परिचय रज्जब (1567–1689), साँगानेर, राजस्थान के भक्तिकालीन संत-कवि थे। विवाह के दिन ही संसार से विरक्त होकर उन्होंने संत दादूदयाल से दीक्षा ग्रहण की। उनकी वाणी में राम-रहीम और केशव-करीम की एकता तथा हिंदू-मुस्लिम समन्वय की भावना प्रमुख है। निर्गुण भक्ति और सांप्रदायिक सद्भाव के स्वर के कारण हिंदी संत साहित्य में उनका विशिष्ट स्थान है। संतो वसुधा वृक्ष समाई रज्जब संतो वसुधा वृक्ष समाई। अद्भुत बात कही को माने, कोण पतीजे भाई॥ मूल न डाल सो अधर अंध्रिपा, बेलि कहाँ बिलमावे। तरुवर त्वचा विहूणा देखा, विहंग न बैठण पावे॥ रहत रूंख फूल फल नाही, त्रिगुण न गुंद प्रकाशे। दोरघ द्रुम देखेगा कोई छाया तिमिर न भासे॥ अकल वृक्ष कंटक कर्म नाहीं, पारिजात पद पूरा। जन रज्जब जुग जुग सो निश्चल, सबकी जीवन मूरा॥ यूँ निर्पख मन भया हमारा रज्जब यूँ निर्पख मन भया हमारा। इन दोनों का देख पसारा॥ माला पहरय्यों तसबी लागै, यासी हूँ कछु नाहीं। ऐसे समझ तजे सब बंधन, क्या पहरै गल माहीं॥ वरत कियों रोज़े रिस माने, इन में कहा बड़ाई। ऐसे जानि तजे सब लंधन, संकट पाशा छुड़ाई॥ देवल जाउँ मसीत मरै जलि, या में क्या सि...