम लूँ तो ज़ेबा है
वो लग़्ज़िशों पे मिरी मुस्कुराए हैं क्या क्या
ख़ुदा ही जाने 'यगाना' मैं कौन हूँ क्या हूँ
ख़ुद अपनी ज़ात पे शक दिल में आए हैं क्या क्या
सब तिरे सिवा काफ़िर आख़िर इस का मतलब क्या
सर फिरा दे इंसाँ का ऐसा ख़ब्त-ए-मज़हब क्या
इक इशारा-ए-फ़र्दा एक जुम्बिश-ए-लब क्या
देख दिखाता है वा'दा-ए-तज़ब्ज़ब क्या
चुल्लू-भर में मतवाली दो ही घूँट में ख़ाली
ये भरी जवानी क्या जज़्बा-ए-लबालब क्या
हाँ दुआएँ लेता जा गालियाँ भी देता जा
ताज़गी तो कुछ पहुँचे चाहता रहूँ लब क्या
शामत आ गई आख़िर कह गया ख़ुदा-लगती
रास्ती का फल पाता बंदा-ए-मुक़र्रब क्या
उल्टी-सीधी सुनता रह अपनी कह तो उल्टी कह
सादा है तू क्या जाने भाँपने का है ढब क्या
सब जिहाद हैं दिल के सब फ़साद हैं दिल के
बे-दिलों का मतलब क्या और तर्क-ए-मतलब क्या
हो रहेगा सज्दा भी जब किसी की याद आई
याद जाने कब आए ज़िंदा-दारी-ए-शब क्या
आँधियाँ रुकें क्यूँ कर ज़लज़ले थमीं क्यूँ कर
कार-गाह-ए-फ़ितरत में पासबानी-ए-रब क्या
कार-ए-मर्ग कै दिन का थोड़ी देर का झगड़ा
देखना है ये नादाँ जीने का है कर्तब क्या
पड़ चुके बहुत पाले डस चुके बहुत काले
मूज़ियों के मूज़ी को फ़िक्र-ए-नीश-ए-अक़रब क्या
मीरज़ा 'यगाना' वाह ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद
इक बला-ए-बे-दरमाँ क्या थे तुम और अब क्या
ज़माना ख़ुदा को ख़ुदा जानता है
यही जानता है तो क्या जानता है
इसी में दिल अपना भला जानता है
कि इक नाख़ुदा को ख़ुदा जानता है
वो क्यूँ सर खपाए तिरी जुस्तुजू में
जो अंजाम-ए-फ़िक्र-ए-रसा जानता है
ख़ुदा ऐसे बंदे से क्यूँ फिर न जाए
जो बैठा दुआ माँगना जानता है
ज़हे सहव-ए-कातिब कि सारा ज़माना
मुझी को सरापा ख़ता जानता है
अनोखा गुनहगार ये सादा इंसाँ
नविश्ते को अपना किया जानता है
'यगाना' तू ही जाने अपनी हक़ीक़त
तुझे कौन तेरे सिवा जानता है
ज़माने पर न सही दिल पे इख़्तियार रहे
दिखा वो ज़ोर कि दुनिया में यादगार रहे
कहाँ तलक दिल-ए-ग़मनाक पर्दा-दार रहे
ज़बान-ए-हाल पे जब कुछ न इख़्तियार रहे
निज़ाम-ए-दहर ने क्या क्या न करवटें बदलीं
मगर हम एक ही पहलू से बे-क़रार रहे
हँसी में लग़्ज़िश-ए-मस्ताना उड़ गई वल्लाह
तो बे-गुनाहों से अच्छे गुनाहगार रहे
उभारती है हवस तौबा-ए-रिहाई की
कि दिल के साथ ज़बाँ क्यूँ गुनाहगार रहे
दिखा दूँ चीर के दिल दर्द-ए-दिल कहूँ कब तक
ज़बाँ पे क्यूँ ये तक़ाज़ा-ए-नागवार रहे
तड़प तड़प के उठाऊँगा ज़िंदगी के मज़े
ख़ुदा न-कर्दा मुझे दिल पे इख़्तियार रहे
सज़ा-ए-इश्क़ ब-क़द्र-ए-गुनाह ना-मुम्किन
यही बहुत है कि बरहम मिज़ाज-ए-यार रहे
ज़माना उस के सिवा और क्या वफ़ा करता
चमन उजड़ गया काँटे गले का बार रहे
ख़िज़ाँ के दम से मिटा ख़ूब-ओ-ज़िश्त का झगड़ा
चलो ये ख़्वाब हुआ गल रहे न ख़ार रहे
जवाब दे के न तोड़ो किसी ग़रीब का दिल
बला से कोई सरापा उमीद-वार रहे
मज़ा तो जब है 'यगाना' कि ये दिल-ए-ख़ुदबीं
ख़ुदी के नशे में बेगाना-ए-ख़ुमार रहे
'यगाना' हाल तो देखो ज़माना-साज़ों का
हवा में जैसे बगूला ख़राब-ओ-ख़्वार रहे
दिल लगाने की जगह आलम-ए-ईजाद नहीं
ख़्वाब आँखों ने बहुत देखे मगर याद नहीं
आज असीरों में वो हंगामा-ए-फ़रियाद नहीं
शायद अब कोई गुलिस्ताँ का सबक़ याद नहीं
सर-ए-शोरीदा सलामत है मगर क्या कहिए
दस्त-ए-फ़रहाद नहीं तेशा-ए-फ़रहाद नहीं
तौबा भी भूल गए इश्क़ में वो मार पड़ी
ऐसे औसान गए हैं कि ख़ुदा याद नहीं
दुश्मन ओ दोस्त से आबाद हैं दोनों पहलू
दिल सलामत है तो घर इश्क़ का बर्बाद नहीं
फ़िक्र-ए-इमरोज़ न अंदेशा-ए-फ़र्दा की ख़लिश
ज़िंदगी उस की जिसे मौत का दिन याद नहीं
निकहत-ए-गुल की है रफ़्तार हवा की पाबंद
रूह क़ालिब से निकलने पे भी आज़ाद नहीं
ज़िंदा हैं मुर्दा-परस्तों में अभी तक 'ग़ालिब'
मगर उस्ताद 'यगाना' सा अब उस्ताद नहीं
सलामत रहें दिल में घर करने वाले
इस उजड़े मकाँ में बसर करने वाले
गले पर छुरी क्यूँ नहीं फेर देते
असीरों को बे-बाल-ओ-पर करने वाले
अँधेरे उजाले कहीं तो मिलेंगे
वतन से हमें दर-ब-दर करने वाले
गरेबाँ में मुँह डाल कर ख़ुद तो देखें
बुराई पे मेरी नज़र करने वाले
इस आईना-ख़ाने में क्या सर उठाते
हक़ीक़त पर अपनी नज़र करने वाले
बहार-ए-दो-रोज़ा से दिल क्या बहलता
ख़बर कर चुके थे ख़बर करने वाले
खड़े हैं दो-राहे पे दैर ओ हरम के
तिरी जुस्तुजू में सफ़र करने वाले
सर-ए-शाम गुल हो गई शम-ए-बालीं
सलामत हैं अब तक सहर करने वाले
कुजा सेहन-ए-आलम कुजा कुंज-ए-मरक़द
बसर कर रहे हैं बसर करने वाले
'यगाना' वही फ़ातेह-ए-लखनऊ हैं
दिल-ए-संग-ओ-आहन में घर करने वाले
कारगाह-ए-दुनिया की नेस्ती भी हस्ती है
इक तरफ़ उजड़ती है एक सम्त बसती है
बे-दिलों की हस्ती क्या जीते हैं न मरते हैं
ख़्वाब है न बेदारी होश है न मस्ती है
क्या बताऊँ क्या हूँ मैं क़ुदरत-ए-ख़ुदा हूँ मैं
मेरी ख़ुद-परस्ती भी ऐन हक़-परस्ती है
कीमिया-ए-दिल क्या है ख़ाक है मगर कैसी
लीजिए तो महँगी है बेचिए तो सस्ती है
ख़िज़्र-ए-मंज़िल अपना हूँ अपनी राह चलता हूँ
मेरे हाल पर दुनिया क्या समझ के हँसती है
क्या कहूँ सफ़र अपना ख़त्म क्यूँ नहीं होता
फ़िक्र की बुलंदी या हौसले की पस्ती है
हुस्न-ए-बे-तमाशा की धूम क्या मुअम्मा है
कान भी हैं ना-महरम आँख भी तरसती है
चितवनों से मिलता है कुछ सुराग़ बातिन का
चाल से तो काफ़िर पर सादगी बरसती है
तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया कीजिए तो किस दिल से
ज़ौक़-ए-पारसाई क्या फ़ैज़-ए-तंग-दस्ती है
दीदनी है 'यास' अपने रंज ओ ग़म की तुग़्यानी
झूम झूम कर क्या क्या ये घटा बरसती है
चले चलो जहाँ ले जाए वलवला दिल का
दलील-ए-राह-ए-मोहब्बत है फ़ैसला दिल का
हवा़-ए-कूचा-ए-क़ातिल से बस नहीं चलता
कशाँ-कशाँ लिए जाता है वलवला दिल का
गिला किसे है कि क़ातिल ने नीम-जाँ छोड़ा
तड़प तड़प के निकालूँगा हौसला दिल का
ख़ुदा बचाए कि नाज़ुक है उन में एक से एक
तुनक-मिज़ाजों से ठहरा मोआमला दिल का
दिखा रहा है ये दोनों जहाँ की कैफ़ियत
करेगा साग़र-ए-जम क्या मुक़ाबला दिल का
हवा से वादी-ए-वहशत में बातें करते हो
भला यहाँ कोई सुनता भी है गिला दिल का
क़यामत आई खुला राज़-ए-इश्क़ का दफ़्तर
बड़ा ग़ज़ब हुआ फूटा है आबला दिल का
किसी के हो रहो अच्छी नहीं ये आज़ादी
किसी की ज़ुल्फ़ से लाज़िम है सिलसिला दिल का
प्याला ख़ाली उठा कर लगा लिया मुँह से
कि 'यास' कुछ तो निकल जाए हौसला दिल का
सिलसिला छिड़ गया जब 'यास' के अफ़्साने का
शम्अ' गुल हो गई दिल बुझ गया परवाने का
इश्क़ से दिल को मिला आइना-ख़ाने का शरफ़
जगमगा उट्ठा कँवल अपने सियह-ख़ाने का
ख़ल्वत-ए-नाज़ कुजा और कुजा अहल-ए-हवस
ज़ोर क्या चल सके फ़ानूस से परवाने का
लाश कम-बख़्त की का'बे में कोई फिकवा दे
कूचा-ए-यार में क्यूँ ढेर हो परवाने का
वाए हसरत कि तअ'ल्लुक़ न हुआ दिल को कहीं
न तो का'बे का हुआ मैं न सनम-ख़ाने का
तिश्ना-लब साथ चले शौक़ में साए की तरह
रुख़ किया अब्र-ए-बहारी ने जो मय-ख़ाने का
वाह किस नाज़ से आता है तिरा दौर-ए-शबाब
जिस तरह दौर चले बज़्म में पैमाने का
अहल-ए-दिल मस्त हुए फैल गई बू-ए-वफ़ा
पैरहन चाक हुआ जब तिरे दीवाने का
सर-ए-शोरीदा कुजा इश्क़ की बेगार कुजा
मगर अल्लाह रे दिल आप के दीवाने का
देख कर आइने में चाक-ए-गरेबाँ की बहार
और बिगड़ा है मिज़ाज आप के दीवाने का
क्या अजब है जो हसीनों की नज़र लग जाए
ख़ून हल्का है बहुत आप के दीवाने का
आप अब शम-ए-सहर बढ़ के गले मिलती है
बख़्त जागा है बड़ी देर में परवाने का
दिल-ए-बे-हौसला तकता है ख़रीदार की राह
कोई गाहक नहीं टूटे हुए पैमाने का
बज़्म में सुब्ह हुई छा गया इक सन्नाटा
सिलसिला छिड़ गया जब आप के अफ़्साने का
हनूज़ ज़िंदगी-ए-तल्ख़ का मज़ा न मिला
कमाल-ए-सब्र मिला सब्र-आज़मा न मिला
मिरी बहार-ओ-ख़िज़ाँ जिस के इख़्तियार में है
मिज़ाज उस दिल-ए-बे-इख़्तियार का न मिला
हवा के दोश पे जाता है कारवान-ए-नफ़स
अदम की राह में कोई पियादा-पा न मिला
बस एक नुक़ता-ए-फ़र्ज़ी का नाम है का'बा
किसी को मरकज़-ए-तहक़ीक़ का पता न मिला
उमीद-ओ-बीम ने मारा मुझे दो-राहे पर
कहाँ के दैर-ओ-हरम घर का रास्ता न मिला
ब-जुज़ इरादा-परस्ती ख़ुदा को क्या जाने
वो बद-नसीब जिसे बख़्त-ए-ना-रसाना मिला
निगाह-ए-'यास' से साबित है सई-ए-ला-हासिल
ख़ुदा का ज़िक्र तो क्या बंदा-ए-ख़ुदा न मिला
जब हुस्न-ए-बे-मिसाल पर इतना ग़ुरूर था
आईना देखना तुम्हें फिर क्या ज़रूर था
छुप-छुप के ग़ैर तक तुम्हें जाना ज़रूर था
था पीछे पीछे मैं भी मगर दूर दूर था
मुल्क-ए-अदम की राह थी मुश्किल से तय हुई
मंज़िल तक आते आते बदन चूर-चूर था
दो घूँट भी न पी सके और आँख खुल गई
फिर बज़्म-ए-ऐश थी न वो जाम-ए-सुरूर था
वाइज़ की आँखें खुल गईं पीते ही साक़िया
ये जाम-ए-मय था या कोई दरिया-ए-नूर था
क्यूँ बैठे हाथ मलते हो अब 'यास' क्या हुआ
इस बेवफ़ा शबाब पर इतना ग़ुरूर था
मौत आई आने दीजिए पर्वा न कीजिए
मंज़िल है ख़त्म सज्दा-ए-शुकराना कीजिए
ज़िन्हार तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-ईज़ा न कीजिए
हरगिज़ गुनाह-ए-इश्क़ से तौबा न कीजिए
ना-आश्ना-ए-हुस्न को क्या ए'तिबार-ए-इश्क़
अंधों के आगे बैठ के रोया न कीजिए
ताकि ख़बर भी लाइए साहिल के शौक़ में
कोशिश ब-क़द्र-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना कीजिए
वो दिन गए कि दिल को हवस थी गुनाह की
यादश-ब-ख़ैर ज़िक्र अब उस का न कीजिए
सावन में ख़ाक उड़ती है दिल है रुँधा हुआ
जी चाहता है गिरिया-ए-मस्ताना कीजिए
दीवाना-वार दौड़ के कोई लिपट न जाए
आँखों में आँखें डाल के देखा न कीजिए
आप में क्यूँकर रहे कोई ये सामाँ देख कर
शम-ए-इस्मत को भरी महफ़िल में उर्यां देख कर
दिल को बहलाते हो क्या क्या आरज़ू-ए-ख़ाम से
अम्र-ए-नामुमकिन में गोया रंग-ए-इम्काँ देख कर
क्या अजब है भूल जाएँ अहल-ए-दिल अपना भी दर्द
हुस्न-ए-मस्ताना को आख़िर में पशीमाँ देख कर
ढूँडते फिरते हो अब टूटे हुए दिल में पनाह
दर्द से ख़ाली दिल-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ देख कर
दिल जला कर वादी-ए-ग़ुर्बत को रौशन कर चले
ख़ूब सूझी जल्वा-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ देख कर
इम्तियाज़-ए-सूरत-ओ-मअ'नी से बेगाना हुआ
आइने को आइना हैराँ को हैराँ देख कर
पैरहन में क्या समा सकता हबाब-ए-जाँ-ब-लब
हस्ती-ए-मौहूम का ख़्वाब-ए-परेशाँ देख कर
सब्र करना सख़्त मुश्किल है तड़पना सहल है
अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देख कर
और क्या होती 'यगाना' दर्द-ए-इसयाँ की दवा
क्या ग़ज़ल याद आई वल्लाह फ़र्द-ए-इसयाँ देख कर
बैठा हूँ पाँव तोड़ के तदबीर देखना
मंज़िल क़दम से लिपटी है तक़दीर देखना
आवाज़े मुझ पे कसते हैं फिर बंदगान-ए-इश्क़
पड़ जाए फिर न पाँव में ज़ंजीर देखना
मुर्दों से शर्त बाँध के सोई है अपनी मौत
होश उड़ न जाएँ सनअत-ए-बेहज़ाद देख कर
आईना रख के सामने तस्वीर देखना
परवाने कर चुके थे सर-अंजाम ख़ुद-कुशी
फ़ानूस आड़े आ गया तक़दीर देखना
शायद ख़ुदा-न-ख़ास्ता आँखें दग़ा करें
अच्छा नहीं नविश्ता-ए-तक़दीर देखना
बाद-ए-मुराद चल चुकी लंगर उठाओ 'यास'
फिर आगे बढ़ के ख़ूबी-ए-तक़दीर देखना
चराग़-ए-ज़ीस्त बुझा दिल से इक धुआँ निकला
लगा के आग मिरे घर से मेहमाँ निकला
दिल अपना ख़ाक था फिर ख़ाक को जलाना क्या
न कोई शो'ला उठा और न कुछ धुआँ निकला
सुनेंगे छेड़ के अफ़्साना-ए-दिल-ए-मरहूम
इधर से मुल्क-ए-अदम का जो कारवाँ निकला
तड़प के आबला-पा उठ खड़े हुए आख़िर
तलाश-ए-यार में जब कोई कारवाँ निकला
लहू लगा के शहीदों में हो गए दाख़िल
हवस तो निकली मगर हौसला कहाँ निकला
हरीम-ए-नाज़ में शायद किसी को दख़्ल नहीं
दिल अज़ीज़ भी ना-ख़्वांदा मेहमाँ निकला
निहाँ था ख़ाना-ए-दिल में ही शाहिद-ए-मक़्सूद
जो बे-निशाँ था वो दीवार-ए-दरमियाँ निकला
है फ़न्न-ए-इश्क़ का उस्ताद बस दिल-ए-वहशी
मरीज़-ए-ग़म का यही इक मिज़ाज-दाँ निकला
लगा है दिल को अब अंजाम-कार का खटका
बहार-ए-गुल से भी इक पहलू-ए-ख़िज़ाँ निकला
ज़माना फिर गया चलने लगी हवा उल्टी
चमन को आग लगा कर जो बाग़बाँ निकला
हमारे सब्र की खाते हैं अब क़सम अग़्यार
जफ़ा-कशी का मज़ा बा'द-ए-इम्तिहाँ निकला
ख़ुशी से हो गए बद-ख़्वाह मेरे शादी-ए-मर्ग
कफ़न पहन के जो मैं घर से ना-गहाँ निकला
अजल से बढ़ के मुहाफ़िज़ नहीं कोई अपना
ख़ुदा की शान कि दुश्मन निगाह-बाँ निकला
दिखाया गोर-ए-सिकंदर ने बढ़ के आईना
जो सर उठा के कोई ज़ेर-ए-आसमाँ निकला
लहद से बढ़ के नहीं कोई गोशा-ए-राहत
क़यामत आई जो इस घर से मेहमाँ निकला
अब अपनी रूह है और सैर-ए-आलम-ए-बाला
कुएँ से यूसुफ़-ए-गुम-ए-कर्दा-कारवाँ निकला
कलाम-ए-'यास' से दुनिया में फिर इक आग लगी
ये कौन हज़रत-ए-'आतिश' का हम-ज़बाँ निकला
अन्य ग़ज़लकारों शायरों की ग़ज़लें / रचनाएं |
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा की ग़ज़लें / Aziz Bano Darab Wafa Ghazals
क़तील शिफ़ाई की ग़ज़लें / Qateel Shifai Ghazals
मोमिन ख़ाँ मोमिन की ग़ज़लें / Momin Khan Momin Ghazal