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गोधूलि (कहानी) | Godhooli : हेक्टर ह्यू मनरो

नार्मन गॉर्टस्बी पार्क में एक बेंच पर बैठा हुआ था। उसके दाहिनी ओर शोर-शराबे से भरा हाइड पार्क स्थित था। मार्च का महीना, गोधूलि की बेला थी। सड़क पर अधिक लोग नहीं थे, फिर भी कई लोग विभिन्न मनस्थितियों में इधर से उधर, एक बेंच से दूसरी तक घूमते नज़र आ रहे थे। गॉर्टस्बी को यह दृश्य पसंद आया, उसकी मौजूदा मन:स्थिति से वह मेल खाता था। गोधूलि, उसके अनुसार पराजय की घड़ी थी, जब पराजित तथा निराश स्त्री-पुरुष अपने को लोगों की नजरों से छिपा कर यहाँ आ बैठते थे। ऐसी घड़ी में उनके हाव-भाव, वेश-भूषा में कोई कृत्रिमता नहीं होती थी। उलटे वे उनकी ओर से उदासीन रहते थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उस मन:स्थिति में लोग उन्हें पहचान पाएँ। वहाँ बैठा-बैठा गॉर्टस्बी भी अपने को पराजित लोगों में मानने लगा। उसे धनाभाव नहीं था और यदि वह चाहता, तो अपने को समृद्धिशाली वर्ग में गिनवा सकता था। उसे तो पराजय का अनुभव हुआ था, अपनी किसी महत्त्वाकांक्षा को लेकर। बेंच पर उसके बग़ल में ही एक वृद्ध बैठा था। उसके कपड़े-लत्ते विशेष अच्छे नहीं थे। फिर वह उठा और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो गया। अब उसकी जगह आकर बैठा एक युवक, जिसक...