उन्होंने हमें एक बड़े सफ़ेद कमरे में धकेल दिया था। मेरी आँखें चौंधियाने लगी थीं, क्योंकि वहाँ का प्रकाश आँखों को चुभ रहा था। तभी मेरी नज़र एक मेज़ पर पड़ी। उसके पीछे चार आदमी बैठे काग़ज़ों को देख रहे थे, वे सैनिक नहीं दिख रहे थे। क़ैदियों का एक जत्था पीछे की तरफ़ खड़ा था और हमें उनमें शामिल होने के लिए पूरे कमरे को पार करना था। उनमें से कइयों को मैं जानता था और कुछ अजनबी विदेशी थे। जो मेरे सामने थे, उनके बाल भूरे थे और सिर गोल। वे एक जैसे लगते थे। उनमें से छोटे क़द वाला बार-बार अपनी पैंट को ऊपर खींचता। वह काफ़ी नर्वस लग रहा था। तीन घंटे बीत गए। मुझे चक्कर आ रहे थे और सिर बिलकुल ख़ाली-सा हो गया था। कमरा ख़ूब गर्म था और सुखद लग रहा था, क्योंकि पिछले चौबीस घंटों से हम लोग ठंड से काँप रहे थे। गार्ड एक-एक करके क़ैदियों को मेज़ तक लाए, चारों आदमियों ने सबसे उनके नाम और व्यवसाय पूछे। अधिकतर समय उन्होंने ख़ास कुछ नहीं किया, बस एक-आध सवाल इधर-उधर पूछते रहे, “बारूदख़ाने पर हुए हमले से तुम्हारा क्या संबंध है? या नौ तारीख़ की सुबह को तुम कहाँ थे और क्या कर रहे थे? वे जवाब बिलकुल नहीं सुन रहे थे, कम से कम लग तो य...